कविता

सुश्री मिलिका लिलिक,
मूल रचनाकार, सर्बिया (योरोप) की प्रख्यात वरिष्ठ कवयित्री ‘मिलिका लिलिक’ (Milica Lilic) 

अनुवादक: पूना की प्रतिष्ठित लेखिका एवं पूर्व प्रोफैसर सुश्री दीप्ति गुप्ता 


दूरी का स्पर्श

दूर की बात जान लेने वाले मेरे हाथ 

जादू-टोने वाले ओझा के हाथों 

की तरह तपते हुए

मेरी सोच के अनुसार जुम्बिश करते है 

अपनी चुनी हुई चीज को छूते हैं !

ऐसे ही एक पल में वे तुमसे टकराए थे 

वे आँखों से बेहतर देख पा रहे थे 

उन्होंने निर्दोषता से मेरी रहनुमाई की 

तुम्हारा वजूद और एहसासत हमेशा 

मुझे आकर्षित करते रहे !

मैं एक या दो ही शब्द लिखती हूँ के 

तभी अपने भीतर और आस-पास इन्द्रधनुष 

की झलक का एहसास होता है 

तेज गति वाली दो जल-धार 

जैसे परस्पर विलय हुई हों 

शब्दों की शक्ति से परिचित 

यह उनको नीचे की ओर गति से बहाता है 

मूल की शक्ति से समन्वित हुए

मन में जो खरा है और सच्चा है, वो 

अन्तरतम की तपिश से बाहर की ओर 

अंदर के गहन रास्ते से बह निकलता है

मैं शब्दों को एक-एक करके छूती हूँ 

वे सहज ही ऊर्जा का संचार करते हैं 

इनका आप तक पहुँचना 

आपको उल्लास से भरता है 

तभी तुम मेरे लिए सारे दरवाज़े 

खोल देती हों-एक नारी

तुमको क्या तोड़ता है, इस बारे में 

तुम्हे पता नहीं चल पाता 

या आग सा स्पर्श अथवा शब्दों की ताकत 

इनमें से  कोई  एक है 

तुमको पराजित कर देता है 

तुम्हारे-मेरे दूर, बहुत दूर होने का रहस्य 

जो तुम्हारे साथ एकाकार होने पर अक्सर 

झिलमिल- झिलमिल झिलमिलाता है ! 


अनुपस्थिति की उपस्थिति 

तुम वो स्याह चाँद हो, जो मुझे 

तुम्हारी ओर आकर्षित करता है 

और मैं तुम्हारी ओर सम्मोहन में बंधी 

ऊपर की ओर खींचती चली जाती हूँ 

तुम मेरे पास न होते हुए भी

मुझ में बहुत अधिक समाए हुए हो 

मैं तुम्हारे वजूद के खास 

क्षितिजों के साथ एक हो जाती हूँ 

मैं ‘लिलिथ’, हमेशा तुमसे 

कुछ न कुछ चाहती रहती हूँ !

तुम मुझमें सिर्फ अपने ख्यालों 

से प्रवेश कर सकते हो 

तुम इस बात को बखूबी जानते हो 

और तब तुम मेरे संकेत की 

मेरी सहमति की प्रतीक्षा करते हो

हालांकि मेरे अन्तर्मन के द्वार बहुत बुलंद हैं

पर, तुम्हारे सिर्फ एक माकूल 

शब्द के स्पर्श से वे खुल सकते हैं 

स्पष्टता के  बीच में 

वह मेरी रगों में आक्रोश भरता है 

वह मेरे और तुम्हारे बीच में 

मानो साक्षात नदी बन जाता है 

हमारी कर्मों को धोने के लिए 

समा जाता है मेरी कविता की 

शाश्वतता में कभी भी, 

अलग न होने के लिए !

मध्यरात्रि में एकाएक उग आए

सूरज को छुपाने के लिए 

जो मादक सा चमकता है

पर विरोध करता है 

जैसे कि सलेटी कबूतर 

किसी पीड़ा से बेचैन हुआ मदद के लिए 

बार-बार तुम्हारे ऊपर चक्कर काटे जाता है 

और पीड़ा को दबाते हुए, तुमको

मानो धीमी नरम आवाज़ में पुकारता है 

पूर्णमासी के उत्सव में 

जहाँ मैं श्वेत परिधान में नृत्य करूँगी

एक फक्कड दरवेश की तरह 

गोल-गोल घूमते हुए 

सिर चकरा देने वाला नाच करूँगी

जब तुम पूरी तरह 

मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से

हर तरह से तैयार हो जाओगे 

मैं एकाएक गायब हो जाऊँगी...!


कविता

डॉ. अभिषेक कुमार, बलिया, बेगूसराय, मो. 9304664551 


सिगरेट का एक कश 

सिगरेट का एक कश

और उलझनों का धुआँ-धुआँ 

होकर आसमान की ओर उठना 

कभी विरल होकर, कभी सघन होकर

घनीभूत पीड़ाओं से लुप्त होती चंचलता 

वेदना से अस्थिर मन की विकलता 

अभिव्यक्ति की विवशता 

और सिगरेट का एक कश

पीड़ाओं के धुएँ का उठता गुबार 

वेदनाओं का बनता छल्ला 

और अभिव्यक्ति की सुलगती राख 

परत दर परत सघन से विरल होती संवेदनाएं 

क्षीण हो मिटती मानवतायें 

हैवानियत का शोर 

कभी भीड़ के शक्ल में तो कभी 

सत्ता पोषित उन्माद के रूप में 

कभी सरकारी डंडों में खोती इंसानियत 

तो कभी सांप्रादायिक झंडों में गुम होती जनआकांक्षा 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

आहिस्ता-आहिस्ता आसमान की ओर उठता हुआ

और आसमान की नीरवता भरी शून्यता में समाता हुआ

कहीं अदृश्य हो जाता है,

चेतना के स्तर पर शायद अस्तित्व ही नहीं

लाल-लाल भोर का उगता हुआ सूरज 

लाल-लाल शाम का डूबता हुआ सूरज 

भोर और शाम में आसमान की लालिमा 

लाल-लाल गोश्त और लाल-लाल रक्त 

गुस्से से लाल-लाल आंखें 

अब तो डर लगता है लाल रंग और उसके सोहबत से

सिगरेट का एक कश

हिम्मत का बढ़ जाना, सीने पर चढ़ जाना 

प्रतिबिम्ब का सुनहले फ्रेम में मढ़ा जाना 

सुनहले रंग के मध्य सिंदूर की लाली का उभरना 

कपाल के मध्य लाल बिंदी का खिलना 

मोटर की घरघर 

ट्रेन की सिटी 

व्यस्त ट्रैफिक और सिग्नल 

उत्पीड़न की नई दास्तान 

बेलगाम रसीदी चालान 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

वायुमंडल में छेद 

प्रदूषण का विभेद 

भूजल का पाताल गमन 

कुंज का उजड़ा चमन 

पेड़ों की कटाई 

वनों की सफाई 

कंक्रीट के जंगल की फैलती हुई दुनिया 

चिमनियों के धुएँं में घुलती हुई दुनिया 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

अनुदान की बेमिसाल राग 

मुफ्तखोरों से आबाद समाज 

दलाली की विकसित होती प्रवृति 

भ्रष्टाचार की अपसंस्कृति 

खून का उबाल और कौन करे बखेड़ा-बबाल

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

साहित्य में रास-रंग 

कृष्ण के सुदर्शन पर भारी पड़ता कंस 

शूर्पणखा की कटी नाक 

स्टेटस बड़ी खतरनाक 

राम कंदराओं में छुप गए 

रावण का विजयी अट्टहास 

साधना से बुद्ध का मोह भंग 

सत्य से हरिश्चन्द्र तंग 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

बाबा की बाबागिरी 

चेलों की चमचागिरी 

प्रफुल्लित मन में वेदना की तरंग 

कूद-फांद कर छूना चाहे सरंग 

ईष्र्या द्वेष की बड़ी तीखी जलन 

नफरत की सार्वभौमिक प्रचलन 

श्रेष्ठ हुए बिना सर्वश्रेष्ठ कहलाने की सारी जुगत

कौआ पीताम्बरी ओढ़ बन बैठा बगुला भगत 

मठाधीशों से आबाद आज का हर मठ 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ-धुआँ 

चाँद और चंद्रयान 

राजनीतिक तलबार ढूंढती 

वोट से बनी म्यान

मैंने मारा, मैंने बचाया

मैंने जिलाया, मैंने तारा 

तू नहीं, तू भ्रम 

तूने ही डुबाया 

तूने ही मिट्टी में मिलाया 

मैं-मैं, तू-तू का छिड़ा द्वंद्व 

सिगरेट का एक कश

और सब धुआँ धुआँ 

मुर्दों की बस्ती में धुआँ ही धुआँ,

सिगरेट का एक कश 

और उलझनों का धुआँ-धुआँ

होकर आसमान की ओर उठना 

कभी विरल होकर कभी सघन होकर।


कविता

सुश्री आशा पाण्डेय
अमरावती, महाराष्ट्र, मो. 9422917252, 09112813033

मैं एक नदी 

मैं एक नदी 

तटों-बांधों का नियंत्रण सहती 

दुःख को समेटती 

सुख को बिखेरती सींचती, उगाती 

अनवरत श्रमरत हूँ 

मुझे डुबाने का प्रयास सतत जारी है 

किंतु मैं स्थिर हूँ।

आता है उफान अंतस में मेरे भी 

किंतु संयम रख लेती हूँ 

ताकि कल-कल की स्वर-लहरी का 

संगीत फूटता रहे 

पथिक ले सकें विश्राम मेरे आंचल में।

फूटती रहें असंख्य प्रेम-धाराएं 

जो हरा-भरा कर दें 

सूखे बंजर हृदय को। 

युगों-युगों से 

पाला गया ये भ्रम 

कि रोक देंगे मेरी निर्बाध गति को 

पोसती रही मैं खुश होकर 

क्रोध में उफन पडूं 

और डुबो दूँ बह्मांड 

ये शक्ति है मुझमें 

किंतु सृष्टि चलती रहे 

और सभ्यताएँ फैलती रहें 

इसलिए मैं स्वयं ही डूबती हूँ 

और डूबती ही जा रही हूँ 

स्वयं की अथाह गहराई में।


गिद्ध                                                          

कई दिन से 

एक गिद्ध मंडरा रहा है 

हमारे मुहल्ले के ऊपर।

जब मै उसे देखती हूँ 

तो डर के मारे काँप जाती हूँ 

क्योकि पाल रखी है मैंने 

एक कुतिया ,गाय एवं खरगोश।

यूँ तो मुहल्ले में कई जानवर हैं 

किंतु मुझे इन तीनों की ही चिंता है। 

इंतजार है मुझे, किसी पड़ोसी का 

कुत्ता या बिल्ली मर जाये 

बंद हो जाये गिद्ध का मंडराना 

क्योंकि कहते हैं, 

गिद्ध आता है तभी आस-पास 

जब कोई जानवर मर गया हो 

या मरनेवाला हो। 

हर दिन सुबह और शाम मैं टोहती हूँ 

मरा किसी का जानवर ?

मेरे पड़ोसी भी

घूम-घाम कर पता लगाते हैं 

मेरी गाय, खरगोश एवं कुतिया का स्वास्थ्य। 

मैं और मेरे पड़ोसी 

गिद्ध के दिखाई पड़ने से चिंतित हैं 

झांक लेते हैं एक दूसरे का आँगन 

किंतु वे भी होते निराश 

मेरे खरगोश को फुदकता,

कुतिया को भौंकता देखकर 

मैं भी होती निराश 

उनके कुत्ते को उछलता देखकर।

जब कई दिनों तक  

गिद्ध दिखाई पड़ता रहा

नहीं मरा कोई जानवर 

तब किया हमने ज्योतिषी से प्रश्न 

बताई अपनी मनःस्थिति।

ज्योतिषी मुस्कराया, 

‘‘मर रही हैं 

इस मुहल्ले की संवेदनाएं,

भाईचारा, आत्माएं एक के बाद एक

तभी देखना चाहते हैं आप 

पड़ोसी का मरा और अपना भौंकता कुत्ता  

जब तक ये मरती रहेंगी 

दिखाई पड़ता रहेगा गिद्ध यूँ ही 

आप के मुहल्ले के ऊपर 

और आस-पास भी’’ 


संपादकीय

आज की डाक से वनिका पब्लिकेशन्स से एक पार्सल मिला। खोला तो देखा नासिरा जी का बाल साहित्य पर एक और सद्यः प्रकाशन, बाल कहानी संग्रह ‘रंगीन परों वाला सपना’ पुस्तक देखते ही मेरे शिशु मन के रंगीन पर भी फड़फड़ाने लगे। और मुझे अपने अतीत के आकाश को ले उड़े। मैंने उन सब सितारों को पहचान लिया। जिनके साथ मैं ‘‘लुका छिपी’’ खेला करता था। मुझे अपने मुण्डन संस्कार का स्मरण हो आया। जब मैं खूब रोया था कि मेरे बाल कहाँ गए ? मेरे भाई ने कहा ‘‘कौवा ले गया’’ तो मैंने कहा था ‘‘कौवे से छीनकर लाओ’’। मेरी बहनों ने कहा ‘‘नहा लो लड्डू मिलेगा’’ मैंने कहा ‘‘मुझे तो अपने बाल ही चाहिएं’’। नाई ने बालों का ढेर मेरे आगे रख दिया। मैंने कहा ‘‘मेरे सर पर लगाओ’’। नाई ने कहा ‘‘ये बाल गंदे हो गये थे। अब तुम नहा लो- मैं एक चीज़ ऐसी लगाऊँगा कि दो दिन में नए बाल आ जाएंगे।’’- मैं खुश हो गया। और रोना बंद कर दिया। 

बचपन कितना मासूम होता है। नाई की बात कितनी जल्दी समझ में आ गई। 

नासिरा जी को इस बाल कहानी संग्रह पुस्तक के सद्यः प्रकाशन पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ:-



आलेख

प्रो. रामस्वार्थ ठाकुर
चंपारण (बिहार) मोः 9953630062, 9910220773 

मैं क्यों लिखता हूँ?

मुझे साहित्य के अध्ययन, अध्यापन और सृजन में समान रूप से आनंद मिलता रहा है और मेरे साहित्य से जुड़ने का समृद्ध आधार भी इसी अध्ययन से तैयार हुआ है। मैं हिंदी के विश्वविद्यालय प्रोफेसर के रूप में हमेशा यह महसूस करता रहा कि अध्ययनशील व्यक्ति ही सुयोग्य शिक्षक हो सकता है। यह अध्ययनशीलता ही है जिससे व्यक्ति के चतुर्दिक ज्ञान का सागर अहर्निश लहराता रहता है और जब एक अध्ययनपरायण व्यक्ति अध्यापन की सेवा में होता है, वह अध्ययन से अर्जित ज्ञानराशि को मुक्तहस्त अपने छात्रों को देता रहता है और उसमें कमी नहीं होती है। वस्तुतः आज कहीं भी जो लिखित साहित्य है, चाहे जिस ज्ञानक्षेत्र का ही हो, उसकी उपयोगिता या सार्थकता इसी में है कि उसे लोग पढ़ें। और इस पाठक समूह को तैयार करने का श्रेयस्कर कार्य सुयोग्य, सुपठित शिक्षकों से ही संपन्न हो सकता है। विश्वविद्यालय प्रोफेसर केवल व्याख्याकार अथवा वर्ग शिक्षक नहीं होता, छात्र के लिए उसकी भूमिका एक उत्प्रेरक या मार्गदर्शक अथवा मोटिवेटर की भी होती है जो उसके भविष्य निर्माण के लिए अधिक आवश्यक होती है। वहीं अध्यापक या प्रोफेसर जब सृजनात्मक लगन और निष्ठा के भी होते हैं तब उनके पुस्तक, ग्रंथों में पढ़े ज्ञान, विषय, वस्तु की गरिमा और अधिक बढ़ जाती है। यह सर्वविदित ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदी भाषा और साहित्य का निर्माण ऐसे ही सुयोग्य सृजनात्मक प्रतिभा के धनी अध्यापकों से हुआ है। श्री हरिऔध जी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ऐसे ही अध्यापक थे जिन्होंने अध्यापक और सृजनशील साहित्यकार की महती भूमिकाएं निभाईं। किंतु उनकी योग्यता, लगन, निष्ठा का श्रेय किसी विश्वविद्यालय को नहीं दिया जा सकता। ये लोग किसी विश्वविद्यालय के छात्र नहीं रहे थे, फिर भी विश्वविद्यालयों के निर्माता सिद्ध हुए। आज भी कहीं भी कुछ हिंदी में सृजनात्मकता दिखाई दे रही है वह उन्हीं आचार्य-अध्यापकों की देन है, जो केवल पढ़ाते नहीं थे, स्वयं पढ़ते भी थे, लिखते भी थे और अपने छात्रों को लेखन-अध्ययन की उत्प्रेरणाएं भी देते थे। मैं स्वयं भी उस महान गुरु परंपरा का ऋणी महसूस करता हूं और उनके  कृतित्व के संरक्षण, परिष्कार और परिवर्द्धन के प्रति सजग सचेष्ट रहा हूं। निस्संदेह जिस प्रकार परिवार में माता-पिता के ज्ञान-शील-आचार के संस्कारों से ही संतान का चरित्र निर्माण होता है, उसी तरह शिक्षा-शिक्षण के श्रेष्ठ संस्कार भी छात्र को अपने गुरुजनों और अध्यापकों से ही मिलते हैं। अपने गुरुजनों की कृतियों का अध्ययन करके ही छात्र प्रामाणिक बनते हैं और गौरवान्वित भी होते हैं। मेरी अध्यापकीय सेवाओं का एक हिस्सा साहित्य के अध्ययन और सृजन के लिए भी था। इसी की सफल सुंदर परिणति मेरी कुछ प्रकाशित रचनाएं हैं। उनमें एक लघु उपन्यास, एक ललित निबंध संग्रह, और दो आलोचना कृतियां हैं। छात्रों को पढ़ाने के क्रम में हमें साहित्य सृजन के कौशल को भी समझने का अवसर मिला और मैंने उसके संबंध में चिंतन भी किया। मैंने इस क्रम में यह अनुभव किया कि साहित्य-सृजन एक बहुत ही कठोर श्रमसाध्य कर्म भी है। एक साहित्यिक रचनाकार को रचनाकर्म के क्रम में कई स्तरों पर मानसिक-शारीरिक, भावात्मक, विचारात्मक श्रम से भी गुजरना पड़ता है। इस प्रसंग में सर्वप्रथम स्मरण आते हैं बाबू देवकीनंदन खत्री। उन्होंने तिलिस्मी और ऐयारी को विषयवस्तु बनाकर चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति और भूतनाथ जैसे उपन्यास, लिखे जिनकी विषयवस्तु और भाषा शैली की लोकप्रियता और चारुता से आकृष्ट होकर खड़ी बोली हिंदी पढ़नेवालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। इसी तरह, हिंदी साहित्य के निर्माता साहित्यकारों ने बड़ी संख्या में रचनाएं कीं। गुरुदत्त ने 68, भैरवप्रसाद गुप्त ने 14, यादवेंद्र शर्मा चंद्र ने 19, कृशन चंदर ने 28, चतुरसेन शास्त्री ने 15, यज्ञदत्त शर्मा ने 19, प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने 12, गोविंदवल्लभ पंत ने 18, भगवतीप्रसाद वाजपेयी ने 35, उपेंद्रनाथ अश्क ने 12, यशपाल ने 13, जैनेंद्र कुमार ने 12, भगवतीचरण वर्मा ने 12, वृंदावनलाल वर्मा ने 25, प्रेमचंद ने 12, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने 9, नागार्जुन ने 10 उपन्यास लिखे। ये समस्त कृतियां अलग-अलग कई-कई सौ पृष्ठों में हैं। और इस क्रम में यहां उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि इन रचनाओं में विषय वस्तु और भाषा-शैली की दृष्टि से कहीं भी कुछ भी त्रुटि लक्ष्य नहीं की गई है। ये सारे लेखक अपनी कृतियों के कारण बहुत बड़े-बड़े सजग पाठक समूहों द्वारा भी सम्मानित और लोकप्रिय हुए दिखाई देते हैं। इसका स्पष्ट कारण इन लेखकों की प्रतिभा निपुणता के साथ अभ्यास और श्रमनिष्ठा भी रही। है। किन्तु, अपने श्रेष्ठ और प्रशंसनीय कृतित्व कौशल से सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन-दशाओं को अभिव्यक्ति देनेवाले इन कालजयी मनीषियों की चिंता कहां, किसे रही है? कहीं किसी एकांत कक्ष में लगातार अहर्निश एक स्थान पर घंटों बैठकर कहानी-उपन्यास, नाटक, निबंध, आलोचना, कविता के लेखकों के इस त्याग, तपस्यापूर्ण जीवन को आज कितने लोग जानते हैं? शायद किसी को जिज्ञासा, उत्सुकता, सहानुभूति भी न हो उन लेखकों और रचनाकारों के अभाव, पीड़ा और कष्टभरे जीवन के संबंध में। भले ही, कुछ साहित्यकार बंधुओं ने ही उसकी खोज-खबर ली हो, जैसे विष्णु प्रभाकर जी ने ‘आवारा मसीहा‘ लिखकर बांग्ला के महान साहित्यकार शरतचंद्र को स्मरण किया। दिनकर जी ने ‘‘संस्मरण और श्रद्धांजलियां‘ लिखकर हिंदी के महान साहित्यकारों को याद किया। क्षेमचंद्र सुमन ने ‘दिवंगत हिंदी सेवी‘ लिखकर हिंदी के महान रचनाकारों के जीवन की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया। फिर भी, महाप्राण निराला की मनोव्यथा- ‘‘दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूं आज जो नहीं कही‘‘ को कितने लोग जान पाये? साहित्य सृजन कर्म द्वारा आत्मोन्नयन के साथ लोकोन्नयन का भी उद्देश्य साथ लेकर चलने वाले साधकों का जीवनवृत्त सभ्यं समाज की दृष्टि से सदा ओझल ही रहा, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है। सभ्य समाज के समक्ष अक्षर साधकों का जो भी स्थान रहा हो, इसका महत्व उतना नहीं है जितना अक्षर कर्म को ही जीवन का लक्ष्य बनानेवालों के लिए है। मेरा निश्चित विचार है कि जो भी नवयुवक कविता, कहानी, उपन्यास अथवा आलोचना विधा में लेखन कार्य करना अपने जीवन का उद्देश्य मानें, उन्हें अपनी रुचि के अनुरूप साहित्यकार, लेखक, कवि के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व के संबंध में विस्तार से जानने का प्रयत्न करना चाहिए। लेखकों की आत्मकथा, उनके संस्मरण और जीवनियों को पढ़ना चाहिए। इससे उन्हें साहित्य के अक्षर साधकों को समझने और पहचानने का अवसर मिलेगा। अक्षर साधक और रचनाकार-कलाकार समाज, मानव-समूह के सम्मानजीवी व्यक्तित्व होते हैं। उन्हें द्रव्य, पद अथवा सुविधा के साधन मिलें या न मिलें, वे लोकहित के लिए सृजनकर्म में लगे ही रहते हैं। मनुष्य को जीना ही नहीं चाहिए, उसे सम्मान सहित भी जीना चाहिए, यह शिक्षा हमें महान साहित्यसेवी ही देते हैं। जीवन में परेशानियां, दुःख-दर्द, अभाव, कठिनाइयां चाहे जितनी भी आई हों, उन लोगों ने राजसत्ता, राजपुरुष के आगे कभी हाथ नहीं पसारे और इस तरह उन लोगों ने मानव, मानवता के गौरव को जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया । गोस्वामी तुलसीदास जी के संबंध में सब जानते हैं कि उन्होंने बादशाह अकबर की मनसबदारी को बड़ी सहजता से अस्वीकार कर दिया था। आधुनिक काल में भी ऐसे अनेक मनस्वी साहित्य साधक मिलते हैं, जिनके आगे मानव-गौरव और आत्मसम्मान का सर्वोपरि स्थान था। 

साहित्य-साधक या रचनाधर्मी को अध्ययनशील, मननशील होना चाहिए। उसे अपने समाज, देश, इतिहास, पुराण, कला-संस्कृति की भी प्रामाणिक जानकारी होनी चाहिए। बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि प्रेमचंद जी ने लिखना प्रारंभ करने के पूर्व ‘कथासरित्सागर‘ और ‘बृहत्कथा‘ के उर्दू अनुवाद को पढ़ लिया था। वहीं, जयशंकर प्रसादजी भारतीय वेद, उपनिषद, पुराण, इतिहास के गंभीर ज्ञाता थे। उनका ‘कामायनी‘ महाकाव्य और ऐतिहासिक नाटक इसके प्रमाण हैं। महादेवी जी, पंत जी, निराला जी, दिनकर जी, अज्ञेय जी, जैनेंद्र जी और शेष अनेक साहित्यकारों की श्रेष्ठता का कारण भी उनका विशाल अध्ययन ही रहा है। प्रसादजी की ‘कामायनी‘ के ‘कर्म‘ सर्ग के भावों और चिंतन पर श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के कर्मयोग का सीधा स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। अब यदि कोई विश्वविद्यालय अध्यापक गीता के तीसरे अध्याय को पढ़े बिना कामायनी के कर्म सर्ग को छात्रों को पढ़ाएगा तो वह क्या पढ़ाएगा? इसी प्रकार, ‘कामायनी‘ के आमुख में प्रसादजी ने श्रद्धा की प्रतिष्ठा की है जिसका आधार ऋग्वेद का श्रद्धा सूक्त ही है। ऋग्वेद के दशम मंडल के 151वें सूक्त को श्रद्धा सूक्त कहा गया है। इस सूक्त में श्रद्धा की महिमा का गान है। इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवों में बड़े-छोटे का भेद नहीं है। यही समरसता और समन्वय इस सूक्त का सार है। सभी यज्ञकर्म में इसी श्रद्धाभाव की धारणा की आवश्यकता बतलाई गई है। ऋषि ने इस सूक्त में श्रद्धा का आवाहन देवी के रूप में करते हुए कहा है, वह हमारे हृदय में श्रद्धा उत्पन्न करे।

श्रद्धां देवा यजमाना वायु-गोपा उपासते। / श्रद्धा दृहय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु ।। (ऋग्वेदः 10/151/4) 

(बलवान वायु से रक्षण प्राप्त करके देव और मनुष्य श्रद्धा की उपासना करते हैं। वे अंतःकरण में श्रद्धा की ही उपासना करते हैं। श्रद्धा से धन प्राप्त होता है।) 

श्रद्धां प्रातहवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि। / श्रद्धां सूर्यस्य निमुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः ।। (ऋग्वेदः 10/151/5) 

(हम प्रातःकाल में श्रद्धा की प्रार्थना करते हैं। मध्याह्न में श्रद्धा की उपासना करते हैं। हे श्रद्धादेवी! इस संसार में हमें श्रद्धावान बनाइये।)

कामायनी के ही प्रमुख पुरुष पात्र (‘‘एक पुरुष”-कामायनी चिंता सर्ग- प्रथम पद में प्रयुक्त संबोधन) का विशेष 

पौराणिक परिचय श्रीमद्भागवतपुराण के आठवें अध्याय में है, जिसे कामायनीकार ने उसी रूप में कामायनी में ग्रहण किया है (द्रष्टव्य- कामायनी- आमुख)। यही नहीं, कामायनी के सभी 15 सर्गों का नाम- चिन्ता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईष्र्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य, आनंद-भी वेद, उपनिषद और पुराणों से लिये गए शब्द हैं। यहां यह सब लिखने का तात्पर्य यह है कि किसी लेखक की रचनाकृति की आलोचना, टिप्पणी, समीक्षा करने के लिए उस रचनाकार के ज्ञानस्रोत तक भी पहुंचना आवश्यक होता है। आज के पाठकों, अध्यापकों, और आलोचकों में बहुधा इसकी कमी देखी जा सकती है। कुंवर नारायण की कृति ‘आत्मजयी‘ का स्रोत ‘कठोपनिषद‘ के उद्दालक ऋषि के पुत्र नचिकेता का यम के साथ संवाद है। अतः ‘आत्मजयी‘ का परायण, पाठन, अध्यापन कठोपनिषद को पढ़े बिना उचित नहीं होगा।

मुझे उच्च शिक्षा का अवसर चंपारण (मोतिहारी) से ज्ञान और अध्यात्म संस्कृति की राजधानी काशी तक निवास और गुरुजनों के कृपामय सान्निध्य में मिला । मोतिहारी में नित्य प्रणम्य गुरुवर प्रोफेसर रामाश्रय प्रसाद सिंह से मुझे उच्च शिक्षा की उत्प्रेरणाएं मिलीं। उनके प्रोत्साहन, सहयोग और दिशा-निर्देशों में ही मैंने काव्य-साहित्य को पढ़ने-समझने का पवित्र संस्कार प्राप्त किया और उसी का सुंदर परिणाम स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध-अनुसंधान की शिक्षाओं के प्रति जिज्ञासा में दिखाई दिया। स्नातकोत्तर अध्ययन का दिशा निर्देश मुझे पूज्य गुरुवर डॉक्टर विनय कुमार, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर और उनके सहयोगी गुरुवर प्रोफेसर कामेश्वर शर्मा, प्रोफेसर शुकदेव सिंह, प्रोफेसर अवधेश्वर अरुण, प्रोफेसर महेंद्र मधुकर से प्राप्त हुए। ये सभी उन दिनों विश्वविद्यालय के कृतविद्य यशस्वी विद्वान थे जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य में सुन्दर कार्य करने हेतु सुयोग्य नई पीढ़ी का निर्माण किया। उनकी अध्ययननिष्ठा और उत्प्रेरणाओं से हम कई जिज्ञासु छात्रों को साहित्य पढ़ने और लिखने के सुसंस्कार प्राप्त हुए जिसका सुफल आज हमें अपने काव्यालोचन-विवेक और सृजन में दिखाई देता है। अपने शोध-कार्य को पूरा करने के लिए मुझे शोध पर्यवेक्षक यशस्वी विद्वान कवि-आलोचक डॉ. शंभुनाथ सिंह (काशी विद्यापीठ) के सान्निध्य में रहने का सुअवसर मिला। उनके सान्निध्य से भी मुझे एक सुयोग्य अनुसंधाता, शिक्षक और साहित्यसेवी बनने की दीक्षा मिली। परमपूज्य आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का कृपामय आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य यहीं प्रतिफलित हुआ जहां उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ‘‘ऐतिहासिक हिंदी व्याकरण लेखन परियोजना‘‘ में अपने साथ शोधकार्य करने का अवसर देकर अनुगृहीत किया। यही उनसे हमें सीख मिली कि लेखक को पुराना लिखित साहित्य अवश्य पढ़ना चाहिए। पुराना पढ़ने से ही नए चिंतन के आयाम दिखाई देते हैं। वहीं उन्होंने मुझे लेखक के दो शत्रुओं का भी संकेत दिया था और कहा था- ‘‘सुनो, लेखक के दो शत्रु होते हैं- प्रमाद और क्षिप्रता। प्रमाद का अर्थ है आलस्य और क्षिप्रता यानी जल्दबाजी। लेखन में इन दोनों से बचना चाहिए।‘‘ अनेक लोग जन्मजात प्रतिभासंपन्न होते हुए भी प्रमादवश साहित्यसेवी नहीं बन पाते और कई लोग क्षिप्रता में भी पीछे छूट जाते हैं। आज मैं अपने कृतविद्य महान साहित्यकारों, लेखकों और आलोचकों को देखता हूं तो पूज्य द्विवेदी जी की सीखें अक्षरशः सत्य दिखाई देती हैं। अब इस कविता संकलन के बारे में। यूं तो हर रचनाकार को अपनी रचना पसंद होती है, किन्तु, पाठक समूह को जो रचना जितनी प्रिय होती है, वही उसकी श्रेष्ठता भी मानी जाती है। इस दृष्टि से ही यह संकलन आपके हाथों में है। मैं साहित्य सृजन की हर विधा में लघु रचना को ही पसंद करता हूं। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि जहां बृहदाकार कृतियां पुस्तकालय की शोभा होती हैं, वहीं लघु रचनाएं पाठकों का कंठहार बनकर प्रशंसनीय होती हैं। हिंदी के ही मध्यकालीन कवियों - कबीर, तुसली, रहीम, बृन्द, बिहारी की लोकप्रियता का कारण उनकी रचनाओं की लघुता ही रही है। आज भी अपढ़-सुपठित, साक्षर-निरक्षर, सभी को उपरोक्त कवियों की रचनाएं आसानी से याद हो सकती हैं। वे बड़ी सहजता से किसी मौके पर तुलसी की कोई अद्र्धाली बोल देते हैं- ‘का बरसा जब कृषि सुखानी‘। बिहारी सतसई की लोकप्रियता भी उसकी रचनाओं की लघुता में ही छिपी है- ‘सतसैया के दोहरे, अरु नावक के तीर, देखन में छोटन लगे, घाव करें गंभीर।‘ यही कारण रहा कि भारतेंदु जी से लेकर छायावाद-प्रयोगवाद तक के लगभग सभी श्रेष्ठ कवियों की पहचान उनकी लघु आकार की कविताओं से ही पाठकों के बीच सुरक्षित और सुनिश्चित हुई। आज हरिऔध जी, मैथिलीशरण गुप्त जी, और छायावादी कवियों प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी जी, प्रगतिवादी अज्ञेय जी के बाद दूर-दूर तक ऐसे कवियों की कमी दिखाई देती है जिनकी कविताएं सहज ही लोकग्राह्य बन जाएं । आज हमें कवि और कविता की पहचान ढूंढने के लिए पुनः द्विवेदी युग के श्रीधर पाठक, गुप्त जी, हरिऔध जी से छायावादी कवियों तक ही आकर ठहर जाना पड़ता है। अपने 35-40 वर्षों के साहित्य के अध्ययन-अध्यापन और कुछ लेखन के बाद मैं अब उन्हीं पुराने कवियों की रचनाओं को पढ़ रहा हूं। दिनकर, नेपाली, बच्चन को पढ़ रहा हूं। प्रसाद जी की कामायनी और लहर को पढ़ रहा हूं। पंत जी की वीणा, ग्रंथि, गुंजन को बार-बार पढ़ रहा हूं और नए चिंतन के लिए परमपूज्य आचार्य द्विवेदी जी के कथन को याद कर रहा हूं- ‘‘पुराना नहीं पढ़ोगे, तो नया कैसे सोच सकोगे?‘‘ पूर्व अध्यक्ष हिंदी विभाग, मुंशी सिंह कॉलेज मोतिहारी, पूर्वी 

साभार: ‘अतीत के मुखर वर्तमान’


बंग्ला से अनुदित कहानी

अनु. सुश्री सीमा सिंह ‘स्वस्तिका’
सिल्चर, असम, मो. 9435079900

मूल लेखक : हिमाशिष भट्टाचार्य


भगोड़ा 

कक्षा में बैठे-बैठे मोबाइल पर मैसेज मिला मयूरी को-‘लेखक वैभव डेका नहीं रहे।‘ भेजनेवाले का कोई उल्लेख नहीं है। कोई अनजान नम्बर है। पहचान नहीं पाई। याद करने की कोशिश की। नहीं हो पाया। भराली सर मध्ययुगीन अंग्रेजी साहित्य के किसी गूढ़ विषय को लेकर बोर्ड पर पर कुछ लिख रहे हैं। मयूरी उठ खड़ी हुई। 

‘एनी प्राब्लम मयूरी‘? आश्चर्यचकित नेत्रों से अपनी प्रिय छात्रा की ओर भराली सर ने ताकते हुए पूछा।

एक अर्जेट मैसेज है सर। मुझे अभी जाना होगा।

कोई बुरी खबर है क्या ? घर में किसी का ? नहीं, नहीं सर। वैसा कुछ नहीं है। मेरा एक मित्र - 

ओके, ओके। यू कैन गो।

भराली ‘सर’ फिर बोर्ड की ओर मुड़ गए। कक्षा में पीछे मुड़ कर नहीं देखा मयूरी ने। जानती है, कई निगाहें, अभी उसे घूर रही हैं। यूनिवर्सिटी के मेन गेट से निकल कर फुटपाथ पर आकर रुकी। बस स्टाप है। युनिवर्सिटी के ठीक बीचोंबीच चीरती हुई यह बड़ी सड़क चली गई है बरझार हवाई अड्डे की ओर। इसी सड़क पर हवाई अड्डे की तरफ से बसें आयेंगी। भाद्र महीने की दोपहर है। चिलचिलाती धूप! इस वर्ष धूप में प्रखरता पहले से कहीं ज्यादा है। पिछले कई वर्षों का गरमी का रिकार्ड टूट गया है इसबार किसी प्रकार यूनिवार्सिटी की कक्षाएँ चल रही हैं। छात्र-छात्राएँ भी कम ही आ रहे हैं। मयूरी भी बीमार हो गई थी। बेलतला के जिस मकान में मयूरी रहती है उस मकान के मालिक एक डाक्टर हैं। उन्होंने कुछ दिनों के लिए मयुरी को विश्वविद्यालय जाने से मना किया था। बुखार फिर से बढ़ सकता है। मयूरी ने सुन कर भी अनसुना कर दिया था। अनमिता ने भी समझाया- ये तेरी ज्यादती है। कोई खबर मिलेगी तो मैं तुझे बताऊँगी नहीं? मैं तो रोज ही जा रही हूँ। कोई जवाब नही दिया था मयूरी ने। 

इधर-उधर इक्के-दुक्के घर खड़े हैं। ज्यादातर पुराने असम-टाइप के मकान हैं। टिन के छत वाले। हाल में दो-एक आर. सि .सि. मकान भी बने हैं। बाकी खाली मैदान हैं। ज्यादातर पानी से भरा हुआ है। चारों तरफ हरियाली है। कुछ-कुछ दूरी पर एक-एक डिपार्टमेटं है युनिवर्सिटी के। ज्यादा बड़ा नहीं है। ज्यादातर दो मंजिले मकान ही हैं। असमटाइप मकान ज्यादा अच्छे हैं। आस-पास के मैदान में बड़े बड़े पेड़ों की कतारें हैं। चिलचिलाती धूप के बीच इन्हें देखना थोड़ा सुकूनदायक हैं। मन शांत हो जाता है। पेड़-पौधे कुछ ज्यादा हैं। इसलिए इतनी धुप में भी हलकी बयार है। जिससे धूप की तपन को सहा जा सकता हैं। फुटपाथ पर कुछ और लड़के-लड़कियाँ खुद में व्यस्त हैं, छिटपुट बातें हो रही हैं। सभी को बस का इंतजार है। मयूरी थोड़ा आगे बढ़ कर खड़ी हो गई। भीड़ ज्यादा है। बस रुकेगी भी तो यहाँ चढ़ा नही जाएगा। सामने सीधी सड़क पर जहाँ तक नजर जाती हैं, उसने देखा। एक लाल बस आ रही हैं। लालबस में वह नहीं चढ़ेगी। बहुत वक्त लगता है। सभी स्टाॅपेज पर रुकते हुए जाएगी। इससे अच्छी हैं नीली बसें। किराया थोड़ा ज्यादा है। पर इतनी रुकती नहीं हैं।

मयूरी ने फिर मोबाइल का इनबाक्स खोला। नम्बर देखकर पुनः याद करने की कोशिश करने लगी। किसी भी हालत में याद नही कर पा रही है किसका नंबर है। ऐसे कई नम्बर हैं उसके मोबाइल पर जो सेव नहीं हैं फिर भी फोन आनेपर वह समझ जाती है कि यह किसका नबर है। ऐसा अक्सर होता है। देखते-देखते यकायक नंबर पहचान में आ जाता है। एक झलक देखते ही कालर का नाम याद आ जाता है, चेहरा आँखों के सामने खिल उठता है। तभी अनमिता की याद आई। नम्बर याद रखने में वही सबसे आगे है। एक बार देख ले तो दोबारा नहीं भूलती। इस लाइन की सभी बसों के नम्बर उसे याद रहते हैं। आज नहीं आई हैं। तबीयत ठीक नहीं है। मयूरी ने अनमिता का नंबर मिलाया। स्विच आफ है। दुखी मन से फोन को वापस बैग में रख दिया। दिमाग में केवल वही नंबर घूम रहा है। कईबार देख चुकी है। कंठस्थ हो गया है। किसने किया? इतनी बड़ी खबर देनेवाला मयूरी के पहचान में कौन हो सकता है? भेजनेवाले का परिचय जाने बगैर वह इस खबर पर पूरी तरह से विश्वास नहीं कर पा रही है। कई सवाल मन में उठ रहे हैं। दिमाग चकरा रहा है। मयूरी अधीर हो रही है। जरुरी है‘ कहकर कक्षा से तो निकल आई। पर अब कहाँ जाए मयुरी? खबर भी ऐसी है जो फट से किसी को कह भी नहीं सकती। अनमिता होती तो कुछ शेयर भी करती। वह भी आज नही आई। मोबाइल भी बंद कर के रख दी है। 

एक नीली बस स्टापेज पर आ चुकी है। खाली ही है। देरी करने से कोई फायदा नही। बस में चढ़ने के लिए मयूरी आगे बढ़ी। बस रुकी। आगे के दरवाजे से कुछ लोग उतर रहे हैं। मयुरी पीछे की ओर एक सीढ़ी चढ़ कर फिर उतर गई। गर्दन पर हाथ रखकर जैसे किसी ने उसे बुलाया हो- मैडम। 

पीछे आ कर फिर फुटपाथ पर खड़ी हो गई मयूरी। मुड़ कर देखा तो पाँच-छः लोग उसे ही घूर रहे हैं। इनमें दो महिलाएँ भी हैं। मयूरी को ऐसा लगा मानो ये सभी उसे घेर कर रखे है। वह किसी को पहचान नहीं पाई। कभी देखा भी नहीं है शायद। इनलोगों को तो बस से उतरते हुए नहीं देखा। अभी तक कोई आसपास नहीं था। तो ये हैं कौन? बस कंडक्टर ने दरवाजे से लटकते हुए पूछा - दीदी जाना नहीं है? मयूरी कुछ बोले उससे पहले ही उनलोगों में से एक ने कहा नहीं, दीदी नहीं जाएँगी। कंडक्टर ने मुँह में ऊँगली डाल कर सीटी बजा दिया। बस निकल पड़ी। मयूरी को बड़ा गुस्सा आया। जान न पहचान। गले पड़ गये-यह कैसे असभ्य है ? फिर भी मुँह से कुछ नहीं बोली। उनके साथ खड़ी दोनों महिलाओं से मुख़ातिब होकर थोड़े रुखे स्वर में ही पूछा आप लोग हैं कौन? कोई गलती तो नही कर रहे हैं? मैं ठीक...

पहचान नहीं पाई, हूँ न ? कहते हुए एक ने अपने जेब से पहचान पत्र निकाल कर मयूरी को दिखाया। कमांडिंग आफिसर, युनिफायड कमांड। हमसब आपको ही दूढ़ने युनिवर्सिटी आए थे। आपको अपने मोबाइल पर एक संदेश मिला होगा, हालांकि अभी तक आप नंबर नही पहचान पाई हैं। करती भी तो कैसे ? यह मोबाइल नंबर तो आपके पहचान वाला है नहीं। इसी मोबाइल से आपको वह संदेश भेजा गया था। एक महिला आफिसर ने हिंदी में बोलते हुए मयूरी को अपना मोबाइल दिखाया। - इसका मतलब वह मैसेज गलत था? अवाक रह गई मयूरी। किसी की मौत की खबर फैलाकर यह कैसा मजाक है? यह खबर सही है क्या? एक साथ कई प्रश्नों ने मयूरी को बेचैन कर दिया। तो वैभव को कुछ नहीं हुआ है। फिर ये लोग इस तरह की हरकतें क्यों कर रहे हैं? उसे कक्षा से बाहर क्यों निकाल लाए हैं? इनके हावभाव भी कुछ अजीब लग रहे हैं। शोर मचा कर प्रतिवाद भी नहीं किया जा सकता। कुछ भी हो, आखिर पुलिसवाले हैं। मयूरी ने ख़ुद को शांत रखने की कोशिश की।

उग्रवादी गतिविधियों के दमन करने के उद्देश्य से राज्य में कई साल हुए युनिफायड कमांड का गठन किया गया है। अखबारों में खबर छपी थी। मयूरी ने देखा है। पुलिस, अर्ध-सैनिक बल एवं सेना को मिलाकर इस युनिफायड कमांड का गठन किया गया है। उग्रवाद के खिलाफ अभियान में सेना एवं पुलिसबल में समन्वय बनाए रखन हेतु इस कमांड का गठन हुआ। इसके गठन के पश्चात पुलिस की वास्तव में तूती नहीं बोलती। थानों में सेना के अफसरों का ही दबदबा है। बड़ेबड़े शहरों का पूरा दायित्व लगभग कमांड के हाथों में ही है। सबसे ज्यादा गुवाहाटी में है।

इन बातों को याद करते ही मयूरी और चैकन्नी हो गई। ये सेना व पुलिस के लोग हैं। इनके सामने सावधानी से बात करनी है। और बोलेगी भी क्या? मयूरी समझ नही पा रही है- ऐसे हालात में वह करे तो क्या करे या क्या करना चाहिए? उसे क्यों बुलाया गया है - इस बारे में अभी भी ये लोग कुछ बोल नहीं रहे है। खुद से कुछ पूछना भी सही नहीं होगा। अति उत्साह के प्रदर्शन से उन्हें शक भी हो सकता है। 

मैडम। एक अधिकारी मयूरी से मुखतिब होकर बोले-बिना नोटिस के आपको बुला लाने के लिए हमें खेद है। परंतु आप निश्चय ही हमारी डयूटी के बारे में जानती होंगी। वैसे बेवजह तो आपको बुलाया नही गया बड़ी मुश्किल से थोड़ा हँसने की कोशिश की मयूरी ने। गला सुखा जा रहा है। बैग में पानी की बोतल है। निकालने का मन नहीं कर रहा। किसी प्रकार बोली किंतु मैं ......... मतलब ............ कुछ समझ नहीं पा रही हुँ ............ मुझे क्या करना होगा? - हाँ, असली बात तो अभी तक आप को बताया ही नही गया है। आपको हमारे साथ कमांड के खानापाड़ा वाले कैंप में चलना होगा।

- मुझे? पुलिस कैंप में जाना होगा - क्यों? मयूरी जैसे आर्तनाद कर उठी। सर चकराने लगा। एक महिला अधिकारी ने आकर मयूरी को सम्हाला - डोटं गेट नर्वस। आप नाहक ही घबरा क्यों रही हैं? हम तो आपसे बस कुछ बातें करना चाहते हैं? बस!

- हाँ, बोलिए, क्या कहना चाहते हैं? मेरे साथ आप लोगों की क्या बात हो सकती है यही मैं नहीं समझ पा रही हूँ। - है, है मिस हाजारिका। बहुत सारी बातें हैं। हमें आपसे कुछ जानकारी चाहिए। - क्या जानना चाहते हैं जरा जल्दी ही बोल दीजिए ताकि मैं अपने क्लास में वापस जा सकूँ।

-बोलेंगे। अवश्य बोलेंगे। पर यूँ सड़क पर खड़े होकर यह सारी बातें तो नहीं हो सकती न। यह आपके लिए भी सही नहीं होगा। आफटर अल युनिवर्सिटी है। यहाँ आपके दोस्त-सहपाठी हैं। इससे अच्छा है कि हम सब कैंप में चलें। वहीं खुल कर बातें होंगी।

एक अधिकारी ने सीटी बजाई। एक काली स्कार्पिओ उनके सामने आकर खड़ी हो गई।

ये सारे घटनाक्रम मयूरी के सामने चलचित्र की भाँति घटने लगे।। युनिवर्सिटी के मेन गेट से सटी एक बड़ी दुकान है किताबों की। गाड़ी वहीं से निकल कर आई है। अभी थोड़ी देर पहले मयूरी उसी रास्ते से निकल कर आई है। तब तो वहाँ कोई गाड़ी नहीं दिखी। समझ गई, इन्हें रोका नहीं जा सकता। ये जो भी चाह रहे हैं तो करके ही रहेंगे। इनके पास पावर है। अगर ना नुकुर करेगी तो ये जबरदस्ती ले जाएँगे। नाहक एक सीन बन जाएगा। वर्दी में नहीं हैं इसिलिए अभी तक किसी ने इनको नोटिस नहीं किया है। सभी अपने-अपने काम में व्यस्त हैं। - चलिए मैडम। स्कार्पिओ का दरवाजा खोलते हुए एक अधिकारी ने मयूरी को बुलाया।

-आप लोग मुझे गिरफ्तार कर रहे हैं क्या? - कर सकते हैं। वारेंट है। फिर भी हम ऐसा नहीं कर रहे। कुछ पूछताछ के लिए अभी हम आपको कैंप ले जा रहे हैं। एक ने मयूरी के हाथों में एक कागज का टुकड़ा पकड़ाया। मयूरी ने पढ़कर देखा-अरेस्ट वारंट है। उसे मोड़ कर अपने बैग में डालते हुए मयूरी गाड़ी में बैठ गई। बाकी सभी भी तुरंत चढ़ बैठे।

-आपके जोरहाट वाले घर में या बेलतला वाले मैस में बताना होगा क्या? गाड़ी के चलते ही बगल में बैठी महिला अधिकारी ने मयूरी से पुछा।

-मुझे आपलोग रोक कर रखेंगे क्या? ऐसे में तो घर पर .............

-मेरे खयाल से रहने ही दीजिए। जोरहाट में आपके माता-पिता नाहक ही परेशान होंगे। वैसे उन्हें पता भी नही चलेगा। और बता दो तो टेंशन। दूर से भय ज्यादा लगता है न। मयूरी ने देखा कि रोक कर रखनेवाली बात को अधिकारी ने चालाकी से टाल दिया है। उसने भी कुछ नहीं बोला। हो सकता है इसबात को लेकर अभी तक कोई फैसला न हुआ हो या फिर इस टीम को ही पता न हो।

- मेरा घर जोरहाट में हैं, यह भी आप लोगों को पता है?

- हाँ, है न। गुवाहाटी में आप अपनी दो सहेलियों के साथ मैस में रहती हैं। आज वे दोनों भी गुवाहाटी में नहीं हैं। एक गई है शुवालकुचि, अपने घर। और दूसरी झालुकबाड़ी में एक शादी की पार्टी अटेंड कर रही है। तो इस ओर से तो आप निश्चिंत हैं। आप के लिए कोई इंतजार नहीं करेगा। एम आई राइट? अधिकारी हँसने लगे।

- अपना मोबाइल दीजिए मैडम। आगे की सीट पर बैठे अधिकारी ने हाथ आगे बढ़ाया। मयूरी थोड़ा पीछे हो ली। मोबाइल फोन निहायत व्याक्तिगत चीज है। यह किसी को दिया नहीं जा सकता। और वह भी पुलिस को। नहीं। 

अधिकारी मुस्कराए।

-नही देंगी तो हमें आधिकारिक तौर पर इसे सीज करना पड़ेगा। इस फोन की हमें बड़ी जरुरत है। बिना मतलब बात बढ़ाने की क्या जरुरत है, मैडम?

- पर मेरे फोन से आपका क्या काम? मैं किसी को अपना मोबाइल देना पसंद नहीं करती। मोबाइल में बहुत कुछ व्यक्तिगत डेटा होते हैं।

- डोंट वरी। आपका कोई भी तथ्य हम कहीं भी - आई मीन आप हम पे पूरी तरह से भरोसा कर सकती हैं। राष्ट्र का कार्य है। जितना भी नापसंद हो - हम लोग मजबूर हैं। आपके आउटगोइंग एवं इनकामिंग कॉल, मैसेज बाक्स आदि हमें जाँचना है- यह एक प्राइमरी रुटीन वर्क है, बस। पास बैठी महिला अधिकारी ने अपनी बात जोड़ते हुए कहा हमारा काम किसी भी प्रकार से आपकी प्राइवेसी को हैंपर नहीं करेगा। आप निश्चिंत रहें। हम अपना काम पूरा करके आपका फोन वापस कर देंगे। इतनी देर में आप को कोई असुविधा नहीं होगी। तबतक आप यह फोन अपने पास रख सकती हैं। रोमिंग है। जहाँ मर्जी वहाँ फोन कर सकती हैं। अधिकारी ने अपना मोबाइल फोन मयूरी को थमाते हुए उसका फोन ले लिया। मयूरी कुछ भी नहीं बोल पाई। लाचार होकर अपना फोन उन्हें दे दिया।

-आप लोग एक भाई और एक बहन हैं न। अधिकारी ने बात बदली। भैया एल.आई.सी. में काम करते हैं। शिवसागर में पोस्टड हैं। ग्रेजुएशन के बाद आप अंग्रेजी में एम.ए.कर रही है। आफटर ए स्माल गैप।

-स्माल गैप नहीं। कई साल हो गए। दरअसल - मयूरी को बीच में ही रोकते हुए अधिकारी ने कहा सात साल जानता हूँ। इसके अलावा आपके पास कोई चारा भी तो नहीं था। वैभव जोरहाट गया भी तो आपसे नहीं मिला। आप अच्छी तरह से जानती है कि इस युनिवर्सिटी में उसका एक कैंप, आई मीन एक ठिकाना तो है लेकिन पिछले एक वर्ष में आप उससे मिल नही पाई हैं। सात वर्ष के लंबे अंतराल के बाद दोबारा पढ़ाई शुरु करना वाकई टफ है। पर आपने इसे संभव बनाया है। आपके प्यार में कहीं कोई खोट नहीं है। आजकल प्यार में इतना बड़ा त्याग कोई नहीं करता। इतना कहकर एक अर्थपूर्ण मुस्कान बखेरी अधिकारी ने।

गाड़ी गणेशगुड़ी फ्लाइओवर पार हो रही है। बाँई और नीचे ज़ू-रोड पर काफी भीड़ है। दाँई ओर बाजार है।

-आप बीच बीच में गणेशगुड़ी आती हैं न? 

-आना पड़ता है। बेलतला से युनिवर्सिटी की बस यहीं से जाती है। बाजार भी यहीं से करने आना पड़ता है।

-गणेशगुड़ी के इस बाजार में सुना है बह्मपुत्र की ताजी मछलियाँ मिलती हैं?

मयूरी समझ चुकी थी कि यह अधिकारी उसे बातों में घुमा रहा है। असल मुद्दे पर सीधे नहीं आना चाह रहा है। मयूरी ने हवा नहीं दी।

- गुवाहाटी के सभी बाजारों में कमोबेश ब्रह्मपुत्र की ही मछलियाँ पाई जाती हैं। यह नद शहर के बीचोंबीच से जो निकला है। वैसे मछली आजकल इतनी सस्ती नहीं रही।

अधिकारी मुस्कराए। नार्थ-ईस्ट में लगभग सभी चीजों की कीमत देश के बाकी हिस्सों से ज्यादा है, है न? परंतु मैडम, अधिकारी पुनः पुराने मुद्दे पे आ गए - ग्रेजुएशन के बाद इतना बड़ा विराम। फिर एम.ए. में दाखिला लेना, क्या इसके अलावा आपके पास और कोई चारा नहीं था? या .... इसके पीछे कोई और कारण तो नहीं मैडम ?

- गजब है। लोग पढ़ते नहीं है क्या? अब मयुरी को गुस्सा आ गया। इसके पीछे और कोई कारण भी होना होगा? और हो भी तो आप मुझसे पूछ क्यों रहे हैं? आप लोगों को तो पहले से ही सब पता है। - नाराज हो रही हैं क्यों? 

अधिकारी जोर से हंस पड़े- इसे लेकर हमें बहुत कुछ सोचना पड़ा है। इसलिए पूछ रहा था और क्या। हम बस सम्भावनाओं को ही तलाश रहे हैं।

-अच्छा आपके पिता तो प्राइमरी टीचर है न?

-प्राइमारी टीचर होने से क्या हुआ? अपनी संतान को पढ़ानेलिखाने की क्षमता एवं इच्छा दोनों ही है उनमें। 

- हाँ, है तो सही। नवपुर गाँव में आपके पिता एक विशिष्ट एवं प्रगतिशील गृहस्थ है। काफी जमीन है उनकी।

- जब सबकुछ जानते ही हैं तो झूठमूठ का मेरा वक्त क्यों बरबाद कर रहे हैं? मयूरी ने तीखे स्वर में यह बातें कह डाली।

- वजह कुछ और ही है। जरुरत पड़ने पर बताऊंगा।

तबतक गाड़ी खानापाड़ा का अस्थायी कैंप में आकर रुकी। दरवाजा खोलकर महिला अधिकारी ने बुलाया- आइए मैडम। हम पहुँच गए। मयूरी गाड़ी से उतरी। बाहर से देखने से कुछ पता नही चलता हैं। यह कैंप काफी बड़ा है। बहुत सारे लोग कार्यरत हैं। कई सारे दफ्तर हैं। सभी में काम की व्यस्तता दीख रही है। किसी ने उन्हें देखा ऐसा नहीं लगा। सभी अपने काम में व्यस्त हैं। मयूरी को एक बड़े से हाल में बैठाया गया। चारों ओर घूम कर देखा मयूरी ने। नहीं, लाॅकअप नहीं है। दफ्तर जैसा ही है। लेकिन काफी बड़ा है। हाल के दोनों ओर। कई कमरे हैं। मयूरी का चेहरा देखकर और उसकी चिंता को समझते हुए अधिकारी हँस पड़ी। 

- इसे हमारा क्वार्टर ही समझ लीजिए। इन कमरों में हम रहते हैं।। चैबीस घंटे की डयूटी जो ठहरी। घर-आफिस सब एक है। रात-रात। को निकलना पड़ता है। आप शायद कुछ और ही सोच रही थीं। मिस हाजरिका - अधिकारी ने कहा। एक व्यक्ति ने बगल के कमरे का ताला खोल दिया। यह हमारा गेस्ट रुम है। आप इसमें चले जाइए।। फ्रेश हो लीजिए। मैं बगल के कमरे में ही हुँ। थोड़ी देर बाद आप को बुलाया जाएगा। तब काम की बातें होंगी।

- सच-सच बताइए, आफिसर, आप लोग मुझे यहाँ क्यों लाये। हैं? अरेस्ट वारंट है फिर भी गिरफ्तार नहीं किया, यहाँ भी गेस्ट रुम में रहने को कह रहे हैं .....। 

- मतलब एक अपराधी के साथ जैसा व्यवहार होना जाहिए वैसा नही हो रहा। ऐसा आपको लग रहा हैं, और आप कुछ असमंजस में पड़ गई हैं, है न?

- जी हाँ। मैं आप लोगों की मंशा को समझ नहीं पा रही हूँ। मयूरी की व्याकुलता बाहर आ गई।

-आप को तकलीफ देकर हमें क्या लाभ। हम तो आपसे सहयोग की आशा रखते हैं मिस हाजरिका।

-मैं कैसे आपकी मदद कर सकती हैं? अधिकारी धीरे से मुस्कुराई - कर सकती हैं। खैर, अभी इन बातों का कोई लाभ नहीं। आप कमरे में जाइये और थोड़ी देर आराम कर लीजिए। थोड़ी देर में आपको बुलाया जाएगा।

अधिकारी अपने कमरे में घुस गई। मयूरी वहीं खड़ी रही। जिस जिज्ञासा के निवारणहेतु वह इतनी बेचैन है वह तो अभी तक पूछा ही नहीं। यह अधिकारी थोड़ी अलग किस्म की हैं। पुलिस में हैं तो क्या, आखिर वह भी तो उसी की तरह एक महिला हैं। बाद में बाकी लोगों के सामने हो सकता हैं वह कुछ पूछ न पाए। मन को दृढ़ करते हुए, उसने सीधे महिला अधिकारी का दरवाजा खटखटाया। दरवाज़ा खोलकर अधिकारी ने पूछा - एनी प्राब्लम?

-नहीं, नहीं, एक बात जानने के लिए आप को डिस्टर्ब कर रही हूँ।। 

-कहिए?

- मोबाइल का मैसेज सच तो नहीं है न? अधिकारी बोली - नो, नाट एट आल। आपको कक्षा से बाहर लाने के लिए वह मैसेज भेजा गया था। हम आपको क्लास में डिस्टर्ब नहीं करना चाहते थे। हमारा समाज अभी भी रुढीवादी विचारधारा वाला है न। पुलिस किसी को ढूँढ़ रही है यह सुनते ही लोग अपने हिसाब से अर्थ लगाने लगते हैं।

छाती पर पड़ा भारी पत्थर जैसे थोड़ा सरक कर नीचे आया। धन्यवाद।

-आपकी मुश्किलें मैं समझ सकती हुँ मिस हाजरिका। आप इसे लेकर ज्यादा ना सोचें। हम सिर्फ सच्चाई जानना चाहते हैं। आपको परेशान करना हमारा उद्देश्य नहीं है। महिला अधिकारी ने दरवाजा बंद करते हुए कहा। मयूरी को और कुछ पूछने का मौका ही नही मिला।

जीवन के परतों पर तजुबौँ के कई स्रोत छुपे रहते हैं। वक्त के साथ ये और भी समृद्ध होते हैं। अनमिता ने एकदिन कहा था मयूरी से - तेरा वैभव किसी हाड़माँस का अस्तित्व ही नहीं है। एक ख्याल है बस।

बेवजह मन को बहला जाता है। 

- धत। वैभव डेका हमारे इसी गुवाहाटी यूनिवर्सिटी का होनहार छात्र था। एक समय का जुझारु छात्र नेता। पढ़ने में बहुत तेज स्कूल में हर बार फर्स्ट आता। बहुत अच्छा डिबेट भी करता था।

- समझी, फिर?

- फिर क्या?

- इस सवाल का जवाब तू नहीं जानती मयूरी? क्यों बेवजह खुद से छल कर रही है? जो नही होना वह नहीं होना। महज़ ख़्यालों में जिंदगी नहीं बिताई जाती। जीवन का एक वास्तविक पहलू भी है। यह बहुत ही कठिन है।। 

- वह तो सच है, लेकिन ....

- कोई लेकिन - वेकिन नही मयूरी।

यह सही है कि कल्पना की दुनिया एवं वास्तविकता किसी के लिए भी एक नही होते। पर तेरा मामला तो एकदम अलग है रे। वैभव डेका एक व्यक्ति नही, तेरे लिए एक मिथक है अथवा ....। 

- तू तो यूँ ही बात को घुमाए जा रही है मिता! कुछ भी बोल रही है! 

- तो वैभव डेका तुझसे प्यार करता है - तू दावे से कह सकती है?

मयूरी चुप रही। कहेगी भी तो क्या? पिछले सात वर्षों में वैभव से उसकी एक भी मुलाकात नहीं हुई। कोई सम्पर्क भी नहीं हुआ। वैभव लापता है। सरकारी खाते में वह एक अंडरग्राउंड उग्रवादी।

- वैभव जैसे लड़के किसी अन्य धातु से बन कर आते हैं, इस धरती को सुधारने के लिए। वे समाज को आमूलचूल बदल देने के सपने में विभोर रहते हैं। यह मामला एकदम ही तात्विक है मयूरी। ये लोग समाज के किसी भी विषय से खुद को उलझा नहीं पाते, शायद चाहते भी नहीं। लोगों से सम्पर्क बनाना भी उनके लिए एक जरुरी काम है बस।

- मयूरी का दिमाग चकराने लगा - चुप कर मिता। क्या अनापशनाप बोल रही है, मैं इसका सिर-पैर कुछ भी नहीं समझ पा रही हुँ।

अनमिता ने उसदिन और बात नहीं बढ़ाना चाहा। थोड़ी देर बाद उसने मयूरी से कहा-सॉरी मयूरी। मैं तुम्हें दुख नहीं देना चाहती थी। मैं दरआसल..........। 

- तू ऐसे क्यों बोल रही है। अनमिता के दोनो हाथों को अपने हाथों में लेते हुए मयूरी ने कहा - मैने ऐसा कुछ बोला क्या? 

- मैं शायद आखिरकार सिनिक होती जा रही हुँ रे। भावनाएँ जैसे एकतरफा होती जा रही हैं।

विस्तर पर लेटे-लेटे इन्ही बातों को याद कर रही थी मयूरी। अनमिता ने मयूरी एबं वैभव के रिश्ते की डोर एवं नींव, इन दोनों विषयों को लेकर एक अनसुलझा सवाल दागा था। यह सवाल बहुत दिनों तक मयूरी के दिमाग में घूमता रहा। उम्र के इस पड़ाव तक वह एक मोहपाश में बढ़ती रही। गाड़ी में बैठकर पुलिस अधिकारी ने भी इशारों-इशारों में यही सवाल दागा था। स्नातक तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कई वर्ष तक घर बैठी रही मयूरी। पिता ने तभी युनिवर्सिटी में भर्ती होने की बात कही थी। वह राजी नही हुई थी। क्या होगा एम. ए. पढ़ के? कुछ वर्षों के बाद जब वह खुद ही भर्ती होने के लिए ज़िद करने लगी, घर में सभी भौंचक रह गए। किसी को भी किसी सवाल का जवाब नहीं दिया था मयूरी ने। सब से निगाहें बचा कर रहती थी। फिर क्यों दाखिला लेना चाहती थी यह तो उसे खुद भी नहीं पता था। वैभव तो उससे भी पहले से लापता था। सरकारी खाते में मोस्ट वांटेड। मयूरी उसका कोई अता पता नहीं जानती। मुलाकात भी नहीं हुई।

सम्पर्क साधने की बात याद आते ही इस अवस्था में भी मयूरी को हँसी आ गई। सम्पर्क तो उन दोनों के बीच कभी था ही नहीं। अनमिता इस बारे में जानना चाहती थी। मयूरी उसे कुछ भी बता नहीं पाई। कैसे और क्या बोलती? उसे खुद भी कहाँ पता है। आखिरी बार गाँव में मुलाकात हुई थी। सुनने में आया था कि वैभव किसी गोपनीय कार्य में उलझ गया है। खुद से उसने कभी कुछ नही बताया। पूछने से भी टाल देता। मयूरी को गुस्सा आता। आखिरी बार जब मुलाकात हुई थी तब वैभव कुछ अलग सा लगा। चेहरा गम्भीर। पता नही किस चिंता में डूबा हुआ था। 

- बिना बात के मुझे मत बुलाना तुम। वैभव ने आते ही चेताया था।

- मन न हो तो मत आना।

- नहीं, नहीं, इस बात को गम्भीरता से लेने की जरुरत है मयूरी।

- मतलब? तुम्हारे मन में अभी भी दुविधा है? तुम सहज क्यों नहीं हो पा रहे हो?

- ये फालतु बातें छोड़ो। बेमतलब के आवेग। वैभव अपनी खीझ रोक नही पाया। मयूरी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही थी। चक्कर खाके गिर ही जाती कि बैभव ने उसे पकड़कर बिठा दिया - डोंट बी इमोशनल मयूरी। क्यों बेकार में अपनी जिन्दगी बरबाद कर रही हो? सभी रिश्तों को अंत में सफलता का सपना रहता है, जिस उम्मीद में वह रिश्ता परवान चढता है, हमारे रिश्ते में ऐसा कुछ भी नहीं है। यह कभी संभव नहीं है। 

-क्या एकदम ही असंभव है? क्यों बैभव? मैंने कौन सा अपराध किया है? क्या तुम मुझे प्यार नहीं करते?

वैभव हँसने लगा - ऐसे मत कहो मयूरी। ढेर सारी बातें हैं। मैं तुम्हें सबकुछ बता नहीं सकता।। 

- ऐसी कौन सी बात हैं जो तुम मुझे भी नहीं बता सकते? 

- मैं खुद भी तो सबकुछ नहीं जानता। तुम्हें कुछ विश्वास भी नहीं होगा। और कहना मना भी है।

वैभव उसदिन बहुत रहस्यमय मालूम हुआ था। बात करते करते अचानक उठ खड़ा हुआ - देर हो रही है - मैं चलता हूँ मयूरी। 

तब तक मयूरी कुछ बोल भी नही पाई थी। परंतु वैभव के इस व्यवहार से उसके मुंह से कोई बात नहीं निकली। छलकती आँखें लिए सिर्फ सिर हिला दिया था। वैसे वैभव के अचानक रफूचक्कर होने का कारण थोड़ी ही देर में उसे पता चल गया था। पुलिस की एक जीप तुरंत उनके घर के सामने आकर रुकी। चार-पाँच पुलिसवाले धड़धड़ाते हुए। आकर उनके घर में घुसे। पिताजी अभी स्कूल से लौटे थे। घर में पुलिस देख कर चैकं गए। पुलिसवाले ने मयूरी को 

धमकाते हुए कहा था - वैभव डेका अभी थोड़ी देर पहले यहीं था। हमारे पास कनफर्मड खबर थी। कहाँ गया वह इडियट? 

- आप शायद कोई गलती कर रहे हैं। मयूरी के कुछ बोलने से पहले ही उसके पिताजी बोल पड़े - वह यहाँ क्यों आएगा? नहीं, नहीं।

-आप लोग वैभव को क्यों खोज रहे हैं? क्या किया है उसने? सवाल करने से खुद को मयूरी रोक नहीं पाई थी। पिता ने धमकाया - तू चुप कर। ज्यादा बड़े बनने की कोशिश मत कर। फिर पुलिसवाले से मुखातिब होकर बोले - आप इसकी बातों पर ध्यान मत दीजिए सर। अभी बच्ची है।

- वैभव डेका के खिलाफ कई मामले हैं। क्या नहीं किया हैं बदमाश ने। इसी उम्र में एकदम महापुरुष बन बैठा है। जिसे कहते है न- सर्वगुणसम्पन्न। मेरे इलाके में होकर ही तो सारी मुश्किलें हैं। साले के लिए पता नहीं कब मेरी नौकरी भी चली जाए। उस्ताद छोकरा है। दिमाग तो एकदम चंगा है। अपनी पार्टी का वही थिंकटैंक है- ब्रेन। 

 मयूरी पुलिसवाले की इन बातों का कोई सिर पैर नहीं समझ पाई। भारी मन से पुलिसवाला चला गया। जाते-जाते पिताजी को सावधान कर गया- आप लोग आग से खेल रहे हैं मास्टरजी। यह सही नहीं है। वैभव अपराधी है। उसको शरण देना अपराध है। पुलिस के जाने के बाद पिताजी ने मयूरी से पुछा था - वैभव आया था हमारे घर? पिताजी की आखों में आँख रख कर मयूरी ने जवाब दिया- हाँ, आया था। इसमें क्या गलत है पिताजी? उसने ऐसा क्या किया है।

एक लंबी-गहरी श्वास छोड़ते हुए पिताजी ने कहा- मुझे नहीं पता। पर अभी-अभी पुलिसवाले ने जो कहा उतना ही काफी है। अभी स्थिति बहुत खराब है। पुलिस पीछे लग जाएगी तो तुम भाग कर नहीं बच पाओगी। आजकल के बच्चे इस छोटी सी बात को नहीं समझ पाते। वैभव अब यहाँ न आए। तुम उसे यह बात बता देना।

वैभव को यह बात बतायी नहीं जा सकी। युनिवर्सिटी में दाखिला लेने के बाद मयूरी को वैभव से मिलने की उम्मीद थी। बस के इंतजार में फुटपाथ पर खड़े-खड़े मयूरी ने कई बार मन ही मन सोचा है - अब शायद वैभव अगली बस से उतरेगा। कैंटीनवाले सुकुमार भैया ने एकदिन मयूरी के कानों मे फुसफुसाते हुए कहा था - पहले तो अक्सर आता था यहाँ। इधर बहुत दिनों से नहीं देखा।

- अनमिता ने सही ही तो कहा है। प्यार एकतरफ से नहीं होता है। कोई एक ता जिंदगी इसको ढोता रहे यह कैसे संभव है। मयूरी भी सब समझती है। कभी-कभी कुछ और सोचने की कोशिश नहीं की ऐसा नही है। घर से भी निरंतर दबाव डाला जा रहा है। पिताजी ने तो बोल भी दिया है - ढेर सारे रिश्ते आए हैं। बार -बार दबाव भी डाला जा रहा। है, वक्त पर मयूरी को सुचित कर दिया जाएगा।

-उन्होंने तुम्हारी कोई मर्जी नहीं जाननी चाही? चैंक कर अनमिता ने पूछा।

-नही, सिर्फ सूचना मिली है - तुम्हारी शादी तय की जा रही है। तय होने पर तुरंत जाकर मंडप में बैठ जाना होगा। यहाँ कोई और बात की गुंजाइश ही नही है।

- डिसगस्टिंग। असहनीय, हमारी राय का कोई मुल्य ही नहीं? आश्चर्य है। तू भी मान लेगी?

- मैंने अभी कुछ बोला नहीं है। और क्या बोलूँ?

अनमिता चुप हो गई। जिसके भरोसे मयूरी अब तक बैठी रही उसका तो कोई अता-पता ही नही है।

-अपनी ताकत जब है ही नहीं तो फिर सब कुछ अभिभावकों पर ही छोड़ देना चाहिए। एक्स, वाई, जेड, जो भी हो।

-तू कर पाएगी शादी?

- नहीं। पर घर में यह बात बोलते ही तो झमेला शुरु हो जाएगा। इससे अच्छा है कुछ न कुछ बहाना करके वक्त कटता रहे। पिताजी को बोल चुकी हूँ - और कुछ दिन जाने दो। मेरा एम.ए. कम्पलीट हो जाए। पर वह भी कितने दिन और बचे हैं। लगभग खत्म हो चला। उसके बाद क्या बोलुंगी? मैं तो एक अनजान डगर पर चल पड़ी हूँ मिता।

-देख, भविष्य भी तो कुछ होता है न? परंतु मयूरी मैं लेकिन वैसा कुछ ........... उम्मीद की किरण नहीं देख पा रही हैं, यही ना? मैं भी तो...... पर क्या करूँ बोल? मन को किसी भी प्रकार समझा नही पाती। सब दिमाग में गोल-गोल घूमता है। 

उस पुलिसवाले की याद आई जो उसदिन घर आया था। उसने कहा था - वैभव पार्टी का थिंकटैंक है। इतना बड़ा बोझ जिसके सरपर है वह इस विषय को लेकर क्या कुछ भी नहीं सोचेगा? मयूरी की मुश्किलों को नहीं समझेगा ?

बिस्तर पर पड़े पड़े काफी वक्त गुजर गया है, मयूरी को ध्यान ही नहीं रहा। दरवाजे पर दस्तक हुई। मयूरी ने दरवाजा खोला। पुलिस अधिकारी ने मुस्कुराते हुए कहा - आइए मिस हाजारिका। कुछ बातें हो जाए। अधिकारी के पीछे-पीछे बगल के एक कमरे में गई मयूरी। चारपाँच लोग पहले से ही बैठे हुए हैं। अधिकारी ने उनसे मयूरी का परिचय करवाया। ये लोग स्पेशल टास्क फोर्स के खुफिया अधिकारीगण हैं।

-बैठिए मिस हाजारिका। हमारे साथ आपको कैसा लग रहा है?। 

- अच्छा, हँसकर बोली मयूरी।

-दरअसल पुलिस नाम से ही लोग आतंकित हो जाते है। वास्तव में हम उतने बुरे नहीं है शायद। ठठाकर हँसे 

अधिकारी। एक ने मयूरी के सामने एक डायरी खोल कर रख दी।

- देखिए तो, यह लिखावट आप पहचान पा रही हैं?

- क्यों नहीं पहचानेंगी? पास बैठे दूसरे ने कहा-आप ही के बारे में तो लिखा हुआ है मिस हाजारिका।

वैभव के हाथों की लिखवट ! वह कैसे भूल सकती है। कब का लिखा हुआ है पता नहीं। डायरी के उपर की ओर जहाँ तारीख रहती है। वह फाड़ दिया गया है।

- देखिए, पढ़कर देखिए। मयूरी ने आगे झुककर कुछ पढ़ने की कोशिश की। वैभव ने लिखा है- मयूरी को पता नहीं क्यों मैं अपनी मुश्किलें बता नहीं पाया। पुलिस को शक हो गई है। उनके घर तक पहुँच गई थी। मासूम लड़की, कुछ नहीं समझ पाई। बस उसे कोई आँच न आए। उसे एक दिन सब बताना होगा। मैं दुसरे जन्म में विश्वास तो नही करता। पर मयूरी जरुर करेगी......

इतना पढ़ते ही अधिकारी ने डायरी खींच ली।

- यह लिखावट तो आपकी ही है न मिस हाजारिका? एक अधिकारी ने एक लिफाफे के अंदर से एक चिट्ठी निकालते हुए मयूरी के हाथों में रख दिया। चिट्ठी कीे परतें खोलते ही अपने हाथ की लिखावट आखों के सामने चमक उठी। कबका लिखा हुआ है। तो इतने दिनों तक वैभव ने इसे सहेज कर रखा था।

-इसी चिट्ठी की वजह से हमलोग आपको यहाँ लाए हैं। व्यक्तिगत चिट्ठी है। फिर भी जाँच के चलते हमें इसे पढ़ना पड़ा। आप समझ सकेंगी शायद। एक बात कहूँ मिस हाजारिका, आपका निश्छल प्रेम, त्याग आदि वह समझ ही नहीं पाया। बेवकुफ ने इसका कोई मोल ही नहीं दिया।

-मेरी चिट्ठी आपलोगों को कहाँ मिली?

- भूटान सीमा पर किसी खूफिया अड्डे से मिली हैं यह डायरी। पल में शूट एट साइट हो जाता। लेकिन पहले ही खबर मिल गई और वह भाग निकला वैभव डेका। साथ में और कितने साथी थे कुछ पता नहीं चला। फिर भी तीन मारे गए हैं। भागते समय कुछ लेकर जा नहीं पाया। व्यक्तिगत चीजें भी नहीं। यह डायरी भी वहीं छोड़ गया। चिट्ठी इसी में थी। बड़ा सहेज कर रखा था मैडम। अचानक छापा पड़ सकता है यह उन्होंने सोचा भी नहीं था। उनके सारे सोर्सेज फेल हो गए थे।

मयूरी के कानों में जैसे किसी ने शीशा घोल कर डाल दिया हैं। पुलिस, सरकार यहाँ तक कि इस समाज की आखों में भी वैभव एक अपराधी है। समाज विरोधी - मोस्ट वांटेड। चांस है कि वैभव बच गया सो अधिकारी नाखुश हैं। मरा नहीं इसलिए वे एक बड़ी सफलता पाने से बस कुछ कदम दूर रह गए। इधर वैभव के लिए मयूरी का मन कचोट कर रह गया। खुद को वह रोक नहीं पाई, छलछलाकर रो पड़ी। उसके वैभव को पुलिस पहचानती ही नहीं है इसलिए मार डालने के लिए इतना बड़ा आयोजन किया गया है। ऐसा सोचने लगी।

- हमने आपका मोबाइल पूरा सर्च कर लिया है। एक अधिकारी ने उसका मोबाइल लौटाते हुए कहा।

मयूरी को क्या बताना चाहता था वैभव? अपनी जिंदगी के बारे में बताने को क्या हैं उसके पास। साधारण जीवन में मयूरी उसके लिए अस्तित्वहीन है। उन दोनों को लेकर मयूरी के आँखों में जो सपने हैं, वैभव का रास्ता उसके विपरीत है। यह बात कई बार वैभव ने मयूरी को समझाने की कोशिश की थी। पर मयूरी मान ही नहीं पाई। समझौते की तो गुंजाइश ही नहीं थी। अनमिता कहती है - वास्तव में उन दोंनो में कोई सम्पर्क उस प्रकार पनप ही नहीं पाया। कुछ छिटपुट घटनाँए, आवेग-यही बस। वैभव को किसी भी हाल में इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

-आपके इमोशनल, इनवाल्वमेंट की हम इज्जत करते हैं मिस हाजारिका। महिला अधिकारी ने आगे बढ़ कर मयूरी का हाथ पकड़ा। इस चिट्ठी को एकबार पढ़ लीजिए। यह आपको लौटायी नहीं जा सकता। अधिकारी ने वह चिट्ठी उसके सामने रख दी।

बहुत पहले की चिट्टी है। वक्त ठीक से याद नहीं कर पा रही है मयूरी। वैभव की भेजी हुई किसी दो-लाइन की चिट्टी के जवाब में इस चिट्ठी को मयूरी ने लिखा था। ऐसे ही दोनों एक दुसरे को चिट्ठी नहीं लिखते थे। वैभव को यह सब पसंद नहीं था। विशेष कोई जरुरी बात होने पर किसी के हाथों दो-एक लाइन की एक चिट्ठी भेज दिया करते थे। मयूरी को बड़ा गुस्सा आता। काम की बात के अलावा और कोई बात नहीं है। क्या तुम्हारे पास कुछ भी ऐसा नहीं जो तुम मुझे कह सको ? 

- कुछ खास कहने के लिए ही तो च्टिठी लिखना होगा क्या ? वैसे मुझे यह सब पसंद नहीं। बचकाना लगता है। वैभव का दो टुक जवाब सुनकर स्तब्ध रह गई थी मयूरी। वैभव की चिट्ठी पाने की उसको बड़ी इच्छा थी। अदभुत, सुंदर तरीके से सजा कर लिखता है वैभव। अखबारों में, मैगजीनों में अक्सर उसके लेख छपते। उसके लेखन में आत्मीयता एवं पाठक को बाँधे रखने वाली मोहक मादकता, इन दोनों ने उसे समकालीन लेखकों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय बना दिया था। चिट्ठी लिखने के लिए फिर दोबारा वैभव को मयूरी ने नहीं कहा। खुद भी नहीं लिखा। लेकिन वैभव को बताने के लिए उसके पास बातों का हुजूम उमड़ पड़ता। मन चंचल हो उठता। जब ज्यादा आवेगपूर्ण हो उठती तब कागज-कलम लेकर बैठ जाती। बाद में ऐसा लगने लगा जैसे खुद से बचने के लिए मयूरी के पास इसके अलावा और कोई चारा नहीं। अपनी डायरी में वैभव से बातें करना उसकी आदत बन गई। कितनी ही बातें लिख कर रखी है। एकदिन अनमिता को वह डायरी दिखाई थी। अनमिता ने देखने से मना कर दिया। बोली तेरे वैभव को मैनें कभी नहीं देखा। मेरी हमदर्दी तेरे साथ है, तेरे साथ जो रहती हूँ न। तेरे इस दर्द का निदान भी तेरा व्यक्तिगत मामला है। रहने दे। अकेले में कभी...... क्यों ? मैं ही तो दे रही हूँ तुझे पढ़ने को, इसमें तुम्हें संकोच है ?

-संकोच क्यों होगा? मैनें ऐसा क्या कहा ? कोई और इसे गलत समझ सकता है।

- समझे। जिसको जो समझना हो, मेरा क्या?

- बात इतनी आसान नहीं है मयूरी। तुझे तकलीफ होगी।

मयूरी हँसते हँसते बोली- चोट लगेगी तो तकलीफ तो होगी ही। यह है बेचारे की आर्तनाद। पर इसमें शरमाने जैसी कोई बात नहीं है। लाश को जितना भी मारोगे, कुछ भी फर्क नहीं पड़ेगा ?

- क्यों बेवजह तर्क कर रही है। यह लिखी हुई बातें बेचारे की आर्तनाद क्यों होगी? यह तेरे प्यार की सच्ची दलील है मयूरी। जिसके लिए लिखी गई हैं - उसे शायद ही कभी पता चले कि तुम्हारे मनोभाव क्या हैं ? 

मयूरी समझती है, अनमिता धीरे-धीरे खुद में समाने लगी है। उसकी जिंदगी में ऐसी कोई कहानी नहीं है। अनमिता शिलचर की लड़की है। स्कूल में पढ़ते वक्त शमित के साथ मुलाकात हुई थी। शमित तब गुरुचरण कालेज में पढ़ता था। पिता सेना में अधिकारी थे। मात्र एक साल शिलचर में रहे। फिर वे काश्मीर चले गए। जाने के बाद एक वर्ष तक सम्पर्क रहा। अब शमित कहाँ है यह अनमिता नही जानती।

उसे कोई गुरेज भी नहीं है। खूब जम कर दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाती है। मयूरी जानती है, उसकी कहानियाँ सच नहीं हैं। कहानियों के द्वारा अनमिता खुद का मन बहलाती है। परंतु असफल रहती है। इसलिए फिर घूम कर उसी कहानी पर वापस आती है - अलग भूमिका में। मन की गहराइयों में शमित के लौट आने के सपने संजोकर रखना पसंद करती है। कभी-कभी अपनी खुशी में खुद ही उछल पड़ती है। मयूरी समझती है। अनमिता को इसका आभास नही होने देती है।

-मैडम, इस कागज को देखिएगा? अधिकारी की आवाज से मयूरी की तंद्रा टूटी।

पूरानी यादों में काफी वक्त गुजर गया है। मयूरी ने देखा, सभी उसी को देख रहे हैं। थोड़ी झेंप सी गई। कागज के लिए हाथ आगे बढ़ाया। चिट्ठी जैसा नहीं है। किसी एक वक्त की कुछ अंतरंग तस्वीरें है। इन्हे कब भेजा था वैभव को, कुछ याद नहीं आ रहा।

मयूरी ने लिखा था-आकाश का खगोल और भूगोल तुम्हीं ने मुझे समझाया था वैभव। तुमने कहा था जब आसमान मे कुदाल से कटे दुधिया बादलों को देखोगे तब समझ जाना शरद ऋतु आ गई है। जाड़े का बादल कुछ मेरे जैसा ही अकेला है। छोटे-छोटे टुकड़ों में आसमान में इधर-उधर घुमता रहता है। नदी केवल बहती जलधारा ही नहीं है। नदी एक लड़की है। तुमने कहा था जिरि, चिरि, धलेश्वरी, तिस्ता, विपाशा, कृष्णा, गंगा-सभी तो नदियाँ ही है। नदी की गति के साथ जीवन की भी समानता है। जीवन भी तो बहता रहता है - एक दिन खत्म हो जाता है। खत्म हो जानेवाली बात तुम मानना नहीं चाहते थे। कहते थे - नदी कभी खत्म नहीं होती। मुहाने पर जाकर सागर में मिल जाती है। दृढ़ विश्वास था तभी तो तुम्हारे लेखों में नदी एक लड़की के रूप में आती। मुझे कहते थे तुम केवल एक लड़की या नारी ही नहीं हो, तुम एक बहती नदी हो। मेरा नया नाम दिया था - तिस्ता।

मेरा नाम तिस्ता है - यह तुम्हारे अलावा कोई नही जानता। कोई नही जानता-यह बात भी पूरी तरह से सत्य नहीं है शायद। एक और है जो जानता है, मन से विश्वास करता है। वह मैं हूँ। तुम्हारी याद आते ही मेरा तन-मन प्राण सभी बता जाते हैं कि मैं तिस्ता हूँ। केवल तिस्ता। और कुछ नहीं। और कुछ हो भी नही सकती। दरअसल मैं तो नदी ही होना चाहती थी। नदी हो कर मुहाने पर तुम से मिल जाऊँगी। परंतु तुम्ही ने तो इसे होने नहीं दिया वैभव।

कागज हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया। मयूरी को एहसास भी नहीं हुआ। दोनों आँखें छलक आई। अब कुछ भी अच्छा नही लग रहा है। अधिकारी के कंधों पर सर रखकर किसी प्रकार पूछ पाई- वैभव अभी कहाँ है, कृपया मुझे बताइए। मैं एकबार उससे बात करना चाहती हूँ।

-यही तो लाख टके का सवाल है मिस हाजारिका। एबस्काॅडिंग। वैभव डेका भगोड़ा है। डरपोक , कावर्ड। -वैभव इतना भी बुरा नहीं है आफिसर। आप लोग वैभव को नही पहचानते। तभी ऐसा बोल रहै हैं। 

-माफ कीजिए मिस हाजारिका। ये बातें शायद आपको अच्छी न लगें। पर वास्तविकता भी आपको समझनी होगी, मानना होगा। आप अपना सबकुछ लुटा कर जिसे चाहती हैं वह तो भगोड़ा है।

-वह भाग रहा है आप लोगों के डर से। - आल द सेम। परंतु आपका क्या दोष है ? आपको इतना कष्ट....

मयूरी हँस दी- शुक्रिया आॅफिसर। अपना कष्ट मैं खुद भोगना चाहती हुँ।

-श्योर। वह तो आपको करना ही है। एक और बात, आपके साथ हमारा काम खत्म हुआ। अब आप निश्चिंत होकर जा सकती हैं। हमारी गाड़ी आपको घर तक पहुँचा देगी।। 

-रात बहुत हो गई है। इतनी रात को मैं मेस्स में लौटकर नहीं जाना चाहती। बल्कि भोर होने पर ............। 

-आपकी इच्छा। हमने बस आपको सूचित कर दिया है। वैसे मेस्स में लौट जाने में भी कोई असुविधा नही होगी। आपके मकान मालिक को हमने शाम को ही खबर कर दी थी कि आपको लौटने में थोड़ी देर हो सकती है।

-पूरी बात बता दी क्या ?

-जितना जरुरी था। इसके अलावा उपाय भी क्या है बताइए ? यदि वे आपके जोरहाटवाले घर पर फोन कर देते, इससे अच्छा है कि उनकी जानकारी में थोड़ा-बहुत रहे। इसे लेकर आप ज्यादा न सोचे। आपने सहयोग किया इसके लिए हमारी पूरी टीम की ओर से आपको धन्यवाद। उम्मीद है भविष्य में आपसे मिलने की जरुरत नहीं पड़ेगी।

भोर होने में अब ज्यादा वक्त बाकी नहीं है। एक काली जिपसी में बैठते हुए, मयूरी ने देखा-पूरब की ओर भोर की लालिमा बिखर रही है। आकाश के तारे धूमिल हो रहे हैं। गाड़ी ने गुवाहाटी-शिलोंग रोड को छोड़ते हुए बाई और बेलतला की मोड़ ली। महिला अधिकारी ने मयूरी के हाथों को दबाते हुए कहा-जीवन में काफी कुछ घटित हो जाता है मिस हाजारिका। कष्ट होता है, फिर भी उसे मान लेना पड़ता है। सामना होता है चरम सत्य से। आप इन्नोसेंट हैं। हम जान चुके हैं। 

हल्का मुस्कुराते हुए मयूरी ने कहा -मेरे  बारे में आपने में आप और क्या आॅबजर्व कर पाईं हैं- बताइए?

-मैं एक बात कहूँ मिस हाजारिका? व्यक्तिगत। कृपया इसे अन्यथा न लें - कहिए। निस्पृह आवाज में मयूरी ने जवाब दिया।

-आप, एक जटिल मामले में उलझ गई हैं जहाँ आपके और वैभव के बीच में हम दीवार की तरह खड़े हैं। वैभव खूनी है। कई मर्डर केस उसके सर पर लटक रहे हैं। उसे दंड अवश्य मिलना होगा -दोष किया है तो दंड तो मिलेगा ही। सहज आवाज़ में इन बातों को कहा मयूरी ने।

-बस। यही तो, अब आप वास्तविकता को समझ पाई हैं।

-क्यों नहीं समझूगी आॅफिसर। मैं क्या पागल हूँ? लेकिन, मैं इससे ज्यादा आप-लोगों की कोई मदद नहीं कर पाई.......... कहते-कहते बीच में ही जोर से रो पड़ी मयूरी- मैं खुद ही हेल्पलेस है। आॅफिसर। बहुत अकेली हो गई हूँ। आप लोगों ने मदद मांगा-वह भी नहीं कर पाई। वैभव भी दूर हो गया। विश्वास कीजिए आफिसर, मैं कुछ भी नहीं जान पाई। 

मयूरी के माथे पर स्नेहिल हार्थों से सहला कर सांत्वना देने की कोशिश करने लगी महिला अधिकारी। कुछ कहा नहीं। 

गाड़ी रुकी। मकान निस्तब्ध शांत है। सभी सो रहे हैं। शांति की नींद। अधिकारी थोड़े घबराई सी लगी। सभी तो सो रहे हैं। डिस्टर्ब करना पड़ेगा।

मयूरी ने कुछ नहीं बोला। वह जानती है -घर के भीतर बिस्तरों पर सभी जगे हुए है, रात भर कोई नहीं सोया है। जो भी हो- पुलिस का मामला है। ऐसे ही थाने ले जाते हैं तो सभी उसी रात थाने पहुँच जाते। युनिफायड कमांड थी इसलिए ऐसा कुछ नहीं हुआ। कहाँ ले गए है, क्यों ले गए हैं - ये सारे कौतुहल अब एक -एक करके शांत करना होगा मयूरी को। इससे पहले कितनों ने कितनी तरह से सोचा होगा। मयूरी को पुलिस पकड़ कर ले गई है, इस खबर के बाद फिलहाल शांत दिखनेवाले इस घर का वातावरण कितना भयंकर हो सकता है - इसका मयूरी को आभास है। घर के लोगों को अबतक कारण भी पता चल चुका है। नहीं भी होगा तो पता चलते देर नहीं लगेगी। हर कोई अपने हिसाब से निष्कर्ष निकाल कर निश्चिंत हो जाएगा। कल हो सकता है मकानमालिक बातों-बातों में घर खाली करने को भी बोल दे। जिस अभियोग के आधार पर मयूरी को पूछताछ के लिए ले जाया गया है - वह इतना संवेदनशील है कि उसे लेकर आमने-सामने कोई मुँह नहीं खोलना चाहता। ऐसा भी हो सकता है कि कोई उससे कुछ बात ही ना करे। सिर्फ संदेह करेगा-अपराधी समझेगा- फिर उसे अपराधी मानकर एकतरफा फैसला लेगा। मयूरी अगर कुछ कहना भी चाहे तो नहीं सुनेगा। कुछ तो होगा, मकान मालिक ही क्यों, पिता जी भी यही कहेंगे कुछ तो है। पुलिस यूँही क्यों पकड़ कर ले जाएगी? केवल पिता जी ही क्यों, भैया आदि भी जानेंगे तो कुछ ऐसा जरुर कहेंगे कि मयूरी ने वैभव से गोपनीय सम्पर्क बनाकर रखा होगा। सबसे तो छुपा ली पर पुलिस की आँखों में धूल नहीं झोंक पाई। आखिरकार पकड़ी गई। जिस समाज को बदल देने के जनून में विभोर है वैभव। वही समाज उसे कैसी निगाहों से देख रहा है। यह साधारण तथ्य वह नहीं जानता, जानना चाहता भी नहीं। वैभव लेखक है। रंग बदलते जीवन की कथा लिखने में वह माहिर है। लेकिन कब उसकी अपनी जिंदगी का नीला आकाश घनघोर काला होकर फिर सुर्ख लाल हो गया है वह खुद ही नहीं जान पाया। वैभव कहता था - भागकर जीवन की समस्या का समाधान नहीं किया जाता मयूरी। सामने से लड़ना ही वास्तव में सत्य है।

अब यह सब सिर्फ बातों की बातें हैं। वैभव खुद भगोड़ा है। अब वह आमने-सामने लड़ना नहीं चाहता। खुद को समाज के सामने खड़ा करने में ही उसको भय है। हालाकि अंदर ही अंदर एक और जीवन बिताने की चाहत से वह स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहा है। तभी तो डायरी में लिखी बातों से उसके अंदर के घावों के अस्तित्व का पता चलता है। एक अदभुत संकट की घड़ी है। परंतु मयूरी के लिए अब सबकुछ अर्थहीन हो गया है। लंबे समय से उसे पागलों की तरह ढूँढ़ने का प्रयोजन भी आज समाप्त हो गया है। मन काफी दबाव - मुक्त, भारहीन, हल्का हो गया है। अधिकारी ने सच ही कहा है - अब आगे देखने का वक्त है।  

सुबह से नये अध्याय की शुरुआत होगी। इस छोटी सी घटना ने मयूरी को समाज के सामने एक नये परिचय से प्रतिष्ठित कर दिया है। अंजाम चाहे जो भी हो, इस पल इसबारे में कुछ सोचना मयूरी को अच्छा नहीं लग रहा है। गाड़ी से उतरते हए अधिकारी को धन्यवाद देकर हाथ हिलाया और विदा हुई। अधिकारी केवल मुस्कुराई। धुआँ छोड़ती हुई गाड़ी बेलतला बाजार की ओर आगे बढ़ गई।

हवा के ठंडे झोंके ने मयूरी को सिर से लेकर पैर तक स्निग्ध कर दिया। गुवाहाटी के इतने भोर के इस परिवेश से मयूरी परिचित नहीं है। गाड़ी का नज़र से ओझल होते ही खुद को एकदम मुक्त सा महसूस हुआ। कमांड के कार्यालय में किसी ने उससे बुरा बर्ताव नहीं किया। फिर भी किसी अनजाने दबाव ने उसे घेरे रखा था। गाड़ी के साथ साथ मन का वह बोझ भी जैसे दूर हो गया। चारों ओर के मकानों में लोग गहरी नींद सो रहे हैं। मयूरी रातभर नहीं सोयी है। परंतु शिथिलता का लेशमात्र भी अहसास नहीं है। ताजी हवा, ताजा अहसास से मन पुलकित हो उठा। इतने दिन जिसे ढूँढ़ने के लिए जान-प्राण एक करके भी व्यर्थ हो चुकी थी, पुलिस ने उसे ले जाकर वही मोक्ष देने वाली खबर दे दी। वैभव भगोड़ा है समाज से, शायद जीवन से भी। अधिकारी की बातों से मयूरी यह सच्चाई अच्छी तरह से समझ चुकी है कि वैभव को लेकर उसके सपने अब कभी सच नहीं होंगे। उसके जीवन के छोटे से दायरे में वैभव का स्थान कभी नहीं हो पाएगा। मन के कोने में बचपन से संजोया हुआ यह बोध मात्र एक रात के तुफान में टूटकर बिखर गया और एक तीव्र हाहाकार में बदल गया है। दम घोंटु एक असहनीय दर्द की विह्वलता से उसका मन धीरे-धीरे बाहर आ रहा है और एक नया बोध जाग रहा हैं। मयूरी धीरे-धीरे महसूस कर सकती है कि जिस जीवन को वह पीछे छोड़ आई है वह एक दुर्घटना मात्र है, केवल फ्रेम में बंधी किसी छवि की तरह स्मृति में ही सीमित।

मन भारहीन व्यथामुक्त होकर उत्फूल्लिता का आभास देने लगा है। भोर की निर्मल निष्कलुष, ठंडी हवा के बीच अकेले खड़े-खड़े मयूरी ने अस्तित्व को उत्कर्षकाल में प्रवेश करते हुए अनुभव किया..... 


लघुकथा

डाॅ. आशुतोष आशु ‘निशब्द’
-गुलेर, काँगड़ा, (हि.प्र.), मो. 9418049070

चिकित्सा का धर्म 

अभ्युदय रोज की तरह अस्पताल में ईश्वर प्रदत्त अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु तत्पर बैठा था। आज नई एडमिशनज की भरमार थी। और क्लिनिकल हिस्ट्री का लम्बा पुलिंदा लिखने को था।

सबसे पहले उसने नाम पूछा। मोहतरमा ने उसे बड़ी शालीनता से दर्ज कराया। सकुचाते हुए अभ्युदय ने उनसे उनकी उम्र पूछी, उसने भी निःसंकोच बताई, अभ्युदय ने वह भी दर्ज कर दी।

आगे उनसे उनका धर्म पूछा गया। मोहतरमा को यहाँ बात कुछ खटकी और अपनी रौबदार आवाज में कहने लगीं, ‘मुझे नहीं मालूम था कि यहाँ धर्म पूछ कर इलाज किया जाता है। पहले पता होता तो मैं कभी यहाँ न आती।‘

दुनिया भर का ज्ञान, बिन माँगे अभ्युदय को बंट रहा था। अपनी प्रकृति के विरुद्ध वो भी सुनता रहा। उसे आशा थी कि शायद इस तथाकथित धृष्टता का कारण भी पूछा जाएगा। लेकिन इस सबसे इतर, बात निदेशक महोदय से मिलने तक जा पहुंची थी।

उसने क्षमा माँगते हुए कहा, “महोदया, मालूम होता है कि यहाँ कुछ गलतफहमी हो गई है। लोगों का धर्म पूछना मेरा शौक नहीं, अपितु मेरा काम है। आप चाहें तो निदेशक महोदय से बेशक शिकायत करें, लेकिन मेरे धर्म पूछ लेने से आपकी चिकित्सा योजना पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।”

महोदया को यह भी नागवार गुजरा। तमतमाते हुए कहा, ‘आप केवल ऐसा कह रहे हैं। यदि यह सच होता तो आप मेरा नाम जानकर भी मुझसे मेरा धर्म नहीं पूछते।‘

मोहतरमा की यह बात जायज थी। लेकिन अभ्युदय के कटु अनुभव भी इससे इतर थे। उसने पुनः क्षमा माँगते हुए अपना दर्द उन्हें बताया कि कैसे एक बार केवल नाम के आधार पर धर्म लिख देने के कारण भी एक ऐसा ही बवाल हुआ था। और वैसे भी विज्ञान एजंप्शन नहीं, एफरमेशन की अपेक्षा रखता है।

मोहतरमा अब कुछ शांत थी। शायद उन्हें अभ्युदय की सच्चाई पर भरोसा होने लगा था। स्थिति कुछ नियंत्रित प्रतीत होने लगी थी।

अब मोहतरमा ने नया सवाल पूछा - ‘ऐसा बेहूदा सवाल रखा ही क्यूँ है? आप इसे बदल दीजिए।‘

अभ्युदय ने लम्बी साँस भरकर कहा - ‘‘मैडम, मेरे वश में होता तो मैं तुरंत हटा देता था। लेकिन चिकित्सा की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य जानकारी है। इसलिए इसे हटाने की दुर्भावना कभी मेरे मन में नहीं उपजी।‘‘

‘आप फिर उसी दिशा में जा रहे हैं! धर्म से चिकित्सा का क्या लेन-देन?‘ मैडम फिर से तमतमा उठीं।

अब तक अभ्युदय का धैर्य भी चुक गया था। उसने गम्भीर स्वर में कहा - ‘‘मैडम धर्म मैंने नहीं बनाए, और न ही मुझे व्यक्तिगत धर्म में निजी रुचि है। परंतु चिकित्सा की दृष्टि से मरीज के धर्म की जानकारी का अनूठा महत्व है। मेडिकल हिस्ट्री में दर्ज जानकारियाँ रोग के त्वरित निदान में सहायक होती हैं। मसलन धर्म विशेष में प्रचलित रीतियों  आधार पर कुछ लोगों में विशेष समस्याओं की उत्पत्ति हो सकती है। पहले से धर्म विशेष की जानकारी होने पर चिकित्सक मरीज की धार्मिक आस्था के आधार उस रोगी पर कुछ विशेष दवाओं का प्रयोग करने से बच सकता है।‘‘

अब मोहतरमा निःशब्द थी। लेकिन अभ्युदय एक बार फिर अपने प्रश्नों को गति दे चुका था।


आलेख

डाॅ. मीरा कांत
नई दिल्ली, मो. 9811335375



काग़ज़ी बुर्ज

(मंच दो हिस्सों में बँटा है। आगे के हिस्से में गोलकोंडा किले का भागमती महल है जो अब एक उजाड़ खंडहर में तब्दील हो चुका है। बीचोबीच आधा फ़ुट ऊँची एक मँुडेर है जो मंच को दो हिस्सों में बाँटती है। मुँडेर पर ही बराबरबराबर दूरी छोड़कर दो खम्भे हैं। इसी आगे के हिस्से में दायीं ओर काली सुतली से बना एक बहुत बड़ा मकड़ी का जाला है जिस पर एक बड़ीसी मकड़ी चिपकी हुई है। खम्भे के पीछे का हिस्सा खुलाखाली स्थान है और दीवार के पर्दे पर गोलकोंडा किले का एक बड़ासा चित्र है। नाटक के आरम्भ में मंच खाली है परन्तु पाश्र्व से कुछ आवाज़ें आ रही हैं। इन आवाज़ों से आभास होता कि कोई गाइड किसी समूह को किले का भ्रमण करा रहा है। तभी कन्धे पर झोला लटकाये और हाथ में पानी की बोतल लिये गोपा का भागमती महल में प्रवेश। वह पाश्र्व की आवाजे़ं सुनती हुई धीरेधीरे आ रही है।)

गोपा: ये निज़ामुद्दीन भी ना बस! थकता भी नहीं है। रोज़ ऐसे ही सैकड़ों लोगों से घिरा चलता रहता है... वहीवही दोहराता हुआ। रट्टू तोता।

(गाइड निज़ामुद्दीन का अभिनय करके भारी आवाज़ में)।

किले को ग्रेनाइट पत्थरों की तीन दीवारें घेरती हैं। बाहरी दीवार में आधी गोलाई वाले कुल सत्तासी बुर्ज थे। पचास से साठ फ़ीट ऊँचे। इनमें से चार मशहूर हैं। तीन मैं आपको दिखाऊँगा और चैथे की सिर्फ बाताँ होंगी।

(अपने चरित्र में लौटकर)

फिर उस ग्रुप में से ज़रूर कोई पूछेगा- क्यों भई ऐसा क्यों? चैथे की सिर्फ बातें क्यों? तो हाथ नचाकर कहेगा...

(गाइड का अभिनय करके) 

क्योंकि वो अब है ईच नई! 

(अपने चरित्र में लौटकर)

तब सब हैरानी से उसे देखेंगे कि भई है क्यों नहीं! कहाँ गया? तो साहब शुरू हो जाएगा...

(गाइड का अभिनय करके)

हाँ साब... तब यहाँ का सुल्तान था अबुल हसन तानाशाह कुतुबशाही वंश का आखिरी सुल्तान! औरगज़ेब की आँखों में वह कंकड़ की मानिन्द चुभता। किले पर कब्ज़ा करने वास्ते औरंगजे़ब आठ महीने गोलकोंडा के बाहर ठहरा पर किले का बाल बाँका नको कर पाया। एक रोज़ मुगल सिपाहियों ने गोले बरसाबरसा के किले का एक बुर्ज और उसकी दीवार को उड़ा दिया। सुल्तान तानाशाह समझ गया कि अब ख़ैर नहीं। रातोंरात तो पत्थर की दीवार खड़ी की नहीं जा सकती थी। तो साब उसने सोची एक तरकीब! अपने दस्तकारों को बुलाया और कहा कि रातरात में ही काग़ज़ और कपड़े का हूबहू बुर्ज तैयार करो। साब सुबह बिल्कुल वैसा ही फ़र्ज़ी बुर्ज खड़ा था। ऐसा फ़र्ज़ी कि मुगल सिपाही सक्ते में आ गए। उन्होंने धोखे से उसे पत्थर का ही समझ लिया। औरंगज़ेब ने सुना तो चेहरा पीला पड़ गया। बस उसे ही बाद में कहा गया काग़ज़ी बुर्ज।

(अपने चरित्र में लौटकर) 

फिर सब आश्चर्य से दोहराएँगे- काग़ज़ी बुर्ज! तो कहेगा... 

(निज़ामुद्दीन का अभिनय करके) हाँ साब काग़ज़ी बुर्ज !  काग़ज़ी था ख़त्म हो गया। अब कहाँ ! 

(अपने चरित्र में लौटकर)

फिर ज़रूर कोई यह भी पूछ बैठेगा कि सुल्तान तानाशाह तो बहुत अक्लमन्द था पर उसके बाप ने उसका नाम तानाशाह क्यों रखा। बस फिर क्या है हमारे किस्सागो को मिल गया एक और मौक़ा!

(गाइड का अभिनय करके)

नहीं साब... नाम नहीं था उसका। ये तो रिआया उसे प्यार से कहती थी... तानाशाह... छोटा बादशाह

(अपने चरित्र में लौटकर) 

नृत्य का तो दीवाना था वो। 

(धीमे स्वर में जैसे रहस्य खोल रही हो।) 

तभी नर्तकी तारामती से प्रेम कर बैठा जो नर्तकी तो थी ही शायद नटी भी थी।

(हैरानी से)

जानते हैं एक किलोमीटर दूर अपने महल कलामन्दिर से जब तानाशाह से मिलने आती थी तो महल से किले तक 

बँधी एक तार पर नाचती आती थी।

(कोमल स्वर में) 

फिर तानाशाह ने उसके नाम से मस्जिद बनवायी- तारामती मस्जिद।

(पीछे आती है। खम्भे के सहारे मुंडेर के पास अपना झोला रखती है। एक साँससी छोड़ती है और आकर खम्भे की टेक लगाकर झोले के पास बैठ जाती है।)

एक समय में गडरियों की पहाड़ी पर बने इस गोलकोंडा के किले के बारे में सोचती हूँ तो मन में कुछ... कुछ... ऊपरनीचेसा हो जाता है। शताब्दियों का समय पुता है इन पत्थरों पर। कभीकभी लगता है कि पत्थरों पर बने इस किले को जैसे कि पत्थरों ने नहीं बूढ़े समय की हथेलियों ने थाम रखा है। इस... इस गाइड निज़ामुद्दीन ने ही तो बताया था मुझे...।

(गाइड का अभिनय करके)

ये देखने की चीज़ मैडम... इस कीले की नींव नई... ये इतना बड़ाबड़ा पत्थर कीले को सैंकड़ों सालों से संभाला है... क़ीला ऊपर से नीचे को बनाया गया... नीचे से ऊपर को नई! 

(उदास होकर)

पर मेरा जीवन तो बचपन से बड़ेपन की तरफ ही बढ़ा है। नीचे से ऊपर की तरफ और उसकी तो नींव 

थी... गहरी नींव... फिर वो नींव हिलतीसी नज़र क्यों आती है कभीकभी!

कभीकभी लगता है नींववींव सब कोरी बकवास है। जब जहाँ का लिखा होता है मौत खुद खींचकर ले जाती है। मैं तो उसे बचपन से जानती थी। मेरठ में एक ही मकान में ऊपरनीचे रहते थे हम।

आँगन हमारा एक ही था। तो फिर? और वो... वो शलीं? उसकी नींव ? 

(उठकर खड़ी होती है और अपने कपडे़ झाड़ती है।)

नहीं मुझे ये सब नहीं सोचना चाहिए। मैं... मैं... यहाँ किले की स्टडी करने आयी हूँ... मुझे सिर्फ... और सिर्फ गोलकोंडा किले के बारे में सोचना है।

(झोले में से एक किताब और एक रजिस्टर निकालती है। पेन ढूँढ़ती है। वह भी निकालती है। रजिस्टर के पन्ने खोलकर देखती है।)

काश मेरा सब्जेक्ट ये... ये इतिहास न होता। मुझे भी तब औरों की तरह बिना नींव और नींव की तामीरों के बारे में न कुछ पता होता और न ही मैं इन बातों के बारे में कुछ सोचती। आज हम आतंक की कितनी घिनौनी मिसालें छोड़ रहे हैं..... आनेवाली पीढ़ी के लिए। क्या ये मिसालें ही नींव नहीं होंगी उन खौफ़नाक भावी किलों की जो उनके अवचेतन में... उनके मन में बनेंगे?

(अचानक रजिस्टर बन्द कर देती है।) 

मगर मैं... मैं ये क्या करने बैठ गयी? मुझे तो आज ऊपर जाना था...बारहदरी में 

(किताब और रजिस्टर वापस झोले में डालती है। चप्पल उतारकर उसे झाड़ती है और फिर पहन लेती है।)

तीन दिनों से लगातार नीचेनीचे का चक्कर काटकर लौट जाती हूँ और आख़िर में आकर यहीं बैठ जाती हूँ... इसी भागमती महल के उजाड़ वीराने में। (गुस्से से) इन... इन जालों में... किला भी तो कम बड़ा नहीं है! (आँखों में चमक के साथ) और इसमें एक अट्रैक्शन भी है। (अचानक रुककर विस्मय के साथ)

अगर प्रोफेसर अस्थाना एक प्रोजेक्टर के तहत इस किले पर पुस्तक न लिख रहे होते... और... और उनके पैर में फ्रैक्चर न होता... और इस पुस्तक को सब्मिट करने की तारीख़ सिर पर न होती और... अपनी पीएच.डी. स्टूडेंट होने के नाते वो मुझे ही यहाँ न भेजते तो? तो? तो शायद मैं यह किला ही न देख पाती! और मैं यह भी न जान पाती कि मैंने क्या गँवाया है। सच!

(फिर गम्भीर होकर)

मगर मैंने भी तो उनके प्रस्ताव पर यहाँ आने के लिए फ़ौरन हाँ कर दी थी। शायद मेरठ और दिल्ली से कुछ समय के लिए बचना चाहती थी मैं और ऐसे में प्रो. अस्थाना का ऑफर मुंह मांगा इनाम था।

(खड़ी हो जाती है।)

मगर उनके प्रोजेक्ट के लिए यहाँ इतनी बार आने की तो कोई ज़रूरत नहीं थी। फिर मैं रोज़ ही मुंह उठाकर 

कन्धे पर झोला लटकाकर यहाँ क्यों चली आती हूँ? पिछले बीस दिनों से यही कर रही हूँ। क्यों?

(खुशी से घूमसी जाती है।)

क्योंकि यहाँ आना मुझे बहुतबहुत अच्छा लगता है। यहाँ मुझे सुकून मिलता है। यहाँ मैं ख़ुद को अजनबीसी नहीं लगती।

(सिर को झटककर)

क्या फ़र्क पड़ता है? अच्छा लगता है तो लगता है बस। बाहर से जब अन्दर आते हैं तभी से किस्सेकहानियों का एक तिलिस्म साथ हो लेता है। वो फ़तह दरवाज़ा... उससे अन्दर आते हैं तो वो पोर्टिको जिसमें सिर ऊपर करके देखें तो ऊँचे गुम्बद पर चैबीस पत्तियों का एक डायमन्डकट वाला सुन्दर डिज़ाइन है... जो असल में एक आश्चर्यजनक तकनीक है।

(तेजी से मंच के आगे एक कोने में पहुँचती है और वहां खड़ी होकर ताली बजाती है। फिर पलटकर पीछे लगे पर्दे को देख उस ओर संकेत करती है।)

इस डायमन्डकट के नीचे ख़ास जगह पर खड़े होकर ताली बजाने से आवाज़ वहाँ पहुँचती है... वो वहाँ... चार सौ फ़ीट ऊपर बनी बालाहिसार बारहदरी में।

(ताली की गूंज अचानक पीछे पर्दे के पास से आती हई सुनायी देती है। गोपा खुश होकर एक बार फिर ताली बजाती है तो गँूज फिर पीछे पर्दे पर सुनायी देती है।)

यहाँ ताली बजाकर वहाँ बैठे लोगों को ख़बरदार किया जाता था कि दरवाज़े पर कोई है। स्ट्रेंज!

(तभी गम्भीर होकर भागमती महल में लौट आती है।)

अपने को आने वाली मुश्किलों से... विपदाओं से बचाना इंसानी फ़ितरत है... पर आख़िर तो क़िला फ़तह कर ही लिया गया। इस तकनीक की चैकसी के बावजूद। जीतता वही है जिसके पास ताकत होती है... चालाकी होती है। न्यायअन्याय तो कहनेसुनने की बातें हैं बस!

(जालेवाली तरफ आकर ज़मीन पर बैठ जाती है थककर)

पिछले दो सालों से लड़ रही हूँ ख़ुद से... सँभल रही है... टूट रही हूँ... पर... पर मेरी बात उस तक नहीं पहुंच रही... किसी तकनीक से भी नहीं! ।

मैं रोती हूँ फूटफूटकर और फिर उसे मनाने... लौटाने चल देती हूँ पर वो... कभी वो ख़ामोश रहता है। कभी झालरदार कहानियाँ पेश करता है और कभी... नये वादों की फैंस लगा देता है कि मेरे आँसू रुक जाएँ। कभी... कभी मैं बोलना बन्द कर देती हूँ कुछ दिनों के लिए लेकिन... फिर... फिर अपने मजबूर मन की लालटेन लिए पहुँच जाती हूँ उसी स्टेशन पर!

(गला रूँध जाता है। आँसू पोंछकर) 

आखिरी बार जब मैं रोयी थी तो कहा था उसने... 

(निखिल का अभिनय कर)

तुम्हें नहीं लगता ये हमारा पैटर्न हो गया है। रूठनामनाना, मान जाना! आदत हो गयी है तुम्हें इस पैटर्न की।

(अपने चरित्र में लौटकर डूबते स्वर में)

पैटर्न। और मेरे आँसुओं को अचानक ब्रेक लग गया था यह शब्द सुनकर... पैटर्न! आँसू ही नहीं मेरे अन्दर भी कुछ ठहर गया था... शायद बहुत कुछ... या सब कुछ! कैसा महसूस किया था मैने। जैसे किसी ने मेरे मन को कच्चे नारियल की तरह छीलकर... खोखला करके सड़क के किनारे कूड़े के ढेर पर फेंक दिया हो। बिल्कुल खाली करके। ओफ्फ़!

(पसीने पोंछती है। उठती है।)

इस क़िले के भीतर कुतुबशाही मेहमानख़ाने में जाती हूँ तो मन घबरा जाता है। वहाँ आरकिटेक्चर की एक और तकनीक का इस्तेमाल हुआ है। उस मेहमानख़ाने में विपरीत कोनों में अगर दो लोग एक दूसरे की तरफ पीठ करके यानी दीवार की तरफ मुँह करके खड़े हैं...

(दौड़कर पहले भागमती महल के ही आगे दायीं ओर के कोने में जाती है फिर पीछे बायीं ओर के कोने में जाकर उलटी खड़ी होकर पीठ दर्शकों की ओर करके दिखाती है और मंच के मध्य में लौट आती है।)

यानी एक यहाँ इस... इस कोने में दीवार की तरफ मुँह करके तो दूसरा वहाँ... उस कोने में अपनी दीवार की तरफ मुँह करके... ऐसे... पहला व्यक्ति अपनी तरफ वाली दीवार के करीब जाकर सरगोशी के अन्दाज़ में आहिस्ता से कुछ कहे तो दूसरी ओर का व्यक्ति बिना उसकी ओर देखे अपनी ओर की दीवार से वह सुन लेता है और बिना मुड़े दीवार में फुसफुसाकर उसका जवाब भी दे सकता है।

(मंच के आगे वाले कोने में दौड़कर जाती है और दीवार की परिकल्पना करके आहिस्ता से कुछ कहती है।)

ऐसे... यहाँ... इस दीवार के कान में जैसे मैं कुछ कहूँ... पर क्या बोलूँ? (सोचकर धीरे से) निखिल... आई स्टिल लव यू...

(दूसरी ओर वाली दीवार के पास उसके शब्द गूंजते सुनाई देते हैं।) 

निखिल... आई स्टिल लव यू!

(वह जहाँ खड़ी है वहीं परिकल्पित दीवार में कान लगाकर कुछ सुनने की कोशिश करती है... परन्तु वहाँ कोई 

ध्वनि सुनाई नहीं देती तो उदास होकर आहिस्ताआहिस्ता मंच के मध्य आ जाती है।)

जवाब कैसे आयेगा... उस ओर तो कोई भी नहीं है। हँह, आज क्या... जब आमनेसामने बैठकर बात करते थे तब भी क्या मेरी बातें उस तक पहुंचती होंगी? पहुँचती तो वो यों...

(घबराकर दिल थामे पीछे झोले के पास आती है। मुंडेर पर बैठती है। बोतल उठाकर पानी पीती है। बोतल का ढक्कन बन्दकर वापस रखती है। उद्विग्न स्वर में)।

सब कुछ ठीक चल रहा था... फिर ऐसा क्या हो गया कि निखिल.... 

(कुछ सोचकर)

पीएच.डी. के दौरान उसके डिपार्टमेन्ट के हैड ने उसे बराबर उत्साहित किया और वादा भी किया कि लेक्चरर का पद मिलने में उसकी मदद करेंगे। इस बीच निखिल की मुलाकात इरा से हो गयी थी। इरा हैड की बेटी थी। यह मुलाकात दोस्ती में तब्दील हुई और निखिल ने यू टर्न ले लिया। क्या यह पैटर्न नहीं कहलाएगा? क्या कहेंगे इसे ? शायद... शायद महत्त्वाकांक्षा... यानी एम्बीशन जिसे निखिल तरहतरह से जस्टिफ़ाई करता रहा।

ओफ्फ़ जितना भागती हूँ इन पुरानी बातों से उतनी पीछे लग लेती हैं ये... हर रोज़ यहाँ चली आती हूँ मैं इस वीराने में यह सोचकर... कि अकेले में अपने मन के सब जाले आज साफकर दूँगी... अपनी ज़िन्दगी से बाहर फेंक दूँगी इन्हें 

पर... यहाँ आकर कुछ और उलझ जाती हूँ....

(किताब पढ़कर)

भागमती एक जानीमानी नर्तकी थी और मूसी नदी के उस पार रहती थी जबकि इस पार गोलकोंडा के क़िले में रहने वाला तेरह वर्षीय मोहम्मद कुली कुतुबशाह उसकी मोहब्बत में इतना दीवाना हो चुका था कि रात में हहराती मूसी नदी पारकर उसका दीदार करने पहुँचता था। पिता इब्राहिम कुली कुतुबशाह ने रोकने की हरचन्द कोशिश की पर जवानी के चढ़े दरिया को रोक न पाये तो बेटे की सलामती के लिए मूसी नदी पर पुल बनवा दिया।

(किताब बन्द करके)

वैरी गुड... ये हुई ना बात! वैसे मोहम्मद कुली कुतुबशाह की किस्मत बहुत अच्छी थी। वे अपने पिता की छह में से तीसरी सन्तान थे। तीसरी सन्तान! पर सुल्तान यही बने...

सुल्तान... यानी जो सत्ता के शीर्ष पर हो! पर सत्ता थी क्या उसके हाथ में? क्या यह कठपुतली का खेल नहीं रहा होगा? उसी... उसी महत्त्वाकांक्षा की ताल पर। मंच पर कोई... और डोर किसी और के हाथ में... कभी किसी वैचारिक समूह के और कभी किसी धार्मिक तन्त्र के। शासन न हुआ लट्टू हो गया जो शासक के नहीं किसी और के इशारों पर नाचता है। पर निखिल जो आज अपनी शादी की तैयारियों में व्यस्त है उसके जीवन की डोर किसके हाथ में है... खुद उसके... इरा के... या इरा के पिता यानी निखिल के हैड ऑफ़ डिपार्टमेन्ट के हाथ में? अगर निखिल इरा से शादी के लिए हाँ न करता तो क्या उसे कभी नौकरी ही न मिलती?

(उदास होकर)

क्या निखिल इरा को वहीं ले जाता होगा? उसी बरिस्ता में? क्या उसी मेज़ पर आमनेसामने बैठकर वो ब्लैक कॉफ़ी पीते होंगे? क्या इरा की उँगलियों को भी हाथ में लेकर देरदेर तक उन्हें निहारता होगा? (ज़रा ठहरकर) पर उससे ये... ये तो हरगिज़ नहीं कहा होगा...

(निखिल का अभिनय करके)

बॉयफ्रेंड होने का मतलब शादी करना तो नहीं होता और न ही बॉयफ्रेंड होने का मतलब आँखों पर पट्टी बाँधकर रहना होता है कि देखेंगे तो दुनिया में बस एक को..... जन्मभर... निगमबोध घाट तक!

(अपने चरित्र में लौटकर रुँआसी होकर)

जन्म भर! निगमबोध घाट तक! पर मैं ही क्यों निखिल को अपना जीवन... अपना सब कुछ समझ बैठी। क्यों?

(तभी फ़ोन की घंटी बजती है। गोपा पलटकर झोले को देखती है। आँसू पोंछकर झोले के पास जाती है। मोबाइल निकालकर बात करती है।)

हैलो... हैलो... जी नमस्कार अंकल। आप कहाँ मणिपुर से... ओ... क्या... अच्छा दिल्ली में हैं... और शर्ली? क्या... फिर अस्पताल में भर्ती है? वहीं दिल्ली में... हालत फिर बिगड़ गयी थी? ओ... मैं... हाँ... मैं हैदराबाद में हूँ... जी... शर्ली मिलना चाहती है मुझसे... जी... अगले हफ्ते... जी... जी मैं आती हूँ जल्दी... जी (हँसकर) जी ठीक हूँ... बढ़िया... मैं आती हूँ उससे मिलने... नमस्कार।

(मोबाइल बन्द करके झोले में रखती है। भारी कदमों से उठती है।)

शर्ली... शर्ली फिर अस्पताल पहुँच गयी! उसकी दिमागी हालत उसे चैन से जीने नहीं दे रही। मगर क्यों ? माना मैं कस्बे में पलीपढ़ी थी। निखिल के शब्दों में ‘मेरठ मेन्टैलिटी‘ की हूँ पर शर्ली तो बचपन से ही बोर्डिंग्स में रही है... पढ़ी है... मेयो कॉलेज से आयी थी वो... फिर... फिर उसका बॉयफ्रेंड समर क्यों ऊब गया उस रिश्ते से छह महीने में ही? उसे क्यों इतना जल्द सब कुछ रेपेटेटिव लगने लगा जिसमें किक न हो? उस किक के लिए उसने शर्ली को ड्रग्स की आदत डलवा दी। आज समर तो नामालूम किस अंधेरे में कहीं खो गया और शर्ली साइक्रेट्रिस्टस की शरण में अस्पताल में भर्ती है। जूझ रही है अपने बीमार मन से।

(विचारशील मुद्रा में)

यानी शर्ली को उसका बॉयफ्रेंड ड्रग्स के सहारे जहाँ ले गया मुझे निखिल का प्रेम वहाँ ले जा रहा है? (घबराकर) 

नहीं... मैं ऐसा नहीं होने दूँगी। स्थितियों को पकड़कर रखना होगा।

(सिर झटककर कपड़े झाड़ने लगती है।)

ये मैं... मैं अपने बारे में क्यों सोचने लगती हूँ? मैं तो यहाँ इतिहास के बारे में.... मतलब गोलकोंडा के बारे में शोध करने आयी हूँ। अब बस... कोई इधरउधर की बात नहीं... बस बस... कुतुबशाही डायनेस्टी... और कुछ नहीं.. हाँ तो... हाँ तो इस डायनेस्टी का सबसे मशहूर सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुबशाह ही था जिसे एक सेक्यूलर शायर के रूप में याद किया जाता है। और उसकी सबसे बड़ी देन है हैदराबाद शहर जो उसके और भागमती के प्रेम का प्रतीक है। राइट ?

(अचानक गम्भीर होकर) 

क्या है ये प्रेम और विवाह ? क्या होते हैं जन्मजन्म के रिश्ते? नाम-बेनाम रिश्ते! इसमें भी दाँव ? इसमें भी जोड़तोड़।

(सिहरकर) 

ये क्या हो गया है मुझे ! ये मेरी हड्डियों में ठण्डसी क्यों लग रही है? 

(काँपसी जाती है।) 

कहीं मैं भी शर्ली की तरह डिप्रेशन में तो...

(तभी अचानक सिर के ऊपर कुछ उड़ाती है।) उई। ये क्या है... 

(नज़र ऊपर उठाकर देखती है।)

ओह! इतने चमगादड़... कहीं काट न लें। 

(कपड़े झाड़कर दूर होकर बैठती है।) 

छि... ऐसा लग रहा है जैसे मेरी देह से चिपक गये हैं ये चमगादड़। 

(ध्यान से देखकर) 

नहीं... कहीं कुछ भी तो नहीं... फिर मैं बारबार... 

(उठकर फिर कपड़े झाड़ती है।)

मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि कुछ... ये... ये बारबार कपडे़ झाड़ना कहीं कोई मैनरिज़म तो नहीं! (खिसियाकर मुस्कराती है) नहीं मैं तो सिर्फ कपड़ों पर लगी धूल साफ करती हूँ। 

(तभी उदास होकर) 

धूल... कपड़ों की और..... 

(तभी फिर लगता है कि सिर के ऊपर से कोई चमगादड़ गुज़रा)

ओफ़... ये चमगादड़ भी... कहाँकहाँ से हटाऊँ... कभीकभी लगता है मेरे वजूद से चिपक गये हैं ढेरों चमगादड़। ओफ़!

(उदास होकर)

जब तानाशाह के ही एक विश्वासघाती ने क़िले का दरवाज़ा औरंगज़ेब के लिए खोल दिया तो तानाशाह को बन्दी बना लिया गया। ठीक चैदह साल उसने कैद में काटे। सूफ़ी मन के साथ चैदह वर्ष राज़ और चैदह वर्ष कैद। कहते हैं कि कुतुबशाही के पतन के समय भी मुगल सैनिकों के सामने तानाशाह बहुत शान्त और सन्तुलित रहा। उसने नमाज़ के लिए मोहलत मांगी। फिर एक दस्तरखान बिछवाकर अपने विरोधी खेमे को नाश्ते की दावत दी और इसके बाद क़िले और सत्ता को अलविदा कहा। तानाशाह का सूफ़ी मन सत्तालोलुप मन की परतों को बखूबी समझता होगा। तभी तो उसने क़िले की दीवार और बुर्ज ढह जाने पर काग़ज़ी बुर्ज बनवाया।

(पहले आँखों में एक चमक कौंधती है फिर उदासी घिर आती है।) 

काग़ज़ी बुर्ज! यानी कल्पना... या फिर मात्र भ्रम... वो दीवार जो नहीं है पर लगता है कि है। सिर्फ एक रात में बना पर्दा जो... जो क्षणजीवी हो... कुछ ही दिनों के लिए बहलाये रख सकता हो... इल्यूजन... सिर्फ इल्यूजन... यानी काग़ज़ी बुर्ज यानी प्रेम!

(तभी पाश्र्व से कुछ कदमों की आहटें व कुछ दूर होती आवाज़ें सुनायी देती हैं। कोई पुरुष स्वर स्पष्ट होता है।)

चलिए... चलिए... किला बन्द होने का समय है... 

उधर.. उधर से... चलिए...

(गोपा आवाज़ों को ध्यान से सुनती है।) 

शाम हो आयी है... किला बन्द होने का वक्त... 

(निज़ामुद्दीन का स्वर पाश्र्व से)

तू इन्हें ले जा... मैं शॉर्ट कट से जा रहा हूँ... कब्रिस्तान वाले रास्ते से... ख़ुदा हाफ़िज़।

(गोपा भारी कदमों से उठती हैं। झोले में सामान डालती है। चप्पल झाड़ती है। फिर उसे पहनती है।)

पता नहीं ये बजरी क्यों चिपक जाती हैं पैरों से... पर यहाँ तो बजरी है ही नहीं.... 

(अपने व्यवहार से झेंपसी जाती है।)

ओह! चलना होगा। मैं भी शार्टकट से निकल लूँगी। कब्रिस्तान वाले रास्ते से।

(अचानक ठहरकर)

क़िले के ठीक बाहर कब्रगाह क्यों है? जैसे क़िले के बाहर पाँव रखते ही मौत मिले!

(झोला कन्धे पर लटकाती है।)

अँधेरा कुछ ज़्यादा ही घिर आया है। पूरे क़िले पर अपने डैने फैलाये। मन नहीं है अभी जाने का... क्यों? बाहर ऊँचेऊँचे पेड़ भी मानो अन्धकार बरसा रहे हों....और भीतर मन की छत पर दरारें पड़ी हैं... उन दरारों से वीराना चू रहा है... अंधेरा वीराना। मुझे... मुझे कुछ अजबसा क्यों महसूस हो रहा है।

(धम्म से नीचे बैठ जाती है।)

उस बच्चे की तरह... जिसने एक सरसराते केंचुए को चाकू से काटकर उसके दो टुकड़े कर दिए थे। माँ ने कारण पूछा था तो उसने कहा था- ये केंचुआ अकेला था। अब इसे एक दोस्त मिल गया है।

(झोला एक ओर रख धूल में लोटसी जाती है। फिर विक्षिप्तसी मुस्कराकर आँखों में चमक के साथ मानो कोई राज़ की बात बताती है।)

मेरे मन के अंधेरे में जो काग़ज़ी बुर्ज था वह ढह तो गया पर उसका मलबा... वो मलबा अब वीरान नहीं रहेगा... हाहा... हाहा... मेरा मन अब वीरान नहीं रहा... पता है... उस पर कटा हुआ केंचुआ सरसरा रहा है। (हँसकर) हाहा... हाहा... कटा हुआ केंचुआ! सच कहती हूँ... कटा हुआ केंचुआ!

सम्पादित संस्करण, मूल एकल नाट्यत्री ’तीन अकेले साथसाथ’ में संकलित।    

कहानी: साभार ‘मछली सलीब पर टंगी’


डाॅ. कमला दत्त
Email : kdutt1769@gmail.com जोर्जिया, यू.एस.ए.

महसूस

वह देर तक बैठे गिरी हुई सीपियाँ बीनते रहे थे। बिना कुछ बोले। कभी-कभार वह एक-आध बात कर लेता और सिलसिला जारी रखने के लिए वह कुछ पूछ लेती। मसलन वह शाम से चार बार दुहरा चुकी थी कि वह उसे खत लिखता रहे और वह कई बार कह चुका था-‘सेहत का ध्यान रखना, ज्यादा काम मत करना, शादी से पहले मुझे लिखना, मैं चला आऊंगा।‘

वह देर तक बैठे सीपियां अलग-अलग करते रहें थे, मिली हुई सीपियों को अलग कर उन्होंने काग़ज़ के छोटे-छोटे डिब्बों में रखा था और इसी में उसकी कुछ सीपियों की मालाएं टूट गयी थीं। वह उन्हें बीनता चला गया था और वह पिरोती रही थी। 

ढेर सारी रंग-बिरंगी सीपियों को बीनते और पिरोते वक्त वह सोचती रही थी कि वह नरेन को सिर्फ दो सालों से जानती है। दो साल पहले वह ट्रांसफर हो कर उसके आफिस में आया था। बहुत कम बोलता था, झिझका रहता था। कुरेद-कुरेद कर उसने बहुत-सी बातें पूछी थीं, उसके बारे में, उसके घरवालों के बारे में। फिर वह उसी की एक सहेली को चाहने लगा था, जो उसको बिल्कुल पसन्द नहीं कर सकी थी। और अब सिलसिला टूट गया था। वे सभी लोग घूमते, वे उसकी सहेली, उसकी छोटी बहन और नरेन । अच्छा खासा ग्रुप बन जाता। उसकी सहेली वाली बात के टूटने से उसे बड़ा दुख हुआ था। वह उसे समझाती रही थी कि कोई और लड़की पसन्द कर ‘सेटल‘ हो जाये ।

जब उसका ट्रांसफर का आर्डर आया तो बहुत घबड़ाया था, सबसे पहले उसे ही बताने आया था। कहने लगा-बिल्कुल भी जाने को मन नहीं कर रहा । उसने कहा था, उसे भी उसका जाना अच्छा नहीं लग रहा। उसका हर इतवार या किसी भी शाम को उनके घर आना, सब लोगों का मिल कर चाय पीना और घूमने चले जाना, एक आदत-सी बन गया था।

और यह सोचना बड़ा अजीब लगता है कि वह चला जायेगा और शामें एक साथ बहुत बोझिल हो जायेंगी। वह और उसकी बहन हमेशा कहते थे, अकेले पिक्चर जाना या रेस्तरां जाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। कोई हम उम्र भाई या ‘एस्कॉर्ट‘ जरूर साथ होना चाहिए। वह और उसकी बहन हंसती थी। ऐसे भी कुछ आदमी मिलने चाहियें (किराये पर) जो आप के साथ थोड़ी देर घूम आयें, चाय पी आयें, न इससे कुछ ज्यादा, न इससे कछ कम । और वह लोग हंसते थे कि ऐसा तो अमेरिका में भी नहीं होता, ‘डेट इज ए डेट‘ ।

वह जाने की बात से बहुत परेशान था, वह हर रोज़ चला आता और वे लोग घुमने निकल जाते। कभी-कभार उसकी सहेली भी साथ होती। पर किसी टूटे सिलसिले के जुड़ने की उम्मीद नहीं थी।

वह आजकल आॉफिस में बहुत बिज़ी थी, और वह काम में उसकी मदद कर दिया करता था। वह सोचती, वह कितने निरपेक्ष भाव से हर किसी का काम कर देता है । जव कभी वह सुधीर को लेकर परेशान होती थी, वह उसे समझाया करता था और अकसर कहता था कि उससे उसका परेशान होना नहीं देखा जाता। और कि वह खुल कर उससे कोई भी बात कर सकती है, और किसी चीज़ की ज़रूरत हो मांग सकती है। उसने कहा था, कभी जरूरत हुई तो उसी से मांगेगी। 

जाने से पहले वह इतना घबड़ाया हुआ था कि उसने समझाया था कि कुछ दिन वह अपने त्रिवेंद्रमवाले दोस्त के पास हो आये। पूछने लगा, वहां से क्या लाऊं तुम्हारे लिए? उसने कहा था कुछ सीपियां और कुछ सीपियों की मालाएं। उसे सीपियां और उनकी मालाएं बहुत पसन्द है। वह अक्सर गले में बड़ी-बड़ी सीपियों की मालाएं डालती है। बड़ी बचकानी बात है, उसकी उम्र और सोबर पर्सनैलिटी के साथ बिल्कुल नहीं जाती। 

उसने ढेर सारी सीपियां इकट्ठी कर रखी थीं। जब वह उसके लिए और सीपियां लाया, तो वह पुराने डिब्बे उठा लायी थी, और वे देर तक बैठे सीपियां अलग करते रहे थे। वह कहता रहा था कि अब वह कभी नार्मल नहीं हो पायेगा, और वह उसे बार-बार समझाती रही कि इतना ‘सेंटीमेंटल‘ नहीं होना चाहिए । वह उसे बहुत-सी लड़कियां बताती रही थीं, और वह हंस कर टालता रहा था। किसी भी बात का सिलसिला जुड़ नहीं पाया था और पूरी की पूरी शाम उन्होंने चुप रह कर काट दी थीं, सीपियाँ बीन कर, जमीन पर उँगली से रेखाएं खींच कर, जिनका न कोई निशान था, न कोई रूप रेखा। केवल इतना भर कि आप वक्त काट रहे हैं।

उसने उससे पूछा था कि वह इतनी उदास क्यों है, तब उसे महसूस हुआ कि वाकई ही वह हर रोज़ से कम बोल रही है और उदास है। उसके जाने के बाद उसने सोचा, शायद उसे उसका जाना अच्छा नहीं लग रहा और इसी से वह अपने को इतना बोझिल महसूस कर रही है। वह अपने को कुरेदती है।

उसे लगता है नहीं, एक अरसा हुए उसने किसी भी चीज़ को पूरी तरह महसूस करना छोड़ दिया है। एक बार बहुत पहले किसी चीज़ को बहुत गहरे महसूस किया था। उसके सब कुछ से किसी के सब कुछ की बात बिखर गयी थी क्योंकि दूसरे व्यक्ति ने कुछ भी, कभी महसूस नहीं किया था उसे ले कर । यह सब सोचना अब कितना पागलपन लगता है। लेकिन उसके बाद उसने शायद कुछ भी पूरी तरह महसूस नहीं किया। हर चीज को महसूस करती है एक ऊपरी ढंग से, और उसका एक हिस्सा दूर रह कर सब कुछ देखता रहता है, कुछ भी महसूस नहीं करता। उसका बाकी का शरीर इन्वॉल्व होकर जी रहा है, पर एक हिस्सा दूर तटस्थ सब कुछ देख रहा है, कुछ भी महसूस नहीं कर रहा, जब कि लोग सोचते हैं, बहुत इंवॉल्व हो कर जी रहा है। शायद उसका एक हिस्सा बहुत इवॉल्व है । जब उमेश को जाना था, उसे कितना बुरा लगा था, और सचमुच उसके जाने की बात सोच वह उन दिनों कितनी उदास हो जाती थी। उसे याद आता है, उसके जाने से पहले उसने अपने आपको काफी छूट दे रखी थी। बिना आफिस के लोगों की परवाह किये, घण्टों उसके साथ गप्पें मारनी, उसी के साथ खाना, उसी के साथ चाय पीनी। आफिस के लोगों ने काफी किस्से घड़ लिये थे। पर वह हमेशा जानती थी, वह किसी भी तरह इवॉल्वड नहीं है। पर उसे उसका जाना बड़ा बुरा लगा था। वह सोचती है, वह हर किसी के जाने की बात सोच इतनी उदास क्यों हो जाती है ? आॅफिस में काम करती है, लोगों के ट्रांसफर तो होते रहेंगे। उसे याद आता है, जाने से पहले अकसर उमेश उदास हो जाया करता था। शाम को उसी के एपार्टमेंट में बैठ वे देर तक कॉफी पीते रहते। रिकॉर्ड सुनते रहते, इधर-उधर की बातें..‘उसका यह कहना कि उसके लिए लड़की ढूंढ़ दे, उसका यह कहना कि अपनी शादी पर बुलाना जरूर। पर उसे याद है, उसके साथ बैठ एपार्टमेंट में गप्पें मरते हुए, पेड़ों के झुरमुट के बीच रात को गुज़रते हुए, रिक्शा में उसके हाथ को धीरे से सहलाते वक्त भी उसका एक हिस्सा कुछ भी महसूस नहीं कर रहा था। दूसरे हिस्से का महसूस करना एन्ज्वॉय कर रहा था । सिर्फ एन्ज्वॉय और जब उमेश जाने के कुछ दिन बाद ट्रांसफर करवा कर वापस आया था तो उसका कोई भी हिस्सा उसके लिए कुछ भी महसूस नहीं कर रहा था। छोटी-सी बात पर वे दोनों नाराज हो गये थे। 

और अब दोनों मिलते हैं तो फॉर्मल बातचीत के अलावा कुछ भी नहीं । कटे-कंटे से गुज़र जाते हैं। शायद कुछ भी न महसूस करने वाला हिस्सा उस पर हावी हो गया है। वह सोचती है. बडी गलत बात है। जब भी उसके सर्कल का कोई आदमी जाने लगता है, तो लगता है कुछ बहुत गहरे टूट रहा है । और वह शायद हर जाने वाले से कुछ ज्यादा ही घुलमिल जाती है। कभी मनोविश्लेषण करेगी। 

वह याद करने की कोशिश करती है, सुधीर के जाने के वक्त उसने कैसे महसूस किया था। उसे याद आता है, जाने का जब अचानक प्रोग्राम बनने के बाद वह मिलने आया तो उसने कुछ भी महसूस नहीं किया था। वह लोग सारा दिन शॉपिंग करते रहे थे। कितनी अजीब बात है। उसे याद आता है, उसके जाने के बहुत दिन बाद उसे उसका जाना महसूस हुआ था। शायद वह लोग इतने करीब थे कि बहुत मोनोटोनी आ गयी थी और कुछ दिनों के लिए उसे उसका जाना अच्छा लगा था । और उसके जाने के काफी दिन बाद उसका जाना महसूस हुआ था, और वह बहुत उदास हो गयी थी। वह सोचती है, सुधीर और उसके इतना करीब होने पर भी कुछ है जो पूरी तरह इन्वॉल्व नहीं। वह सुधीर को याद करने की कोशिश करती है। सुधीर को याद करने से पहले उसे याद करना पड़ता है, पहली बार सुधीर ने कब उसे बाँहों में लिया। कब हलके से उसके बाल छुए, और कबकब कहा कि शादी करेगा तो उसी से। वह सोचती है, बड़ी गलत बात है, उसी को महसूस करने के लिए, उसे महसूस करना पड़े कि पहली बार उसकी बाँहों में उसने कैसे महसूस किया, और कब कैसे उसने उसके बाल सहलाये। वह आप से आप सुधीर को लेकर कुछ भी महसूस नहीं कर पाती। वह छोटी-बड़ी बहुत-सी बातों को महसूस करने की कोशिश करती है ताकि उसे लगातार महसूस कर सके। उसे लगता है, शादी के बाद भी उसका एक हिस्सा कुछ महसूस नहीं कर पायेगा। 

उसे लगता है, नरेन के जाने को लेकर उसने कुछ महसूस किया है। उमेश के जाने की बात लेकर भी वह परेशान थी और उसने कुछ महसूस किया था । वह सोचती है, अकसर इन दिनों स्कीम का काम करते वक्त जब कभी नरेन का हाथ उसे छू जाता, वह कुछ महसूस करती है। और जब हाथ देखते वक्त, वह उसका हाथ लिये देर तक बैठा रहा था, उसने कुछ महसूस किया था। वह सोचती है, उसे सुधीर से शादी करनी है और सुधीर को लेकर सोचना महसूस करना चाहिए।

लेकिन उसने कुछ लमहों में नरेन, उमेश के साथ कुछ महसूस किया है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता: फिर उसे याद आता है, वह कुछ भी महसूस नहीं करती, उसका महसूस करने वाला हिस्सा बहुत पहले मर चुका है। अब उसका एक हिस्सा बचा है जो सब कुछ देख रहा है, कुछ भी महसूस नहीं कर रहा।


कहानी

सुश्री स्वरांगी साने
पूणे, मो. 09850804068


गेटअप, गेट अप!

शहर का वैसे तो यह गहमागहमी वाला कॉफी हाउस था लेकिन यहाँ हर किसी को बैठने की जगह और प्राइवेसी मिल ही जाती थी। आशिमा को यह कॉफी हाउस बहुत पसंद था। जब भी मौका मिलता वह यहाँ आया करती, कई बार तो अकेले ही। हालाँकि आज उसने प्रिया से पूछा था कि क्या वह उसे कंपनी देने आ पाएगी? प्रिया ने जानना चाहा, क्या इसकी कोई खास वजह? आशिमा ने कहा, ‘ऐसे ही वह बहुत थक गई है और थोड़ा फ्रैश होना चाहती है, किसी से बात करने का मन कर रहा है और प्रिया से बेहतर कौन हो सकता है, जो उसकी बात सुनेगा’!

प्रिया हँस दी। समय निकाल पाना थोड़ा कठिन था लेकिन प्रिया सहेलियों को कभी नहीं जताती थी कि वो व्यस्त है या नहीं आ सकती। तय समय पर प्रिया वहाँ थी। आशिमा भी उस वक्त रिक्शा से उतर रही थी। प्रिया उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई और बोली- हैलो मैडम!

- हैलो!

- बताइए आज आपने कैसे याद किया?

- अरे अंदर तो चल और ये क्या आप-आप लगा रखा है।

- ऐसे ही सोचा मैडम की थोड़ी क्लास ली जाए।

- वोह, अब तुम ही बची थी।

आशिमा उस शहर के कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर थी और प्रिया रिपोर्टर। दोनों का अलग-अलग पेशा उनके पहनावे में भी दिख रहा था। आशिमा कड़क स्टार्च की हुई कॉटन की सफेद साड़ी पहने थी जिस पर हरे रंग के छोटे-छोटे फूल बने थे। प्रिया ने नीली जींस और हलके गुलाबी रंग का कैजुअल टॉप पहना था। आशिमा ने अपने पूरे सफेद बालों का जूड़ा बाँध रखा था। आँखों पर काली मोटी फ्रैम का चश्मा चढ़ा था। गले में मोतियों की छोटी माला और कान में छोटे से टॉप्स थे। माथे पर मैरून रंग की बड़ी सी बिंदी लगाई थी। प्रिया के गेटअप में ऐसा कुछ भी नहीं था। उसके कानों में हमेशा ही सोने के टॉप्स डले रहते थे। उसने बालों की हाई पोनी की थी। प्रिया के कुछ-कुछ बाल सफेद हो रहे थे जिन पर शायद वह मेहंदी लगा लिया करती थी। दोनों समवयस्क थीं, लेकिन उनके गेटअप से उनकी उम्र में फासला नजर आ रहा था। फासला कुछ और भी था, प्रिया को लगातार किसी न किसी के फोन आ रहे थे, कभी वो किसी को मैसेज कर रही थी, जबकि आशिमा शांत मूर्तिवत् बैठी थी। थोड़ी देर बाद प्रिया को ही अहसास हुआ, उसने कहा- सॉरी यार, वर्किंग डे और तूने बीच में ही बुला लिया। वो तो दोपहर का समय था इसलिए आ भी गई। बता कैसे याद किया?

- तू मेरे सामने है और दुनिया भर की बातों में लगी हुई है। देख ले पहले दुनिया में क्या चल रहा है, फिर सहेली की सुध लेना।

- ओह, कम ऑन, तेरी ही तो सुध लेने आई हूँ। ले मैं अपना फोन साइलेंट पर रखती हूँ। अब बता क्या बात है?

- कुछ नहीं यार थक गई हूँ।

- तो घर जाकर आराम कर, भरी दुपहरी यहाँ क्यों आ गई?

- वैसे नहीं यार, मन से थक गई हूँ। इडविन आरलिंगटन अपनी कविता ‘द हाउस ऑन द हिल’ में कहते हैं न, ‘दे आर ऑल गॉन अवे, द हाउस इज शट एंड स्टिल, देअर इज नथिंग मोअर टु से’।

- मुझे तो स्टाइल कौंसिल का गाना याद आ गया पर ‘ऑल गॉन अवे- देअर इज नथिंग लेफ्ट सो, दे हैव ऑल गॉन अवे’। यह कहकर प्रिया गुनगुनाने लगी।    

- मुझे फ्रस्ट्रेशन हो रहा है और तुझे गाना सूझ रहा है।

- तू भी गाने लग, फ्रस्ट्रेशन चला जाएगा।

- तुझे नहीं पता क्या, मूड अच्छा हो तो धुन अच्छी लगती है, मूड खराब हो तो गाने के शब्द बींधते हैं। 

- तो मैडम के मूड को क्या हुआ?

- यार घर पर, कॉलेज में सबको लगता है, मैं बहुत खड़ूस हूँ।

- हाँ तो तू रहती भी ऐसे हैं और बिहेव भी वैसे ही करती है। 

- तेरी तरह रहने लगूँ तो दुनिया कच्चा चबा जाए, हमारी सोसाइटी अभी भी सिंगल वर्किंग वूमन के लिए तैयार नहीं हुई है।

- दुनिया जिस भाषा में बात करती है, उससे उस भाषा में बात कर, लेकिन हमेशा क्यों संजीदा रहती है, थोड़ी रिलेक्स हो, थोड़ी जिंदगी जी ले। इमाम बख्श नासिख का शेर पता है न ‘ज़िंदगी ज़िंदादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक़ जिया करते हैं’

- जिंदगी शायरी नहीं है, शायरी जैसी खूबसूरत नहीं है।

- तो उसे खूबसूरत बना ले।

- अकेली रहती औरत यदि सबसे ज्यादा हँसने-बोलने लग जाए तो उसे फ्लर्ट समझते हैं।

- और हँसो-बोलो नहीं तो खड़ूस समझते हैं, तो छोड़ न, दुनिया क्या समझती है, जैसा तुझे अच्छा लगता है, वैसी जी ले।

- जैसा चाहे, वैसा भी तो जीने नहीं देते, फिर चिढ़चिढ़ाहट इतनी बढ़ जाती है कि किसी पर भी गुस्सा उबल पड़ता है। उस दिन मैं कॉलेज लाइब्रेरी में बैठी थी। कुछ लड़कियाँ हँसते हुए आईं, मैंने उनकी ओर घूरकर देखा और चुप रहने का सख्त इशारा किया। वे पलभर के लिए चुप हो गईं लेकिन उनकी फुसफुसाहट भी लाइब्रेरी की शांति में साफ सुनाई दी, वे कह रही थी, मैडम की शादी नहीं हुई इसलिए खड़ूस हो गई हैं। क्या सच प्रिया, ऐसा है?

- यदि तुम्हें ऐसा लगता है तो ऐसा हो भी सकता है। तुमने जीवन का रस लेना बंद कर दिया हो। कहीं न कहीं तुम्हें लगता है कि हँसने का अधिकार शादी से जुड़ा है। शादी नहीं हुई और अकेले रहना है तो कठोर रहना है। फिर जो भी तुम्हें खुश दिखता है, उससे तुम्हें तकलीफ होती है पर ऐसा किसने कहा कि अकेले रहना है तो कठोर बन जाओ और शादी न करने का निर्णय तुम्हारा अपना था, फिर मलाल क्यों?

- चार महिलाएँ कहीं बैठी नहीं कि पति-बच्चों की बातें करने लगती हैं। तब मेरे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होता। पुरुषों के साथ बैठूँ तो वे भी मिसेस ने यह कहा, वाइफ ये बोली कहने लग जाते हैं, वहाँ भी मैं खुद को अकेला पाती हूँ। मेरे पास कहने को वहाँ भी कुछ नहीं होता। 

- तू उसे नॉर्मली लिया कर न। अब तूने मुझे लाइब्रेरी का जो अनुभव बताया, वह मेरे पास नहीं था या मैं किसी खबर को लेकर तुझसे चर्चा करूँ तो तेरे पास मुझे देने के लिए कोई इंफो नहीं होगी पर क्या तब मुझे या तुझे ऐसा लगता है कि हममें कुछ कमी है। फिर पति-पत्नी की बात आने पर तुझे ऐसा क्यों लगता है कि तेरे पास बात करने को कुछ नहीं। जब किसी विषय पर बात करने को कुछ नहीं होता, तो हम चुप रहते हैं, यह सामान्य बात है। तू भी इसे उतने ही सामान्य तरीके से ले।

- पता नहीं क्यों लगता है जीवन में कुछ अधूरापन है।

- तुझे क्या लगता है क्या तुझे पूरा करेगा?

- पता नहीं, कभी-कभी लगता है कोई जीवनसाथी चाहिए, लेकिन अब उम्र में नए सिरे से ऐडजस्ट कर पाऊँगी या नहीं। 

- सवाल अधूरा मत छोड़। सवाल की तह तक जा, तुझे जीवनसाथी क्यों चाहिए?

- क्यों चाहिए मतलब, सबको चाहिए होता है, लगता है हम अधूरे हैं। कोई साथ हो तो लाइफ में बैलेंस आ जाएगा शायद।

- हाँ, सही कहा, शायद। तुझे क्या लगता है शादी के बाद सब ठीक हो जाता है? गृहस्थी की अपनी चुनौतियाँ होती हैं, फिर तुझे लगेगा, आए थे हरि नाम को, ओटन लगे कपास।

- तू मुझे हिंदी मत सिखा, अंग्रेजी के प्रोवब्रस और ईडियम्स मैं भी तुझे सुना सकती हूँ।

- बस इसीलिए तू खड़ूस कहलाती है। तूझे ऐसा क्यों लगता है, मैं या कोई भी दूसरा तुझे कुछ ज्ञान दे रहा है। मैंने तो बस उस बात से कहावत याद आ गई, तो बता दी। कहावतें किसी को कुछ सिखाने-सुनाने के लिए थोड़ी होती हैं, वे तो बड़ी बात, छोटे में समझने-समझाने के लिए होती हैं। बड़ी बात यह है कि तू अपने में खुश रह। अपने में खुश रहने वाला गृहस्थी में भी खुश होता है और अकेले भी।

- मतलब तेरा कहना है, मैं खुश नहीं हूँ। वो तो तुझे आज कॉफी पीने बुला लिया, लेकिन कितनी ही बार मैं अकेले भी यहाँ कॉफी पीने आ जाती हूँ। मैं अपने आप के साथ खुश हूँ।

- यह तू खुद को जताती है। जता मत, वैसे जी। खुश रह। 

- खुश रहने से डर लगता है।

- खुश रहने में डर कैसा?

- पता नहीं, पर अकेले रहने में भी डर लगता है। 

- अपने आप से क्यों डरती है? अपने आप की कंपनी इंजॉय कर। अपने आपके साथ खुश रह।  

- क्या ऐसा हो सकता है?

- हाँ क्यों नहीं हो सकता!

- खुद के लिए इतनी क्रूर मत बन।

- क्रूर? मैं कुछ समझी नहीं। अच्छे से हेल्दी लाइफ जी रही हूँ। हेल्दी डायट लेती हूँ, एक्सरसाइज करती हूँ, अच्छी साड़ियाँ पहनती हूँ।

- ..लेकिन खुश होना चाहती तो है, पर खुश नहीं हो पाती। चेहरे पर कठोरता लिए बैठी है। जितनी कड़क तेरी साड़ी है, उतना ही कड़क तेरा ऐटिट्यूड है। थोड़ा रिलैक्स हो, ताकि थकान नहीं आएगी। तूने कहा तुझे थकान महसूस हो रही है लेकिन तू भी जानती है यह शरीर की थकान नहीं है। तेरा मन थक रहा है, तू मन से बूढ़ी हुई जा रही है।

- तो क्या करूँ?

- हँसना शुरू कर, बालों का जूड़ा इतना कसकर मत बाँध, कभी-कभी बिना स्टार्च की साड़ी भी पहनकर देख। ये मोटी फ्रैम का चश्मा हटा, चश्मे की फ्रैम लाइट कर, अपने जीवन को थोड़ा लाइट कर, नया चश्मा पहनकर दुनिया को देख।

- मुझे हलका-फुलका जीना पसंद नहीं।

- तू समझी नहीं, मैं डायल्यूट होने की बात नहीं कर रही। मैं कह रही हूँ अपनी एनर्जी को लाइट कर, नई चीजों का स्वागत कर। जिंदगी जो तुझे देना चाहती है, उसे ले, जिंदगी का स्वागत कर। चल मेरे अगले वीक ऑफ पर तेरे लिए खरीदारी करने चलते हैं। थोड़े ट्रेंडी कपड़े खरीद अपने लिए। कॉलेज के प्रोफेसर भी अब सलवारसूट पहनने लगी हैं। तू तो इतने यंगस्टर्स के साथ रहती है, खुद भी तो यंग महसूस कर।

- इस चालीस की उम्र में?

- हाँ इसी चालीस की उम्र में। 

ऐसा कहते हुए प्रिया हँस दी। कॉफी का बिल आ चुका था, प्रिया ने बिल भर दिया और  कहा- ‘‘नाऊ गटअप, बी हैप्पी’’ पर्स उठाकर चलते हुए बोली- ‘‘अगली पार्टी तेरी तरफ से होगी, नई आशिमा के साथ’’।           




अमृत पाल सिंह ‘गोगिया‘
लुधियाणा, मो. 9988798711

संदेह

मैंने देखा वो चली जा रही थी। 

सरपट-सरपट!

दोनों हाथों से स्ट्रोलर को खिंचती हुई। इतनी तपती दोपहर, चमकता हुआ सूरज। साथ में था उसका बुजुर्ग बाप। सिर पर एक बड़ी सी गठरी उठाए हुए। शायद उसकी बेटी  मेधावी के स्कूल में गर्मी की छुट्टियाँ हुईं थीं। 

बाप-बेटी दोनों पसीने से तर-बतर, गर्मी की चिलचिलाती धूप को चीरते हुए पैदल ही रोज गार्डन से फव्वारा चैक की तरफ जा रहे थे। मैं उनके आगे से अपनी वातानुकूलित गाड़ी से निकला और नजर उन पर पड़ी। उनकी हालत को देख तरस आ गया। शायद उनके पास रिक्शे के पैसे भी नहीं थे। 

मैंने गाड़ी रोकी मगर मैं पशोपेश में पड़ गया कि क्या मुझे अपनी मदद की पेशकश करनी चाहिए या नहीं ?

क्या पता मुझपर विश्वास करेंगे भी कि नहीं ? मेरी पेशकश को कहीं ठुकरा तो नहीं देंगे? मन ने कहा छोड़ो यार अपना काम करो। मैंने अपनी गाड़ी आगे बढ़ा दी।

मैं आगे निकल गया, मगर मन कचोटने लगा कि तुम इतने निर्दयी कब से हो गए, तुमको दिखता नहीं है कि कितने मजबूर हैं दोनों। तुम भी उन्हीं लोगों में शामिल हो गए, जिनका इंसानियत के साथ कोई लेने देना नहीं।

मैं तिलमिला उठा।

मैंने गाड़ी वापस घुमाई और वापस उनके करीब पहुँचा और उतरकर बड़े अदब से बोला !आओ, आप लोगों को मैं छोड़ देता हूँ !

उन्होंने बिना रुके एक नजर मेरी ओर देखा और मुझपर विश्वास नहीं किया। 

जवाब आया- नहीं हम स्वयं चले जाएंगे !

मैं तिलमिला उठा, ज़मीन फट जाती तो अच्छा होता मैं भारी मन से वापस चल पड़ा। 

अपनी मंजिल की ओर मगर अब मंजिल कहाँ .....?

वह तो बहुत दूर निकल गयी, मेरी तड़प और भी बढ़ गयी, मैंने गाड़ी साइड कर के वहीं रोक ली। 

जब वो दोबारा क़रीब पहुंचे तो मैंने पुनः आग्रह किया कि मैं भी उधर ही जा रहा हूँ !

जवाब आया- नहीं हम स्वयं चले जाएंगे और वो चलते-चले गए।

मगर न जाने कितने प्रश्नों की बौछार कर गए! मैं तड़प का रह गया कि क्या हम इतने गिर गए हैं ?

एक बाप इतना वज़न तो उठा सकता है। गर्मी की चिलचिलाती धूप तो सहन कर सकता है। 

अपनी गरीबी से तो लड़ सकता है। पसीना भी बहा सकता है। 

सारे सुख त्याग सकता है। मगर उसकी बेटी का सम्मान दाव पर लगे 

यह बर्दाश्त नहीं कर सकता। 

क्या पता एक और दरिंदा, पता नहीं किस रूप में घूम रहा हो !

जो भी हो- उसे तो बस अपनी बेटी सुरक्षित चाहिए। 

बाप को संदेह है हमारी व्यवस्था पर। जो किसी को भी संदेह के कटघरे में खड़ा कर देती है। 

और मैं...... एक ग़रीब बाप और बेटी की मदद नहीं कर सका। 



कविता

डाॅ. पूनम कुमारी
विशाखपट्टनम(आंध्र प्रदेश), मो. 7901346001

वे दुर्दिन.....

नाम शकुंतला, मुंबई में रहती थी पति के संग 

काम दिहाड़ी मजदूरी की, हालत थी उसकी  तंग। 

देख कोरोना का संकट वे खूब घबराए, 

कहाँ से लाये चावल, कहाँ से पैसा पाए, 

घर बना था जेल, कहाँ कैसे को जाए।  

बस-गाड़ी सब बंद, सड़कें सून्न पड़ी थीं 

हे भगवान बचा लो, आँखें वहीं गड़ी थी।  

देख के हालत मजदूरन की भय से हो लाचार, 

घर का मालिक भी कह बैठा, छोड़ो मेरा द्वार।  

छोड़ो मेरा द्वार, कोरोना के तुम पोषक हो,

हम सब भी फँस जाएंगे, तुम सब दोषक हो।  

क्या करते वे लोग गरीबन सड़क पर आ गए,

कुछ दिन का था राशन, वे सब कड़की पे आ गए।  

परेशान मजदूरन ने की पति से दुहाई, 

चल चलो निज गाँव वहाँ मैं ठौर तो पाई। 

मरना ही है भूखे तो, मिलकर वही मरेंगे, 

अंत समय में घर समाज के साथ तो होंगे।  

खोजी आँखें खोज रही थी, देशज क्या अंग्रेज,

कौन हैं इनमें संकट मोचन, समझ न पाई भेज।  

नौ माह पेट था उसका, ऊपर से ये लाचारी, 

पैदल हजारों किलोमीटर, चलना थी उसकी मजबूरी

हाय...सौ भी न पहुंची होगी, दर्द हुआ बेजार, 

सड़क किनारे ही बच्चे को जन्म दिया बन लाचार। 

कोई न सहयोगी थी, किस्मत थी भी कालरंगी, 

ले कर नवजात, बढ़ चली जस वो बजरंगी।

पार किया कुछ और राह अब राज्य का बार्डर आया,

देख के उसकी बेबस दशा, बोर्डरी भी घबराया।

जच्चा की हालत देख, रूह उसका भी काँप गया रे भाई, 

उसने ही सेवा करने की हर संभव जतन जुटाई,

काश! ऐसा बने ये सड़कजन्मा, नवजात शकुंतला जाया,

बदल सके अपनी माँ के साथ इस भारत की भी काया।  

कविताएँ

लता अग्रवाल, 
इंद्रपुरी, भोपाल, मो. 9926481878

औरतें

कहाँ गईं

वो तमाम औरतें

जो सुबह फटाफट फारिग हो

घर के कामों से

दफ्तर रवाना होते ही पति के

आ बैठतीं थी चैबारे में

मन में कई भाव - घाव लिए

दिल से भरी बैठी

ये औरतें

लगा बैठी थीं जमघट

लेकर ऊन सलाई

बुनने स्वेटर

स्वेटर के बहाने गुनती

जीवन में आशा - निराशा के पल

गिरे फंदों को

झट सलाई से खींच

ले आतीं ऊपर

होतीं खुश मानो

पा लिया हो किसी

बड़ी समस्या का हल

गोद में पड़ा उनके

बड़ा सा ऊन का गोला

खरगोश सा,

उंगलियों की तर्ज पर

नाच नाचती उसको

हाथों से दे देकर झटका

उठाती-पटकती नज़र अंदाज़ कर उसे

फिर उंगलियाँ बुनने लगती हैं

फंदे

ज्यूँ नचाकर सास ननंद को

इशारों पर अपने

कुछ खुश, बेपरवाह सी

इठलाती ये औरतें

शाम ढले पति के लौटने तक

खत्म हो जाता था ऊन का गोला

गोले संग मन का गुबार भी

यूँ हो हल्की

लौट जाती थीं वो स्त्रियाँ

अपनी गृहस्थी में

प्रण मुद्रा में पति के स्वागत को

आज तथाकथित सभ्यता के दौर में

घर की चारदीवारी

दफ्तर की चिकल्स से उबी

अपने अहम के घेरे में

कैद होकर रह गई हैं औरतें

नहीं राह कोई

निकालने मन का गुबार

भीतर ही भीतर घुट कर

मानसिक रोगों की शिकार हो रही हैं औरतें ।


हर रोज़ थी दिवाली

आप थे बाबा

तो रिध्दि - सिध्दि

नित घर में बरसती थी

हर दिन हमारी

धन तेरस मनती थी।

आपके रहते

खुशियाँ दौड़ -दौड़

आती थी कदमों में हमारे

मुस्कान होठों पर

हमारे सजती थी

बाबा ! रूप चैदस तो

तब मनती थी।

जलते थे आंखों में

उम्मीदों के चिराग सभी के

संभावनाएं ऊँगली पकड़ने को मचलती थी

सुनो न बाबा

दिवाली तो तब मनती थी।


चिकनी- चुपड़ी हो

या हो रूखी - सुखी

संग मिल जुलकर

हर निवाला गले

उतरता था

बाबा ! अन्नकूट तो

हमारा तब मनता था।

एक छत के नीचे

बैठ बतियाते थे

प्यार से सब

सुख-दुख अपने

साँझा करते थे हम

बाबा ! भाईदूज तो तब मनाते थे हम ।

बिन आपके कैसी दिवाली बाबा

कहने को दीप सजाते हैं

रोशनी मन के दीपों की

अब कहाँ जलती है

दिवाली अब कहाँ मनती है।



कविता

सारिका आशुतोष  मूंदड़ा, पुणे, मो. 92255 27666

उपमायें

मुझे दी गयी,

कई उपमायें 

कभी.....

सृष्टि की,

नदी की,

पृथ्वी की....

या कि कोशिश की गई,

हर बार मुझे थामने की 

कि 

सृष्टि सी हो,

दायित्व वहन करो 

नदी सी हो,

दो किनारों के बीच बहो

पृथ्वी सी हो,

सहनशील बनो 


क्यों....

आखिर क्यों  नहीं कहा गया कभी मुझे

अम्बर या फिर 

सागर ?

कहीं उड़ने ना लगूँ

सपनों के पंख खोलकर,

और जान ना लूँ कहीं कि 

आसमां की हद नहीं होती 

या कहीं मैं 

विस्तार ना पा जाऊं

सागर सरीखा !


दोनों ही परिस्थितियों में तय है ना

मेरे व्यक्तित्व का फैलाव,

इसलिए ....

सदैव कोशिश की गई,

मुझमे कुछ उकेरा जाए,

ताकि मैं वो न हो सकूं,

जो मैं हो सकती हूँ 

चलो.....

सब कुछ समझ कर भी 

स्वीकार करती हूँ 

मगर तुम याद रखना कि  

मैं पृथ्वी....

भूकम्प लाना भी जानती  हूँ

मै प्रकृति....

अपने नियम खुद बनाती हूँ 

और....मैं

मैं अपने लिए मानती  हूँ 

महज एक उपमा ...

मैं अर्थात  ,

अथाह शक्ति!



लघुकथा

डाॅ. मीरा रामनिवास

गांधीनगर, गुजरात, मो. 99784 05694

‘‘कसूरवार’’

जया पति के होते हुए भी अकेली थी। अकेले ही बच्चों का पालन पोषण कर रही थी। पढ़ा लिखाकर बेटी का विवाह कर दिया। बेटा पढ़ रहा था। दो बच्चों के पिता बनने के बाद पति को किसी औरत से इश्क हो गया। परिवार को छोड़कर प्रेमिका के साथ रहने चला गया।

जया पढ़ी लिखी थी। घर चलाने के लिए दफ्तर में नौकरी करने लगी। 

आज शाम जया घर देर से पहुंची। बेटे की निगाहें दरवाजे पर टंगी थी। घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोला। मम्मी आज बड़ी देर करदी। 

बहुत थकी हुई भी लग रही हैं। 

मैं पानी लाता हूं। 

बेटे ने मां की तरफ पानी का ग्लास बढ़ाते हुए कहा। आज देरी क्यों हो गई मां। 

बेटा आज दफ्तर में काम थोड़ा ज्यादा था, पास वाली टेबल के सहकर्मी छुट्टी पर थे, उनका काम भी मुझे ही देखना था।

मां ने प्यार से पूछा अच्छा ये बताओ 

खाने के लिए क्या बनाऊं? 

क्या खाओगे?

माँ ऐसा करते हैं, आज दाल चावल बना लेते हैं। आप हाथ मुंह धो लीजिए। कपड़े बदल लीजिए। मैं दाल चावल भिगो देता हूं। प्याज हरी मिर्च आदि काट पीट देता हूँ। आप थोड़ा सुस्ता लें। फिर बना लीजिए।

ठीक है बेटा।

जैसे ही जया अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ती हैं।मोबाइल की घंटी बजती है। 

हैलो ऽऽ बेटी श्रिया की सिसकियों की आवाज सुनाई देती है। सिसकियां जया के दिल में गर्म शीशे की तरह उतर जाती हैं।

क्या हुआ बेटा! क्यों रो रही हो ? वह और जोर से रोने लगती है। तुम दोनों का झगड़ा हुआ है क्या?आखिर बात क्या है ? श्रिया सिसकते हुए कहती है। 

‘‘माँ ईश ने मेरी उंगली मरोड़ दी‘‘।

इतना सब कैसे हो गया? बेटा।

मां आज वो ऑफिस से ही गुस्से में आये थे।मैंने चाय दी थोड़ी प्लेट में गिर गई नाराज हो गये। घूंट भर कर बोले चाय में शक्कर ज्यादा है। मैंने कहा रोज़ डालती हूँ उतनी ही डाली है। ईश झगड़ने लगे चीखने लगे। क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ।

फिर फ्रस्ट्रेशन में आपके लिए अनाप शनाप बोलने लगे। तुम्हारे पापा ने तुम्हारी माँ को छोड़ दिया।

मैने कहा किसी ने किसी को नहीं छोड़ा है। अपनी मर्जी से दोनों अलग-अलग रहते हैं। तो कहने लगे जरूर तुम्हारी माँ का कोई कसूर होगा। मैने कहा ईश चुप कर जाओ। तुम कुछ नहीं जानते। माँ के लिए कुछ भी मत बोलो। तो गुस्से में हाथापाई पर उतर आए।

बेटा मैने तुम्हें कितनी बार समझाया है। लोग जो भी सोचें, सोचने दो। सच्चाई क्या है। कसूरवार कौन है। 

तेरे पापा जानते हैं। हम सब जानते हैं। 

ईश्वर जानते हैं।

माँ ईश, उन लोगों में नहीं आते। 

वो मेरे पति हैं। 

उन्हें सच्चाई का पता होना चाहिये।

मैने आज ईश को सच बता ही दिया। परिवार को छोड़कर पापा भागे हैं मां नहीं। बच्चों के लालन-पालन की ज़िम्मेदारी निभाने की जगह अपना दैहिक सुख पापा ने ढूंढा है। मां ने नहीं। दूसरी औरत के साथ पापा रह रहे हैं। मां हम बच्चों को संभाल रही है। घर और बाहर दोनों ज़िम्मेदारी निभा रही है।

कसूरवार कौन है। 

पापा हैं या मां है। 

खुद ही तय कर लो।


कहानी

डाॅ. हुस्न तबस्सुम निंहां, वर्धा, मो. 09415778595


अगले मौसम के इंतजार में

सारे मौसम धरे के धरे रह गए। कहां कि मेहमानों की लंबी फेहरिस्त पर मुबाहिसा चल रहा था, किसको बुलाएं और किसको काटा जाए। कहां कि सारा मुआमला ही ठण्डे बस्ते में चला गया। हाल दिल्ली के जामा मस्जिद के करीब बसी एक मुस्लिम बस्ती का है। आदिल अहमद इस बस्ती में रईसों में गिने जाते थे। उनका बड़ा ही दबदबा था। व्यापार मण्डल के अंतर्गत आने वाली विभिन्न शाखाओं में से एक पर उनका कब्ज़ा था। बस्ती के भीतर जीम पूरी मार्केट का जिम्मा उनका था। यानी उनका ही टेण्डर था। चार बच्चे उनके जिसमें से तीन विवाहित, सबसे छोटी औलाद बेटी लैला। जिसका निकाह आज ही कल में होना था। प्रेम विवाह था। रिश्ता फेसबुक के ज़रिए शुरू हुआ था। आमिर बर। पाकिस्तानी इंजीनियर। पाकिस्तान के लाहौर से था। साॅफ्टवेयर इंजीनियर। लैला शेख आदिल अहमद की सबसे छोटी संतान और जामिया मिल्लिया की अर्थशस्त्र विभाग की रिसर्च स्काॅलर। वर्चुअल दुनिया से गुजरते हुए जाने कब वे एक दूसरे की हक़ीक़ी दुनिया में दाखिल हो गए थे। लैला की झेलम-आंखों के साहिल पर आदिल की कीम खाब से जड़ी अफशां तमन्नाएं किसी भी वक्त ठहर के पंख फटकारने लगतीं। और लैला के ख़्वाब आदिल की समंदरी बांहों में गोतम गोता। रात के तीसरे पहर आदिल की आंखों में शहतूत की टहनी सी झूल जाती। अंततः जब बात शादी तक पहुंच गई तो घर वालों को भी शामिल करना जरूरी हो गया। इस लिहाज से घर की ज़िम्मेदार औरतों के माध्यम से यह बात घर के मर्दों तक पहुंचाई गई। लैला की मां ने बड़ी सहम के साथ आदिल अहमद के सामने यह बात रखी तो वह भड़क उठे-‘‘तुम दोनों मां बेटियों का दिमाग़ तो नहीं खराब हो गया है। जाओ इलाज कराओ अपना। लड़का भी ढ़ूंढ़ा तो पाकिस्तान में, हिंदोस्तान में लड़के मर गए थे क्या? जितनी छूट दो उतनी ही कम है। अब मुझे इतना मौक़ा है कि मैं पाकिस्तान के दौरे शुरू करूं? वाहियात कहीं की।‘‘

अम्मा आ कर लैला को जली कटी सुना गईं। पर दिल की लगी का क्या इलाज? लैला के हाथ के तो तोते उड़ गए। आमिर से बताया तो वह भी मायूस हो गया। कोई तरतीब निकालने का बोला और खामोश रह गया। चंचल बयार सी लैला बिल्कुल शांत हो गई। लेकिन जब घर में दादी मां तक यह बात पहुंची तो वह फौरन हरकत में आ गईं। लैला के कमरे में पहुंचीं और उसके बाजू में बैठ कर उसके सिर मे हाथ फेरती बोलीं-

‘‘निंगोड़ी, इतनी अच्छी खबर तूने पहले क्यूं न सुनाई मुझे? अब समझ तेरा काम हुआ सो हुआ।‘‘ लैला चीख कर उनसे लिपट गई

‘‘दादी मां क्या कह रहीं हैं, ?‘‘

‘‘सही कह रही हूं। बहुत दिनों बाद फिर से सारे टूटे रिश्ते बहाल होने वाले हैं।‘‘ कहते हुए उन्होंने गहरी सांस खींची।

‘‘ क्या मतलब दादी मां?‘‘ लैला संभल कर बैठ गई। 

‘‘ दरअसल गुड़िया, शायद तुझे नहीं पता कि हमारा 

आधा खानदान करांची में ही क़याम करता है। बंटवारे के बाद हमस ब तिंयां-तियां हो गए। कोई कहां बिखर गया कोई कहां बिखर गया। फिर जब तूफान थमा तो हम सारे एक दूसरे से सदियों सदियों के लिए छूट चुके थे। आंखों में बस एक अनाम सी तलाश बाकी रह गई थ जो कभी खत्म नहीं हुई। तेरे अब्बा के चचा, मामू, और तमाम लोग उधर ही तो हैं। अब तेरे बहाने अल्लाह ने एक पुल क़ायम किया है। अब जरूर टूटे हुए रिश्ते बहाल होंगें। आना जाना शुरू आमद रफ्त शुरू होगी, अमन और उल्फत के लियाक़त गुलाब फिर महकेंगे इंशाल्लाह।‘‘ कहते कहते उनकी आंखें भींग गईं। 

‘’लेकिन दादी अम्मा, अब्बूजान तो हत्थे से ही उखड़ गए उनका क्या करेंगे। ‘‘

‘‘उसकी ऐसी की तैसी। कैसे न होने देगा। उसी की मर्जी से सब कुछ थेाड़े ही होगा। 

फिर दादी मां ने आदिल अहमद की अच्छी क्लास लीं। अंततः उन्हें राजी होना पड़ा। आमिर बर से जब उन्होंने बात की तो निहाल हो गए-

‘‘अम्मी, लड़का तो काफी तालीमयाफ्ता और बेहतरीन इंसान है।‘‘

‘‘मैं कहती थी न, बगैर जाने समझे किसी के बारे में राय कायम नहीं करनी चाहिए। आखिर पाकिस्तान हिंदोस्तान में फर्क ही क्या है? हैं तो भई-भाई ही। एक भाई दूसरे भाई के घर अपनी बेटी ब्याह रहा है इसमें इतना डरने की क्या बात है। वो भी अपना ही मुल्क है, अपना ही घर है। फिर हमारे आधे लोग तो वहीं रहते हैं।....हां, याद आया पेशावर में मुनव्वर रहता है तेरे मामूजान का भी इस्लामाबाद में बिजनेस है।उन सबके नंबर तलाश करो और सबसे राबता कायम करो‘‘

‘‘ हां, यह ठीक रहेगा।‘‘ 

आमिर बर अपने कमरे में बैठा ख़लअ में खोया हुआ सिगरेट के कश खींचे जा रहा था। कई दिनों से उसे नींद नहीं आई थी। मन ही मन मनाता रहता कि किसी तरीके से बात बन जाए। लेकिन जब उस रात लैला का अचानक फोन आया तो वह चैंक पड़ा। इत्ती रात में लैला का फोन? लेकिन जब लैला ने उसे चहकते हुए खुशखबरी दी तो उसने लंबी सांस खेंचते हुए अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। वर्ना इतने दिनों से उसकी हिम्मत न हो रही थी लैला को फोन करने की। कई बार फोन उसे मिलाता फिर काट देता। खैर। खुश खबरी सुन उसका जी हरा हो गया था। थोड़ी बहुत बात दादी अम्मा ने भी की थी उससे।

आदिल अहमद ने कवायद शुरु कर दी थी।  पुरानी डायरी निकाल कर सबके फोन नंबर तलाशें और तडा तड़ सबको फोन करना शुरू कर दिया। कुछ मिले कुछ नहीं मिले। मुनव्वर का फोन लग गया। फोन रिसीव करते ही मुनव्वर ने नाक भैं बनाए ‘‘ क्यूं भाईजान, याद करने में ज़माने लगा दिये। आखिर हम मिट्टी तो वहीं की हैं।‘‘

‘‘बिल्कुल बरखुरदार, इससे कब इंकार है। बस कुछ मसरूफियात ज्यादह थी। लेकिन अब जल्द ही नजदीकियां बढ़ेंगी।‘‘ और फिर उन्होंने सारी सूरत ए हाल मुनव्वर को बता डालीं। मुनव्वर निहाल हो उठा-

‘‘ वाह, फिर तो बड़ी समझदारी दिखाई हमारी लाडो ने। देख, मुहब्बतें सरहदें नहीं मानतीं।‘‘ और रिष्ते बहाल हो गए। इधर हिंदोस्तान का जी बल्लियों उछल रहा थां उधर पाकिस्तान की बाछें खिली पड़ी थीं। 

फिर चचा जान को फोन लगाया। 

‘‘चचा जान, बहुत जल्दी आपकी ख़िदमत के लिए आपकी पोती लैला को भेज रहा हूं।‘‘

‘‘क्या मतलब?‘‘ और सारा कुछ आदिल अहमद ने कह सुनाया। चचाजान उछल पड़े। 

‘‘वाह मेरे जानेमन, मारके की खबर सुनाई। पास होते तो जुबां चूम लेते। जल्दी ही हम रूबरू होंगे इसका  मतलब।‘‘ 

‘‘हां.....इंशाल्लाह...‘‘

‘‘ठीक है अभी जाकर सारे शहर में पेड़े बंटवाता हूं। तेरी चची तो नाच उठेंगी।‘‘ सरहद की देानों तरफ घी के दिए जलाए गए। शादी की खुशी से ज्यादह अपने बिछड़े हुओं से मिलने का उत्साह था। घूम थी। फोन पर रोज लंबी बातें होने लगीं। पाकिस्तानी दूल्हा जैसे मुनव्वर और चचा समेत पूरे परिवार में खिलौने की तरह खेला जा रहा था। आए दिन दावतें, जियाफतें। चचा को लगता कि वह लड़का उनका सारा हिंदोस्तानी परिवार उनके कदमों में ला कर डाल देगा। जिस बार दूल्हा हिंदोस्तान गया शादी की तारीख तय करने मुनव्वर व चचा समेत सारे खानदान ने शानदार विदाई दी। चचा ने उसकी पेशानी चूम कर उसे विदा किया। यहां आदिल अहमद के परिवार ने भी उसका वो शानदार खैरमखदम किया कि लोग देखते रह गए। लगा उनका पूरा पाकिस्तानी खानदान सामने आ खड़ा हुआ हो। दादी मां ने उसका हाथ थाम कर पुछा-

‘‘बेटे, आते वक्त शमशुल ने तुझे बोसा कहां दिया था?‘‘ दूल्हे ने पेशनी की तरफ इशरा करते हुए कहा-

‘‘जी दादी मां, यहां..‘‘

और दादी मां ने उसे थोड़ा झुकने को कहा फिर उसकी पेशनी पे हाथ फेरने लगीं- ‘‘हां, यहीं से आती है हमारी मिट्टी की महक‘‘!  और उन्होंने उसकी पेशनी चूम ली। 

पूरे दो दिन तक आमिर बर दिल्ली में रहा। खूब इज्जत अफजाई हुई। लैला से भी मुलाकात हुई। मन में सोचता रहा ‘‘मैं तो सोच रहा था कि पाकिस्तानी लड़कियां ही खूबसूरत होती हैं, मगर ये हिंदोस्तानी हुस्न तो पाकिस्तानी हुस्न को भी मात दे रहा है।‘‘ वहीं लैला की खुशी का ठिकाना न था। एक नामुमकिन सी बात मुमकिन हो गई थी। वह मन ही मन दादी मां पे वारी जाती। दादी मां ने सारा कुछ कितना आसान कर दिया था। तीसरे दिन आमिर की वापसी की फ्लाईट थी। आदिल अहमद के घरवालों की आंखों में आंसू थे। जैसे घर का ही लड़का कहीं दूर देश को जा रहा हो। दादी मां ने ब्ढ़ कर उसकी पेशनी चूम ली।‘‘ जा बेटा शमषुल से मेरा सलाम कहना और अपने घर भी। शाम को आमिर पाकिस्तान पहुंच गया। वहां अलग ही रौनक थी। लैला का सारा खानदान आमिर के घर पे इकट्ठा था। सभी बेहद बेसब्री से उसका इंतजार कर रहे थे। हर तरफ से सवालात के सोते फूट रहे थ-‘‘ वहां कैसा लग रहा था? लोग कैसे थे? वहां का मौसम कैसा था? सभी कैसे मिलते थे? कोई दिक्कत तो नहीं हुई? 

मुमानी ने पूछा-

‘‘क्यूं आमिर, वहां तो गैरमुस्लिम भी हैं, उनका सलूक कैसा था तुम्हारे साथ?‘‘

‘‘अरे मुमानी पुछो मत। लैला के अब्बू के दोस्त शंकर अंकल तो लाजवाब थे। ऐसी खातिर तवाजो की कि उनका बस चलता तो दिल में रख लेते हमें। लैला की हिंदू सहेलियां भी क्या कम थीं। किरन ने तो पूरे एक दिन में ही पूरी दिल्ली की सैर करवा दी। उसकी बहनें, वालिदैन सभी बेहद मेहमान नवाज। जैसे मैं उनका अपना ही दामाद हूं। हमारे लाहौर से दिल्ली कहीं भी कम नहीं मुमानी। बिल्कुल अपनी सी ही लगी।‘‘ सभी गौर से सुन सुन के बिछे जा रहे थे। मुमानी की आंखों से आंसू रूक ही नहीं रहे थे-

‘‘ क्यूं न हो बेटा, सियासत ने हमें इधर उधर फैंक दिया वर्ना हम एक चने की दो दाल ही तो हैं। तभी चचा जान घर में दाखिल हुए। आवाज सुन कर आमिर उछल पड़ा और जा के उनके गले से लग गया-

‘‘जीते रहो बेटा, कैसा रहा सफर। कैसे हैं सब लोग।?‘‘ आमिर ने अलग होते हुए कहा ‘‘ अलहमदोलिल्लाह..‘‘ फिर अपनी पेशानी की तरफ इशारा करते हुए बोला ‘‘दादी मां ने आपको सलाम कहा है।‘‘  चचा जान ने लपक कर उसका माथा चूम लिया। आमिर ने शोखी की- ‘‘चचा जान, दो बार सलाम कहा था‘‘ सबकी हंसी छूट गई। चचाजान ने दोबारा बढ़ कर उसकी पेशानी चूम ली।

दोनों मुल्कों में शादी की तैयारियां जोरों पर थीे। लग रहा था सिर्फ दो जन की नहीं, दो खानदान की नहीं बल्कि दोनों मुल्कों की शादियां आपस में हो रही थीं। जैसे दो सागर एक मेक होने वाले थे। दो आकाश एक दूसरे में विलय होने वाले थे। 

नवंबर महीने की कोई तारीख थी। बादलों से आसमान हमेश भरा ही रहता था। दिल्ली का आसमान वैसे भी कुहरे और बादलों से कहीं ज्यादह दूसिता हवाओं से अटा रहता है इन दिनों। यानी दिल्ली का आसमान पूरी तरह अभिशप्त है घोर प्रदूशण से। सही कहा जाए तो बड़ा वाहियात होता जा रहा है दिल्ली का मौसम। फिर भी, गुलाबी मौसम की आमद आमद। खैर उस एक किसी तारीख में हिंदोस्तान दहक उठा अचानक। नेफा पर हलचल हो गई। कुछ जवान शहीद हो गए। फिर क्या थ हिंदोस्तान-पाकिस्तान खेला जाने लगा। दिल्ली की गली गली में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए गए। पाकिस्तान के खिलाफ जलसे किये गए और उधर से इधर, इधर से उधर की आमद रफ्त पे बंदी। हिंदोस्तान में बीजा ले कर रह रहे पाकिस्तानी बाषिंदों को रातों रात खदेड़ दिया गया। भले ही वो बेकसूर हों। दिल्ली की धुंआई गलियां और काली सी होने लगीं। जामा मस्जिद के पास का पूरा इलाका घरों में दुबका रहा। आदिल अहमद के घर में भी एक भयंकर तरह की तीरगी वीरानी ओढ़े पड़ी थी। लैला का जी रख- उठ रहा था-‘‘ अब क्या होगा।‘‘ हिंदुस्तान की हर गली में पाकिस्तान मुर्दाबाद की रैलियां उग रही थीं। अचानक तुसारापात नहीं, अग्निपात हुआ था। किंतु कम्यूनिस्ट एवं वामपंथी इन रैलियों को पानी पी पी के गरिया रहे थे। मुल्क की दुर्गति की खैर मना रहे थे। कयोंकि उन्हें पता था कि मुल्क की जड़ों में मट्ठा डालने वाले हाथ कोई और हैं। उन्हें पता था कि सरहद-हत्या ईमानदारी की नहीं साजिश की पैदाईश है। उन्हें पता था कि ये रैलियां प्रायोजित रैलियां थीं। केवल सांप्रदायिकता को प्रोत्साहित करने वाली। हर गली कूंचे का मुसलमान घर में मरा पड़ा था। दुकानों पर ताले लटक रहे थे। गली कूंचे सांए-सांएं कर रहे थे। राजतंत्र अपने उरूज पर था। हर प्रकार से कुशासन थोपने को प्रतिबद्ध। 

खैर हिंदोस्तान के सूर्य ने जी भर तांडव किया। दो से तीन दिनों में ही सारा मामला बिगड़ गया था। दिल्ली तअस्सुब के ताप से सुलग रही थी। मुस्लिम बस्तियां कुछ न कर पाने और कुछ न समझ पाने की स्थितियां लिए घरों में सो गई थीं। मेहनतकषों के चूल्हे फाके को मजबूर थे। घोषित हिंदोस्तानी बच्चे स्कूल जा रहे थे, और अघोषित हिंदोस्तानी बच्चे अपने बस्तों के साथ दड़बों में बंद पड़े थे।  सारे पारिदृष्य पे आवारा पशुओं का साम्राज्य था।

एक दिन आदिल अहमद हारे हुए से आए और बरामदे में सोफे पर धम्म से धंस गए। पूरा जिस्म थकान और अवसाद से कांप रहा था। दिखने से लग रहा था कि तन से ज्यादह मन की थकान हावी है। हाथ में एक बड़ा सा थैला था जिसमें से उन्होंने सफेद कागज के बंडल निकाले और लैला की तरफ बढ़ा दिए-

‘‘लो इसे ठीक से रख दो।‘‘ लैला ने बढ़ कर ले लिया। फिर एक गिलास पानी उनके सामने रख के चली गई। पानी पी कर उन्होंने बेटों को आवाज दी और उन्हें समझाने लगे-

‘‘देखो कागज ला के लैला को दे दिए हैं। उससे ले लो और सभी लोग आराम से बैठ कर बड़े-बड़े लफ्जों में लिख डालो‘‘

‘‘ठीक है अब्बूजान, मगर लिखना क्या है यह तो बताईए?‘‘

आदिल अहमद थोड़ा झिझके फिर नजरें चुराते हुए बोले-

‘‘बेटा.....लिखना है....पाकिस्तान मुर्दाबाद।‘‘ 

‘‘क्या....?‘‘ कई आवाजें एक साथ चैंकी। 

‘‘अब्बू, आ...आप डर गए। कोई हमारा क्या करेगा। आखिर हिंदोस्तान हमारा मुल्क है।‘‘

‘‘डर का नहीं, अना का सवाल है बेटे। आज हमसे हमारी वफा का सुबूत मांगा जा रहा है। और हमारी वफादारी के सुबूत में हमसे सिर्फ यह जुमला मांगा जा रहा है। जो मुसलमान ये नहीं कहेगा वो गद्दार कहलाएगा। उन्हें इससे नहीं मतलब कि बहादुरशाह जफर ने अंग्रेजों को जवाब में कहा था कि सबकुछ मिट जाएगा लेकिन हिंदोस्तान नहीं मिटेगा। इनके लिए ये सबूत काफी नहीं।‘‘

घर के लोगों ने आदिल अहमद को जिंदगी में पहली बार इस कदर हारा और थका सा पाया था। पूरे घर में खामोशी छा गई अचानक। आखिर दादी मां उठ कर आदिल अहमद के पास आई और बोलीं- 

‘‘बेटा आदिल, तेरा दिमाग फिर गया है क्या? कल तेरे भाई जुनैद से कुछ खुट पुट हो जाए तो क्या तू उसके लिए मुर्दाबाद का रट्टा मारेगा? ऐसे ही पाकिस्तान भी तो हमारा भाई ही है।‘‘

‘‘नहीं अम्मा यहां जज्बात से काम न लें। यह जरूरी है वर्ना हम सबकी रोजी रोटी खतरे में पड़ जाएगी। जाओ तुम लोग लिखो बैठ कर।‘‘ 

घर में ढेर सारे लड़के जमीन पर कागज फैला के बैठ गए और लिखा जाने लगा ...पाकिस्तान मुर्दाबाद...पाकिस्तान मुर्दाबाद। लैला की स्थिति और भी गई गुजरी हो गई थी। वह किसी कमरे के एक कोने में दुबकी रहती और अपनी लोहित जिंदगी की बिखरी हुई किरचियों की चुभन महसूस करती रहती। शाम को जब आदिल अकेले में मिले तो दादी मां दे उन्हें धीरे से टटोला-

‘’...और आदिल अहमद, लैला के रिश्ते के लिए क्या कहते हो?‘‘

वह सिगरेट के छल्ले हवा में उछालते हुए बोले-

‘‘लैला से कह दो अम्मां, जी कड़ा कर ले और उसे भूल जाए‘‘

लैला ने सुना तो बेहोश हो गई। घर में कुहराम मच गया। घर की औरतें मातमजदां हो गईं। बेटी का रिश्ता खत्म हो जाना कोई मामूली बात नहीं। लैला की हालत देख कर दादी अम्मा ने अंतिम बार गुहार लगाई थी- 

‘‘आदिल बेटा, ...लड़की का मँुह तो देखा होता तुमने उससे वादा किया था।‘‘

‘‘तो क्या करें अम्मा, जान दे दें?‘‘

‘‘बेटा क्या फर्क पड़ता है यहां और वहां में। आखिर हिंदोस्तान और पाकिस्तान भाई-भाई ही ठहरे।‘‘

‘‘नहीं अम्मा, अब हिंदोस्तान पाकिस्तान भाई-भाई नहीं रहे। वर्ना ये नौबत ही क्यूं आती।?‘‘  दादी अम्मा रोती हुई कमरे में चली गईं और लैला को सीने से लगा लिया। और फिर दोनों दहाड़ें मार-मार के रो पड़ीं। आदिल अहमद का दिल बैठा जा रहा था। 

बाहरी दालान में कुछ मोतबर लोगों के बीच गर्मा गर्म बहस जारी थी। चाय के कप टेबिल पर सजे हुए थे। शकिर नवाब लगे पड़े थे-

‘‘भई, ये क्या बात हुई? दंगे खुद करवाते हो तोबड़ा पाकिस्तान के सिर फोड़ते हो।‘‘

‘‘भई, सरहद पर तनाव है, लगता है चुनाव है।।‘‘ किसी ने चुटकी ली।

‘‘और नही तो क्या, फिर कहते हैं हिंदोस्तान छोड़ो पाकिस्तान जाओ। क्यूं छोड़ें भला? पैदाईश यहीं लिया, दादा परदादा सब यहां दफनाए अब हम पाकिस्तान जाएं अपनी मिट्टी छोड़ कर।‘‘

‘‘बिल्कुल, कोई नहीं जाएगा।  अगर अलग भी करना है तो हम बाशिंदे यहां के हैं यहीं का एक टुकड़ा दे दो हमें, हम उसे ही अपना अलग वतन बना लेंगें। मगर रहेंगें तो यहीं‘‘

‘‘और नही तो क्या जहां तीन चार टुकड़े पहले ही हो चुके हैं हिंदोस्तान के एक टुकड़ा और सहीं।‘‘

‘‘अरे छोड़ो मिंयां। सरकार क्यूं टुकड़े होने देगी। क्यूं वो एक और टुकड़ा करने लगी मुल्क का। ये सब बस शगूफे हैं। अवाम को आपस में लड़वाने के। हां नहीं तो।‘‘ 

 दूसरे दिन घर का नौकर वो सारे छोटे-छोटे पोस्टर ले कर बाहर निकला दुकानों की दीवारों पर चिपकाने के लिए तो लगा वह पोस्टर नहीं, किसी आत्मीय का जनाजा लिए जा रहा हो। घर की औरतों की आंखें भर आईं पता नहीं क्यूं?

मार्केट की सारी दीवारों पर पोस्टर चस्पा किए जा रहे थे। हाजी मुन्नन का हाथ कई बार कांपा। बड़बड़ाए-‘‘क्या मुसीबत है।‘‘ फिर खड़े हो कर सिगरेट फूंकते रहे और पोस्टर पर लिखा बार-बार दोहराते रहे। ‘‘पाकिस्तान मुर्दाबाद.....पाकिस्तान मुर्दाबाद...

बीबीसी की रिपोर्टर जाहिदा शाहीन उधर ही टहलती हुई आ गईं। कई दुकानों की फोटो ली कवरेज किया फिर एक टोपी पाजामें वाले सज्जन के पास जा कर धीरे से बोलीं-

‘‘ मिंयां, ये...इस मुर्दाबाद के पीछे क्या आपकी रजामंदी है?‘‘

वह ठंडी सी सांस धीरे से खींच के फुसफुसाया-जाने दो बीबी, बस माहौल न खराब होने पाए इसलिए एहतियातन। 

उधर लैला फोन पर आमिर से सुबग रही थी, और आमिर ढांढ़स दिए जा रहा था-‘‘ सब ठीक होगा इंशाल्लाह। अल्लाह पर भरोसा रखो। दिन बदलेंगे। मौसम बदलेगा। हालात बदलेंगे। हम अगले मौसमों का इंतजार करेंगे। 



कविता

डॉ. प्रज्ञा शारदा, चंडीगढ़, मो. 98150 01468

प्रसव पीड़ा को सहती हुई

उसकी चीख

पहुंच गई वहाँ

जहाँ निवास करती है

सृष्टि।

निढाल हो

परास्त सा महसूस

करती है

जब पता चलता है

कि

पैदा हुई है बेटी।

क्योंकि

बेटी के आने से

न होता है कोई

खुश

न मिलती है बधाई

पड़ी रहती है

अकेली

छा जाता है

सन्नाटा चारों ओर

हो जाते हैं सब खामोश।

न कोई पूछता है

न बूझता है

न पास आता है

न हाल पूछता है

बस मिलती है

सबसे जुदाई।

बेटा होता

तो विपरीत होता

लोगों का हुजुम

लग जाता

कोई मुझे चूमता

कोई उसे चूमता

कोई गले लगाता

कोई सिर पर

हाथ फेरता

तो कोई बच्चा 

गोदी में उठा

उसका चेहरा निहारता

तुझ पर गया है

मुझ पर गया है

के क्यास लगाए जाते

लड्डू बांटे जाते

ढ़ोल वाला आता

नगाड़े बजाए जाते

हिजड़े आते

नाचते गाते

पैसे,जेवर

माँग ले जाते

और मिलती

खूब बधाई।

प्रसव पीड़ा

एक नया जन्म

होता है स्त्री का

आती है स्त्री वापिस

मौत के मुँह से

पर लड़के की चाहत में

धकेला जाता है उसे

फिर से।

तभी तो

स्त्री भी चाहती है

कि न हो बेटी,

बेटा जन्में 

पहली ही बार में

नहीं तो उसे दोबारा

उस राह जाना पड़ेगा

जहाँ उसे

फिर से बेटी

हो जाने के 

भय का 

दर्द सहना पड़ेगा।

लड़का हो

या लड़की

भला स्त्री के

हाथ में है क्या?

सब इस सच्चाई को

जान कर भी

क्यों लेते हैं

ऑंखें मूंद

मैं समझ नहीं पाई

मैं समझ नहीं पाई।


आलेख

श्री अजित राय, कन्नौज, कानपुर, मो. 98396 11435


कितना बदल गया है गाँधी का भारत......

गाँधीवाद की हत्या तो गाँधी के जीवन-काल में ही हो गई थी और विभाजन की त्रासदी तथा हिन्दू-मुस्लिम दंगों के नृशंस तांडव ने गाँधी को अप्रासंगिक बना दिया था। राजनैतिक संत ने स्वराज तो दिला दिया किन्तु सुराज अब भी एक सपना ही है। कुटीर उद्योग और लघु उद्योग की हालत खराब हो गई और भारत अब गाँवों का कृषि-प्रधान देश नहीं रहा। वह मुट्ठी भर अरबपतियों का देश बन गया है जिसे कार्पोरेट जगत नियंत्रित करता है। अब नेता नंदीग्राम वासी भरत की भूमिका में नहीं, उनके ऊपर रोज करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। अब विदेशी वस्त्रों की होली नहीं जलाई जाती, गेहूँ के साथ विदेशी विचारों का आयात किया जाता है। अब अंग्रेज नहीं, अंग्रेजी भाषा शासन कर रही है जो कृष्ण को कृष्णा (द्रौपदी) में बदल देती है। खैर लिंग-परिवर्तन तो आधुनिक विज्ञान ने सहज सम्भव कर दिया है। मूल्यपरक राजनीति का पतन हो चुका है और फिर वह साहित्यिक राजनीति में भी प्रतिफलित होता है। कांग्रेस ने अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधि मंडल का अध्यक्ष बनाकर संयुक्त राष्ट्र संघ में भेजा, जहाँ उन्होंने हिन्दी में भाषण दिया था लेकिन अब मोदी जी तो अपने राजनैतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी को ही हाशिए पर फेंक देते हैं। लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान! जय किसान‘ नारे की धज्जियाँ उड़ गईं। आज साल भर से किसान धरने पर बैठे हैं लेकिन संवाद के मार्ग में कीलें गाड़ दी गई हैं। गाँधी के अहिंसा धर्म का सबसे अधिक पालन तालिबान ने किया और अफगानी औरतों पर कोड़े बरसा कर अपना पुरुषार्थ सिद्ध किया। अब चोरी-डकैती करने वालों के हाथ-पैर चैराहों पर काट दिए जाएँगे लेकिन अब देश को लूटने वाले तालिबान के हाथ कौन काट सकता है ? अमेरिका भी नहीं। उसी ने तो इस भस्मासुर को पैदा किया था रूस को रोकने के लिए। बहुत याद आता है गाँधी का दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटिया मजदूरों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना। वह संघर्ष कितना रचनात्मक था! उनका आत्म - संघर्ष तो उनके बाह्य संघर्ष से भी अधिक व्यापक था। अपने कंधों से ऊँचा उठने का रसायन उनके पास था। गाँधी एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे, देश थे। उनका समूचा जीवन एक प्रयोगशाला है। फटे हुए कपड़ों और टूटे हुए चप्पलों को कई बार सिलकर पहनने वाले मितव्ययी महात्मा के इस देश में पर्यावरण का अनन्त दोहन रोकने के लिए ही शायद हमारे प्रबन्ध तंत्र ने टूटे फूटे भवनों से ही काम चलाने का दृढ़ संकल्प किया हो, ताकि सौ बीघे जमीन की आमदनी को पचाया जा सके। कितना लोकतांत्रिक परिवेश था ! कितनी सहिष्णुता थी कि राष्ट्रपिता की उपाधि गाँधी को उनके धुर विरोधी नेता सुभाष चंद्र बोस ने दिया था। अहिंसा का प्रयोग व्यापक पैमाने पर राष्ट्रीय स्तर पर गाँधी के नेतृत्व में पहली बार विश्व ने देखा....

सचमुच गाँधी आजानुबाहु थे। उनकी लम्बी भुजाओं की पकड़ में पूरा विश्व था। उनके उपवास का सही अर्थों में राष्ट्र हित में व्यापक प्रयोग करने वाले सादगी के प्रतीक लालबहादुर शास्त्री जी को गाँधी जी के साथ भाव सिक्त सादर नमन। क्योंकि गोडसे की गोली ने भी गाँधी के भीतर राम के सिवा कुछ नहीं पाया। वह राम जो वनवासी शोषितों, वंचितों के जीवन स्तर का साक्षात्कार करता है। वह राम, जो अयोध्या की सेना नहीं, वानर-भालुओं को संगठित कर उनमें आत्मविश्वास भरकर विश्वविजेता रावण को पराभूत करता है। गाँधी जी ने भी तो यही किया। साधारण जनता में आत्म विश्वास जगाकर अंग्रेजों का सूर्यास्त कर दिया। किन्तु उनके रामराज्य का गुजराती अनुवाद कितना त्रासद है ! कांग्रेस भी केवल गाँधी की मूर्ति पूजक है, जिंदा गाँधी उसे पसन्द नहीं। गाँधी आन्तरिक स्वच्छता के कायल थे, जिसे आज कर्मकाण्ड बना दिया गया है। उनका चरित्र और व्यक्तित्व उनकी पुस्तकों की बाइंडिंग जैसा है। हरिजन बस्ती में जाकर पुराने ढंग के शौचालयों को अपने हाथ से साफ करना रोंगटे खड़े कर देता है। किन्तु अछूतोद्धार के प्रवर्तक को आज न तो दलित गले लगा पाते हैं और न ही मार्क्सवादी उन्हें वांछित मूल्य देने को तैयार हैं। मरण-शय्या पर पड़ी पत्नी को जेल से पत्र लिखना गाँधी ने इस लिए अस्वीकार कर दिया कि उन्हें अंग्रेजी में ही पत्र लिखने की अनुमति मिली, हिंदी या गुजराती भाषा में नहीं। आचरण की यह भाषा कितनी प्रणम्य है, कितनी वन्दनीय! 


हाइकु 

श्री संजीव निगम
फिल्म सिटी रोड, मलाड पूर्व, मुंबई, मो. 09821285194

लौट रहे हैं

सभी परिन्दे घर

मैं लौटूं क्या?


दिन है उगा,

इतना मत हंसो,

रात आएगी।


दिन के घोड़े

थक कर ढूंढते,

सुख की  रात। 


बहते आंसू

समा लेगी खुद में,

रात अंधेरी।


बंद दीवारें , 

भीतर आखें देखें

खुला आकाश ।   .


रात करेगी,

तुम और मुझसे

मन की बात। . 


सपना टूटा

कोई नहीं था पास

सच्चाई दिखी ।   .


रात बीतती

अंधेरे से निकल

खुलती आंख ।   .


एक अकेला

उजाले से लड़ता

भोर का तारा ।   .  


रात के पाले

सुख सपने, तोड़ें

धूप के कोड़े।  


कविता

राकेश गौड़
(Indian Express 26 सितंबर 2021 के अंक में प्रकाशित दो समाचारों पर आधारित) 
नई दिल्ली, मोबाइलः 9818974184

नैतिक शिक्षा

आज की ताजा ख़बर, 

ख़बरदार होशियार

नैतिक शिक्षा टीचर

अपनी ही परीक्षा में फेल

छह साल की बच्ची के साथ

दुराचार के अपराध में

हुई है उन महाशय को

उनतीस साल की जेल


सांस्कृतिक विरासत

सिविल सेवा के लिए कैसे कैसे

बाबू किए जा रहे हैं तैयार

सामान्य ज्ञान पढ़ाने वाले

शिक्षक के सुनिए विचार

“ट्राइबल लोग जो होते हैं हमारे

दिमाग तो होता नहीं उनके पास कोई

ना ही उनके पास कानूनी कागज

होते हैं जमीन जायदाद के“

वाह जी वाह, जंगल के रक्षक से

माँगे जा रहे हैं, कागज जमीन के

जंगल और जमीन में बसे हैं हमारे प्राण

जल, प्राकृतिक सम्पदा की जो करें रक्षा

वेद पुराण करें उनका गुणगान

हम सब करें उनका सम्मान

मगर, ये भविष्य के नौकरशाह

और, ये उनके आधुनिक शिक्षक

जिन्हें अगर पढ़ाया जायेगा,

ऐसा सामान्य ज्ञान

वे क्या करेंगे, प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा

और, क्या हमारी विरासत का सम्मान !!



कहानी

डॉ. कुसुम रानी नैथानी
चुक्खुवाला देहरादून (उत्तराखंड), मो. 9412922513

तिलांजली

रामबाबू हास्पिटल से नकुल को देखकर लौट रहे थे। वह कुछ समय से बहुत बीमार था। हास्पिटल के रास्ते में ही उसका घर था। वर्षों से बाबूलाल का वहाँ आना-जाना था। नकुल के पिता रतनलाल उनके अच्छे मित्रों में से थे। रतनलाल का घर देखकर उनके मन में एक हूक उठी। 

“ इतने बड़े घर और गैस एजेन्सी के मालिक  रतनलाल का इकलौता बेटा नकुल जीवन और मौत के बीच झूल रहा है। भगवान न करे उसे कुछ हो गया तो...

‘‘सहसा उनके पैर रतनलाल सेठ के घर की ओर मुड़ गये। घर पर उस वक्त रतनलाल अकेले ही थे। 

“कैसे आना हुआ रामबाबू ?” 

“बस यूँ  ही चला आया। अस्पताल से नकुल को देखकर आ रहा हूँ। भगवान से दुआ मांग रहा हॅू उसे लंबी उमर दे। ”

“.......“ राम बाबू की बात का रतनलाल ने कोई जवाब नहीं दिया और नौकर को आवाज लगाई -

“दो कप चाय ले आना।”

“तुम नहीं गये बेटे से मिलने ।”

“.........”

“यह कैसी हठ है रतनलाल? नकुल तुम्हारा इकलौता बेटा है। इस वक्त उसे सहारे की जरूरत है।”

“उसकी मां उसके साथ है तो.....”

“माँ माँ होती है । वह पिता की जगह नहीं ले सकती । ऐसी हालत में तुम इतने कठोर कैसे हो सकते हो ?”

“मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना। तुम्हें कुछ पूछना हो अपनी भामी से पूछ लेना। वह आती ही होगी।”

“मैं यहां अपने दोस्त को मिलने आया था । क्या पता था रिश्तों की कडुवाहट ने उसके सीने में दिल की जगह पत्थर बिठा दिया ।”

तभी नौकर चाय लेकर आ गया।

“लो चाय पियो ।” रतनलाल बोले। बेटे की बीमारी का उनके चेहरे पर लेशमात्र  भी असर नहीं दिखाई दे रहा था। वे कुछ देर तक रामबाबू के साथ बातें करते रहे और फिर उनसे विदा ले ली। कुछ ही देर बाद उनकी पत्नी शीला अस्पताल से आ गयी। 

“बड़ी थकी हुई लग रही हो । कुछ देर आराम कर लो।”

“लगता है अब नकुल के कुछ दिन ही शेष रह गये हैं। ऐसी हालत में उसे अकेले छोड़ने में बहुत डर लगता है।”

“यह सब एक दिन होना ही था।” लंबी सांसे भरकर वे बोले। 

“एक बार मेरी खातिर ही उसे मिलने चले जाते । बहुत याद करता है तुम्हें। बस हर वक्त तुम्हारी रट लगाए रहता है।”

“सब कुछ जानकर भी तुम ऐसा कह रही हो। केाई और कहता है तो मैं उसकी बात एक कान से सुनकर दूसरी कान से निकाल देता हूँ पर जब तुम...” कहते हुये रतनलाल की आवाज भर्राने लगी।

“आज के बाद अब कभी नहीं कहूँगी ।” शीला बोली। कुछ देर उसने नकुल के हाल उन्हें सुनाए और फिर घर के काम में लग गयी। 

 चालीस साल के नकुल के जीवन मे मौत कभी भी दस्तक देने ही वाली थी। उसके पदचापों की आवाज हर कोई सुन रहा था। अंत समय में उसके कातर स्वर को  सुनकर मिलने आए लोगों की आंख् नम हो जाती । वह हरएक से एक ही प्रार्थना करता- 

“प्लीज मैं पापा को देखना चाहता हूँ। बस एक बार वे मुझे माफ कर दे तो मेरे प्राण चैन से निकल सकेंगे। ” कुछ ने हिम्मतकर यह बात रतनलाल तक पहुँचाई भी। पर वे अपने इरादे से टस से मस न हुये। इसके मूल मे नकुल का अपना ही व्यवहार था जिसने उन्हें इतना कठोर बना दिया था।

रतनलाल का इकलौता बेटा नकुल बचपन से बहुत जिद्दी एवं बिगड़ैल स्वभाव का था। जवानी में कदम रखते ही उसके कदम बहक गये और उसकी दोस्ती कुछ आवारा लड़कों से हो गयी।  माँ बाप  ने बहुत समझाया पर वह न माना। शराब , जुआ, सिगरेट उसकी दैनिक दिनचर्या  के अंग बन गये। पिता का लिहाज़ भूलकर वह अक्सर रात को शराब पीकर घर आने लगा । पिता की उसके आगे एक न चली । बेटे को  हाथ से निकलता देखकर रतनलाल ने पत्नी के माध्यम से बेटे पर शादी का दबाब डाला ।

 शीला के बहुत समझाने-बुझाने पर नकुल शादी के लिये राजी हो गया। रतनलाल ने इस बारे में दिनेश की पत्नी सीता से बात की। दिनेश का पिछले साल लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। वह उनकी गैस एजेसी मे काम करता थां। उसके जाने के बाद सीता की आर्थिक हालत बहुत खराब हो गयी थी। रतनलाल बोले-

“तुम्हारी बेटी मीना बहुत सुंदर और सर्वगुण सम्पन्न है सीता। मेरे बेटे को तुम जानती ही हो। मेरा घर आबाद करने के लिये अपनी बेटी मीना मेरी झोली मे डाल दो। मैं तुम्हारा ये एहसान कभी न भूलँगा।”

“मैं मीना से बात करके ही आपको जवाब दे सकूँगी । कहाँ आप और कहाँ हम ? मीना के तो भाग्य खुल जायेंगे।”  सीता   मीना से बात की तो वह बोली- 

“माँ तुम नकुल को अच्छी तरह से जानती हो । फिर भी तुम उन्हें मना न कर सकी।”

“इतने बड़े घर का रिश्ता बार-बार थोड़े ही आता है । तू वहाँ राज करेगी।”

“माँ घर पति से होता है उसकी दौलत से नहीं।”

“मुझे तुझ पर पूरा विश्वास है तेरा साथ पाकर वह  अपनी सारी पुरानी आदतें छोड़ देगा। मैं विधवा तुझे दे ही क्या सकती हूँ किसी तरह  दो जून की रोटी जुटा पाती हूँ । “ मां का कातर स्वर सुनकर मीना पसीज गयी । उसने हाँ कर दी। यह सुनकर रतनलाल गदगद हो गये।

“बेटी तूने मेरा मान रख लिया। जब तक मैं जिंदा हूँ वादा करता हूँ  तुझ पर कोई मुसीबत न आने दूँगा। बस मेरे भटके हुये बेटे को रास्ते पर ले आना।”

रतनलाल ने बड़ी धूम-धाम  से नकुल का विवाह मीना से कर दिया। दोनों पक्षों का सारा खर्चा उन्होंने खुद ही वहन किया। कुछ दिन तक सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा। नकुल समय से घर लौट  आता। पीने पिलाने का दौर बहुत कम हो गया था। सब  खुश थे। साल भर के अंदर नकुल के घर बेटा अक्षत पैदा हो गया। रतनलाल जी के पैर धरती पर न पड़ रहे थे। मीना ने इस घर  की खोई हुयी खुशियां उन्हें लौटा दी थी। पर ये खुशियां ज्यादा दिन टिक न सकी। शादी के दो साल बाद से नकुल का फिर घर देर से आना शुरू हो गया। पुराने दोस्तों की महफिल उसे रास आने लगी। नकुल के भटके हुये कदम देखकर  रतनलाल के चेहरे पर चिंता की रेखाएं उभरने लगी। 

“शीला नकुल को सचेत कर दो। वह फिर पुराने रास्ते पर जाने लगा है।”

“जवान बेटे को कब तक हम घर पर बांधकर रख सकते हैं? पत्नी की भी एक सीमा होती है पति को रोकने की । उसके बाद मनोरंजन के लिये साथियों की जरूरत तो पड़ती ही है। ”

“तुम्हें नकुल पर भरोसा होगा मुझे नहीं  है। अभी भी वक्त रहते उसके भटकते हुये पैरों को रोक लो वरना कई जिंदगियां तबाह हो जायेंगी।”

“मैं मीना से बात करूँगी । तुम तो जानते हो नकुल कितना जिद्दी है।”

मौका निकालकर शीला ने मीना से बात की तो वह बोली- 

“मम्मी मैं हर तरह से कोशिश कर तो रही हूँ। मैं हताश जरूर हो गयी पर निराश नहीं हूँ। आप का साथ मिलेगा तो ये सही राह पर जल्दी ही आ जाएगें।” 

मीना की हताशा उस दिन निराशा में बदल गयी जब उसे पता चला कि नकुल ने घर से बाहर और औरतों के साथ भी संबंध बनाने शुरू कर दिये हैं। एक दिन यह बात इतनी बढ़ गयी कि मीना घर छोड़कर मायके आ गयी।

रतनलाल से ये सब देखा नहीं गया। वे मीना और अक्षत के पीछे-पीछे उनके घर पहुँच गये और बहू को मनाकर किसी तरह घर ले आए। 

“बहू तुम नकुल की नहीं अब मेरी जिम्मेदारी हो। बस हमारी खातिर तुम यहाँ रूक जाओ। वरना तुम जानती ही हो समाज में हमारी कितनी पगड़ी उछलेगी ।”

मीना को सास-ससुर से कोई शिकायत न थी। एक ही छत के नीचे नकुल के साथ रहने का अर्थ था बिन मांगी मुसीबतों को गले लगाना। बहुत सोच-समझ कर वह बोली थी- 

“पापा मेरे लिये अब इस घर में रहना संभव नहीं है । कोई ऐसा  व्यसन नहीं है जिसका सेवन इन्होंने  न किया हो। अपने पोते के भविष्य की खातिर अपनी आंखों के सामने मेरे रहने का इंतजाम कहीं और कर दीजिये।” 

बहू  की बात समझने में रतनलाल को देर न लगी। उन्होंने पास में ही उसके लिये एक प्लैट ले लिया। आंखों के सामने बहू और पोते को देखकर  रतनलाल व शीला ने संतोष कर लिया था। आए दिन रूपयों की खातिर नकुल घर आकर हंगामा करता। एक दिन रतनलाल के समझाने पर  उसने  उनपर हाथ उठा दिया । रतनलाल ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले- 

“ अब सहने की सारी सीमाएं खत्म हो गयी हैं। ये मेरी तुम्हारे लिये आखिरी चेतावनी है । इस घर में रहना है तो बेटा बनकर रहना होगा। मवाली बनकर नहीं।”

“चुपकर बूढे। तेरी मौत के बाद  ये सब मेरा  ही तो होगा। छाती पर धरकर ले जायेगा क्या अपने साथ ?”नकुल उन्हे धक्का देकर बोला।

“शीला अब बस और नहीं। अभी इसे मेरी आंखों के सामने से दूर ले जाओ वरना अनर्थ हो जाएगा।” रतनलाल गुस्से से बोले।

शीला ने पति के पैर पकड़ लिये और नकुल को किसी तरह धकेलते हुये कमरे से बाहर ले आई। उसके पास जो रूपये थे वे उसने बेटे के हाथ में रख दिये। बेइज्जती की आग मे जलते हुए अगली सुबह रतनलाल एक पत्र छोड़कर घर से निकल पड़े। शीला ने पढ़ा तो सन्न रह गयी। लिखा था- 

एक छत के नीचे बाप-बेटा नहीं रह सकते । मैं नकुल का त्याग कर रहा हूँ। ये तुम्हारी मजबूरी है कि तुम दोनों में से एक के साथ ही रह सकती हों । मुझ से ज्यादा तुम्हारे बेटे को तुम्हारी जरूरत है। अच्छा हो कि ऐसे बेटे से तुम भी सदा के लिये  अपना नाता तोड़ दो। मैं तुमसे फोन पर संपर्क बनाए रखूगा। रतनलाल। 

शीला को काटो तो खून नहीं। ये क्या हो गया है  भगवान? पौराणिक  कथाओं में कुपुत्रों के जो चर्चें  सुने थे वह सबकुछ आज इस घर मे सामने दिख रहा था। बाप ने बेटे को त्याग दिया पर वह कैसे छोड़े ?”

 मां को डरा धमका वह जो कुछ भी वसूल सकता था नकुल ने वसूला। एक दिन वह घर से हजारों की नकदी व शीला के जेवर लेकर लापता हो गया। रतनलाल को पता चला तो वे शीला की खातिर घर लौट आये ।  उसका रो-रोकर बुरा हाल था। वह बोली-

“ऐसे बेटे होने से तो  न होना ही अच्छा था। किसी जन्म का पाप  था मेरा तभी ये सब देखने को मिला है। शायद अब हमारा प्रायश्चित पूरा हो गया।”

बात यही पर खतम नही हुई थी। ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन पड़ोस में रहने वाले वर्माजी ने बुरी खबर दी थी- 

“मैने नकुल को लखनऊ के एक सरकारी अस्पताल में देखा था। उसका बहुत बुरा हाल था। शायद उसे वह बीमारी लग गयी है जो....”

शीला ने सुना तो छाती पीट ली।  रतनलाल कुछ न बोले। शीला ने मीना को बहुत मनाया कि वह जाकर उससे मिल ले पर वह न मानी । थककर बेटे की हालत पर तरस खाकर शीला नकुल से मिलने चली गयी । अनाथों की तरह नकुल को अस्पताल में पड़ा देखकर  शीला फफक पड़ी । मां पर नजर पड़ते ही नकुल की जीर्ण काया में थोड़ी देर के लिये जैसे जान पड़ गयी। दूसरे ही क्षण उसने आंख बंद कर ली। आंसुओं की धारा आंखों के कोने से बह निकली। शीला ने उसके आंसू पोछे । मां के हाथ का स्पर्श पाकर उसके चेहरे पर संतोष की झलक दिखाई पड़ी । वह बोला -

“मुझे माफ कर दो मां ।”

उत्तर में शीला ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।  रतनलाल को शीला ने फोन से नकुल का सारा हाल कह सुनाया। वे बोले-

“शीला यह तुम पर है कि तुम  बेटे को कितना सहारा दे सकती हो। हां इतना याद रखना दो तलवारें एक म्यान में नहीं रह सकती।”

“कैसी बातें करते हैं आप ? वह हमारा बेटा है दुश्मन नहीं। ऐसी हालत में...”

“बीती बातों को उधाड़कर क्या फायदा ? फैसला तुम्हारे हाथ में है। मैं तुम्हें रोकूँगा नहीं।” रतनलाल ने अपना फैसला सुना दिया।

बहुत सोचकर शीला नकुल को अपने शहर ले आयी और आते ही उसे अस्पताल में भर्ती कर दिया। पति और बेटे के आगे लाचार शीला रिश्ता के दोनों छोरो पर अपना फर्ज निभा रही थी। रतनलाल केा न पिघलना था वे न पिघले। 

एक महिनें से नकुल अस्पताल मे था। शीला के कहने पर मीना व अक्षत नकुल से मिल आए थे। उनके सामने भी वह अपने पापा के लिये बहुत तड़प रहा था। मीना के कहने पर भी वे न पिघले। एक बार बेटे का त्यागकर रतनलाल ने उससे अपने सारे संबध खत्म कर लिये। जीवन की अंतिम सांस तक  वह रतनलाल से माफी की गुहार लगाता रहा पर उन्होंने नकुल को एक बार तिलांजली दी तो पलटकर न देखा। 

दो सप्ताह बाद दिल मे बोझ लिये नकुल इस दुनिया से विदा हो गया। नकुल की मौत पर शीला का रो रोकर बुरा हाल था। इस पर भी रतनलाल की आंखों में आंसू न थे। उसकी पार्थिव देह के साथ गाडी घर के आगे खड़ी थी। राम बाबू बोले-  

“अब तो बेटे के अंतिम दर्शन कर लो रतनलाल । इसके साथ ही इसका सारा बैर और दुख-दर्द चला गया है।”

 “जब जीते जी इसका चेहरा न देखा तो इस पार्थिव देह देखकर क्या करूँगा ? ले जाइये इसे और अग्नि के सुपुर्द कर दीजिये।”

रतनलाल ने कठोरता की सारी हदें पार कर दी थी। अंदर की वर्षों पुरानी टूटन पर कोई भी मरहम काम नहीं आया। भटके हुये बेटे को राह पर लाने के लिये उन्होंने अपने साथ बहू और पोते  की जिंदगी से खिलवाड़ किया था। यह बात उन्हें कहीं अंदर तक बेध गयी थी। 

शमशान से लौटकर लोग अपने घर चले गये । शोक व्यक्त करने के लिये  लोग आते रहे । शीला उनकी भावनाओं को सहेजती रही पर रतनलाल का दुनिया की नजर में जो कुछ आज खोया था उसे तो वे वर्षों पहले अपने हाथ से बहुत दूर छोड़ आये थे। 


पत्रांश

अभिनव भी और इमरोज भी, जिसके नाम में ही चमत्कार हो उस पत्रिका का हर अंक अनूठा होगा ही, होना ही चाहिए। अतिथि संपादक प्रोफेसर (डॉ) दिनेश चमोला, शैलेश, डीन आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार तथा प्रबंध संपादक देवेंद्र कुमार बहल अभिनव इमरोज और साहित्य नंदिनी, नई दिल्ली के संपादन में अक्टूबर 2021 का अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। एक-एक पन्ना अपनी अलग तासीर कहता है विनोद प्रकाश गुप्ता शलभ जी की गजल खुद कहती है कि ‘हो सके तो मेरी गजलों से मुझे पहचान साथी’। हर लेखक की अपनी लेखन शैली होती है और वहीं उसकी पहचान भी होती है। सो यहाँ अलग-अलग लेखकों की कलम अलग-अलग बानगी देती चलती है। वाराणसी के सूर्य प्रकाश मिश्र जी की कविता ‘साथी’, बूढ़े बरगद से रिश्ते को बताती है तो ‘पीला गुब्बारा’ बचपन की ओर ले जाती है। बड़ोदरा से श्रद्धा व्यास की कलम आत्मनिर्भर होने की कुंजी देती है। यामिनी नयन गुप्ता क्रंकीट के जंगलों के बीच अपनी व्यथा कहती है। चमोला जी का संपादकीय सहेजे जाने योग्य है क्योंकि उसमें वे साहित्य की व्यापक परिभाषा रखते हैं। वे साक्षात्कार श्रृंखला की पांचवी कड़ी में डॉ. दामोदर खड़से के व्यक्तित्व-कृतित्व को रखते हैं। यह साक्षात्कार विस्तार से लिया गया है और खड़से जी के लिखे को उनके जीवन के बजरिए जानना ‘बिटवीन द लाइंस’ लेखक को समझने जैसा है।

यह साक्षात्कार एकदम परिचयात्मक शैली से शुरू होता है, बिल्कुल वैसा परिचय जैसा किसी भी लेखक की जीवनी को पढ़ते हुए हमारे सामने आता है लेकिन धीरे धीरे उनका वह व्यक्तित्व खुलने लगता है जिसके बारे खड़से जी स्वयं कहते हैं कि ‘स्थितियाँ व्यक्ति को शक्ति देती हैं और चुनौतियाँ दरवाजे खोलती हैं’। छोटे से गाँव से शुरू हुई यह यात्रा लेखक के तौर पर उन्हें समृद्ध बनाती हैं, जैसे गाँव की मिट्टी उन्हें तरल और सरल बना देती है। किशोर वय में ‘कल्याण’ पत्रिका से जो अर्थ उनके हिस्से आता है, वह अद्भुत है। बचपने के संगी-साथियों से बिछड़ने का गम उन्हें बार-बार गाँव की ओर ले जाता है। घर में मराठी का वातावरण और बाहरी परिवेश में हिंदी, इस तरह दोनों भाषाएँ उनके साथ-साथ चलती हैं। इस साक्षात्कार में खड़से जी अपनी जीवनयात्रा के हर व्यक्ति को याद करते हैं। उनके जीवन के कुछ किस्से, कुछ रोमांच, कुछ आपबीती, जिस तन्मयता से खड़से जी ने अभिव्यक्त की है, उसी तसल्ली से साक्षात्कारकर्ता चमोला जी ने उसे लिपिबद्ध भी किया है। महाराष्ट्र की उवर्रा भूमि का जिक्र करते हुए वे साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे काव्या, चिंतन दिशा, हम लोग का उल्लेख करते हैं। उनके रचनात्मकता से जुड़े कई पहलुओं को इस साक्षात्कार में समेटा गया है।

इस लंबे साक्षात्कार के बाद दीपक शर्मा की कहानी है। पाठक से अधिक यह लेखक के लिए चुनौती है क्योंकि छप्पन भोग के बाद जो परोसा जाएगा उसका स्वाद इतना अच्छा होना चाहिए कि वह ग्राह्य हो और इस पर वे खरी उतरती है। कहानी कई नाट्यपूर्ण मोड़ लेती है, लगता है इसमें उपन्यास होने की संभावना है। अगला पुष्प प्रभा कश्यप डोगरा का सरल-तरल कविता के रूप में है। प्रो. फूलचंद मानव का आलेख रोमांच जगाता है। सुशांत सुप्रिय की प्रेम कथा अलग ही कलेवर लिए आती है। रश्मि रमानी जी का आलेख कविता एवं गद्य की अनुवाद प्रक्रिया समझाता है। जयश्री बिरमी गुजरात की धरती पर ले जाती है। संजय कुमार सिंह की लघु कथा पहले वाक्य से ही अपनी ओर खींचती है कि ‘शब्दों के पंख नोचोगी तो उड़ना भूल जाओगी’...

पंकज सुबीर को मिले पुश्किन सम्मान का समाचार भी यहाँ समेटा गया है। इसके बाद डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय की कहानी है। कहानी-कविता की लंबी यात्रा कर चुकी राजी सेठ जी को जन्मदिन की बधाई और डॉ. आरती स्मित की उनसे बातचीत और उसके बाद संगीता कुजारा टाक की कुछ त्रिवेणियाँ आनंद देती हैं। इस तरह यह पूरी पत्रिका पाठक को तृप्त कर देती है एवं संग्रहणीय अंक है।  स्वरांगी साने, पुणे, मो. 09850804068


आदरणीय बहल जी, सादर नमस्कार, 

‘‘अभिनव इमरोज’’ साहित्य में योगदान करने वाली  बहुत सी शख्सियत से परिचय करवाने का काम करती रही है। इसके लिए आपको धन्यवाद। आदरणीय नासिरा शर्मा जी के लेखन का फलक लिंग, जाति, देश से कहीं बेहद ऊपर उठकर बहुत दूर दूर तक फैला हुआ है। उनकी तेजस्विता, कलम पर पकड़, उनकी चरम बौद्धिकता मुझे हमेशा चकित करती रही थी। आपने इनके व्यक्तित्व पर प्रकाशित विशेषांक के मुखपृष्ठ पर बिल्कुल सही शीर्षक दिया है-नूरे अदब। प्रोफेसर दिनेश चमोला जी के हम शुक्रगुजार हैं कि हमें विस्मित करने वाले प्रश्नों के उत्तर देने में इस अंक के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की है। 

नासिरा जी का विद्वतापूर्ण परिवार-पिता से लेकर पति तक। एक ही परिवार में हिन्दू धर्म व मुस्लिम धर्म  की मिली जुली संस्कृति व निरंतर ऐसे लोगों से मिलना। अनेक देशों में रहकर, वहां के लोगों से परिचय। कितना कुछ उनके निजी जीवन में है जो एक आम लेखक को नसीब नहीं होता। 

 आप का लिखा ‘‘छीन ले कोई आफजा मेरा’’ पढ़कर दिल भर आया। ये उनकी नहीं हर एक गंभीर लेखक की पीड़ा  है। उसकी भावनायें, उसे समझने वाला कोई नहीं मिलता। उस पर आपा के बौद्धिक स्तर पर पहुंचना सबके बस की बात नहीं है। आपको ऐसा नहीं लगता उनके साहित्य का मूल्यांकन बहुत कम हुआ है। एक बार पुन: आपको धन्यवाद कि आप ये  जिम्मेदारी बखूबी निबाह रहे हैं। आशा है आप ठीक होंगे, शुभकामनाओं सहित, 

-नीलम कुलश्रेष्ठ, अहमदाबाद, मो. 09925534694  





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