अभिनव इमरोज़, जनवरी 2022




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 श्री अंशुुमन कुठियाला, शिमला, मो. 86288 17851

ग़ज़ल

इंतज़ार में चाँद के जागते तारे रह गए,

इस वैलेंटाइन पर भी जो कवारे रह गए !

जाल सभी ने बिछाया मछली पकड़ने को,

पर खाली हाथ ही कुछ मछ्वारे रह गए !

इस अंतिम घड़ी में मैं याद कर रहा हूँ,

किन दोस्तों पर मेरे पैसे उधारे रह गए !

सरकार के कानों पर जूँ तक ना रेंगी,

भूखे-प्यासे अपने अन्ना हज़ारे रह गए !

हमने तो कोशिश की मिठास लाने की,

पर वो समंदर थे खारे के खारे रह गए !

जो मिट्टी की पुकार सुनके भी न आए,

ना जाने कहाँ वो माँ के दुलारे रह गए !

हक़ीक़त कुछ और, कुछ और है मंज़र,

असल में सहरा से प्यासा है समंदर !

यूँ तो सारी दुनिया से जीत गया था,

पर ख़ुद से तो हार गया था सिकंदर !,

और कुछ नहीं तो ज़ख्म कुरेद देगा,

आखिर कुछ तो कर जाएगा बवंडर !

इंसाफ़ अदालत में भला कैसे होगा,

जब जनता में हैं बापू के तीन बंदर !

तुम्हारी बादशाहत हो तुम्हे मुबारक,

अपने हाल में बड़े मस्त हैं कलंदर !

पूरी तरह मुझसे रुखसत नहीं हुई,

अभी भी कहीं बाक़ी हो मेरे अंदर !

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श्री अमरनाथ ‘अमर’, नई दिल्ली

तुम्हारी परिभाषा

तुम्हारी ही नज़रों से ओझल,

तुम्हारा सौंदर्य

तुम्हारी ही

कल्पना से परे

तुम्हारा आकर्षण

उदात्त व्यक्तित्व

तुमसे ही अपरिचित

तुम्हारी मुस्कान

तुमसे ही

संकोच करती

तुम्हारी झिझक

तुमसे ही बोलती

तुम्हारी ख़ामोशी

तुम्हारी ही प्रतीक्षा करती

तुम्हारे क़दमों की आहट

तुमसे ही

अंतर्मुखी हुई

तुम्हारे मन की

मुखरित भावनाएँ

तुम्हारी ही परख से 

अनजान

तुम्हारी आँखों की भाषा

है मेरे लिए

तुम्हारी परिभाषा

अपरिचित

पर निजत्व का बंधन

मेरे अहसास का स्पंदन


   साभार:


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शार्लिट, नार्थ कैरोलिना, अमेरिका, ईमेल: rekhabhatia@otmail.com

वह नारी

वह नारी आज ठंडी देह बन 

पड़ी है पार्थिव, स्पंदनहीन 

न कोई प्रतिक्रिया 

न कोई प्रतिशोध 

आसपास वेदना भरे हृदयों की भीड़ 

निर्जीव देह में क्या अब भी है स्पंदन  

उसका नारी हृदय स्पंदित होता था  

उल्लास से जब लहरें समुद्र में मौज करतीं 

जब घटायें घिर मेघों से अठखेलियाँ करतीं 

जब हवा सीमाएँ तोड़ शोर मचाती 

जब वर्षा आषाढ़ में घनघोर रूप धर लेती 

एक नन्ही बालिका उसके भीतर कुलाचें भरती  

यह नारी देह थी कभी नवनी अल्हड़ तरुणी 

झरन हँसी उजास रंग यौवना 

नेह भरी, गुलाब की महक बिखेरती 

आतुरता से निहारते सभी उस मिठास को 

उसके हृदय में थी भावों की शून्यता 

प्रेम के स्पंदन से बेसुध तरुणी  

प्रेम अगन की आतुरता रात्रिकाल बनी 

जिसकी विद्रूपता से कभी सवेरा न हो सका 

यूँ तो परिपक्व हो चुका है समाज 

बढ़ते विलास से नारी सशक्त की परिकल्पना 

कई व्यक्त अपेक्षाएँ, अव्यक्त उपेक्षाएँ

तरक्की के रस में गाद बनी नारी पीड़ा 

धरा की छटा दोहन से खाक बनती 

छदम नाद गूँजता समाज से वाह-वाह 

अंतरमन के तालों में छिप जाती वेदना 

संशयों में उसाँस लिए जीती जाती 

उसके ख्वाबों की किरचों से घायल 

युग बदल जाते पल वही  रहते 

दारुल दृश्य हर युग के भाग्य में 

हर काल नारी सुलह करती समाज से

भंवर में फँसा काल, अंत विरह साँसों से 

कई मत आज भी उभरे हैं दोष किसका  

कई हृदय  स्पंदित हैं एक आग से 

जब ठंडी देह गर्मा रही चिता में !

चलो क्षितिज पार

तुम चलो क्षितिज के उस पार

अब नहीं रुकना है तुम्हें

किसी डगर विश्राम करने

कह दो मंज़िलों से करें तुम्हारा इंतज़ार

भीतर जो आक्रोश भर लिया कभी

कुछ असफलताओं ने निराश किया

प्रेम में विरह  कुछ कड़वा अनुभव रहा

मित्रों, अपनों का साथ भी आजमाता रहा

दुनियादारी की चाल अद्भुत मकड़जाल

खुद ही बुने, खुद ही बने शिकार

एक अवस्था उस घड़ी की परीक्षा

कभी ढलती शाम में तन्हा अकेले

एक शाम बादलों संग गुजारी  है

ढलते सूरज को अलविदा कहा है

अँधेरा घिर आते विलुप्त हो जाता

दृश्य भान से अस्तित्व उस दिन का

उस घड़ी की अवस्था और बित जाता

सुबह होता नया जन्म नई उम्मीदों संग

सूरज के लौटने से गतिमान हो जाता

कर धन्यवाद उस क्षण का और बढ़ चल

यह धरती तपोवन है और जीवन तप है

तपकर कुंदन बन चमकना यही लगन हो तेरी

कर स्वाहा आक्रोश का जिसे दबाया भीतर

प्रवाहित कर उसे जोश में भीतर ज्ञानगंगा

कर चन्दन अपनी लगन का

तुम चलो क्षितिज के उस पार

अब नहीं रुकना है तुम्हें

भूत, भविष्य, वर्तमान निर्भर है

वक्त पर और वक्त तेरी लगन पर।

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मेरे जीवन का प्रथम प्रयास, 10 साल पहले 2012 में लिखा गया संपादकीय उस प्रथम अंक का जो पूज्यनीय डाॅ. त्रिलोक तुलसी को समर्पित था।

परम श्रद्धेय डाॅ. त्रिलोक तुलसी हमारे मध्य नहीं रहे, लेकिन उनके व्यक्तित्व का प्रभाव और छाप कभी कम न हांेगे, रिश्ते की शुरुआत तो गुरू और शिष्य के संदर्भ में हुई थी परन्तु उन्होंने गुरू बनने से इन्कार कर दिया और हम ने शिष्य बनने में कोई क़सर न छोड़ी, उन्होंने सीखाने में कभी पहल नहीं की और हम सीखने में कभी पीछे न रहे, वह कहा करते थे कि कोई किसी का गुरू नहीं है- हम स्वयं अपने गुरू हैं। ‘परिवेश-मन और साहित्य’ में ‘अपने बारे’ में लिखते हैं कि ‘‘लेखक ही पुस्तक को नहीं लिखती, पुस्तक भी साथ-साथ लेखक को लिखती जाती है’’ भाव यह कि ज़िन्दगी में कुछ भी एक तरफा नहीं है हम जब सीखाते हैं तो सीखते भी हैं। गुरू का ज्ञान अगर गंगा है तो शिष्य का अंतर लोक यमुना है, दोनों के संगम से ही साक्षात सरस्वती का प्रादुर्भाव सम्भव है। उनका मानना था कि शिक्षा से जीवन नहीं, शिक्षा ही जीवन है। उन्होंने हमे पढ़ाया नहीं बल्कि पढ़ने की लग्न भी पैदा की!

मेरी प्रो. त्रिलोक तुलसी से घनिश्ठता कालिज के तीसरे साल में बढ़ी, हम बी. ए. में हिन्दी विषय के तीन ही छात्र थे, क्लास भी बोटेनीकल गार्डन के लान में लगती थी, कला और संस्कृति पर विचार विमर्ष होता रहता था। उन्हीं की प्रेरणा और प्रोत्साहन से मेरी रूचि का विकास हुआ! मनोविज्ञानक प्रवृतियों का संष्लेशण और व्यवहारिकता में उनकी प्रसंगिकता उनके जीवन मूल्यों का आधार था, उनकी धारणा के अनुसार हमारी संवेदनशीलता हमारे अंतः प्रज्ञा का संचालन करती है और विवेक विश्लेषण; और परिणाम हमारे आत्मविकास में योगदान देते हैं।

उनका प्रोत्साहन प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष होता! मेरे जीवन का सब से पहला खेला गया नाटक ‘अखबार का दफ्तर’ (प्रकाश पंडित-हिन्दी कोमेडी) में संपादक का रोल दे कर उन्होंने निर्देशन और रिहर्सल के दौरान ही मेरे चेतन में एक प्रतिमा घड़ कर रख दी और अगले साल 1960 में उन्हीं द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक ’चांद का सफर’ में मानवता का रोल दे कर मानवतावाद के पूरे फलसफे को मेरे दिल की गहराईयों में उतार दिया। उनके दिए एक रोल ने साहित्यिक रुचि पैदा की और दूसरे ने बौद्विक हल चल! डा. तुलसी के विज्ञानिक दृष्टिकोण की पृष्टभूमि में देखा जाए तो वह प्रौफेसर तो थे ही अब मैं उन्हें भविष्य द्रष्टा भी मानने लग गया हूँ। लगभग हर विषय पर गहन अध्ययन के कारण (उनकी लाईब्रेरी से बागवानी पर भी किताबें मिली हैं) वह चलते फिरते विश्वकोश माने जाते थे। केवल मुझे ही नहीं और बहुतों को भी शब्दों के अर्थ और प्रश्नों के उत्तर बन बन मिलते रहे! ऐसी शख्सीयत के महज़ ज़िकर मात्र से ही सिर झुक जाता है।

अभिनव इमरोज़ के इस प्रथम अंक के माध्यम से मैं पूज्यनीय प्रिंसीपल रलाराम, प्रो. बलदेव राज, प्रो. हरिंद्रजीत कुमार, प्रो. अशोक कुमार और प्रो. के. सी. न्यासी को भी अपने श्रद्धा सुमन अर्पण करता हँू! इन सब के डाॅ. तुलसी से गहरे और करीबी सम्बंध रहे, पंडित जी की प्रेरणा से ही त्रिलोक तुलसी जी ने एम. ए. हिन्दी में की थी! तुलसी साहब का एक संस्मरण पंडित जी के बारे में ‘विश्व ज्योति’ के 2005 के एक अंक में छपा था- उसे इस अंक में दोहरा कर मैं होश्यारपुर की महान विभूतियों को नमन करता हूँ।

समय की लकीर पर डाले गए उनके

आदर्शों के पूरने उघाड़ना शेश

जीवन की व्यस्तता रहेगी-

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सुश्री संगीता कुजारा टाक, राँची, मो. 9234677837

2021 में आरम्भ किया गया ‘त्रिवेणियाँ’ का यह स्तंभ अत्यंत सफल रहा। और इन रचनाओं ने पाठकों से निरंतर श्लाघा अर्जित की है। जिसके लिए संगीता जी का हार्दिक अभिनन्दन एवं आग्रह है कि इस स्तंभ को निरंतर अपनी रचनाओं से पोषित करते रहें। -संपादक


त्रिवेणियाँ

मुझे देख कर उदास हो जाती है

मैं कितना भी हँसूँ

सब समझ जाती है माँ!

*****

अनुपस्थित हूँ मैं

स्वयं से आजकल

शायद प्रेम में हूँ !

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नुकीले पत्थरों पर भी सो जाऊँ मैं

शर्त बस इतनी है

मेरे पहलू में तू हो !

*****

पड़ा रहने दे खामोश

अपने पहलू में मुझे

जैसे समंदर रखता है मोती अपने आगोश में

*****

इश्क की कश्ती यूँ ही नहीं डूबी

छेद था लाले

तेरे ईमान में.....

*****

ख़त्म हो गई है

आँखों की रसद

आना पड़ेगा अब तुम्हें !

*****

कुछ यों बना रखा है

उसने मुझे अपना

वक्त को मेरे पीछे लगा रखा है

*****

आँसुओं ने आँखों में घर बना रखा है

दौड़ रही हूँ मैं

ख्वाब हाथों में लेकर...

*****

जो तुमने कभी कही नहीं

जो मैंने कभी सुनी नहीं

बहुत शोर मचाती है वो आवाज़ें

*****

मर रही हैं एक-एक कोशिका मेरी

असर हो रहा है

तेरे शब्दों का...

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वो जब भी गुज़रता है

मेरे आस-पास...

घर-घर-सी महक आती है

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प्रेमचंद विशेषांक जिसका संपादन डाॅ. कमल किशोर गोयनका ने 2013 में किया था।


सम्पादकीय

‘अभिनव इमरोज़’ के संस्थापक सम्पादक श्री देवेन्द्र कुमार बहल एक अनोखे हिन्दी-प्रेमी हैं। वे हिन्दी भाषा तथा साहित्य से प्रेम के कारण पत्रिका निकालते हैं और इसी में आनन्द की अनुभूति करते हैं। ऐसे निस्वार्थी, निष्ठावान समर्पित हिन्दी प्रेमी अब दुर्लभ हैं जो इस आध्यात्मिक आनन्द के लिए लाखों रुपए खर्च करने को तैयार हों।

‘अभिनव इमरोज़’ के प्रवेशांक से ही मैं इसका पाठक रहा हूँ और प्रशंसक भी, क्योंकि इसकी सामग्री एवं प्रकाशन मेंसुरुचिपूर्ण कलात्मकता का पूरा ध्यान रखागया है। एक दिन श्री बहल मेरे घर आये और पत्रिका के ‘प्रेमचंद विशेषांक’ के सम्पादन का प्रस्ताव किया जो मैंने स्व्ीकार कर लिया। प्रेमचंद पर कोई कार्य हो तो मुझे आत्मिक सुख मिलता है। प्रेमचंद, साहित्य और पाठक के लिए शाश्वत विषय हैं और जब तक साहित्य है, वे मर कर जीवित रहेंगे। प्रेमचंद पर विपुल सामग्री छप चुकी है। मेरी ही लगभग 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, अतः पाठकों के सम्मुख प्रेमचंद के ऐसे साहित्य तथा पक्षों को रखने का विचार बना जिससे आम पाठक ही नहीं हमारे प्रोफेसर भी अनभिज्ञ रहे हैं। प्रेमचंद-आलोचना में वामपंथियों का वर्चस्व रहा है और उन्होंने प्रेमचंद के वही पक्षों को बार-बार रखा जो माक्र्सवाद के प्रचार के लिए उपयोगी था। ऐसा साहित्य पाँच प्रतिशत भी नहीं, लेकिन यह प्रगतिशील आलोचकों का कमाल है कि शेष पिच्चानवें प्रतिशत साहित्य को ओझल कर दिया अथवा कूड़े में डाल दिया। असल में यही पिच्चानवें प्रतिशत साहित्य वह है जिसमें प्रेमचंद की आत्मा  विद्यमान है और यही वह साहित्य है जिसमें वे भारतीय परम्परागत जीवन-मूल्यों, संस्कारों एवं आदर्शों की रक्षा करके भारतीयता का स्वरूप प्रस्तुत करते हैं। प्रेमचंद माक्र्सवादी नहीं, भारतीयता के लेखक थे और यही उद्घोष उनका साहित्य करता है। ‘अभिनव इमरोज़’ के इस अंक में पाठक एक ऐसे प्रेमचंद से मिलेंगे जिनसे वे पहले नहीं मिले थे और वे उस उद्घोष को सुनेंगे जिसमें उन्होंने स्वराज्य-प्राप्ति तथा भारतीयता  की रक्षा का संकल्प लिया था। 

प्रेमचंद-साहित्य के अतिरिक्त इस अंक में कुछ निजी दस्तावेज, लेखादि भी दिये हैं, पर उनका सम्बन्ध भी प्रेमचंद से ही है। इनसे पाठक प्रेमचंद की कुछ नई व्याख्याओं का भी आनन्द ले सकंेगे। अन्त में, मैं श्री देवेन्द्र कुमार बहल का आभारी हूँ कि उन्होंने प्रेमचंद के अज्ञात, अनछुए सन्दर्भों, रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने का अवसर दिया। मुझे पाठकों की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।  डाॅ. कमल किशोर गोयनका, अतिथि संपादक

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प्रो. सादिक़, नई दिल्ली, मो. 9818776459

आत्मकथ्य

मैं और मेरा हमज़ाद

क्लोन का आविष्कार तो बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की बात है लेकिन कई सदियों से यह विश्वास चला आ रहा है कि हर व्यक्ति के साथ हमज़ाद भी जन्म लेता है जो उसका अगोचर जुड़वां होता है और जन्म से मृत्यु तक हर जगह और हर समय उके साथ लगा रहता है। सब लोग उसे डोपलगेंजर या शैतान मानते हैं, कुछ उसे जिन और बेताल सरीखी एक योनि-विशेष समझते हैं। हमज़ाद की सुरक्षित पनाहगाह व्यक्ति का मस्तिष्क होता है जहाँ बैठकर वह अपना रंग दिखाता है। व्यक्ति के विचारों में खण्डत डालता है।

आज रात, जब मैं अपने आत्मकथ्य लिखने बैठा हूँ, तो मेरा हमज़ाद भी रुबरु आ बैठा है। कह रहा है कि यह काम आसान न समझो। आत्मकथ्य लिखना मानो तलवार की धार पर चलना है। लहूलुहान होकर रास्ते ही में ढेर हो जाओगे, मेरी मानो तो इस बखेड़े में न पड़ो।

“अब रहने दे अपनी लनतरानी। रास्ते की मुश्किलों का हव्वा खड़ा कर के रोकना चाहता है। मुझे कम-हिम्मत समझा है। क्या तुझे मालूम नहीं कि मुझे आगे बढ़ने से रोकना तेरे बस की बात नहीं। तू कितनी ही बार ऐसी कोशिशें करके हार चुका है। लगता है अतीत के अनुभवों से तूने कुछ सीखा नहीं।” 

“ठीक है भाई। अब और मेरा दिमाग मत चाट। मुझे अपना काम करने दे और तू अपना काम कर।” 

“वही तो कर रहा हूँ मगर आप हैं कि खुद भी रुके हुए हैं और मुझे भी रोक रहे हैं।”

“अच्छा भाई, तुझे जो कुछ कहना है जल्दी कह और मेरा पिण्ड छोड़।”

“अब आए न रास्ते पर। बड़ों ने कितनी बार समझाया है कि पहले पूरी बात सुना करो, फिर बोला करो। खैर मुझे यह कहना है कि तुम जो आतकथ्य लिखना चाहते हो यह सीधे-सीधे धोखाधड़ी का काम है। आत्मकथ्य के बहाने लोग आमतौर पर खुद की प्रशंसा करते है। अपनी सारी गलतियों और गलत कार्यों को जस्टीफाइड करते हैं। अपने व्यक्तित्व का प्रचार करते हैं। कुल मिलाकर आत्मकथ्य लेखक पूरा सच नहीं लिखते किंतु आशा यही करते हैं कि उन्होंने जो कुछ लिखा है उसे सच समझा जाए। मेरी बात पर शक हो तो किसी भी लायब्रेरी में जाकर किसी भी आत्मकथ्य उठाकर पढ़ डालो। 90 प्रतिशत से अधिक पुस्तकें ऐसे ही निकलेंगी जैसा कि अभी मैंने कहा है।” 

“अब तुम बोलते ही रहोगे या मेरी भी सुनोगे। पहली बात तो यह है कि मैं आत्मकथा नहीं बल्कि आत्मकथ्या के तौर पर एक छोटा-मोटा लेख लिखना चाहता हूँ।” 

“एक ही बात है।” 

“आख़िर तुम चाहते क्या हो? क्या मैं आत्मकथ्य भी न लिखूँ?” 

“यह किसने कहा? लिखो और जरूर लिखो, लेकिन जो भी लिखो वो बिल्कुल सच हो।” 

“वही तो करने जा रहा हूँ और तुमने टोक दिया। क्या तुम नहीं जानते कि मेरा नाम सादिक़ है अर्थाक् ‘सच कहने वाला।’ मैं जो कुछ लिखूँगा वह सब सच ही होगा।” 

“बस रहने दो। यदि नाम रख लेने मात्र से आदमी वही बन जाता जो उसके नाम का अर्थ है तो आज दुनिया में हर आदमी का नाम “बादशाह” या दौलतराम होता। सादिक़ साहब, तुम कितने सच्चे हो, मैं जानता हूँ तुम्हारा हमज़ाद जो ठहरा। मेरी आँखों में धूल झोंकना मुमक़िन नहीं। अच्छा! बताओ तो, आत्मकथ्य में तुम क्या-क्या लिखोगे?” 

“यही कि मेरा नाम सैयद सादिक़ अली है। दस अप्रैल 1943 की सुबह उज्जैन शहर में जन्म हुआ और...।” 

“अरे, इसमें क्या सन्देह? यह तो मुझे जानने वाले जानते ही हैं। क्या तुमने मेरे स्कूल सर्टिफिकेट और यूनिवर्सिटी की डिग्रियाँ नहीं देखी? सब में यही नाम लिखा है और यही तिथि और सन् दर्ज है।”

“यह दोनों बातें सत्य की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। सादिक़ तो तुम हो, नाम के सही, लेकिन ‘सैयद’ कैसे हो गए? बचपन में यतीम हो जाने के बाद अपने ननिहाल में पले-बढ़े हो। वह भी अपने नानाजी रहमान ख़ाँ साहब की छत्र-छाया में जो कि मज़हबी मामलों के “कट्टर” थे, इस्लामी शरीअत के पाबन्द। वहाबी विचार-धारा के आदमी। क्या उन्होंने तुम्हें रसूल-अल्लाह का यह क़ौल नहीं सुनाया कि झूठा बनने के लिए सिर्फ इतना ही काफी है कि आप सुनी-सुनाई बात उसकी सच्चाई को मालूम किए बिना कहीं और दोहरा दें। तुमने बड़ों से यह सुना होगा कि तुम्हारे वालिद साहब ख़ानदानी सैयद थे और सब लोग उन्हें “सैयद साहब” कहकर पुकारते थे लेकिन क्या तुमने इस सिलसिले में कभी शोध-परीक्षण भी किया है?” 

“इसकी जरूरत ही नहीं समझी। मेरे वालिद सैयद थे, दादा सैयद थे। परदादा सैयद थे, सो मैं भी सैयद हूँ।” 

“बात इतनी आसान नहीं सादिक़ भाई। शज्रे और बिना शज्रे वाले सैयदों की बात छोड़ें तो भी भारतीय मुसलमानों में तीन प्रकार के सैयद पाए जाते हैं। पहले शीआ, दूसरे सुन्नी और तीसरे ख़ुद साख़्ता या मनगढ़न्त।” 

“अब इस तरह बाल की ख़ाल निकालोगे तो हर बात सन्दिग्ध लगेगी। वैसे तुम ख़ुद जानते हो कि मैंने अपने सैयद होने पर कभी भी गर्व नहीं किया बल्कि आज से चालीस बरस पहले ही मैंने अपने नाम से यह जाति-सूचक शब्द निकाल दिया था। 1967 से मैं केवल “सादिक़” नाम से ही लिख रहा हूँ। सर्टिफिकेट और डिग्रियों इत्यादि में पूरा नाम होने की वजह से सर्विस वग़ैर में अब तक पूरा नाम चल रहा है तो यह मजबूरी है।” 

“ख़ैर, नाम को छोड़कर अब जन्म-तिथि की तरफ आईये। आपका जन्म उज्जैन में हुआ मानता हूँ। अलस्सुबह हुआ, यह भी मानता हूँ क्योंकि सुबहे सादिक़ की रिआयत से नानाजान ने आपका सादिक़ नाम रखा था, लेकिन यह 10 अप्रैल 1943 वाली बात सबूत चाहती है।”

“ठीक गिरफ्त की तुमने। हुआ यूँ कि एक बार नानाजान के घर में चोरी हुई। चोर जो क़ीमती सामान ले उड़े उनमें नक़दी और जेवरात के अलावा नानाजान की वह डायरी भी थी जिसमें ख़ानदान के सारे बच्चों की जन्मतिथियाँ इत्यादि भी लिखी हुई थीं। डायरी चोरी होने का कारण यह था कि नानाजान उस डायरी में जगह-जगह सौ-सौ रुपये के नोट रखा कते थे। ख़ैर साहब, तो जब हमें दाख़िले के लिए स्कूल में ले जाया गया तो जन्मतिथि और सन् वाले कालम की ख़ानापूर्ति स्कूल के मास्टर साहब ने कर दी। वही अब तक चली आ रही है।” 

“अब बोलो, पूरी सच्चाई के साथ आत्मकथ्य लिखने के दावेदार सैयद सादिक़ अली साहब, आगे क्या लिखोगे।” 

यह छोटे-छोटे सच के बचपन थोड़ी-सी तंगदस्ती लेकिन भरपूर मस्ती में गुजरा। जान एक लेकिन शौक़ अनेक। शायरी पढ़ता तो दिल में शायर बनने का शौक़ पैदा होता, कहानियाँ पढ़ता तो कथाकार बनने का, नाटक या फिल्म देखता तो अभिनय करने और चित्र देखता तो चित्रकारी में रमने की उमंगें मन में जागने लगती। अजीब बेचैन मिट्टी से बना हुआ था मेरा वजूद। मैं बचपन में इन सारी मंजिलों से गुजरा। शायरी की। नाटक लिखा। उसका मंचन हुआ तो अभिनय का शौक़ भी पूरा किया। कहानियाँ लिखने और चित्रकारी भी करने लगा। मेरे बड़े भाई मेहमूद जकी साहब का मुझ पर बड़ा प्रभाव रहा। वे शाइर और पत्रकार थे। उर्दू दैनिक ‘नया समाज’ के उज्जैन संस्करण के संपादक भी रहे और मासिक पत्रिका “शोला-व-शबनम” (देहली) के उप-सम्पादक भी। इनके अलावा भोपाल और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों से सम्बद्ध थे। खुले दिलो-दिमाग के आदमी थे। उर्दू के साथ-साथ कभी-कभार हिन्दी में भी लिखते थे। संस्कृत की मालूमी-सी सुधबुध रखते होंगे मगर कालिदास के आशिक़ थे। हिन्दी और संस्कृत साहित्य से मेरा विशेष लगाव उन्हीं की वजह से पैदा हुआ। मुझ पर उनकी दया-दृष्टि ऐसी थी कि जब मुझे चित्र बनाने का शौक़ चर्राया तो ड्राइंग का सारा सामान मुझे दिलवाया। नानाजान- चीख़ते ही रह गए कि यह गुनाह है। तस्वीरें बनाओगे तो मरने के बाद अल्लाह-मियाँ के यहाँ ख़ूब दरुर् पड़ेंगे। बाईजान की शह पार कर मैं चित्रकला का अभ्यास करता रहा और इस मैदान में निरन्तर आगे बढ़ता रहा। ठीक कह रहा हूँ न! मेरे दोस्त, मेरे दुश्मन, मेरे हमजाद।”

“जब आदमी कम बोलता है तो उसके कथन में झूठ भी कम ही होता है लेकिन इस पूरे बयान में वह दो बातें छोड़ गए जिनमें सुबकी का डर था।” 

“कौन-सी दो बातें?” 

“अरे भाई उसी जमाने में तुम्हें गायकी और फिर जादूगरी सीखने का शौक तो चर्राया था।” 

हाँ... हाँ...। वह तो मैं भूल ही गया। बचपन में मुझे गाने का भी शौक था। फिल्मी गाने और क़व्वालियाँ ख़ूब सुनता था। ख़ुद भी गाता था। जब बाक़ायदा गायकी सीखने का शौक़ हुआ तो भाईजान ने उस्ताद मस्सूख़ाँ साहब का शागिर्द बनवा दिया हालाँकि वे तवाइफों के मुहल्ले में रहते थे। मैं कुछ दिनों उनके घर गया लेकिन कुछ उस मुहल्ले की बदनामी और कुछ उस्ताद की बदमिज़ाजी की वजह से कुछ दिनों के बाद वह शौक़ ही छोड़ दिया। जादूगर बनने का शौक़ कमालू उस्ताद की वजह से पैदा हुआ था जो इस कला में पारंगत समझे जाते थे। इस शौक़ में तीव्रता उस समय आई जब एक बहुत मशहूर जादूगर गोगिया पाशा ने उज्जैन आकर शो किए। कमालू उस्ताद अपने चेलों को लेकर वहाँ पहुँचे और उसे चुनौती दे डाली। गोगिया पाशा बड़ा होशियार आदमी था। वह इस मामले को टालकर उज्जैन से चलता बना। शहर में कमालू उस्ताद की धाक बैठ गई। मैं भी बहुत प्रभावित हुआ और उनका शिश्य बनने को तैयार हो गया। जब भाईजान से इस ख़्वाहिश का इजहार किया तो उन्होंने बुरी तरह झिड़क दिया।

“ठीक ही तो किया। कमालू उस्ताद के शागिर्द बन जाते तो आज प्रोफेसर की बजाए मदारी होते।” 

“जब मैंने कॉलेज में प्रवेश किया तो मानो एक नई दुनिया में आ गया। सारा माहौल और परिवेश एकदम बदल गया। मैंने उर्दू में लिखने की शुरुआत तो कुछ पहले ही कर दी थी। उर्दू में हास्य-व्यंग्य की तरंग में ख़ूब लिखता-छपता रहता था। कॉलेज में आने के बाद जब हिन्दी में लिखना आरम्भ किया तो सबसे पहले इसी रंग में तबाआजमाई की। मेरी पहली हिन्दी रचना 1966 में दिल्ली प्रेस की लोकप्रिया पत्रिका “मुक्ता” में प्रकाशित हुई। उसी वर्ष गुरुवर डॉ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य ने मुझे ‘माधविका’ के लिए “उज्जैनः रात की बाँहों में” शीर्षक से एक लेख लिखने के लिए कहा। मैंने रिपोर्ताज शैली में एक लम्बा-सा लेख तैयार करके उनके सुपुर्द कर दिया तो ‘माधविका’ में प्रकाशित हुआ। यह हिन्दी गद्य में मेरी पहली रचना थी। उसी जमाने में कार्टून बनाने की धुन सिर पर सवार हुई। फिर कुछ समय तक यही करता रहा। ‘माधविका’ के लिए प्रभात जी ने मुझसे कई कार्टून बनवाए। हमारे कॉलेज के प्राचार्य शिवमंगल सिंह सुमन, विक्रम विश्वविद्यालय के उपकुलपति आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी, हरिवंश राय बच्चन जी और कई जानी-अनजानी हस्तियाँ थीं जिनके व्यंग्य-चित्र मैंने बनाए जो ‘माधविका’ में छपे और चर्चा का विषय बने। जब मेरा बनाया हुआ एक व्यंग्य-चित्र साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुआ तो शहर भर में धूम मच गई। यह कहानी फिर कभी।”

मैंने उर्दू में जितना लिखा उतना हिन्दी में नहीं। यह सच है। हुआ यूँ कि एक बिल्कुल निजी पारिवारिक घटना की वजह से मैं 1967 में उज्जैन छोड़कर औरंगाबाद चला गया। वहाँ पूरा माहौल उर्दू का था या फिर मराठी का, इसलिए हिन्दी से बड़ी हद तक मेरा सम्बन्ध टूट-सा गया। हिन्दी पत्रिकाओं और पुस्तकों तक के लिए तरस गया। सत्तर के दशक में वहीं पहली बार कमलेश्वर से मुलाकात हुई। उन दिनों “सारिका” में भारतीय भाषाओं की प्रथम मौलिक कहानियाँ और आद्य कथाकार ‘स्तम्भ’ के तहत शोधपरक लेखों के प्रकाशन का सिलसिला चल रहा था। कमलेश्वर जी ने मुझे पहली उर्दू कहानी और कहानीकार पर लिखने के लिए कहा। मैंने इस विषय पर बड़ी छान-बीन के बाद एक आलेख तैयार करके उन्हें भेज दिया। यह मेरा पहला शोधपत्र था। जब यह लेख ‘सारिका’ में प्रकाशित हुआ तो प्रतिक्रिया में कुछ पत्र भी आए। उर्दू पत्रिका ‘आजकल’ ने इसका अनुवाद उर्दू में प्रकाशित किया तो उर्दू में भी बहस शुरु हो गई। उर्दू साप्ताहिक ‘हमारी जबान’ में कई हफ्तों इसकी प्रतिक्रिया में लेख और पत्र छपते रहे। कमलेश्वर ने भी शामिल किया है।

ख़ैर तो सत्तर के दशक में ही संघलोक सेवा आयोग से चयन होने के बाद मैं भारत सरकार के केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय में आ गया। दिल्ली आने के बाद एक बार फिर हिन्दी के साथ जुड़ गया। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की पत्रिका भाषा और समय≤ पर प्रकाशित होने वाले अन्य ग्रंथों के लिए विविध विषयों पर लेखों के अतिरिक्त हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में भी लिखने-छपने का सिलसिला शुरु हो गया। हिन्दी के सेमिनारों और गोष्ठियों में भी जाने लगा। हिन्दी, संस्कृत, मराठी, पंजाबी और सिंधी में विशेष रुचि और इनके अध्ययन के कारण इन भाषाओं के राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सेमिनारों में शिरकत करने और उनें आलेख पढ़ने और अध्यक्षता करने के अवसर भी कई बार मिले। 1986 में मेरी हिन्दी गजलों का पहला संकलन ‘गिरते आसमान का बोझ’ नाम से प्रकाशित हुआ। फिर मेरी हिन्दी कविताओं का एक “शब्दों का जन्मदिन” प्रकाशित हुआ।

“देखिए, आप फिर सच्चाई की डगर से हट रहे हैं। ‘गिरते आसमान’ का बोझ को अपनी हिन्दी गजलों का संग्रह कहते समय यह नहीं सोचा कि उसमें कुछ ऐसी गजलें भी शामिल हैं जो आपने मूलतः उर्दू में लिखी थीं और जो आपकी उर्दू पुस्तकों में छप चुकी है।” 

“ठीक गिरफ्त की मेरे यार, मगर यह भूल गए कि मेरी उर्दू गजलें भी शुरु से ही डिकशन की सतह पर उर्दू-फारसी परम्परा से अलग, उर्दू-हिन्दी परम्परा की चीज रही हैं। इसीलिए उन्हें हिन्दी गजलों के साथ शामिल करते हुए मुझे जरा भी संकोच नहीं होता। तुम मेरे हमजाद हो। तुमसे मेरा कुछ छुपा नहीं है। तुम ख़ूब जानते हो कि लिखने से पूर्व कई दफा मुझे ख़ुद मालूम नहीं होता कि जो लिखने जा रहा हूँ, वह रचना उर्दू होगी या हिन्दी। मेरे पहले दो उर्दू कविता संग्रहों‘दस्तख़त’ और ‘सिलसिला’ में कई रचनाएँ ऐसी हैं जो मूलतः हिन्दी में लिखी गई थीं। और फिर लिपियान्तर के बाद उर्दू पत्रिकाओं में छपी थीं। मिसाल के तौर पर ‘दिनचर्या’ ‘सरकूबी’ महानगर में, वे उप-ईश्वर, पर्दा गिराओं और लम्बी कविता ‘गुज़रते हुए’ इत्यादि कविताओं के शीर्षक याद आ रहे हैं जो पहले-पहल हिन्दी में ही लिखी गई थी। ‘गुजरते हुए’ अस्सी के दशक में हिन्दी पत्रिका ‘दीर्घा’ में छपने से पूर्व तीन बार उर्दू में छप चुकी थी। डॉ. नरेन्द्र मोहन ने इसे बीसवीं शताब्दी की उत्कृष्ट लम्बी कविताओं के संकलन में शामिल किया। मेरे हिन्दी कविता संग्रह ‘शब्दों का जन्मदिन’ की सारी कविताएँ मूलतः हिन्दी ही में लिखी गई हैं लेकिन दो-एक ऐसी भी हैं जो पहले उर्दू में लिखी थीं।

पिछले कई वर्षों से मैं हिन्दी ही में गजलें लिख रहा हूँ। बीच में कभी-कभार यूँ भी होता है कि उर्दू में गजल हो जाती है। 1999 की एक रात जब कुछ लिखने का मूड बना और मैंने एक गजल लिखी तो वह न केवल यह कि हिन्दी में थी बल्कि हास्य-व्यंग्य से भरपूर थी। उसे पढ़कर ख़ुद मुझे हँसी आ गई, फिर उसी मूड में कई दिन तक ऐसी ही गजलें लिखता रहा। ये गजलें लिख कर मुझे एक अजीब-सा संतोष मिलता था और ख़ुशी होती थी। ऐसा लगता था कि मैं अपने और अपने समय के बारे में पूरी ईमानदारी, सच्चाई और निर्भीकता के साथ वह सभी कुछ लिखता जा रहा हूँ जो कि मुझे लिखना चाहिए मैंने जब इनका जिक्र कमलेश्वर जी से किया और उन्हें कुछ शेर भी सुनाए तो उन्होंने “दैनिक भास्कर” के रविवारीय परिशिष्ट में हर हफ्ते उनके प्रकाशन का सिलसिला शुरु कर दिया। प्रचलित ग़ज़ल से पृथक और विशेष पहचान बनाने के लिए ‘हज़ल’ शीर्षक दिया गया और इस तरह काफी समय तक मेरी हज़लें ‘दैनिक भास्कर’ में प्रकाशित होती रहीं और मैं उनमें प्रत्यक्ष रूप से अपने समय का इतिहास रकम करता रहा। फिर अचानक वह मूड ख़त्म हो गया। उन दिनों दैनिक भास्कर तीन-चार राज्यों में 17 लाख से अधिक तादाद में प्रकाशित हो रहा था। अर्थात् मेरी रचनाएँ उससे कहीं ज्यादा पाठकों तक पहुँच रहीं थीं, किन्तु मूड खत्म हो चुका था और सिर्फ छपने के लिए लिखते रहना मैंने पसन्द नहीं किया। कुछ समय बाद फिर मूड बना तो फिर बहुत-सी ‘हज़लें’ लिख डाली जो मेरी एक हिन्दी पुस्तक “जिन्दगी का जायका” में शामिल है।

मैं यह कह चुका हूँ कि भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य में मुझे बचपन से ही दिलचस्पी रही है। उर्दू हिन्दी मुशायरों और कवि सम्मेलनों के अलावा मालवी के कवि सम्मेलनों में श्रोता के रूप में जाया करता था। मालवी कवियों की हास्य कविताएँ मुझे पसन्द आती थीं। फिर मराठी नाटकों के ख़ासतौर पर आचार्य अत्रे के हास्य-व्यंग्य से भी प्रभावित हुआ। मेरी हास्य-व्यंग्य रचनाओं में उर्दू के बाद इन दोनों भाषाओं की हास्य परम्परा का प्रभाव जरूर होगा। मैं कुछ गलत नहीं कह रहा, पता नहीं मेरा हमज़ाद मुझे क्यों घूर रहा है। उसके टोकने से पहले यह और बता दूँ कि मैं एक ख़ाल-मस्त, मनमौजी आदमी हूँ, कोई एक काम लम्बे समय तक नहीं करता हूँ। जब जो पसन्द आ जाए, जिस काम के लिए मन करे वही करने लगता हूँ। लाभ-हानि की परवाह नहीं करता। पैसे के लिए जिन्दगी में एक ही काम किया है और वह है नौकरी। बाकी सारे काम सिर्फ अपने शौक़ के लिए करता रहा हूँ। जब जो मन में आ जाए, मूड बन जाए लिखता रहता हूँ। कविता, कहानी, ग़ज़ल, हज़ल, मज़मून, शोध लेख। कभी उर्दू में कभी हिन्दी में। शौक़ चर्राया तो दूरदर्शन के लिए विविध विषयों पर कई वृत्तचित्र तैयार किए। इस काम में बालस्वरूप राही जैसे मित्र का सहयोग मिला, रेडियो-नाटक भी लिखे और टेलीफिल्में भी। चित्रकारी का शौक़ कभी कम नहीं हुआ। अब भी रियाज़ जारी है। रेखांकन करता रहता हूँ हिन्दी और मराठी, रचनाओं के बेशुमार अनुवाद उर्दू में कर चुका हूँ। मालवे की लोककथाएँ भी जमा की है। सूफीवाद की वादियों में वर्षों तक भटकता रहा। इस विषय पर अगणित पुस्तकों का अध्ययन किया। कई विद्वानों से मिला। अन्ततः इस नीतेज पर पहुँचा कि सूफीवाद को पुस्तकों द्वारा नहीं सीखा-समझा जा सकता और इस क्षेत्र में पाखण्डियों के बीच किसी ‘मुर्शिद ए कामिल’ की तलाश सम्भव नहीं। फिर भी इस अनुभव ने इतना तो सिखा ही दिया कि आतंकवाद को सूफीवाद द्वारा ख़त्म किया जा सकता है। मैंने यही पैगाम दिल्ली, पंजाब, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहरों तक पहुँचाने का प्रयत्न किया। आदरणीय निर्मला देशपाण्डेय के साथ पाकिस्तान भी गया। शिकागो (यू.एस.ए.) की काँफ्रेंस में भी सूफीवाद पर अपने विचार व्यक्त किए। मैं समझता हूँ यह बड़ा महत्वपूर्ण और आवश्यक मिशन है जिसके लिए मुझे अपना बाक़ी जीवन समर्पित कर देना चाहिए।

आत्मकथा में आत्म प्रशंसा करते डरता हूँ। वैसे भी मेरा हमजाद मुझे घूरे जा रहा है किन्तु यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं कि मेरी हिन्दी कविता ‘गुजरते हुए’ कोई 

साधारण रचना नहीं है। इसी तरह मेरी हिन्दी गजलें भी इस विधा में याद रखी जाने वाली चीजें हैं और पूरे आत्म विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि मेरी हज़लें या हास्य व्यंग्यपूर्ण ग़ज़लें निस्सन्देह हिन्दी के हास्य-व्यंग्य साहित्य में खुशगवार इज़ा़फा मानी जाएँगी। 


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पूज्य विश्वनाथ जी द्वारा प्रो. सादिक़ के लेख की प्रशंसा में लिया गया पत्र

30 जनवरी, 2013

क्रमांकः

प्रो. सादिक़ 

ए.जी.-1/47-सी, विकासपुरी 

नई दिल्ली-110 018

प्रियवर सादिक़ साहब, 

कुछ समय पहले भी मैंने आपको एक पत्र लिखा था। आपकी ओर से प्राप्ति सूचना भी नहीं मिली। संभवतः मेरा पत्र डाक में ही खो गया। 

‘अभिनव इमरोज़‘ में आपका आलेख ‘जुग-जुग जीवे मेरा मुर्शिद सोणा‘ पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसी से प्रभावित होकर मैंने श्री प्रभात कुमार भट्टाचार्य को एक पत्र लिखा था। फिर उनका विस्तृत पत्र मुझे मिला। अपने पत्र की प्रतिलिपि संलग्न कर रहा हूँ, सुविधा से पढ़िएगा। 

इस पत्र के साथ अपनी चार पुस्तकें भिजवा रहा हूँ। कृपया स्वीकार करें। आपके लिए ये पुस्तकें रूचिकर होंगी।।


शुभ कामनाएँ,

आपका


(विश्वनाथ)

संलग्नः चार पुस्तकें (आलाप, अन्तरा, रूमी, Musings)


17 जनवरी, 2013

क्रमांकः


श्री प्रभात कुमार भट्टाचार्य 

संस्थापक ‘समावर्तन‘ 

129, दशहरा मैदान 

उज्जैन-456 010


प्रियवर,

आपका पत्र मिला। धन्यवाद। मुझे ऐसा लगता था कि पत्र लिखने की कला समाप्त हो रही है। आपके इस पत्र से मेरी वह धारणा गलत सिद्ध हो रही है। पत्र द्वारा कैसे अंतरंग वार्तालाप किया जा सकता है, आपका पत्र उसका जीवंत उदाहरण है। 

यह एक विडम्बना है कि मैं अब तक अपने देश को पूरी तरह नहीं देख पाया। न तो भोपाल गया हूँ और न ही उज्जैन। परंतु, संसार के अधिकांश देशों में घूम आया हूँ-चाहे वह यूरोप हो, अमेरिका, अफ्रीका, यू. एस. एस. आर. अथवा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड। मेरे एक प्रिय गीत की एक पंक्ति है... ‘‘देस बिदेस बहुत दिन भटक्यो, अपने ही घर नहीं आया।‘‘ ऐसा ही अपराध-बोध कई वर्ष पहले मुझे बड़ी तीव्रता से हुआ तो मैंने एक कार चेन्नई में किराए पर लेकर पूरे दक्षिण की परिक्रमा कर ली थी। फिर भी मेरी भारत यात्रा अधूरी है, और इस अवस्था में तो ऐसा लगता है कि अधूरी ही रहेगी। उज्जैन से मेरा परोक्ष घनिष्ठ संबंध रहा है, तीन व्यक्तियों के 

कारण 1) डॉ. शिवमंगलसिंह ‘सुमन‘, 2) डॉ. भागवतशरण उपाध्याय, और 3) कृष्ण बलदेव वैद। सुमनजी के साथ इतनी आत्मीयता बनी जब हम दोनों ही ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन‘ के सरकारी डेलीगेशन में मॉरीशस गये थे। इस डेलीगेशन की अध्यक्षता डॉ. कर्णसिंह कर रहे थे, जिनसे मेरी घनिष्ठता रही। है। जब भी कभी सुमनजी दिल्ली आते थे तो मेरे कार्यालय में अवश्य पधारते थे। यह उनका बड़प्पन था। मैंने उनकी कविता पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। 

एक ऐसा दौर आया था जब भारत सरकार ने साहित्यकारों को विदेश सेवा में सम्मानपूर्वक स्थान दिया था। सबसे पहले सुमनजी को नेपाल में सांस्कृतिक attache बनाकर भेजा था। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी। उससे भी अधिक प्रसन्नता तब हुई जब डॉ. भगवतशरण उपाध्याय को मॉरीशस में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। उपाध्यायजी की अनेक पुस्तकों का प्रकाशक हूँ, उससे कहीं अधिक सुमनजी के ही समान मैं उनकी विद्वत्ता, वाग्मिता, सरलता, और मुक्त स्वभाव से अभिभूत था। मुझे याद आ रहा है मॉरीशस के लिए विदाई के दिन मैंने घर पर एक छोटा-सा समारोह उनके सम्मान में रखा था। अचानक उस शाम को घनघोर वर्षा घिर आयी, फिर भी मित्रमंडली पहुंची थी। मॉरीशस मुझे कई बार जाने का अवसर मिला है। उपाध्याय जी ने तो वहाँ पहुँचते ही मुझे खुला निमंत्रण दिया था कि कभी भी आओ और मेरे पास तब नहीं जा पाया था। फिर उनका दुखांत निधन भी वहीं हुआ। उपाध्याय जी ने पुस्तकें प्रकाशित करने का अवसर दिया। मैं उनकी स्मृति को नमन करता हूँ। उनकी दो पुस्तकों के कारण मुझे विशेष प्रसन्नता हुई और यश मिला-‘विश्व साहित्य की रूपरेखा‘ और उनकी चीन यात्रा पर पुस्तक ‘कलकत्ता से पीकिंग‘। कितनी ही पुरानी स्मृतियां आँखों के सामने आ रही हैं। 

आपने वैद जी पर भी एक पुस्तक लिखी है- ‘गल्प का विकल्प‘। संभवतः आप जानते हों कि वैद जी से और उनकी सहधर्मिनी चंपा जी से मेरी बहुत पुरानी मित्रता रही है-अब भी है। उनका प्रकाशक तो रहा ही हूँ। एक और विचित्र संयोग है कि उनका और मेरा जन्मदिन एक ही तारीख (27 जुलाई) को पड़ता है। हम दोनों एक-दूसरे को बधाई देते हैं। 

मुझे आपसे रश्क होता है। अन्य उपलब्धियों के अतिरिक्त आपको ईश्वर का एक बहुत बड़ा आशीर्वाद। मिल रखा है, वे हैं आपके मित्र। आज के युग में सच्चे मित्र पाना असंभव सा है। अंग्रेजी में एक कहावत है...To have a friend, you have to be a friend आप स्वयं बहुत। अच्छे मित्र हैं इसीलिए चुंबक के समान आप मित्रों से घिरे रहते हैं। सॉमरसेट मॉम ने अपने जीवन के अंत में एक लेख में ये बात कही थी कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखे और उसे लगे कि उसने कुछ-न-कुछ सार्थक काम किया है तो यह अपने में बहुत बड़ी उपलब्धि है। आपको पूरा संतोष होना चाहिए कि आपने साहित्य की अनेक विधाओं में इतना कुछ किया है जिसे कर पाना कठिन है। कवि कुलगुरु कालिदास की नगरी में रहकर आपने कालिदास के नाटकों की अपने ढंग से व्याख्या की है। मैं भी संस्कृत का विद्यार्थी रहा हूँ और अब तक हूँ। आप संभवतः जानते ही हैं कि जिस जमाने में मैं कॉलेज में पढ़ता था। संस्कृत सिखाने का माध्यम अंग्रेजी भाषा थी। कॉलेज के दिनों में (सन् 1935 से 1941) ही मैंने। ‘मालविकाग्निमित्रम्‘, ‘अभिज्ञान‘, ‘शाकुन्तल‘, और ‘कादम्बरी‘, पढ़ने का अवसर मिला था। हमारे प्राध्यापक थे श्री महेन्द्र कुमार सरकार, जो संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे, परंतु हिन्दी नहीं जानते थे। दूसरे थे, पं. चारूदेव शास्त्री, जिन्हें उस जमाने में आधुनिक पाणिनी कहा जाता था। उन्होंने महात्मा गांधी पर संस्कृत में ‘गांधी चरितम्‘ काव्य की रचना की थी। इन दोनों गुरुओं की विशेषता यह थी कि वे कोर्स की पुस्तकें कभी भी पूरी नहीं पढ़ा पाते थे। कालिदास की एक पंक्ति की व्याख्या करते हुए अन्य संस्कृत कवियों की समानधर्मी पंक्तियों के चर्चा में तल्लीन हो जाते थे। कभी ही कोर्स की पुस्तक के एक-दो अध्याय ही पूरे हो पाते थे, परंतु उन्होंने जो संस्कृत एवं साहित्य के प्रति जो संस्कार दिये वे मेरे लिए आज भी अत्यंत मूल्यवान हैं। उन्हीं के कारण आज मैं विनयपूर्वक कह सकता हूँ कि मुझे संस्कृत अत्यंत सरल लगती है। और संस्कृत के ग्रंथ पढ़ते समय मुझे कोई कठिनाई नहीं होती। हिन्दी और अंग्रेजी तो स्कूल और कॉलेज के माध्यम से पढ़ी हैं। उर्दू अपने शौक़ के कारण। एक विचित्र स्थिति थी अंग्रेजों के शासन में हिन्दी और संस्कृत में डॉक्टरेट के लिए लोग लंदन और पेरिस जाते थे। मेरे कॉलेज के दिनों में ही डॉ. सूर्यकांत पेरिस से संस्कृत में डॉक्टरेट लेकर आए थे-अंग्रेजी के माध्यम से। 

मेरे और आपके जीवन में एक और साम्य है। मैं भी भले ही परोक्ष रूप से शिक्षा से जुड़ा हूँ। मैं पिछले 20 वर्षों से 

अधिक से डी.ए.वी. कॉलेज मैनेजिंग कमेटी का वरिष्ठ उप-

प्रधान हूँ जिसके अन्तर्गत लगभग 600 शिक्षण संस्थाएं पूरे भारतवर्ष में चल रही हैं। 450 पब्लिक स्कूल हैं। 65 डिग्री कॉलेज। इनके अतिरिक्त लॉ कॉलेज, आयुर्वेदिक कॉलेज, 3 टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, और अब 2 डेन्टल कॉलेज, और 2 अस्पताल भी। होशियारपुर स्थित विश्वैश्वरानंद वैदिक रिसर्च इंस्टीट्यूट भी डी.ए.वी. के ही कार्यकलाप का अंग है। पिछले पंद्रह वर्षों से मैं डी.ए.वी. के मासिक मुखपत्र ‘आर्यन हैरिटेज‘ का संपादन कर रहा हूँ। यह मेरे शौक का काम है और मेरी गुरु-दक्षिणा भी। ‘आर्यन हैरिटेज‘ के कुछ अंक आपको इस पत्र के साथ भिजवा रहा हूँ। आगे से यह पत्रिका नियमित आपको मिले, इसकी व्यवस्था भी कर दी है।

आपकी भेजी दोनों पुस्तकें ‘रचना प्रभात‘ और ‘शब्दों के बीच शब्द प्रभात‘ प्राप्त हुई थीं। उनके अधिकांश भाग पढ़ चुका हूँ। इन पुस्तकों के माध्यम से आपके व्यक्तित्व और 

कृतित्व से और गहरा परिचय हो पाया। पुस्तकें भेजने के लिए धन्यवाद। 

आप स्वस्थ रहें और इसी प्रकार साहित्य-साधना करते रहें, यही कामना है।

शुभकामनाओं सहित,

आपका


(विश्वनाथ)

पुनश्चः अपने पहले कविता-संग्रह ‘अन्तरा‘ की प्रति इस पत्र के साथ प्रेषित कर रहा हूँ। सुविधा से इसे देखिएगा।

अब एक ऐसी बात कह रहा हूँ जिसे शायद 

अनाधिकार चेष्टा कहा जाए। कविवर हरिवंशराय बच्चन जी से मेरी घनिष्ठता रही है। उनकी प्रायः सभी पुस्तकों का प्रकाशक भी हूँ। उनकी सहधर्मिनी तेजी जी से लाहौर से ही परिचय था, जब वे फतेहचंद कॉलेज फॉर वुमन में लेक्चरर थीं। एक संभ्रान्त सिख परिवार की बेटी ने कैसे कायस्थ परिवार में अपने को रचा-बसा लिया और बच्चन जी को सब चिंताओं से मुक्त करके उनको कविता लिखने के लिए सुविधा तथा आगे बढ़ने के लिए अपना पूरा सहयोग दिया। कुछ ठीक उसी ही तरह मुझे लगता है कि उनमें और आप में साम्य है। आप दोनों अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे हैं और हिन्दी में कविता की हैं। आप दोनों ने ही नाटकों के अनुवाद भी किए हैं। केम्ब्रिज से अंग्रेजी साहित्य में डॉक्टरेट करने के बाद भारत लौटने पर जब बच्चन जी ने ये कहा कि वे शेक्सपियर के नाटकों का हिन्दी अनुवाद करेंगे तो मैंने उन्हें कहा था कि जो समय आप अनुवाद में लगाएंगे, वही आप अपने मौलिक रचना-कार्य में दें तो आपके लिए अधिक सार्थक होगा। बच्चन जी ने तब एक मूल्यवान बात कही थी। उन्होंने कहा था, ‘मैंने अंग्रेजी साहित्य का वर्षों अनुशीलन किया है। शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद अभी तक मेरे मन के अनुकूल नहीं है। शेक्सपियर के साथ न्याय नहीं हुआ। अपने अनुवाद द्वारा एक ऋण चुकाना चाहता हूँ।‘ बच्चन जी ने ‘मैकबेथ‘, ‘हैमलेट‘ और ‘ओथेलो‘ के अनुवाद किये। ‘मैकबेथ‘ का तो मंचन भी तेजी जी ने ही किया और प्रमुख भूमिका भी उनकी ही थी। और एक छोटी-सी भूमिका अमिताभ जी ने भी की थी। उन दिनों वे दिल्ली के करोड़ीमल कॉलेज में पढ़ रहे थे। जवाहरलाल जी देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने इस नाटक का उद्घाटन किया था, साथ ही ये भी कहा था कि मैं केवल एक घंटा ही बैठ पाऊँगा, परंतु वे अंत तक लगभग दो घंटे बैठे रहे-नाटक के समाप्त होने तक। जैसे आप नाटकों से जुड़े हैं और आपकी सहधर्मिनी ने भी कंधे के साथ कंधा मिलाकर आपके इस अनुष्ठान में पूरा भाग लिया है और आपके जीवन को सम्बल और सार्थकता दी है, वैसा ही कुछ तेजी जी और बच्चन जी के जीवन में मैंने देखा था। आपने एक स्थान पर ये लिखा है कि अब आपकी 

सहधर्मिनी कहीं माँ की तरह आपकी देखभाल करती है। इस प्रसंग में मेरी एक छोटी-सी कविता है, संलग्न कर रहा हूँ। तेजी जी भी बच्चन जी के जीवन के पिछले दिनों में कुछ इसी तरह उनकी देखभाल करती थीं। नारी ममता और वात्सल्य की मूर्ति है। बच्चे बड़े हो जाते हैं तो वही ममता अपने पति पर उड़ेलती है। यह एक शाश्वत सत्य है।  -विश्वनाथ


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डॉ. राहुल, विकासपुरी, नयी दिल्ली, मो 9289440642

लेख

श्रीयुत् देवेन्द्र कुमार बहल और अभिनव इमरोज़ जैसा मैंने देखा इक्कीसवीं सदी की पत्रकारिता के क्षेत्र में देवेन्द्र कुमार बहल एक ऐसा नाम है जिसने अपनी अद्भुत  सम्पादन क्षमता से ‘‘अभिनव इमरोज़‘‘ मासिक पत्रिका का दायित्व  संभाला। यद्यपि यह कार्य बड़ी पित्तेमारी का है और कोई विरला ही कुशलतापूर्वक  दायित्व का सम्यक निर्वहन कर पाता है। सम्पादन की लम्बी परम्परा में पं. अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचन्द, बालमुकुन्द गुप्त, गणेश शंकर विद्यार्थी और इधर के नव सम्पादकों में कुछों ने ही अपने निर्भीक एवं निष्पक्ष  लेखन से अपनी पहचान कायम की। उनमें बहल जी का नाम विशेष उल्लेख्य है। विशेष इस अर्थ में कि बहुत कम व्यक्ति अपने व्यक्तित्व से समय-समाज को प्रभावित कर पाते हैं। ये गुण मैंने बहलजी में देखा। उनका स्वाभिमानी, निस्पृह व व्यक्तित्व दूसरों को प्रभावित ही नहीं करता उन्हें अपना भी उदात्त बना लेता है।

‘‘अभिनव इमरोज़‘‘ पत्रिका का प्रकाशन 2012 में शुरु हुआ। इससे पहले मैं बहल जी का नाम और उनकी साहित्यिक  रुचि के बारे में पंजाब के अपने साहित्यकार मित्र डॉ. रमेश सोबती से चंडीगढ में हुई एक भेंट में किसी चर्चा के दौरान  सुना था। बात आई-गई हो गयी। साल-डेढ साल बीत गए। अचानक एक दिन बहल जी का फोन आया, ‘आप राहुल जी बोल रहीं हैं?‘... ‘जी हाँ।‘

उधर से फिर मद्धिम स्वर सुनाई दिया, ‘मैं अभिनव  इमरोज़ पत्रिका का सम्पादक बहल बोल रहा हूँ।‘ इनके इतना कहते ही मेरे दिमाग में डॉ. सोबती की बात स्मरण हो आई। शायद वही बहल जी हैं, मैंने दुबारा फोन कर कन्फर्म करना चाहा कि वे स्वयं ही बोल पड़े, अपनी कोई रचना प्रकाशनार्थ भेज दीजिए।‘...‘अवश्य!‘

जल्दी ही आपसे आपके मायापुरी कार्यालय में मिलने आऊंगा, आपके दर्शन भी हो जाएंगे, और रचना भी दे दूंगा।‘

उन दिनों मैं भारतीय खाद्य निगम के मायापुरी कार्यालय में था। अतः मेरे लिए मिलना आसान था। सो, बहल जी के विरल व्यक्तित्व ने पहली भेंट में ही इतना प्रभावित किया कि वह मैत्रीपूर्ण व्यवहार आज तक यथावत् बना हुआ है। 

जनवरी 2021 में यह पत्रिका अपने गौरवपूर्ण प्रकाशन  के एक दशक पूरा कर 11वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। यह अनुमान कर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई। क्योंकि इस पत्रिका के अनेक अंकों में यथोचित परामर्श कभी-कभार बहल जी ले लेते थे और मैं मित्रवत् अपने निष्पक्ष मनोभावों से अवगत करा देना अपना नेक कर्तव्य और धर्म (भी) समझता था। इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं कि बहल जी के मन में सम्पादन को लेकर कोई दुविधा होती थी, बल्कि इसलिए कि वे कुछ साहित्यकारों पर ‘अभिनव इमरोज़‘ के विशेषांक निकालना चाहते थे उसे उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम कैसे बनाया जाय ताकि अंक अपना प्रतिमान कायम कर सके और एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन सके। और ऐसा ही हुआ, जब 11 जुलाई 2013 का ‘‘प्रेमचन्द‘‘ विशेषांक छपा जिसके अतिथि सम्पादक थे डॉ. कमल किशोर  गोयनका। देवेन्द्र बहल ने आलोच्य अंक में ‘अपनी ओर से‘ में लिखा, ‘साहित्य निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी का स्मरण करना यहां प्रासंगिक होगा- यह उनकी 150वी जयन्ती वर्ष भी है और वह प्रेमचन्द के प्रथम समीक्षक भी थे। प्रेमचन्द के माध्यम से जो तत्कालीन परिवेश का चित्रण हमारे सामने आता है, उसके लिए द्विवेदी जी का योगदान अविस्मरणीय कहा जाएगा। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और विस्तार के लिए जरूरी उनके विचार गौरतलब हैं। ‘‘मेरी राय में शब्द चाहे जिस भाषा के हों, यदि वे प्रचलित शब्द हैं तो उन्हें हिन्दी के शब्द-समूह के बाहर समझना भूल है।

उनके प्रयोग से हिन्दी को कोई हानि नहीं, प्रत्युत लाभ है। अरबी, फारसी के सैकड़ों शब्द ऐसे हैं जिनको अपढ़ आदमी तक बोलते हैं। उनका बहिष्कार किसी प्रकार संभव नहीं। दूसरी भाषाओं के शब्दों को ग्रहण कर लेने की शक्ति रखना ही सजीवता का लक्षण है।‘‘ (हिन्दी आलोचना का विकास- साहित्य नन्दिनी, पृष्ठ 41)

नियमित अंकों के साथ-क्रमशः विशेषांक सम्पादन भी अपनी अतिरिक्त अहमियत रखता है। ‘‘अभिनव इमरोज़‘‘ अंक 4, अप्रैल 2015 प्रेमचन्द साहित्य समग्रता के अनुरोध डॉ. कमल किशोर गोयनका के विश्रुत व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित था। 11 अक्टूबर 1938 में बुलन्द (उत्तर प्रदेश) में जन्मे डॉ. गोयनका प्रेमचन्द के अध्येता हैं। प्रतीकात्मक भाषा-बिम्ब में बहल जी ने विशेषांक के सम्पादकीय में जिस खूबी से अपने भावों की बारीक बुनावट की है, वह काबिलेगौर है,‘ जब इस अंक के लिए लखनऊ और देहरादून से विषय- सामग्री प्राप्त हुई तो मेरे मानसिक पटल पर एक बिम्ब उभरता कि यह महायज्ञ हो रहा है जिसमें डॉ. कमल किशोर गोयनका स्वयं ब्रह्मा हैं और यजमान भी। ऊध्र्वागमन अग्नि से ऊर्जा अर्जित करते हुए एकाग्रचित्त होकर मंत्रोच्चारण कर रहे हैं। इस अंक के सम्पादन से मैं गोयनका जी को एक साहित्य-ऋषि के रूप में देख सका। जिन्होंने अपने जीवन के पांच दशक प्रेमचन्द  की खोज को अर्पण कर दिए और उस खोज को साहित्य  के धरातल पर एक अतुल्य विद्वता का शोध-प्रकाश-स्तम्भ बनाकर खड़ा कर दिया।‘ निश्चय ही ये सम्पादकीय बहल जी के साहित्यिक विपुल अध्ययन-मनन-चिन्तन के साक्ष्य हैं। 

इसी प्रकार ‘दस्तावेज‘ पत्रिका के सम्पादक और साहित्य अकादमी, दिल्ली के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अक्षय व्यक्तित्व और अमर कृतित्व पर विशेषांक का सम्पादन/प्रकाशन, एवं हिन्दी-कहानी तथा ग़ज़ल पर प्रकाशित विशेषांक भी अपनी कालजयी महत्ता रखते हैं। जिनमें बहल जी की अजस्र निष्ठा, लगन, त्याग, समर्पण की भावना प्रज्ञा-प्रभा के प्रतीक हैं। वाकई ये साहित्य के प्रति एक समर्पित सम्पादक हैं। यही कारण है कि इन्हें सरकारी, साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थानों ने सम्मानित कर अपना और अपनी संस्था का मान बढ़ाया है क्योंकि कुछ विमल व्यक्तित्व होते हैं जिनके सम्मान से संस्थाएं स्वयं गौरवान्वित होती हैं। ये ऐसी ही एक विभूति हैं।

‘‘अभिनव इमरोज़‘‘ के नाम को लेकर किसी को भी भ्रम हो सकता है। दरअसल इमरोज़ साहब के नाम से सभी बखूबी परिचित होंगे। पंजाब कोकिला अमृता प्रीतम के महान साहित्य के संवर्धन और संचयन में इमरोज़ साहब का विशेष अवदान अविस्मरणीय है। बहल जी के कार्यालयी कक्ष में उक्त दोनों महान साहित्य सेवियों की टंगी तस्वीर उनकी लौकिक-अलौकिक प्रमाभिव्यक्तियों की एक नई दुनिया दर्शाती है। उनकी भूमिका विश्वस्तरीय है। इमरोज़ साहब अपने समय के बेजोड़ शायर थे। इनके प्रति अभिनव इमरोज़ के सम्पादक का साहित्य और समर्पण प्रेम इनकी आत्मीय लगाव का अद्वितीय दृष्टान्त है। संभवतः इमरोज़ साहब देवेन्द्र कुमार बहल के अभिन्न मित्र थे। एक मित्र का एक मित्र के प्रति ऐसा अटूट प्रेम कृष्ण-सुदामा की मार्मिक-मित्रता का प्रमाण पेश करता है... अभिनव इमरोज़!

‘‘साहित्य नन्दिनी‘‘ एक विशुद्ध समीक्षात्मक पत्रिका है। इस पत्रिका के प्रकाशन का विचार बहल जी के मन-मस्तिष्क में साहित्य के समाजशास्त्रीय विवेचन-विश्लेषण के दृष्टिगत आया। चर्चा की। समकालीन समय में एक ऐसी ही निष्पक्ष विचारपरक पत्रिका की जरूरत महसूस की जा रही थी क्योंकि जो समीक्षाएं इधर पत्र-पत्रिकाओं में लिखी या प्रकाशित की जा रहीं हैं, अधिकांश नीमहकीमी लगती हैं। आज जरूरत है सर्जनात्मक समीक्षा की जो समग्रता में प्रभावशाली और 

कृतिपरक हो। इस दृष्टिकोण से साहित्य नन्दिनी अपनी उजली पहचान बनाती है। जैसा कि मैंने देखा: बहल जी एक निस्पृह व्यक्तित्व के धनी सृजेता समाजशास्त्री विवेचक, गम्भीर चिन्तक और स्पष्टवादी वक्ता हैं। सत्य के प्रति आग्रह उनके व्यक्तित्व का गुण-वैशिष्ट्य है।

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डॉ. राहुल, विकासपुरी, नयी दिल्ली, मो 9289440642

व्यंग्य-विमर्श के वैचारिक विवेचन

हास्य तथा व्यंग्य दोनों का स्वतंत्र  अस्तित्व होते हुए भी इनमें परस्पर  सम्बन्ध है। संस्कृत काव्यशास्त्र में  हास्य का सैद्धांतिक पक्ष पर्याप्त  होते हुए भी व्यंग्य का विवेचन कम मिलता है। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि संस्कृत-साहित्य में व्यंग्य का नितांत अभाव है। पुराणों में व्यक्ति की शिथिलताओं और अपने युग की कुरीतियों पर पशु-पक्षी कथाओं पुराकथाओं तथा आख्यानों द्वारा सार्थक व्यंग्य किया गया है। शूद्रक का ‘मृच्छकटिकम्‘ तत्कालीन सामाजिक जीवन-परिवेश पर व्यंग्य है। इसी प्रकार दामोदर गुप्त के ‘कूट्टनीमत‘ को श्रृंगार-प्रधान व्यंग्य माना जाता है। इसके विपरीत अंग्रेजी साहित्य में व्यंग्य का स्थान महत्वपूर्ण है। अंग्रेजी में व्यंग्य की सुनिश्चित परम्परा भी मिलती है तथा उसका स्वतन्त्र अस्तित्व भी है। इसी कारण अंग्रेजी के व्यंग्यकारों तथा आलोचकों ने व्यंग्य का विशद विवेचन किया है। इसीलिए व्यंग्य का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए पश्चिम के व्यंग्यकारों तथा आलोचकों के मतों से अवगत होना अपेक्षित है।

पाश्चात्य साहित्य में आधुनिक व्यंग्य (सैटायर) का आदिम स्वरूप प्रायः अस्पष्ट, अपूर्ण और अव्यवस्थित ही रहा है। ऐसी कोई भी वस्तु पैनी या कठोर हो,उसे व्यंग्य कहा जाता रहा। अतः पोर ने स्विफ्ट की टीका करते हुए कहा है,"You call your Satires Labels I Would call my Satier Epistes." इसी प्रकार इसका प्रयोग हास्य-व्यंग्य या नकल, वक्रोक्तिपूर्ण कथन या परिहास (ridicule), कटाक्ष (सरकाज्म), उपहास (रेडिक्यूल) कटूक्ति (सिनिसिज्म), वाग्दंश (सारडोनिक) और विशुद्ध हास्य (काॅमीडी) के साथ भी किया जाता है। उपर्युक्त तथ्यांकन के आधार पर कहा जा सकता है कि व्यंग्य अपने आरंभिक काल में बड़ा भ्रामक तथा सम्मिश्रित रहा। उसका उपयोग पाश्चात्य साहित्यकारों के द्वारा ज्यों ज्यों अधिक रूप में होता गया त्यों-त्यों उसका महत्व भी बढ़ता गया तथा उसके स्वरूप में परिवर्तन एवं परिमार्जन भी हुआ।

व्यंग्य की उत्पत्तिपरक अर्थ  व्यंग्य बहुरूपी ही नहीं, बहुरंगी भी है। किन्तु सामान्यतः व्यंग्य और व्यंग में कोई विशेष अन्तर नहीं है। दोनों शब्दों के लिए ‘सैटायर‘ का प्रयोग हिन्दी साहित्य में समान रूप से किया जाता है। सैटायर शब्द  का मूल लाटिरा 'Satira‘ शब्द से माना गया है। बाद में इसका रूप Sutura हो गया। जिसका अभिप्राय होता है सम्मिश्रण। जुबेनल ने इसके लिए Olla podrida या miss & mass और Farrago शब्दों के पंचमेल या खिचड़ी  शब्द प्रयोग किए हैं। कालांतर में इसका सम्बन्ध सैटायर (Satire) से सम्बद्ध कर दिया गया। कुछ काल तक यह ग्रीक शब्द satyros और Satura के बीच भ्रम पैदा करता रहा।यही बाद में Satyrels विकसित होकर अंग्रेजी में 'Satire' के रूप में प्रचलित हो गया जिसे आज हिन्दी में व्यंग्य कहते हैं।

कुछ विद्वान इसकी उत्पत्ति का मूल ग्रीक शब्द 'Satyros' से मानते हैं। इसका अर्थ होता है यूनानी वनदेवता, जिसका आधा शरीर मनुष्य का और आधा शरीर बकरे का होता है। इसीलिए जुलियस और हेसियरसादि जैसे यनानी विद्वान स्वयं को इसका जनक मानते हैं। दूसरी ओर रिगलशियस और कैसाबन जैसे रोमन विद्वान भी अपने को इसका जन्मदाता कहते हैं। उनके मतानुसार, इसका नामकरण 'Satyros' के  आधार पर हुआ है। डॉ. बी. डी. एन. कहार लिखा है, व्यंग्य का जन्म प्रायः दृश्य काव्य से हुआ है। प्रारंभिक काल में  रंगरलियां, हंसी, दिल्लगी आदि जो पद्य में होने लगी थी, उन्हें नाटकों में प्रस्तुत किया जाता था। लियोऐण्ड्रानिक्स ने सर्वप्रथम इसको शुद्ध और शिष्ट बनाकर दृश्य काव्य का रूप देकर नाटक के अन्तर्गत रखा। इसी प्रकार इनायत ने सुन्दर पदों में इसका प्रथम बार प्रयोग किया। इसके बाद इस सम्प्रदाय को बढ़ाने वाले लाइसेंस, जोबनिल और पसियस हैं।‘ अस्तु। एक सशक्त, स्वतंत्र एवं सुनिश्चित साहित्यिक विधा के रूप में व्यंग्य-साहित्य का विकास और उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा  की सुदीर्घ धारा हमें पाश्चात्य साहित्य में मिलने के कारण व्यंग्य को प्रायः पाश्चात्य-साहित्य की देन माना गया है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि यदि व्यंग्य पश्चिम साहित्य की देन है तो हमारे वैदिक वांड्मय में वर्णित व्यंग्य का तात्पर्य क्या है? यह वाकई बहुत गम्भीर विषय है। इसका सही समाधान पाने के लिए यह जानना आवश्यक हो जाता है कि आज व्यंग्य से क्या तात्पर्य है और उसका क्या आशय भारतीय काव्याचार्यो द्वारा लिया गया है? क्या वह चर्चित व्यंग्य से इतर तो नहीं? हिन्दी में जिसे व्यंग्य कहते हैं, अंग्रेजी में सैटायर, उर्दू में तंजानिया अथवा ‘हजो‘ गुजराती भाषा में कटाक्ष, मराठी में कहते हैं। कुछ इलाकों में इसे वक्रोक्ति एवं भोजपुरी में गड़बड़झाला भी कहते हैं। कहीं-कहीं ‘मजाक‘ भी प्रयुक्त किया गया है। किन्तु हमारी मजबूरी है की हम हर चीज को पाश्चात्य-साहित्य से जोड़कर देखते हैं, उसकी देन स्वीकारते हैं। अगर संदर्भित पश्चिमी साहित्यकारों की जन्मकुण्डली खंगालें तो वे वैदिक साहित्य से पीछे नहीं जाते। ऐसी स्थिति में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि व्यंग्य पौर्वात्य-साहित्य की महान उपलब्धि है। इसे ही पश्चिमी विद्वानों ने तरह-तरह से संज्ञायित कर अपनी मुहर लगा दी। कहीं रोमन से, कहीं ग्रीक से उत्पत्ति की प्रासंगिक चर्चा होने लगी। व्यंग्यकार का कौशल इसमें है कि वह इनका प्रयोग किस तरह से करता है।

व्यंग्य के मूल तत्व 

व्यंग्य का अभी तक कोई सुनिश्चित तथा परिनिष्ठित स्वरूप नहीं बना है। साहित्य के प्रसंग में व्यंग्य भाषाई आक्रमण भी कला है।

प्रत्येक साहित्यकार ने व्यंग्य का निजी ढंग से प्रयोग किया है और उसकी रचनाओं में उसकी निजी विशिष्टताएं उपलब्ध होती है। परिणामस्वरूप व्यंग्य-रचनाओं में एकरूपता नहीं मिलता। इसके अभाव में हर व्यंग्य-लेखक अपने व्यंग्य को उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर यहाँ तक कि उत्कृष्टतम घोषित करने/कराने का उपक्रम करता है। इसलिए जिन तत्वों के कारण व्यंग्य स्वरूप धारण करता है, उनमें भी विभिन्नता का होना स्वाभाविक है। परन्तु प्रत्येक व्यंग्य रचना में कुछ ऐसे मूल तत्व विद्यमान होते हैं जिन्हें इस रूप में व्यक्त कर सकते हैं- 1. आलोचना, 2. वीभत्सता या हास्य 3. सुधार।

आलोचना

व्यंग्य आवश्यक रूप से सामाजिक प्रकृति का साहित्य है पर व्यंग्यकार की आलोचना प्रायः खंडात्मक होती है। 

सीधी और स्पष्ट खंडात्मक आलोचना लांछन या दोषारोपण के समान होती है। किन्तु दंडात्मक आलोचना द्वारा यदि कलात्मक प्रहार किया गया है तो उसमें व्यंग्य को आंका जा सकता है। आलोचना जितनी विश्वसनीय तथा प्रहार जितना प्रबल होगा, व्यंग्य का प्रभाव उतना ही बढ़ेगा। इसीलिए व्यंग्य-गीत के लिए आवश्यक है कि वह आलोचनात्मक प्रहार इस तरह करे कि दुर्बलताओं, कुकर्मों अथवा अनाचारों का उद्धार हो सके। आलोचना जितनी तथ्यपरक, सत्यनिष्ठ या तर्कसंगत  होगी,उतनी सुगमता से आलोचक-व्यंग्यकार पाठक को अपने पक्ष में कर सकेगा।

केवल सत्य या तथ्य को सम्मुख रखना ही पर्याप्त- व्यंग्य नहीं है, व्यंग्यकार जितने अधिक आवेग, प्रवाह तथा आत्मविश्वास के साथ सत्य का उद्घाटन याकि आलोचनात्मक तर्क रखेगा उतना ही अपने पक्ष को सबल बना सकेगा। इसी में सुधी व्यंग्यकार की सफलता निहित होती है। परन्तु प्रायः पाया गया है नवधे व्यंग्यकारों के अलावा कुछ बड़े व्यंग्यकार भी इस फोबिया के शिकार हुए हैं कि वे उम्दा व्यंग्य लिखने के चक्कर में समकालीन स्थिति, परिस्थिति या तथ्य-सत्य की आलोचना में सुगमता खो बैठे, परिणामतः भाषा-प्रवाह बाधित हो गयी। मसलन सिर्फ आलोचना करना ही व्यंग्य नहीं है। तथ्यों-सत्यों के उद्घाटन के व्यंग्यात्मक परिमार्जित भाषाई मार भी आवश्यक है।

आलोचना तभी संभव होती है जब आलोचक स्वयं को आलोच्य से श्रेष्ठ समझे। यानी व्यंग्यकार जितना अधिक स्वयं को आलोच्य से श्रेष्ठ समझेगा उसकी आलोचना उतनी अधिक कटु-प्रहारात्मक और उपहासात्मक होगी। इसी प्रकार की आलोचना व्यंग्य रचना के लिए सहायक सिद्ध होती है।  प्रहार की कुशलता के सम्बन्ध में किसी व्यंग्यकार का कथन है,‘ व्यंग्य का पहरा उस चमकते तेज उस्तरे की तरह होना चाहिए जिसके स्पर्श मात्र से घाव भी हो जाय और पता भी न चले। भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट, हरिशंकर परसाई और गोपालप्रसाद व्यास के कुछ व्यंग्य इसी कोटि के हैं।

वीभत्सता या हास्य  

हास्य को भी प्रायः व्यंग्य का अनिवार्य अंग मान लिया गया है। वस्तुतः व्यंग्यकार हास्य के सहयोग से खंडात्मक आलोचना की कटुता को कम करता है। आलोचना कुनैन की  गोली की-सी कड़वी नहीं होनी चाहिए। अगर वह कहीं ऐसा है तो हास्य चीनी की लेप का काम करता है। क्योंकि चीनी की मिठास के सास कड़वी गोली भी आसानी से निगली जा सकती है। इसी कारण हास्य के साथ कटु आलोचनाएं भी सुनी जा सकती हैं। यकीनन हास्य के द्वारा व्यंग्य की रिक्तता कम हो जाती है। हास्य के बिना खंडात्मक आलोचना आक्षेप मात्र या सुधार की भावना उपदेश मात्र बनकर रह जाएगी। यद्यपि प्रेम जनमेजय व्यंग्य के लिए हास्य की बैसाखी को आवश्यक नहीं मानते। उन्होंने लिखा है, ‘व्यंग्य सुरक्षित मस्तिष्क की विधा है। व्यंग्य लेखन अन्य विधाओं से भिन्न प्रक्रिया की मांग करता है। व्यंग्य आपको बेचैन भी अधिक करता है। इसके लिए अलग लेखकीय दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। व्यंग्यकार अपने कथ्य के लिए हार्दिक सार-सार गहि लेने की शैली में  केवल विसंगति पर अपनी दृष्टि रखता है। वह विसंगतियों के कारण विक्षिप्त होता है और उन पर प्रहार करता है।... व्यंग्य-लेखन के भी अनिवार्य तत्व हैं। जैसी उसकी सोच, दृष्टि और चिन्तन। (दैनिक जागरण, 10 सितम्बर 2017)

आज व्यंग्य के नाम पर जो साहित्य परोसा जा रहा है,उसमें फूहड़ता ज्यादा है। ‘व्यंग्य में हास्य को लेकर लोगों की अलग-अलग सोच के स्कूल हैं। कुछ व्यंग्य के नाम पर हास्य परोसते हैं और अधिसंख्य फूहड़ हास्य।‘ (वही) हास्य के मूल में सदाशयता और मैत्री की भावना होती है जबकि व्यंग्य तनाव को सघन और तीव्र करके प्रतिशोध की इच्छा में बदल देता है।

इसे व्यंग्य की विडम्बना कहें या नियति कि व्यंग्य अपने ढंग-ढर्रे से उतरता जा रहा है। शुद्ध हास्य तथा व्यंग्य के हास्य में अन्तर होता है। और वह अन्तर यह है कि जहां शुद्ध हास्य में असंगति, अपकर्ष, अथवा खटकने वाली असम्बद्ध केवल मनोरंजन के उद्देश्य से प्रकट की जाती है, वहां व्यंग्यकार उनकी अभिव्यक्ति द्वारा सुधार की ओर संकेत कर आलोचनात्मक प्रहार भी करता है। ‘हास्य और व्यंग्य के बीच की स्थितियों में मूलभूत अन्तर है। हास्य रचनाओं का मूल उद्देश्य केवल पाठक को हंसाना, गुदगुदाया भर होता है जब कि व्यंग्य पाठक के मर्म स्थल पर चोट करता है और अपने पैनापन का अहसास कराता है। चुटीली शैली में अव्यवस्था के जिस्म में नश्तर चुभाना ही व्यंग्य का असली कार्य होता है। जहां हास्य रचना अभिधान प्रधान रचना है, वहां व्यंग्य 

लाक्षणिक है। शैलीगत चातुर्य से पाठकों को तिलमिलाने तक की हद पर मजबूर करती रचना व्यंग्य रचना है।‘ (राष्ट्रीय सहारा, 26 नवम्बर 1995) हास्य की आड़ में व्यंग्यकार कटु आलोचना भी करता है तथा सन्मार्ग (भी) दिखाता है। यहां ध्यान देने वाली विशेष बात ये है कि यह हास्य में निहित सहानुभूति की भावना प्रबल हो जाये तो व्यंग्य की प्रभावोत्पादकता कम हो जाएगी और व्यंग्य अपने उद्देश्य में सफल नहीं होगा। इस कारण व्यंग्यकार यदि हास्य तथा आलोचनात्मक प्रहार में संतुलन रखने में सफल हो तभी उत्कृष्ट व्यंग्य की रचना संभव है।

सुधार

व्यंग्य रचना में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सुधार की भावना अवश्य रहती है। ‘जब व्यंग्यकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रकार से सुधार किए बिना व्यक्ति अथवा समाज की दुर्बलताओं या अनाचार को नष्ट करने के उद्देश्य से प्रहार करता है तब भी उसकी नाश करने की मूलभूत प्रेरणा में सुधार की भावना अवश्य निहित रहती है। इस प्रकार व्यंग्यकार की ध्वंसात्मकता में भी सृजनात्मकता की क्रिया निहित होती है। यदि व्यंग्यकार समाज का नेता अथवा किसी आन्दोलन का संचालक रह चुका है तो उसकी व्यंग्य रचनाओं में सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, राष्ट्रीय, धार्मिक, सुधार करने की क्षमता अधिक रहती है। जिस व्यंग्यकार का आदर्श जन समुदाय  से जितना अधिक सम्बद्ध या स्वीकृत होगा उसकी व्यंग्य रचनाओं में उतनी ही सुधार करने की शक्ति होगी। इस प्रकार  पूर्णतया सुधार न होते हुए भी व्यंग्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा जीवन, समाज में स्वस्थ मूल्यों की स्थापना में सहयोग देता है। कहें कि, आलोचना, हास्य और सुधार ये तीनों तत्व  प्रत्येक व्यंग्य रचना में समान रूप से नहीं मिलते फिर भी किसी एक तत्व की प्रधानता तथा अन्य दो की गौण मात्रा का होना स्वाभाविक है।

हिन्दी साहित्य में व्यंग्य की परिपाटी लम्बे समय से चली आ रही है। वैदिक, पौराणिक और मध्यकाल को छोड़कर अगर आधुनिक काल पर नजर डालें तो एक लम्बी फेहरिश्त दिखाई देती है। कबीर के लट्ठमार व्यंग्य-वार के पश्चात् खड़ीबोली के विकास के प्रथम चरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर अब तक की अवधि में हिन्दी व्यंग्य ने कई सोपान तय किए हैं। यानी हिन्दी व्यंग्य इस बीच कई मोड़ से गुजरा है, इसके क्षेत्र में समय≤ पर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। इसके बावजूद बहुत अरसे तक व्यंग्य को गम्भीरता से लेने में लोग हिचकते रहे और व्यंग्य को अन्य विधाओं की अपेक्षा दोयम दर्जे का समझने की प्रवृत्ति भी तथाकथित आलोचकों में रही। 

हिन्दी साहित्य में व्यंग्य की सही शुरुआत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समय में ही हो गयी थी। सन् 1873 में प्रकाशित प्रहसन ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति‘ उनकी पहली व्यंग्य  रचना मानी जा सकती है। जब कि कुछ आलोचकों की दृष्टि में 1880 में प्रकाशित ‘भारत दुर्दशा‘ और कुछ की दृष्टि में 1881 में प्रकाशित ‘अंधेर नगरी चैपट राजा‘ पहली व्यंग्य-प्रधान पुस्तक मानी गयी है। उनकी एक अन्य रचना ‘स्वर्ग में विचार सभा का अधिवेशन‘ भी एक चुटकुला व्यंग्य है। मेरा मानना है की वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति की अपेक्षा ‘भारत दुर्दशा‘अधिक सशक्त कृति है। इसके व्यंग्यों में अधिक गहराई तीखा व्यंग्यवार है। सिर्फ किसी रचना का भाव-पक्ष ही ऐतिहासिक नींव-पत्थर बनने के काफी नहीं होता, समग्रता में  उसका विपुल कथ्य,भाव, एवं व्यापक प्रभाव पक्ष का होना लाजिमी है। इस दृष्टि से ‘भारत दुर्दशा‘ पुस्तक अपनी पुख्ता पहचान रखती है।

भारतेंदु युगीन साहित्यकारों में पं बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र, रामचरण गोस्वामी महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। भट्ट जी ने जहाँ आंख, नाक, कान जैसे साधारण विषयों पर व्यंग्य लिखे, वहीं ‘चली सो चली‘ उनकी श्रेष्ठ व्यंग्य रचना है। उनकी तुलना में पं प्रताप नारायण मिश्र के व्यंग्य अधिक असरदार हैं। लेकिन पांडित्य प्रदर्शन और बाल की खाल निकालने की प्रवृत्ति के कारण उनके व्यंग्य इतिहास की धरोहर बनकर रह गये। बावजूद इसके उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उस युग के अन्य महत्वपूर्ण साहित्यकारों में बद्रीनारायण ‘प्रेमधन‘ बालमुकुन्द गुप्त का नाम विशेष उल्लेख्य है। प्रेमधन ने भाषा और शब्द प्रयोग के द्वारा व्यंग्य उत्पन्न करने में माहिर थे। गुप्त जी ने अपनी पुस्तक ‘शिव शम्भू के चिट्ठे‘ रचना में व्यंग्य की सशक्तता का पूर्ण अहसास कराया है। 

भारतेंदु युग का अगला चरण द्विवेदी युग है। महावीर प्रसाद द्विवेदी उस युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार थे। आधुनिक  हिन्दी गद्य के जनक के रूप में विख्यात द्विवेदी जी का महत्व सर्वविदित है। ‘दंडदेव का आत्मनिवेद‘ एक ऐसा सशक्त  निबन्ध है जिसमें स्वार्थपूर्ति के लिए बल प्रयोग करने, लाठी को आजीविका बनाने और दंड को अनुशासन का मूलमंत्र  मानने वाले शक्तिजीवियों पर अच्छा करारा व्यंग्य किया गया है। धर्म के प्रति अत्यन्त उदार गुलेरी जी के निबन्धों में भी अनेक स्थानों पर रूढ़िवादिता तीव्र विरोध देखने को मिलता है। इसके लिए उन्होंने भी व्यंग्य का सहारा लिया है। शिव पूजन सहाय की रचनाओं में भी व्यंग्य का हास्य संवेदित रूप आकर्षक बन पड़ा है। तदनन्तर, आचार्य रामचंद्र शुक्ल युग में बाबू गुलाब राय का कठुवा क्लब‘ तथा ‘मेरी असफलताएं‘ आदि रचनाएं प्रकाशित हुईं जिनमें व्यंग्य का सफल निर्वाह  हुआ है। हरिशंकर शर्मा यों तो उस युग के हास्य लेखकों में  माने जाते हैं किन्तु उनके निबन्धों में हास्य की गुदगुदी के बीच कहीं-कहीं व्यंग्य की हल्की-सी प्रदीप्त रेखा उन्हें अर्थवत्ता दे जाती है। पं. माखनलाल चतुर्वेदी के व्यंग्यात्मक निबन्ध प्राप्त होते हैं। सियाराम शरण गुप्त, वियोगी हरि, बेढब बनारसी, जे पी श्रीवास्तव, बक्शी जी की रचनाओं में व्यंग्य  की धार और मार गौरतलब है। सूर्यकान्त त्रिपाठी  निराला के औपन्यासिक रेखाचित्रों बिल्लेसुर बकरिहा, चतुरी चमार, कुल्ली भाट, में सामाजिक विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया गया है। इनमें ‘बिल्लेसुर बकरिहा‘ उनकी व्यंग्य प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रमाण है। निराला के बाद छिटपुट कुछ व्यंग्य रचनाएँ मिलती हैं। उनके व्यंग्यों में उनके व्यक्तित्व की दबंगई है। राधाकृष्ण दास का ‘सनसनाते सपने‘ हिन्दी के सर्वप्रथम व्यंग्य उपन्यास के रूप में सामने आया। इसमें राधाकृष्ण दास ने समीर नामक कवि पात्र के माध्यम से फैंटेसी द्वारा व्यंग्य की सृष्टि की है। इसके काफी समय के पश्चात केशवचन्द्र वर्मा का ‘मोहब्बत‘ और दाढ़ी-मूछ उपन्यास भी व्यंग्य के आरंभिक चरण में अपनी प्रयोगधर्मिता से अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। इसी प्रकार अज्ञेय और नागार्जुन के व्यंग्य में जो जमीन-आसमान का अन्तर है वह सम्बद्ध वर्ग-दृष्टियों का अन्तर है।

समकालीन व्यंग्य को समृद्ध बनाने में मात्र अंगुलियों पर गिने जाने योग्य कुल जमा चार व्यंग्यकारों.. हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल और रवीन्द्रनाथ त्यागी का विशेष  स्थान है। इनमें किसको बड़ा माना जाए यह निर्णय करना अति जटिल है। यूँ तो के. पी .सक्सेना ने भी निरन्तर सशक्त व्यंग्य लिखते रहे हैं।

रोचक हास्य-व्यंग्य लिखने में गोपाल प्रसाद व्यास ने भी अपनी पुख्ता पहचान कायम की है। लेकिन समसामयिक दृष्टि से हिन्दी-गद्य में व्यंग्य लेखन का सबसे बड़ा श्रेय हरिशंकर परसाई को जाता है। व्यंग्य को एक गम्भीर विधा के रूप मे पहचान कायम कराने में सर्वाधिक योगदान परसाई जी का रहा है। ‘भोलाराम का जीव‘ जैसी मानक रचना प्रबुद्ध पाठकों और आलोचकों ने विशेष रूप से स्वागत किया है। यह उनकी कालजयी व्यंग्य रचना है। परसाई के बाद शरद जोशी की व्यंग्य रचनाएँ वर्षों तक पाठकों की जुबान पर रहीं। श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे। पर  व्यंग्य- साहित्य में जितना मान-सम्मान परसाई और जोशी को मिला कदाचित उसका आधा अंश भी शुक्ल जी को नहीं मिल सका। ‘‘राग दरबारी‘‘ उपन्यास ने उन्हें ब्याज रूप में वह सबकुछ दिया जिसके वे वास्तविक हकदार रहे। रवीन्द्रनाथ त्यागी के व्यंग्य ब्याजोक्ति अथवा विदग्ध द्वारा परोक्ष रूप से चोट करते हैं। 

इधर के बहुचर्चित व्यंग्यकारों में मध्य प्रदेश के लतीफ घोघी और शंकर पुणताम्बेकर की व्यंग्य लेखन में बड़ी गहरी पकड़ है जिसकी चर्चा सर्वत्र हुई है। लक्ष्मीकान्त वैष्णव के व्यंग्यों में शिल्पगत वैशिष्ट्य अधिक दिखता है। ‘बागपत के खरबूजे‘ डाॅ. हरीश नवल का बहुचर्चित व्यंग्य संग्रह है। इनके अतिरिक्त समकालीन व्यंग्य- लेखन में कई प्रतिष्ठित चर्चित- अचर्चित व्यंग्यकार भी सक्रिय हैं जिनमें रौशन सुरीरवाला,पूरन सरमा, डाॅ. बालेन्दुशेखर तिवारी, सुरेशकान्त,उर्मिलेश,डॉ. गौरीशंकर राजहंश, डॉ. शेरजंग गर्ग, विप्रम, ओमप्रकाश कश्यप, वेदप्रकाश भारद्वाज, अश्विनी कुमार, डॉ. नवीनचन्द लोहनी जगदीश कश्यप और सुभाष चन्दर आदि की व्यंग्य  रचनाओं में हास्य, उपहास, परिहास के बारीक पुट हैं। इनके अलावा लेखन की इस भीड़ में कुछ और स्वयं-भू व्यंग्य लेखक हो सकते हैं जिनके नाम स्मृति में नहीं हैं जो भाषा को तोड़-मरोड़कर या अभद्र भाषाई इस्तेमाल से व्यंग्य को 

धार दे रहे हैं। ऐसे व्यंग्य व्यंग्य की कसौटी पर रांगा की तरह अपनी चमक पैदा नहीं कर पा रहे हैं, पर रगड़ देने की हर कोशिश जारी है। प्राच्य भारतीय काव्यशास्त्र में व्यंग्य के शास्त्रीय चिन्तन का अभाव होने के बावजूद व्यंग्य-विमर्श का कपाट खुला हुआ है। व्यंग्य में वाणी-विधान की विविध शैली रूपों को देखकर आश्वस्त जरूर हुआ जा सकता हैउसमें व्यंग्य-विमर्श की दृष्टि विद्यमान है। परन्तु चिन्त्य यह है कि व्यंग्य को एक मजबूत आधार मिल जाने के बावजूद हिन्दी- साहित्य में उसकी विधागत पृथक पहचान नहीं बन सकी है क्योंकि विडंबना, वंचना, विसंगति और आरोप आदि के अर्थ में व्यंग्य का असली धर्म-अर्म संकुचित हो गया है। अनौचित्य-अनाचार ज्यों-ज्यों बढ़ता जाएगा, हृासशील और प्रगतीशील शक्तियों का संघर्ष और राजनीतिक दुष्कर्ष जैसे-जैसे तेज होता जाएगा, वैसे-वैसे ग्यंग्य की धार तीव्र होती जाएगी और हास्य गायब हो जाएगा- इधर अधिकांश व्यंग्य रचनाएं इसकी साक्षी हैं।



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श्री आनंद विजय चिंचालकर, पुणे, मो. 9403625144

कहानी

आत्महत्या की राह पर

श्री आनन्द विजय चिंचालकर का अभिनव इमरोज़ में पहली कहानी मैं एक बार खुदकुशी करने के लिए गया था। मन अशांत था। फिर भी उस अवस्था में मैंने खुदकुशी करने की जगह ढूँढ निकाली। मन भले ही बहका हुआ था। परंतु उस जगह को ढूँढ निकालने का होश उसमें था। परंतु मैं खुदकुशी नहीं कर सका। आज भी जब मुझे वह प्रसंग याद आता है, तब मैं उस घटना पर विश्वास नहीं कर सकता। मेरे विचारों की गति रुक जाती है। उस जगह पर मेरी जिस व्यक्ति से मुलाकात हुई, वह इनसान था या कोई ‘पिशाच्च‘ था, इस बात की गुत्थी नहीं सुलझती! मैं सचमुच ही वहाँ कभी गया था या नहीं, इस बात को लेकर मन में भ्रम पैदा होता है! उस प्रसंग की याद से मैं अभिभूत हो जाता हूँ। वहाँ का माहौल, गहरा अंधःकार, वह नुकीली चोटी, उस चोटी के पास की गहरी खाई, माऊथ ऑर्गन का डरावना स्वर और वह अजीब व्यक्ति इन सभी बातों का खौफ अभी भी मेरे दिल पर सवार है।

खुदकुशी करने के लिए जिस जगह को मैंने चुना था, वह एक ऊँची चोटी थी। उस चोटी के पास ही एक गहरी खाई थी। इतनी गहरी कि देखते ही चक्कर आ जाए! इसी वजह से वह जगह हमारे गाँव का भूषण बन गई थी। उस ऊँची चोटी और गहरी खाई को देखने के लिए आस-पास के लोग वहाँ आ जाते, उसी प्रकार कुछ लोग खुदकुशी करने के लिए भी वहीं पर आ जाते थे। किसी के जानबूझकर खुदकुशी कर लेने पर भी लोगों को लगता कि वह पैर फिसल जाने की वजह से गिर पड़ा है। इस दृष्टि से वह जगह खुदकुशी करने के लिए अच्छी जगह थी! मैंने भी वहीं जगह तय की थी।

गहरा अंधेरा था। रात के साढ़े नौ-दस बज रहे थे। लोगों के चले जाने से वह जगह अब खाली हो गई होगी, इस विश्वास से मैं वहाँ पर चला गया। मैंने जो जगह तय की थी वह वहीं जगह है, ऐसा विश्वास हो जाने पर मैं कुछ क्षण वहीं पर खड़ा रह गया। और बाद में जी जान से उस चोटी के किनारे की तरफ दौड़ने लगा। मानो खुदकुशी करने के विचार से दूर हो जाने से पहले ही मुझे मेरे शरीर को उस खाई में फेंक देना था। मैं चोटी के बिलकुल किनारे पर पहुँच गया। और तभी किसी ने गर्दन को कस के पकड़कर मुझे पीछे खींच लिया।

मुझे गुस्सा आ गया। बिल्कुल अंतिम क्षण में मेरे प्रति प्रेम क्यों जग गया? जिस संसार को एक आदमी के जीवनयापन की क्या व्यवस्था की जाए यह समझ में नहीं आता, उस संसार को, उस आदमी को ‘तुम मरो मत‘ कहने का क्या अधिकार है?- मेरे मन में यही विचार मँडरा रहा था।

“नहीं-नहीं! मुझे मत रोकना। मैं मरना चाहता हूँ। मैं मरना चाहता हूँ। मेरे पास जीने लायक कुछ भी नहीं है। मैं जोर से चिल्लाया। उस पर किसी ने गंभीर आवाज में कहा,

“भले आदमी, तुम्हें मरना है तो मर जाओ। जी लो या मर जाओ, मैं कौन होता हूँ तुम्हें बतानेवाला?‘‘ 

मैंने खीझकर पूछा, “तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है?” 

उस पर उसने शांति से उत्तर दिया, “मरने के लिए निकले हुए आदमी को नाम से क्या मतलब है? मैं जो कोई भी हूँ। दो ही मिनट बाद तुम इस विशाल खाई में समा जाओगे। ऐसे में तुम मेरा नाम जानकर क्या करोगे?‘‘

हैरान होकर मैंने पूछा, “आखिर तुम चाहते क्या हो?‘‘

मेरी कमीज की बांह पर से हाथ फेरते हुए वह बोला, तुमने बहुत सही प्रश्न पूछ लिया। तुम्हारी पहनी हुई कमीज रेशम की लगती है! उसकी चिकनाहट हाथ को महसूस हो रही है!‘‘

मैंने बदमिज़ाज होकर पूछा, “तुम्हें उससे क्या करना है?‘‘ 

निर्विकार होकर उसने जवाब दिया, “तुम भी अब इसका क्या करोगे? तुम तो अभी मर ही जाओगे ना? उस चोटी पर से कूद पड़ने के बाद ठोकरें खाते-खाते तुम उस खाई में गिर जाओगे। तुम्हारी यह कीमती कमीज फट जाएगी। इसलिए यह कमीज मुझे निकालकर दो और फिर आराम से कूद पड़ो! मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा ।‘‘

“यह कमीज तुम पहनोगे?‘‘ मन की अस्वस्थता को छिपाते हुए मैंने पूछा।

“नहीं! नहीं! मैं ठहरा गरीब। मैं रेशम की कमीज लेकर क्या करूँगा। मुझे अपनी फटी-पुरानी बनियान ही ठीक है। मेरे बच्चों के लिए दो-तीन रुपये मिल जाएँगे।‘‘

“तुम्हारे बच्चे हैं?‘‘ 

“नहीं होने चाहिए?‘‘ 

“अपने बच्चों को छोड़कर इतनी रात गए तुम यहाँ पर क्या कर रहे हो?‘‘

‘‘खुदकुशी करने निकले लोगों से चीज-वस्तुएँ माँग लेने के लिए यहाँ आया हूँ।‘‘ उसने रूखेपन से जवाब दिया।

“नहीं, नहीं! मेरा विश्वास नहीं होता इस बात पर।‘‘

“अरे भाई, इस संसार में बहुत-सी बातें हमें सच नहीं लगतीं। अगर पहले कभी तुम्हें किसी ने कहा होता कि तुम आगे चलकर खुदकुशी करनेवाले हो तो वह बात तुम्हें सच लगती? वह सब जाने दो! मुझे कमीज निकालके दे रहे हो ना?‘‘

मैं खीझ गया। मैं खुदकुशी करने जा रहा हूँ और यह है कि बेशरम होकर मुझे रोककर मेरी चीज-वस्तुएँ माँग रहा है। कैसा आदमी है यह? उस मनोवस्था में भी मुझे एक क्षण लगा कि अपने आप को नीचे फेंकने की अपेक्षा इस आदमी को ही फेंक देना चाहिए। उससे छुटकारा पाने के लिए मैंने कहा-

“वाह भाई! मैं नंगे बदन ही मर जाऊँ क्या?‘‘

परंतु वह तो और भी उस्ताद निकला। वह बोला, “भाई मेरे, जब तू खुदकुशी कर लेगा, तुम्हारी लाश मिल जाने पर पुलिस उसे फाड़ के देखेगी। यह बात तुम्हें पता चलेगी? जन्म लेते वक्त क्या तुमने कपड़े पहन रखे थे?‘‘

‘मेरी देह फाड़ दी जाएगी‘- यक कल्पना भी मुझे सहन नहीं हुई। चोटी के पास से दूर होते-होते मैं बोला-

‘‘बड़े अजीब हो तुम! मैं पहले कभी ऐसे आदमी से नहीं मिला था।‘‘

“तुम कुछ देखे बिना ही जा रहे हो। खुदकुशी करने निकले लोगों से उनकी चीज-वस्तुएँ माँगकर, उन्हें बेचकर, मैं मजे में जीवनयापन कर रहा हूँ। जिंदगी के मज़े लूट रहा हूँ। कडुवाहट निगल रहा हूँ। परंतु रेशम की कमीज़ पहनने की हैसियत होते हुए भी तुम खुदकुशी करने जा रहे हो! तो बताओ अजीब कौन है- मैं या तुम? मगर वह सब बातें छोड़ दो। और अधिक गहराई में जाकर क्या फायदा है? कमीज़ निकाल के दे रहे हो ना?‘‘

इस प्रकार के आदमी से मिलकर सचमुच ही मुझे अपने भीतर की कमजोरियों का पता चल गया। 

मैंने जिज्ञासा वश उसे पूछा-

“तुम यही काम करते हो?‘‘ 

मेरे प्रश्न को अनसुना करते हुए उसने पूछा

‘‘मुझे देने लायक और क्या है तुम्हारे पास?‘‘ 

मेरे पास की वस्तुओं का मनोयोग से हिसाब लगाकर मैंने जवाब दिया, “मेरे पास एक साइकिल है।‘‘

‘‘अच्छा? तुम्हारे पास साइकिल भी है? अब तो मैं शान से रहूँगा!” वह इस ढंग से बोला मानो साइकिल उसकी हो गई।

“साइकिल लेकर तुम क्या कर सकते हो?‘‘ 

“अरे, बहुत कुछ करना संभव है। सुबह-शाम समाचार-पत्र बेच सकूँगा। किसी लाँड्रीवाले से तय कर लोगों के घर से कपड़े ले जाने, ले आने का काम कर सकूँगा। कुछ भी करना संभव है। मर जाने की अपेक्षा किसी तरह‘ जी लेना अच्छा है! अच्छे दिन कभी न कभी आ ही जाएँगे। मर जाने पर वह भी संभव नहीं। वह सब जाने दो। मैं अपने नुस्के नहीं बताउँगा। कमीज दे रहे हो ना? और साइकिल का क्या हुआ?‘‘

मुझे कुछ उत्तर सूझ नहीं रहा था। उस व्यक्ति का चेहरा देख लेने की इच्छा हुई। मैंने उसे खींचा और म्युनिसिपालिटी की लालटेन के सामने ले गया।

‘‘मुझे तुम्हारा चेहरा ठीक तरह से देख लेने दो!‘‘

“क्यों? लगता है खुदकुशी कर लेने का इरादा बदल गया! मेरी कमीज और साइकिल हाथ से गई! हे भगवन्!, फिर से वही बात!‘‘

“क्यों? इससे पहले क्या हुआ था।” मैंने होश में आते हुए सवाल किया।

“एक महिला आई थी खुदकुशी करने। उसका प्रेमभंग हो गया था। मूर्ख थी वह। उसके सॅण्डल्स बहुत सुंदर थे। मैंने माँगते ही उसने दे दिए मुझे। लेकिन वह पगली ठीक तरह से कूद नहीं पाई। यहीं पर नीचे एक झुरमुट में फँस गई वह। बाद में चीखना-चिल्लाना शुरु हुआ। मैंने ही उसे बचा लिया। केवल उन यातनाओं से मृत्यु की भीषणता उसे महसूस हुई होगी शायद! उसने खुदकुशी करने का विचार त्याग दिया। मुझे धन्यवाद देकर वह वापस चली गई। मेरी सँण्डल्स तो गई! अच्छे खासे दो-तीन रुपए मिलते उसके!‘‘

मैं उस आदमी की ओर हक्काबक्का होकर देखता रहा। एक महिला की जान बच गई, इस बात की खुशी होने की अपेक्षा उसे सॅण्डल्स गँवाने का दुख था! मेरा ध्यान उसके टूटे हुए दाहिने हाथ की ओर गया। मुझे अचरज लगा। 

“अरे! तुम्हारा एक ही हाथ है?‘‘

‘‘अरे हाँ! वह एक मजेदार किस्सा ही हुआ! कुछ दिन पहले गरीबी से तंग आकर एक ठेलेवाला यहाँ खुदकुशी करने के लिए आया था। ठेला उसने यहीं पर छोड़ दिया और खुदकुशी कर ली। वह ठेला बाद में मैंने इस्तेमाल किया। पर मुझे आदत कहाँ थी? चैदहवें दिन ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ट्रक के नीचे आ गया। दाहिना हाथ टूट गया।” यह घटना बताते वक्त ही उसका ध्यान मेरे पेन की ओर चला गया।

“अरे वाह, तुम्हारे पास पेन भी है? अच्छी बात है। वह पेन भी मुझे चाहिए। मैं अब बाएँ हाथ से लिखने का अभ्यस्त हो गया हूँ।‘‘

मैं भौंचक्का होकर उसकी ओर देखने लगा। मेरी नजरों का अर्थ उसने शायद भाँप लिया होगा। वह बोला-

“मिस्टर, यह जीवन जीने के लिए है। मरना तो है ही। उसे कोई टाल नहीं सकता! विजयी होने की अपेक्षा जूझ में ही जीतना जरुरी होता है। छोटी-छोटी बात पर लोग खुदकुशी कर लेते हैं। यह तो बड़े मजे की बात है! उनके पास जो बातें हैं, उन बातों की कुछ अहमियत ही उन्हें नहीं होती।‘‘

उसके विचारों से मैं सहमत होने लगा। मुझे ऐसा लग रहा था कि बेकारी और संसार का बाकी सारा दुख केवल मैं ही झेल रहा हूँ। मैं बहुत भावुक हूँ, मैंने जितना दुख झेला है, उतना बाकी किसी ने भी नहीं झेला है, इसी घमंड में मैं था। इसी वजह से- ‘बहुत दुख झेल लिया, अब बस!‘ यह विचार मन में उठते ही मैं खुदकुशी करने के लिए आ गया। परंतु इन सारी बातों को बिल्कुल ही महत्व न देनेवाले आदमी से मेरी मुलाकात हुई थी। मुझे अपने संकट झूठे लगने लगे। दुःख भी झूठे लगने लगे। वह आगे कहने लगा-

“एक अठारह बरस का लड़का। परीक्षा में असफल रहा, इसलिए मर जाने के लिए यहाँ पर आया था। मुझे उसपर तरस आ गया। बड़े बाप का बेटा था! उसने ‘सॅण्डो‘ कंपनी की घड़ी पहन रखी थी। मैंने माँगते ही उसने झट से निकालकर दी। परंतु उसे मरने के विचार से दूर करने के लिए मैंने कहा-

“ऐसा पागलपन मत करना।‘‘ 

‘‘मेरा बाप पत्थर दिल है। मैं असफल हो गया हूँ- यह बात सुनते ही वह मुझे घर से निकाल देगा।‘‘ ‘‘फिर भी, तुम्हारी खुदकुशी से उसे सदमा पहुँचेगा।‘‘ 

“नामुमकिन है!‘‘ 

“तुझे देखना है क्या होता है?‘‘

‘‘हाँ, जरुर!‘‘

‘‘तुम यहीं पर छिपकर बैठ जाओ। तुम्हारी खुदकुशी का झूठा समाचार मैं उन्हें देता हूँ। देखो वह कैसे छाती पीटते हुए आते हैं!‘‘

वह छिपकर बैठ गया। उसके दिए पते पर जाकर मैंने समाचार सुनाया। सुनते ही उसका बाप और रिश्तेदार मेरे पीछे दौड़ते हुए आए। उसका बाप तो खाई में उतरने के लिए भी तैयार था। उस लड़के से यह सब सहा न गया। वह बाहर आ गया। उसने उसके बाप के और मेरे पैर पकड़ लिए। मेरी वजह से लड़का बच गया इसलिए उसने वहीं पर मुझे दस-दस के पाँच नोट निकालकर दिए। भला आदमी था वह! मेरे घर में बहुत दिनों के बाद दीवाली मनाई गई। अब उस लड़के की चैक में दूकान लगी है। अभी भी वहाँ मुझे एक ‘सिंगल‘ मुफ्त में मिलता है।

मैं नीचे ही बैठ गया। मेरी ओर देखते हुए, होठों ही होठों में हँसते हुए वह बोला, 

‘‘लगता है तुम्हारा प्रेमभंग हो गया है!‘‘ 

‘‘प्रेमभंग, बेकारी.... और.... और...... जिंदगी में मुझे कुछ भी मिला नहीं!‘‘

“यही तो तुम्हारी गलती है। तुम्हें किसने बताया कि, जिंदगी में कुछ हासिल भी होता है? जिंदगी में ‘सब कुछ मिल जाने वाला है‘ इस भ्रम के साथ तुम जी रहे थे। इसी वजह से छोटी-सी चीज नहीं मिल पाई इसलिए खुदकुशी करने पर तुल गए तुम?‘‘

इस प्रश्न से मन बेचैन हुआ। मैंने उसे पूछा, “प्रेम का असफल होना छोटी चीज होती है?‘‘

वह उतनी ही दृढ़ता से बोला, “अर्थात्! जिंदगी के सामने प्रेम छोटा ही है। जिंदगी है इसलिए प्रेम है। हमें इस संसार में कुछ भी मिलनेवाला नहीं, यह सोचकर अगर जी लेते तो छोटी-सी इच्छा पूर्ण होते ही तुम बहुत खुश हो जाते। प्रेम के बारे में मैं कहूँगा कि- It is better to have love and lost than never to have loved at all!

“तुम अंग्रेजी भी जानते हो?‘‘

“पाँचवीं तक पढ़ा हूँ। अब पढ़ने पर जोर दे रहा हूँ। उसके बिना खुदकुशी करने आनेवाले ‘बड़े लोगों से उनकी चीज-वस्तुएँ कैसे माँग सकूँगा? प्रेम की राह पर हम भी चले है।‘‘

मैंने अधीर होकर पूछा, “प्रेमभंग का सदमा तुमने किस प्रकार सहन किया?‘‘

‘‘मैंने कैसे सहन किया? जिस दिन उसने मुझे धोखा दिया, उस दिन उसे घर पर बुलाया और उसकी जम कर पिटाई की। पुरुषों को फंसाने का क्या अंजाम होता है, यह मैंने उसको दिखा दिया। मैं पशु ही बन गया था। इन्सानियत छोड़ देने पर दूसरा क्या होगा। प्रेमभंग करके उसने और उसे पीट कर मैंने इन्सानियत छोड़ दी। एक स्त्री पर हाथ उठाया इसलिए मुझे सजा हुई। सजा भी भुगत ली। परंतु मेरे किए का मुझे आज तक पछतावा नहीं है। वह सब जाने दो! कमीज़ और पेन दे रहे हो ना? और साइकिल का क्या हुआ?‘‘

मैंने उसे पूछा, “मरे हुए लोगों की चीज़ें वस्तुओं का इस्तेमाल करते वक्त तुम्हे झिझक नहीं होती?‘‘

“अरे भाई, मरे हुए लोगों की चीज वस्तुओं की बात छोड़ो। अगर उनके शरीर का एखाध अंग काटकर लगाना संभव होता, तो वह भी मैंने माँग लिया होता उनसे। शरीर के सभी अंग अपने-अपने स्थान पर ठीक तरह से होना, यह बड़े नसीब की बात है। उस अमीरी की बराबरी नहीं हो सकती। पर इस बात को तुम समझ नहीं सकते। उसके लिए तुम्हें मेरी तरह अपाहिज बनना पड़ेगा!

उसके ऐसा कहते ही मेरा अपने व्यंगरहित शरीर की ओर ध्यान गया। बहुत समय लग गया ध्यान जाने के लिए! हमारे पास जो है उसके बारे में भी दूसरों को बताना पड़ा इस बात का बुरा लगा। केवल बेकारी और प्रेमभंग की वजह से मैं इस सुंदर शरीर को खाई में फेंक देने पर तुला हुआ था। बेकारी और प्रेमभंग की बात मुझे फालतू लगने लगी। मुझे एक नई सोच मिल गई थी।

यह सोच देनेवाले की ओर मैंने देखा। मुझे वह ‘इन्सान‘ नहीं लग रहा था। वह कोई अपरिचित था। इस प्रकार की सोच रखनेवाला कोई ‘आदमी‘ इस संसार में होगा, इस बात को मानने के लिए मेरा मन तैयार नहीं हो रहा था। किसी भी बात पर भरोसा नहीं हो रहा था। वह सचमुच ‘इन्सान‘ ही था अथवा जीवन के प्रति आदमी की आसक्ति-प्रवृत्ति ही मनुष्य रुप में आकर मुझे रोकना चाहती थी- मेरी समझ से परे थीं ये सब बातें। मुझे थोड़ा सा डर लगने लगा। मैं खुदकुशी करने के लिए आया हूँ, यह बात भी मुझे झूठ लगने लगी थी। इस प्रकार का पागलपन करने की हिम्मत मैंने कैसे की, इस बात पर मुझे अचरज हो रहा था! वह मेरी ओर ही देख रहा था। मेरे हट्टेकट्टे शरीर को निहारते हुए उसने पूछा,

“कसरत करते हो?‘‘ 

“नहीं! कभी नहीं की!‘‘ 

‘‘फिर भी इतना अच्छा शरीर तुम्हें मिल गया है। बड़े भाग्यशाली हो।‘‘ 

मैंने उसके टूटे हुए हाथ की तरफ देखते हुए पूछा-

“तुम्हारा हाथ टूट जाने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा?‘‘

“अरे, ऐसे क्यों बोल रहे हो? मैं अब बाँसुरी नहीं बजा सकता। परंतु अब मैंने ‘माऊथ ऑर्गन‘ बजाना सीख लिया है। तुम जब नीचे कूद पड़ोगे, तब मैं ‘माऊथ ऑर्गन‘ बजाऊँगा। सुना है कि सिनेमा में पार्श्वसंगीत के रूप में इस प्रकार बजा लेते हैं!‘‘

वह जोर जोरसे बजाने लगा। बजाते-बजाते जोश में आकर वह बेढंगा नाचने लगा। वह ‘इन्सान‘ नहीं था। इन्सान की आशा-आकांक्षाओं का पिशाच था वह! इन्सान की जीवन-लालसा थी वह!- यह विचार मन में उठते ही मैं डर गया। वह भयावह अंधःकार, टूटी हुई चोटी, गहरी खाई, उसका भयावह वादन और नाच! डर के मारे मैं पसीना-पसीना हो गया। मैं चोटी की ओर जा रहे रास्ते से एक-एक कदम पीछे जाते हुए मुड़ गया और जिस रास्ते से आया था, उसी ओर बढ़ने लगा! उसने वादन समाप्त किया। वह बोला,

“क्यों जी, वापस जा रहे हो? लगता है खुदकुशी करने का विचार छोड़ दिया! ख्वामख्वाह इतनी बातें की आपसे। अब ‘लाँड्रीवाले‘ का या ‘कलई‘ का धंधा कर लोगे ना?‘‘

मुझमें पनप रहे झूठे घमंड ने जवाब दिया, “नहीं, नहीं! मैं इस तरह का काम नहीं कर सकता!‘‘

‘‘ठीक है। मगर फिर भी आठ दिन कोशिश करके देख लो। नहीं होगा तो आ जाओ वापस! यहीं पे आ जाओ। यही कमीज पहनकर आना। पेन भी ले आना साथ में। साइकिल पर आना, जिससे ज्यादा समय नहीं लगेगा। मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ!‘‘

माऊथ ऑर्गन की आवाज अंधेरे को चीरती जा रही थी। मैं वापस लौटा।

इस घटना को हुए बहुत दिन बीत गए हैं। ‘खुदकुशी करने का विचार मैंने कभी किया था‘, इस बात पर मैं विश्वास नहीं कर सकता! वहाँ पर मैं फिर कभी नहीं गया। संभव है, अभी भी वह मेरी राह देख रहा होगा!

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डॉ. कुमार कौस्तुभ, दिल्ली, मो. 9953630062


इस लेख से पत्रकारिता स्तंभ का शुभारंभ

पत्रकारिता, प्रतिरोध और पुरस्कार- संदर्भ दिमित्री मुरातोव

30 अक्टूबर 2021 को साठ साल पूरे करनेवाले दिमित्री मुरातोव 2021 के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दो पत्रकारों में से एक हैं। मुरातोव का नाम सिर्फ इसलिए चर्चा में नहीं आया कि उन्हें 2021 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा हुई, बल्कि इसलिए भी कि वे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के मुखर आलोचक अखबार नोवाया गजेता के संस्थापक और प्रमुख संपादक हैं। इस वजह से वे पूरे विश्व में फैले उन तमाम लोगों के नायक बन गये जो सत्ता प्रतिष्ठानों के विरूद्ध आवाज उठाते रहे हैं। इस तरह मुरातोव को 21वीं सदी में ‘प्रतिरोध की पत्रकारिता’ का प्रमुख चेहरा करार दिया गया है। वैसे, इसे रूसी लोकतंत्र की खूबसूरती और राष्ट्रपति पुतिन का बड़प्पन ही कहिये कि पुरस्कार की घोषणा के 12 दिन बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में मुरातोव से मुखातिब पुतिन ने उन्हें खुद बधाई भी दी और उनके काम की तारीफ भी की। हालांकि मुरातोव को विदेशी एजेंट कहे जाने पर 13 अक्टूबर 2021 को पुतिन स्वयं यह भी साफ कर चुके थे कि नोबेल पुरस्कार मिलने का यह अर्थ नहीं है कि कोई रूसी कानून और कायदों के विरूद्ध काम करे। दिलचस्प तो यह भी है कि मुरातोव ने पुरस्कार की रकम का कुछ हिस्सा बच्चों के उस अस्पताल को दान करने का एलान किया जिसकी स्थापना राष्ट्रपति पुतिन ने ही की थी। कुल मिलाकर स्पष्ट है कि पुतिन और पत्रकारों के बीच नूरा-कुश्ती का खेल चलता रहेगा। लेकिन यह समझना जरूरी है कि ऐसी स्थिति क्यों बनी?

रूस में 1993 में नोवाया गजेता अखबार शुरु किया गया था। उससे 10 साल पहले 1983 से 1985 तक मुरातोव ने सोवियत सेना में भी काम किया था। 1987 से उन्होंने औपचारिक रूप से पत्रकारिता में कदम रखा और 10 साल से भी कम समय में रूस के एक प्रमुख राष्ट्रीय अखबार को शुरु करने की स्थिति में पहुंच गये। उनके अखबार को पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव का भी भरपूर सहयोग मिला। यह वह समय था जब सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस नये सिरे से खड़ा होने की कोशिश कर रहा था और बेहद गंभीर परिस्थितियों से जूझ रहा था। व्लादिमीर पुतिन तो सात साल बाद 1999-2000 से रूस की सत्ता में आये, उससे पहले से मुरातोव के अखबार ने नये रूस में कई ज्वलंत मुद्दों को उठाने और उजागर करने का काम शुरू कर दिया था।     

मुरातोव का अखबार नोवाया गजेता रूस के उन चंद प्रमुख मीडिया संगठनों में से है जो पुतिन सरकार में कथित भ्रष्टाचार के मामले उजागर करता रहा और पुतिन की खुलकर आचोलना करता रहा है। इसे रूस का पहला स्वतंत्र अखबार कहा जाता है। 8 अक्टूबर 2021 को नोबेल पुरस्कार देनेवाली समिति ने अपने बयान में कहा कि उनके ‘‘अखबार की तथ्यपरक पत्रकारिता और पेशेवर प्रतिबद्धता ने उसे ऐसे मामलों की जानकारी का प्रमुख स्रोत बना दिया है जिनकी चर्चा शायद ही किसी अन्य मीडिया में होती हो। (पेरिगो, 8 अक्टूबर 2021)‘‘ इसमें कोई शक नहीं कि मुरातोव और उनके साथियों ने बड़ा जोखिम मोलकर सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके अखबार के कम से कम 6 पत्रकारों की हत्या कर दी गई। अन्ना पोलित्कोव्सकाया भी उन्हीं में से एक थीं जिन्हें 7 अक्टूबर 2006 को मॉस्को में गोली मार दी गई थी। माना जाता है कि अन्ना को चेचेन युद्ध को लेकर पुतिन सरकार की आलोचना का खामियाजा भुगतना पड़ा। 10 साल बाद उनकी हत्या को प्रमुख ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने रूस में आजाद मीडिया की हत्या करार दिया था। 5 अक्टूबर 2016 को द गार्जियन में प्रकाशित एक लेख में टिप्पणीकार शॉन वाकर ने दावा किया था कि पोलित्कोव्स्काया की हत्या के एक दशक बाद भी रूस के मीडिया संगठन उन मुद्दों को उठाने से बचते हैं जिनसे रूस की सत्ता के केंद्र क्रेमलिन के नाराज होने का खतरा हो। हालांकि अन्ना और खासतौर से मुरातोव का अखबार नोवाया गजेता तो पत्रकारिता का अपना कर्तव्य पूरा करता ही रहा। मुरातोव ने नोबेल पुरस्कार को उन पत्रकारों को ही समर्पित किया, जिनकी समय≤ पर हत्या कर दी गई। नोबेल समिति ने अपने बयान में यह भी कहा कि “पत्रकारों की हत्या और धमकियों के बावजूद मुरातोव ने अपने अखबार की स्वतंत्र नीति से पीछे हटने से मना कर दिया। वे लगातार इस बात की हिमायत करते रहे हैं कि पत्रकार यदि पत्रकारिता के पेशेवर और नैतिक मानकों का पालन करते हैं तो उनको जिस मुद्दे पर मर्जी हो, लिखने का अधिकार है” (पेरिगो, 8 अक्टूबर 2021)।  शायद यही वजह है कि अन्ना पोलित्कोव्सकाया की हत्या के बाद उन्हें नोबेल पुरस्कार देने की पहल नहीं हुई, जबकि 15 साल बाद उनके अखबार के संस्थापक मुरातोव को इस सम्मान का हकदार माना गया पश्चिमी मीडिया ने आन्ना की हत्या को भी मुद्दा बनाया था, और अब मुरातोव को सम्मानित किये जाने की खबर को भी हाथोंहाथ लिया।  इसके निहितार्थ जो भी हों, लेकिन यह पूरा प्रकरण पत्रकारीय कर्तव्य से जुड़े विमर्श के कई आयामों को उद्घाटित करता है जिन पर विचार जरूरी है।  

पहली बात तो यह है कि प्रतिरोध की पत्रकारिता क्या है जिसके पैरोकार मुरातोव को अपना नायक मान रहे हैं? यहां प्रतिरोध से तात्पर्य राजसत्ता की नीतियों और कार्रवाइयों के प्रति उस असहमति से है जो अखबार और मीडिया के माध्यम से समय≤ पर जाहिर की जाती है। प्रतिष्ठित पत्रकार रामशरण जोशी के शब्दों में, “प्रतिरोध की गैर-मौजूदगी में समाज के दबे-कुचले लोगों के मानवाधिकार पर राज्य और उसके विभिन्न अंगों के हमले बढ़ जाते हैं, नागरिक अधिकार कुचले जाते हैं, संवैधानिक संस्थायें निष्प्रभावी बनने लगती हैं या उन्हें विवादास्पद बना दिया जाता है। (जोशी, 2019)” यह तो असल में एक पक्ष है। कहना न होगा कि पत्रकारीय कर्तव्य और कथित प्रतिरोध की पत्रकारिता में बेहद झीना-सा फर्क है। पत्रकार का मूल काम तो अपने पाठकों, दर्शकों, श्रोताओं और समाज को समाचारों से अवगत कराना है। लेकिन, इस प्रक्रिया में पत्रकार जब कहीं न कहीं पार्टी बनने लगता है और निष्पक्ष तरीके से खबरों को पेश करने के बजाय किसी न किसी पक्ष की नुमाइंदगी करने लगता है, तो यह स्थिति पत्रकारिता नहीं कही जा सकती। सत्ता का समर्थन या विरोध- दोनों ही बातें इससे जुड़ी हुई हैं। सत्ता के अच्छे कामों की रिपोर्टिंग और उसके पक्ष में लिखना- दोनों दो तरह की बातें हैं। इसी तरह से, सत्ता के अनुचित कामों को उजागर करना एक बात है और उसके खिलाफ मुहिम छेड़ना दूसरी बात। चाहे देश हो या दुनिया- हर फलक पर यह स्थिति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। भारत हो या रूस या फिर अमेरिका या ब्रिटेन या फिर अफ्रीका का कोई देश- कहीं भी सरकार के काम की तारीफ करने पर पत्रकार चाटुकार करार दिये जाते हैं, तो विरोध में लिखने-बोलने वालों को दूसरे तरीके से देखा जाता है। यह बहुत आम समझदारी है जिसे सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने-अपने हित में पत्रकारों की ब्रैंडिंग के लिए इस्तेमाल करता है। आम जनता की भलाई और नुकसान का इससे कोई सीधा संबंध नहीं माना जा सकता। तो प्रतिरोध की जिस पत्रकारिता का नायक मुरातोव को माना जा रहा है, वह भी कहीं न कहीं इसी विमर्श का हिस्सा है। यह सही है कि मुरातोव और उनकी टीम ने रूस में भ्रष्टाचार और मानवाधिकारों के हनन के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, लेकिन सवाल यह भी उठता कि क्या उन्होंने शीत युद्ध के बाद बदली दुनिया में अमेरिका के वर्चस्व को टक्कर देने के लिए खड़े हुये रूस का समर्थन किया या नहीं? क्या उन्होंने सोवियत संघ के बिखराव के बाद नये रूस के निर्माण में कोई सकारात्मक भूमिका निभाई? प्रतिरोध की पत्रकारिता अक्सर नकारात्मक पहलुओं पर केंद्रित होती है, लेकिन होना यह भी चाहिए कि इसके कुछ सकारात्मक नतीजे निकलें। आमतौर पर इस तरह की पत्रकारिता सत्ता और पत्रकार के बीच तनातनी तक सीमित होकर रह जाती है, आम जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिलता, जबकि पत्रकारिता का मकसद जन-सरोकार होना चाहिए, सिर्फ सरकार का विरोध या समर्थन नहीं। मुरातोव प्रकरण को भी कहीं न कहीं इसी द्वंद्व के संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए।

दूसरा विमर्श तो रूस और पुतिन के विरोध से ही जुड़ा हुआ है। यह तो सर्वविदित है कि प्रतिष्ठित होने के बावजूद नोबेल पुरस्कार पश्चिमी और यूरोपीय एजेंडे की पक्षधरता को लेकर विवादों में रहे हैं। पुरस्कार का मकसद भले ही विश्व में सबसे अलग और सबसे विशिष्ट काम करनेवाली शख्सियतों को सम्मानित करना हो, लेकिन यह भी सच है कि कई नामी हस्तियों को इसके लायक नहीं समझा गया। अब अगर मुरातोव प्रकरण को देखें तो इसमें भी कहीं न कहीं रूस-विरोधी एजेंडे की बू आ सकती है। मुरातोव की पुतिन विरोधी मुहिम कहीं न कहीं उससे जुड़ी हुई है। वरिष्ठ पत्रकार पुष्प रंजन ने बड़ी दिलचस्प जानकारी खोजकर दैनिक पूर्वोदय में छपे अपने लेख में शामिल की। ‘पत्रकार को पुरस्कार’ शीर्षक लेख में पुष्प रंजन लिखते हैं- “गोर्बाचेव के दस फीसद शेयर इस अखबार में थे। 14 प्रतिशत शेयरधारक दूसरे शख्स रशियन बिजनेसमैन अलेक्जेंडर लेबेदेव हैं जो कोई दो दशक तक रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी और फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विस एवीआर से जुड़े रहे थे। अलेक्जेंडर लेबेदेव रूस के 39वें नंबर पर गिने जानेवाले धनाढ्य शख्सियत हैं। अलेक्जेंडर लेबेदेव का पैसा लंदन से प्रकाशित द इंडिपेंडेंट और वहीं मुफ्त में बंटनेवाले अखबार द इवनिंग स्टैंडर्ड में लगा हुआ है। (पुष्परंजन, फेसबुक, 10 अक्टूबर 2021)” लेबेदेव खुद कई आरोपों से घिरे रहे हैं। पहले मुरातोव के अखबार में उनकी हिस्सेदारी और अब मुरातोव को नोबेल पुरस्कार कहीं न उसी पुतिन विरोध को रेखांकित करता है जिसकी धुरी में अमेरिका और ब्रिटेन हैं।

तीसरा विमर्श रूस में मीडिया की आजादी से जुड़ा हुआ है। बार-बार कहा जाता है कि रुस में पुतिन के विरोध में आवाजें दबा दी जाती हैं और सरकार की ओर से पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाता है। लेकिन, इन दावों पर आखिर कैसे यकीन किया जाय जबकि रूस में करीब 30 वर्षों से चल रहा अखबार खुलेआम सरकार विरोधी खबरें छापता है और बंद नहीं होता। न तो सरकार उसे बंद कर पाती है और ना ही जनता उसके खिलाफ जाती है। कहा जा सकता है कि लोकतंत्र में प्रतिपक्ष का होना जरूरी है, चाहे वह राजनीतिक दल के रूप हो या फिर पत्रकारिता के रूप में अन्यथा उसे लोकतंत्र नहीं तानाशाही मान लिया जाएगा। रूस में 20 साल से अधिक समय से सत्ता पर काबिज पुतिन पर लोकतंत्र को दबाने के आरोप तो लगते हैं, लेकिन हकीकत यह भी है कि उसी शासन में मुरातोव जैसे पत्रकार भी काम कर रहे हैं और नोवाया गजेता जैसे अखबार भी चल रहे हैं। या तो ऐसे मीडिया संगठनों को बरकरार रखना पुतिन सरकार की मजबूरी है या फिर किसी न किसी रूप में ऐसे संगठन पुतिन की सरपरस्ती को बनाए रखने में सहयोग भी कर रहे हैं। 21 साल कम नहीं होते किसी लोकतंत्र में एक दल या एक नेता के लिए। लेकिन, यदि असहमति और प्रतिरोध के सुरों को ताल दे रही पत्रकारिता पुतिन को उखाड़ फेंकने के लिए जनांदोलन खड़ा नहीं कर सकी तो यह भी माना जा सकता है कि वो किसी न किसी रूप में पर्दे के पीछे उनके लिए काम ही कर रहे हैं। विदित हो कि नवेल्नी और उनके समर्थक अभी भी पुतिन के शासन के आगे काफी कमजोर साबित हो रहे हैं और निकट भविष्य में पुतिन के विरुद्ध किसी ऐसे प्रतिरोध की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती जो रूस की राजनीति में एक बार फिर युगांतरकारी बदलाव ला सके।     

एक और विमर्श मुरातोव को नोबेल पुरस्कार दिये जाने पर रूस में उठी विरोध की आवाजों से जुड़ा हुआ है। पहले से यह मांग उठ रही थी कि रूस में कैद लोकतंत्र समर्थक नेता अलेक्सेई नवेल्नी को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए। लेकिन, नोबेल समिति ने नवेल्नी को पुरस्कार न देकर मुरातोव को चुना। हालांकि मुरातोव ने खुद बयान दिया कि यदि वे निर्णायक होते तो नवेल्नी को पुरस्कार देते। लेकिन, नोबेल समिति के फैसले से यह सवाल तो उठने ही लगा है कि उसकी सोच क्या है और सवाल पूछे जाने लगे हैं कि ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ 

कुल मिलाकर नोबेल शांति पुरस्कार 2021 की घोषणा ने पत्रकारिता, प्रतिरोध और पुरस्कार के संबंध में ऐसे विमर्शों को जन्म दिया है जिनका और भी विस्तार हो सकता है। 

संबंधित मुद्दों पर विचार और मंथन की संभावनाएं बनी रहेंगी। तभी यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि विश्व में पत्रकारिता, प्रतिरोध और पुरस्कारों की पॉलिटिक्स क्या है? 

संदर्भ

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख

https://time.com/6105332/dmitry-muratov-nobel-peace-prize/

https://www.bbc.com/hindi/india-48589531

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अक्टूबर 2014, अंक 10 से सम्पादक के नाम पत्र

‘अभिनव इमरोज़’ अंक 10, अक्टूबर 2014, हस्तगत हो अपार प्रसन्न्ता लाई, धन्यवाद। अकल्पनीय साहित्यक विभूतियों का संगाथ मेरे लिए अद्भुत उपहार।

दोपहर से अभी तक रात 9 बजे 40% ही पढ़ पाई। मात्र पढ़ना नहीं मनन करना, ज्ञान के सागर में गोता लगाना कभी विस्मृतियों की धूल साफ कर ताज़गी एवं लेखकों की लेखनी की खूशबू से बंधी रही। हाथ आए विरल मोतियों की आभा से जीवन की धन्यता अनुभव की। मेरे पास शब्द बौने हैं इस अंक के अन्दर साहित्य का श्रेष्ठतम अंश आत्मानंद दे गया, प्रशंसा नामुमकिन है।

रचना चयन की जो गुणवत्ता आप में है अन्य सुलभ नहीं। आदि से अन्त तक मन को झंकृत करने वाले लेख-लेखक पाकर पढ़ने का प्रलोभन कम न हो पाया।

आपकी भावांजलि देखें तो ‘सपने केवल सपने हैं। वे कब हुए अपने। परन्तु यहाँ कुछ लेखक कल्पना में थे वे यथार्थ में सामने आए। मेरी जीवन संध्या को साहित्य के पंख लग गए जो उड़-उड़ कर हर लोक की डाल को पकड़ झूलना चाहती है।

सम्पादकीय- ऐसा भी होता हैं एक मंच पर तीन-तीन महान आत्माएँ, भारत के गौरव लेखक उनकी पुण्य तिथि ऊर्जा प्रदान करने वाली ‘सोलर (एनर्जी) कुछ लेख व लेखक अब तक सपने बने थे, बहल साहब ने उनसे रूह ब रूह मुलाकात करा दी। आपके श्रम,  लेखों, लेखकों का चुनाव एवं प्रस्तुतीकरण अभिनन्दनीय है। निराला-मन्टो और ग़ालिब। नमन। 

सम्पादक के सराहनीय शब्द नोटिस बोर्ड पर लिखकर टांगना चाहिए ‘‘साहित्य संवेदनशीलता की कर्म भूमि है। पारखी को अन्तः प्रज्ञा और आन्र्तात्मा के आदेश का पालन करते हुए न्याय करना होगा ताकि साहित्य उत्कर्षित और समाज सुसंस्कृत और समृद्ध होता रहे।

लेखक के साथ एक शाम-रसप्रद, ज्ञानवर्धक- मोहसिना जिलानी की कहानी ‘दर्द की बाहरी लकीर’ मर्मस्पर्शी, माता की ममता, उसके मातृत्व की संवेदना को समझना असम्भव है। कुत्ता निसंतानों के लिए या एकाकी जीवन जीने वालों के लिए परम मित्र होते हैं। कभी कभी अपवाद रूप विशेष प्रसंग भी बन जाते हैं। श्रेष्ठ रचना इन्सान अजीब प्राणी है उसके प्रति कहा नहीं जा सकता कुछ भी हो सकता है।

विश्वमोहन तिवारी एयर वाईस मार्शल की कहानी ‘बर्थ डे’ आज के संभ्रान्त समाज में ऐसा होने लगा है। माँ-बाप की अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने का जनून कभी-कभी यही परिणाम लाता है।

उर्मिला शिरीष का निराला के पुण्यतिथि पर का लेख उनकी गहन अध्ययनवाही, मानवमूल्यों को परखने वाली है। बहुत अच्छा लेख-निराला जी तो ‘वीणा वादिनी वर दे। कालजयी वंदना के पर्याय बने हैं। वसंतपंचमी को उनका जन्म दिन है।

राकेश भारतीय भी ‘राम की शक्तिपूजा’ की समालोचना या विस्तृत संवेदनात्मक अनुशीलन लिखा है। विद्वानता के साथ कुशल रचनाकार साहित्य पारखी है। अभिनन्दन।

अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि 31 अक्टूबर के संदर्भ में डाॅ. अमर सिंहवधान - साहित्य मर्मज्ञ, अध्ययवेत्ता, नीरक्षीर पारखी लेख, आत्म विभोर कर गया। ‘अमृता प्रीतम: स्याह दौर’ की काव्यात्मक चीख ‘‘वधान साहब ने क्या शीर्षक लिखा है शब्द समूह के गहन प्रज्ञार्थ का यथार्थ की अभिव्यक्ति वधान जी के पाण्डित्य को नमन करती है। पूरा लेख तीन बार पढ़ा मन सागर की लहरों में डूबता उतरता रहौ- ‘‘कैन्वास’ और ‘रेवन्यूटिकट’ आत्मकथा नारी वेदना का दस्तावेज है। विरल लेखिका, विरल व्यक्तित्व।

अंक की प्रशंसा गूंगे के गुड़ जैसा अनिवर्चनीय है। देवेन्द इस्सार का नाम बहुत पढ़ा था। अध्ययन नहीं। अच्छा परिचय एक महान कथाकार का मिला। नासिरा शर्मा भी एक विभूति महिला है; उनसे बातचीत लेख व्यक्तित्व सभी कुछ उनकी प्रकाण्ड पाण्डित्य का द्योतक है। उनकी अगाढ़ अध्ययन कर्मठता, उच्चकोटि के रचनाकारोंकी कहानियाँ, जीवनी गूदड़ी के लाल की तरह हजारों साहित्य प्रेमियों से आलिप्त, अपरिचित, अज्ञात रह जाता। अभिनव इमरोज़ को उनका योगदान नया रक्त प्रवाह प्रसारित करना है। शुक्र हमें उनके द्वारा बहुमूल्य साहित्य पढ़ने को मिल रहा है।

‘‘सआदत हसन मंटो के अफसानों में निस्वानी किरदार’’ रिजवान बिन अलाउद्दीन का जानदार, सर्वश्रेष्ठ, हृदय के तार-तार मानवीय मूल्यों को झंकृत करता है। अलाउद्दीन जी ने कठोर श्रम साधनों कर मंटों के किरदारों का नाज़ुक, व्यथित अबोल भावों को पाठकों तक पहुँचाने का ही नहीं मूल्यांकन करने सत्व परखने विवश करता है। इस लेखक की 

रचनाधर्मिता को प्रणाम। 

पुनश्चः 

प्रतिभाव लिखने के बाद पत्रिका बंद की, कुछ क्षण बाद फिर खोली दृष्टि ‘रावण के पुतले’ पर अटकी, मन में विषाद जगा। भारतीय रुढ़िचुस्त बालबुद्धि में जी रहे हैं। सदियों से कागज के रावण को जलाकर अपने अहं मनोभाव व्यक्त होने का जताकर कृत्रिम संतोष पाते हैं।

सही तो यह है कि मानव मन में बसे रावण को जो मानव रक्त में घुल रहा है, चिरस्थायी स्थान बना राम के नाम की धज्जियाँ उड़ा रहा है, उसके मारने, जलाने की जरूरत है। सीता रावण के घर सुरक्षित थी मगर हमारे देश में नारी जाति बच्ची से लेकर वृद्धा तक दैहिक प्रताड़ना, बलात्कार से सुरक्षित नहीं। चाहे कोई भी जगह हो घर या बाहर। 

दूसरी कविता ‘प्रेम पत्र’ एक दो, अरविंद अवस्थी का रोमांटिक शब्द विन्यास अच्छा लगा- ‘‘पांव के नीचे की जमीन। तुम्हारे ख़त की गर्मी से/खोए दिनों की स्मृतियों की बर्फ/पिघलने लगी।’’

‘‘क्यारी में खिले फूलों से/बाहर निकल आई खुशबू। और लिपट गई बदन से/कमीज की तरह/महक उठा। मेरे मन का कोना-कोना।’’

सरस्वती चन्द्र फिल्म का गीत ‘फूल तुम्हें भेजा है खत में’’ याद आ गया।

दोनों कविराजों को नमस्कार।

शुभकामनों के साथ

गांधी निर्वाण दिन

कांति अय्यर

30 जनवरी 2015

गांधी का नाम/पतवार बन/सांसदों को/तार रहा है।/कुर्सी तक टिके रहने को। 

-स्मृतिशेष, कांति अय्ययर, सूरत



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अवध बिहारी पाठक सेंवढ़ा, जिला दतिया (म.प्र.) मोबा. 9826546665


एक समीक्षक की प्रतिक्रिया

समाज को बदलने का पराक्रम अर्थात अभिनव इमरोज़ एवं साहित्य नन्दनी

माह फरवरी 2021 में पत्रिका अभिनव इमरोज एवं साहित्य नन्दनी के संपादक श्री देवेन्द्र कुमार बहल को साहित्यिक पत्रकारिता के लिए पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। इसमें मीडिया विमर्ष की भागीदारी भी थी। इस सम्मान समारोह में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानन्द मिश्र, प्रो. कुमुद शर्मा, अनन्त विजय जैसे लोगों की उपस्थिति से ही इस सम्मान कार्यक्रम की गरिमा का स्वतः ही आभास होता है।

आजादी के पहले और कुछ समय बाद तथा ‘प्रताप’ कानपुर, ‘साहित्य स्वदेश’ आगरा, ‘शिक्षक बंधु’ अलीगढ़, ‘मधुकर’ टीकमगढ़ जैसी पत्रिकाएँ साहित्य केन्द्रित रहीं, परन्तु बाद में कुछ अपवाद छोड़कर पत्रिकाओं से साहित्य नदारत हो गया और मनोरंजन की सामग्री परोसी जाने लगी। परिणामतः वैचारिक स्खलन होता गया और आज भी हो रहा है।

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री बहल साहब के योगदान और विशिष्टियों को निम्न बिन्दुओं से रेखांकित किया जा सकता है

1. समारोह में बहल साहब ने कहा था किसी भी काम को करने का जुनून होना चाहिए उस व्यक्ति में। लगता है उन पर साहित्य का जुनून केवल है ही नहीं, उन की मनः स्थिति पर हावी है तभी वे एक नहीं दो पत्रिकाएँ बिना शासकीय या संस्थागत बाहरी सहायता के निकाल रहे हैं। कहीं को कोई मदद नहीं। निजी सीमित साधनों पर ये उपक्रम कायम रखना पत्रकारिता के क्षेत्र की अन्यतम मिसाल है।

2. जैसा कि कहा गया ‘अभिनव इमरोज़’ मौलिक विचारों को प्रेषित करने को प्रस्तुत है और साहित्य नंदिनी रचनाकारों, लेखकों द्वारा लिखी गई समीक्षा पर केन्द्रित होता है दोनों ही मंचों पर तटस्थ विचार चेतना को महत्व दिया जाता है।

3. संपादक ने प्रेम प्रतिभा और प्रोत्साहन, पत्रिकाओं का आदर्शन बना रखा है फलतः नए और प्रतिभा सम्पन्न रचनाकारों की रचनाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। इसका अप्रत्यक्ष लाभ यह हो रहा है कि किसी साहित्य और पत्रकारिता को नया परिप्रेक्ष्य मिल रहा है। विचार-चेतना को नए आयाम, नया शिल्प, यथा संगीता कुजारा की त्रिवेणियों, जो अंतर्मन में छिपी उमड़न नयी संदेवना को प्रकट करती हैं और ठिठकी हुई संवेदना गति दे रही है। उसके यथार्थ का रूप बदल रहा है। साहित्य और अभिव्यक्ति दोनों को नया विस्तार मिल रहा है। इस तरह ये संपादक अपने इन माध्यमों से साहित्य में वर्षों से जमी रुढ़िवादिता को तोड़ कर उसे इक्कीसवीं सदी में नई पहचान देने में सक्रिय है।

4. संपादन का लक्ष्य व्यक्ति है और उसकी जड़ता को सरल बनाने का प्रयत्न भी क्यों कि प्रेम उसका मोटो है और प्रेम की लहर केवल एक लहर जाने कितने किनारों को तरंगित कर जाती है लोक में कहा जाता है कि लहर शांत हो जाती है परन्तु ऐसा नहीं है पर कई जन्मों का खेल है। लहरें मरना नहीं जानती वे तो निरन्तर नया उन्मेष देती है।

5. किसी भी वैचारिक प्रतिबद्धता से दूर तटस्थ भाव से साहित्य के प्रति अपने कर्तव्य निर्वाह करने वाले इस संपादक को सम्मान दे कर पत्रकारिता ने अपना नया अध्याय बनाया है। मैं द्विवेदी जी के परिजनों को इसके लिए धन्यवाद देता हूँ और बहल जी को शतशः बधाईयाँ। वे अपने इस महत आयोजन में और और नए पृष्ठ रचें हिन्दी के पाठक वर्ग को इस संपादन के प्रयत्न को सराहने और सहयोग देने की अब महती आवश्यकता आ पड़ी है।

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देवी नागरानी, मुम्बई

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लेख

भारतीय नारी और आतिया दाऊद


थोड़ी सी विष की कड़ुवाहट / सहनी पड़ती है मरने के लिए / मगर  /बहुत कुछ सहना पड़ता है आदमी को जीने के लिए...

आत्महत्या जैसे शब्द की सच्चाई अपने सभी आवरण उतारकर आज समाज के हर शहर, हर गली हर कोने में अपनी आवाज़ की बुलंदियों में चीख रही है, अपने उन पुरोधाओं को ललकार रही है जो आवाज़ को अनसुना कर रहे है. शायद आने वाला वक़्त उनकी ऐसी ही किसी मनोअवस्था के दौरान इतना समय भी न दे पाए कि वे अपने हक में न्याय के लिए हाथ भी उठा पाएं.  

हिन्द हो या सिंध, नारी मन की बातें वही है, कील सा चुभता दर्द वही है, भाषा अलग अलग है, भाव अलग अलग है, पर संस्कार वही है, जो अधीनता के दायरे में मन को घुटन बख्शते हैं. यह विद्रोह की शायरी है। मानवीय समझ की दरिद्रता से उभरती है। तंगदिली/अदूरदर्शिता से फैलती है और परामर्श के प्रयास से सारी जंजीरें तोड़ देती है और उसकी आँखों में आँखें मिलाकर कहती हैः 

‘‘मैं तुमसे प्रतिभावान हूँ, / मैं साहित्य की अल्ट्रासाउंड मशीन हूँ। / तुम्हारा अन्तर्मन मुझसे छिपा हुआ नहीं है।’’ 

सिंधी समाज के बीच रहते हुए, पुरुष सत्ता के अधीन नारी की परिवर्तनशील अवस्थाओं के संदर्भ में सिंध की शायरा अतिया दाऊद ने अपनी ज़ात के हक़ में अनेक कवितायें लिखी हैं. इस संग्रह की सशक्त कविताओं में अत्तिया जी के शब्द शब्द में एक छुपा हुआ दर्द शीशे सा पिघलता हुआ रिसता है, सच्चाई के सामने रखता है जिसे नकारने की गुंजाइश ही नहीं रहती. उनकी कविता “सच की तलाश में” वे प्रतिरोध की भावना को सामने रखते हुए कहती हैंः  

इस सहरा में मेरा सफर / न जाने कितनी सदियों से जारी है / सच का सलीब पीठ पर उठाए / फरेब से सजी धरती पर चलती रही / एक आँख कहती है सब सच है  / एक आँख कहती है सब झूठ है / मैं सच और झूठ के बीच में पेन्ड्युलम की तरह / हरकत करती रही / जानती हूँ कि वह दूर का पानी है / दर असल मरीचिका है...(अंश) 

यह भावाभिव्यक्ति और कुछ नहीं, बस नारी मन की छटपटाहट है जो मन में मचे तहलके को अभिव्यक्त कर रही है. स्त्रियों का पहले की तरह अनपढ़ होना, उनका अबोध होना, अब कोई गुण न होकर अवगुण माना जाने लगा. राजनैतिक, सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी लेने की छूट तो तब भी सपना ही था. पर रिश्तों की महत्वता घर परिवार और परिवेश के बीच में रहते हुए आदम जान ही जाता है..हाँ यह बात और है कि कोई इस मर्यादा का पालन करे, कोई न कर पाए। अमेरिका की भारतीय प्रवासी सहित्यकार सुषम बेदी अपनी कविता ‘टूटना’ में इसी ओर ध्यान खींचने की एक कोशिश करते हुए लिखती हैंः                                                                

रिश्ते टूटते हैं, व्यक्ति नहीं /पत्ते टूटते हैं, पेड़ नहीं / क्योंकि, / जब व्यक्ति टूटता है / तो पेड़, पत्ता / कुछ भी नहीं रहता ! 

नारी पर मानसिक अत्याचार पुराने ज़माने से होता चला आ रहा है, सदियों से स्त्री हाशिये पर फेंकी गई है, पर आज नारी अपनी क्षमताओं को पहचान कर शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठा रही है. कभी उनकी कमज़ोरियों को ललकार कर, कभी उनकी भीतर छिपी शक्ति को ललकारते हुए, कभी उलझी परिस्थितियों में नारी पुरुष के बीच खड़ी की गई और असमानताओं के विरुद्ध. यही भाव सुधा ओम ढींगरा जी के काव्य में उभर कर सामने आया है-  

राम बने तुम अग्नि परीक्षा लेते रहे /  भावनाओं के जंगल में / बनवास मैं काटती रही /  देवी बना मुझे, पुरुषत्व तुम दिखाते रहे / सती बन सतीत्व की रक्षा मैं करती रही / स्त्री पुरुष दोनों से सृष्टि की सरंचना है- फिर यह असमान्यता क्यों? 

नारी मन यक सा होता है, उसके दर्द की परिभाषा एक सी होती है, चाहे वह हिन्द में हो, सिन्ध में हो या प्रवास में. प्रवासी होते हुए भी अपने देश की धड़कन को हर भारतीय नारी सीने में लिए फिरती हैं. दूरी के बावजूद भी कोई खबर अपने भाई-बेटे, बेटी-बहन या किसी अजन्मे अणु की आती है तो मन में एक ज़िलाज़िला सा उठता है. उस समय नारी मन की सोच में भारत के अपने भारतीय परिवेश के जन के लिए होती है, होते हैं, अपने परिवार के लोग होते हैं।

  उषा राजे सक्सेना, अध्यक्ष-ग्रेट ब्रिटेन हिंदी लेखक संघ, की कलम हृदयविदारक दृश्य को सामने रखते हुए लिखती है इस अंश मेंः 

“लाशों के पटे मैदान / आंसुओं के उफने सैलाब / मार कर जमाने को / खुद मर गई मौत / वीरानगी में.....!” 

अपने मन को प्रत्येक नारी अपनी अवस्थाओं व् समस्याओं के साथ जोड़ते हुए अपनी क्षमता का उपयोग करती है, और वह उसमें खुश है. उसे दायत्व का अहसास है, पर यह सोच सबसे मेल खाए, यह जरूरी नहीं. मेरी एक कविता ‘अगर तुम समझते हो’.रचना में नारी के दासत्व को नकारते हुए अपने स्वाभिमान और इयत्ता की सत्ता की हुंकार है अर्थात मुझे कमजोर न समझना का सन्देश है। वहीं ‘औकात’.में अपनी अस्मिता के प्रति सजग नारी अपने अस्तित्व को बचाने में समर्थ होकर अपनी औकात भी बताती है। पुरुष की अहंता से त्रस्त नारी ‘तलाक’ पर बिलबिला कर अपनी बेलिबास कजा के लिए कजा का कफन जैसी शब्दावली में पीर तार-तार होती है। नारी की अस्मिता के लिए बेइन्तहा तड़प और इस बर्बर समाज के प्रति आक्रोश है। 

अगर तुम समझते हो / कि / तुमने मुझे जंजीरों में जकड़ लिया है / तो गलत समझा है / मत समझो कि मैं  / तुम्हारी चाल के चंगुल से / खुद को आजाद कराने के रास्ते / अपने पीछे बंद कर आई हूँ./यह तुम्हारी नादानी होगी...देवी 

यहां और वहां के बीच की दूरियों की खाई को अपनी सोच शब्दों की भावाभिव्यक्ति उन्हें राहत देती है, जैसे किसी अपने का दर्द बाँट लिया हो. दर्द सभी को सालता है यहां हो चाहे वहां. एक संसार बहार आँखों के सामने फैला हुआ है, एक भीतर मन में अपनी विराटता के साथ रचा बसा हुआ है, जहाँ तहलका भी मचाता है, और ठहराव भी. कैलिफोर्निया की रहवासी मंजू मिश्रा अपनी कविता में इन शब्दों द्वारा नारी मन की व्यथा और संघर्ष दोनों ज़ाहिर करते हुए कह रही हैः 

रिश्ते जब रिसते हों/और हम जान न पाएं / तो हमें समझ लेना चाहिए कि अब अंत निकट है / फिर चाहे जितनी ऑक्सीजन लगा लो / या वेंटीलेटर पर रख लो / कुछ फर्क नहीं पड़ता / क्योंकि, उनकी नियति में / बस मरना ही होता है।

यहीं वह कलमकार अपनी धडकनों की जुबानी कुछ कह जाता है, कहीं शोर में खो जाता है, कहीं खामोशियों को टटोलने लग जाता है. पर इसी भरोसे पर के वह जो इज़हार कर रहा है वह उसकी दिल की हर सच्चाई के साथ रंगा हुआ यथार्थ है.  कल्पना को भी इतने सरल और सहज ढंग से अभिव्यक्त करता है, लगता है मानो सच-झूठ के क्षितिज पर यथार्थ का साक्षात्कार हुआ है. उस सच के इज़हार में बहुत तकलीफ भी होती है, कभी काँटों की चुभन, कहीं चकनाचूर दिल की खनक, कहीं याद की वादियों में बसा सन्नाटा, तो कहीं तपती सहरा के सुराबों में खो जाने की हद तक का अजाब. भोपाल की दस्तावेजी कलमकार संतोष श्रीवास्तव अपनी ‘पस्त’ नामक कविता में कहती हैः

हौसले पस्त हुए/ रात भर जागी आँखो में / सुबह को तरसी आँखोँ में/जलते पलों की तपिश में / जाने कितने सूरज अस्त हुए।

अजाब भरी राहों से गुजरना बहुत मुश्किल है। आसानियों से समझौता करना कोई कठिन बात नहीं, पर दिल की शिकस्ता हालत के दौर में अपने आप से पूर्ण ईमानदारी से जुड़ना एक मुकमिल मुकाम हासिल करने 

जैसा है। इसी भाव को देखिये, महसूस कीजिए मुंबई की कवियित्री अनीता रवि की भावनाओं में जो इस चीखती कविता में कह उठती हैः  

नहीं, अब मैं तुम्हें अपना वध नहीं करने दूँगी! / हर बार अपनी हर सभा में तुमने/ मेरा वध करना चाहा / और हर बार मैं होती रही हूँ / अपमानित, उपहासित / पर कहीं बची हुई है मेरी अस्मिता / और अब तुम / बावजूद अपनी हर कोशिश के, / नहीं कर पाओगे मेरी अस्मिता का चीरहरण! 

यहीं आकर जीवन के मधुबन में एक नए मौसम का आगमन होता है जहाँ जख्मों के सुमन महकने लगते हैं, एक नयी बहार का संचार होता है, ऐसे जैसे खिजां के बाद मधुबन में नए कोंपल का खिलना, महकना व् सुगन्धित होकर हरसूं अपने होने का अहसास महसूस करना। 

हैदराबाद से कवियित्री विनीता शर्मा भी इस दौर के दर्पण में कुछ विकृत ऐसे ही सवालों की आकृतियों की परछाइयों की उलझन से बाहर निकलते हुए कह रही है-

पहले थीं तुम दामिनी फिर निर्भया मजबूर / अब हमेशा के लिए हो नज़रों से दूर / कैसे थे वो जानवर लूट ली अस्मत तुम्हारी/ चीखते हैं आज भी स्वर तुम्हारे क्रांतिकारी / ढूंढते हम घर कोई रहते जहां इंसान हों / दर्द की दीवार पर राहत के रोशन दान हों।

औरत की चीखती आवाज़ को आखिकार कुछ राहत मिली जब निर्भया के मामले में सफलता मिली है, उसका यही सबब है कि केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारा दायित्व भी है और ऋण भी, जो हमें अपने समाज और अपनी मातृभूमि-मातृशक्ति को चुकाना है. नारी की 

धारधार कलम अपने जज्बात को सामने ला रही है. रायपुर की सशक्त लेखिका रूपेंद्रराज तिवारी जी कह रही है अपनी व्यथा-उनकी जुबानी उनकी शब्द भावनाएं: 

एक अंतः स्त्राव बहता है मेरे भीतर भी / अनमना सा / खुद के अस्तित्व को भी नकारता हुआ। / तुमने कभी महसूस नहीं किया शायद! / मैं जुदा हो जाती हूँ खुद से भी / अपने आपको भी नहीं पहचानना चाहती.../ तुम पुकारते हो बारहा मेरा नाम / पर मैं अपना नाम भी नहीं पहचानना चाहती.. / कभी सोचा है क्यों?   

ऐसे अनगिनत सवाल फिजारों में जवाब की तलब में सलीबों की तरह लटके हुए हैं..

विरोध को सह कर भी नारी अपने हौसलों को विराम नहीं देती। उसकी संघर्ष-क्षमता और ऊर्जा में ही उसकी अपनी पहचान है यह वह जान गई है। जैसे एक नन्हा दीपक घनघोर अंधकार में भी पराजय नहीं मानता, ऐसे में नारी अपनी लड़ाई खुद लड़ते हुए हर उस चक्र से मुक्त होना चाहती है, जो उसे क़ैदखाने की घुटन बख़्शता है। उस कफ़स से बाहर आकर सांस लेते हुए वह अपनी बात रहते हुए कह उठती है डॉ. अनीता ठक्कर के शब्दों मेंः  

कश्मीरी औरत / कश्मीरी औरत माँ बनने से घबराती है / गर बेटा पैदा हुआ, तो / आतंकवाद का शिकार होगा/ गर बेटी हुई, तो / बलात्कार की शिकार होगी / कश्मीरी औरत माँ बनने से घबराती है !

अपने मन की सहरा में शायद उसका सफर कितनी सदियों से जारी है। आगे अपने मन रूपी ज्वालामुखी से पिघले हुए लावे की मानिंद अपनी काव्य धारा में वे निरंतर नारी के प्रताड़ित मन की हर अवस्था में झाँकते हुए लिखती है। बरेली की शायरा अतिया नूर भी अपने भाव नज़्म में लिखने से पीछे नहीं हटती, उनकी धारदार कलम की ललकार शब्दों से झांक रही हैः 

तहजीबें बचानी हैं हमें / अपनी जागीरें बचानी हैं हमें / मुल्क की अज्मत लगी है दाँव पर / मुल्क की अज्मत बचानी है हमें / अब हिफाजत सारे ऐवानों की हो

अब जमाना बदला है, नारी पुरुष की जागीर नहीं, उसके साथ कंधे से कंधा मिलकर चलने में सक्षम है। आधुनिक नारी पुरुष की संपति मात्र न बनकर उसकी सहभागिनी होकर जीवन व्यतीत करना चाहती है। घर और बाहर की हर परिधि में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने परिवार से, अपने पति से सहकार के अपेक्षा रखती है-

‘मुझे खाध पानी चाहिए फलने फूलने के लिए, डाली के साथ। / मैं खुश हूँ सिर्फ ‘मैं’ होने में!’

इस ‘मैं’ की परिपूर्णता नारी का स्वाभिमान है, उसकी अपनी पहचान है। अब वह स्वयं अपने भले- बुरे की पहचान रखती है, अपने दायित्व को निभाने की  शक्ति रखती है। यह सच है कि स्त्री को पुरुष से कोई विरोध नहीं, हाँ उसकी मानसिकता से जरूर है। पर जब परिस्थितियाँ उसके स्वाभिमान और सम्मान के चिथड़े उड़ाने लगतीं हैं, तब वह चीत्कार उठती है औरत की अन्ना जब उसे मात्र एक जन्मदेने वाली औरत के सिवा कुछ और नहीं समझा जाता. यह उसी नारी कि दास्ताँ है जो माँ भी है, बहु-बेटी भी है और एक जन्मदातिनी भी जो अपने खिलाफ के होते हुए अन्याय के खिलाफ अपनी औलाद को भी अपना पैगाम भी देती है. अत्तिया जी ने भी इसी भाव को अपनी सोच के ताने बानों में आत्मविश्वास के बल पर अभिव्यक्त किया हैः और एक जगह उनका यह लिखना भी सोच में सिलवटें पेश करता है...

“गैरत के नाम पर ‘कारी’ करके मारो, 

किसी को भी दूसरी, तीसरी और चैथी औरत बनाओ.. !”                     भावनात्मक संधी में इसी भाव को आगे ले जाते हुए रायपुर की विदूषी लेखिका नीलिमा मिश्रा जी  अपनी मानसिकता की उलझन को पाठकों के सामने रखते हुए ‘‘कुंती‘‘ नामक इस कविता में कह रही हैः 

सूरज को हथेली में ले, / मुट्ठी में बाँध लिया, हौले हौले,/ हृदय तंतुओं को झंकृत करता, / तपता हुआ वो 

धीरे धीरे उतरा, / पिघलता स्वर्ण सा, मेरे पोर पोर को, उन्मादित करता रहा, वो फिसलता हुआ,                                                आकर ठहरा बीज बनकर, मेरी कोख में, / आकार लेता रहा और मैं, / हतभागी कुंती, ना दे पाई अपना नाम भी उसे/ ममता का आँचल, रिक्त रह गया उस अभागे, / शिशु के लिये, अक्षत योनि का अभिशाप, / भोगती रही मैं कुंती। 

ये शब्द नहीं है, नारी मन की छटपटहाट के प्रतीक हैं। नारी का संघर्ष कल भी था, आज भी है और सदा सतत जारी रहेगा., जब तक उसकी आवाज समाज के बहरे कानों तक नहीं पहुँचती ! 

इसी मानसिकता को एक नया अर्थ देते हुए आतिया दाऊद लिखती हैं....

मुझे गोश्त की थाली समझ कर / चील की तरह झपट पड़ते हो / उसे मैं प्यार समझूँ ? इतनी भोली तो मैं भी नहीं  / मुझसे तुम्हारा मोह ऐसा है / जैसा बिल्ली का छिछड़े से....(मांस का लोथड़ा...12 )

स्त्री की विडम्बना यह है कि उसे केवल पुरुष समाज से जूझना नहीं होता स्त्री जाति से भी होड़ लगी रहती है। सौतन एक ऐसी ही विडम्बना है जिसमें स्त्री ही स्त्री की शत्रु हैः जब पुरुष पूर्ण अधिकार से एक औरत के सामने दूसरी, या फिर तीसरी ले आता है. इस बेगैरत नाइंसाफी को हक का नाम देकर, पर अब बदलते वक्त ने औरत के हक में कुछ सही फैसले लिए है, बावजूद इसके क्या कुछ नहीं होता है रिश्तों के नाम पर। मुंबई की दस्तावेजी हस्ताक्षर संपादिका डॉ. राजम नटराजन पिल्लै नारी की विडम्बना को बयां करते हुए लिखती हैः 

जंजीर नहीं बांधती, कड़ी टूटती है! / फूल नहीं झरते, मिट्टी बिसूरती है! / मीनार नहीं टूटी, बुनियाद हिलती है!

माँ -बाप अनाथ नहीं होते, वृद्धाश्रम में जगह तय हो जाती है!

और मैं नारी मात्र एक मौन दृश्य अद्र्श्यता में देख रही हूँ, बहुत कुछ सुन रही हूँ, पर लगता है गूंगी बहरी हो सी गई हूँ इतना कुछ होने कि जामिन होते हुए. बस इसी जामिन की बयानी और इसी ललकार को एक और कड़ी में जोड़ने को मुन्तजिर मेरी कलम अब विराम चाहती है:

जामिन / किसका जमीर जिंदा है./जो जामिन बनकर/ आईने से आँख मिलाकर/गुनहगार से कह दे/तुम कसूरवार हो!/काव्यधारा-दर्द का अहसास / दामिनी के दर्द का अहसास / होगा उन धड़कते दिलों को / कभी तो होगा.... / यकीनन आज नहीं तो कल / आने वाले कल में, या / होगा तब जब / उनकी अपनी माँ-बहन / बेटी-बहू, या बीवी खुद / रेंगती हुई छटपटाएगी / उन शिकंजों के चंगुल में, / जो पाठ मानवता का / कभी पढ़ न पाये, जिनके / दूध में और ख़ून में / शायद / कभी इंसानियत घुल ही न पाई! / क्या समझेंगे वे पीड़ा / नारी के अपमान की / निर्वस्त्र जब उसकी परतें हुईं / बेलिबासी जिस्म ने जब ओढ़ ली। / कोई पांडव, कृष्ण कोई /अंग-वस्त्र न ला सका!/कोई सुन न पाया/उस उबलते लहू की पुकार/जो किसी दुखियारी माँ की बद्दुआ की चीख थी /जो आग के बदले, आहों को उगलती रह गई / और उगलती ही रहेगी/उस समय तक, जब तक / उस आह के उगले पिघलते लावा में/धंस न जाएगी दरिंदगी,/दर्द की उस बाढ़ में /तब तक नहाएगी गंदगी! / तब अहसास होगा, जरूर होगा/उन्हें, दामिनी के इस दर्द का/जो जिंदगी में जीते जी/दाह पर आह भरती रह गई! 

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सुश्री किरण राठौर, लोधी रोड, नई दिल्ली, मो. 9318358112

अब पता चला

जीवन की भागा-भागी में

कब सुबह हुई, कब शाम हुई

कब धूप खिली, कब रात ढली

ना पता चला, ना पता चला।


जो साथ रहा ना सहा गया

जो छूट गया ना कहा गया

छूटे की ढूंढा-ढांढी में

कब धूप खिली, कब शाम ढली

ना पता चला, ना पता चला।


क्या चाहा था, कुछ याद नहीं

क्या पाया है, कुछ पता नहीं

पाने और चाहने की हसरत में

कब धूप खिली, कब शाम ढली

ना पता चला, ना पता चला


जीवन की आवाजाही में

कुछ बिखर गया, कुछ संवर गया

क्या संवर गया, कुछ पतानहीं

जो बिखर गया उसे याद किया

यादों की आँख-मिचैली में

कब सुबह हुई, कब शाम ढली

ना पता चला, ना पता चला


ये सांझ है मेरे जीवन की

अब वक्त मिला, पलटुं देखुं

एक लम्बा जीवन जी कर के

ये अनुभव मैंने पाया है

मंजिल पाने की चाहत ही

जीवन को सफल बनाती है

अब पता चला, अब पताचला

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