अभिनव इमरोज़ फरवरी 2022






प्राफेसर सादिक़

ग़ज़ल

चै-तरफ़ ही चल रही हैं आरियाँ क़ानून की

दूर कब होंगी बताओ ख़ामियाँ क़ानून की


कब वो दिन आएगा जब इंसाफ़ हम सब पाएँगे

सुनते-सुनते थक चुके हैं ठुमरियाँ क़ानून की


जो भ्रष्टाचार के बल पर बने ‘सत्ता-पति’

लेके चलते हैं सदा बैसाखियाँ क़ानून की


ज़ेहन में भर के दफ़ाएँ घर से निकले हैं वकील

अब अदालत में करेंगे कुल्लियाँ क़ानून की


झूठ की ताक़त किसी थाने में जाकर देख लो

रोज़ उड़ती हैं जहाँ पर धज्जियाँ क़ानून की


एक ही केवल पुलिसवालों का प्यारा खेल है

लेके डंडा खेलते हैं गुल्लियाँ क़ानून की


देखते हो तुम शिखर क़ानून के जितने बुलंद

उतनी ही गहरी समझ लो खाइयाँ क़ानून की


आज के लाॅयर जो सोचो कम क़साई से नहीं

बेचते हैं काटकर यह बोटियाँ क़ानून की


देश के उद्यान में कुछ ढोर-डंगर भी तो हैं

रौंद देते हैं जो अकसर क्यारियाँ क़ानून की


बहस करते दो वकीलों को जो देखा फिल्म में

यों लगा कि लड़ रही हैं बल्लियाँ क़ानून की


जितने घोटाले हुए उसमें सज़्ाा किसको मिली

सब की जेबों में हैं सादिक़ चाबियाँ क़ानून की


साभार

 नई दिल्ली, मो. 8384036071 

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ग़ज़ल

श्री बालस्वरूप राही


शेर जो मैंने कहे उन को सुनाने के लिए

वो ये समझे हैं ये महफ़िल में भुनाने के लिए


ख़ौफ़ या लालच मुझे हर्गिज़ झुका सकते नहीं

मैं झुकूंगा गोद में बच्चा उठाने के लिए


प्यार का रिश्ता करें क़ायम वो ये मंशा नहीं

आज़्ामाते हैं मुझे बस आज़माने के लिए


मेरा दामन शहर ने नाकामियों से भर दिया

शौक़ में भर कर चला था कुछ कमाने के लिए


दोस्तों ने क्यों तलाशी ली है मेरी रात-दिन

पास मेरे तो महज़ ग़्ाम है छिपाने के लिए


उन का दावा है कि दुनिया को बदल डालेंगे वो

पास जिन के सिर्फ़ क़िस्से हैं सुनाने के लिए


फूल-फल मांगे परिन्दे ने कहां किस पेड़ से

चन्द तिनके चाहिएं बस आशियाने के लिए


बस परों से काम जुगनू का कभी चलता नहीं

कुछ तपिश भी है ज़्ारूरी जगमगाने के लिए


जब से कोशिश की ज़रा-सा सर उठाने के लिए

ढूंढता हूं मैं नशेमन सर छिपाने के लिए


मुझ को दिखला दो कहीं तो बेईमानी की शिकस्त

दिल बड़ा बेचैन-सा है मुस्कराने के लिए


यों तो राहों ने बड़ी तकलीफ़ दी राही मगर

गीत तो बख़्शे कई हैं गुनगुनाने के लिए

साभार

नई दिल्ली, मो. 9958479432  

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ग़ज़ल

श्री सत्यप्रकाश उप्पल


मधुबन ख़ुशबू छलकाएँगे

फिर अपने दुख याद आयेंगे


ख़्वाबों के रंगीन परिन्दे

पकड़ोगे तो मर जाएँगे


बाँध कफ़न जो घर से निकले

घर लौटे तो पछताएँगे


मन में एक जुनून हुआ तो

सब दरवाज़े खुल जाएँगे


ख़ुशबू आवारा भटकेगी

फूल खिलेंगे मुरझाएँगे


हँसते हँसते फिर रो देंगे

ज़ख़्मों को जब सहलाएँगे


सागर का दुःख सुनने वाले 

पर्वत निर्झर हो जाएँगे 

मोगा, मो. 9876428718 

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ग़ज़ल

श्री विज्ञान व्रत

राज़ ये अब क्या छुपाना

आप हैं मेरा फ़साना


याद जिन को हूँ नहीं अब

चाहता हूँ भूल जाना


मत मिलो गर मन नहीं है

क्यूँ बनाते हो बहाना


याद रखना सिर्फ़ ख़ुद को

और सब कुछ भूल जाना


मैं रहूँगा सिर्फ़ घर में

आप रक्खें ये घराना

नोएडा, मो. 9810224571 

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ग़ज़ल

जनाब ज़ाहिद अबरोल


जब से अपनाई है फितरत उस कली ने ख़ार की

ख़ार सी लगने लगी है हर कली गुलज़ार की


आ गए वो दाद देने हसरत-ए-दीदार की

ख़त्म होने को थी जिस दम जि़्ान्दगी बीमार की


चाँद, गुल क़ौस-ए-कुज़्ाह1 सब को ख़फ़ा हम ने किया

नामुकम्मल ही रही ता’रीफ़ उस रूख़्सार की


तोड़ दे तन्हाइयों की आहनी-2 दीवार को

ख़ामुशी खा जाएगी वरना इसी दीवार की


मौसम-ए-बारिश में घर से कम निकलते हैं सभी

इन दिनों में सूख जाती है नदी दीदार की


यास3 के साए में है ‘‘ज़ाहिद’’ उमीदों का चमन

ज़िन्दगी अब मुस्कराहट है किसी बीमार की

ऊना (हिमाचल प्रदेश), मो. 98166 43939


1. इन्द्रधनुष, 2. लोहे की, 3. निराशा

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ग़ज़ल

जनाब सागर सियालकोटी


प्यार है तो प्यार का इज़्ाहार होना चाहिए

बिक सके ‘यूसुफ’ कोई बाज़्ाार होना चाहिए


लोग तो अब झूठ को ईमान बतलाने लगे

कुछ न कुछ तो शख़्स का किरदार होना चाहिए


क़ाफ़िला दर क़ाफ़िला कोहे सफ़र दरकार है

मुश्किलों में रास्ता हमवार होना चाहिए


आशिकी सच्ची इबादत ये हक़ीक़त जान लो

वस्ल तो लाजि़्ाम नहीं दीदार होना चाहिए


डूब जाने का नहीं ग़्ाम प्यार में यूँ दोस्तो

दोस्ती जि़्ान्दा रहे एतबार होना चाहिए

-लुधियाना, मो. 9876865957

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डॉ. रमेश मिलन हिंदी साहित्य के सशक्त एवं सम्मानित हस्ताक्षर हैं। एन.सी.ई.आर.टी. तथा अकादमिक पुरस्कारों से अलंकृत मिलन जी की विविध विधाओं में दो दर्जन से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं दिल्ली के निजी विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में आपकी रचनाओं का समावेश है तथा मराठी, तमिल भाषाओं में आपकी पुस्तकें अनूदित हो चुकी हैं। -संपादक


आलेख

डॉ. रमेश मिलन


‘‘हिन्दी कविताओं में वसंत’’

हमारा देश विभिन्न ऋतुओं का रंगमंच है। यहाँ एक वर्ष में छ (6) आनंददायी ऋतुएँ अपनी छटाएँ बिखेरती हैं- वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद हेमंत और शिशिर। अपनी अद्भुत और मंत्रमुग्ध छवियों से सम्मोहित करती हुईं ऋतुओं का आवगमन निरंतर होता रहता है। ऋतुओं का यह परिवर्तन मनुष्य के जीवन चक्र की तरह चलता रहता है। ये ऋतुएँ बारी-बारी से भारतमाता का श्रृंगार करती हैं। इन्हीें ऋतुओं में से एक है वसंत ऋतु। वसंत का नाम आते ही मन-मयूर नृत्य करने लगता है और एक अलौकिक आनंद की अनुभूति हेाती है। वसंत के आगमन से प्रकृति सिहर उठती है, मन-प्राणों की बगिया रिवल उठती है। फरवरी माह से अपनी गंध-सुगंध से सुवासित करता हुआ वसंत अप्रेल के मध्य तक मदहोश किए रहता है।

प्रकृति उपासक महाकवि कालिदास ने अपने ‘ऋतु संहार’ ग्रंथ में ऋतुओं का वर्णन करते हुए वसंत ऋतु को मन-मोहिनी बताया है। पेड़-पौधे, लताएँ रंग-बिरंगे फूलों से लद जाती हैं। महाकवि ने अशोक वृक्ष के खिलते हुए लाल-पीले और सुगंधित फूलों का, आम की मंजरियों की सुंदरता और पुष्पों की भीनी-भीनी गंध का मनमोहक चित्रण किया है। वसंत में कनेर, कुरबक, चम्पा, दुपहरिया, लोध आदि के पुष्पों का आकर्षण तो बस देखते ही बनता है।

सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा की कुछ पंक्तियों का अवलोकन करें-

स्वप्न से किसने जगाया

मैं सुरभि हूँ

छोड़ कोमल फूल का घर

ढूढ़ती हूँ कुंज निर्झर

पूछती हूँ नवधरा से

क्यों नहीं ऋतुराज आया

मैं ऋतुओं में प्यारा वसंत

मेरी पग ध्वनि सुन जग जागा

कण-कण में छवि मधुरस मांगा

नव-जीवन का संगीत बहा

पुलकों से भर आया दिगंत

मेरे स्वपनों की निधि अनंत

मैं ऋतुओं में न्यारा वसंत।

वसंत ऋतु की प्रतीक्षा में सुमित्रानंदन पंत कह उठते हैं-

फिर वसंत की आत्मा आई

मिटे प्रतीक्षा के दुर्बह क्षण

अभिवादन करता भू का मन

दीप्त दिशाओं के वातायन

प्रीतिसांस-सा मलय समीरण

चंचल नीर, नवल भू यौवन

फिर वसंत की आत्मा आई।

मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी खुश है, तितलियाँ फूलों पर मंडराने लगी हैं। आम की मंजरियों से मुग्ध होकर कोयल कुहू-कुहू की रट लगा रही है। ऐसे में भला भौंरे भी क्यों चुप रहें, वे गुन-गुन करके बागों में डोल रहे हैं। सोहन लाल द्विवेदी वसंत के सौंदर्य का अद्भुत चित्रण कुछ इस प्रकार करते हैं-

आया वसंत आया वसंत

छाई जग में शोभा अनंत

सरसों खेतों में उठी फूल

बौरें आमों में उठीं झूल

बेलों में फूले नए फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत

आया वसंत आया वसंत।

सुभद्रा कुमारी चैहान ने तो वसंत को वीरता के भावों से ओत-प्रोत करते हुए प्रेरणादायी उद्बोधन किया है-

वीरों का कैसा हो वसंत

आ रही हिमाचल से पुकार

है उदधि गरजता बार-बार

प्राची-पश्चिम भू-नभ अपार

सब पूछ रहे हैं दिग्-दिगंत

वीरों का कैसा हो वसंत

फूली सरसों ने दिया रंग

मधु लेकर आ पहुँचा अनंग

वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग

है वीर वेष में किंतु कंत

वीरों का कैसा हो वसंत

वसंत ऋतु में सुंदर मंद समीर बहने लगता है। खेतों में झूमती हुई गेहूँ की बालें किसानों के मन में आशा की नई किरणें पैदा कर देती हैं। केदारनाथ अग्रवाल की वसंती हवा की अठखेलियों का एक गान-

हवा हूँ हवा मैं वसंती हवा हूँ

सुनो बात मेरी, अनोखी हवा हूँ

बड़ी बावली, बड़ी मस्तमौला

नहीं कुछ फिकर है

बड़ी ही निडर हूँ

जिधर चाहती हूँ

उधर घूमती हूँ

मुसाफिर अजब हूँ

हवा हूँ हवा मैं वसंत हवा हूँ।

कामदेव को वसंत का दूत माना जाता है। कामदेव उल्लास और उमंग के प्रतीक हैं। वे जीवन में उत्साह भरते हैं। इसी उत्साह से जीवन के सभी कलाप संचालित होते हैं। इन्हीं से जीवन जीने की चाह उत्पन्न होती है। वसंत ऋतु की इन्हीं सूक्तियों के कारण गीता में भगवान कृष्ण ने कहा था- ऋतुओं में मैं वसंत हूँ इस ऋतु में व्रजधाम  में वे गोपियों के साथ नृत्य-रास करते होंगे। गोपालदास नीरज की ये पंक्तियाँ इन्हीं भावों का समर्थन करती दिखाई देती हैं-

आज वसंत की रात

गमन की बात ना करना

धूप बिछाए फूल बिछौना

बगिया पहने चाँदी सोना

कलियाँ फेंके जादू टोना

महक उठे सब पात

हवन की बात ना करना

आज कंत की रात

गमन की बात ना करना।

और कंचन पांडेय ने भी इसी का समर्थन करते हुए क्या खूब कहा है-

आ गया वसंत है, छा गया वसंत है

खेल रही है गौरैया सरसों की बाल से

मधुमाती गंध उठी अम्बा की डाल से

फिर से जमुना तट पर,

कुंज में, पनघट पर,

खेल रहा छलिया

आ गया वसंत है, छा गया वसंत है।

वसंत ऋतु में वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इसी दिन माँ देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इस दिन पीले वस्त्र धारण करके माँ सरस्वती का पूजन किया जाता है। केसरिया खीर और हलवा बाँटा जाता है। ज्ञान की देवी सरस्वती के संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ-

ऋतु वसंती का पंचम दिन

सरस्वती का हुआ अवतरण

ज्ञान और विज्ञान की देवी

वीणा पर संगीत बजाया

आया रे नव वसंत आया।                        

पौरुष के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का मन तो वसंतागमन से इतना आनंदित हुआ कि इनको आलस, निराशा, बाधाएँ दूर करके नया जीवन जीने की इच्छा उत्पन्न हो गई है। जिस प्रकार वसंत की हरियाली चारों ओर बिखरी है, उसी प्रकार कवि यशस्वी होना चाहता है। वसंत आगमन से पेड़ों पर नए पल्लव आने लगे हैं और सभी में नई कलियों और नए प्रभात से एक नए उत्साह का संचार हुआ है। निराला जी तो कवियों में स्वयं वसंत हैं। 

अभी न होगा मेरा अंत

अभी-अभी तो आया है

मेरे मन में मृदुल वसंत

अभी न होगा मेरा अंत

डालियाँ, कलियाँ, कोमल गात

मैं हूँ अपना स्पप्न-मृदुल-कर

फेरूंगा निद्रित कलियों पर

जगा एक प्रत्यूष मनोहर

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको 

हैं मेरे वे जहाँ अनन्त

अभी न होगा मेरा अंत

मेरे मन में मृदुल वसंत।

वसंत में चारों ओर रंग-बिरंगें फूल बच्चों के समान मुस्करा उठते हैं। धरती का आँगन सरसों के पीले फूलों से भर जाता है। चम्पा और चमेली अपने आसपास के वातावरण को सुगंध से सुवासित कर देते हैं-

ऋतु वसंती ये अलवेली

कहीं पै चम्पा कहीं चमेली

टेसू और गुलाब मोंगरा

ले ऋतुराज नवेला आया

आया रे नव वसंत आया।

वात्स्यायन और जयदेव ने भी वसंत को अनेकानेक उपमायें देकर उसका मनोहारी रूपांकन किया है।

पदमाकर को तो वसंत का भी कवि कहा जाता है। वसंत के संदर्भ में उनकी अलंकारिक पंक्तियाँ-

कूलिन में केलिन में कछारन में कुंजन में

ब्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है,

वीथिन में ब्रज में नवेलिन में बोलिन में

बनन में वासन में बग्रयौ वसंत है।

प्रबुद्ध कवि डाॅ. सुनील देवधर के अनुसार वसंत ने अपने अद्भुत रूप से जग के सभी प्राणियों को लुभा कर अपने वश में कर लिया है, कवि का हृदय भी वसंत की सौगंध देकर अपने प्राण प्रिय को अपने मन-आँगन में हमेशा के लिए बसा लेना चाहता है-

वासंती मौसम से रंग कुछ उधार लिए

कैसा वन-उपवन सा रूप ये सजा लिया

रस भिने दिन की सौगंध तुम्हें प्राण प्रिय

मैंने मन आँगन में तुम्हें है बसा लिया

संध्या सिंदूरी के पवन गीत गाती है

भंवरों को कली-कली दूर से लुभाती है

राग के प्रसंगों में रति और रंगों में

ऋतु के इस उत्सव ने सबको लुभा लिया

इस प्रकार वसंत को कवियों ने अपनी साहित्यिक कविताओं में महत्वपूर्ण स्थान देकर उसे विशिष्ट गौरव प्रदान किया है। वसंत आगमन पर जिस प्रकार प्रकृति स्वस्थ और निर्मल हो जाती है, उसी प्रकार चहुं दिशि आनंद और उल्लास के वातावरण में सभी प्राणियों के हृदय में खुशियों की उमंग-तरंग प्रवाहित होने लगती है।

वसंत आगमन पर पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ, नदियाँ, ऊँचे पर्वत शिखर, जल, वायु, भूमि की सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी आकर्षण एवं विशिष्ट भंगिमाओं से अलौकिक रूप-स्वरूप प्रदान करते हैं। तो आइये, पर्यावरण के प्रति जनचेतना का जन-जागरण करते हुए वसंत का स्वागत करें और अधिकाधिक वृक्षारोपण करके उनके संरक्षण का संकल्प लें जिससे हमारे हृदय में भी सुख, शांति, समृद्धि और सौंदर्य की अतिशय आनंदमयी-अमृतमयी पावन गंगा प्रवाहित हो। वसंतोत्सव के शुभ आगमन पर सभी का शत-शत वंदन-अभिनंदन।   -मुम्बई, मो. 9029784346

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कहानी

डाॅ. चेतना उपाध्याय

‘‘लल्लू चाचा’’


कॉलोनी के बाहर ही ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी। अंदर जाने की जगह ही नहीं थी। कारण कुछ समझ नहीं आया, तो वह उतरा और पूछताछ की....... उसे लगा था कि किसी अति महत्वपूर्ण व्यक्ति का आगमन हुआ है। मगर पूछताछ से पता चला कि लल्लू जी का देहवासान हुआ है उन्हीं के तीये की बैठक हैं। लगभग हजारों आदमियों का जमावड़ा लग रहा था सभी आपस में बतिया रहे थे...... बहुत अच्छा इंसान था। हमारी तो बहुत सेवा की। हर कोई उनकी सेवा भावना की चर्चा करता नजर आया। सभी के चेहरे पर मृतात्मा के प्रति आत्मीयता के भाव थे। और यह भी आम जुमला था कि अरे....... उसका है कौन.....? कौन करेगा ? कौन आएगा ? चलो हम ही चले जाते हैं। बस ऐसा ही हर कोई बोल रहा था...... और वहां उपस्थित जनसमुदाय को देखकर आश्चर्यचकित हो रहा था।

मेरी आंखें भी डबडबा गई। वास्तव में वह अनूठा व्यक्तित्व था उन्हें हर किसी से आत्मीयता रहती थी......... पर उन्हें जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर इस कदर अपनापन प्राप्त हो पाएगा ऐसी भी उम्मीद ना थी आज की दुनिया में जहां स्वार्थ को प्राथमिकता दी जाने लगी है। निःस्वार्थ भाव से जनमानस की उपस्थिति सभी को आश्चर्यचकित कर देने वाली थी। हालांकि यह भी सच है कि लल्लू जी ने भी सभी की सेवा निःस्वार्थ भाव से हमेशा ही की थी। उन्हें कभी किसी से कोई अपेक्षा ना रही थी। कोई जो कुछ अपनी मर्जी से दे दे, तो ठीक । ना दे, तो भी ठीक। दो बोल कोई प्रेम से बोल दे तो निहाल हो जाते थे। ना बोले तो भी कोई मलाल नहीं दर्शाते थे। एकदम उदासीन जीवन था उनका, खुश रहते थे, खुश रखते थे। हर व्यक्ति की सेवा ईश सेवा मान ही करते थे। जो मिला खा लिया, जो मिला पहन लिया कुछ भी दो, सभी तहे दिल से स्वीकारते। कई बार तो कुछ मनचले किशोर काम के एवज में उन्हें जमीन से कंकड़ पत्थर उठाकर पकड़ा देते थे, वह उसे भी आत्मीयता से स्वीकारते थे। बच्चे कितना भी उनका मज़ाक उड़ा लें, वे किसी भी बात का बुरा नहीं मानते थे। सब कुछ हरि इच्छा रूप में स्वीकारते। बहुत भले इंसान थे। उन्हें किन्नर कहना तो अपने आप को गाली देना होता था। सभी के मुखारबिंद से यही शब्द प्रस्फुटित हो रहे थे।

लल्लू जी कहने वाले अब कम ही लोग बचे थे। लल्लू भैया, लल्लू चाचा, लल्लू मामा इसी संबोधन से पुकारे जाते थे। आज सभी की आंखों में नमी सी छाई थी। मेरी आंखों से भी स्नेहिल बूंदें टपक पड़ी। उनका जाना सभी को गमगीन कर रहा था। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया से कूच............... किया था। आमतौर पर इस उम्र तक आते-आते 20-25 व्यक्तियों का नाती-पोतियो का परिवार होता है, पर उनके पास अपना कहने को कोई नहीं......... नहीं-नहीं मैं गलत हूं। यहां तो पूरा शहर ही उनका अपना नजर आ रहा है।

फिर मैंने ऑटो ड्राइवर से कहा, भैया कृपया आप मेरा लगेज घर तक पहुंचा दो। गाड़ी तो आगे नहीं जा पाएगी। जी हां मैं पहुंचा देता हूं। मेरा वाक्य खत्म होने से पूर्व ही उन्होंने बैग उठाया और मेरे द्वारा बताई दिशा में चल दिए। बिलकुल वैसे ही जैसे अक्सर ही लल्लू चाचा गाड़ी रुकते ही बैग उठाकर तेजी से चल दिया करते थे।

कुछ देर मैं, वही बैठक में शामिल रही। उसके बाद घर में प्रवेश किया। बड़ी दुखद खबर थी किसी काम में मन नहीं लग रहा था। हालांकि इस दुनिया से कूच कर जाने की उनकी उम्र हो चली थी। मगर शरीर में युवाओं सी ऊर्जा थी। उम्र का पता ही नहीं चलता था। हर एक की सेवा के लिए हर पल हाजिर रहते थे...... चेहरे पर सदैव मुस्कान ही अठखेलियां करती रहती थी। वैसे उनकी लहरदार चाल पर बच्चे अक्सर ही हंसते थे। वह भी साथ में हंस लेते थे, क्या करूं? यह निगोड़ी चाल बचपन से ही ऐसी ही है। सुधरती ही नहीं। उनके व्यक्तित्व की गंभीरता और सहजता तुरंत ही सामने वाले के मुंह पर ताला जड़ देती थी। चाल के अलावा अन्य कोई संकेत उनके किन्नर होने का, उनके व्यवहार से नहीं मिलता। हर व्यक्ति सच्चे सेवक के रूप में उन्हें पहचानता था। मगर आज जाने के बाद वह दिव्य पुरुष सा महसूस हो रहा था। सच इतनी भीड़ तो राजनेताओं या फिल्मी हस्तियों के अलावा और कहीं दिखाई नहीं देती।

अगले दिन उनका कमरा खंगाला गया। जहां कुछ थोड़ा सा जरूरी सामान, कुछ नए पुराने कपड़े एक बैंक पासबुक और कुछ रूपए...... अरे नहीं, बहुत सारे रुपए बॉक्स में रखे थे। हिसाब लगाया तो वह 80 लाख रूपए निकले। इतना कैसे जमा हो गया ? उनकी तो कोई बंधी हुई कमाई भी ना थी। जो भी किसी ने सेवा के बदले दिया दे दिया, वे चुपचाप रख लेते थे। कभी किसी से कुछ मांगा नहीं। पर इतना पैसा कैसे इक्कठा हो गया ? इसका मतलब है उन्होंने अपने पर कभी कोई खर्च किया ही नहीं। जो मिला खा लिया, पहनने को मिला तो पहन लिया। विवाह, गृह प्रवेश, जन्मोत्सव इत्यादि पर उपहार स्वरूप जो दिया वह रख लिया। जो कुछ मिला बस जमा हो गया। उनसे जुड़े दृश्य आंखों के आगे तैरते-तैरते कहां से कहां चले गए। एकदम से सब कुछ याद आने लगा।

घर के पिछवाड़े में शौचालय के पास रखी टंकी के पीछे एक 4-5 वर्ष का लड़का दुबका हुआ सा बैठा था। दादीजी की नजर पड़ी तो दादीजी भी एकदम से धक्क सी रह गई और वह लड़का भी सहम गया। उसके गालों पर सूखे हुए आंसूओं की सूखी सूखी रेखाएं बता रही थी कि वह काफी लंबे अरसे से रोता रहा है गाल भी कुछ अजीब तरह से फूले हुए दिख रहे थे। दादीजी ने पहले तो उसे धुड़का.... मगर उसने कुछ जवाब ना दिया। वो चुपचाप घुटने के मध्य मुंह दबा कर बैठा रहा। दोबारा पूछा तो रो पड़ा वह...... मुंह से आवाज निकल नहीं रही थी....... फिर पलभर में ही उस पर मुर्छा छा गई। उसके शरीर पर डंडों की मार के लाल नीले पीले निशान नजर आ रहे थे। पानी के छींटे डाले तो वह होश में आ गया ध्यान से देखने पर पाया कि उसके मुंह में कपड़ा टुसा हुआ है। ओह यह तो सताया हुआ प्राणी लगता है। चोरी चकारी वाली स्थिति तो है नहीं..... ताऊ जी ने तुरंत उसे पुलिस के हवाले कर देने को कहा। मगर दादीजी का मन उसकी मासूमियत पर डोल गया। इतने में रघु चाचा भी आ गए। उन्होंने भी कोशिश की वह बच्चा कुछ बोले मगर मुंह तो उसका ठीक से खुल ही नहीं पा रहा था उसके मुंह में ठंुसा हुआ कपड़ा निकालना पड़ेगा...... वह स्वयं अपना हाथ मुंह तक उठा नहीं पा रहा है। तो फिर पड़ोसी कंपाउंडर भैया को बुलवाया गया..... रघु चाचा तो स्वयं पुलिस महकमे में ही है। उन्होंने अपनी सुरक्षा की खातिर रिपोर्ट तो दर्ज करवा ही ली।

कंपाउंडर भैया ने उसके मुंह से कपड़े बड़ी मुश्किल से निकाले......... गले तक ढूंस ढूंस कर भरे गए थे। उसका गला भीतर से छिल सा गया था। उन्होंने वहीं उसे प्राथमिक सहायता दे दी। उसके बाद चाचा ने उसे पहने कपड़े उतारने को कहा...... उसने शर्ट उतार दी मगर निक्कर नहीं उतारी....... दादी बोली रहने दो, घबरा रहा है बेचारा....... चल वहीं बरामदे में लगे नल पर नहा ले। पता नहीं कब से नहाया नहीं है। चाचा ने उसे वही नहाने को साबुन दिया। तो वहां तुरंत नल खोल उसके नीचे खुशी-खुशी खड़ा हो गया।

दादी पुराने बक्से में से छांटकर उसके नाप के कपड़े निकाल लायी। नहा धोकर उसने कपड़े बदल लिए....... हालांकि दादी को उसकी सहायता करनी पड़ी क्योंकि वह हाथ ठीक से उठा नहीं पा रहा था। रघु चाचा ने पुनः उसे पुलिस चैकी ले जाने का प्रयास किया मगर वह दादी के पैरों में लिपट गया। इशारों-इशारों में ही उसने समझाया घर से बाहर नहीं जाऊंगा। कंपाउंडर भैया ने कहा इसका गला कपड़े की रगड़ से छिल गया है। दो-चार दिन में ठीक हो जाएगा। तब ही पूछ लेना हो सकता है तब कुछ बोल पाए, बता पाए।

मम्मी उसके लिए गुड़ की राब बना लाई। वह जैसे तैसे उसे निगल गया। कंपाउंडर भैया ने कोई दवा भी दी पानी में घोलकर...... भैया बोले अब इसे थोड़ी देर में ही नींद आ जाएगी। बाद में जब उठे तब बात करना......... उसे वही पिछवाड़े वाले बरामदे में ही खाट पर सोने को कहा, तो झट से वह वहां जा कर सो गया। बरामदा बाहर से बंद कर दिया और अपने कमरे को भीतर से बंद कर लिया गया। ताकि उस बच्चे से हमें कहीं कोई नुकसान ना हो......

दो-चार दिन यूं ही चुपचाप निकल गए। वह मासूम बालक सुनता समझता था, बोलने का प्रयास भी करता मगर उसके मुंह से आवाज नहीं निकलती। गुड़ की राब, चाय, हल्दी वाला दूध उसे नियमित मिलता रहा। रघु चाचा भी उसकी खैर खबर लेते रहे मगर उसका कहीं कोई सुराग ना मिला ....... कुछ दिनों बाद धीरे-धीरे उसके बोल स्पष्ट होने लगे जिससे सारा माजरा समझ आ गया।

हुआ यूं कि उसके जन्म के कुछ ही समय पश्चात किन्नर आ गए.....मात्र नेग चार लेने नहीं, उन्हें तो अपनी जमात का बच्चा चाहिए था। घर वालों ने उनकी मांग को नहीं स्वीकारा...... तो उस समय वह बच गया....... ढाई-तीन साल बाद वे फिर आए उसे लेने........ धमकियां भी दी। मगर उसके घर वालों ने उसे उन्हें नहीं सौंपा। एक दिन बरामदे के बाहर खेलते समय किन्नरों को मौका मिल गया और वह इसे उठा ले गए। घरवालों ने बहुत ढूंढा। पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज करवाई मगर कुछ पता ना चला। एक दिन नजर बचाकर वह बालक उनके चंगुल से भाग छूटा। रास्ते में कोई परिचित मिल गया तो उनके सहयोग से वह सकुशल अपने घर पहुंच गया। उसके बाद उसका घर से बाहर निकलना बंद हो गया। उसके माता पिता चाहते थे कि उसे सामान्य बच्चों की सी परवरिश मिले। वे सामान्य बालकों की तरह ही रह पाए। वह स्वयं भी सामान्य लड़कों सा ही था। वह तो अस्पताल के रजिस्टर से किन्नर होने की जानकारी किन्नरों को मिल गई थी। जो कि उसके लिए मुसीबत का कारण बन गई।

घर में शिक्षित वातावरण था तो उसको घर में ही पढ़ाई लिखाई का अवसर भी मिल गया। उसकी बौद्धिक क्षमताओं को देखते हुए उसके उज्जवल भविष्य की कल्पना में उसे विद्यालय में प्रवेश दिलवाया गया। मगर उसके स्कूल जाने की भनक भी उन किन्नरों को मिल गई थी। जो कि उसके लिए घातक सिद्ध हुई। चाक-चैबंद सुरक्षा घेरे के बावजूद भी एक दिन किन्नरों द्वारा उसे उठा लिया गया।

पहले भी एक बार वह उन्हें गच्चा देकर भाग निकला था तो इस बार वह भी चैकनें थे। और एक जगह से दूसरे जगह तेजी से बदल रहे थे। उनकी तहजीब इसे रास ना आ रही थी। पारिवारिक बिछोह तो पीड़ादायक रहता ही है। विरोध करने पर उन्होंने तरह-तरह की यातनाएं दी। भोजन तक नहीं दिया। इसके रोने चिल्लाने पर डर के कारण उसके मुंह में कपड़े ढूंस दिए। ताकि बाहर रोने की आवाज ना जाए। हाथ पैर बांधकर पटक दिया। उसके परिवार वाले उसे खोज न पाए। समाज, पुलिस किसी की भी अन्य सहायता ना मिली। ना ही बच्चे को भागने का अवसर। कई महीनों यूं ही गुजर गए.......अब उसके विरोधी स्वर भी कुछ मंद पड़ गए। फिर वह इसे लेकर पुनः रेल यात्रा पर निकले अतः हाथ पैर खोल दिए। पर निगरानी में कस कर हाथ पकड़े रखा। ट्रैन में किसी बात पर उनकी यात्री के साथ कहासुनी हो गई। टीटी ने बीच-बचाव किया था तो यह लोग उनसे भी बदतमीजी करने लगे। टीटी गुस्से से चिल्ला उठा और उसने इनको कोच से बाहर खदेड़ दिया ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ चुकी थी। अफरा-तफरी सी मच उठी। उन्होंने अपने कोच में पुनः चढ़ने की कोशिश भी की। मगर लोगों द्वारा धकेल दिए गए। ट्रेन रफ्तार पकड़ गयी। अब यह बच्चा कोच में कोने में दुबका बैठा रहा। फिर अगले स्टेशन पर गाड़ी से उतर बचते-बचाते हमारे घर में आ गया। पैरों से चलकर वह जैसे-तैसे आ गया। मगर उसमें इतनी ताकत व समझ नहीं बन पाई कि मुंह से कपड़े भी बाहर निकाल सके। उसने इस तकलीफ को इतना सहा कि विश्वास ही नहीं रहा जब हाथ खुल गए तो कि वह स्वयं मुंह भी खोल सकता है। खैर.........

पुलिस विभाग से कोई सूचना नहीं मिली। वह बालक अपना नाम पता बता नहीं पाया। बस दादी जी ने उसे लल्लू कहकर पुकारना शुरू कर दिया और वह लल्लू ही होकर रह गया। वह बड़ा ही आज्ञाकारी वह सेवाभावी बालक था। इसलिए जल्दी ही पूरे परिवार का चहेता बन गया। अहाते में उसी खाट पर रात को सोता था वह। और सारा दिन सभी के कामों में मदद करता रहता था। घर के बाहर उसने कभी कदम नहीं बढ़ाया। वह कौन था, कहां से आया उसके माता पिता कौन थे एक अनसुलझा रहस्य ही बना रहा।

छोटे बच्चों के पास बैठ कर पढ़ाई करना और लेखन कार्य में मदद करना उसे बहुत पसंद था। दादीजी ने चाहा इसे भी स्कूल में प्रवेश दिलवा दिया जाए। मगर वह घर से बाहर कदम रखने को राजी ना हुआ। कई बार प्रयास किए। मगर वह रोता रोता दादी जी के पैरों में लिपट जाता। उसे डर था कि स्कूल जाएगा तो किन्नर उसे उठा ले जायेंगे। उसका रुदन दिल दहला देने वाला होता था। उसने बच्चों के पास बैठकर पढ़ने लिखने के प्रयास किए और उस समय उसे सफलता भी मिल गई.....

वह सवेरे उठकर दादीजी को पूजा घर की सफाई में व पूजन सामग्री एकत्र करने में मदद करता। फिर बच्चों का स्कूल बैग जमाने में आगे रहता। फिर बच्चों के स्कूल जाने के बाद खुद भी नहा धोकर तैयार होता और सीधा रसोई में जाकर मदद करने लगता। फिर सब के जूते पॉलिश करता। नाश्ता, खाना जो भी मिला खुशी-खुशी खाता। अब वह हमारे परिवार का अभिन्न सदस्य हो गया था। सभी का चहेता बन गया था वो।

किशोरवय पर उनकी चाल में हल्का सा परिवर्तन आया था, जो कि कभी-कभी उनके किन्नर होने का आभास करा देता था। अन्यथा अन्य कोई परिवर्तन उसके किन्नर होने का आभास नहीं देता था। आवाज तो गला भीतर से छिल जाने से उसकी कुछ विशिष्ट ही थी। और अब वह हमारे परिवार को ही अपना परिवार स्वीकार चुका था। अहाते में उसकी खाट के ऊपर पहले टीन शेड डला, फिर चारदीवारी, बंद दरवाजा भी लग गया। अब वह कक्ष उसका आशियाना था।

फिर धीरे-धीरे अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलते-खेलते उसके कदम घर के बाहर भी निडरता पूर्वक निकलने लगे। एक बार डर दूर हो जाने के बाद धीरे-धीरे उसने पास की दुकान से दूध, फल, सब्जी लाने का कार्य भी संभाल लिया। गेहूं पिसाने का काम भी वही करने लगा। गेहूं का पीपा कंधे पर ऐसे उठाकर चलता जैसे कोमल सा फूल लेकर जा रहा हो। पड़ोस वाली आंटीजी जी भी अक्सर उससे गेहूं पिसवाने जाने में मदद लेने लगी। शंकर अंकल के पैर में फ्रैक्चर हुआ तो उनके घर में गेहूं पीसवाना भी लल्लू की जिम्मेदारी हो गया। वह हर किसी की मदद को आतुर ही रहता। उसकी सेवा भावना का हर कोई कायल ही रहता। यही कारण था कि धीरे-धीरे वह हर किसी का चहेता बन गया। पर सबसे बड़ी बात, उसे सभी का अपनत्व प्राप्त हुआ। हमारे घर में भी उसे पूरी स्नेहिल स्वतंत्रता थी। उसकी जो मर्जी हो वह करें, जहां जाना हो जाए। किसी किस्म की रोक-टोक नहीं।

समय अपने विशिष्ट पंखों के सहारे तेजी से उड़ता रहा। लल्लूजी ‘‘लल्लू चाचा, लल्लू मामा में तब्दील हो गए। उनकी सेवा भावना की खुशबू पूरी कॉलोनी में फैल गई। वह हर किसी की सेवा को सदैव तत्पर रहते ही थे। पीढ़ियाँ बदल गई। परिवार बढ़कर फैल गए। कॉलोनी के बाहर जब यहां के बच्चे बसने लगे तो लल्लू चाचा/मामा की सेवाभावी खुशबू भी बाहर फैलने लगी। और इस तरह कॉलोनी के बाहर भी उनके चर्चे होने लगे। परिवारों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी भी बुढ़ापे की ओर अग्रसर होने लगी। मगर लल्लू चाचा/मामा फिर भी चाचा/मामा ही बने रहे। इसी युवा रूपहले रिश्ते की बदौलत बुढापा उन्हें छू भी ना सका। मैं भी सात समुंदर पार पहुंच गई थी। व्यस्तताऐं और प्राथमिकताएं बदल चुकी थी। कभी कभार खैर-खबर मिल जाती थी। रेल यात्राओं के दौरान कभी किन्नरों के भौंड़े स्वरूप को देखती तो बड़ी ही कोफ्त होती, पैसा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि मैंने लल्लू चाचा के रूप में किन्नर का जो सादगीभरा इन्सानियत से ओत-प्रोत स्वरूप देखा था उसका कहीं कोई सानी ना था। 

अजमेर मो. 9828186706, 8094554488

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कविता

सुश्री शीला चित्रवंशी


‘‘मैं और तुम’’

अपना अपना करके हमने त्याग दिया सब कुछ अपना

केवल ‘‘मैं’’ ही अपना बाकी है सीमित हो जाते शब्द यहाँ

दिल ही दिल की बातों से दिल न सम्भलता है लेकिन

संगी साथी साथ के हों दिल कह जाता है सब कुछ

तुम धीर सतह समुंदर जैसे मैं गागर से सागर भरती

तुम सागर मैं नदिया जैसी तुम स्थिर मैं हलचल उसकी

बहती नदिया की धार हूँ मैं कल कल करती आवाज हूँ मैं

तूफ़ानों विपदाओ का मैं भार सम्भाले रहती हूँ

माँ का नाम जुड़ा मुझसे माँ तले दबी ही रहती हूँ

नील गगन धरती पर झुकता दूर दृष्टि से कभी-कभी

तब कुछ कुछ सोच अलग हो जाती समझूँ भी मैं कैसे उसे

धरा तो हूँ धरती का बोझ उठाए रहती हूँ

माँ का नाम जुड़ा मुझसे माँ तले दबी ही रहती हूँ

नील गगन के साये में जन जीवन चलता रहता है

पर मेरे बिना क्या सम्भव है जीवन-यापन चलना-फिरना

आकाश में पक्षी उड़ते हैं पर करते हैं विश्राम यहाँ

ऋषी, मुनी, तपस्वी, योगी करते हैं सब ध्यान यहाँ

गत वर्ष बीती बातों को समझाउँ मै किसे किसे

यही विधा है यहीं सुधा है यह बिसराऊँ भी तो कैसे

आकाश में पक्षी उड़ते है

यह बिसराऊँ भी कैसे.......

गत वर्ष बीती बातों को समझाऊँ भी..                                                                       नोएडा, मो. 9711421367

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ग़ज़ल

जनाब केवल गोस्वामी


तर्के तआलुक करके किसे मुहं दिखाए गें 

पीछा करेंगी लानतें जिस ओर जाओ गे 


पागल हवा चिढ़ाए गी ताली बजाए गी

किस अंधी गुफा मे अपना मुहं छिपाओ गे


जी की जलन हर पल तुम्हारे साथ जाए गी

जंगल में जाओ गे या सहरा में जाओ जे


बरबादियों की दासतां लिखी है हर तरफ 

चेहरा छिपाओ गे या चेहरा दिखाओ गे 


अपनों की आंख में जो ग़ैरत थी मर गई

इन बेशर्म इन्सानो से कैसे निभाओ गे


आती है मौत आए गी अपने हिसाब से

तुम गिड़गिड़ा के मौत को कैसे बुलाओ गे।


-नई दिल्ली, मो. 9871638634

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आलेख

पत्रकारिता स्तंभ

पूश्किन की पत्रकारिता

   डॉ. कुमार कौस्तुभ

महान रूसी साहित्यकार अलेक्सांद्र सेर्गेयेविच पूश्किन को इस दुनिया को छोड़े हुए 10 फरवरी 2022 (प्राचीन जूलियन कैलेंडर के मुताबिक 29 जनवरी) को 185 वर्ष पूरे हुए। महज 37 वर्ष की छोटी-सी जिंदगी में अपने अनूठे अवदान के लिए पूश्किन का न सिर्फ रूसी, बल्कि विश्व साहित्य में याद किया जाता है। उन्हें आधुनिक रूसी भाषा और साहित्य का निर्माता कहा जाता है क्योंकि पुरानी लीक से हटकर उन्होंने जिन आदर्शों का निर्माण किया उन पर रूसी साहित्यकार आज भी कायम हैं। वैसे तो पूश्किन अपने काव्य, कहानियों, उपन्यास और नाटकों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। करीब 20 साल के अपने साहित्यिक जीवन में पूश्किन ने 12 काव्य संग्रहों, 6 नाटकों, 10 लंबी और दर्जनों छोटी कहानियों, 5 औपन्यासिक कृतियों, यात्रा वृत्तांत, ऐतिहासिक गाथाओं तथा परीकथाओं की रचना की। लेकिन, उनके रचनाकर्म का एक खास हिस्सा पत्रकारिता से भी जुड़ा रहा है, जिसकी चर्चा कम होती है और उस पर विमर्श की आवश्यकता है।

19वीं सदी के रूसी समाज में जन्मे पूश्किन साहित्य की दुनिया में सक्रिय तो थे ही, जारशाही से देश को निजात दिलाने के लिए चल रही राजनीतिक गतिविधियों का भी उन पर असर रहा जिसकी झलक उनके लेखन में मिलती है। कहीं न कहीं यही वह प्रस्थान बिन्दु था, जहां से पूश्किन पत्रकारीय रचनाकर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं। पत्रकारिता में पूश्किन का दखल रहा, लेकिन वे उसे शायद उस मुकाम तक नहीं पहुंचा सके जिसकी उन्हें तमन्ना थी और जिसकी उन्हें दरकार थी। रूसी साहित्य की अध्येता बेल्ला ग्रिगोरयान ने इस विषय में अपने शोध कार्य में इस संबंध में गहन चर्चा की है। बेल्ला (2015-16, पृ. 70) के अनुसार, अपने कैरियर के आखिरी वर्षों (1832-35) में पत्रकार के रूप में काम करने की पूश्किन की बहुतेरी उन कोशिशों से पता चलता है कि उनमें कितनी संभावना थी, लोगों तक पहुंचने की कितनी चिंता थी और कुछ हद तक असफल रहने से कितनी निराशा थी। वजहें बहुत-सी हो सकती हैं जिसकी ओर बेल्ला ने अपने अध्ययन में प्रकाश डाला है- चाहे इसके लिए पूश्किन की समकालीन राजनीतिक और व्यावसायिक खेमेबाजी जिम्मेदार रही हो या फिर तत्कालीन रूसी सांस्कृतिक और विचारधारात्मक अवरोध, या फिर ज़ारशाही के दबाव का मसला हो, चैतरफा अड़चनों से जूझते हुए पूश्किन ने अपने समय में पत्रकारिता की दुनिया में जगह बनाने की कोशिश ज़रूर की, जो शायद समय की मांग भी थी। वे उस साहित्यिक समूह में भी शामिल थे, जिसने 1830 में रूस के प्रमुख समाचार पत्र लितेरातुरनाया गजेता की स्थापना की थी। यहां तक कि उनकी तस्वीर का रेखाचित्र भी इस अखबार के मास्टहेड पर छपता था। आगे चलकर यह अखबार सोवियत लेखकों के संघ का मुखपत्र भी बना। यह वह दौर था, जब पूश्किन साहित्य जगत में भी सितारे की तरह चमक रहे थे। उनकी कई प्रमुख काव्य कृतियां लिखी जा चुकी थीं और अब वो गद्य रचना की ओर प्रवृत हो रहे थे। तो भला ऐसी क्या मजबूरी थी, कि वो पत्रकारिता में पांव जमाने को उत्सुक थे? इस सवाल का जवाब शायद पूश्किन की बहन ओल्गा सेर्गेयेएव्ना पाव्लिशेवा के उस खत से मिल सकता है जो उन्होंने पूश्किन की योजनाओं बारे में अपने पति को लिखा था। इस खत का जिक्र बेल्ला (2015-16) ने अपने शोध कार्य में किया है। ओल्गा ने लिखा था, “मेरा अभागा भाई अपनी रचनात्मक प्रतिभा को महज़ इसलिए धूल में मिलाने को तैयार है ताकि वह अपनी भौतिक जरूरतें पूरी कर सके। ऐसा वह अपने भविष्य की अनिश्चित स्थिति के कारण कर रहा है। अलेक्सांद्र अन्यथा ऐसा कुछ नहीं करता। लेकिन, भला कैसे वह अपनी उदात्त, ध्येयपूर्ण, और आदर्शवादी आत्मा का विसर्जन उस तुच्छ गद्य में कर सकेगा, कैसे रोजाना की बकवास से जूझेगा, कैसे हर रोज पुलिस महकमे से आनेवाली ऐसी खबरों को पढ़ेगा कि कौन आया, कौन गया, सड़क पर बेकवूफी से किसकी नाक टूटी, किसे नियम-कायदों को तोड़ने पर थाने लाया गया, सिनेमाहॉल में कितनी भीड़ थी, किस अभिनेता या अभिनेत्री ने लोगों का जमकर मनोरंजन किया, या हर दिन बारिश या सूरज के बारे में या तमाम बुरी चीजों के बारे में बात करेगा, उन्हें प्रकाशित करेगा, और यही नहीं राजनीतिक ज्ञान बघारनेवाले विदेशी झूठे-मक्कारों के लिखे अनगिनत लेखों की व्याख्या करेगा...इन सब घिसी-पिटी चीजों को तो बुल्गारिन और ग्रेच के लिए छोड़ देना चाहिए..(बेल्ला, पृ. 21)।”  

स्पष्ट है कि कुछ तो मजबूरियां जरूर रही होंगी, अन्यथा 19वीं सदी के रूस के उस दौर में पूश्किन जैसे प्रतिभावान रचनाकार को पत्रकारिता के उस पेशे की ओर मुड़ने को बाध्य नहीं होना पड़ता, जिसकी दुश्वारियां खुद उनकी बहन ने अपने पत्र में गिनाई थीं। ओल्गा का पत्र तो पत्रकारिता की उस हकीकत को बयां करता है, जो आज के दौर में भी प्रासंगिक है। हालांकि, सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि पत्रकारिता महज़ रोज़ आनेवाली उन ख़बरों को प्रकाशित-प्रसारित करने भर का काम नहीं है जिनका जिक्र ओल्गा ने अपने पत्र में किया था। इससे इतर सामाजिक-प्रासंगिक और भी ऐसे मुद्दे जरूर रहे होंगे जिन पर पूश्किन पत्रकारिता के दौरान अपनी लेखनी से प्रकाश डालना चाहते रहे हों। वैसे साहित्य सेवा के साथ-साथ पत्रकारिता में कदम रखने का कारण यह भी हो सकता है कि पूश्किन के समक्ष उस दौर में कुछ आर्थिक कठिनाइयां रही हों, या फिर वे पत्रकारिता के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाना चाहते रहे हों या उस खेमेबाजी से भी निपटना चाह रहे हों जिससे तब उनका पाला पड़ा। क्योंकि, 1830 तक आते-आते पूश्किन इस स्थिति में पहुंच चुके थे कि पत्र-पत्रिकाओं में उनकी खट्टी-मीठी चर्चा हो रही थी। माना जा सकता है कि कहीं न कहीं सिविर्नाया प्छेला, तिफ्लिस्किय वेदोमोस्ती से होते हुए लितेरातुरनाया गजेता तक चली साहित्यिक समालोचना संबंधी लड़ाई ने भी पूश्किन को पत्रकारिता में ताल ठोकने को मजबूर किया होगा, क्योंकि ऐसा उल्लेख आता है कि पूश्किन ने लितेरातुरनाया गजेता में यह सवाल उठाया था कि ‘पत्रिका जनता के लिए जरूरी है या चंद लेखकों के लिए’(बेल्ला,पृ.66)।  

अब पूश्किन किस द्वंद्व से जूझ रहे थे, इसका पता तो गहराई से अध्ययन करने पर ही चल सकता है। इसका कुछ संकेत उनके उत्तरार्द्ध के लेखन में भी पाया जा सकता है। साहित्यिक लड़ाई अपनी जगह पर है, किंतु यह भी माना जा सकता है कि पूश्किन का ध्येय भी निश्चित रूप से कहीं बड़ा रहा होगा, उनकी इच्छा पत्रकारिता के माध्यम से राजनीति और विचारधारा के स्तर पर समाज में बदलाव लाने की रही होगी, जिसकी रूसी ज़ारशाही के उस दौर में बड़ी जरूरत रही होगी, जिसमें पूश्किन जी रहे थे। इसमें कोई दो राय नहीं कि 6 जून (26 मई) 1799 को कुलीन घराने में पैदाइश के बावजूद पूश्किन का रुझान सत्ता के विरुद्ध खड़े ‘दिसंबरवादी आंदोलन’ से था। विद्रोह के पक्ष में लिखने के कारण उन्हें निर्वासन भी झेलना पड़ा था। उनके राजनीतिक लेखन और कविताओं पर ज़ारशाही की टेढ़ी नज़र थी। वहीं, तमाम पाबंदियों के बावजूद, पूश्किन के दिल में कहीं न कहीं आम जनता की स्थिति को व्यक्त करने, और उनके लिए लिखने की आग धधक रही थी, जिसका निस्तारण शायद पत्रकारिता के माध्यम से ही मुकम्मल तरीके से हो सकता था। बेल्ला ग्रिगोरयान ने अपने शोध में यह स्पष्ट किया है कि पूश्किन ने कई बार पत्र-पत्रिकाएं और अखबार निकालने की कोशिश की और इसके लिए शासन से इजाजत मांगी। 1835 में उन्होंने उसी अखबार को फिर से प्रकाशित करने की अनुमति मांगी थी जिसे 1832 में मंजूरी दी गई थी, लेकिन इस बार सरकार इसके लिए राजी नहीं हुई। पूश्किन को पाक्षिक पत्रिका प्रकाशित करने की अनुमति मिली जिसका नाम था ‘सव्रेमेन्निक’। हालांकि खुद वो इसे जारी रखने के लिए जिंदा नहीं रहे। 1837 में द्वंद्व युद्ध में उनकी मौत हो गई।

बहरहाल, पूश्किन ने जिस ‘सव्रेमेन्निक’ की नींव रखी थी, उसकी गणना रूस की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में होती है। माना जाता है कि ‘सव्रेमेन्निक’ ने रूस में पत्रकारिता के न सिर्फ नये प्रतिमान गढ़े बल्कि रूसी जनाकांक्षाओं की पूर्ति करने का भी दावा किया। हालांकि शुरूआती दौर में वह आम पाठकों की पसंद नहीं बन सका। कहीं न कहीं उस पर कुलीन समुदाय का प्रतिनिधि होने का ठप्पा जरूर लगा रहा। 

अपने पत्रकारीय उपक्रम में पूश्किन लितेरातुरनाया गजेता (1830), द्नेब्निक (1832), सव्रेमेन्निक (1836) जैसी पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े, किन्तु जिस मुकाम को वो हासिल करना चाहते थे, वह नसीब नहीं हुआ।

पत्रकारिता की दुनिया में पूश्किन को लगातार उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरना पड़ा, ठीक वैसे ही जैसे उनका अपना जीवन था। वे जिन आदर्शों की झलक अपनी पत्र-पत्रिकाओं में देखना चाहते थे, शायद उसकी दरकार कारोबार को नहीं थी। यही वजह रही होगी कि पूश्किन हर संभव कोशिश के बावजूद पत्रकार के रूप में भले ही प्रतिष्ठित नहीं हो सके, दुनिया उन्हें महानतम रचनाकारों में तो जरूर शुमार करती है।  

संदर्भ-

Grigoryan, B. (2015). The Poet Turned Journalist: Alexander Pushkin and the Reading Public. Pushkin Review / Пушкинский Вестник, 18/19, 61–84. https://www.jstor.org/stable/48600720

https://www.jstor.org/stable/48600720?read-now=1&seq=13#page_scan_tab_contents

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आत्मकथ्य

सुश्री रश्मि रमानी

बरसों पहले अक्षर ज्ञान होते ही, रंगबिरंगे चित्रों वाली कहानी, कविता की सुंदर सी छोटी-छोटी पुस्तकों ने मुझे आकर्षित किया, और युवा होते-होते बंद किताबों के भीतर बसे संसार में जब मैंने अपने आपको तलाशा तो पता चला कि यह खोज कितनी रोमांचक थी ! आज भी कैसी भी परिस्थिति हो, कोई भी मनःस्थिति क्यों न हो, किताबों ने सच्चे मित्र की तरह साथ निभाया है। लिखना मैंने बचपन में ही शुरू कर दिया था। शुरुआत कहानी से की, पर धीरे-धीरे कविता मेरे वजूद का हिस्सा बन गयी। फिर अनुवाद की चुनौतियां स्वीकारते, दूसरी भाषा के साहित्य का प्रीतिकर आस्वाद लिया। कभी लोक साहित्य तो कभी बाल कविताएं एक ओर सिंध के इतिहास संस्कृति और साहित्य पर फैलोशिप तो दूसरी ओर शोध के साथ सदियों पहले मोअन जो दड़ो में कविता संग्रह।

लेखन मेरे लिए सिर्फ पुरस्कार और सम्मान ही नहीं लाया कितनी मुश्किलों से पार पाना भी उसी ने सिखाया। लेखन के दौरान न सफर आसान था न मंजिल करीब कभी-कभी लगता था जैसे किसी भूलभुलैया में भटक रही हूँ, पर चंदन वन में प्रेम करना हो तो सांपों से तो सामना तय है! 

पहले लिखना शौक़ था, फिर आदत बना, बाद में जिन्दगी का हिस्सा और अब लगता है जैसे तमाम बंधनों से, उलझनों से मुक्ति की राह लेखन और किताबों के बीच से ही निकलेगी!

ऐसा नहीं है कि मेरी रचना यात्रा बहुत सरल रही हो, या मुझे सहजता से कभी कुछ मिला है, मैंने बहुत संघर्ष किया है। पतझर को जीते हुए वसंत के स्वप्न देखे हैं। आज पाथेय के रूप में शुभचिंतकों और पाठकों का प्रेम और सराहना है, पर किसी जमाने में समाज के, परिजनों के ताने और तिरस्कार के साथ रचनाओं का अस्वीकार भी था, निराशा का वह दौर भी मैंने देखा है जब लगता था कि लेखक होना जैसे कोई अभिशाप है, यह सिलसिला आज भी जारी है, पर मेरी ज़िद और गुस्सैल स्वभाव के कारण जो ठान लिया, सो ठान लिया। सुबह छह बजे से रात के ग्यारह बजे तक घर के काम के बाद देर रात तक लिखती थी। पुराने घर में कभी मेरी किताबों के लिये जगह नहीं होती थी, आज मेरे फ्लैट के सबसे रौशन और बड़े कमरे में सिर्फ किताबें हैं, जिन्हें कभी मैं लोहे के बड़े से कूलर में छिपा देती थी क्योंकि साल के दस महीने तो कूलर चलता नहीं था। फर्क इतना है कि अब लगता है कि पूरी नींद नहीं मिली तो क्या हुआ ? रोटी थोड़ी कच्ची या टेड़ी मेड़ी है तो कोई बात नहीं, नहाने में देर हो गयी चलेगा, जरूरी थोड़े ही है कि खाने में सब्जी रोटी या दाल चावल ही हों, सेंव के साथ ब्रेड या दो केले खाकर भी लेख तो पूरा कर ही लिया, अवार्ड के नाॅमिनेशन का कोरियर समय पर चला गया, प्रूफ के सौ पन्ने जांच दिये और अपने आपको पुरस्कृत करते हुए काजू किशमिश की पूरी प्लेट साफ कर दी कोई बात नहीं! अकेले रहने के सौ दुखड़े होने के बावजूद एक अकेला सुख काफी है कि मैं अपनी मर्जी की मालिक हूँ रेडियो पर विविध भारती चलाकर, बड़े आराम से चंद्रकांता संतति खोलकर चुनार चली जाती हूँ, अन्ना केरेनिन्ना के साथ रूस भी हो आयी और कृष्ण चंदर के साथ एक गधे की आत्मकथा पढ़ने का आनंद स्वर्गिक है। बस ये नहीं सोचती कि लोग क्या कहेंगे? घर के काम का क्या होगा? और शुक्र है कि मुझे न तो समय पर ढेर सारा काम करना पड़ता है न कोई मेरे काम मेरे काम में गलतियां निकालता है, वर्ना एक दौर ऐसा भी गुजरा है जब मैं नटी की तरह घड़ी के कांटों पर चली हूँ, काम की सराहना तो दूर की कौड़ी थी सबको राजी करने के फेर में ख़ुद से इतना नाराज हुई कि अपने आपसे मोहभंग हो गया, पर जिन्दगी भी बड़ी अजीब और रहमदिल निकली जो उसने मुझे न सिर्फ गले लगाया, यह भी लिखना सिखाया कि ‘मेरे पास क़तरा स्याही का तेरे पास बूँद आंसू की चल वक्त की हथेली पर खुशी की इबारत लिखें।‘

मेरे हाथ गर्म रहते हैं, शायद लिखने और पढ़ने की बेचैनी के कारण, एक अजीब सी उत्तेजना के चलते मैं अक्सर सोचती रहती हूँ, कभी-कभी जब कोई मुझसे पूछता है कि ‘ मैं सारा दिन करती क्या हूँ ‘? तो मेरे लिये यह समझाना कठिन होता है कि मेरे जीवन में सोचना भी एक काम है।

मुझे यात्राएं करना पसंद है, कई यात्राएं मेरे लेखन में महत्वपूर्ण रही हैं, सिंध, कच्छ, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के साथ सिंगापुर, मलेशिया की यात्राएं मेरे लेखन में सहायक रही हैं। शांति निकेतन, सांची, हरिद्वार और गर्मियों में भोपाल की शामें मुझे बेहद पसंद हैं।

एक लेखक के लिये आत्मकथ्य लिखना शायद आसान होता हो पर मेरे लिये यह बहुत कठिन है क्योंकि मुझे नहीं लगता है कि मैं कोई लेखक- वेखक हूँ मुझे तो एक साधारण - सी स्त्री होना पसंद है, अपने घर आंगन में डोलती, अपने हाथों से सिर्फ घर ही नहीं घरवालों को भी संवारती, रंगोली के रंगों से जीवन को रंगीन बनाती और खाने में स्वाद के साथ खुद भी उतर जाती, ऐसा नहीं है कि मैंने इस जीवन को जिया नहीं है पर परिस्थितियों के चलते अपने आपको साबित करने के लिए, अपने भीतर की बेचैनी को, भावनाओं को व्यक्त करने के लिये नौकरी और पी-एच. डी. छोड़कर मैंने लेखन चुना।

मैंने लेखन चुना कहना गलत होगा, क्योंकि मैं बचपन से लिख रही थी पर अपने लिखे को प्रकाशित करवाने की कोशिश मैंने बहुत देर से की। मुश्किल सफर शुरू हुआ, पर यह रोमांचक भी कम नहीं था। एक अख़बार ने मेरी ८९ कविताएँ लौटा दीं, मैं विचलित जरूर थी, किन्तु उन्हीं कविताओं में से ७० कविताओं का चयन करके, ‘साज चुप है‘ कविता संग्रह प्रकाशित करवाया, जिसे केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ, 1997 में पच्चीस हजार का यह पुरस्कार विज्ञान भवन में के. आर. नारायणन (महामहिम राष्ट्रपति महोदय) के अस्वस्थ होने के कारण, मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी जी ने प्रदान किया, और यही एकमात्र पुरस्कार था जिसे ग्रहण करते समय मैं बेहद खुश थी, ऐसा नहीं है कि बाद में मुझे पुरस्कारों से सम्मानित नहीं किया गया, पर ‘साज चुप है‘ को पाठकों की सराहना भी मिली और मेरा आत्म विश्वास भी बढ़ा। किसी भी लेखक के लिये पुस्तक लेखन कम श्रम साध्य नहीं होता, किंतु हर पुस्तक पूरी होने पर सात्विक आनंद के साथ कभी गौरव की तो कभी अनोखे अनुभव की प्राप्ति होती है, ऐसा मेरे साथ तब हुआ, जब अक्तूबर 2011 में संस्कृति मंत्रालय द्वारा मेरा चयन सीनियर फैलोशिप के लिए हुआ, और मैंने ‘सिंधः इतिहास संस्कृति और साहित्य‘ विषय पर 650 पृष्ठों की थीसिस लिखी। इस पुस्तक का अनुभव बहुत विचित्र था, सितंबर 2011 में मेरे पति प्रोफेसर अश्विनी कुमार रमानी का अकस्मात निधन हो गया, और मुझे विभिन्न स्तरों पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, पर पता नहीं कौनसी दैवीय शक्ति थी या शायद मैं ही ‘ट्रांस‘ में जा चुकी थीः मैंने फैलोशिप का काम पूरा किया, जिसे बाद में संपादित करके नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया। मेरी 28 पुस्तकों में, मैं इसे सर्वश्रेष्ठ मानती हूं। भविष्य के बारे में कोई नहीं जानता, वर्तमान होता जरूर है, पर याद हम अतीत को ही करते हैं कितनी अजीब बात है कि बीते दिनों में पीड़ा और संघर्ष के बावजूद, वे दिन बहुत याद आते हैं, शायद इसलिये कि दुख व्यक्ति को मांजता है और बीते दिनों में एक ऐसी महक होती है जो किसी इत्र से कम नहीं।

इत्र से याद आया कि कहीं पढ़ा था कि लड़कियों को इत्र नहीं लगाना चाहिये, भूत पीछे लग जाते हैं, पर अनुभव कहता है कि दिखाई न देने वाले अशरीरी भूतों से कहीं अधिक घातक तो दिखाई देने वाले वे लोग हैं, जो महिलाओं के आसपास किसी न किसी रूप में होते हैं, और इन्हें भगाना दिवास्वप्न है। मेरी एक कविता में भूत और सच्चे प्यार का जिक्र है, दोनों के बारे में बस बातें होती हैं। दोनों, सच्चा प्यार और भूत मिलते तो बिरलों को ही हैं। भूत से कहीं मुलाकात हो तो शुरू होती है दुनिया जीतने की खुराफात और प्रेम अगर सच्चा और घड़ा पक्का हो तो महिवाल से मिलने के लिए सोहनी चिनाब भी पार कर लेती है। ये अलग बात है कि अच्छी तैराक होने पर भी प्यार में डूबना तय होता है। जीवन में कई बार लाख कोशिशों के बावजूद पानी में तैरना नहीं आता, पर प्यार में डूबना कोई नहीं सिखाता और कबीर तो इन डूबने वालों के ही पार उतरने की बात करते हैं। मैंने जब कविताएँ लिखीं तो पाया कि उनकी धुरी स्त्री है, और ‘प्यार में डूबी लड़की‘ कविता को पाठकों ने पसंद भी किया। साधारण और मुक्त होने की चाहत हर स्त्री में होती है, और आसमान की तरह मुक्त और साधारण दिखने वाली औरत अनभिज्ञ नहीं होती, भीतर की भूलभुलैया से, बहुत कुछ कहती है उसकी चुप्पी भी, क्योंकि संसार की सबसे अच्छी कविता है औरत।

स्त्री 

तीर की तरह चढ़ती है

इंद्रधनुष की प्रत्यंचा पर

रंगों की तरह बिखर जाती है

पुरुष के मन के आकाश पर!

नववर्ष की बधाई। शुभकामनायें। 

कुशलता की कामना है।                                                                                        इन्दौर, मो. 91113 45259

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कहानी

सुश्री दीपक शर्मा


खुराक


’’माँ कैसी लगीं ?’’ सगाई की रस्म के बाद रेवती को मैं अपने साथ बाहर ले आया।

’’उन्हें लेकर मेरे मन में अभी उत्सुकता है। उन्हें मैं अभी और जानना चाहूँगी,’’ रेवती मेरी पकड़ से बच निकली।

’’क्यों ?’’ अपने परिचितों की व्याख्या और विश्लेषण के लिए सदैव तत्पर रहनेवाली रेवती की टाल-मटोल मुझे खल गयी, ’’तुम्हें वे पसन्द नहीं आयीं क्या ?’’

’’मैं उन्हें पसन्द हूँ क्या ?’’ रेवती ने जवाबी हमला दाग दिया, ’’उन्होंने भी तो अपने व्यवहार में कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है।’’

यह सही था। पापा, दादी, बुआ और फूफा लोग की भाँति माँ ने रेवती पर स्नेह उँड़ेला न था ।

’’उनका व्यवहार अलग जरूर था, ’’मैंने सफाई देनी चाही, ’’पर तुम भूल रही हो कि सगाई की तुम्हारी इस अँगूठी का बिल उन्हीं ने दिया था ।’’

’’लेकिन इसे पसन्द किसने किया था ?’’ रेवती ने हीरों-जड़ी अपनी अँगूठी अपनी उँगली में घुमायी और अँगूठीवाला हाथ हवा में लहराया।

’’दुनिया की सबसे मीठी लड़की ने, ’’मैंने उसका हाथ अपने हाथ में सँभाल लेना चाहा। रेवती का आग्रह था अपनी अँगूठी वह स्वयं पसन्द करेगी।

’’मुझे अपनी माँ जैसा न समझना, ’’रेवती ने परिहास किया, ’’जो प्रशंसा के बिना जी नहीं सकतीं !’’

’’मतलब ?’’ मैं चैंका।

’’प्रशंसा का ऐसा लोभ मैंने आज तक किसी में नहीं देखा। मानो प्रशंसा ही उनकी खुराक हो और आप सब लोग भी कैसे लोग हो ? उनकी प्रशंसा शुरू करते हो तो बस प्रशंसा ही किये जाते हो। वे क्या इतनी विरली हैं ?’’

’’हाँ! विरली हैं वे! उन्होंने पापा के परिवार के लिए बहुत किया है। मेरे दादा की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी और मेरी तीनों बुआ लोग की शादी उन्होंने ही की। अपनी तनख्वाह का एक-एक पैसा उन पर लगा दिया।’’

’’कितनी तनख्वाह मिलती है उन्हें ?’’

’’ग्यारह हजार! वे अपनी शादी से पहले से इस सरकारी स्कूल में पढ़ा रही हैं-’’

’’कुल जमा ग्यारह हजार?’’ रेवती ने ठीठी छोड़ी, ’’और पापा की तनख्वाह कितनी है?’’

’’अट्ठाइस हजार।’’

’’फिर ऊपर से सरकारी बँगला है, टेलीफोन है, वाहन-वाहक है। तुम हिसाब लगाकर देखो तुम्हारे पापा की जीविका की तुलना में उनका वेतन निर्वाह-योग्य भी नहीं।’’

’’तुम भटक रही हो, ’’मैं हँस पड़ा, ’’सीधी-सी बात है तुम्हें माँ पसन्द नहीं आयीं।’’

’’तुम जानते हो मुझे खुली किताब जैसे पारदर्शी लोग ज्यादा पसन्द हैं और वे विपरीत स्वभाव की हैं । वे जटिल हैं, बहुत ही जटिल।’’

’’और मेरे पापा ?’’

’’उन्हें समझना सुगम है। वे पारदर्शी हैं और सरल भी। सच पूछो तो मैंने हूबहू उन्हें वैसा ही पाया जैसा मैंने सोच रखा था। अपने सौभाग्य एवं वैभव के गुलाबी नशे में आश्वस्त, सन्तुलित एवं प्रसन्नचित्त। जबकि माँ में ऐसा कुछ भी नहीं है-न पापा जैसा ठाठ, न उन जैसी सुरभि। बल्कि परिवार की दूसरी महिलाओं की तुलना में भी वे गहना बहुत कम पहने हैं और अपने कपड़े-लत्ते भी बहुत फीके और शुष्क रखे हैं।’’

’’मेरे नाना-नानी स्वयं भी गाँधीवादी रहे और अपने तीनों बच्चों को भी उन्होंने उसी ढंग से रहने की शिक्षा दी, ’’मैंने कहा। मैंने बताया नहीं सन् पचास के दशक में बिताये अपने बचपन के अन्तर्गत माँ ने खुशहाली कम और संघर्ष अधिक देखा था। लाहौर में रहने वाले मेरे नाना पाकिस्तान बन जाने पर ही कस्बापुर आये रहे और साधनविहीनता के उस समय में मेरी नानी के सारे गहने क्या बिके, घर में फिर गहनों को प्रवेश पाने में कई साल गये। जब मेरे मामा लोग ब्याहे गये। माँ नहीं। असल में जिस स्कूल में माँ को दाखिला दिलाया गया था, वहाँ गहना पहनने की मनाही रही थी और माँ के कान भी छिदवाये न गये थे। फिर नानी ने अपने हाथ में कभी सोने की एक चूड़ी भी जब नहीं पहनी थी तो माँ ने भी सादगी को अपना धर्म मान लिया था और गहनों का मोह सदैव के लिए त्याग दिया थ।।

’’माँ को बता दो उनका गाँधीवाद मेरे साथ नहीं चलने वाला, ’’ रेवती ने बनावटी रोष जतलाया। 

’’कह दूँगा, ’’मैंने उसकी पीठ घेर ली, ’’आज ही कह दूँगा।’’

’’बल्कि मेरे लिए तो माँ कुछ खरीदें ही नहीं। मुझी को रूपया पकड़ा दें और मैं अपना देख लूँगी।’’

रात में जब परिवार की सभी महिलाएँ बैठक में एकजुट हुईं तो मैं फूफा लोग और पापा के पास जा बैठा, लेकिन जैसे ही रेवती के लिए खरीदे जानेवाले सामान की बात मेरे कानों ने पकड़ी, मैं बैठक में लपक लिया। 

’’मैं तो उसको सात साड़ी दूँगी और चार सलवार सूट,’’ माँ कह रही थी।

’’रेवती की पसन्द भी पूछनी चाहिए, माँ,’’ मैंने माँ को टोक दिया, ’’बल्कि मैं तो कहता हूँ आप सारा रूपया मुझे पकड़ा दीजिए, मैं सब देख लूँगा।’’

’’लड़का सही कह रहा है, ’’छोटी बुआ हर्षित हुई, ’’बल्कि हम तो कहेंगी हमारी साड़ी का रूपया भी हमीं को पकड़ा दिया जाए।’’

’’रूपया क्यों पकड़ा दिया जाए ?’’

मँझली बुआ ने छोटी बुआ को चिकोटी काटी, ’’हम बजार जाएँगी और अपनी-अपनी साड़ी पर हाथ रखेंगी और भाभी हमें वही खरीद देंगी।’’

’’बल्कि मैं तो कहती हूँ’’ दादी उल्लसित हुईं, ’’घर में तमाम काम है। तुम तीनों बहनें ही क्यों न सब ले-लिवा आओ? रेवती के लिए, अपने लिए, अपने-अपने पति के लिए, अपने-अपने बच्चों के लिए।

’’बहुत अच्छा सोचा, अम्मा,’’ बड़ी बुआ हुलस लीं, ’’और इस बार तुम्हारी साड़ी भी हमी लाएँगी, भाभी नहीं। भाभी की पसन्द तुमने बहुत पहन ली, इस बार, हमारी पहनना।’’

अपनी शादी से लेकर अब तक माँ ही दादी के लिए खरीदारी करती रही थी। 

’’बढिया, ’’ दादी हँसी, ’’बहुत बढ़िया। इकलौते तोते की शादी है। इस बार, तो खूब बढ़िया पहनना ही चाहिए।

’’ऐसा करेंगे, ’’ बड़ी बुआ ने कहा। ’’एक ही कीमत की पाँच साड़ी लाएँगी। अपने तीनों के लिए शोख और चमकदार रंगों में और भाभी के और तुम्हारे लिए हल्के और नीरस रंगों में।’’ और कहते-कहते हँस पड़ीं।

दूसरी दोनों बुआ के साथ दादी ने भी बड़ी बुआ की हँसी का पीछा किया।

माँ अपने गाल चबाने लगी ।

उनके माथे पर त्यौरियाँ चढ़ आयीं और वे लगभग चीख उठीं, ’’अपनी साड़ी की कीमत और बनावट मैं भी आप लोग की तरह अपने आप ही पसन्द करूँगी। आप लोग की तरह अपने मन की खरीदूँगी, मन की पहनूँगी।’’

’’क्या हुआ ?’’ पापा बैठक में चले आये।

विरले ही माँ की आवाज में ऐसी तेजी हमने पहले कभी सुनी थी।

’’माँ को अपनी खुराक नहीं मिल रही थी, ’’मैंने कहा।

’’खुराक ?’’ पापा अचम्भित हुए, ’’कैसी खुराक ?’’

’’रेवती ने आज माँ का एक भेद मुझसे खोल डाला। बोली, माँ अपनी प्रशंसा की भूखी हैं, प्रशंसा ही माँ की खुराक है और अपनी प्रशंसा सुनती वे अघातीं नहीं।’’

’’ऐसा कहा उसने ?’’ माँ का रंग सफेद पड़ गया।

दादी और तीनों बुआ लोग एक-दूसरे को चिकोटी काटने लगीं।

’’ईष्र्या से ऐसे बोली वह, ’’पापा माँ की बगल में आ बैठे, ’’हमीं जानते हैं तुम्हारी माँ की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। कम रहेगी। और मेरा दावा है वह लड़की जब इस घर में आएगी और तुम्हारी माँ का धीर देखेगी, तुम्हारी माँ का त्याग देखेगी, तुम्हारी माँ का संयम देखेगी तो वह भी तुम्हारी माँ को सलामी देने लगेगी, मेरी तरह, तुम्हारी तरह, हम सबकी तरह।’’

माँ के माथे की त्यौरियाँ लोप होने लगीं। दाँत, गालों से हटकर तालू में आ जमे और आँखें बरस पड़ीं।

बिना चेतावनी दिये।

’’हम तो मजाक कर रही थीं, भाभी, ’’बड़ी बुआ ने माँ को अपने अंक में ले लिया, ’’वरना आपके बिना भला हम क्यों बाजार जाने लगीं ?’’

’’असम्भव, एकदम असम्भव, ’’मँझली बुआ भी माँ के पास आन खड़ी हुईं, ’’बाजार जाएँगी तो भाभी ही के साथ, वरना कतई नहीं।’’  -लखनऊ, मो. 9839170890

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कहानी

‘नो’ मीन्स ‘नो’

   सुश्री अन्नदा पाटनी

शुभा अकेली बैठी कल जो पिक्चर ‘पिंक’ देख कर आई थी, उसके बारे में सोच रही थी। काश यह फिल्म आठ दस साल पहले आई होती तो न केवल लोगों का नज़रिया बदल गया होता बल्कि दीपा का जीवन भी।

उसे याद आया वह दिन जब दरवाजे की घंटी बजी। खोला तो देखा एक सुंदर सी नवयौवना खड़ी है। चेहरा मुरझाया सा दिखा। उसने हाथ जोड़ कर नमस्ते कहा। तो शुभा ने उसकी ओर हैरत से झाँका और कहा,” कहिए, कौन हैं आप ?”

वह बोली,” मैडम, मेरा नाम दीपा है। आपके हजबैंड जिस स्कूल के जनरल सेक्रेटरी हैं, उसके एक अंग्रेजी टीचर की मैं पत्नी हूँ।”

शुभा ने उसे अंदर आ कर बैठने को कहा। वह सकुचाती सी आकर सोफे पर बैठते ही बोली, ”मैं आपसे बहुत व्यक्तिगत बात करने आई हूँ मैम। मुझे बहुत शर्म भी आ रही है पर आपके बारे में बहुत सुना है तो मैं हिम्मत करके आपके पास आई हूँ।”

शुभा ने कहा,” शर्म की कोई बात नहीं है। मुझसे खुल कर बात कर सकती हो।”

दीपा थोड़ी सहज हुई। बोली,”

मैं अपने पति के बारे में बात करने आई हूँ।

मैम, मुझे बहुत संकोच हो रहा है क्योंकि यह बहुत पर्सनल है।”

शुभा ने उसकी ओर देखा तो दीपा बोली,” अभी दो महीने पहले मेरा विवाह हुआ है साकेत से। अच्छे संभ्रांत घर से है, देखने में सुंदर है। बहुत योग्य है और स्कूल में अंग्रेजी का प्राध्यापक है। हमारी आर्थिक स्थिति भी अच्छी है।”

शुभा बोली,” अरे वाह, सब कुछ तो बहुत अच्छा है। तुम भी इतनी प्यारी हो। फिर ऐसा क्या हो गया ? क्या साकेत का  पहले से किसी से अफेयर चल रहा है ?”

दीपा झट से बोली,” अरे अरे मैम, ऐसा बिल्कुल नहीं है आप गलत समझ रही हैं। वह मुझे बहुत प्यार करता है। शादी के बाद हम हनीमून पर कश्मीर गए थे। अपने से अलग ही नहीं करता था, हमेशा अपनी बाँहों में लिए घूमता रहता। मैंने जो कल्पना की थी, उस से भी अधिक प्यारा जीवन साथी पाया। विवाह के बाद दो तन का एक हो जाना कितना सुखद होता है वह मैंने तब जाना। मैं बहुत खुश थी।

हनीमून मना कर हम लौटे तो कुछ दिनों के लिए मैं पीहर चली गई। एक हफ्ते बाद ही साकेत मुझे लेने आ गया और दो दिन ससुराल में रह कर यहाँ आ गई। 

साकेत का इतने दिनों का दबा प्यार उमड़ पड़ा। सुबह नाश्ता बनाती तो गले में बाँहें डाल कर पता नहीं कितनी बार कभी गालों को, कभी माथे को चूमता जाता। मैं रोकती कि जल जाऊँगी पर वह कहाँ सुनता। सुबह स्कूल जाने से पहले बड़े प्यार से बाय बाय कर कह कर जाता कि शाम को मिलते हैं, इंतजार करना।”

तभी शुभा बोली,” इसमें नई बात क्या है, सभी नए जोड़े ऐसे ही करते हैं। तुम्हें तो खुश होना चाहिए।”

दीपा बोली,” हाँ मैं भी बहुत खुश थी, इतना प्यार करने वाला पति पा कर। दिन भर स्कूल में बिता कर वह जब स्कूल से आता तो हम लोग साथ में चाय पीते। खाना मैं पहले से तैयार रखती थी कि वह किचन में आकर मुझे चैन से खड़ा भी नहीं रहने देगा। फिर रात को मुझे नहीं छोड़ता, दिन भर की पूरी कसर निकाल लेता।”

शुभा बोली,” सब कुछ बढ़िया तो चल रहा है, इतना प्रेम करने वाला पति मिला है। तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है ?”

दीपा तपाक से उठी, अपने कपड़े जगह जगह से ऊपर कर शुभा को दिखा कर गुस्से से रोती हुई सी बोली, ”यह प्यार है, इसे प्यार कहते हैं ?”

शुभा ने देखा, पूरे शरीर पर नीले दाग और दाँत के निशान पड़े हुए थे।

दीपा फिर रोते हुए ऊँची आवाज में बोली,” पूरी रात सोने नहीं देता। मेरे शरीर को छलनी करके रख दिया है। इसे आप प्यार कहतीं हैं ?

शुभा उन निशानों को देख भौंचक्की रह गई  यह काम तो कोई दरिंदा ही कर सकता है। उसने पूछा,” तुम विरोध नहीं करतीं ?”

दीपा बोली,” शुरू शुरू में तो सहती रही पर बाद में ना नुकुर करती तो गुस्से से लाल पीला हो जाता और जोर जबरदस्ती करता है। मैं तंग आ गई हूँ क्या करूं ? अपना दुखड़ा किसके आगे रोऊँ ?”

शुभा ने उसे समझाया,”  थोड़ा धैर्य रख कर और समय देख कर उस से बात करने की कोशिश करो कि हाड़ माँस का शरीर है उसके साथ अनाचार करने से तकलीफ होती है। देखो, यह बहुत ही व्यक्तिगत मामला है। अच्छा होगा कि तुम दोनों आपस में ही अपनी प्रॉब्लम सुलझा लो।”

साकेत के आने का समय हो रहा था इसलिए दीपा जाने के लिए उठ खड़ी हुई। 

दो दिन बाद दीपा फिर आई। बेतहाशा रोए जा रही थी। थोड़ा सँभलने के बाद बोली,” मैम, आपकी सलाह पर मैंने उस से बात करने की कोशिश की पर वह तो गुस्से से उबल पड़ा। अब तो वह मुझसे और भी अमानवीय, घृणित कार्य करवा रहा है। मेरे मना करने पर मुझे मारता है। कल रात को तो मुझे खदेड़ कर घर के बाहर ही निकाल दिया। पड़ौसियों के डर से सुबह घर के अंदर ले लिया ।

शुभा यह सब सुनकर घबरा गई। उसने सलाह दी कि माँ बाप के पास चली जाय। दीपा ने कहा कि वे लोग उसका साथ नहीं देंगे। पुराने विचार के हैं। पति के ख़िलाफ तो उसकी एक नहीं सुनेंगे और उन्हें वह खुल कर यह सब बता भी नहीं सकती है।”

साकेत की जगह कोई औरत होती तो शुभा बात कर उसे समझाने का प्रयत्न भी करती। औरत होने के नाते उसे संकोच हो रहा है साकेत को बुला कर उस से बात करने में। उसने दीपा को सांत्वना दी कि वह अपने पति सुमित से साकेत के वहशीपन के बारे में बात करेगी। उसे नौकरी से निकाल देना कोई हल नहीं होगा उल्टे तुम और परेशानी में फँस जाओगी। सुमित को बात करने दो शायद सुमित के समझाने से समझ जाय नहीं तो फिर कुछ और सोचेंगे।

दीपा का मन थोड़ा आश्वस्त हुआ। बोली,” मैम जल्दी कुछ करिए, मैं अब साकेत की शक्ल देख कर घबरा जाती हूँ और रात को उसके जंगली रूप को याद करके सिहिर उठती हूँ।”शुभा उसकी हालत समझ सकती थी। उसने दीपा को प्यार से गले लगाया और दो दिन बाद आने को कहा।

आज शुभा ने अपने पति सुमित को दीपा और साकेत के बारे में सब विस्तार से बताया। साकेत की वहशियाना हरकतें बताते हुए शुभा का गला काँप रहा था। सुमीत भी सकते में आ गया। बोला,” यह तो इतना नाजुक मामला है कि हम क्या, उनके परिवार का कोई सदस्य भी कुछ नहीं कर सकता। हर हालत में दीपा ही फँसेगी। एक रास्ता है कि वह साकेत से तलाक ले ले। उसमें हम उसकी मदद कर सकते हैं।” 

शुभा को भी यही ठीक लगा। जब दो दिन बाद दीपा आई तो उसके चेहरे पर चोट के निशान थे। शुभा को माजरा समझते देर नहीं लगी। 

दीपा को प्यार से बैठा कर चाय वगैरह पिलाई। उसे तलाक़ का रास्ता सुझाया। दीपा पहले इसके लिए तैयार नहीं हो रही थी क्योंकि जानती है कि पीहर वाले उसको सहारा नहीं देंगे, उल्टे समझाएँगे कि पति परमेश्वर होता है, उसे पत्नी पर पूरा हक़ होता है। वही अकेली नहीं है अनोखी इस दुनिया में और भी औरतें हैं जो शादी के बाद पति की हर बात को बिना ना नुकुर मान लेती हैं। तुम्हारे ही ज़्यादा पंख निकल आए हैं।

शुभा ने किसी तरह बहुत समझा बुझा कर उसे तलाक़ लेने के लिए राजी कर लिया और पूरी मदद देने का वायदा भी किया।

शुभा थोड़ी निशचिंत हुई। एकाध दिन में दीपा सब डिस्कस करने आती ही होगी। दीपा तो नहीं आई पर खबर आई कि दीपा ने अपने पति साकेत की हत्या कर दी है और उसने स्वयं पुलिस थाने में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया है।

शुभा स्तब्ध रह गई। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह दीपा की मनःस्थिति को समझ पा रही थी। उस समय उस पर जो बीता होगा, वह अवश्य ही असहनीय रहा होगा और उसे इतना कठोर कदम उठाना पड़ा होगा।

आज दस साल बाद ‘पिंक’ फिल्म में लड़कियों और पत्नियों को उनकी इच्छा के बगैर सैक्स करने पर पतियों और बॉयफ्रेंड्ज को बलात्कारी ठहराया जाय, इस मुद्दे पर बहुत बहस हुई। इस पर भी जोर दिया गया कि पत्नी और लड़कियों के ‘नो’ कहने का मतलब ‘नो’ होगा  और ‘नो’ मीन्स ‘नो’ को नकारनेवाला अपराधी।

काश ! ऐसा कानून आ गया होता तो बेचारी दीपा को साँस लेने के लिए खुली हवा मिल जाती। तर्क यही दिए गए कि बंद कमरे में पति पत्नी क्या करते हैं, इसका कोई साक्ष्य नहीं होता। दूसरे पति को बलात्कारी मानने वाले कानून का दुरुपयोग भी किया जा सकता है। आजकल महिलाएँ भी तो कम नहीं। इसीलिए तो नहीं बन पाया यह कानून। 

जब सारे दरवाजे बंद दिखें तो फिर दीपा जैसी लाचार पीड़िताएं कहाँ गुहार लगाएँ।

हाँ, पिंक पिक्चर से एक फायदा तो हुआ है कि अब कम से कम लड़कियाँ और महिलाएँ सैक्स जैसे वर्जित विषय पर खुल कर बात करने की हिम्मत तो कर पा रही हैं। 

शुभा उस दिन का इंतजार कर रही है जब ‘नो’ मींस ‘नो’ को कानून की हरी झंडी मिल जाए। बलात्कारियों  तथा व्यभिचारी पतियों के अत्याचारों से तभी बालिकाओं, महिलाओं को राहत मिल पाएगी । 

 मैरीलैंड, अमेरिका, ईमेल:  annada.patni@gmail.com

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कविता

सुश्री अरुणा शर्मा

कुछ  डर बेहतर होते हैं

कुछ डर बेहतर होते हैं जीवन जीने के लिए 

देते हैं हौसला उस पार जाने के लिए 

तैरने व डूबने के बीच अन्र्तमन में निरन्तर होते हैं द्वंद्व युद्ध

व पार लगाती हैं दुआएँ अपनों की ही...

साथ चलती हैं दुआएं उनके साथ जीवन भर 

जो सीमा रेखा के भीतर रहतें हैं 

उड़ान भरने की लालसा हरेक के मन में है 

जो छू लेते हैं आसमां 

और लौट आते हैं वापिस,जो जमीनी होते हैं

जानते हैं वो कि बसेरा नामुमकिन है वहां...

हाथ खुली रखना लेने के लिए दुआएं व देने के लिए भी        

होती है तुम्हारे संग,दृश्य अदृश्य रूप में चलती हैं संग संग 

अंधेरे घने जंगलों में और फिसलन से भरी घाटियों में 

व बनाती हैं पद चिन्ह तुम्हारे लिए 

यही देती है बहुत सकून महकाती है मन को 

खुशबूदार हवा बनकर   

देती हैं खुदी पर यकीं रखने की ताकत भी... 

बढ़ाती हैं हौसला इस पार से उस पार जाने के लिए 

हवाएँ उड़ाती हैं सहलाती नहीं 

जानना जरूरी है सभी के लिए 

क्योंकि कुछ डर बेहतर है जीने के लिए...                                        -नई दिल्ली, मो. 9212452654

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कविता

नमिता सिंह ‘आराधना’

तेरी यादों से लिपटी एक शाम

तेरी यादों से लिपटी इक शाम

वर्षों से सहेजे रखा है इक किताब में

हर रोज ख्वाब का एक सितारा

टाँक देती हूँ मैं उसमें

ताकि मुरझा न जाए वो शाम

तेरे लंबे इंतजार में।

दिन में कई दफा

चूमती पुचकारती हूँ उस शाम को

प्यार से सहलाती हूँ

फिर सहेज देती हूँ किताब में

खो जाती हूँ कल्पना में

कि जब तुम आओगे

मुझे आगोश में लेकर

जड़ दोगे चुंबन मेरे माथे पर

और फिर घंटों बतिआएँगे हम

यूँ ही एक दूसरे में खो कर।

आजकल अक्सर वह शाम

बड़ी बेचैन सी हो जाती है

अकुला सी जाती है

शायद दम घुटने लगा है उसका

सपना टूटने लगा है उसका

आखिर सब्र की भी एक हद होती है

इंतजार की भी एक ज़द होती है।

आखिर एक दिन

तेरी यादों से लिपटी उस शाम ने

दम तोड़ ही दिया ।

हो गई बेरंग और निष्प्राण

मुरझा गई तेरी यादें और

टूट गए मेरे सारे ख्वाब भी

तेरे अंतहीन इंतजार में।                                                              -अहमदाबाद, ईमेल: nvs8365@gmail.com

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कहानी

आर न पार

      डाॅ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी

निर्भय आकाश के नीचे और साफ-सुथरी करीने से कटी घास पर वह पसरी हुयी थी। ऊपर आकाश का चँदोवा उसे ताक रहा था। वह सोच रही थी क्या उसके घर देहरादून में भी आकाश ऐसा ही दिखता होगा-इतना स्वच्छ, इतना नीला और इतना पारदर्शी। शायद हाँ शायद नहीं। वहां तो अक्सर जब मंसूरी में बादल घिरते तो देहरादून की मसें भीगने लगतीं। आकाश की नीलाइ छुप कर एक रोमानी सा वातावरण बना देती। 

वह बेसुध सी घास पर लोटने-पलौटने लगी। कभी-कभी उसे लगता है कि जिंदगी पास से कंधे उचकाती फर्राटे से गुजरी जा रही है और कह रही है-मैं तो जिन्दा हूँ-पर तुम नहीं। इन सन्नाटों ने तो उस का जीना भुला दिया है। जिंदगी के पिछले पंद्रह वर्ष एक-एक कर के उसे अपने बाहों में जकड़ते चले गए और उसे पता भी नहीं चला। वह हर समय बस बच्चों को याद कर-कर के और अपने घर को लेकर सुबकती रही है। अपने उस घर को जिस के मुख्य द्वार से एक दिन उस के महेन की अर्थी अंदर आई थी और फिर बाहर लौट गई। उस दिन की स्मृतियाँ कहीं सारी कायनात को 

धूमिल कर जाती हैं। उस दिन तो उसके लिए उगा-उगाया सूरज डूब गया था और बादलों की ओट सदैव के लिए छिप गया था। मिलिट्री के कैप्टन विनोद ने महेन की शान में प्रशंसा की झड़ी लगा दी थी। बाकी लोग भी महेन की दयाद्रा, वीरता और मानवीयता की दुहाई देते रहे, पर उसे वह सब कुछ इतना याद नहीं आता। उसकी आँखों में तो केवल बची है-उस पार्थिव शरीर की विदाई-जो आज तक उसकी आँखों की नमी बन कर पलकों के नीचे दबी पड़ी है। 

अच्छा ही है कि अब उसे उस घर में नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि बेटी ने कहा है-नए घर की छत पड़ रही है। इस नए घर में महेन की अर्थी कभी न आएगी-न जाएगी। अब वह केवल उसकी मानसी आँखों में प्रेत की छाया बन कर अपने सदय-मनुहार के साथ जिन्दा रहेगी। निम्मी सोचती है महेन के जाने के छः महीने बाद ही वह वहां से चली आई थी। वहां से पलायन का यही बड़ा कारण था। जब महेन के दोस्त विनय ने अपने छोटे भाई के साथ अमेरिका में अपनी माँ की देख-रेख में सहायता करने का आग्रह किया केवल दो तीन माह के लिए। तब तक उसके अंदर के तूफान थमे नहीं थे। वह घर वह दीवारें सब कुछ काटने को दौड़ती थीं। बच्चे भी कहीं परिपाश्र्व में चले गये थे। बड़े जेठ-जिठानी ने बच्चों की देख-रेख का आश्वासन दे-दे कर इस निर्णय को दृढ़ कर दिया था। उन्होंने कहा-बहू क्यों भूल रही हो यह हमारे महेन के बच्चे हैं, हम इन्हें संभाल लेंगे, और उन्होंने संभाला भी। तब वाणी बारह साल की और अवध केवल नौ साल का था। 

जीवन सत्य है और मृत्यु उस सच का अंत। हम उम्र भर जिसे छाया या छलावा समझते रहते हैं, वास्तव में वही सच है, अंतिम सच। इस सच को हम जीते जी झेलते रहते है, न मर कर भी रोज मरते हैं। फिर भी कुछ यादें अपरोक्ष रूप से मस्तिष्क की खूटी पर टंगी रह जाती हैं और उतरती ही नहीं। कारगिल शब्द आम-जनता के लिए एक शब्द मात्र बन कर जिन्दा है पर उसके लिए वह शब्द चिता-समान 

धू-धू कर आज तलक जल रहा है जो उसके महेन को लील गया। महेन की उस मृत घायल देह के सत्य से क्यों आज तक वह उसके जाने का चितंन सत्य आत्मसात नहीं कर पाई। उम्र भर वह उस दृश्य के अहसास को कांख में दबाये-आँखों को मींचती-भींचती रही है कि वह तस्वीर पलकों की बरौनियों तक न पहुंचे। आज तक उस स्मृति को अंदर की कोठरी में रख जीती रही-मरती रही। जब आँखें मिचमिचाने लगें और सांसें फड़फड़ाने तो आसमान का विस्तार बढ़ जाता है और अपना घेरा छोटा पड़ता जाता है।

उसके अंदर का सन्नाटा धुआँसा सा होकर बाहर निकल रहा है। प्रकृति की आँखों पर जैसे मोतिया उतर आया है। सब कुछ धुंध में लिपटाया सा है और फीकी नंगी पेड़ों की टहनियों में हवा कसमसा कर धीरे-धीरे कराह रही है। छतों का रंग स्लेटी से सफेद होने को है। बर्फ की बारीक फुनगियां-पानी की बूंदों सी टपक रही हैं। पास ही परेम में शशि स्वच्छ हवा के झोंकों में मुस्कुरा रहा है। वह तो जैसे उसे भूल ही गई थी।  

घर कब लौटोगी!

घर जल्दी लौट जाउँगी! अब छत पड़ रही है नए घर की। 

बहुत अच्छा है निम्मी! अपने घर लौट जायों। मैं भी बेघर हो गया हूँ। सदा तुन्हे ढूंढ़ता रहता हूँ। दूसरों के घरों में तुम्हें लुढ़कते, फिसलते देखते मेरा मन दुखता है।

उसने आँखें खोली-वह स्तब्ध रह गई और उठ कर बैठ गई-इधर-उधर देखने लगी। ओह! यह तो महेन की आवाज थी! पर महेन की आवाज कहाँ से आई!

तो महेन भी चाहते हैं मैं लौट जाऊं!

वह अपने-आप में कसमसाने लगी। एक महीने के लिए आई थी और आज पन्द्रह साल हो गए। वह भी एक अवैध नागरिक की छुपन-छुपाई खेलते-खेलते। यहाँ न जाओ, यह न करो, वह न करो। इस से नहीं मिल सकती-उस के पास नहीं जा सकती। किसी अत्याचार की रिपोर्ट न लिखवाओ। सब कुछ बस कड़वा घूंट समझ कर पीयो और जीयो। 

एक क्रूर निराशा उसके मानस को लील गई है और इसीलिए वह भावों में भी अभाव ढूंढ़ने लगी है। इच्छाओं में अनिच्छाएं, जल में रेगिस्तान और मुस्कानों के पीछे छिपे-आंसू तलाशती रहती है। सारांशतः होनियों में अनहोनियां ढूढ़ने की लत पड़ गई है। इसी भटकन में पिछले पंद्रह साल से वह भटक रही है। उसे लगता है उस पर तिजारती दुनिया का मुलम्मा चढ़ गया है। वह भी बच्चों की ज़रूरतें पूरी करते-करते बेहद लालची हो गई है। पर दूसरी ओर वह जाने के साधन ढूंढ़ती है तो कहने वाले यह भी कहते हैं क्यों यहाँ का पैसा और उस से प्राप्त अय्याशी को छोड़ कर बदहवासी गले लगाना चाहती हो! 

कभी किसी ने सोचा है कि ऊँची आवाजों और चीखों से महल नहीं ढहते पर धीमे कहे गए गहरे शब्दों से उनकी नींव हिल जाती है। वह उम्र भर अपने शहर नुमा गाँव में ऊंची-ऊंची चिल्लाहटों में सुने गए सर फाड़ शब्दों को सुनने के बाद भी उन घरो में संध्या में गुलगुलों और पकोड़ों के साथ होती रुन झुन हंसी और कहकहे सुनती रही है और कुछ भी नहीं टूटा-पर यहाँ फुसफुसाहटों में धीमे से कहे शब्दों ने भी कांच की दीवारों में दरार डाल दी। 

हम आपके लिए अलग घर बनवा देंगे। अभी आप दो-तीन साल और वहां रह सको तो! बेटी के शब्द मन के कांच में दरार बन गए और वह एक बार फिर लहूलुहान हो गई है क्योंकि एक बार बेटा भी यही कह चुका है। 

कुछ सम्बन्ध ऐसे होते हैं जो कट तो सकते हैं पर टूट नहीं सकते। छाया की तरह साया बन कर पीछे चलते हैं। पैसों के लालच में बच्चों की फरमाइशें-आज एक लाख चाहिए आज दो लाख और उनके साथ जुड़ी और न जाने कितनी ख्वाइशें-जिन्हें पूरा करते-करते आज तक वह अपने देश, अपने शहर, अपनी गलियाँ, हाट-बाजार, मिलिट्री की कन्टोन्मेंट का वातावरण और खुली स्वछंद हवा को छूने और महसूसने को तरसती रही-और बेटी ने कह दिया-हम आप के लिए अलग घर बनवा देंगे! 

यहाँ किसी ने हाथ पकड़ा तो बेहयाई से। प्रयोग किया तो वस्तु समझ कर। जब भी हाथ छुड़ाया-वहां से निकाल दी गई। मालिक चिरोरियाँ करते रहे और मालकिने घृणा। इस उपेक्षा और उपहास के बीच जैसे युग बीत गए। जवानी की अल्हड़-आहत उम्र आज बुढ़ापे की दहलीज पर आ खड़ी हुई। आज न जाने क्या हुआ है उसे कि अंदर का दबा-घुटा लावा पसलियों को मरोड़ कर हृदय को कचोटता बाहर निकल रहा है।

उसकी आँख भर आई। बस अब कुछ भी हो-उसे यहाँ से चले जाना है। उसने बहुत प्रयत्न किये किसी तरह अपने अवैध निवास को वैध बना सकने के। यहाँ तक कि बच्चों को यहाँ बला सकने के भी। किन्तु कुछ न हो सका। जिन के साथ आई थी उन्होंने ही सारे कागज छिपा कर रख लिए कह दिया खो गये। वेतन भी पूरा न दिया और चलता कर दिया। कह दिया जिस की सेवा-सुश्रषा के लिए लाये थे-वही नहीं रहीं तो क्यों रखें तुम्हें। हम दोनों नौकरी करते हैं-हमें तुम्हारी सहायता की आवश्यकता नहीं है। हम तुम्हें वापिस भेज सकते हैं पर रख नहीं सकते। उनका टका सा जवाब और उस समय का अपने बच्चों के लिए लिया गया निर्णय-जीवन का जंजाल बन गया। जब लाये थे तो बहुत से सपने दिखाए थे, झांसे दिये थे-बच्चों की जिंदगी बन जायेगी। वहां तुम नौकरानी नहीं-महारानियों की तरह रहोगी। एक सुनहरा सपना मन में संजो कर रख लिया था। सोचा अच्छा है-महेन की स्थानीय यादों से दूर हो जाऊँगी और इस दुःख को आत्मसात करने में सहायता होगी। बच्चों ने भी भरपूर हामी भरी थी। पर आज सब कुछ नया-नवेला होकर डसने लगा है। गले में डाला हुआ उत्तरदायित्व-अपना ही फंदा बन गया है। 

अचानक उसे लगा-चारों तरफ धुंध ही धुंध छा गई है। उसे देहरादून में अपने घर की बालकनी याद आ गई जहाँ खड़ी होकर वह उस पावस ऋतु में नन्ही-नन्ही बूंदों में सायास भीगती थी। महेन की यादों में खोई-महेन के घर आने की प्रतीक्षा में, उसे अच्छा लगता था। उसे लगा महेन ने पीछे से आकर उसे भींच लिया है और अपने गालों से सटा कर बढ़ कर चूम लिया है। वह चाँद की कलाओं से भी विस्तृत महेन की मुस्कान उसके चेहरे से उतर कर उसके अंग-अंग को महकाने लगी थी। वह झपाटे से उठी-क्योंकि धुंध स्वयं बारिश का रूप ले रही थी और उसे भी भिगोने लगी थी। पर आज इस भीगने में टूटे सपनों की सीलन थी-पावस की रंगीन महक नहीं।

उसके नीचे घास का बिछोना चींटियों की तरह रेंगने लगा। वह अपने-आप में बिसूरती है। क्यों वह रोज इन ऋतुओं के तिलस्म तले रिसने के लिए चली आती है। निम्मो तू तो जानती है कि तू वराह-मिहिर के दांतों में दबा वह ग्रास है जिसे न निगल सकते हैं न उगल। तेरे लिए जिंदगी एक गुंझल बन कर रह गई है। कैसे सुलझाएगी यह अष्टांग-जिसमें तेरी उंगलियां ही नहीं तेरी सारी कायनात उलझी है। वह तो जैसे एक किले में बंदी बना ली गई है और शत्रु दुर्ग पर संगल डाल कर कहीं लाम पर चला गया है। 

परैम में शशि कुनमुनाने लगा। मेम साहिब के आने का समय हो गया। वह घायल तिलस्म से जाग गई और ठोस धरती पर आ गिरी। उसका सारा अस्तित्व कम्पायमान था और नितांत-निर्जीव सा भी। वह कैसे जी रही है, क्यों जी रही है। किस अशुभ घड़ी में उसने यह निर्णय ले लिया था! क्या सवार था उस पर! ऊपर से सारे परिवार वाले उसे इसी ओर धकेल रहे थे या नियति अपना जाल बुन रही थी, बस विदेश की पट्टी आँखों पर कसती चली गई थी और वह अंधी हो गई थी।

बीता हुआ समय ठूंठ बन कर खड़ा रहता है और हम उसे रोज झिंझोड़-झिंझोड़ कर उस से खट्टी-मीठी खुरमानियां लपकते रहते हैं। चाहे पेड़ ठूंठ बन चुका हो।

वह घर भी तो मेरा ही है न! उसने कहा था। 

हाँ माँ! पर आप जानती हैं हम इतने वर्ष अलग रहें हैं और आप को भी तो अपनी तरह अलग रहने की आदत हो गई होगी-तीषा भी यही चाहती है। तीषा ऊपर रहेगी और मैं नीचे। बेटे ने भी अपना निर्णय सुना दिया था।

समय तो हर क्षण जूती पहने-हमें लांघ जाने के लिए तत्पर रहता है और हम हैं कि उस के पीछे-पीछे नंगे पाँव दौड़ लगाते-लगाते हलाक होते रहते हैं। 

उसे लगा वह किसी लावारिस लाश घर में पड़ी है जहां उसे पहचानने के लिए कोई नहीं है। इस अनजान धरती पर लावारिस रह कर ही एक दिन वह खत्म हो जाएगी। निम्मों ने ऊपर फैले आकाश की ओर देखा और सोचा वह तो न आर की रही न पार की और देहरादून में बनते घर की ठक-ठक उसके कानों में बजने लगी।

उसने जल्दी से शशि को उठाया और मूसलाधार बौछार से बचने के लिए बरामदे की ओर दौड़ पड़ी।

USA, Email : sudershen27@gmail.com

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लघुकथा

‘गिद्ध’

       सुश्री मीरा रामनिवास

पति के देहावसान के बाद रूपमती मजदूरी करके अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जैसे तैसे जुटा रही थी। पड़ोसी परिवार होली मनाने शहर से गांव आया। एक दूजे के यहां आना जाना हुआ। आपसी बातचीत हुई। उन्होंने रुपमति के हालात देख मजदूरी के लिए शहर चलने को कहा। बच्चे यहां वो वहां क्या उचित रहेगा, सोच कर पहले तो उसने मना कर दिया, किंतु बच्चो के भविष्य को ध्यान में रखते हुए रुपमति बच्चों और सास को छोड़ कर पड़ोसी परिवार संग शहर चली आई। ईंट गारे ढोने का काम करने लगी। ईमारत के साथ ही दूसरे मजदूरों की तरह रैगजीन की झुपडी बना कर रहने लगी।

जैसा नाम था वैसा ही उसका रुपरंग था। गदराया हुआ बदन, तीखे नैन-नक्श, सामान्य कपड़ों में भी वह बहुत सुंदर दिखती थी। ठेकेदार की नज़र पड़ी और उसे गिद्ध नज़र से घूरने लगा। वह मजदूरों को सूचना देने के बहाने उसके इर्द-गिर्द घूमता रहता। रुपमति को तनिक भी नहीं सुहाता। गुस्से से वह लाल हो जाती और उसका मुंह नोचने का मन करता। ठेकेदार की हरकत से उसके चमचे मज़दूर भी उसे ललचाई नज़रों से देखने लगे। एक दो के साथ तो उसने झगड़ भी लिया। किंतु घिनौनी और कपड़ों के पार झांकने वाली नज़रों ने उसके मन को व्यथित कर दिया था। वह रात को ठीक से सो भी नहीं पाती थी। वह गाँव से दरांती (पेड़ पोधे काटने का औजार) अपने साथ लाई थी सिहराने रख सोती थी। एक रात कालू मजदूर उसकी झोंपड़ी में घुस गया। आहट पाते ही वह जाग गई और दरांत लेकर टूट पड़ी। कालू के हाथ में जोर से चोट लगी और वह भाग खड़ा हुआ। अगली सुबह काम पर नहीं आया।

वह अपनी रक्षा करना जानती थी। किंतु उसे अपने इर्द-गिर्द घूमते गिद्धों से भी बदतर लोगों से नफ़रत हो गई थी। गिद्ध तो मरे हुए को खाते हैं ये तो जिंदा इंसान को खा जाना चाहते हैं। उसकी मां कहा करती थी जिन लोगों में सदाचार न हो, लोलुपता हो उनसे सदा दूर रहना चाहिए। 

अगली सुबह वह दनदनाते हुए ठेकेदार के पास गई, पंद्रह दिन का मेहनताना लिया और गांव लौट आई। कम खा लेगी लेकिन मानव गिद्धों से दूर रहेगी। -गाँधी नगर, मो. 99784 05694

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हास्य-व्यंग्य

नये साल के नये सितारे...


       डाॅ. जवाहर धीर

पिछले दिनों जब हम फक्कड़ बाजार में वक्त कटी के लिए फक्कड़ों की तरह घूम रहे थे तो हमें एक फड़ पर एक कबाड़िया पुरानी किताबों की दुकान लगाए बैठा नज़र आया। ‘छलकती जवानी‘ और ‘चाल मस्तानी‘ जैसे लार टपकाऊ शीर्षकों को देख हमारे कदम जो वहां रुके तो फिर अंगद के पांव की तरह वहीं जम गए। कारण था किताबों के ढेर के बीच पड़ा एक बड़ा-सा पोथा जिसका शीर्षक था ‘अगले बीस वर्षों का भविष्य फल‘। पोथा उठाकर देखा तो उसमें पिछले वर्ष से लेकर इस वर्षों का भविष्य फल भी दर्ज था। चावड़ी बाजार मार्का किसी प्रकाशक के छापे हुए इस पोथे की कीमत भी चूंकि कोई ज्यादा नहीं थी और उसमें दिया गया भविष्य फल चूंकि हमारे दिल को जंच गया सो हमने वह पोथा खरीद लिया। अपने शुभचिन्तकों के साथ हम उन भविष्यवाणियों को साझा कर रहे हैं क्योंकि ज्योतिषी चैपटा नंद लिखित इन भविष्यवाणियों से वे भी घनघोर फायदा उठा सकें...

मेष - ग्रह चाल के मुताबिक सितारा आमदन वाला। अगर आप ऊंचे अफसर हैं तो मेज के नीचे से भारी रकम मिलने की संभावना है। नोट डालने के लिए बोरा सिल कर रखें। विजीलैंस या इन्कम टैक्स वालों की परवाह न करें। उनकी जुबानबंदी के लिए नोटों का एक थैला ही काफी होगा। सितारे इस वर्ष सिर चढ़ कर बोलेंगे। पत्नी की पिछले वर्षों से लटकी आ रही फरमाइशें पूरी करने का अच्छा मौका है। इस साल मिलने वाला धन घरवाली के गहने बनाने में लगा दें। शराब के ठेकेदारों के लिए भी ग्रह उत्तम। कैप्सूलों वाली मिलावटी शराब बेचने पर पकड़े जाने का कोई भय नहीं, पर ध्यान रहे कि शराब में ज्यादा कैप्सूल मिला देने से कोई मौत न हो जाए।

वृष - वृष का पहला अद्धा नौकरी पेशा महिलाओं के लिए विशेष फलदायक। अध्यापिकाएं बेखौफ अपनी ड्यूटी के दौरान बच्चों को पढ़ाने के स्थान पर धूप तापते हुए और मेज पर टांगें पसारे स्वैटर बुन सकती हैं या घर के दूसरे काम कर सकती हैं। रेड होने पर अफसर के घर जाकर उसकी घरवाली को नए के नाम पर स्वेटर का कोई उलटा-सीधा डिजाइन समझा दें, मामला सुलझ जाएगा। परीक्षाओं के सीजन में ट्यूशनों पर जोर रखें लेकिन हैडमास्टर या हैडमास्टरनी जी के घर जाकर उनका हिस्सा देना न भूलें। वर्ष का पिछला हिस्सा छात्र वर्ग के लिए शुभ। मेज पर छुरा गाड़ कर बेखौफ नकल मारें, कोई माई का लाल आपको पकड़ने के लिए हाल के भीतर नहीं आएगा।

मिथुन - इस राशि के लेखकों के लिए यह जश्न मनाने का साल है। अब तक जो सम्पादक आपको घास नहीं डालते थे, वही चिट्ठियां लिख-लिख कर आपसे रचनाएं मांगेगे। अभी से पिछले वर्ष की यानी पुरानी पत्रिकाएं निकाल कर रख लें ताकि मांग बढ़ने पर रचनाओं की सप्लाई में दिक्कत न हो। वर्ष का उत्तरार्द्ध कवियों के लिए सावधानी वाला। कवि सम्मेलनों में हूटिंग हो सकती है। इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए अपने शागिर्दो या भाड़े के श्रोताओं को साथ लेकर जाएं ताकि वे ईंट का जवाब पत्थर से दे सकें।

कर्क - अगर आप पद विहीन राजनीतिज्ञ हैं तो इस वर्ष अपनी औकात के मुताबिक किसी भी पद का सपना लेना भूल जाइए और चुपचाप नाराजों के खेमे में शामिल हो कर अपनी गोटी फिट कराइए।

अगर पद युक्त राजनीतिज्ञ हैं तो ज्योतिषी झंडू प्रसाद से पद बचाऊ अनुष्ठान कराइए। आला कमान के आला अफसरान के तलवों को धोकर उस पानी को पीने से बुरे ग्रह टलेंगे और आपकी सफलता देख कर दुश्मन जलेंगे। सर्दियों के मौसम में अपने इलाके में गर्म कपड़े बंटवाएं, गर्मियों में झोंपड़ पट्टियों में आइसक्रीम के लंगर लगवाएं और अपनी साख बढ़ाने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ अश्लील पोस्टर छपवाएं।

सिंह - राशि चक्र के आठवें घर में राहू और केतु के बैठे होने से यह वर्ष प्रेमिकाओं के लिए शुभ लेकिन प्रेमियों के लिए मिश्रित फलदायक है। एक तरफा इश्क में अंधे होकर प्रेमिकाओं के गली-मोहल्ले के चक्कर मारने पर जूते पड़ने का योग है। इस साल भी पिछले साल की तरह प्रेम कथाओं पर आधारित फिल्में खूब हिट होंगी। फिल्म निर्माता अपनी उन फिल्मों को रिलीज कराने के तत्काल प्रबंध करें जो वर्षों से वितरकों द्वारा न उठाए जाने के कारण डिब्बों में बंद पड़ी हैं। पुस्तकों के प्रकाशक स्तरीय पुस्तकों के स्थान पर लचर और फार्मूला टाइप प्रेम कहानियां छापें। तिजोरियां भरने में सहायता मिलेगी। ईमानदार लोगों को सरे बाजार जलील होना पड़ेगा और हर भलाई का बदला बुराई से मिलेगा।

कन्या - इस राशि के पुलिस अधिकारियों और डिपो होल्डरों के लिए मंगलकारी है। पुलिस वाले जिस केस में भी हाथ डालेंगे जेबें नोटों से भर जाएंगी। शरीफ लोग इस साल पुलिस थानों के आगे से न गुजरें। राशन डिपो होल्डर इस वर्ष भी मिट्टी के तेल की ब्लैक करते रहेंगे। गृहणियां पिछले साल की तरह ही गैस और दूसरी जरूरी जीवनपयोगी वस्तुओं के लिए खीझती-झीखती रहेंगी जिनकी आपूर्ति सरकार पर निर्भर है। बाबू लोगों की जेबें पिछले साल की तरह इस साल भी महीने के दूसरे हफ्ते के बाद खाली रहेंगी। आप उधार मांगने के लिए इधर-उधर मुंह मारेंगे लेकिन आपकी फितरत के कारण आपके परिचित उधार नहीं देंगे।

तुला - बिल्डिंगों, सड़कों, पुलों आदि के ठेकेदारों के लिए वर्ष उत्तम। अधिकारीगण बिना इंस्पैक्शन किए बिल पास करते जाएंगे। ऊंची इमारतों के निर्माण में सरिए के साथ बांस फिट कराएंगे। रेत-सीमेंट का मिश्रण नौ-एक का होगा। पांच-एक बताएंगे। अतः ठेकेदारो खूब निर्माण करो, इस साल जी भर कर कमाई करो...आप पर कोई ग्रह अनिष्ट नहीं है। अफसरों को प्रसन्न रखना, खूब फलोगे, रूके हुए बिल भी पास हो सकते हैं, कमीशन बढ़ा दें, बहती गंगा में नहा लें और निश्चिंत होकर देश को चूना लगा दें।

वृश्चिक - इस राशि के निर्यातक इस वर्ष अत्यंत लाभ में रहेंगे। विदेशों से इस वर्ष भारतीय सामान की वापसी का संकट नहीं होगा। जो भी भेजेंगे, हाथों हाथ बिकने के योग है, अतः पिछले वर्ष का सर्दी न पड़ने की वजह से रुका हुआ गर्म माल तुरंत निर्यात करें। वारे-न्यारे हो जाएंगे। इस राशि की कन्याएं इस वर्ष फेल हो सकती हैं अतः तुरंत ट्यूशन का प्रबन्ध करें। बूढों को गर्मियों में ज्यादा गर्मी और सर्दियों में ज्यादा सर्दी लगने के योग। अतः गर्मियों में नीम्बू और सर्दियों में च्यवनप्राश के इस्तेमाल पर जोर रखें।

धनु - इस राशि के लोगों के लिए यह वर्ष मिश्रित फल वाला है। दिल के रोगी ध्यान रखें कि आपका दिल चोरी न हो जाए। ज्यादा समय बीवी से दूर रहें, टी.वी., स्टार प्लस के सैक्सी प्रोग्राम देखें, दिल लगा रहेगा। डॉक्टरों के लिए यह वर्ष खास एहतियात वाला। आप्रेशन के दौरान कैंची या दूसरे औजार पेट के अंदर रह जाने का योग। कुछ मरीज मर भी सकते हैं। पिछले साल की तरह इस साल भी मैडिकल प्रतिनिधियों से मिले दवाओं के मुफ्त नमूने बेचते रहें।

मकर - चुलबुले लोगों के लिए यह वर्ष मस्ती भरा। खूबसूरत स्त्रियां किट्टी पार्टियों में जरूर जाएं, खूब तारीफ होगी। सरे राह चलते कोई मनचला अगर दुपट्टा खींचे तो मुस्करा दें। इस राशि की कन्याओं के दुपट्टे खिंचते रहने का योग है अतः दुपट्टा ओढ़ना ही छोड़ दें। बेहतर है जीन्स या स्कर्ट पहने। ‘तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त‘ की तर्ज पर लिखा एक और गीत इस वर्ष हिट होगा। लिपस्टिक, बिन्दी खूब बिकेंगी, भरपूर स्टॉक जमा कर लें।

कुम्भ - महिलाओं के लिए वर्ष नेष्ट है। सास-बहू में नहीं बनेगी। सारे वर्ष को श्रावण मास समझ कर बहू सास से अलग रहे तो बेहतर होगा वर्ना पड़ोसी दीवारें फांद कर आपके घर के महाभारत का आनन्द लेते रहेंगे, सास बहू पर हावी रह सकती है। इस राशि के पुरुषों के लिए भी यह समय ठीक नहीं है। ऑफिस प्रातः जल्दी जाया करें और शाम को लेट घर पहुंचे। छुट्टी के दिन भी ओवर टाईम का बहाना करें। राज दरबार में धाक जमाने के लिए बॉस को प्रसन्न रखें। ठगों, चोर-उचक्कों, जेब कतरों, सेंधमारों, फिल्मी गीतकारों और संगीतकारों...यानि हर उस धंधे से जुड़े लोगों की सफलता का योग हैं जिनके धंधे से दूसरे का माल चुराने का धंधा जुड़ा हुआ है।

मीन - इस राशि से सम्बन्धित लोग इस वर्ष यथा सम्भव पानी से दूर रहने की कोशिश करें। बाथरूम में फिसल कर गिरने और टांग टूटने का योग है। नौकरी पेशा लोग बॉस की फटकार सुनने के बाद गुस्से में आकर इस्तीफा देने की गलती न करें, स्वीकार कर लिया जाएगा। व्यापारी मसाले में लीद और दोधी दूध में पानी मिलाते रहें...पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी लैबोरेटरियों के अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत खाकर आपके भरे हुए नमूने पास करते रहेंगे। -फगवाड़ा, मो. 98726 25435

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कहानी

परवाज हम

   सुश्री संतोष श्रीवास्तव

थिएटर दर्शकों से खचाखच भरा है। स्टेज पर नायिका अपनी बेहतरीन अदाकारी से दर्शकों को पलक न झपकाने के लिए मजबूर कर रही है। उसके होठों से मानो शब्दों के फूल बिखर कर पूरे सभागार को खुशबू से तर किये हैं। दुष्यंत खन्ना सभागार की एकदम पीछे की सीट पर अंधेरे कोने में खामोश बैठे हैं। 

अंधेरा पूरे सभागार में है। यह अंधेरा उजाले की कितनी कितनी किरने सौंप रहा है। नाटक के एक-एक संवाद को जीवंत करते अभिनेता दुष्यंत खन्ना की बरसों की मेहनत। एक स्वप्न जो अब साकार है। खुली आँखों का स्वप्न थिएटर ‘‘थियेटर ऑफ रेलेवेन्स‘‘ का वो मदमाता स्वप्न। जितना अंदर उतरो गहराई उतनी ही बढ़ती जाती है। यह स्वप्न मात्र थिएटर का नहीं है। मात्र नाटक चुनकर उसको अभिनीत करने का नहीं है। ये स्वप्न जोड़ता है थिएटर को दर्शकों से। इसलिए थिएटर भी दर्शकों का है, दर्शकों के लिए है ...... उसी से उसका उदगम है, विकास है।

फौजी बूटों की ठक ठक आहट से चैक पड़ा था दुष्यंत। पिता फौज में अफसर रैंक में थे, बेहद रुआबदार। उनके रोबीले व्यक्तित्व में कहीं पिता का कोमल मन भी छुपा होगा यह जाना नहीं था दुष्यंत ने। वे छुट्टियों में घर आते तो बिखरा बिखरा अपने ढ़रल्ले से जिंदगी जीता घर अनुशासन में सिमट जाता था। जब तक वे रहते घर में ठहाके, चाय के प्यालों की खनखनाहट, रसोई में उनकी पसंद के पकते व्यंजनों की खुशबू समाई रहती। माँ भी सजी संवरी हिरनी सी डोलती रहतीं। उस शाम जब पिता बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे तो उन्होंने दुष्यंत को पुकारा। वह सहमा सा आकर उनके सामने खड़ा हो गया।

‘‘बैठो।‘‘ उनके होठों पर मूँछें उनके वाक्य की तेज गति में थिरक उठीं। ‘‘क्या सोचा है? कौन सी लाइन पकड़ोगे ?‘‘

‘‘जी आर्टिस्ट बनना चाहता हूँ।‘‘

‘‘क्यों? डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या फिर आर्मी क्यों नहीं ? किस चीज के आर्टिस्ट बनोगे ?‘‘

‘‘जी ड्रामा, थिएटर।‘‘

वह रोबदार पिता के सामने दृढ़ता से खड़ा था। पिता ने देखा बेटे की मूँछें निकल आई हैं। आँखों में एक संकल्प है जो उसकी नर्वसनेस के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने माँ को आवाज दी-‘‘ आइए बेगम साहिबा, देखिए,फौजी अफसर का बेटा नौटंकी करेगा, नाचेगा ,गायेगा, तमाशा जुटाएगा। लोगों को रिझाएगा।‘‘

और वे ठहाका मारकर हँसे। दुष्यंत की आँखों में पानी छलक आया। उसे अपना सपना उस पानी में तैरता सा नज़र आया।

‘‘ कलाकार बनना क्या मज़ाक है? पहले खुद को डुबोना पड़ता है फिर उबर कर दुनिया को उसमें डुबोना होता है।‘‘

दुष्यंत को पिता के अंदर अपने स्वप्न के बीज नज़र आए। साथ माँ ने भी दिया।

‘‘ठीक है, कलाकार बनो। लेकिन पढ़ाई पूरी करके ही इस ओर कदम बढ़ाना।‘‘

पिता और मां उसके फैसले को महत्व दे रहे हैं तो फिर तो वह ज़माने से लड़ेगा। उम्र छोटी होने के बावजूद उसके मन की संकल्प शक्ति ने उसे भटकने नहीं दिया। हालांकि अपनी बड़ी बहन के आग्रह पर उसने एनडीए की परीक्षा भी दी। बहन की इच्छा थी उसका लाड़ला इकलौता भाई कमीशंड ऑफिसर बने। उसने भी बहन का मान रखते हुए परीक्षा दी। उत्तीर्ण भी कर ली लेकिन फिर अंदर के कलाकार ने ज़ोर मारा। यह लाइन तुम्हारे लिए नहीं है दुष्यंत। तो फिर? तो फिर ? क्या रंगकर्म से रोटी कपड़ा मकान मुहैया करा पाएगा। कहीं वह अभावों के दलदल में फंसकर अपना हुनर न गंवा बैठे। यक्ष प्रश्न ने उसे दिनों, हफ्तों मथा। इस बीच उसे राजीव मिला। उसी की तरह रंगकर्मी बनने का ख्वाब लिये। अगला कदम क्या हो, इस पर सोचने विचारने को अब दो हो गए। फिलहाल तो कुछ रुपए कमाए जाएं, सोचकर दोनों बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे। दुष्यंत अपने फैसले को अंजाम देने के लिए पिता पर निर्भर नहीं रहना चाहता था।

ट्यूशन के बच्चों को अपने स्कूल के 15 अगस्त के कार्यक्रम के लिए एक नाटक तैयार करना था। दुष्यंत ने स्क्रिप्ट भी लिखी। संवाद भी लिखे और बच्चों से वह नाटक तैयार भी करवाया। नाटक सुपर हिट था और बच्चों का अभिनय दर्शकों के दिलो-दिमाग पर छा गया था। बड़ी बहन ने भी वह नाटक देखा था। रात को वह उसके लिए दूध गर्म कर लाई-‘‘ अब मैं तुम्हें कुछ भी बनने के लिए प्रवोक नहीं करूंगी। अपनी मर्जी की लाइन पकड़ो दुष्यंत। अपने ढंग से जियो। यही जिंदगी की कुंजी है। यू आर अ ग्रेट आर्टिस्ट।‘‘

उसने बहन के कंधे पर सिर टिका दिया।

दीपावली के बाद दुष्यंत और राजीव मुंबई आ गए। चलते वक्त माँ ने कहा था-‘‘ बेटा, यह कभी मत भूलना कि तुम्हारे पिता ने अपनी जिंदगी देश के नाम कर दी। तुम्हें ऐसा कुछ कर दिखाना है कि उनकी कुर्बानी बेकार न जाए।‘‘

‘‘माँ पिता सरहद पर हैं। मैं देश के अंदर का रंगरूट। फर्क इतना है कि उनके हाथ में बंदूक है मेरे हाथ में कलम और आंखों के आगे चुनौती। माँ तेरा ही तो बेटा हूँ।‘‘

माँ ने लड्डू मठरी साथ रख दिए थे। हिदायत भी ......‘‘बाहर का मत खाना। हो सके तो घर में दाल चावल पका लेना ‘‘अब वह माँ को कैसे बताता कि कितने ही दिन उसने छोटी सी चॉल में वड़ापाव खा कर गुजारे। रात रात भर जागकर दुष्यंत शेक्सपियर, चेखव, ब्रेख्त के नाटक पढ़ता। उस वक्त इन्हीं का चलन था। पूरा हिंदी थिएटर जगत इन विदेशी नाटक कारों से बुरी तरह प्रभावित था। दुष्यंत ने कुछ कलाकारों को जोड़कर अपना ग्रुप बना लिया था। और इन्हीं कलाकारों के साथ वह जुहू में टू बैडरूम हॉल के फ्लैट में पेइंग गेस्ट बनकर रहने लगा था। किराया कामवाली बाई की पगार वे आपस में शेयर करते और खाना मिलकर पकाते। ज्यादातर लंच, डिनर बाहर ही होता। उन दिनों वह शेक्सपियर के हेमलेट पर काम कर रहा था। जिसमें वह अभिनेता और निर्माता दोनों की बागडोर थामे था। सारा रिसोर्स ही उसने खड़ा किया था। नीलकमल फिल्म स्टूडियो में नाटक के सेट का डिजाइन तैयार हुआ था। वे उसकी और उसके ग्रुप की तपस्या के दिन थे। सभी युवा, सभी में जोश, उत्साह कुछ कर दिखाने का जज्बा। रात रात भर सीन डिसकस होता, संवाद रटे जाते, दिनभर रिहर्सल।खाना पीना सब मुल्तवी। उसके सहयोगी कलाकारों में सबसे अधिक उसका ध्यान रखने वाली राधिका कभी सैंडविच बना लाती, कभी इडली चटनी।

‘‘इन सब में ज्यादा ध्यान मत दो राधिका, अपने रोल पर कॉन्संट्रेट करो।‘‘ दुष्यंत राधिका को समझाता। साधारण नाक नक्श की सांवली सी राधिका, बेहद प्रतिभावान कलाकार थी। उसके सांवले चेहरे पर दूध से सफेद दाँत उसकी हँसी को चार चाँद लगा देते। दुष्यंत के मन में जैसे कुछ क्लिक होता पर फिर तुरन्त वह अपने सीन को फोकस करने लगता।

नाटक का प्रीमियर पृथ्वी थिएटर में हुआ। शुरू में दर्शक कम थे। पर तीसरे शो तक दर्शकों की संख्या काफी बढ़ गई थी। दुष्यंत अभी अपनी कामयाबी का जश्न अपने ग्रुप के साथ मना भी नहीं पाया था कि चैथे शो के दौरान राजीव घायल हो गया। नाटक में वह क्लॉडियस का रोल कर रहा था। फाइट सीन के दौरान उसकी बाईं आँख के बहुत करीब तलवार का वार लग गया। अधबीच में ही शो रोककर राजीव को अस्पताल ले जाना पड़ा। अगले शो भी जैसे रुक ही गए। इतनी जल्दी दुष्यंत किसी और कलाकार को तैयार भी तो नहीं कर सकता था। थिएटर से नाटक का सेट निकालकर दुष्यंत को अपने फ्लैट की बालकनी में रखना पड़ा। महीनों की मेहनत स्वाहा हो चुकी थी। दुष्यंत आहत था। सब जगह आना जाना बंद। नया सोचना बंद। अधिकतर राजीव के पास बैठा रहता। आँख के करीब की चोट थी। टांके भी आए थे। चेहरे पर सूजन थी। वह बालकनी का दरवाजा बंद रखता। राजीव इस हालत में सेट देखेगा तो उसका घाव भरने में ज्यादा समय लगेगा। वह जानता था उसका प्यारा साथी मन ही मन रो रहा है। रो तो वह भी रहा था। माँ का, बहन का फोन आता ‘‘कैसा चल रहा है तेरा नाटक दुष्यंत।‘‘

क्या जवाब देता कि माँ पहली ही सीढ़ी पर वह गिर पड़ा है। सीढ़ियां तो अनन्त हैं, आसमां तक जाती हैं। 

मुंबई में बारिश टूट कर बरसती है। अपने संग टूटे-फूटे को भी समेट लेती है। उसके टूटे बिखरे सेट को बारिश गलाती रही। साथ ही गलाती रही उसके भीतर भी बहुत कुछ .......तो क्या वह हार मान ले, मान ले कि हेमलेट की ट्रेजेडी उसकी ट्रेजेडी बन गई। नहीं, ऐसा वह होने नहीं देगा। उसे नए सिरे से सोचना है। वह विदेशी अनूदित नाटकों को ही क्यों करें ? क्यों भारी भरकम सेट सज्जा से दर्शकों के मन को मोहे? खुद को खोजते खोजते वह किचन तक आ गया। कॉफी का पानी गैस पर चढ़ाया। भूख भी लग आई। कुछ भी न था खाने को। उसने नीचे की किराना शॉप में ब्रेड, अंडे, नमकीन के लिए फोन किया। सामान लेकर अठारह उन्नीस साल का लड़का दरवाजे पर था। उसे देख मुस्कुराया-‘‘ साहब आपका तो पूरा सेट गल गया। कल कचरे वाले से फिकवा दीजिए।‘‘

दुष्यंत के दिल पर चोट लगी लेकिन फौरन ही सम्हला-‘‘ जब आए भेज देना।‘‘

‘‘साहब क्या हुआ आपके नाटक का ?‘‘

रुपये देते हुए वह एकटक लड़के को देखता रहा। उसे लगा जले पर नमक छिड़क रहा है। यह बात उसने राजीव से छिपा ली थी। उसने कॉफी का मग उसकी ओर बढ़ाया तो राजीव बोला-‘‘ बहुत आराम हो गया  कल से पुराने ढर्रे पर आना है।‘‘

दुष्यंत फीकी हंसी हंस दिया।

काफी दिनों बाद राजीव और दुष्यंत एक साथ घर से बाहर निकले। किराना दुकान वाले लड़के ने दोनों को सलाम ठोका।

‘‘तबीयत ठीक हो गई राजीव सर?‘‘ और उसकी ओर देख फिर वही सवाल -‘‘साहब क्या हुआ आपके नाटक का?‘‘

उसका मन हुआ लड़के को झिड़क दे पर एकाएक उसे एहसास हुआ कि इस सवाल, इस चिंता की वजह वह नहीं है जो वह सोच रहा है। इस चिंता की वजह है कि लड़का अपनी तरफ उसका ध्यान खींच रहा है। बता रहा है कि मेरी तरफ देखिए। मेरा थिएटर करिए न।

और यह अहसास होते ही दुष्यंत ने खुद को सेंट्रल लाइब्रेरी में कैद कर लिया। राजीव सुमेधा थिएटर द्वारा होने वाले ‘‘तुगलक‘‘ में काम तलाशने निकल जाता। उसके साथी कलाकार दूसरी नाट्य संस्थाओं के लिए शो कर रहे थे और वह सुबह नाश्ता करके लाइब्रेरी आ जाता। दिन भर वह स्टडी करता। वहां स्टडी करते हुए उसने जाना कि हिंदुस्तानी थिएटर क्या है ? ग्रीक थिएटर क्या है? दुनिया का थिएटर क्या है? वह जो सिल्वर लाइन उसे किराना दुकान में काम करने वाले लड़के ने दी थी उसे विचार रूप देने में लंबा वक्त लगा। जब राजीव से उसने इसकी चर्चा की तो वह आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगा -‘‘यार तू तो रंग चिंतक होता जा रहा है। कहां हम थिएटर करने यहां आए थे, कहाँ तू दार्शनिक होता जा रहा है।‘‘

‘‘हाँ राजीव, यह चिंतन ही हमें नई दिशा देगा। बस तू थोड़ा वक्त दे मुझे और प्रॉमिस कर कि जब मैं पुख्ता नींव पा लूंगा तुझे अपने करीब पाऊंगा।

सेंट्रल लाइब्रेरी से निकलकर दोनों मिसल पाव खाने एक छोटे से रेस्तरां में बैठे थे। दोनों ने अपने हाथों की हथेलियाँ पंजा लड़ाने की मुद्रा में टकराई और वादे में बंध गये।

करीब 3 बरस तक दुष्यंत माँ के भेजे रुपयों से काम चलाता रहा और बतौर रंग चिंतक भारत से लेकर विदेश के थिएटर को समझता रहा। इस बीच राधिका उसके काफी करीब आ गई। वह राधिका से अपनी सोच, स्वप्न और चिंतन को बांटकर सहज हो लेता। धीरे-धीरे थिएटर के लिए मानी हुई धारणाओं से अलग हटकर उसकी जिस एक अथक और सार्थक सोच ने नया रूप लिया वह ‘‘थियेटर आफ रेलेवेंस ‘‘के नाम से थिएटर की दुनिया में उभरा।

राजीव राधिका सहित बाकी के साथी भी जुहू बीच पर मिले। गोल घेरा बनाकर बैठे और कसमें खाई कि हम सब थियेटर आफ रेलेवेंस के नाट्य सिद्धांत में जिएंगे। इस स्थापना दिवस को उन्होंने नारियल पानी से सेलिब्रेट किया और किनारे से टकराती उफनती लहरों के संग संग एक दूसरे का हाथ पकड़े चलते रहे। आसमान में हँसिया के आकार का दूज का चाँद निकल आया था। राधिका ने उस ओर उंगली उठाई -‘‘देखो चाँद भी हमारे संग है।‘‘

तुम भी तो। तुम्हारा साथ भी तो। दुष्यंत ने कहना चाहा और देखता रहा लहरों के संग बिछलती उसकी हँसी को। महसूस करता रहा दिल की धड़कनों में समाई राधिका को। पर यह सही वक्त न था इजहार का। अभी तो मंजिल की ओर जाती पथरीली, कांटों भरी राह दिखाई दी है, अभी तो उसे अपने पैरों की हिम्मत परखनी है, उन काँटों और पत्थरों को नजरअंदाज कर। घर लौट कर उसने माँ और बहन से बात की। 

‘‘माँ मुझे लक्ष्य मिल गया। मैंने जान लिया कि मुझे जिंदगी में क्या करना है।‘‘

इससे पहले कि माँ समझती, बहन प्रश्न करती उसने फोन कट कर स्विच ऑफ कर दिया। आज वह आनंद के अतिरेक को किसी से नहीं बाँटेगा।

हफ्ते भर बाद समाचार था अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और बड़ी तेजी से मुंबई में दंगे भड़क उठे। चारों और धुआं धुआं। सुलग उठी मुंबई। दुष्यंत की नींद ही उड़ गई। दंगों में इंसानियत झुलस गई थी और उसने जिस परिकल्पना के तहत अपना मिशन स्थापित किया था मानो उसके परखने की घड़ी आ गई थी। रात दिन जुटकर उसने नाटक लिखा और दंगों के माहौल में जब अपने साथियों के सामने उसने उसे प्रदर्शित करने की बात रखी तो राजीव, 

राधिका को छोड़कर सभी ने विरोध किया-

‘‘पागल हो गए हो दुष्यंत। इस माहौल में नाटक खेलोगे। यह तो जान का सौदा हुआ।‘‘

दुष्यंत अपने निश्चय पर अडिग था।

‘‘हाँ, जान का सौदा ही समझो। हम कफन यानी सफेद पायजामा कुर्ते में ठीक 5ः00 बजे खार और बेहरामपाड़ा के बीच मिलेंगे।‘‘

उस कफ्र्यू ग्रस्त एरिया में ? वहाँ नाटक खेलना होगा?‘‘

लेकिन इस सवाल को निरुत्तरित छोड़ दुष्यंत जा चुका था।

दूसरे दिन सभी साथी मंत्रबिद्ध से नियत ठिकाने पर मौजूद थे। न रिहर्सल, न संवादों का रटना, न सेट, न सज्जा। सबके हाथों में उनके संवादों का पन्ना था और दुष्यंत की आँखों में एक आँधी। उस आँधी का सामना कोई नहीं कर पाया। उस आँधी ने पंद्रह सौ की जुटी भीड़ के दिलों में से नफरत अलगाव को जड़ से उखाड़ दिया और वहाँ प्यार मोहब्बत के बीज बो दिए। यह दुष्यंत के मिशन की पहली कामयाबी थी जिसने एक नाट्य आंदोलन का सूत्रपात किया।

उस सुलगते माहौल में पहली बार दुष्यंत ने राधिका के सामने दिल खोल कर रख दिया। 

‘‘राधिका क्या मेरी जीवनसंगिनी बनोगी?‘‘

राधिका ने पलकें झुका लीं। देर तक पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदती रही। कहना चाहा ‘अगर यह सुलगता वक्त उनके प्यार की ताकत बन रहा है तो हाँ दुष्यंत, अगर इस सुलगते वक्त को उन्हें अपने मिशन से महकाना है तो हाँ दुष्यंत। ‘

राधिका की हाँ का जवाब दुष्यंत को उसकी ख़ामोशी से मिल गया। उस रात दोनों के दिल मोहब्बत से लबरेज थे।   

दुष्यंत के हौसले बुलंद थे। थिएटर आफ रेलेवेंस ने नाट्य आंदोलन का रूप ले लिया था। वह अपने साथियों के साथ मिलकर मुंबई के चप्पे-चप्पे में नाटक खेल रहा था। ढेरों नाटक। न विदेशी नाटक, न लिखे गए साहित्यिक नाटक। इन सबसे परे दुष्यंत नई नई थीम पर खुद लिखता। उसके साथी लिखते, दर्शक लिखते, वह दर्शकों के मन में उतर जाता। दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाते, यह मंच उनका है। वे उसके पात्र, उनकी जिंदगी ही नाटक की थीम है। सैकड़ों, हजारों शो। दुष्यंत को दम मारने की फुर्सत नहीं। राधिका को बाकायदा ब्याह कर लाने की फुर्सत नहीं। जब दिल नहीं माना तो राधिका बोरिया बिस्तर लेकर उसके फ्लैट में आ गई।

‘‘जब फुरसत होगी शादी कर लेंगे।‘‘ दोस्तों ने भी साथ दिया। लिहाजा एक कमरा उन दोनों को दे दिया गया। दूसरे कमरे में राजीव और दो साथी रहने लगे। महीने भर बाद दोनों साथी ने एक अलग ठिकाना खोज लिया। अब राजीव, राधिका और दुष्यंत तीनों के बीच वक्त नए-नए आयामों को लेकर हर दिन हाजिर होने लगा।

छै बरस गुजर गए।इन छै वर्षों में दुष्यंत ने पूरे देश की सरजमी को नाप लिया और सरहदों के पार पहुंचने लगा थियेटर आफ रेलीवेंस। यूरोप के अधिकांश देशों में उसके शो आयोजित हुए। नई और अद्भुत थीम पर लिखे नाटक और अपने साथियों के साथ दुष्यंत का थिएटर जब विदेशों में शो करता तो और-और की मांग बढ़ती जाती। अपने देश लौटता तो नाट्य कार्यशालाएं मानो उसकी बाट जोहतीं। बाट तो माँ भी जोह रही थीं। पिता रिटायर हो चुके थे और अब उन दोनों को बहू की जरूरत थी। यानी कि दुष्यंत की पत्नी की।अंडमान निकोबार की 10 दिन की कार्यशाला निपटाते ही दुष्यंत राधिका को लेकर माँ के पास गया।

माँ ने नख से शिख तक राधिका का मुआयना किया। बहन हँसने  लगी-‘‘ बेकार है माँ। दोनों  6 सालों से साथ रह रहे हैं। गनीमत इसी में है कि मुहूर्त देखकर शादी निपटा दो।‘‘

रिटायरमेंट के बाद फौजी के लिबास के साथ अपना डरावना रुतबा भी उतार चुके थे पिता।

अब वे अपने बच्चों के जज्बाती और प्यार करने वाले पिता थे। अपने दोनों बच्चों के लिए अब वे कुछ भी करने को तैयार थे। बहन फौज में डॉक्टर हो गई थी और पढ़ाई के दौरान ही जिससे उसे मोहब्बत हो गई थी उसी से शादी कर दोनों कश्मीर में थे। पति-पत्नी दोनों फौज में डॉक्टर। हालांकि शादी अंतरजातीय थी लेकिन माँ पिता की रजामंदी से पूरे रीति-रिवाज के साथ हुई थी। पिता संतुष्ट थे। दोनों बच्चों में कम से कम बेटी तो उनके नक्शेकदम पर है। दुष्यंत की कामयाबी से भी वे संतुष्ट थे। लेकिन बिना शादी किए सालों उसका राधिका के साथ रहना उन्हें नागवार गुजरता था।

दुष्यंत और राधिका की एक सादे समारोह में शादी कर दी गई। धूमधाम तड़क-भड़क से परहेज था दुष्यंत को। उसके नाटक भी बिना साज-सज्जा, सेट के दुनिया भर में लोकप्रिय हुए थे जिंदगी भी वह इसी तर्ज में जी रहा था ‘मेरे संग चलना है तो मिट्टी फाँकने को तैयार हो जाओ।‘

चार दिन बाद वे मुंबई लौट आए। राजीव ने सभी साथियों के साथ मिलकर एक बड़ी पार्टी अरेंज की थी। जहाँ राजीव की जिंदगी के महत्वपूर्ण लम्हे का खुलासा वृंदा बिष्ट और राजीव के पिछले 7 सालों से चले आ रहे इश्क से हुआ। राधिका ने उनकी मंगनी की घोषणा की और शादी की तारीख तय हुई। साल भर में हुए बदलाव के साथ एक बदलाव यह भी था कि राजीव वृंदा बिष्ट के नेपियन सी रोड स्थित बंगले में शिफ्ट हो गया था। वृंदा बिष्ट  उससे 8 साल बड़ी थी और अपने पिता की करोड़ों की संपत्ति की अकेली वारिस थी।

नाटक खत्म हो चुका था। दुष्यंत खन्ना अंधेरे कोने से निकलकर मंच के नजदीक आए। सभी अभिनेता, अभिनेत्रियां उनके पैर छू रहे थे। दर्शकों में से भी कितने युवा आगे आए।उनके पैर छूते हुए बोले-

‘‘सर बेहतरीन नाटक था।‘‘

‘‘कहाँ हो तुम लोग ?‘‘

‘‘बस सर जिंदगी के तकाजों की गिरफ्त में हैं।‘‘

दुष्यंत खन्ना मुस्कुराए-‘‘ मेरे विद्यार्थी होकर ऐसा कह रहे हो?‘‘ ‘‘नहीं सर, वो बात नहीं है।‘‘

दुष्यंत खन्ना अपने सभी विद्यार्थियों को कैंटीन ले आए।

‘‘तुम सब तो जन्मजात कलाकार हो। जिंदगी के अपने तकाजे हैं, उन्हें कभी अपने अंदर की कला पर हावी नहीं होने देना चाहिए। फुरसत मिले तो खुद को परखना।‘‘ दुष्यंत खन्ना की यही खासियत थी। वह कभी हालात, मजबूरियों से समझौता नहीं करते थे। यही वे अपने विद्यार्थियों से उम्मीद रखते थे।

दुष्यंत खन्ना अब 60 साल के हैं। जब जालंधर से मुंबई आए थे तो 23 साल के थे। 37 वर्ष उन्होंने खुद को समझने और अपने मिशन को दुनिया को समझाने और दुनिया को अपना बना लेने में लगा दिए। उनकी दो जुड़वां बेटियाँ हैं और बांद्रा मैं अपना फ्लैट। डेढ़ मिनट बड़ी बेटी ने अपना प्रोडक्शन हाउस खोला है।‘‘ राधिका प्रोडक्शन्स।‘‘ वह इस प्रोडक्शन के बैनर तले टीवी धारावाहिकों के निर्माण में जुटी है और जो छोटी बेटी है वह राजनीति में है। दुष्यंत खन्ना ने कभी बेटियों पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला। न ही शादी के लिए फोर्स किया लेकिन आजकल वे भीतर ही भीतर विचलित से हो रहे हैं। अपने अथक परिश्रम से उन्होंने जो यह महल खड़ा किया है क्या होगा उनके बाद इसका ? इस बात को अपनी दौड़ती दिनचर्या में एक बार भी उन्होंने नहीं सोचा था पर अब यह सोच उन्हें मथे डाल रही है। उन्हें तनावग्रस्त देख बेटियों ने जबरदस्ती उन्हें क्रिसमस पर ऊटी भेजा। उन्हें और राधिका दोनों को ‘‘जाइए पापा, थोड़ा वक्त अपने लिए भी निकालिए।‘‘

उन्होंने अपनी समझदार बेटियों को लाड़ से देखा। उन्हें लगा कि जैसे वे अपनी बेटियों के सामने बच्चा हो गए हैं। 

नीलगिरी के सघन दरख्तों से घिरी झील के किनारे वे सूर्यास्त का नजारा देखने बैठ गए। ठंड पड़ रही थी। राधिका कनटोपा और शॉल लिए उनकी बगल में आ बैठी। अपने हाथों कनटोपा पहनाया। शॉल उढ़ाया। घोसले की ओर लौटती चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। उनके चहचहाने में एक संदेश सा महसूस हुआ दुष्यंत खन्ना को। सूरज मद्धिम रोशनी में नारंगी गोले सा झील की सतह पर उभरा। नीलगिरी की डालियाँ हवा में गलबहियां करती झील की सतह को आलोड़ित कर रही थीं। सूरज की पल पल क्षीण होती रोशनी झील की लहरों संग गडमड हो रही थीं। राधिका उनके कान में फुफुसाई-‘‘  दिवस का अवसान‘‘

वे चैंक पड़े। तो यह क्या आगत का संकेत है। फिर वही सवाल कि उनके कामों को आगे कौन बढ़ाएगा ? क्या बिखर जाना ही नियति है। क्या उनका उद्देश्य, लक्ष्य और कामयाबी यहीं तक सीमित होगी ? धीरे धीरे सूरज झील की बाहों में समा गया। फिर सब कुछ शांत था। हवा भी, झूमती डालियाँ भी, चिड़िया भी। जैसे सूरज और झील के इस मदहोश कर देने वाले प्रणय के नजारे से सब जड़ हो चुके थे और अब झील पर चाँद का प्रतिबिंब था। उनकी आँखें चमकने लगीं। उन्हें अपने सवाल का जवाब मिल गया। उन्होंने पास पड़ा कंकड़ उठाकर झील में फेंका। झील का दिल हल्के से उछला और कई लहरें सतह पर फैलने लगीं। यही है जीवन का सत्य। ये लहरें ही तो आगे चलकर तूफानी मौजे बनेंगी। खुद को डुबोने का कर्म तो कब का कर चुके दुष्यंत खन्ना।   

भोपाल, मो. 9769023188, Email : kalamkar.santosh@gmail.com

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आलेख

प्रकृति की सहनशीलता अब खत्म होने को 


          प्रफुल्ल सिंह ‘बैचेन कलम’

प्रकृति की सहनशीलता अब खत्म होने को प्रकृति, जिसके जितने करीब जाओ उतनी ही अपनी ओर खींचने को आतुर। बाहरी और आंतरिक सौंदर्य से लबालब। अद्भुत सम्मोहन शक्ति की स्वामिनी। इतनी मोहक कि एक रूखा व्यक्ति भी दो पल के लिए ठिठक जाता है। विभिन्न रूप और हर रूप का अपना अलग दैवीय सौंदर्य। इसके सौंदर्य का रसपान एक प्रकृति प्रेमी ही कर सकता है। वही महसूस कर सकता है इसकी विभीषिक में, कांटों में और संघर्षों में भी इसका अनूठा सौंदर्य। 

सघन अरण्य की ओर रुख करें तो अपने बाहुपाश में बांध लेती है प्रकृति। अनुपम सौंदर्य, लंबे घने तरुवरों का सागर, नाना रूप। कुछ नन्हें तो कुछ आसमां को चूमते। सबके अलग रंग, सबकी अलग पत्तियां। स्वयं के रूप से संतुष्ट। न ईष्र्या न द्वेष, जो मिला उसमें खुश, स्वयं में मस्त, झूमते गाते जीवन को सरलता से जीते नजर आते हैं। इनसे लिपटी खूबसूरत लताएं अपने प्रिय से प्रेम प्रदर्शित करती हुईं, थोड़ी-सी इठलाती हुई मनमोहक। नयन-आकर्षक जंगली फूलों से सज्जित, एक अलग खुशबू से महकता हुआ सुरभित अरण्य। इसकी गोद में विचरते सुंदर जीव-जंतु। रंग-बिरंगे आकर्षक पक्षियों के कलरव से गूंजता हुआ सन्नाटा अद्भुत। 

रेगिस्तान, रेत का अनूठा सौंदर्य। सूर्याेदय-सूर्यास्त के समय स्वर्णथाल, तो दुपहरी में रजतथाल। रेत के चमचमाते टीले। टीलों में पवन की चंचलता प्रकट करती हुई नक्काशी-सी लहरदार लकीरें। मानो रात राधा का इंतजार करते कान्हा ने बैठे-बैठे लकीरें खींच दी हों। उत्कट जिजीविषा को दर्शाती कंटीली हरीतिमा। थोड़े में संतुष्ट हो खुश रहने की कला सिखाते रंगीन फूलों से युक्त कैक्टस। संघर्षों में जीना सिखाता टेढ़ा-मेढ़ा सा फिर भी खूबसूरत ये ऊंट। कितना सौन्दर्य, प्रकृति ने किसी का हाथ खाली नहीं रखा, सबको कुछ न कुछ विशिष्टता से अलंकृत किया है।

पहाड़ों की ओर जाओ तो हीरक ताज धारण किए हुए पर्वतराज का चित्ताकर्षक सौंदर्य स्तब्ध कर देता है हमें। सर्पिल सड़कों से गुजरो, तो ये कहती हैं - देखो तुम्हारी जिंदगी की राह भी तो कुछ ऐसी ही हैं न। हर चंद कदमों के बाद एक नया मोड़। कभी राहत का मोड़ तो कभी संघर्षों का मोड़। ये मोड़ जरूरी भी तो हैं लक्ष्य तक पहुंचने के लिए। उन्नति की चढ़ाई को आसान जो करते हैं। पानी का ऊंचाई से गिर, हार नहीं मान, पहाड़ों और पत्थरों से ठोकर खाकर अप्रतिम झरने में परिवर्तित होना हमें सिखा जाता है। यही कि संघर्षों से हार न मान, गिरने का शौक न मना, हमें नई राह पर चल स्वाभिमान से अपने व्यक्तित्व को नए सौंदर्य में ढाल लेना चाहिए। पहाड़ों के कोख से निकल बाबुल के दामन में हरियाली बिछाती हुई ये नदियां निकल पड़ती हैं नए परिवेश को हरीतिमा देने। एक नई संस्कृति को जन्म देने, सृजनशील नारी की तरह। 

कितना सौंदर्य बिखरा पड़ा है हर दिशा में। संपन्नता में भी सौंदर्य, तो विपन्नता में भी सौंदर्य, सुरुपता में भी सौंदर्य तो कुरूपता में भी सौंदर्य। विश्वास नहीं होता कि हमारी धरती कभी सूर्य की तरह धधकती थी। करोड़ों वर्षों की तपस्या के बाद धरती ने यह रूप पाया है। शानदार वृक्ष, खूबसूरत पहाड़, शांत-सौम्य सागर, उछलते खेलते नटखट झरने और उत्तरीय सी लिपटी नदियां। 

जब मानव आया धरा पर, इन वृक्षों ने पनाह दी, अपने फलों से उनकी क्षुधा तृप्त की। जीवित रहने के लिए प्राणवायु उपहार में दिया। नदियों ने उनकी प्यास मिटाई। सबने नवागत का दिल खोल कर स्वागत किया। मानव ने भी उन्हें देवी-देवताओं का दर्जा दिया। फिर हुआ यह कि मानव बुद्धिको मान हो गया। बुद्धिमान होते ही मूर्ख हो गया। सोचने लगा कि यह सब बस हमारा है। वह और-और की चाह करने लगा। लोभ की पराकाष्ठा, विकास की उत्कट चाह में अपने जीवनदायक का विनाश करने लगा। भूल गया कि ये हैं तभी उनका अस्तित्व है। लालसा थम नहीं रही, मूक साथी मौन हो बलिदान दे रहे हैं। पर प्रकृति अब नहीं सह पा रही है। अब ये प्रतिकार करने लगी है। मानव अब भी न समझा तो उसे इसका भयानक रूप देखने के लिए तैयार रहना होगा।।

-लखनऊ, मो. 6392189466

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कहानी

स्वप्न: गी द मोपासां की कहानी Was it a Dream

हिन्दी अनुवाद: द्विजेन्द्र द्विज 


     श्री द्विजेन्द्र द्विज

मैंने उसे दीवानावार चाहा था। कोई किसी को क्यों चाहता है? क्यों चाहता है कोई किसी को ? कितना अजीब होता है, सिर्फ़ एक ही को देखना, पल-पल उसी के बारे में सोचना, दिल में बस एक ही ख़्वाहिश, होंठों पे बस एक ही नाम - एक ही नाम, जो बढ़ा आता है, सोते के पानी-सा, आत्मा की गहराइयों से होंठों तक, एक ही नाम जो आप दोहराते हैं बार-बार, एक ही नाम जो आप लगातार बड़बड़ाते हैं कहीं भी प्रार्थना की तरह।

हमारी कहानी, मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ क्योंकि प्रेम की बस एक ही होती है कहानी, जो हमेशा एक ही जैसी होती है। मैं उसे मिला; मैंने उसे चाहा; बस ! और पूरा एक बरस मैं उसकी नज़ाक़त उसके प्रेम-स्पर्शों, उसकी बाहों में, उसकी पोशाकों में, उसके शब्दों पर जीवित रहा हूँ, इतनी अच्छी तरह ढँका-लिपटा, बँधा हुआ उससे मिलने वाली हर चीज़ में, कि मुझे रात- दिन की परवाह ही नहीं कि मैं जीवित हूँ, या मर गया हूँ।

और फिर वो मर गई, कैसे ? मैं नहीं जानता; अब मुझे कुछ भी याद नहीं है। लेकिन वह एक शाम को भीग कर लौटी थी, बारिश तेज़ थी। अगले दिन उसे खाँसी हुई, लगभग एक हफ़्ता वो खाँसती रही और उसने बिस्तर पकड़ लिया। फिर क्या हुआ, मुझे कुछ याद नहीं है, डाक्टर आए, दवाइयाँ लिखीं और चले गए। दवाइयाँ लाई गईं, कुछ औरतों के द्वारा उसे पिलाई गईं। उसके हाथ गर्म थे। उसका माथा तपा हुआ था, आँखें चमकीली और उदास थीं। मैंने उससे बात की, उसने जवाब दिया, लेकिन मैं भूल गया हूँ कि उसने कहा क्या था। मुझे तो बस उसका वो हल्क़ी-सी, कमज़ोर-सी ठण्डी साँस लेना याद है। बस उसने कहा ‘आह!’ और मैं सब समझ गया।

इसके अलावा मैं कुछ नहीं जानता, कुछ भी नहीं। मैं एक पादरी से मिला, उसने कहा, ‘तुम्हारी प्रेमिका?’ मुझे लगा पादरी उसका अपमान कर रहा था, वह मर चुकी थी, और उसके बारे में ऐसा कहने का अधिकार किसी को नहीं रह गया था। मैंने उस पादरी को निकाल दिया। फिर एक और आया जो दयालू और कोमल हृदय वाला था। जब उस पादरी ने मुझसे उसके बारे में बात की तो मैंने आँसू बहाए। लोगों ने उसे दफ़नाने के बारे में मुझे पूछा। उन्होंने क्या कहा, मुझे कुछ भी याद नहीं। मुझे तो बस वो ताबूत याद है। हथौड़ी का वो नाद याद है जब उन्होंने उसे ताबूत में बंद करके ताबूत पर कीलें ठोंक दी थीं। आह! परमेश्वर! परमेश्वर! परमेश्वर!

उसे दफ़न कर दिया गया। दफ़्ना दिया गया उसे! उस गड्ढे में! कुछ लोग आए, कुछ मित्र औरतें, मैं उनसे बचने के लिए भागा, भागा और गलियों में पैदल चला, घर गया और अगले दिन सफ़र पर निकल गया।

अभी पिछले कल ही पैरिस लौटा हूँ। और जब मैंने अपना कमरा - हमारा कमरा, हमारा बिस्तर, हमारा फ़र्नीचर और मौत के बाद जो कुछ भी शेष रह जाता है - फिर देखा तो दुःख के एक ज़ोरदार झटके ने मुझे यूँ जकड़ लिया कि मैंने खिड़की के रास्ते से ख़ुद को गली में फेंक देना चाहा। मैं इन चीज़ों में, उसे अपने भीतर रखने और पनाह देने वाली दीवारों में, जिनकी अत्यन्त सूक्ष्म दरारों में उसकी त्वचा और साँसों के अनगिनत परमाणू मौजूद थे, और अधिक नहीं रुक सका। इस सबसे बचने के लिए मैंने अपना हैट उठाया और जाते-जाते हाल में लगे उस आदमक़द शीशे (आईने) के क़रीब से गुज़रा जो उसने वहाँ इसलिए लगवाया था कि बाहर जाने से पहले उसमें स्वयं को सिर से पैरों तक (सरापा) निहार सके, देख सके कि उसके ऋंगार अच्छे लग रहे हैं या नहीं।

मैं ठिठक कर रुक गया उस दर्पण के सामने जिस में वह न जाने कितनी ही बार प्रतिबिंबित हुई थी - इतनी बार- इतनी बार कि शायद उस दर्पण ने उसके प्रतिबिम्ब को ही सुरक्षित कर लिया हो। मैं वहाँ खड़ा था, काँपता हुआ, आँखें गड़ाए, उस दर्पण पर - उस सपाट, गहरे, ख़ाली दर्पण पर जो उसे सरापा ख़ुद में क़ैद कर लेता था उस पर मेरी तरह और मेरी दीवानी निगाहों की तरह क़ाबिज़ हो जाता था। मुझे लगा मैं उस दर्पण को चाहने लगा हूँ। मैंने दर्पण को छुआ, वह ठण्डा था। आह ! यादें ! व्यथित दर्पण; जलता हुआ दर्पण; भयावह दर्पण; पुरुषों को तड़पाता हुआ दर्पण! भाग्यशाली होते हैं वे जिनका हृदय स्वयं में बन्दी वस्तुओं को विस्मृत कर पाता है, भूल जाता है बीते हुए क्षणों को ! कितना व्यथित हूँ मैं !

मैं बाहर चला गया, अनजाने में, न चाहते हुए भी, क़ब्रिस्तान की ओर। मुझे उसकी सादा-सी क़ब्र मिल गई जिस पर सफ़ेद संगमरमर का क्रॉस बना हुआ था, जिस पर ये कुछ शब्द खुदे हुए थे:

उसने किसी को चाहा, चाही गई, और स्वर्ग सिधार गई। ’

वहाँ है वह, क़ब्र में, सड़ी हुई ! कितना भयानक है यह सब। मैं सुबकता रहा, अपना माथा ज़मीन पर टिकाकर, बहुत देर, बहुत देर वहीं रहा। मैंने देखा अँधेरा हो रहा था और एक अजीब-सी पागल ख़्वाहिश, एक हताश प्रेमी की चाहत ने मुझे जकड़ लिया। मैं सारी रात उसकी क़ब्र पर रो कर बिता देना चाहता था। लेकिन वहाँ देखे या पाए जाने पर मुझे वहाँ से खदेड़ दिया जाता तो फिर मैं क्या करता ? मैं उठा और मुर्दों के शहर में घूमने लगा। मैं चलता रहा, चलता रहा। कितना छोटा होता है यह शहर, उस शहर जिसमें हम ज़िन्दा लोग रहते हैं, की तुलना में। फिर भी मुर्दे ज़िन्दा लोगों से कितने अधिक होते हैं! हम ऊँचे घर चाहते हैं, चैड़ी गलियाँ और ज़मीन चार पीढ़ियों के लिए जो एक ही समय में दिन की रोशनी देखती हैं, झरनों से पानी, अंगूर की बेलों से शराब पीती हैं और समतल ज़मीनों (की उपज) से पेट भरती हैं। और मृतकों की समस्त पीढ़ियों के लिए, मानवता की हम तक उतरने वाली सीढ़ियों के लिए संभवतः कुछ भी नहीं है। ज़मीन उन्हें वापिस ले लेती है, विस्मृति उन्हें मिटा डालती है।

क़ब्रिस्तान के एक छोर पर, सहसा मैंने देखा कि मैं उसके सबसे पुराने हिस्से में हूँ, जहाँ बहुत पहले मर चुके लोग धूल में मिल रहे हैं, जहाँ क्रॉस भी सड़-गल चुके हैं, जहाँ संभवतः कल, नए आने वाले लोगों को गाड़ा जाएगा। क़ब्रिस्तान का यह भाग मानव-मांस की गंध पर पले हुए उपेक्षित गुलाबों सरू-वृक्षों और उदास सुन्दर उद्यानों से भरपूर है।

मैं अकेला था, बिल्कुल अकेला। मैंने स्वयं को हरे पेड़ के पीछे दुबक कर, अँधेरी, उदास झाड़ियों में छिपा लिया मैं प्रतीक्षा करता रहा तने से चिपका हुआ जैसे तूफ़ान में क्षतिग्रस्त जहाज़ का सवार तख़्ते से चिपककर प्रतीक्षा करता है।

अँधेरा गहराते ही मैं अपने आश्रय से बाहर आकर मुर्दों से अटी ज़मीन पर धीरे-धीरे, हौले-हौले बिना कोई आहट किए हुए उसकी क़ब्र की तलाश में चल दिया। मैं क़ाफ़ी देर इधर-उधर भटका लेकिन फिर उसे ढूँढ नहीं पाया। मैं बाहें पसारे अपने हाथ-पैर घुटने, अपना सीना, यहाँ तक कि अपना सर भी क़ब्रों से टकराते हुए, चलता रहा लेकिन उसे ढूँढ नहीं पाया। अन्धे की तरह रास्ता टटोलता मैं, अँधेरे में, पत्थरों को लोहे के जँगलों को, धातुओं की मालाओं, मुर्झाए हुए फूलों के हारों को महसूस कर पा रहा था। उँगलियों को अक्षरों पर फेर कर मैंने नाम पढ़े!

क्या रात थी! क्या रात थी! चाँद कहीं था ही नहीं। क्या रात थी ! मैं बहुत डर गया था। क़ब्रों की क़तारों के बीच के तंग रास्तों में मैं बहुत ज़्यादा डर गया था। मेरे दायें-बायें, आगे-पीछे, आस-पास, हर जगह क़ब्रें ही तो थीं ! मैं एक क़ब्र पर बैठ गया। चलने की ताक़त मुझमें नहीं बची थी। मेरे घुटने बहुत क्षीण पड़ चुके थे, मैं अपनी धड़कनें सुन पा रहा था। मैंने कुछ और भी सुना, क्या ? एक अजीब-सा शोर था यह। क्या यह शोर मेरे ज़ेहन में मचा था, अभेद्य रात में मचा था, या फिर मेरे पाँवों तले की लाशें-बोई हुई ज़मीन के भीतर मचा था?

मैंने अपने चारों तरफ़ देखा। मुझे याद नहीं मैं वहाँ कब तक रुका, मुझे लक़वा मार गया था, भय ने मुझे बर्फ़ बना दिया था, मैं चिल्लाने वाला था मैं मरने ही वाला था।

सहसा, संगमरमर की वह पट्टी जिस पर मैं बैठा था, मुझे लगा हिल रही थी। हाँ, यह हिल रही थी, मानो इसे कोई उठा रहा हो। एक ही छलाँग के साथ मैं पास वाली क़ब्र पर कूद गया। और मैंने देखा, हाँ, मैंने साफ़ देखा, ऊपर उठते हुए उस संगमरमर के टुकड़े को जिसे मैंने अभी-अभी छोड़ा था।  फिर मुर्दा,  एक नंगा कंकाल अपनी दोहरी कमर से पत्थर को धकेलते हुए बाहर निकला, घने अँधेरे के बावजूद मैं क्रॉस पर लिखा हुआ पढ़ पा रहा था:

‘यहाँ लेटे हैं जेक्वीज़ ओलीवाँ, जो इक्यावन वर्ष की आयु में भगवान को प्यारे हुए। वे अपने परिवार से प्रेम करते थे, दयालू थे, सम्मानित थे और प्रभुकृपा में स्वर्ग को सिधारे।’

उस मुर्दे ने भी अपनी क़ब्र पर लिखे हुए को पढ़ा; फिर उसने रास्ते से एक तीखा पत्थर उठाया और बड़ी सावधानी से अक्षरों को खुरचने लगा। उसने धीरे-धीरे उन्हें मिटा दिया और अपनी आँखों के झरोखों से उन सब जगहों को देखा जहाँ वे अक्षर उकेरे गए थे, उसने हड्डी की नोंक के साथ जो कभी उसकी तर्जनी रही होगी, प्रदीप्त अक्षरों में, जैसे कि लड़के दीवारों पर दियासलाई की नोंक से पँक्तियाँ उकेर देते हैं, लिखा:

यहाँ लेटा है जेक्वीज़ ओलीवाँ, जो इक्यावन वर्ष की आयु में मर गया। उसकी निष्ठुरता उसके पिता की शीघ्र मृत्यु का कारण बनी, क्योंकि वह अपने पिता की समस्त सम्पत्ति का उत्तराधिकार चाहता था; उसने अपनी पत्नी को संतप्त किया; बच्चों को यातनाएँ दीं; पड़ोसियों को धोखे दिए; जिसे भी लूट सकता था, लूटा और फिर यह घिनौना व्यक्ति मर गया।

लिख चुकने के बाद वह निश्चल खड़ा अपनी अपनी कृति को निहारता रहा। मैंने नज़रें घुमाकर देखा कि सब क़ब्रें खुली हुई थीं, सब मुर्दे अपनी-अपनी क़ब्रों से निकल आए थे और उन्होंने अपनी-अपनी क़ब्रों से अपने रिश्तेदारों द्वारा खुदवाए गए झूठ मिटा डाले थे और उन पर सच उकेर दिया था। और मैंने देखा कि अपने जीते-जी वे सब अपने पड़ोसियों के उत्पीड़क, दुर्भावपूर्ण, बेईमान, पाखण्डी, झूठे, कपटी, निंदक और ईष्र्यालू रहे थे। मैंने पढ़ा कि उन्होंने चोरियाँ की थीं, धोखे दिए थे; हर घृणास्पद काम किया था, ये अच्छे पिता, ये वफ़ादर पत्नियाँ; ये समर्पित सुपुत्र; ये कुँवारी बेटियाँ ; ये सम्मानित व्यापारी ; औरतें और मर्द थे जिन्हें उनके सम्बन्धियों ने अनिंदनीय लिखवाया था। वे सबके सब एक ही साथ, एक ही समय में, अपने अंतिम आवास की दहलीज़ पर सच लिख रहे थे, भयानक और पवित्र सच, जिससे हर व्यक्ति अनभिज्ञ था या कम-अज़-कम उनके जीते जी अनभिज्ञ बनने का ढोंग किया करता था।

मुझे विचार आया कि उसने भी अपने समाधि प्रस्तर पर कुछ न कुछ अवश्य लिखा होगा और अब मैं बेख़ौफ़ हो अधखुले ताबूतों, लाशों और कंकालों में से होता हुआ उसके पास गया इस विश्वास के साथ कि वह मुझे तुरंत पहचान लेगी। मैंने उसे एकदम पहचान लिया, कफ़न में लिपटे हुए उसके चेहरे को देखे बिना, और संगमरमर के क्रॉस पर, जहाँ कुछ समय मैंने पढ़ा था:

‘उसने किसी को चाहा, चाही गई, और स्वर्ग सिधार गई।’

के स्थान पर मैंने उकेरा हुआ पढ़ा:

‘एक दिन अपने प्रेमी को धोखा देने के लिए वह बारिश में बाहर गई, उसे सर्दी लग गई और वह मर गई।’

ऐसा लगता है कि सुबह होते ही लोगों ने मुझे उसकी क़ब्र पर बेहोश पाया होगा। 

धर्मशाला (हि.प्र.), मो. 9418465008

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कविता


अरविंद अवस्थी


समय 

कैसा समय आ गया? 

खुलकर

घूम नहीं सकतीं हवाएं

घूर- घूर कर 

देखते हैं बादल

अपशब्द बोलकर

करते हैं अट्टहास

कभी तो 

हद कर देते हैं

काॅलेज में घुसते-घुसते

खींच लेते हैं दुपट्टा

क्या जानते नहीं

कितनी ताकतवर

होती हैं हवाएं

अपने पर आ जाएं

तो हवा - हवाई होते 

देर नहीं लगती बादलों को

शर्म नहीं आती उन्हें

बिजली की आंख से 

करते हुए गंदे इशारे

अरे बादलों! 

जब बूंद - बूंद गिरते हो 

सहारा देकर

संभालती हैं हवाएं 

धीरे से

सुला देती हैं धरती पर

एहसान मानों 

वर्ना हो जाओगे हवा - हवाई

तरसोगे  

सांस लेने के लिए भी

-मीरजापुर, उ.प्र, मो.  9161686444, ईमेल: awasthiarvind1962@gmail.com    

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कविताएँ

सुश्री संगीता कुजारा टाक 

सच्ची बात

उलझे-उलझे से रिश्ते हैं

मगर रेशम से हैं

तल्ख़-तल्ख़-सी बातें हैं

मगर गहरी-सी हैं

पुराना-पुराना-सा घर है

मगर अपना है

रुखे-सूखे-से जज़्बात हैं

मगर पाक-से हैं

झुका-झुका-सा सिर है मेरा

मगर सज़्ादे में है

मैं और तू

उस तू का अहसास

मेरे लिए

हमेशा से ही

बहुत ज़्ारूरी था

जो मेरे उद्वेगों को दिशा दे सके

मेरे अव्यक्त को व्यक्त कर सके

मेरी नासमझी को समझ में बदल दे

मेरी संवेदनाओं में उफान भर दे

मेरे हौसलों को उड़ान दे सके

उस तू को मैंने बहुत जगह ढूँढ़ा

वर्जित, अवर्जित संभावनाओं में तलाशा

ओड़े-तिरछे पथरीले रास्तों में खोजा

गहरी खाइयों में

और ऊँचे शिखरों पर पता किया

और फिर एक दिन ऐसा लगा

कि जो एक तू था

मुझे मिल गया


इश्क़

मेरे इश्क़ की क्या बिसात 

बेमानी है ये!

मेरी चाहत का कहाँ ठौर-ठिकाना

आवारगी है ये!

इस मोहब्बत पर कौन जाए कुर्बान

बेचारगी है ये!


अहसास

अनंत आकाश के नीचे

विशाल धरती

और मेरी दो आँखें


जिन्होंने देखा है

उस विशाल धरती से

अंकुर निकलते

अंकुर को पौधा बनते

उस पौधे से कोंपल फूटते !


तुम, वही अनंत आकाश

मैं, वही विशाल धरती


और ये नन्हे-मुन्ने पौधे

जैसे, तेरा-मेरा साया

जैसे, तेरा-मेरा रूप

जैसे, तेरे मेरे अंग

जैसे, तेरा-मेरा रंग


सच बताऊँ, कैसा लगता है माँ बनते हुए!

जैसे, आज मैं

खुद से उग आई हूँ!

-राँची, मो. 9234677837

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कविताएँ

सुश्री नंदा पाण्डेय


आरंभ या अंतिम संस्कार

कितनी सहज और स्वाभाविक

इच्छा थी तुम्हारी

माफ कर दो मुझे....

कई दिनों का ठहरा हुआ आवेग

अजीब सी बेबसी और एक कचोट

जो उमड़-धुमड़ कर पिघलने

को तैयार था

संवेदना के इतिहास से घिरे

स्नेहसिक्त बादल आज बरस तो गए

पर बूंदें धरातल तक नहीं आईं

त्रिशंकु की तरह

तुम्हारे ही अधखुले अधरों पर

लटकी रह गई....

आज तुम्हारे अपराध-बोध की

छत्रछाया में रुक कर सुस्ताना

बहुत सुखद लग रहा था मुझे

तुम लिपटे रहे मुझसे

चंदन की सुगंध की आस में

और मैं तय करती रही

तुम्हारी प्रतीक्षा से उत्सर्ग तक कि दूरी

बाहर आज धरती के आगोश में

‘पारिजात’ भी कुछ पाने की बेचैनी 

और खोने की पीड़ा से गुजर रहा था

बिल्कुल मेरी तरह

तुम्हारे प्रति उमड़ते प्रेम ने मेरे मन में

सावन के झोंकों का काम किया

मुझे नहीं पता

आज जो कुछ भी घटित हो रहा है

उसमें चाहत नाम मात्र है भी या नहीं

आज कितनी ही अनगिनत बातें

रगो-रेशे के साथ

 उभरते और मिटते चले गए

शंशय और संदेह के सारे कांटे

जैसे पलट कर मुझे ही बेधने लगे

भावुकता मूर्खता का पर्याय है!

जानते हुए भी

एक बार फिर मैं,

अप्रमेय प्रेम की खोज में

सबसे सरलतम प्रमेय से छली गई

क्या ?

ये मेरा आरंभ होगा या अंतिम-संस्कार

नहीं जानती मैं.......!


मौन फैली चांदनी और मैं

मौन फैली चांदनी और मैं

एक साथ न जाने कितने अनुभवों को जीती हूँ

मुक्तांगन में कुलांचे 

भरता हुआ मेरा मन

तय करने लगा है आज

तुम्हारी प्रतीक्षा से उत्सर्ग तक की दुरी

रह-रह कर दर्द की एक गाँठ 

उभरती है मन में

तुम कौन हो ?

क्यों तुम्हारे सामने

अपना सर्वस्व खो बैठती हूँ मैं

क्यों तुम्हारे सामने

मेरी खुली आँखें झुक जाती है

क्यों तुम्हारे स्पर्श से

मुझे मेरे पन का ज्ञान नहीं रहता

जब तुम अकस्मात् मुझे

अपनी बाहों में भरते हो, तो

जाने कहाँ चली जाती हूँ, मैं

और जब मेरी आँख खुलती है

तो तुम वहां नहीं होते हो

अपनी यादों की कसक ही तो

तोहफे में देकर गए हो तुम

पाषाण बनी थी अहिल्या भी

शायद इसी तरह

हरी फिर जब आये थे तो

प्राण पाये थे उसने और

उनके स्पर्श को पा चेतन हुई थी वो                                                                -रांची, झारखंड, मो. 7903507471

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कविताएँ

श्री प्रणव प्रियदर्शी

तुम और मैं

पाने और छोड़ने की

अभिलाषा से मुक्त

तुम मुझमें इस तरह रहो

जैसे रहती हैं साँसें

पानी और धूप

तुम मुझमें इस तरह रमो

कि कोई छाया न बने

कोई आवाज न हो

क्रिया-प्रतिक्रिया से दूर

मैं तुममें

और तुम मुझमें छलकती रहो।


दरवाजे पर खड़ा वसंत

उसने पूछा

हम कलम

और डायरी की तरह

कब एक साथ रहेंगे?

वसंत आँखों में सिमट गया!

उसने पूछा

क्या हमें भी

अखबार की तरह

कभी पूरा पढ़ा नहीं जाएगा?

वसंत सोच में पड़ गया!

उसने पूछा

क्या स्वाद के लिए जरूरी है

हर चीज को

आग में पकना

वसंत खिलखिला कर हँस पड़ा!

उसने पूछा

क्या धूल इतना गैर जरूरी है

कि हर जगह से

उसे हटाया ही जाए?

वसंत हर गर्द में समा गया!

उसने कहा

हम अब कभी नहीं मिलेंगे

वसंत तब से आज तक

हम दोनों के घर के

दरवाजे पर ही खड़ा है!

हर आनेवाले की आहट पर

वह चैंक पड़ता है

और हर जानेवाले

अपनी स्मृति

चप्पल पर पड़े

अंगुलियों के दाग की तरह

उस पर छोड़ जाते हैं।


प्रतीक्षा में प्रेम

प्रेम का अदृश्य फूल

इतने स्थूल काँटों में गूँथा रहा

कि प्रेम को जब भी

याद करना चाहा

काँटे ही याद आते रहे

सुख तो दबा रहा

कई परतों के भीतर

दुख तमाशा दिखाता रहा

आप मानें या न मानें

लेकिन हमारी यादों पर भी बंधन है

उन नुकीले पंजों का

जिनका वार सहन करने से

मन सदा इनकार करता रहा 

हालांकि दोष हमारा ही है

कि उन चीज़्ाों को ही

सदा महत्व दिया

जो समय के साथ

निढाल हो जाते हैं

पर प्रेम का वह कतरा-सा क्षण

सुख का मद्धम-सा अहसास

यादों का कोमलतम स्पर्श

मेरे इंतजार में हैं आज भी

कि उनके पास लौटूँ

और कह दूँ

कि तुम्हारी ही सुगंध से

सुरभित है हमारा जीवन

बची हैं कविताएँ

बची हैं अभी कई संभावनाएँ।                                                                   

राँची, मो. 09905576828, 07903009545

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कविताएँ

डाॅ. नलिनी विभा ‘नाज़ली’

किस-किस से?

एक साथ खुल गए हैं 

कितने युद्ध-केन्द्र 

किस-किस से लड़ें 

बीमारियों से? 

परिस्थितियों से?

भीतरी खींचतान से? 

रिश्तों से? 

किस-किससे?

 भूलती जा रही हूँ 

आत्म-विस्मृति में खोती जा रही हूँ 

धुंधला रहा है सब, यह भी कि 

इतने युद्ध-केन्द्रों में से

आपात-स्थिति किसकी है 

किसे प्राथमिकता दूँ?


अभिलाषा सुख की 

कहाँ से कहाँ ले आती है 

सुख की अभिलाषा 

गंतव्य और दूर

और दूर होता जाता है 

मंतव्य धरा का धरा रह जाता है

और इन्सान, भँवर में ही 

फँसा रह जाता है


जर्जर

भव्य दिखने वाला 

यह घर

हो रहा जर्जर 

दरक रही ज़मीन 

दीमक कर रही 

चहुँ दिशाओं से खोखला 

सूना 

उदास-सा मंज़र 

घर हो रहा जर्जर


काश!

काश! पिघल जाता 

छोड़ देता अपनी ज़िद 

उबरता नकारात्मकता से 

न देता सज़ा स्वयं को 

नशे में न डूबता 

सदमे से निकल पाता 

खोल देता अपना मन


काश!


अपनी ही अस्तित्व के कारावास में

समय कितना धीरे-धीरे चल रहा है

ऐसा केवलमात्र लगता है

ढली उम्र में

वीरान घर में

नितान्त एकान्त में

दरअसल भागा जा रहा है सरपट

समय का घोड़ा

मृत्यु कितनी अनिश्चित 

न हो तो वर्षों निकल जाएँ

होने को एक पल में-

व्याधियाँ, पीड़ाएँ

अचेतनता

उनींदी रातें

जवाब देता जिस्म

समय की गति तो वही है

हम ही गति तो वही है

हम ही कार्यभार-मुक्त हो गए हैं

मानो सुप्त हो गए हैं

अपने ही अस्तित्व के

कारावास में

कहीं लुप्त हो गए हैं।                                                                                       -भोटा (हि.प्र.), मो. 9418304634

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कविताएँ

सुश्री अल्का अग्रवाल

नव वर्ष

नव विहान नव किसलय लेकर,

नव उमंग, नव आशाओं का,

नव वितान छाया।

नव वर्ष आया।

 

खुशियां महकें हर घर, हर दिल,

प्यार के सुंदर फूल खिलाता,

आशाओं के दीप जलाता।

नव वर्ष आया।


पिछले वर्ष की भूल सुधारें,

नव संकल्पों की लड़ियां लेकर,

हर दिल पर छाया।

नव वर्ष आया।

 

जीवन बने सभी का सुंदर,

नव सौगात, नव खुशियां महकें,

नूतन वर्ष का करें अभिनंदन।

नव वर्ष आया।



राहें

जीवन की राह पर चली थी,

पकड़ कर हाथ मां-बाप का।

कितनी ही राहें

खुद ब खुद जुड़ती गईं।

जिनमें से 

कुछ कंक्रीट से भरी थीं,

कुछ उबड़ खाबड़ थीं,

कुछ ऊंची नीची थीं,

तो कुछ सुखद समतल।

कुछ ने पैरों में चुभ कर,

संभलना सिखाया,

कुछ ने घाव दिए,

कुछ ने गिर कर उठना

और फिर दौड़ना सिखाया।

हर राह कुछ न कुछ सिखाती गई।

कुछ राहों में फूल बिछाती गईं।

तो कुछ जीवन को रंगी बनाती गईं।

कुछ राह गली के कुछ दूर जाकर,

समाप्त हो गईं।

तो किन्ही के किनारे लगे 

छायादार वृक्ष 

जीवन को सहलाते रहे,

 दुलराते रहे।

प्यार की छांव में पालते,

थक कर 

आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे। 

कुछ दरख्त सूख गए। 

तो कुछ तेज हवा के झोंकों से 

टूट कर बिखर गए। 

पर, जीवन तो 

उस अनजान राह की नाईं है, 

जिसमें अनेकों राहें

आकर जुड़ती हैं।

कुछ साथ चलने के लिए, 

तो कुछ बिछड़ने के लिए,

कुछ बिछड़ कर फिर मिलने के लिए। 

पर, जीवन तो

राह पर चलता ही जाता है।

जब तक उस परम सत्य से 

साक्षात्कार नहीं हो जाता है।


नदी

अपने उद्गम से निकल 

एक धारा 

अनेकों धाराओं से मिल,

शैशवकाल को पार कर,

अल्हड़ जवानी में

अठखेलियां करती 

नदी बन 

जीवन के पथ पर 

निरंतर बढ़ती रही।

कभी ऊबड़-खाबड़ रास्ते,

कभी समतल, सुखद

धरा पर चलती वो बढ़ती रही। 

अपने किनारे के 

वृक्षों को सींचती, 

उन पर बैठे 

पक्षियों के कलरव से 

गुंजायमान होती, 

जमीन उपजाऊ बनाती, 

सबको जीवन देती, 

खुशियां बिखेरती, 

वह जीवन पथ पर 

निर्बाध बढ़ती रही।

कभी सूर्य ने धूप की 

तपिश से जलाया। 

तो कभी चांद ने

शीतल चांदनी में नहलाया। 

कभी हवा के थपेड़ों ने 

उद्वेलित किया। 

तो कभी शांत वातावरण ने 

निस्तब्धता प्रदान की। 

पर, वह रुकी नहीं,

चलती रही, बढ़ती रही। 

कभी बादलों को देती, 

कभी वर्षा से लेती,

जीवन संगीत सुनाती, 

पल-छिन कुछ गुनगुनाती, 

वह बहती रही। 

जब तक सागर से जाकर 

मिली नहीं, 

वह आगे को 

बढ़ती रही, बहती रही।                                                                                                  -पुणे, मो. 9325014141

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कविताएँ



सुश्री रागिनी शर्मा


साक्षार हुई धड़कने

नदी की

दो धाराएं हैं

साथ बहे हैं हम

बहुत दूर तक !

दूर क्षितिज को

स्पर्श करती

प्रतीत होती

हमारी भावनाएं !

स्नेह जल 

सिंचित करती

सुख-दुख

साक्षा करती

हमारी धड़कनें

भी कदाचित !

हो गई हैं साक्षर !

आंसुओं मुस्कानों

की भाषा

पढ़ जाती हैं

अनायास ही !

कल फिर सुबह होगी

उगते सूरज को

प्रणाम क्यों ?

यहाँ रोज ढलते हैं

सूरज !

देखो सूरज लुढ़क रहा है

पर्वत की चोटी से

धीरे-धीरे

किसी ने थाम रखा है हाथ

ले जाना चाहता है

मंजि़्ाल की ओर !

हौंसला देता सहारा !

जीने के लिए रोज

लड़ना होता है

सूरज की तरह

लिखना होता है

खूनी इतिहास!

तभी तो प्रेरणा देगा

आने वाले कल को !

दुनिया करेगी

इबादत

उसके हौंसलें की !

लड़ेगा अन्तिम साँस तक,

पिघल जाएगा तारों में,

बिखर जाएगा

सूरज !

पगडंडियों पर

फैलता साजिशों

का अंधेरा

डरायेगा उसे

लेकिन

जीते हौंसलें की।


कल फिर सुबह होगी

कल फिर निकलेगा सूरज

तेज रोशनी के साथ

बड़े हुए आत्मविश्वास के साथ

जो प्रेरणा बनेगा

सृष्टि की !!!


हे प्रिये ! कर स्वीकार निमंत्रण

चितवन हस्ता कर देना...!

धरकन पर नाम तुम्हारा

मन चाहे तो पढ़ .......!

फागुन के सब रंग मुबारक

नव रस से अनुबंध मुबारक

अंग-अंग नव छंद आज तुम

मीत प्रीत के गढ़ देना....!

हर धड़कन पर नाम तुम्हारा

मन चाहे तो पढ़......!!        -इंदौर, मो. 9754835741

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गीत

श्री सूर्य प्रकाश मिश्र

थाली का बैगन 

रंग चोखा हुआ दलाली का 


पैसा भुगतान हो गया है 

बिन बने खड़ंजा नाली का 


मुद्दा विकास का छाया है 

अब आगे कदम बढ़ाना है 

ऐसे में खरे उल्लुओं को 

हर तरफ दिख रहा दाना है 


भगवान ही बस रखवाला है 

उल्लुओं भरी इस डाली का


मुखिया जी खुश हाकिम भी खुश 

हर तरफ खुशी ही छायी है 

हरियाली के इन दावों में 

ऊँचाई है गहराई है 


सब देख रहे अपना कोई 

बैगन बन गया है थाली का 


थोड़ी भी चली उलटी बयार 

कितने ही गड़े मुर्दे उखड़े 

पर क्या मजाल इस मौसम पर 

रत्ती भर कोई फरक पड़े 


कीचड़ में गले तक डूब गया 

कोई भी सफर रखवाली का 


जयचन्द  

जो लिखी नाम रजवाड़ों के 

उस बस्ती का बाशिंदा है 

सरकार बनाया करता है 

जयचन्द अभी भी जिन्दा है 


बंदा है बड़े नामवाला 

अपराधी या अभिशाप नहीं 

हर नियम तोड़ता है लेकिन 

करता है कोई पाप नहीं 


कानून निगाहों में उसकी 

रद्दी का एक पुलिंदा है 


सब वाकिफ उसकी फितरत से 

फिर भी पुचकारा जाता है 

आवाज उठाने वालों को 

मिलकर ललकारा जाता है 


सच्चाई कहने की कोशिश 

परिभाषा में परनिन्दा है 


कद छोटा हुआ पहाड़ों का 

खुश हैं अब कदमों के निशान 

चल रही झुकाने की कोशिश 

शायद झुक जाये आसमान 


भर ली है झींगुर ने उड़ान 

जैसे उड़ रहा परिन्दा है 


ऋतुओं ने बदल लिया चेहरा 

रंग उड़ा सीपियों शंखों का 

उपहास उड़ाते चमगादड़ 

बेवजह गरुड़ के पंखों का 


मटकी है बँधी बहुत ऊँची 

स्तब्ध खड़ा गोविन्दा है                                                                                   -वाराणसी,  मो. 09839888743











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