अभिनव इमरोज़ मार्च 2022





इदं न मम

इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ,

चोदय धियमयसो न धाराम् ।

यत्किंचाहं त्वायुरिदं वदामि,

तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम् । -ऋग्वेद


हे इन्द्र हमें सुखकारी हों

इस जीवन की सब इच्छाएँ

फिर लौह खड्ग की धार बनें

मम बुद्धि की सब क्षमताएँ

तव चरण-शरण का अनुरागी

यह विनय प्रभो स्वीकार करो

और देववन्त सा दिव्य बना

मुझ पर प्रभुवर उपकार करो

काव्यानुवाद: श्री सत्य प्रकाश उप्पल

मोगा (पंजाब), मो. 98764-28718

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काशी के शिव

काशी के कण-कण में शिव हैं 

है जग में ऐसा नगर कहाँ 

इस जीवन दर्शन में शिव हैं 

शव में हैं शिव कृति में हैं शिव 

सभ्यता संस्कृति में हैं शिव 

अंकित है जिन पर काल खण्ड 

पूजित हर आकृति में हैं शिव  

वैराग्य और अपनेपन में 

क्रंदन अभिनन्दन में शिव हैं 

शास्त्रों में शिव शस्त्रों में शिव 

पोषण विचार वस्त्रों में शिव 

तप योग ध्यान अर्चन वन्दन 

स्तुति में शिव मंत्रों में शिव 

आहुति में यज्ञ की ज्वाला में 

अक्षत में चन्दन में शिव हैं 

उन्नति में शिव अवनति में शिव 

प्रारम्भ और परिणति में शिव 

सुख की दुःख की परिभाषा में 

दुर्गति सद्गति हर गति में शिव 

शिव हैं विरक्ति अनुरक्ति भक्ति 

निष्काम समर्पण में शिव हैं 

करुणामय शिव उपकारी शिव 

भक्तों के आज्ञाकारी शिव 

पालनकर्ता काशीधिराज 

प्रलयंकर हाहाकारी शिव 

संगीत नृत्य साहित्य कला 

मारण उच्चाटन में शिव हैं 

लघुता में शिव गरिमा में शिव 

श्रृंगार और उपमा में शिव 

गंगा की अविरल धारा में 

घाटों की परिक्रमा में शिव 

हर वैभव नत सम्मुख जिसके 

ऐसे अक्खड़पन में शिव हैं 

जंगम में शिव जड़ता में शिव 

मूल्यों की साक्षरता में शिव 

शिव हर-हर महादेव धुन में 

हैं शिव की सुन्दरता में शिव 

शिव सत्यम शिवम सुन्दरम में 

शासन अनुशासन में शिव हैं 

क्षमता में अक्षमता में शिव 

सौहाद्र्र प्रेम ममता में शिव 

समदर्शी शिव प्रियदर्शी शिव 

हर एक विलक्षणता में शिव 

हर व्याख्या, सीमा से विशाल 

रमते जन गण मन में शिव हैं

सूर्य प्रकाश मिश्र, वाराणसी,  मो. 09839888743 

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डाॅ. कुसुम अंसल की कविताएँ

धूप

आज बहुत दिनों बाद

धूप निकली है।

दिन के चेहरे पर बिखरी

उदासी की धुंध को

सूरज की किरणों ने

हौले से पोंछा है

जैसे पूजा की थाली में

चुपके से कोई

एक दिया जला गया है।


वह शरीर

तुम परम्पराएं खोज रहे हो

और मैं....

मैंने अपनेपन को

पढ़ने की मेज़-कुर्सी पर

उसी तरह बैठा छोड़ दिया है

जैसे कोई कारीगर

गढ़ी हुई कलाकृतियां

ग्राहक के समक्ष सजाता है

मैं एक भाव की तरह

वहीं बैठी रह गई

अनुभव की तरह सोचती रही

और दर्शनीय की तरह दिखती रही।

जो उठकर चला गया

वह शरीर 

मेरे लिए तो नहीं

ना ही मेरा है।

रचयिता ने रचा

तुमने भोगा....

और एक तरह से-मैंने जीया भी।


माँ

माँ

मेरी ऊँगलियाँ

नन्हीं कमज़ोर ऊँगलियाँ

छूती हैं आपकी तस्वीर

एक सर्द लहर

तस्वीर पर धरा शीशा

सिहरा जाता है मुझे।

मृत्यु के बेरहम हाथों ने

बदल दिया मेरा जीवन, भाग्य।

आपका यह श्याम, श्वेत चित्र

बस मेरा तो

यही है एकमात्र

आश्वासन जीने का

हाँ माँ।


वसंत

पीच ब्लौसम

सफेद होते हैं

या होते हैं गुलाबी

जब भी खिलते हैं

प्रकृति की उस खिलखिलाहट का

मनाया जाता है जश्न, एक उत्सव

परन्तु मेरे आँगन में आरोपित

पीच ब्लौसम जब भी खिलते हैं

पीले, गहरे पीले होते हैं उनके फूल

शायद इस कारण

कि मैंने उन्हें

अपने दर्द से काँपते हाथों से

किया था आरोपित 

जख्मों की धरतीपर

सींचा था आँसुओं के जल से

तो फिर, मेरे पीले पीचब्लौसम

पीली खिलखिलाहट, वेदना

क्या है?

वसंत या उत्सव 


मेरा रास्ता

मैंने तो केवल 

एक ही रास्ता चुना था

अपने पैरों के, आने जाने का।

एक पगडंडी जो जाती थी

मंदिर के द्वार तक।

वह राजपथ जो जाता था

साहित्य के संसार तक।

तभी कभी गई बनारस,

माथा टेका काशी विश्वनाथ।

कभी गई वृन्दावन,

माथा टेका बाँके बिहारी।

के चरणों में भक्ति के साथ।

हरिद्वार की गंगा में भी, 

भीगी तन मन से, विश्वासों के साथ।

कभी गई कलकत्ता ‘जुरांसको’

कभी गई बोलपुर ‘शांतिनिकेतन’

साँसों के बटोरा वहाँ का सारा

बौद्धिक, सोष्ठवयुक्त संगीत

पूरी आत्म-लिप्यान्तिरिकता के साथ

कभी गई शेक्सपीरियन कन्ट्री

आँखों में समोहित किया नाटकीय संसार

मौस्को की मिट्टी को भी छुआ

जहाँ टौलस्टौय का घर है

अपने लिये चाहा उनका आशीर्वाद

परन्तु अब जाने क्यों

जहाँ ले आये हैं मेरे पैर

उस नुकीले पथरीले रास्ते पर

जहाँ विश्वास के नाम पर

आशीर्वाद के नाम, क्या होती है

व्यवस्थागत-भक्ति, दर्शन

सात तालों में बंद भगवान।

हाँ बिकते हैं भगवान।

और भव्य साहित्य अकादमियों के प्रांगण में

क्रय होते हैं पाँडुलिपियों,

पर लिखे लेखकों के नाम।

दिये जाते हैं, मान सम्मान, पुरस्कार।

उनको जिनका नहीं कोई अधिकार।

अपने बेहोश चैतन्य में

लहुलुहान हैं मेरे पैर

खंडित हैं विश्वास

जैसे कोई भूचाल

सभी कुछ समया है, मेरे होने में

साक्षीरूप वह जो सच है।


इत्र रंगीन की शीशी

इत्र की इस रंगीन शीशी में,

जो खुशबू है मंद-मंद

जाने कितने फूलों का है निचोड़

कितने ही फूल पिघले हैं

सुगंधित करने इस द्रव्य को!

जब भी लगाती हूँ इसे

अपने वस्त्रों पर ...तो

जाने कैसे मेरी साड़ी

रंग बदल कर,

भक्क... सफेद हो जातीहै!

लगता है जैसे

मेरे वजूद पर कोई बद्दुआ...

कोई दर्द आकर

कफन सा पसर गया है!


ज़मीर

रेगिस्तान के रेतीले बिस्तर में

अपने ऊँट की लगाम थामे

वह राहगीर जाने कब से

चले जा रहा था

मेरा तयशुदा शहरीला रास्ता

जाने कैसे मुझे

रेत के उस बियाबान में ले आया

इससे पहले मैं उससे पूछूं

वह भटका हुआ राही

हैरानी से देखता हुआ कहने लगा

मुझे तो भटकन ही मिली

सफर के नाम पर

रास्ते का सुव्यवस्थित चेहरा

देखें तो उम्र गुजर गई

तुम अभी-अभी आए हो

दुनिया की दुनियावी भीड़ से

बड़े शहरों की बड़ी रंगीनियों से

दोस्त, सच बताना

तुम्हारे शहर का ज़्ामीर अभी ज़िन्दा है

या मर गया है ?



मैं ही तो थी

बम्बई की उस गली में तो था

मेरा घर,

जहाँ फटा था बम

परिवार के सदस्यों के शरीर

चिथड़े-चिथड़े होकर बिखर गए थे।


सुरक्षा की दीवारें...

बदल गई थीं मलबे के ढेर में

और.... तन्हा मैं,

पथराई खड़ी रह गई थी।


रेलगाड़ी के उसी डिब्बे में सवार

मैं ही तो थी

जिसके पहिये पटरी से उतरे थे

चूर-चूर होते दरवाज़े-खिड़कियों में

कुचले थे सहयात्री...।


चीखों और कराहों के बीच

दबी पड़ी रह गई स्मृतियों की पोटली

मैं... क्षत-विक्षत, मैं

खून से नहाई खड़ी रह गई।


नाव के उस गले हुए फट्टे पर

मैं ही तो बैठी थी

जो यात्रियों को उतारती थी

इस पार से उस पार

ज्वार और तूफानी वर्षा के प्रकोप में

जल समाधी ले बैठा मेरा उत्साह

मेरा साहस, मेरा आत्मविश्वास

गहरे पानी की तलहटी में

मैं... कांपती, मैं

निर्वस्त्र खड़ी रह गई थी...।


नासिक के महातीर्थ के

पवित्र जल में डुबकियाँ लेती

मैं हीं तो थी।

जहाँ फेंके गए सिक्कों के पीछे

भागे थे भूखे पेट भिखारी

कुचले गए थे औरतें और बच्चे...।

धरी की धरी रह गई धार्मिकता

अस्पताल के बद्बूदार काॅरीडोर में

ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलती...

मैं कुलबुलाती भूख में...

कराहती पड़ी रही।

कारागार की घुप अंधेरी कोठरी में

बन्द.... मैं हीं तो थी

अपने देश की बेघर, बेसहारा औरत

जो एक घर, एक कारागार

से मुक्त होते हीं पा जाती है

दूसरी उम्र कै़द की सज़ा

या फिर बेचैन भटकती है उसकी आत्मा।


पांडवों की सहगामिनी द्रौपदी की तरह

ले लेती है एक गहरी हिम-समाधि।

मैं बर्फ़ होती मैं

बर्फ़ीली पहाड़ियों में

जाने कब में ज़मीं पड़ी हूँ,

जंग खाई मज़बूर दोनली बंदूक की तरह

अनकहे विश्वासों की

धार्मिक सत्यों की

विकृति।

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संपादकीय

डाॅ. कुसुम अंसल के यहाँ न तो मेरी पहुँच थी और न ही कोई सिफारिश- और तो और मुझे दिल्ली में हिन्दी के लेखक तक नहीं जानते थे। अभिनव इमरोज़ अभी अपने दूसरे साल के प्रकाशन में (2013) प्रवेश पा ही रहा था कि मुझे ‘संवाद’ से एक गोष्ठी का निमंत्रण प्राप्त हुआ। उसी गोष्ठी में डाॅ. कुसुम अंसल ने मेरे साहित्य सेवा के संकल्प को सम्मानित किया। यह मेरी दिल्ली के लेखकों से पहली रूबरू मुलाक़ात थी और मेरे साहित्यिक जीवन का प्रथम सोपान भी। उसी प्रोत्साहन की प्रेरणा से मैंने जनवरी 2022 में दस साल का सफ़र सफलतापूर्वक तय कर लिया है। डाॅ. कुसुम अंसल और नासिरा जी द्वारा दिया गया कामयाबी-ए-ताबीज जो मेरे मिशन की तासीस में रखा गया था यक़ीनन अगले बीस साल तक भी अपनी तौफ़ीक़ से असरदार बना रहेगा... 



मेरी हम क़लम: कुसुम अंसल

-सुश्री नासिरा शर्मा

कुसुम से मेरी पहली मुलाक़ात नन्दन जी के आफिस में हुई थी। जब मैं अपनी पुस्तक ‘इकोज़ आफ ईरानियन रेवुलशन’ प्रोटेस्ट पोयट्री देने गई थी। कुसुम ने उस पुस्तक को लपक कर लिया था फिर बड़ी उत्सुकता से पन्ने पलटती हुई बोली, ‘ऐसा ही काम मैं भी करूँगी’’ इस किताब ने जो हंगामा फारसी विभाग में किया था उस से मैं परेशान तो थी ही और कुछ दिनों बाद जब महीप सिंह के प्रकाशन से मेरी नावेल ‘सात नदियाँ: एक समन्दर’ आया तो एक सर्द शाम को कुसुम मेरे जे.एन.यू. वाले घर में मुझ से मिलने आई। इस दूसरी मुलाक़ात के बाद हमारा मिलना अक्सर होने लगा और मैं महीप सिंह के द्वारा बहुत से लेखकों से मिली जो उनके प्रकाशन व पत्रिका में छपते थे।

वह ‘मंडल कमीशन’ के हंगामें भरे दिन थे। अखबारों से साहित्य ग़ायब हो रहा था और पत्रिकाएँ भी बंद होने के कगार पर थीं। उस माहौल में सभी परेशान थे। एक दोपहर जब हम तीन चाय पर मिले तो यह विषय हमें बेचैन किये था कि इस सियासी घुटन में साहित्य को कैसे जिया जाए और उस दिन ‘संवाद’ की बुनियाद डल गई। अब उसे संभालेगा कौन ? महीप सिंह 1984 को देख चुके थे उन्होंने पल्ला झाड़ लिया कि मेरे बुलावे पर कोई नहीं आयेगा। कुसुम ने भी इंकार किया और ज़िम्मेदारी मुझ पर डाली गई। काग़ज़ तो था नहीं जो लिखा गया वह नैपकिन पर दर्ज हुआ और संवाद अपनी लाल बिन्दी के साथ चल पड़ा। कुसुम मुझे लेने आतीं और हम दोनों अंसल भवन के लंचरूप की तरफ चल पड़ते। संवाद की पहली गोष्ठी में सिम्मी ने अपनी कहानी पढ़ी थी और सुनने वाले केवल तीन थे मैं, कुसुम और सरोज! एक वक़्त ऐसा आया जब संवाद की उस गोष्ठी में बैठने की जगह की कमी होती जबकि वह लंचरूप ख़ासा बड़ा था। यह बेहतरीन दिन थे जब संवाद में हमने बड़े से बड़े लेखकों की रचनाएं सुनी। कुसुम के घर पर भी ‘डिनर’ में सब मौजूद रहते और साहित्य के समन्दर में जितना भीग सकते थे जी भर कर भीगे। मेरी और कुसुम की दोस्ती साहित्यिक के साथ घरेलू भी हो गई थी। शादी व अन्य कार्यक्रम में हमारा मिलना जुलना होता जिस से उसके परिवार के सदस्यों को भी देखा और महसूस किया कि सब कुछ शालीन और सहज था। जब भी हमारे यहाँ थ्वतमपहद क्मसमहंजमे का डीनर होता था तो कुसुम उसमें मौजूद रहती थीं और सादे दिनों में भी हम तन्हा दोपहर में कुछ न कुछ पढ़ते या सुनाते थे। कुसुम ने समाज सेवा भी अपने अन्दाज़ से की वह कुछ अरसा अपने स्कूल में प्रिंस्पल भी रहीं। इन मुलाक़ातों में सुशील अंसल जी भी कभी कभी शामिल होते उनका स्वभाव बेहद मिलनसार होता।

कुसुम से मेरी इतनी गहरी दोस्ती और संवाद की सफलता ने मुझे कुछ अलग अनुभव दिए जो लोग संवाद में आना चाहते थे या उस पूरे माहौल को बिगाड़ना चाहते थे उन्होंने अपनी कोशिशें जारी रखीं और कुछ लिख कर छपवाया भी। संवाद स्थापित हो चुका था। मैं चाहती थी कि कोई दूसरा अब इसे संभाले। मैं और कुसुम व महीप सिंह जी उसे पैमाने पर नज़र रखेंगे जो हमने ‘संवाद’ के लिए तय किये थे अर्थात् बेजा बहस और छींटाकशी जैसी तनतनाहट न हो बल्कि साहित्य की बुनियादी निष्ठा व संजीदगी की तमतमाहट हो। मुझे याद है किसी ने मुझ से अपना काम कराने के लिए कहा था तो मैंने जवाब दिया था कि मेरे और कुसुम के बीच ऐसा रिश्ता नहीं है आप स्वयं सुशील जी से बात कर लें। कहीं पर कुछ और वार्तालाप के बीच में मैनंे कहा था कि कुसुम मेरे लिए किसी बिल्डर की पत्नी के रूप में नहीं बल्कि लेखक के रूप में है यदि कोई लिखता है तो वह मेरे लिए महत्वपूर्ण है चाहे वह किसी रिक्शा चालक के परिवार से क्यों न हो।

इसी बीच मैंने और कुसुम ने तय किया कि हम कुछ दिन उपरी तौर पर एक दूसरे से दूर रह कर देखते हैं कि आसमान का रंग कैसा है ? उन्हीं दिनों एक लेखिका ने जो कुसुम की अक्सर बुराई करती थीं उन्होंने मौक़ा देखकर कुसुम को लेखिका के तौर पर सम्मानित करने की बात की तो कुसुम ने जवाब दिया कि आप यह सम्मान नासिरा को दंे जो मुझ से ज़्यादा अच्छी लेखिका हैं। उन महिला ने बात खुल जाने पर कहा ‘‘वह तो मैंने इस लिए आॅफर दिया था ताकि बाद में उनसे संस्था के लिए आर्थिक मदद ले सकूँ वरना तो... 

उन्हें नहीं पता था कि हमारी दोस्ती और अंडरस्टैडिंग ऐसी नहीं रही कि जो हम दोस्ती का ढ़िढोरा पीटते, हम जानते हैं कि दोस्ती जी जाती है और आज भी उसी स्तर पर है जो कुसुम ने मुझे ख़त में लिखा था, ‘नासिरा तुम मेरे दिल में किसी दीपक की तरह हमेशा जलती रहती हो।’ कुसुम पर बहुत कठिन दिन आए मगर उस तकलीफ़ों से भरे दिनों में भी कुसुम ने अपने लेखक को ज़िन्दा रखा। अपनी साहित्यिक व सामाजिक रिश्तों को साधे रखा। उसकी ज़िन्दगी मेें क़लम  व काग़ज़ की हमेशा अहमियत रही। जब कुसुम ने मुझे अपने पोते की लिखी नावेल दिखई तो मुझे ख़ुशी के साथ सुकुन भी मिला कि कुसुम ने नई पीढ़ी में अक्षरों के अंकुर फोड़ लिए हैं। मेरे और कुसुम के बीच कभी तल्ख़ी नहीं उभरी मगर हाँ दूसरों के चलते हम आहत ज़रूर हुए मगर हमारा आपसी रिश्ता कभी कमज़ोर नहीं पड़ा।

कुसुम एक सम्वेदनशील लेखिका हैं उनके क़लम से उनके अपने जीवन के अनुभव निकले हैं। कविता व कहानियाँ, उपन्यास व यात्रा वृतान्त सब कुछ पंचशील के उस स्टडी रूप में लिखे गए जिस में हम दोनों ने बैठ कर ज़िन्दगी और लेखन को साझा किया है।


नासिरा शर्मा द्वारा लिखा लम्बा लेख हिन्दी में आई आत्मकथाओं पर (शीला झुंझुंवाला, पद्मा सचदेव और कृष्णा अग्निहोत्री) था जिस में से कुसुम अंसल की आत्मकथा पर लिखा हिस्सा पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है।


दरवाज़े दर दरवाज़े का सफ़र 

हिन्दी में आई पहली आत्मकथा कुसुम अंसल की है, जिसका नाम ‘जो कहा नहीं गया‘ उन्होंने रखा है। यह शीर्षक जहां मानीखेज है, वहीं सांकेतिक भी है, विशेषकर उन लोगों के लिए, जो कुसुम को बरसों से जानते हैं। पुस्तक में पन्द्रह अध्याय हैं, जिसमें सबसे प्रभावी पहला अध्याय ‘घर से घर तक‘ है, जिसमें कुसुम ने अपने बचपन को कुरेदा है। दरअसल बचपन ही किसी व्यक्ति का सच होता है। उसकी बुनियाद उन्हीं दिनों पड़ जाती है और शख्सियत की इमारत का एक ब्लू प्रिंट भी तैयार हो जाता है। अपने बचपन को कुसुम कभी नहीं भुला पाई। मां का न होना, सौतेली मां का हसीन होना और पिता का उनमें गुम रहना, बुआ के नजदीक होना, ये सारे समीकरण, जो कुसुम के लिए मानसिक सन्ताप से कम नहीं रहे, उसने संवेदना में घुलकर उसकी अभिव्यक्ति को कई बार दोहराया है। वे टुकड़े बहुत-सी रचनाओं में बयान हुए हैं।

कुसुम से मेरी मुलाकात बहुत सरसरी-सी थी। उसके बारे में बहुत कुछ सुनती ज़रूर रहती थी, मगर जब कुसुम के साथ दोस्ती शुरू हुई तो वह औरत मुझे बिल्कुल अलग लगी। उसके अन्दर के तहख़ानों ने मुझे हिलाकर रख दिया। उसमें पीड़ा की सुरंगें थीं, जिसमें उसके साथ दाख़िल होना मुझे अच्छा भी लगता और साथ ही यह प्रश्न भी मुझे परेशान करता कि यह औरत जैसी है, वैसी लगती क्यों नहीं? साहित्य को लेकर गहरा समर्पण, फिर भी...? दूसरों के साहित्य को चाव से पढ़ना और उनसे इस तरह मिलना जैसे यह कुसुम की पहली ज़रूरत हो। कुसुम की पीड़ा अमरबेल की तरह मेरे पूरे वजूद को कस चुकी थी। हमारे बीच एक अजीब तरह का कान्टम वजूद में आ गया था, जिसमें स्थिति भी थी और वेग भी था। मैंने उसकी आंखों से एक अलग दुनिया देखी थी, जिसमें सारे चेहरे पहचाने हुए थे, मगर उनकी भूमिका बदली हुई थी। हमारा यह रिश्ता रचनात्मक स्तर पर कुसुम को और मुझे बुरी तरह झिंझोड़ गया। उसको लिखने की चाह थी, मुझे उससे कुछ लिखवाने की चाह थी। इस रस्साकशी में कुसुम ने पहला अध्याय लिखा, जो मेरे घर में पढ़ा गया था और ‘वर्तमान साहित्य‘ में छपा था। इसका शीर्षक मैंने ही पसन्द किया था। इसको हर एक ने सराहा था। इस प्रोत्साहन से कुसुम की रुकी कलम चल पड़ा। उसके अन्दर का भय टूटता गया और रचनाकार दबंग होकर क़लम से शब्दों का दरिया बहाने लगा।

कुसुम का मूल्यांकन कभी सही तरीके से नहीं हो पाया, जहां केवल उसके साहित्य को अच्छा या बुरा क़रार दिया जाता। कहीं पर गै़र ज़रूरी तामझाम और कहीं पर गै़रज़रूरी उदासीनता की शिकार कुसुम ने कभी क़लम नहीं रखी। उसकी रचनाएं बराबर आती रहीं। उसकी रचना प्रक्रिया को देखकर लगता था कि जो ऊर्जा हम पूरी की पूरी रचना को लिखने में लगाते हैं, उसी मात्रा की ऊर्जा को आधी से अधिक मात्रा में कुसुम अपने माहौल से निकलने में लगाती है और जो सृजन शक्ति उसमें बचती है, वह एक चैथाई भर होती है, जो किसी भी रचना के लिए पर्याप्त नहीं होती है, तो भी वह किसी प्यासे की तरह, जो रेगिस्तान में पानी की तलाश में भटक रहा हो, एकाएक छोटा ताल ठंडे पानी का मिल जाए तो उसकी क्या कैफियत होगी, कुछ इसी बेताबी से मैंने कुसुम को गटगट कर अपनी प्यास बुझाते देखा था। लम्बी बातों के दरम्यिान उसने दो जुमले एक दिन कहे थे कि मुझे गर्व है कि मैं मिसिज अंसल हूं और दूसरा जुमला था कि मुझे कोई न माने, मगर मैं मरना एक लेखक की तरह चाहती हूँ।

दो सौ पन्द्रह पन्नों पर आधारित ‘जो कहा नहीं गया‘ पुस्तक बहुत-सी घटनाओं और नामों के साथ चलती है, जिसमें कुसुम हर जगह मौजूद है। कुसुम की मातृ भाषा पंजाबी है, मगर अलीगढ़ में पलने-पढ़ने की वजह से उसमें उर्दू की लोच और नज़ाकत आ गई। इस बात का ज़िक्र अलीगढ़ शहर के बयान में साफ झलकता है, जहां की कुसुम है। कुसुम के अन्दर एक विस्तृत दुनिया आबाद है, जहां पिता के घर क़लमकारों का जमा होना और इज़्ज़त के साथ पैसे की रेलपेल और दूसरी तरफ अपने असली घर में बिल्कुल बदला माहौल।

“मुझे नक्षत्रों में विश्वास था। स्वाति नक्षत्र जब उदित होता है, उस समय की वृष्टि का जल यदि सीप के खुले मुख में गिरे तो मोती बन जाता है, केले के पत्ते पर गिरे तो कपूर हो जाता है और पपीहे के पी-पी करते गले में गिरे तो उसके जीवनभर की प्यास बुझाने में सफल होता है। मुझे लगता है, क्यों न स्वाति नक्षत्र का अनुकरण किया जाए, परन्तु जीवन, धारणाओं और सपनों में उतनी दूरी होती है, जितनी धरती और आकाश में, इच्छाएं भी तो गति के मध्य उपजती थीं और गति के कन्धों पर सवार होकर कभी-कभी अवरोधों को तोड़कर बह निकलती थीं। मेरे इस प्लेनेट या ग्रह पर आदर्श कम, वास्तविकता अधिक हावी थी और स्वाति नक्षत्र अभी तो अदृश्य, अप्राप्य जैसा था। मेरा संसार मुझे अपने धरातल से जोड़ता था। सांसारिकता चाहती थी, पहले मैं अपने परिवेश-घर को इतना सजा-संवार लूं, जैसा पीछे अलीगढ़ में छोड़ आई हूं। मध्यवर्ग से कुछ और हो जाऊं, परन्तु धनाभाव और समय का व्यवधान हाथ रोक लेते थे। घर में सभी काम, खाने से लेकर जूते साफ करने तक मुझे ही करने पड़ते थे। शरीर तो काम में जुता रहता, मन भी एक उथल-पुथल से प्रवाहित होता रहता था। मैं काम या श्रम से घबराती नहीं थी, पूरे दिन लगी रहती थी, नए पकवान बनाती, फूल सजाती, कपड़े तहाती, स्वेटर बुनती, एक गृहणी में ढलने का प्रयास करती रहती थी, परन्तु सभी क्रिया, प्रक्रिया के मध्य कुछ था, जो मुझे जुड़ा नहीं रहने देता था। जब-तब उदास कर जाता था। लगता था ‘कुछ‘ है, जो नहीं है, वह क्या है, यह मैं जान नहीं पा रही थी, पर इस ‘कुछ‘ के न होने की रिक्तता मेरे भीतर एक ख़ालीपन कुरेद रही थी। एक दिन मैंने अपनी नन्द इन्द्रा से पूछा, “यहां कोई मैगज़ीन...पत्रिका है?‘‘

‘‘मैगज़ीन क्या होती है?‘‘ उसने कहा।

और मैं स्तब्ध उसका मुंह देखती रह गई, मैं अपने साथ एक बक्सा भर के पुस्तकें लाई थी, उन्हें टटोलने ऊपर के भंडार घर में गई तो मेरे आंसू थमे नहीं। मेरी पुस्तकों को दीमक चट कर गई थीं, बड़ी मुश्किलों से बचाकर अपनी डायरियां और कविताएं निकाल पाई।‘‘

कुसुम ने चूंकि पीड़ा का अहसास बचपन में कर लिया था, इसलिए हर चीज को देखने का उसका नज़रिया बदल गया था। वह धनी परिवार की बिगडैल लड़की नहीं, बल्कि अन्तरधाराओं को पकड़ती एक बेहद संवेदनशील इन्सान बन गई थी, जो अपने साथ हुई ज़्यादतियों को भी सह रही थी और बदले में वह सब कुछ देना चाह रही थी, जो उसको नहीं मिला था। उसको प्यार की, सम्मान की, विद्या की, अपनेपन की ज़रूरत थी। इसी कारण उसका जीवन-लक्ष्य अलग तरह का था, तभी वह घर में बड़ी ख़ामोशी से एक रास्ता बना रही थी, जहां पलभर के लिए ही अपनी सांस अपनी मर्ज़ी से ले सके, अपनेपन को भरपूर तरीक़े से जी सके। यह उसी कश्मकश का नतीजा है कि जिस घर में ईंट-पत्थरों से सरोकार रखनेवाला हर जगह झंडे गाड़ रहा हो, वहां कुसुम ने अपने काग़ज़-क़लम का परचम उसी तेवर से लहराया है।

कुसुम उपन्यासकार, कहानीकार, कवि और नाटककार है। उसकी कृति पर फिल्म बनी और उसने छोटे पर्दे के लिए बहुत कुछ लिखा है। संसार भर में यात्राएं की हैं। इन सारी व्यस्तता के बावजूद वह अपने आध्यात्मिक जुड़ाव को भी जी लेती हैं। शायद यह झुकाव उसकी मजबूरी है, उस क्षण की, जब वह नितात अकेली रह जाती है, उस समय उसको ‘पत्थर की मूर्ति‘ में वह तरलता मिलती है जो उसको दूसरे इन्सानों में नहीं मिलती। अपने को पाने और खोजने की इस पारदर्शी यात्रा में वह वेदान्त की ऋचाओं में, मन्दिरों की घंटियों और आरती की ध्वनि में अपने जख़्मों की खुद मरहम-पट्टी कर लेती है। मेरे खयाल से धर्म की तरफ झुकाव के उसके अपने कारण हैं। यह मेरा अपना अवलोकन है, मगर स्वयं कुसुम ने अपने बारे में ‘भविष्य की ओर‘ अध्याय में लिखा है।

‘‘बासुदा को ‘तीसरी कसम‘ पर पर्चा पढ़ना था। बासु दा ने पर्चा पढ़ा भी और खुली बातचीत की, परन्तु ‘पंचवटी‘ पर कहने के लिए उनके पास कुछ न था-मैं हाल में दम साधे बैठी रही--चुप रहना मेरी नियति है, कहकर तो कुछ हासिल नहीं किया जाता, मैंने तो कभी किसी से कुछ नहीं कहा, न पापा से, न सुशील से...तो फिर अब कहने को बचा भी क्या है?‘‘

कुसुम की आत्म-कथा पढ़ने के बाद एक सच सामने आता है कि उसके लिए ‘रिश्ते‘ बहुत अहम हैं। उनमें वह जीने का पूरा सुख लेना चाहती है, शायद इसलिए कि उसको असली रिश्तों का सुख बचपन में ही वंचित कर गया था। दूर के रिश्तों को अपना बनाने की मजबूरी ने उसको जीना सिखा दिया था। अपमानित होने के बावजूद धीरज न खोने की हिम्मत ने उसको अन्दर ही अन्दर मज़बूत बनाने में मदद की थी। उसके अन्दर स्नेह का जो समुद्र था, वह विस्तार चाहता था। हक़ीक़त यह थी कि उसके अनुभव संवेदना के धरातल पर उसके परिवेश से मेल नहीं खाते थे। इसलिए हर कोई अपनी दृष्टि और तजुर्बे से उसको देखता और आंकता था, मगर वह क्या है, कौन है, कैसी है, इसका अहसास बाहरी टीमटाम से लगाना बहुत मुश्किल है और शायद कुसुम भी हर एक के साथ हर समय सहज होकर खुल नहीं सकती है, सो गलतफहमी का एक सिलसिला लगातार इस दिशा में चलता रहा कि वह एक दौलतमंद बिल्डर की पत्नी है। 

मानती हूं, एक इन्सान के कई चेहरे होते हैं, ठीक उन रिश्तों की तरह, जो उसको अनेक भूमिकाओं में बांधते हैं। कौन-सा चेहरा आपके हिस्में में आता है, जो उस व्यक्ति से आपका परिचय एक अलग धरातल पर कराता है। मुझे कुसुम में हमेशा एक आहत इन्सान नजर आया, जो अपने सारे दुःखों के बावजूद दूसरों के संग सुख का लम्हा जीने का इच्छुक है। यह व्यथा, जो इन्सान से इन्सान को मिलाती है, वह डोर हमारे बीच थी। मैं इससे बेगाना थी कि उसका परिवेश क्या था। मेरे लिए वह एक कलमकार थी। तभी मैंने उसकी ‘रेखाकृति‘ को पढ़कर उससे पूछा था कि, ‘क्या वह अपनी चीजें छपने से पहले किसी को पढ़ाती है। पात्रों को डिसकस करती है?‘ उसका जवाब ‘नहीं, में था, फिर कुछ दिनों बाद उसने मुझसे पूछा था कि, ‘क्या वह कमी तुम पूरी कर सकती हो?‘ बहुत अरसे तक हम रचनाओं में डूबे रहे, फिर हालात और जगह बदलने से मेरी स्थितियां भी मुझे दूसरी तरह की व्यस्तता दे बैठीं, जिसके कारण आपबीती के बाकी अध्यायों से मैं पूरी तरह जुड़ी न रह सकी? एक अहसास मुझे और हुआ कि हर रचनाकार एक स्थिति के बाद दूसरों का हस्तक्षेप, चाहे वह निष्ठा के रूप में ही क्यों न हो, सहन नहीं कर पाता है, सो मेरे कहने के बावजूद कुसुम को पुस्तक समाप्त करने की जल्दी थी। कारण था कि आने वाले छह-सात महीनों में उस पर परिवार की ज़िम्मेदारियों का सिलसिला शुरू होने वाला था, मगर आज भी मैं कह सकती हूं इस पुस्तक में जो नहीं कहा गया और जो मैंने सुना और जिया था, वह संवेदना, अनुभव और आवाज के जरिये आज भी मुझे कुसुम के नजदीक रखता है और मैंने कभी नहीं पूछा कि तुमने वह सब क्यों नहीं लिखा, जो तुम्हारा सच था, जिसमें किसी व्यक्ति का नाम आना महत्त्वपूर्ण नहीं था, बल्कि वे घटनाएं अनुभूतियां, दृष्टिकोण अहम थे, जो पाठकों को अधिक समृद्ध बनाते। उन दिनों का किसी से कहा मेरा एक जुमला हर बार मन में घूम जाता है कि शीज माई डॉटर, इसके अर्थ अनेक हो सकते हैं, मगर एक अहसास तब उपजा था कि उस आत्मा ने बचपन से इतना सहा है और अब मेरे रहते उस पर कोई आंच न आये। यह भावुकता नहीं, एक फेलो लेखक को दूसरे फेलो लेखक के प्रति एक ईमानदार अभिव्यक्ति है। उसमें बेलौस रिश्ते की तपन है। 

इस पुस्तक पर कई गोष्ठियां हुईं। हर बार मैंने बोलने से इंकार किया। हो सकता है कि कुसुम को बुरा लगा हो, मगर मैं जानती थी कि जिस रचना के पीछे मेरा उत्साह इतना गहरा हो, उस पर फौरन बोलना उचित नहीं। आज ‘आपबीती‘ को आए पूरे पांच साल हो गए हैं। उसको दोबारा पढ़ना सुखद लगा। अन्त में कुसुम की चन्द पंक्तियां यहां उद्धृत करना चाहूंगी-

“मेरी जीवन यात्रा में अनेक पड़ाव आए। अवसर, सुअवसर सभी की निरन्तरता से गुज़रते मैं प्रयासरत रही कि अपने अपनेपन को, मां के अस्तित्व की तरह ‘नानबींग‘ होने से बचा लूं। शायद इसलिए मैं किसी महारानी, बेगमात या सफल इन्डस्ट्रियलिस्टों की बीवियों की क़तार में शामिल नहीं हुई। मिसेज अंसल हो जाना मेरी नियति थी और कुछ नहीं, परन्तु अपने जीवन में मैं वह भी कितनी बनी थी? मात्र बेचारी हिन्दी की लेखिका-बस और कुछ नहीं। मैं किसी आत्मदया में नहीं जी रही हूं, परन्तु मेरे आस-पास बहुत से चेहरे हैं, चेताते हुए, संकेत करते हुए, बूढ़े, बेदम, थकान और झुर्रियों से भरे हुए चेहरे। वह भी मेरा सत्य नहीं है, उन्हें मैं प्रकृति का नियम मानती हूं। इससे अधिक वे और कुछ नहीं हो सकते। मैं किसी भी प्रकार की विकृति को नहीं स्वीकारूंगी, यह मेरा अपने आपसे किया गया वायदा है, शायद इसलिए कि मेरे पास एक रचनाकार का मस्तिष्क है।‘‘

‘जो कहा नहीं गया‘ में ढेरों बाते हैं, जैसे विवाहित जीवन पर अनेक टिप्पणियां वार्तालाप के रूप में हैं। प्रेम पर दार्शनिक-वैचारिक अभिव्यक्ति है। बचपन का घर, बुआ का घर और बहन-भाइयों का विस्तार से बयान, घूमने के स्थलों की तस्वीरकशी, दोस्ती, दुश्मनी, खट्टे-मीठे अनुभव, कुछ दोस्तों पर अपनी राय, पति सुशील अंसल के व्यक्तित्व पर कम शब्दों में, परन्तु गहरा विश्लेषण, बच्चों का ज़िक्र, इन सारे तज़कीरों में अहसास का गहरा सफर है। इस आत्मकथा पर बड़ी तल्ख और तीखी आलोचनाएं भी हुई हैं और प्रशंसा भी, मगर मेरे लिए यह आपबीती एक इन्सान की जीवन-यात्रा है, जिसको अच्छा-बुरा कहना इतना 

महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना उसके जीवन को वैसा ही देखना, जैसा उसने लिखा है। मेरे लिए इतना काफी है कि मेरे परिवेश से अलग परिवेश में जीने वाली औरत सोने के जेवर गढ़वाने की जगह शब्दों के मोती जड़ने में व्यस्त है। उस मोती के सच्चे-झूठे होने और साहित्य के मानक पर कसने का काम आने वाला समय करेगा। फिलहाल अपनी बात को कुसुम की कविता ‘एक भेंट‘ से समाप्त करना चाहूंगी।

मेरे कलमदान में 

एक पंख है-

लम्बा-चितकबरा-सा पंख 

काले-सफेद भूरे रंग का पंख! 

अनाम कोई पक्षी इसे 

मेरी खिड़की के निकट 

गिरा गया है 

एक भेंट 

उस मेघदूत की 

मेरे नाम...

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डाॅ. कुसुम अंसल

‘विश्रांति’, 26 फिरोजशाह रोड, नई दिल्ली 110001, मो. 9810016006, ईमेल: kusumansal@gmail.com


आलेख

मेरी लेखकीय यात्रा

यह तो हम सभी जानते हैं कि जब जीवन यात्रा के तहत, ज़िन्दगी की किश्ती पर सवार होते हैं, तो, हमारे अपने स्व के साथ बहुत कुछ आ जुड़ता है, नाते, रिश्तेदार, सहयात्री, मित्र और उनका प्रेम, वर्जनायें उनके साथ-साथ सांसारिक नियम। हमारी नौका समय की पतवार के साथ संसार की लहरों पर बहती है....तो उस यात्रा में बहुत कुछ घटित होता है, घटनायें, दुर्घटनायें, उलझने...परेशानियाँ तथा वह उपलब्धियाँ भी जिन्हें हम अपनी कार्य कुशलता, या कर्मठता से अर्जित कर लेते हैं। सफ़र....ज़िन्दगी का ये सफर अनुभवों का भंडार है जहाँ अड़चनों की एक ‘शह‘ होती है और हर ‘शह‘ की एक ‘मात‘।

शतरंज की वैसी ही किसी बिसात पर मेरा जन्म अलीगढ़ में हुआ.... मैं एक वर्ष की भी नहीं थी कि मेरी माँ मुझे छोड़ कर मृत्यु के किसी अदृश्य कुहासे में समा गई। मेरे पिता ने पुनर्विवाह कर लिया और मुझे मेरी बुआ ने गोद ले लिया और वह मेरी ‘अम्माजी‘ बन गई। अंधेरी खोह में स्नेह का एक नन्हा सा दीपक जिसने जीवन में रौशनी के फूल बोये थे। उन्हें शत्-शत् नमन।

मैं नहीं जानती सात्र्र ने ‘अस्तित्वाद‘ को क्योंकर परिभाषित किया? परन्तु यह तय था कि मैं इस धरती पर जन्मी थी इसलिए मेरा अस्तित्व... .अस्तित्वान हुआ था, या मुझे अपने अस्तित्व के ‘मैं‘ मेरे होने के सच को तलाशना था। तो जब भी बचपन के दर्पण को पकड़ती हूँ तो मुझे अपना एक सपाट मातृविहीन बचपन दिखाई देता है- जिसे संवारने और जिसकी दिशा निर्धारित करने के लिए कोई तैयार नहीं था न मेरे पिता ना ही मेरी माँ। वह आधारहीनता-या रूटलैसनैस जैसी भाव-दशा मन में इतनी गहरी धंसती चली गई कि बार-बार मेरा अपनापन अपने अन्तर्मन के भीतर मुड़ने के लिए विवश हो जाता था। अपने अकेलेपन में टुकड़े-टुकड़े बचपन की कमियाँ और खामियाँ, तथा टीसती अकुलाहट, जाने अनजाने मेरी मानसिकता पर हावी होती चली गई और मैं उसे छोटी आयु में अपने होने के सच को तलाशने हेतु भटकती थी। कभी अपनी माँ के चित्र के सम्मुख खड़ी हो जाती, कभी मंदिर की प्रतिमा के सन्मुख भजन गा-गा कर अपने अस्तित्व के आदि स्त्रोत को तलाशती थी, और, वह मुझे प्राप्त नहीं हो रहा था।

अलीगढ़ के हमारे घर में अच्छा खासा पुस्तकालय था। वहाँ अपने बचपन में ही मुझे बहुत सा अमूल्य साहित्य पढ़ने का अवसर मिला था। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की-‘गीतांजलि‘ से लेकर ‘गोरा‘ और श्री शरतचन्द्र के प्रायः सभी उपन्यास ‘चरित्रहीन‘ से लेकर ‘देवदास‘, प्रेमचंद के ‘गोदान‘ से लेकर ‘गबन‘, महादेवी की ‘यामा‘, सभी कुछ मेरे मन के ड्राइंगरूम में बच्चन जी की ‘मधुशाला‘ पढ़ते थे या भवानी प्रसाद मिश्र अपनी ‘मै गीत बेचता हूँ‘ वहीं दूसरी ओर ‘इस्मत चुगाताई‘ बतौर मित्र आती जाती थी। उनकी भी कहानियाँ विशेष रूप से ‘लिहाफ‘ हम छिप-छिप कर पढ़ते थे। घर में तब भी ‘हँस‘ आता था और उसमें संतोष कुमार नौटियाल की ‘तीस दिन‘ धारावाहिक के रूप में छपती थी। हर महीने में उसके नये अंश को पढ़ने की आतुरता में व्यतीत करती थी। वैसे ही ‘धर्मयुग‘ में अमृता प्रीतम की ‘डॉ. देव छपती थी-‘नवनीत‘ के माध्यम से भी अनेकानेक श्रेष्ठ रचनायें मेरे अतीत से अध्ययन की खूबसूरत धरोहर हैं। नवनीत के ‘शेरो सुखन‘ के बहुत से संग्रहणीय खण्ड‘ ग़ालिब से लेकर ‘मजाज‘, ‘साहिर‘, ‘मजरूह सुल्तानपुरी‘ ‘सरदार जाफरी‘ आदि को पढ़ने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ, जो उर्दू साहित्य के बेशकीमती साहित्यकार है। अपने बी.ए. के कोर्स में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ने के दौरान ‘कीट्स‘, ‘हैमिंगवे‘, ‘शैली‘, से लेकर ‘विक्टर ह्यूगो‘, ‘शेक्सपिअर‘, ‘टाॅल्सटॉय‘, ‘दास्तोवस्की‘, ‘फ्रैज़ काफका‘ और सात्र्र मानसिकता में एक नये अध्याय के साथ समाहित होते चले गये। उस सारे साहित्य ने मेरे लेखकीय अस्तित्व को एक पुख्ता धरती या वह नींव प्रदान की है जो आज भी मेरे लेखन को प्रेरित करती है। एक प्रकार की खूटियाँ हैं वह, समूची साहित्य रचनायें, जो मेरे सामने फैले हुए कोरे काग़ज़ पर एक अमूल्य तथ्य की तरह तटस्थ है। मेरा ऐसा मानना है सभी कालजयी रचनायें या ‘मास्टरपीसेज‘ उन लेखकों की ‘ईगो-ग्राफिक्स‘ है, उनके ‘स्व‘ की सजावटें, वह हंै, हर लेखक की अहं कथा, जो, उनकी आत्मा से उठकर हमारी आत्मा तक आती है और उनका तथ्य हमारी चेतना पर सदा-सदा के लिए एक अलौकिक प्रभाव छोड़ जाता है। तो मेरी ऐसी धारणा बनती गई, कि प्रत्येक कालजयी रचना परमात्मा के निकट की भावनाओं से परिपूर्ण होती है और उनका आत्मा पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा किसी प्रार्थना-मन्त्र का और जो रास्ता ध्यानाश्रम या, बोधिद्वार तक जाता है। मैनें मनोविज्ञान में एम. ए. किया था, जिसके प्रभाव से मनुष्य की भौतिकता से हटकर उसकी मानसिकता को समझने जानने के मूलभूत तत्व मेरे हाथ लगे। तो विस्तृत परिपेक्ष में मानवीय संवेदना मेरे साथ जुड़ गई।

उम्र में बड़े होते जाने की प्रक्रिया में हमारे संस्कार और हमारी शिक्षा ही सहारा एकमात्र सम्बल होते है कम से कम मेरे लिये थे। मेरे पिता सुरेन्द्र कुमार जी के घर में गहरा आर्यसमाजी परिवेश था-सुबह हवन मन्त्रों से आरम्भ होती थी और एक नियमवद्ध जीवन था जहाँ जीवन मूल्यों को और कला-संगीत-साहित्य को सराहा जाता था। अलीगढ़ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान में एम. ए. करते समय मजाज का लिखा तराना ‘‘यह मेरा चमन, यह मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ।‘‘ मेरी आत्मा में अजीबोगरीब, तन्तुजाल बुन रहे थे-‘‘जर्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ....‘‘ इतने ऊँचे स्वर में गाया जाता था कि मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते थे। वैसे वातावरण में, मै, भी, छोटी छोटी कवितायें कहानियाँ रचने लगी थी। मेरी अंतरात्मा में नया सा कुछ उगा और मेरे भीतर और अधिक जानने की ललक ने मुझे साधारण साक्षी-भाव जीने नहीं दिया और मुझे लग गई ‘तलब तलाश की‘ अपने जीवन के उस परिदृश्य से उठकर आगे जाने की कुछ बन पाने की। बस ज़िंदगी के उस बहाव में आशा-अपेक्षा की लपेट बाहर छुट गई और मेरे लेखन की किश्ती दूसरे तट के बहाव की ओर ले चली। परन्तु फिर जैसा होता है एम. ए. पास करते ही मेरा विवाह हो गया और मैं दिल्ली चली आई। एक छोटा मिडिल क्लास घर और बड़ा सा परिवार-जहाँ सिर्फ गृहिणी मात्र बन कर रहते बारह वर्ष बीत गये। जीवन के सारे कलात्मक मुहावरे, दाल रोटी, की प्रक्रिया में या बच्चों की पढ़ाई लिखाई की उठा-पठक में बेआवज बीतते चले गये। कभी-कभी बहुत घुटन होती तो मैं घर के पास ‘लोदी गार्डन‘ के किसी घने पेड़ के नीचे बैठ जाती चुपचाप अपने आप में खोजती थी, क्या है ‘वह‘ जो मुझे इतना अनमना किये रखता है....क्यों है यह साधारण जीवन.....इतना पढ़ा लिखा है....वह सब बेअर्थ मेरे अपनेपन से छूटता क्यों जा रहा है-उसी कुहासे में मेरी एक मित्र, जो मुझे बार-बार कहती थी....‘‘तू जी रही है कुसुम, या जून भुगत रही है?‘‘ सामने आकर खड़ी हो गई। और मुझे मेरे घर की चारदीवारी या मेरी व्यक्तिगत कुंठा से निकाल कर ‘इप्टा‘ के दफ्तर ले गई। इप्टा-‘इंडियन पीपुल्स थिएट्रिकल सोसाइटी‘ है जहाँ नाटक मंचित होते थे। उस समय श्री भीष्म साहनी-शबाना आज़मी के पिता कैफ़ी आज़मी और उनकी माँ शौक़त आज़मी से मुलाक़ात हुई। उससे पहले मैं अपने संकोच में यह कहती कि मैं तीन बच्चों की माँ हूँ शायद अभिनय नहीं कर पाऊँगी, मैं नाटक के मुख्य रोल की अदायगी के लिए चुन ली गई। बस पूरा एक साल ‘ग़ालिब‘ और ‘ग़ालिब के उडं़ेगे पुर्ज़े‘ में अभिनय किया उसी में लीन हो गई। उस नाटक की नाटकीयता ने मुझे एक विस्तृत फलक प्रदान किया जिसने मुझे मेरे शापित अंधेरे से उबरने की एक राह दिखा दी, एक अदम्य साहस जो तब तक मुझ में नहीं था। वह इतना बड़ा सुखद अनुभव था-वहाँ का वातावरण-वहाँ के अन्य किरदार, कि मेरे मन में कहीं दुबकी हुई ललक-उचक कर बाहर आ गई और मुझे लगा जो लिखा है उसे छपवाना चाहिए। तो मेरा पहला उपन्यास ‘उदास आँखें‘, कविता संग्रह ‘मौन के दो पल‘ प्रकाशित हो गया। ‘पंचवटी‘ को मैंने नये सिरे से लिखा था। ‘एक और पंचवटी‘ प्रकाशित होते ही साहित्य के क्षेत्र में अपना स्थान बनाने लगी-पंजाबी और अंग्रेज़ी में अनुदित होकर मात्र पुस्तक रूप में ही पत्रिकाओं में सीरिएलाईज़ हुईं। मेरी बेरंग दुनिया में एक इन्द्रधनुष छा गया था।

मुझे पता नहीं क्यों लगा था, मेरा लिखना, मेरी रचनाएं मेरे परिवार में मेरा कोई स्थान निर्धारित करेंगे-खास तौर पर मेरे पापा....जिनका नैगलेक्ट मेरी आत्मा पर कैचुली जैसा लिपटा था-उतर जायेगा-मैंने उन्हें अपनी पुस्तकों की पहली प्रतियाँ दी....सोचा था हीरे....मोती जैसे कुछ शब्द फूल मुझ पर वार देंगे या प्यार ही निछावर कर देंगे....परन्तु....देने लेने की प्रक्रिया मात्र एक कर्म बन कर रह गई उससे आगे कुछ भी नहीं हुआ तो क्या चमत्कार शब्द ही संरचना बेकार ही की है किसी ने? उसकी कोई सत्ता नहीं है क्या? फिर उस कगार पर खड़ी थी, जहाँ दर्पण टूट जाते हैं....सपनों की किरचें बिखर जाती है।

‘ढूँढता फिरता हूँ मैं, इक़बाल अपने आप को 

आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंजिल हूँ मैं।

अपनी आकांक्षाओं के टूटन-विस्थापना के बावजूद मैंने साहित्य को ही अपना ध्येय मान लिया और चलती चली गई। अचानक मुझे लगने लगा कि इस हिन्दी साहित्य को मैंने ठीक से पढ़ा नहीं है। विवाह के बाद इतने वर्षों में पता नहीं क्या कुछ लिख गया और मैं अजनबी सी दूर हूँ। अतः अपनी बड़ी बेटी के विवाह के बाद मैंने अपना शोध कार्य आरम्भ किया। चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में श्री यश गुलाटी जी के साथ कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप साहित्य के नये आयाम मेरे सन्मुख एक चकाचैंध से फैल गये, और मुझे एक व्यापक तटस्थ सोच की प्रेरणा मिली। साहित्य ने मेरे भीतर विश्वास के साथ जीने का अटूट भाव पैदा कर दिया।

अपने शोधकार्य के समय मुझे बहुत-सा साहित्य पढ़ने को मिला था जिसने मेरी भीतरी जिज्ञासा को बहुत कुछ शांत भी किया था लेकिन पढ़ने की, विशेष रूप से अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ने में मेरा मन लगने लगा। बहुत सी पुस्तके मुझे पढ़ने को मिलीं जिनमें विश्वक्रांति क समय महायुद्धो के दौरान मनुष्य की हवस और महत्वाकांक्षाओं ने अपनी शक्ति के बल पर संसार में अनेक अमानवीय अत्याचार किये थे और ज़ुल्म भी इतने कि उस समय का साहित्य पढ़कर आज भी हृदय में दर्द की तीखी सिहरन थरथराती है। बहुत सी पुस्तकें लिखी गई, जो उस समय की घटनाओं दुर्घटनाओं के दस्तावेज़ थे और बहुत सी रचनाओं में मानवीय मूल्यों के विघटन और चरित्रवत्ता के ऊपर प्रश्न उठाये गये थे, और उन्हीं के माध्यम से सामने आया, ‘पोस्ट-मार्डन‘ का मुहावरा जिसमें बीते हुए युग की बौद्धिक विलासिता और सांस्कृतिक मूल्यों के विघटन का एक नया समीकरण प्रस्तुत किया गया था। ग्लोबलाईजेशन के तहत भारत के सन्मुख नये पश्चात्य साहित्य के नये नकोर मूल्य एक चुनौती या चैलेंज के रूप में आ खड़े हुए। उस समय के बहुत से उपन्यास ‘वार एण्ड पीस‘, ‘लामिसरेबल‘..... डाॅ. जिवैगो‘ या फ्रेंज काफका की ‘मैटा मौरफोसिस‘ जैसी अद्भुद् कृतियों ने मुझे एक विभिन्न चेतना जैसी दी। जर्मन के नाजी जुल्म की दास्तान की ‘डायरी आॅफ ऐने फ्रेंक‘ या ‘औरशविट्ज‘ पर कंसन्ट्रेशन कैप (जेल) में लिखी कविताओं ने भी मेरे भीतर एक घनी उदासी को प्रत्यारोपित किया। अपनी यात्राओं के दौरान मैं हौलेंड में ‘ऐने फ्रेंक‘ का घर और ‘वारसा‘ में ‘औरशविट्ज‘ के वह भुतहे कैंप भी देख आई थी। मेरी स्मृतियों में उनकी गहरी छाप आज भी जीवन्त है। प्रायः हर बार यही लगा कि आंतरिक रागात्मकता, वैभव की चमक से दूर, बंचित-शोषित और सताये हुए व्यक्ति की जीने की विडम्बना बहुत बड़ी होती है।

मेरा ऐसा मानना है कि, प्रत्येक मनुष्य को अपने आत्मिक और मानसिक विकास के लिए कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। उन दिनों (1980-1990) एक नया शब्द ‘‘ट्रांसडेंन्टर मैडीटेशन‘‘ या ‘अनुभवातीत ध्यानावस्था‘ सुनने में आया था। एकान्त में बैठकर अपने भगवान और अपनी आत्मा के साथ एकात्मता प्राप्त करने की विधि वैसी मननशीलता बहुत कठिन लगी थी मुझे, जितना भी प्रयास करती विचारों का रेला चाहे अनचाहे हर समय मन में 

धुएं सा भरा रहता था। लाख बार मन्त्र का जाप करने पर भी वह गुबार मन से निकलता ही नहीं था। ‘रमण केन्द्र‘ में पूज्य स्वामी प्रबुद्धानन्द जी से लगभग दस वर्ष तक मैंने वेदान्त की शिक्षा प्राप्त की। ‘केनोपनिषद, माडूक्योपनिषद, से लेकर ‘ब्रह्म-सूत्र‘ तथा ‘उपदेश-सहस्त्री‘ के साथ साथ गीता का ज्ञान भी प्राप्त किया। स्वामी जी द्वारा की गई मन्त्रों की व्याख्या हर बार मन को झकझोर देती थी और मुझे अपनी दुविधाओं, दैनंदिन उलझनों का उत्तर प्राप्त हो जाता था। मैं नहीं जानती मेरा कितना रूपान्तरण हुआ, परन्तु शायद मेरी अनघड़ता में स्वामीजी के परम्परानिष्ठ विचार जाने-अनजाने आकर घुल गये। परिणामस्वरूप मेरे कथानको के चरित्र मेरी तरह एक दार्शनिक भावबोध, विनम्रता का मानसिक धरातल जीने लगे।

‘एक और पंचवटी‘ के प्रकाशित हो जाने के बाद मुझे दूरदर्शन से ‘सीरियल‘ लिखने का निमन्त्रण मिला था-उन दिनों दूरदर्शन पर केवल ‘हम लोग‘ आता था-उसकी प्रोड्यूसर थी बम्बई की शोभा डॉक्टर-तो उनके लिये मैंने एक के बाद, दूसरा, तीन सीरियल लिखे, जिनमें ‘तितलियाँ‘ काफी चर्चित हुआ था। पता नहीं किस जूनून के तहत मैंने हिन्दी साहित्य में अपना शोधकार्य भी आरम्भ कर दिया था वह भी साथ-साथ चल रहा था। एक तरफ बम्बई का सिनेमाई परिवेश दूसरी और शोधकार्य मुझे बहुत व्यस्त रखते थे। जिन दिनों मेरा ‘वाईवा‘ था-और जो महानुभाव मेरी मौखिक परीक्षा ले रहे थे-वह काँप रहे थे परन्तु मैं तटस्थ थी। बम्बई की उन्हीं यात्राओं के बीच एक दिन शोभा डौक्टर के साथ श्री बासु भट्टाचार्य जो एक जाने माने सिने-निर्देशक थे-और सिने अभिनेत्री दीप्ति नवल से मुलाकात हुई। मेरी कुछ पुस्तकें वहाँ शोभा की मेज़ पर पड़ी थीं-सबसे ऊपर थी ‘पंचवटी‘-दीप्ति ने आश्चर्य से पूछा “आपने लिखी है ये पुस्तक‘‘ और मैंने अपने संकोच में कहा ‘‘हाँ मैंने ही‘‘। तो उसने कहा ‘‘मैंने पढ़ी है ये पुस्तक, बासु दा, इस पर तो बहुत अच्छी फिल्म बना सकते हैं।‘‘ बासु दा ने मुझसे पूरी कहानी सुनी और बस फिल्म के लिये काम आरम्भ हो गया। उसका ‘स्क्रीन-प्ले‘ लिखने का भार भी उन्होंने मुझे ही सौंपा-मुझे तो अपने उस घरेलू संकुचित वातावरण में कोई अनुभव नहीं था-परन्तु चुनौतियाँ स्वीकारना मुझे अच्छा लगता है। जब कुछ महीने बाद मैं, बम्बई पहुँची तो मेरे हाथ में मोटा सा पुलिंदा था पंचवटी के ‘स्क्रीन प्ले‘ का-आपको आश्चर्य होगा कि मैं तो रो ही पड़ी थी- जब बासु दा ने उसे खोलकर भी नहीं देखा। पता चला फिल्म नैपाल में बनेगी। बस अपनी मुख्य नायिका के समूचे व्यक्तित्व को एक भिन्न साँचे में ढालना पड़ा। भाषा संरचना विचार आदि के संदर्भ बदल गये परन्तु बासु भट्टाचार्य के साथ कार्य करने का अपना एक अनोखा अनुभव था। उनकी ऊर्जा, उनके कार्य करने की पद्धति मुझे अभिभूत करते थे, जैसे शांत बादलों में विजली कौंध जाती है।

जीवन के अनेकों आयाम ऐसे थे जहाँ बहुत प्रकार के भिन्न चरित्रों, परसनैलिटियों से मिलता हुआ था। परन्तु उनका संसार अपना था-सिनेमा, कला क्षेत्र से जुड़ा अतीत भविष्य एक नजरिया जो मुझे ऐसा लगता था जैसे वह मेरी नवीन जागृति का क्षण है-जैसे मेरी सोच को कोई सावधानी पूर्वक उकसा रहा था। शोभा डाॅक्टर ने मुझे एक आत्म विश्वास दिया जिसका शायद मेरे जीवन में अभाव था। मुझे साधारण लेखिका से उठाकर प्रोफेशनल बना दिया जिसने मेरी अनुभूति और अभिव्यक्ति के घनत्व को परिभाषित किया। और बासु दा ने एक ऐसा सम्मानित पैडस्टल प्रदान किया जो बहुत कम लेखकों को प्राप्त होता है। ‘पंचवटी‘ को पैनोरेमा‘ में फिल्म फेस्टिवल में शामिल किया गया। मैं भी फिल्म के कलाकारों के साथ ‘ताशकंद‘ गई थी। ‘पंचवटी‘ के प्रदर्शन के बाद हम सब को बासु भट्टाचार्य, शोभा डाॅक्टर, सुरेश ओबेराय, मुझे मंच पर बुलाया गया है। और हमें दस-दस डॉलर दिये गये। वह दस डॉलर आज भी मेरी अमूल्य निधि है। बाद में वैसा ही अनुभव अपने नाटकों के दौरान हुआ-जिनका निर्देशन श्री फैज़ल अलकाज़ी ने किया। फैज़ल अलकाज़ी नाटक जगत की एक प्रसिद्ध हस्ती हैं। मेरे दोनों नाटक ‘रेखाकृति‘ और ‘उसके होठों का चुप‘ दिल्ली, बम्बई, चंडीगढ़ तथा पूना में प्रदर्शित हुए।

यह सभी अनुभव मेरे हृदयाकाश की धड़कन है-उन्हीं के कारण मेरी लेखकीय समृद्धता को पुख़्ता धरती प्राप्त हुई है जिस पर मैं आज तटस्थता से खड़ी हूँ।

‘‘एक और पंचवटी‘ के बाद मैंने अपनी आत्मकथा लिख डाली। मेरी आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया‘ मेरी महिला लेखिकाओं द्वारा लिखी गई पहली आत्मकथा है। परन्तु साहित्य के आलोचकों और मठाधीशों, पत्रिकाओं के संपादकों ने उसे वह मंच, वह सम्मान नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए था। कोई भी आत्मकथा अपने ही जिये हुए जीवन की वह वास्तविकता होती है उसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता। हाँ उसमें अपने जीवन के अनुभवों को हम अपने कल्पनाशील विस्तार से जोड़ते हैं। जैसे बड़े हवेलीनुमा घर में मेरा बचपन बीता था और जिस परिवार में विवाह के बाद संघर्षपूर्ण जीवन को मैने जीया था, वहाँ किसी अय्याशी या दखलअंदाजी, की गुंजाईश नहीं थी जो मैं लिखती। एक तपस्या जैसी थी मेरी जीवनचर्या, एक श्रम का पसीना था हर दिन वही अन्तर्निहित तनाव, या घटनाएं काग़ज़ के अक्षरों में उतरती चली गयीं। अब उसमें ‘रमणिका गुप्ता‘ जैसी लेखिकाओं वाला या अन्य आत्मकथाओं में वर्णित ‘चीप थ्रिल‘ दाँवपेच जैसा कुछ नहीं है, तो उसमें मेरा कोई हाथ नहीं। मैने जो अपनी आत्मकथा को ‘जैसी की तैसी धर दीनी चदरिया‘ जैसी मानसिकता से लिखा था, धुंआरहित, क्योंकि मेरा ईधन गीला नहीं था। मेरे पास सुच्ची मानसिकता थी। और सच तो यह है कि ईमानदारी से की गई किस्साबयानी में संतुलन के साथ साथ दुर्गमता अधिक होती है, चस्केदार ऐपिसोड कम होते हैं। आत्मकथा अपना निजी होने का एहसास है एक महत्वपूर्ण सामाजिक कर्म है जिसमें अपने मर्म का तथा उसका वह सत्य भी उजागर होता है जो अपने जीवन की द्वन्दात्मक मानसिकता और युद्धक्षेत्र की भागीदारी को स्पष्ट करता है।

साहित्य के क्षेत्र में मैंने अपनी आत्मा और श्रम से, बहुत लगन से काम किया, उपन्यास, कहानियाँ, कवितायों, यात्रावृतान्त, आत्मकथा, लेख, शोधकार्य बहुत कुछ लिखा पूरी ईमानदारी से। परन्तु आत्मतुष्टि के नाम पर कुछ विशेष नहीं मिला। जहाँ तक मै इस लेखकीय वर्ग को जान पाई हूँ उसमें मुझे यही पता चला कि किसी भी लेखक को, कोई न कोई ‘प्रमोट‘ करता है-कोई पत्रिका का संपादक, या कोई दूसरा बड़ा नामी लेखक, कोई मठ, कोई खेमा। परन्तु मैंने कभी किसी दरवाज़े पर माथा नहीं टेका। मेरे आत्मसम्मान को यह गवारा नहीं था। हाँ जो भी लिखा अपने मन और आत्मा के संतोष के लिये लिखा था। साहित्य के दावेदारों ने अपने दृष्टिकोणों से उसे कभी स्वीकारा कभी नज़र अन्दाज़ किया। हाँ इस उपेक्षा का दर्द मुझे अक्सर कचोटता है। पर फिर सोचती हूँ-जो मिला है, पर्याप्त है-क्योंकि इस संसार में कभी किसी को ‘मुकम्मल जहाँ नहीं, मिलता‘। मेरे पास मेरी शुद्ध आत्मा है, मेरा शुद्ध अस्तित्व है-एक सूक्ष्म अहंकार कि ‘मैं हूँ‘। वही रहना चाहती हूँ विखंडित। उसे अगर पहचान नहीं मिलती तो, उसे मैं नहीं जानती उसके लिए क्या करूँ? जीवन की तल्खियाँ और कसैलेपन को भोग रही हूँ और जी भी रही हूँ।

एक प्रश्न लोग अक्सर मुझसे पूछते है कि मेरे आर्थिक रूप से समृद्ध होने से मेरे लेखन को कितना नुकसान पहुँचा? आप समझ सकते है। इस हमारे समाज में पुरानी चलती प्रथा है कि जो धनवान है वह शोषण करता है, बुरा है, चरित्रहीन है, उसने धन को गलत तरीकों से हथियाया है। गरीब-निर्धनता में जी कर भी चरित्रवान है और सच्चाई से जीता है। माक्र्सवाद की बुनियाद भी इसी तथ्य पर टिकी थी। इतिहास में बहुत से ज़मीदारियों के या राजघरानों के सदस्यों के कटुतापूर्ण चित्रण मिलते भी है। परन्तु अब समय वैसा नहीं है-फिर भी वह उपेक्षा मुझे झेलनी होती है। हो सकता है अगर मैं ‘कुसुम असंल‘ ना होती तो मेरे प्रति आलोचकों का रूख बदल जाता। अंसल परिवार को आज की स्थिति तक पहुंचाने के लिये मेरे पति सुशील जी ने अथक श्रम किया है। विरासत में हमें सुख समृद्धि के नाम पर कुछ नहीं मिला था। हमारे परिवार की एक साधारण-मिडिल क्लास घर से उठकर ‘अंसल-भवन‘ तक की यात्रा में वर्षों का संघर्षरत रूपान्तरण जुड़ा है, जिसमें मेरे अकेलेपन, मेरे आँसू, त्याग आदि के बहुत से कथानक भी उन्हीं वर्षों में घुले है। बाहर का संसार क्या कहता है मेरे लिये मैं, नहीं जानती? आप ही बतायें मैं आपसे पूछती हूँ आपको मेरे लेखन में क्या दोष दृष्टिगोचर हुआ जो एक धनवान स्त्री होने के कारण मेरे लेखन मे प्रवेश कर गया? वह दोष गुरूवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के लेखन, या श्री राजाराम के चित्रों में क्यों नहीं खोजा आलोचकों ने? 

धनवान वह भी तो थे? मेरा अपने जीवन का एक ध्येय है मेरा अपने आप से किया एक वायदा है कि मैं, अपने अस्तित्व को, अपने ‘स्व‘ को अपनी माँ के वजूद की तरह ‘नान बीईंग‘ (न होने में) परिवर्तित नहीं होने दूगी, क्योंकि शरीर की भौतिक उपलब्धियाँ, धन आदि जीवन का मूल सत्य नहीं है-तो सत्य क्या है? सत्य ही तो जीवन का सबसे महत्वपूर्ण, सारगर्भित शब्द है। सभी चुनौतियों से टकराकर मुझे उस ‘जीवन सत्य‘ को जानना है। अपनी अनुभूतियों, अपनी रचनाओं के माध्यम से। अवश्य ही वह अनुभूति अभूतपूर्व होगी। उस स्थिति तक पहुँचना भी उतना ही असम्भव है, जितना स्वर्ग। परन्तु कामना तो की जा सकती है, प्रयास भी किया जा सकता है। चेतना जहाँ हम निर्विषय, निर्विचार, निरविकल्प है, वैसी कोई अनुभूति, जहाँ साक्षात्कार में न तो कोई ज्ञाता है न कोई ज्ञेय। उस असम्भव तक जाना है मुझे। अंधेरे से टकराकर एक नया सूरज उगाना है अपने उदास कुहासे भरे आसमान में। -डॉ. कुसुम अंसल


.....मैं नहीं जानती सार्त्र ने ‘अस्तित्वाद‘ को क्योंकर परिभाषित किया? परन्तु यह तय था कि मैं इस धरती पर जन्मी थी इसलिए मेरा अस्तित्व... .अस्तित्वान हुआ था, या मुझे अपने अस्तित्व के ‘मैं‘ मेरे होने के सच को तलाशना था... कुसुम




PANCHVATI, woven into the matrix of man-woman relationship, is a film of inner human turmoils. Four lives entwined in not always sunlit days and velvety nights. Two brothers and their wives caught up in the whirlpool of emotions; their interactions and reflections not directed at catharsis but confronting situations that demand pondering.

PANCHVATI is not a film only about conjugal bliss or maladjustment. Underneath the socio-emotional structure lie other significations: mythological, metaphysical and even political. Some explicit. Some subtle. But always flexible. Subject to individual interpretations. At times directing one to the solitary prison of one's aloneness.

The visual structure of PANCHVATI demonstrates the abstract of the concrete, and the magnification inherent in it. The outer design and the inner desire at times in conflict, and at times in conformity. It is the rhythmic harmony of the two in its visual blend that gives PANCHVATI the texture of a rainbow. The fluid flexibility of the inner desire interacts with the concrete outer format of socio-emotional design.

The thin dividing line between dream and desire disappears when the fallen leaves of autumn spread a cover on reality. Perversions become poems. Or meanness. Or pretensions. Or plain anger. The weight of outside material rivalry expresses itself physically, while the burden of inner unfulfilled desires acquires volcanic proportions in the psyche. Vascillation continues to retain continuity of subterranean uncertainty, out of which emerges a different reality.

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संस्मरण

चेतना का कोलम्बस

-डाॅ. कुसुम अंसल

मुझे लगता है सबसे कठिन होता है वह पहला वाक्य जो आप किसी ऐसे व्यक्तित्व के प्रति कहने या लिखने बैठ जाएं जिसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता या कोई दस्तावेज आपके पास न हो और न ही आसपास ऐसा कोई जानकार जो उस व्यक्ति के विषय में गहरी जानकारी रखता हो। और व्यक्ति भी वह जिसके प्रति मन में बेहद श्रद्धा हो और बेहद वितृष्णा भी। असमंजस मेरे आसपास धुंध-सा ठहरा है और मन के एक कोने में आकार ले रहा है। भूला-बिसरा अतीत बासु भट्टाचार्य का वह रूप जिसे मैंने अपने उपन्यास ‘एक और पंचवटी‘ पर आधारित फिल्म ‘पंचवटी‘ के निर्देशन के समय देखा था, जिया था, महसूस किया था... अभिभूत भी थी और निराश भी। बासु भट्टाचार्य अपने समय के महान सिने-निर्देशक थे और उनके साथ काम करना अपने आप में एक अनुभवातीत अनुभव, जो मेरी मानसिकता पर आज भी अंकित है। बिना किसी विशेषाधिकार के मैं वह सब कहने जा रही हूँ जो नितांत मेरा अनुभव था... उन पाँच-छः सालों का अनुभव, जब मैं लगातार बम्बई जा रही थी। मेरे भीतर का सृजनात्मक आवेग ही था जो मुझे बम्बई के अनजान धरातल तक ले जाया था, शायद इस कारण कि जीवन में ‘चैलेंजेस‘ या चुनौतियों को मैं स्वीकार लेती हूँ और मुश्किलें मेरी जिज्ञासा से बड़ी नहीं हो पाती।

प्रत्येक रचना का समापन एक नये-नकोर अध्याय को जन्म देता है। मैं भी तो टेलीफोन पर पाए एक कमज़ोर-से निमन्त्रण के स्वर को पकड़कर वायुयान में बैठ बादलों के रहस्यात्मक अस्तित्व में अपने भीतर के प्रश्नों-उत्तरों के उलझाव में घिरी बम्बई की धरती पर कदम रखती, हवाई अड्डे से बाहर आ गई थी। मेरे नाम का काग़ज़ हाथ में फैलाए एक ड्राइवर खड़ा था। उसी के पीछे चलती मैं शोभा डॉक्टर के घर पहुँच गई थी। दूरदर्शन के डायरेक्टर जनरल श्री हरीश खन्ना ने मुझे उनका परिचय दिया था। मैं बस इतना जानती थी कि शोभा ‘हम लोग‘ नामक सीरियल की पहली प्रोड्यूसर हैं, अपने आप में एक सशक्त नाम तथा व्यक्तित्व। मेरे लिखे सीरियल को वह प्रोड्यूस करना चाहती हैं, यह बात तय होने पर ही मैं चल पड़ी थी। शोभा के घर की गोलाकार सीढ़ियाँ मेरे लिए सम्भावनाओं के अनेक द्वारा खोल रही थीं। छोटे-से दफ्तरनुमा कमरे में शोभा एक बड़ी-सी कुर्सी पर आलथी-पालथी मारे बैठी थी- उसके चेहरे की बड़ी-सी कत्थई बिन्दी, गोल, सरल-सा चेहरा...बेहद अनौपचारिक और सहज परिवेश मुझे परिचय की परिधि में समेट रहा था। ‘फेमिना‘ में मैं शोभा के बारे में पढ़ चुकी थी। दूरदर्शन पर ‘सोप-ऑपेरा‘ की शुरूआत करने वाली वह पहली महिला थीं जो भारतीय दूरदर्शन के लिए नवीन प्रयोग ही नहीं, एक रिवोल्यूशन की शुरूआत में कार्यरत थीं जो आज बवंडर-सा उमड़कर भारतीय जनता के दिलो-दिमाग पर छा गया है। परिचय... मित्रता, आत्मीयता...वे कुछ दिन...मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर हो गए थे। मैं अपने आप में महत्वाकांक्षी कभी नहीं थी, परन्तु उन कुछ दिनों ने मुझे एक गहरा आत्मविश्वास ही नहीं दिया, एक ऐसा परिवेश पकड़ाया, जहाँ मैं अपनी चारदीवारी के भीतर रहकर कभी नहीं पहुंच सकती थी। और शोभा शायद मुझे वैसे देख रही थी जैसे कोई रचयिता अपनी गढ़ी हुई रचना को पैसिल स्कैच से तूलिका के अंतिम स्पर्श तक अवतरित होते देखता है। उसका विचार था कि जीवन में सामान्य कभी कुछ नहीं होता। विशेष रूप से ‘स्त्री‘ के प्रति उसका एक मानवीय दृष्टिकोण था, और शायद यही कारण था कि उसके मन में ‘स्त्री‘ के ‘स्त्रीत्व‘ के प्रति बहुत मान-इज्ज़त थी। वह गहराई तक फैमिनिस्ट है, इसीलिए मेरा लिखा सीरियल अपना नाम बदलता, शोभा के ऑफिस, आनन्द महेन्द्रू से होता निर्देशन के लिए नादिरा बब्बर के हाथों में आ टिका। नादिरा को मैं ‘इप्टा‘ के जमाने से जानती थी-‘त्रिवेणी‘ के सभागार में वह जहीर साहब के ‘बीमार‘ और मैं मेंहदी भाई के लिखे ‘गालिब के उड़ेंगे पुर्जे‘ में अभिनय कर रही थी-हम दोनों को ही नायिका का रोल निभाना था। वह भी एक चुनौती थी और यह भी एक चुनौती जैसा अवसर। इतना अधिक काम मैंने कभी नहीं किया था। जहाँ स्क्रिप्ट का फेरबदल मुझे चिंता-दुश्चिंता से भरता वहीं मैं पूरी-पूरी रात लिखती रहती थी। मेरी अव्यावहारिकता, अव्यावसायिकता मुझे जगह-जगह न्यूनीकृत करते थे जबकि मुझे लगता था वे मेरे जीवन के बहुत सार्थक दिन थे-जहाँ मैं अपने लिए कुछ ‘हो पाने‘ के प्रयास में जुटी हुई थी। बहुत रोमांच के पल थे वे। ‘तितलियाँ‘ की शूटिंग चल रही थी और मैं अपने गढ़े चरित्रों को काग़ज़ के पन्नों से उठकर चलते𝔠ाते, सजीव होते देख पा रही थी। मेरा एक अप्रामाणिक अस्तित्व जैसे समय के उस पल में अपने को स्थापित कर रहा था। सच में उन दिनों मुझे मार्शल ब्लावस्की (अमेरिकन माइथोलाजिस्ट) के ये वाक्य सार्थक लगते थे-‘हम आकृतियों की दुनिया में जीने के लिए विवश हैं, हम भूल गये हैं कि कभी कोई वास्तविक आकाश भी था। वास्तविक आहार था। कभी कोई वास्तविक वस्तु थी।‘ मैं भी तो अपने चरित्रों के चेहरे और चरित्र संवारने में दिन-रात जुटी रहती थी, आकृतियों का वह संसार जिसकी निर्माता मैं थीं।



बम्बई का सिनेमाई जगत अपनी रहस्यात्मक खिड़कियाँ, दरवाज़े खोल रहा था। मैं अपने भीतर की धुंध में कनफ्यूज्ड, डरे कदमों से चल रही थी। शोभा का सशक्त हाथ उसके घर, उसके परिवार की आत्मीयता मुझे एक सहज विश्वास से भर रही थी। कभी-कभी मुझे लगता था जैसे मेरे भीतर एक नई आत्मा प्रवेश कर रही थी। उस दिन भी हम गाड़ी में बैठकर शायद लंच के लिए कहीं जा रहे थे। बम्बई के भौगोलिक परिवेश से मैं अनभिज्ञ थी, परन्तु जहाँ गाड़ी रूकी थी, उस बिल्डिंग के सामने फैले हुए समुद्र के विशाल विस्तार को मैं अपनी पहचान के दायरे में समेट ही रही थी कि पीछे की सीट पर मेरे साथ जो महिला आकर बैठी वह भी दीप्ति नवल उस समय की चर्चित अभिनेत्री और आगे की सीट पर बैठे भव्य से एक व्यक्ति। शोभा ने परिचय कराया-‘बासु भट्टाचार्य..द फेमस डायरेक्टर ऑफ फिल्म्स...।‘

श्री बासु भट्टाचार्य...मन में कुछ सरसराया। वे सब फिल्में एक-एक करके याद आने लगी-‘तिसरी कसम‘, ‘अनुभव‘, ‘आविष्कार‘, ‘गृह प्रवेश‘...मैं उन्हें देख ही नहीं चुकी थी उनसे प्रभावित भी थी। फिल्मों की आलंकारिक तस्वीर के साथ मैं बासु भट्टाचार्य के व्यक्तित्व का तालमेल बैठा रही थी। पैंट के ऊपर खद्दर का साफ-सुथरा सफेद कुर्ता पहना हुआ था, कंधे पर लैदर का भारी-सा झोलानुमा बैग, पैरों में कोल्हापुरी चप्पलें, साधारण कद, परन्तु चेहरा झकझक करता हुआ, उज्ज्वल...साधारण-सी उस मुखाकृति पर चश्मे के पीछे दो बड़ी-बड़ी सैन्सिटिव-सी आंखें, ऐसी गम्भीर परन्तु भोली दृष्टि कि मन में गहरी उतर जाये। पता नहीं क्यों उन आँखों में देखने पर लगने लगा उनकी पीली सफेदी उपासनागृह की खंडित मूर्तियों के मटमैले चूरे जैसी है...ऐसी मुहावरे-विहीन दृष्टि से कम से कम मैं परिचित नहीं थी।

दीप्ति ने कार के पीछे पड़ी मेरी पुस्तकों की ओर देखते हुए ‘एक और पंचवटी‘ हाथ में उठा ली-‘अरे यह उपन्यास तो मैं पढ़ चुकी हूँ और पढ़ते हुए मुझे लगा था इस पर फिल्म बन सकती है, तो आप हैं कुसुम अंसल, आपने लिखा है यह उपन्यास?‘

‘हाँ‘, मेरे गले में कुछ फंस-सा गया था... हाँ मैंने ही लिखा है।‘

बासु भट्टाचार्य ने मुड़कर ऊपर से नीचे तक देखा, पता नहीं हैं उन्हें कितने प्रतिशत लेखिका लगी परन्तु मेरे भीतर मेरा लेखन अपनी तथ्यात्मकता के साथ सिर उठाकर खड़ा हो गया था। वह अंग्रेज़ी में बोले, ‘ओह यू आर शोभा-स न्यू डिस्कवरी...शी टोल्ड मी अबाउट यौर सीरियल...।‘

मुझे लगा मेरे भीतर कुछ नया निर्मित हो रहा है-मैं, मेरा लेखक होना अविश्वास में घुला था एक विश्वास। उस दिन के लंच के बाद ‘दादा‘ से-हाँ, सभी उन्हें दादा कहते थे-मेरा मिलना होता रहा क्योंकि शोभा के यहाँ उनका आना-जाना काफी था। उपन्यास उन्हें दे देने के बाद भी उन्होंने नहीं पढ़ा था। उन दिनों शोभा के साथ एक नये सीरियल ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ की योजना बना रहे थे। जब भी उनसे मिलती, बात करती, उनके प्रति विस्मय से भरती जाती थी। पता चला दादा का जन्म ‘मुर्शिदाबाद‘ (जो अब बांग्ला देश में है) में हुआ था। एक साधारण-से संयुक्त परिवार में उनकी परवरिश हुई थी। अपने माता-पिता के बारे उन्होंने कभी कुछ नहीं कहा। आरम्भ से ही तिजारत से वह भागते रहे थे और अपने उसी भगोड़ेपन में वह कोलकाता चले आये थे-कोलकाता के किसी छोटे-से गेस्ट हाउस में पेइंग गेस्ट के रूप में रहते थे जहां का गृहस्वामी शायद अच्छी प्रवृत्ति का व्यक्ति था। एक अजीब-सी बात मुझे याद आ रही है-दादा बता रहे थे कि वह गृहस्वामी अपने किरायेदारों से कम पैसे लेता था फिर भी उसकी कमाई अच्छी हो जाती थी, जिसका कारण शायद यह था कि वह सब्जी मंडी से तब सब्जियाँ चुनकर लाता था-शाम के वक्त-जब वे आधे दामों पर या उससे भी कम में बिकती थीं। या फिर बता रहे थे एक ट्यूशन पढ़ाने के दौरान विद्यार्थिनी की माँ उनके लिए दो बड़ी पूरी और सब्जी थाल में परसकर दे जाती थी-जिसकी प्रतीक्षा उन्हें बेसब्री से रहती थी। और कभी-कभी केवल उतना ही भोजन पूरे दिन के लिए मिल पाता था। आर्थिक कष्टों और भूख के मध्य भी उनका पढ़ना-लिखना चलता रहा। बम्बई आकर जैसा कि होता है यहाँ-वहाँ धक्के खाकर बिमल राय जैसे डायरेक्टर के असिस्टेंट के रूप में वह कुछ वर्ष काम करते रहे थे और उन्हीं की बेटी रिंकी से उन्होंने प्रेम विवाह किया था। अब घर में ‘आदित्य‘, ‘पग्गी‘ और ‘चीमू‘ थे। आदित्य शायद उन दिनों विदेश से लौटा था। रिंकी को मैंने कभी नहीं देखा, न ही परिवार का कोई सदस्य उसकी कोई बात करता था।

किसी भी घर का एक चरित्र विशेष होता है उस घर की साँस-साँस जीती हुई एक आत्मा होती है। यह पहली बार मैंने दादा के घर जाने पर समझा था। बांद्रा में समुद्र के किनारे एक बिल्डिंग से बाहर की ओर निकला हुआ वह अजीबोगरीब घर एक बार देख लेने पर स्मृतियों से कभी बाहर नहीं जाता। सीढ़ियाँ चढ़ते ही गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का बड़ा-सा तैलचित्र...श्याम और श्वेत। आते-जाते मैं उसके सम्मुख ठिठक जाती थी...याद आते थे महाकवि के शब्द..."The soul of man emerges in painting poetry and song, every time it captures an intimate glimpse of the light of the infinite. Man does not capture this ray of light unless his vision embraces the profound truth of existence.”

अभी उस फुसफुसाहट से उबरी भी नहीं थी कि दादा की बैठक की एक कुर्सी ने मुझे अपने में बैठा लिया। मुझे दादा का वह कमरा भारतीय-कलात्मक परन्तु एक उदास-सी सादगी में बिना किसी तेवर के बेहद चुपचाप लगा थ। बैठक से जुड़ा था पूरे घर का बहुत आकर्षक बरांडा या बैलकनी जिसमें बेशुमार छोटे-बड़े पात्र और उनमें से झाँकते-उमगते तरह-तरह के पौधे...हरे रंग की विविधता के साथ फूलों के हाथ हिलाती डालियाँ। हर पौधे का एक इतिहास, हर पात्र की एक कहानी थी। जिसे दादा बड़े रोचक ढंग से सुनाते थे। शायद वहीं उस घर की आत्मा धड़कती रहती थी। एक नन्हें पत्तों की बेल, जिसे, दादा, मशहूर हास्य अभिनेता ‘चार्ली चैपलिन‘ की कब्र से तोड़कर अपने झोले में छुपा लाए थे परन्तु जिसके लिए उन्हें हवाई अड्डे पर ‘क्वारंटीन‘ में कुछ दिन नज़रबंद रहना पड़ा था। पात्रों की विविधता में भी इतिहास छुपा था। एक टूटा-सा पात्र भी आकर्षक हो सकता है-उस गुलशन का कमाल था वह।

दादा के घर में तरह-तरह के लोग आते-जाते रहते। दादा उन्हें एक जैसा सामान्य आदर देते थे। हाँ, उनकी आर्थिक स्थिति बेहद डावांडोल थी और शायद यही कारण था वह शोभा पर निर्भर रहते थे। उनके पास कभी पर्स या पैसे नहीं होते थे। कम से कम मैने उन्हें कभी कुछ खर्चा करते नहीं देखा। जब भी लंच या डिनर के लिए जाते, शोभा ही बिल चुकाती थी या मैं। शोभा जैसे उनका कोई कर्ज उतार रही थी या उनको स्थापित करने में लगी थी या उन्हें डिकन्स्ट्रक्ट करने में लगी थी? पता नहीं? पाँच सितारा होटलों या वैलिंगडन क्लब के महंगे खाने दादा के सामने परोसे जाते थे, परन्तु दादा का कस्बाईपन चुपके से आकर उनके व्यवहार को जकड़ लेता। छुरी-काँटा छोड़कर अपने हाथों से खाते थे या कभी जोर-जोर से चिल्लाते झगड़ते और फिर मेज़ से उठकर चले जाते। कभी इतने चुप हो जाते जैसे किसी गहरे कुएं में जल-समाधि लगाकर बैठ गए हों। मन के पिछवाड़े खड़ा उनका काम्पलेक्स, रिंकी का छोड़कर चले जाना, इतनी अच्छी, सफल फिल्मों के बावजूद धन का  अभाव, प्रोफेशनल फ्रस्ट्रेशंस-बहुत कुछ था जो जाने-अनजाने उनके व्यवहार को अमानवीय बना जाता था। कभी भीतर से कुछ पुरानी ‘बालूचरी‘ साड़ियाँ निकालकर बताते थे कि वे मुर्शिदाबाद से लाई गई थी और अब उनकी एंटीक-वैल्यू थी। जैसे सहृदयता से उन पर हाथ फेरते, लगता जैसे उस स्पर्श के बहाने कहीं से इन्द्रियानुभूत होकर रिंकी को छू रहे थे। रिंकी के लिखे एक लेख को मैं ‘सैवी‘ या ‘फैमिना‘ में पढ़ चुकी थी-उसकी दर्दीली कराह की अनुगूंज मेरे मन के भीतर उस पल सरसराने लगती थी। परन्तु बहुत-से प्रश्न और कौतूहल कहे नहीं जाते, पूछे नहीं जाते, उन्हें मन के किसी कोने में बन्द रख देना होता है।

एक दिन दादा के कहने पर ‘पंचवटी‘ की कहानी मैंने अपनी रूकती-रूकाती डिमिस्टीफाइड-सी आवाज में उन्हें सुना डाली। उनकी ढेर सारी टिप्पणीयाँ, उनके महत्वपूर्ण प्रश्न, सूक्ष्मातिसूक्ष्म निरूपण और दिलचस्पी मेरी अपनी लेखकीय सामथ्र्य को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा कर रही थी। बस वही नीव थी जिस पर ‘पंचवटी‘ फिल्म को खड़े होना था। जाने कैसे शोभा ने नेपाल की फिल्म इंडस्ट्री के साथ मिलकर ‘पंचवटी‘ को बनाने का फैसला ले लिया था। दादा, मैं और शोभा उन मीटिंग्स के बीच शामिल थे। टीका सिम्हा नामक महिला हमारे साथ सहयोग कर रही थीं। वहाँ ‘स्वयंभू मंदिर‘ और मंदिर के ऊपर तिकोनी बुर्जी पर बनी बड़-बड़ी दो आँखें...नेपाल का नैसर्गिक सौन्दर्य... ‘

धुलीखेल’ ‘का सूर्योदय-दादा की मानसिकता पर छा गया था। और मुझे साफ-साफ लग रहा था इन्हें अपनी फिल्म में उतारना ही होगा जोकि बड़े जोखिम का काम था। तभी काठमँडु में एक दिन मंदिर के बाहर हमारा परिचय एक बूढ़े चित्रकार, कर्मसिद्धि जी से हुआ। पता चला वह प्रतिदिन एक चित्र बनाते थे और उसे शाम को मंदिर की सीढ़ियों पर रख आते थे उनकी वह श्रद्धांजलि होती थी। भगवान के प्रति। दादा और मैं गलियों-गलियों घूमते। उनको खोज निकाला उनसे मिले और इतना ही नहीं, उन्हें अपने कथानक में एक महत्वपूर्ण भूमिका में लाकर स्थापित कर दिया। उस दृश्य की पूरी शूटिंग भी चित्रकार कर्मसिद्धि जी के घर पर हुई। और उस भूमिका को निभाया, श्री नबेन्दु घोष ने, जो अपने समय के विमल राॅय की फिल्मों के लेखक थे। विमल राॅय, रिंकी के पिता और बासु भट्टाचार्य के श्वसुर थे। दादा का वास्तविकता के प्रति बहुत मोह था। वह सैद्धान्तिक रूप से किसी भी मनुष्य या दृश्य को उसकी असलियत से आँकते थे। उन्हें आधुनिकता से, पाश्चात्य के अनुकरण से बड़ा विरोध था। न ही उन्हें चिन्ता होती थी कि उनके आसपास फिल्म इंडस्ट्री में क्या हो रहा है। वह कहते थे, ‘बड़ी भयंकर बात है आज के समय में मनुष्य समाज के लिए जी रहा है, समाज मनुष्य के लिए नहीं।‘ और विरोधाभास यह था कि उनकी मित्रता शोभा के साथ थी जो युगांडा में पैदा होने, वहीं परवरिश पाने के कारण नितान्त आधुनिक थी। परन्तु मन से वह सादा थी साधारण विशाल-हृदया, सबके लिए कुछ-न-कुछ करती हुई-जबकि दादा उसे डाँटते रहते थे। अक्सर उन दोनों का जोर-जोर से झगड़ा हो जाता था। एक-आधा दिन बाद या दूसरी सुबह ही फिर सब नार्मल हो जाता और दादा, फिर नये सिरे से शोभा को भारत की पौराणिक कथाओं या भारतीयता के पक्षों से परिचित कराते। शोभा के पास एक ‘कम्प्यूटर माइंड‘ था जिसमें सारा-का-सारा कथानक या ‘इन्फरमेशन ‘ फीड हो जाती थी और जिसे वह अपनी बिजनेस मीटिंग्स के दौरान प्रयुक्त कर लेती थी। जीवन में बहुत सारे संबंध ऐसे होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता। बहुत बार मुझे लगता था शोभा केवल एक विरक्त तपस्विनी-सी थी जो केवल देना जानती थी लेना नहीं। वह लुटा रही थी अपना धन, अपना विश्वास...मेरे जैसी अनजान मित्र पर...या दादा जैसे अव्यवस्थित डायरेक्टर पर। फिर भी उसकी आत्मा में अजीब सी स्थिरता थी, एक शाश्वतता। और उसकी उस शाश्वतता की दीप्ति हम तक पहुंचकर हमें भी आस्थावान बना रही थी।

‘पंचवटी‘ की पटकथा, डायलॉग लिखने के लिए दादा और शोभा को मैं अपने फार्म पर ले गई थी। दादा को जगह इतनी पसंद आई कि मुझे उन्होंने इमोशनली ब्लैकमेल कर लिया कि ‘‘बस यहीं बनेगी फिल्म। इससे बढकर लोकेशन और कहाँ मिलेगी।‘‘

‘पंचवटी‘ के लिए तो मैं कुछ भी करने को तैयार थी। अतः एक बार कथानक के सारे दृश्य तय हो गए तो मैंने अपनी समझ के अनुसार सारे संवाद आदि लिख डाले और पूरा पोथा ले जाकर दादा को पकड़ा दिया, जिसे उन्होंने खोलकर भी नहीं देखा। सुरेश ओबेराय को ‘विक्रम‘, दीप्ति नवल को ‘साधवी‘ और अकबर खान को ‘यतीन‘ के रोल के लिए चुन लिया गया। सारी प्रक्रिया मेरे लिए बिल्कुल नई थी। मेरे व्यक्तित्व का जैसे एक अजीब-सा साइकिक विकास हो रहा था। हम सब पहली शूटिंग के लिए काठमाण्डू पहुंच गए। ‘अकबर के साथ मारी-भारी सूटकेस और एक मेकअपमैन ‘जिम्मी काण्ट्रैक्टर‘ भी था। मैं बार-बार सोचती कि अकबर का अति आधुनिक, अति रूपवान, ग्लैमरस, सोफिस्टिकेटड व्यक्तित्व ‘यतीन‘ के चरित्र में कैसे फिट बैठेगा पर दादा ने उसे अपने तरीके से अपने सांचे में ढाल लिया। पहले कुछ दिन तो हम सब एक दूसरे से पहचान बना रहे थे-दादा अपने ढंग से और मैं अपने ढंग से अपनी चरित्रों की मानसिकता के बारे में उन्हें समझा रही थी। अब उन्हें उनके डायलॉग पकड़ाने थे, परन्तु ‘सीन‘ चुनने के समय दादा ने सभी कुछ बदल डाला। हर डायलॉग को वह पहले बंगाली में बोलते फिर हिंदी में और मुझे उसे फेरबदल करके दोबारा लिखना पड़ता। मैं नये सिरे से संवाद लिखने बैठ जाती। विडम्बना यह थी कि दृश्यों के भीतर अब अचानक आकर जुड़ गया था कर्मसिद्ध जी, का एक नया किरदार जिसे अपने कथानक से जोड़ना था। उन दिनों ‘फोटोकापी‘ जैसे कुछ नहीं था। अतः पूरी-पूरी रात मैं सीन लिखती रहती और सुबह उठकर अपने चरित्रों को देती थी। खैर जब हमें पहले दिन शूटिंग करनी थी, मैं दादा के साथ दीप्ति और सुरेश को भी पशुपतिनाथ के मंदिर ले गई। मेरी ज़िद थी कि भगवान के दर्शन किये जायें। दादा तो आस्तिक नहीं थे-भगवान उनके लिए बस नाम-भर था और प्रतिमाएं मंदिर की कलात्मकता का एक अंश जैसा बस। प्रसाद के दोनों को हाथ में लेकर जब हमने मंदिर मे प्रवेश करने का प्रयास किया कि अचानक पेड़ पर से कूदकर अनेकानेक बंदर हमारे हाथों से दोने खेंचकर ले गये। दादा ने मेरा मजाक बनाया। परन्तु मैं बेहद चुप, या शायद उदास मात्र, केवल भगवान के दर्शन करके लौट आई थी। मुझे अपनी फिल्म के लिए आशीर्वाद चाहिए था क्योंकि अपनी निजता में मेरे लिए मेरा अध्यात्म, मेरा भगवान ही मेरा एकमात्र  सहायक होता है, उसके बिना मेरी आत्मा को आश्वासन ही नहीं मिलता, कहीं भी। परन्तु कुछ नया स्थितियाँ न चाहते हुए भी स्वीकारनी पड़ती हैं।

दादा, शूटिंग के दौरान बहुत नियन्त्रण बरतते थे, समय की पाबन्दी का विशेष ध्यान रखा जाता था और उन दिनों किसी को भी शराब को छूना भी मना था। हमारे चरित्र कोई मेकअप नहीं करते थे, खासकर दीप्ति। जो जैसा है, उसे वैसा होना है-दादा का विश्वास था-अलंकारविहीन वास्तविकता जो जीवन का सबसे बड़ा गुण है, वही सौन्दर्य है। शूटिंग के दौरान बाधाएं आने पर दादा बेझिझक हर किसी को डांट देते थे-हाँ यह तो था कि, उस समय उनकी भाषा विकृत हो जाती थी और चेहरे की समूची नसें खिंच जाती थीं, हिंसक पशु-सा उमगता चेहरा, जिस पर कुछ था जो मैं पढ़ना चाहती थी, शायद उनका ‘ऐनीमल इन्सटिन्क्ट‘ जो उस व्यवहार के समय उछलकर उनसे बाहर आ जाता था। वह जिसे चाहे चाँटा भी मार देते थे। उस समय मेरे मन में रिंकी का लिखा हुआ लेख कौंध जाता था। जहां एक ओर उनका चिंतन मुझे प्रभावित करता, दृश्यों के विश्लेषण का सलीका तार्किक गलता था, वहीं दूसरी ओर उनका क्रूर व्यवहार मुझे आश्चर्य में डाल देता था। विवाह को लेकर हमने जितने भी संवाद लिखे उनमें संबंधों की सूक्ष्म पकड़ थी- ‘जितने विवाहित जोड़े हैं...मुझे तो जुड़े हुए नहीं लगते‘ या फिर ‘शादी-ब्याह के मौकों पर मैं बहुत अकेला हो जाता हूँ।...‘ दिप्ति का अकबर के साथ किया गया दृश्य-एक क्राफ्ट जैसा था जिसमें यौन इच्छाओं के बीच दीप्ति की दो गहरी उदास, अतृप्त आँखें सारे दृश्य को संवेदना से सींच जाती थीं। एक कुशल चितेरे-सी थी दादा की कल्पना। कुछ दृश्यों में वह खुद कैमरा सम्भाल कर शॉट लेते थे। इतने महीन सूत्र को पकड़ते कि आश्चर्य होता था। एक पूरे के पूरे दृश्य में उन्होंने सुरेश ओबेराय को केवल पौधे के मकड़ी के जाले को साफ करते दिखाया गया था, ‘बोन्साई‘ (बौने) वृक्षों को दर्शाया था। किसी भी कृति का एक निश्चित-सा मतलब नहीं होता, उसमें ढेर सारे सूत्र होते हैं, व्यावहारिक इकाइयाँ होती हैं-पता नहीं दादा कौन-सी बौद्धिक एक्सरसाइज करते थे कि परत-दर-परत गहरा जाकर मानवीय संवेदना की ऐसी एक अद्भुद् सम्भावना को उकेर लाते जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। दीप्ति का एक संवाद देखेंः

‘‘जिस कोमलता से तुम्हारी उंगलियाँ मेरे शरीर को छूती हैं वैसे कहीं अगर मेरे मन को छू पातीं, यतीन।‘

‘तो, तो क्या होता साधवी?‘ यतीन कहता।

‘तो तुम जान पाते यतीन कि मैं शरीर ही नहीं मन भी हूँ...‘ कैमरा साधवी के माथे पर पुंछे हुए सिंदुर पर टिक जाता या उसकी आँखों में झलमलाए आँसूओं पर।

एक दिन मैंने दादा से कहा, ‘दादा, साधवी जब भी विक्रम की ओर देखती है, तो, उसे उनमें हिमालय जैसी विशालता का अनुभव होता है...।‘

बस दादा दूसरे ही दिन फ्लाइट लेकर कैमरा संभाले, हिमालय के अनिवर्चनीय सौन्दर्य को कैमरे में बंद करने चल पड़े। काडमाण्डू से एक खास फ्लाइट जाती थी सुबह-सवेरे जो हिमालय के सारे शिखरों-कंचनजंगा, कैलाशमाउंट एवरेस्ट आदि के बहुत निकट तक ले जाती थी। एक घंटे में उन दुर्लभ पहाड़ियों को देखा जा सकता था। उस फ्लाइट में फोटोग्राफी की अनुमति थी। मेरी बहुत इच्छा थी उनके साथ जाने की परन्तु फिल्म का खर्चा अधिक न हो इस कारण उन्होंने मुझे छोड़ दिया जबकि टिकट केवल सात सो रूपये की थी और वह खर्चा मैं करने को तैय्यार थी। परन्तु मेरे स्थान पर वह अपने साथ अपने बेटे आदित्य को बतौर फोटोग्राफर ले गये। मैं सन्न रह गई थी। शोभा उन दिनों काठमाण्डू में नहीं थी। मैं चुपचाप कमरे के अकेलेपन में जाकर रोती रही।

आदित्य के साथ संजना कपूर (शशिकपूर की बेटी) भी एक ही कमरे में रह रही थी। अभी तक उनका विवाह नहीं हुआ था। दादा संजना की बहुत तारीफें किया करते थे। वह उन्हें बड़ी सुलझी हुई और प्रबुद्ध लगती थी। कहते थे, ‘उसकी और मेरी आदतों में अजीब-सी साम्यता है, एक जैसी कैमिस्ट्री है हमारे शरीरों की, तभी तो वह भी सुबह उठ जाती है और मैं भी तो सूर्योदय से पहले उठ जाता हूँ...‘ बहुत सुबह उठकर सूर्योदय को देखना दादा के लिए जीवन का एक विशिष्ट पहलू था जिसका चित्रण उन्होंने फिल्म में भी कुशलता से किया था। दिल्ली में वह विक्रम के चरित्र के लिए सुरेश को सुबह-सुबह उठकार ओस से भरे लॉन में चक्कर लगवा डालते। सुरेश चिल्लाता-उसकी नींद खराब होती थी। लेकिन दादा को उसके चरित्र-चित्रण के लिए वह एक आवश्यक दृश्य लगता था।

सूर्योदय, घास और ओस के साथ-साथ प्रकृति के रंग, फूल, पक्षी, झरने के पानी की हर लहर दादा को भीतर ही भीतर एक उत्फुल्लता से भरती थी। वह अकेले ही कैमरा लेकर उन्हें फिल्म में उतारते, फार्म के मालियों से बड़े प्यार और अपनेपन से बात करते थे। फिल्म के लिए सुरेश को पकड़ लाते। एक दृश्य में उन्होंने जहां दीप्ति को फार्म पर बने मचान पर पेंटिंग करते दिखाया, वहीं सुरेश को वृक्ष की जड़ में अटके जाले को साफ करते हुए चित्रित किया। मचान पर ही मित्र के साथ बैठकर कविता कहने का आइडिया भी उनका था। पता नहीं दर्शकों को वैसे बारीक चित्रण कैसे लगे थे-मेरे लिए वह सामान्यता से पृथक थे। 

‘धुलीखेल‘ में हज़ारों टहनियों, सूखी पतली डंडियों में गड्डमड्ड वह बेहद रोचक वृक्ष साधवी की मानसिकता के उलझाव, के मनोवैज्ञानिक द्वन्द के प्रदर्शन के लिए एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ था ऐसा मेरा मानना है। ऐसे दृश्यों में घुमड़ते बादल, बुझती हुई रौशनियाँ संवादों से कहीं अधिक सशक्त हो जाती थीं।

‘पंचवटी‘ के नाम को दादा बदलना चाहते थे और मेरे बहुत प्रयास करने पर भी वह दृश्य जो फिल्म के नाम को औचित्य दे सकता था, उन्होंने नहीं फिल्माया। अपनी उसी सैडिस्ट मानसिकता के तहत मेरे न चाहने पर भी यतीन 

द्वारा साधवी को पिटवाया। मैं साधवी के चेहरे पर नील लिए उसे देखती तो सिहर जाती तो फिर प्रतिक्रिया स्वरूप साधवी का यतीन को थप्पड़ मारना भी कहीं मेरे साथ साधवी के आत्मसम्मान को गौरवान्वित कर गया। दादा की हर फिल्म में नायिका का नाम ‘मानसी‘ होता था, यहाँ भी वह यह नाम बदल डालते, अगर वह नाम ‘साधवी‘ न होता तो। पूरी फिल्म के निर्माण के समय मैं क्या नहीं थी-लेखिका, सैट डिजाइनर, कमरों में चादरें बिछवाती, गमले लगवाती, फूलदानों में फूल सजाती ‘हाउस कीपर‘, खाने भी बनवाती। यहाँ तक कि दीप्ति ने बहुत-से दृश्यों में मेरी साडियाँ, मेरे गहने पहने थे। फिर भी मुझे उसके लिए कोई क्रेडिट नहीं मिला था। मैंने भी तो कोई प्रमाण-पत्र नहीं साइन किया था जो वह मुझे किसी खास कैटेगरी में रखते। दादा के इस कुचलने वाले व्यवहार, सैडिज़्म से मैं परिचित हो चुकी थी, पर मैंने यह नहीं सोचा था, वह उसे मेरे ही लिए प्रयुक्त कर लेंगे। मैं जो बिना किसी ईगो के कभी उनकी कविताओं का हिन्दी अनुवाद करती, कभी उनकी नयी फिल्म ‘आस्था‘ की पटकथा लिखती। मुझे अपने लिए चाहिए भी क्या था? ‘पंचवटी‘ से जुड़ा एक नाम, जिसे आज तक मैं एक चित्रकार की तरह पूरा का पूरा उकेर चुकी थी। मेरे ही आत्माभिमान को कुचलकर दादा ने मुझे ही एक मौन निर्वासन की सजा सुना डाली। फिल्म में मेरा नाम ही खो गया। साहित्य अकादमी के सभागार में एक सेमिनार था ‘साहित्य और सिनेमा,‘ दादा ने उसमें पूरा एक पर्चा पढ़ा था। मैं जो सभागार में दम साधे बैठी थी-मेरे लेखन, मेरी ‘पंचवटी‘, मेरी ‘फिल्म‘ का उस पर्चे में कोई जिक्र नहीं था। मुझे मानना पड़ा कि यह इतना संवेदनशील-निर्देशक, जो कुरेद-कुरेदकर कहानी को छोटे-बड़े पुट देकर फिल्म में मानवीयता को स्थापित करता है-मनुष्यता से, मानवीयता से दूर फासले पर बैठा कोई अजनबी है जिसे मैं नहीं जानती। मुड़कर देखती हूँ तो भारत की प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के शव के निकट घंटो खड़े बासु भट्टाचार्य का चित्र सामने आता है या दीप्ति की बीमारी के समय अस्पताल के गलियारे में, अकेले खड़े बासु भट्टाचार्य का चित्र सामने आता है। या अभी अपनी डायरी के फड़फड़ाते पन्नों पर लिखी उनकी ‘श्मशान‘ फिल्म पटकथा के साथ यह सब याद आता है जहाँ मैं या शोभा चोट खाकर मन पर बोझ लिए चुपचाप बैठे रह जाते थे। पता नहीं दादा भावनाविहीन सूखा हुआ रेगिस्तान थे या बादलों को छूते हुए हिम-शिखर-जहाँ काठमाण्डू के परिवेश में ‘येती‘ निवास करते है। पंचवटी फिल्म मेरे पास है, वह सब कुछ उसमें है जो एक कुशल निर्देशक को चाहिए था चित्रित करने के लिए। परन्तु उसके पीछे एक परछाई है अचित्रित...समानान्तर चलता है एक व्यक्तित्व जो किसी मौन के महाशून्य में जा समाया था।

ताशकंद में जब पंचवटी का ‘पैनोरमा फिल्म फेस्टिवल‘ (1989) चल रहा था, शोभा और मैं दोनों ही मौन, उस उपेक्षा और अपने प्रति अजनबी बर्ताव को झेलते चुपचाप चले आये थे। बात ताशकन्द की है, एक दिन दादा को अनुराधा तालुकदार के साथ कहीं जाना था। एक कार की व्यवस्था की गई थी। शोभा और मैं भी उस कार में जा कर आराम से बैठ गये परन्तु हमें उतार दिया गया और वह दो कौड़ी की एअर होस्टेस जिसे दादा ने बंगाली होने के कारण सुरेश की पत्नी के छोटे-से रोल के लिए चुना था, फर्राटे से दादा के साथ कार में बैठकर हमारे ही सामने से चली गयी, जाने कहाँ? बस उसी रात शोभा और मैं अपना टिकट कटाकर दिल्ली लौट आये थे। यान मे बैठी मैं अंधेरे आकाश में डूबते हुए सितारों को देखकर सोच रही थी, कुछ लोगों में भविष्य की सोच के लिए कोई जगह क्यों नहीं होती? क्यों इतने संकुचित हो जाते हैं मन और मस्तिष्क, क्यों?

दादा ‘आस्था‘ बना रहे थे। उन्होंने मुझे फोन भी किया था। उनकी आवाज में ‘आस्था‘ की कहानी मेरे टेप में है परन्तु मैंने उसे लिखने से इनकार कर दिया। उस कहानी को लिखना तो दूर मुझे छूना भी पसन्द नहीं आया था। फिल्म जैसी भी बनी थी उसमें अंकित दादा के पेड़-पौधे और बालकनी की कलात्मकता मुझे अच्छी लगी थी। हाँ, मैं उनके साथ ‘श्मशान‘ अवश्य बनाना चाहती थी या फिर अपने उपन्यास, नाटक ‘रेखाकृति‘ पर एक फिल्म। सारी कटुताओं के बावजूद उनके साथ काम करने का एक अपना बौद्धिक- नशा था। परन्तु ‘श्मशान‘ के सपने देखने वाले दादा फूलों, पंछियों, तितलियों.. मौसम सभी को पीछे छोड़कर अस्पताल में अपने किसी गहरे घाव की फफूंद को उकेरते, महापीड़ा से जूझते एक बेहद सुरक्षित चुप्पी, गहरे मौन के 

धरातल पर विलीन हो गए...रह गया बस ‘आरकाइव्स‘ में कुछ फिल्मों पर लिखा एक नाम, रेंगती हुई लिपियों में लिखा एक शिलालेख, जहाँ ‘पंचवटी ए फिल्म बाई बासु भट्टाचार्य...और अदना-सी मैं कहीं अपनी दबी स्मृतियों में गुम कागज की चंद सतरों के बीच उनकी गंध, उनके शब्द-यह कविता ढूंढ पाई हूँ जिसे हमने साथ-साथ लिखा था-

जीवन का सागर-प्यार का प्यारा 

एक द्वीप न्यारा-जीवन के सागर में 

प्यार है प्यारा-इक द्वीप न्यारा 

मन है कोलम्बस-चेतना का कम्पस

यौवन की नैया-चाहत खिवैया 

खोजता द्वीप न्यारा-प्यार का प्यारा 

लालसा की लहरें-आहटों की आंधी 

जख्मों के पहरे हैं-शिकवों की शादी

प्रेरणा के पाल में-पवन पुरवैया

प्यार का एक द्वीप तो, था, है रहेगा 

लेकिन कहाँ था, कहाँ है, या होगा 

ये न कोई जाने, पर कभी जानें

घुटन के घेरे में-घुट-घुटकर जीकर 

नसीहत के नमकीन-पसीने को पीकर 

न ऊबता, न डूबता, चेतना का कोलम्बस

भारत न पहुँकर, अमरीका पहुँचता 

ऐसा भी होता है-तन-मन को खोता है

जब प्यार के प्यारे-आ टिकते आखिर 

कर्तव्य के किनारे-जीवन के सागर में

यह दादा श्री बासु भट्टाचार्य के जीवन का यह एक छोटा-सा अंश है-कुछ थोड़े-से वर्षों का, हो सकता है यह उनकी तस्वीर का वह रंग न हो जो वास्तव में था और जिसके बारे में मैं नहीं जानती। ये नितान्त मेरे अपने निज के अनुभव है-जिन्हे मैंने उनके सान्निध्य में जिया था। मेरे मन के उस कोने की अमूल्य धरोहर, जहाँ, एक ओर मैं उनकी प्रबुद्धता, उनकी अद्भुत ज्ञानशक्ति, पैनी सोच के साथ-साथ उनकी संघर्षमय जीवन यात्रा, उसकी उपलब्धियों के सम्मुख श्रद्धा से सिर झुकाए खड़ी हूँ...या कभी उनके अमानवीय व्यवहार के पशुत्व से आहत गहरी उपेक्षा के उत्पीड़न के दर्द की टीस को चुपचाप अकेले में सहती हूँ। यह धरती...ग्रह-नक्षत्र...विरोधाभास, सभी कुछ तो है...जताने के लिए कि ‘चेतनाका कोलम्बस‘ जाने कही भी जाये किसी भी विदेशी धरती पर-पर वह, कभी वास्तविकता के धरातल तक नहीं पहुंचता, कभी नहीं। -डाॅ कुसुम अंसल, विश्रांति 26, फिरोजशाह रोड़, नई दिल्ली

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कहानी

मेरे आशिक का नाम



ऑफिस से उठकर, पार्किंग तक चली आती हूँ, चाबी से अपनी बड़ी-सी गाड़ी का दरवाज़ा खोलती हूँ, तो हवा के झोंके-सी नीलू गाड़ी की अगली सीट पर आ बैठती है, ‘‘हाय मम!‘‘ “हाय....कैसा रहा स्कूल?” “फाइन।‘‘ मैं गाड़ी चालू करती हूँ ‘फ्रैशनर‘ की नीली शीशी हिलती है और सुगन्ध का ताजा झोंका आ टकराता है। नीलू की अँगुलियाँ प्लेयर के स्विच को ऑन कर देती हैं, “लो आज हमने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उम्मीद अब न कभी गिला करेंगे किसी से हम।‘‘ ‘हाँ ठीक तो है‘ मैंने सोचा, बीते हुए को यादों में क्यों घसीटा जाए...अब क्या गिला...किससे गिला...?

“ओह मम‘‘ नीलू कहने लगी, “आपका म्यूजिक पता नहीं कौन सी सेंचुरी का है, सुनो तो कांस्टीपेशन हो जाता है...प्लीज...,” और वह कैसेट प्लेयर का स्विच बन्द कर देती है। 

“नहीं, मेरे म्यूजिक को तुम बन्द नहीं कर सकती 

नीलू...कम-से-कम अपनी कार में तो अपनी पसन्द जी सकती हूँ...,‘‘ मैं म्यूजिक चला देती हूँ।

‘‘डोंट बी सेंटीमेण्टल मम...‘‘ ‘‘नहीं मेरी भावुकता इतनी बेमानी नहीं है नीलू...।‘‘

“ओ.के...ओ. के. मम... आपके चेहरे पर ये नाराजगी अच्छी नहीं लगती। पापा कहते हैं ना।‘‘ वह हँसती है...जानते हुए भी कि उसका वाक्य बेकार है।

“मम, कभी-कभी क्या, अक्सर मुझे लगता है आप और पापा एक-दूसरे को प्यार नहीं करते।‘‘ उसने सीधे ही पूछ लिया।

आजकल के बच्चों में एक खास बात है, बेझिझक बड़े से बड़ा सच कह जाते हैं-वह सच, जो सात पर्यों में छुपा होता है और जिसे कहना इतना सरल नहीं होता। मैंने चैंककर देखा, पन्द्रह साल की मेरी छोटी-सी नीलू अपने कटे हुए बालों से घिरे साधारण से चेहरे पर अपनी दो उत्तेजित-सी आँखों से मुझे घूर रही थी। उसके दाँतों के बीच अधखायी च्विंगम फँसी हुई थी।

“तुम प्यार की डैफिनेशन जानती हो नीलू? प्यार क्या होता है बता सकती हो?‘‘

“हाँ मम‘‘ उसके निडर चेहरे पर कुछ भी गुलाबी नहीं था, “प्यार, आई मीन लव, इज एक्साइटमेण्ट...थ्रिल, किसी को चाहना यानी कि सारा दिन उसके सपने देखना और शाम को उसके साथ घूमना, डांस करना...एक्साइटिंग...है न मम...पर आप तो शाम को आती हैं तो बिलकुल थकी हुई होती हैं, कोई एक्साइटमेण्ट नहीं होता। मशीन की तरह काम करती हैं, ऑटोमैटिक, खाना बनाया, टी.वी. ऑन किया, आपने खाना मेज पर रखा, फिर डिशवाशर में बर्तन डाले, नाइटी पहनी और ‘गुडनाइट‘, बस सो गए...। आपको पता है मम, इतने सालों में आपने मुझे ‘गुडनाइट-किस‘ भी नहीं किया...आप कितने सालों से यहाँ हैं मम...यहाँ लंदन में... पर जैसे यहाँ नहीं रहती...रहती हैं अपने इण्डिया में...मेरठ जैसे छोटे किसी शहर में जो वर्ल्ड मैप में ढूँढ़ा भी नहीं जा सकता।‘‘

“सच नीलू, मैं मशीन हूँ...सॉरी बेटा...अच्छा किया बता दिया, कोशिश करती हूँ इन्सान हो जाऊँ।‘‘ और मैं डैश बोर्ड पर टिके उसके पतले से हाथ को मुट्ठी में दबाकर होठों तक ले आती हूँ।

“नो मम,‘‘ वह मेरा हाथ झटक देती है, “जब प्यार ना आता हो तो नहीं करना चाहिए...आर्टीफिशल...कुछ भी नहीं चाहिए मुझे...वैसे ही जैसे आपको कागज के फूलों से चिढ़ है।‘‘

“पर मैं तो तुम्हें सच में प्यार करती हूँ, बेटे, कितना मर-मरकर पाया है तुम्हें... तुम मेरी एक ही तो बेटी हो!‘‘ 

“बस-बस रहने दें मम...अब मैं बड़ी हो गई हूँ...सब समझती हूँ...आप हमें प्यार नहीं करती क्योंकि दरअसल आपको अपने से चिढ़ है तभी तो काम में इतना डूबी रहती हैं कि अपना कुछ भी याद ना आए...ऑफिस, उसकी इंगेजमेण्ट्स बस और कुछ नहीं...और पापा भी तो कितना ट्रैवल करते हैं।‘‘

“उनका काम ही ऐसा है...सेमिनार आदि के लिए जाना ही होता है।‘‘ मैंने समझाना चाहा।

“अच्छा मम, आप इतना क्यों पढ़ती हैं, इतनी किताबें तो कोई नहीं पढ़ता, नैंसी की मदर तो नहीं पढ़तीं-रंजीता मासी या सीमा आंटी कोई भी नहीं।‘‘ 

“सबका अपना-अपना शौक है नीलू...मुझे किताबें फैसीनेट करती हैं, लगता है सब कुछ इन्हीं के माध्यम से मिलेगा। तुम भी तो पढ़ती हो काफी...किताबों ने ही तो तुम्हें इस सोच के काबिल बनाया है जो बात आज तुम मुझसे कर रही हो।‘‘ 

अब तक बाहर बारिश होने लगी थी, मेरे सामने के शीशे पर पानी की बौछारें बहुत-सी नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में जमा हो रही थीं, सामने कार की पड़ने वाली रोशनी से वह बूंदें हजारों ज्योतित छोटे-छोटे गोलों में बदल रही थीं और आँखों को कौंध रही थीं जिससे कार चलाने में दुविधा हो रही थी।

“मम वाइपर चलाएँ ना...फिर खो गईं आप? आपकी ये पथरीली चुप्पी, ओह गॉड...‘‘ 

मैंने झटके से वाइपर चला दिया था। वाइपर खट्-खट् की आवाज़ के साथ अपने हाथ फैलाकर चल पडा था। ज्योतित उन पंजों को कभी एक ओर धकेलता कभी दूसरी ओर, जैसे अनवरत बह रहे आँसुओं को कोई पोंछे दे रहा था। मैंने नीलू की तरफ देखा, वह मुझे भावनाओं की एक लम्बी सीढ़ी चढ़ाकर खुद खटाखट उतरकर किसी फैशन पत्रिका के पन्नों में डूब गई थी और अब अपने ‘मैं‘ का निर्णय मुझे खुद लेना था। उसके चेहरे पर मुझे अपने चेहरे का साम्य कभी दिखाई नहीं पड़ा था। जब भी मैं उसमें अपनापन ढूँढती हमेशा एक विपरीतता वहाँ पसरकर पड़ी होती थी। बुआजी कहती थीं, “बुआ-बेटी का खून एक जैसा होता है, माँ-बेटी का नहीं...तभी तो टुन्नी मेरी जैसी है, साँवली सलोनी माँ का रूप तो लिया ही नहीं बेचारी ने।‘‘

बुआ का सफेद साड़ी में लिपटा विधवा रूप सामने आ खड़ा होता, हर समय काम में व्यस्त बुआ, खाना बनाती, अचार डालती, बड़ियाँ-पापड़ बनाती, कपड़े तहाती बुआ, थकावट से चूर बुझे चेहरे वाली बुआजी...तो क्यों मुझे विरासत में मिला है ये चेहरा, चुप्पी भरा! जिसे नीलू मशीनरी कहती है और उसके पापा, हेमंत, अप्रत्याशित खोने और पाने के सिलसिले में हाथ थामें, जिसे सब विवाह कहते हैं। पहले-पहल उन हाथों की पकड़ में दूरी नहीं थी। मुझे उन दिनों लगता था जैसे एक दिवास्वप्न की मिठास उन उँगलियों में गुंथी थी, परन्तु पता नहीं कब हाथों से फिसलकर अपनापन उँगलियों से दूर होता जा रहा हैं, निरन्तर, दूर बहुत दूर और उस फिसलन के बीच खड़ी नीलू, मुझे एक दर्पण पकड़ाती हुई, जिसमें आज अचानक ढेर-सी विस्मृत अनुभूतियाँ अपने मखमली परिवेश में खड़ी एक आवाज दे रही हैं, हाँ आवाज, “मम...प्लीज रोकिए, घर आ गया है।‘‘

“हाँ, सॉरी,” झटके से कार मुड़कर पार्किंग में रुक जाती है। 

‘‘क्या सोच रही थीं आप...बताइए न?‘‘

“दो बातें नीलू...” कार का दरवाज़ा खोलकर मैं बाहर आ गई थी, अब तक बारिश थम चुकी थी, गीली हवा में खुलकर साँस लेना अच्छा था, “एक तो यह कि तुम बड़ी हो गई हो...प्रेम का अर्थ समझने लगी हो, दूसरी अपने आपको छुपाकर न रख पाने की असावधानी मुझे चैकन्ना कर रही है।‘‘ 

“मेरे बड़े हो जाने की वरी मत कीजिए मम...आई एम वैरी प्रैक्टिकल, मैं आपके जैसी सेंटीमेण्टल नहीं हूँ...मैं अपने आपको लुक आफ्टर करना जानती हूँ मम।‘‘ 

कमरे में घुसते ही नीलू ने टेलीफोन की ‘आंसरिंग-मशीन‘ का बटन दबा दिया। मैं सामान जगह पर टिकाती सुनती जा रही थी, मैसेज थे, “सुनिए...सुनिए...हाँ हम मेरठ से बोल रहे हैं...जी टुन्नी है...उपमा-हेमंत मेहरा...जी टुन्नी को बताइएगा उसके दादाजी का देहान्त हो गया है...मनमोहन बाबू का...‘‘ 

“दादाजी,” उसके हाथों की मुट्ठियाँ तनने लगीं-आँखें लाल हो आई..., “मर जाने दो उन्हें...।‘‘ 

“सॉरी मम...” नीलू ने सांत्वना दी, “बहुत बूढ़े होंगे वह तो, हमने तो उन्हें कभी देखा ही नहीं...आप कभी लेकर ही नहीं गईं अपने मेरठ...खैर, पानी लीजिए, प्लीज रिलैक्स,‘ नीलू ने पानी का गिलास होंठों से लगा दिया और मैं गटागट पी गई। 

“नीलू...मैं तुम्हें एक फोन नम्बर देती हूँ, गिरधारी चाचा का, उन्हें फोन मिला दो।‘‘ मैं बेडरूम से झटपट डायरी ले आयी हूँ। नीलू फोन मिलाती है। मैं काँपते हाथों से चोगा पकड़ती हूँ, “हाँ हौन, प्रेमा चाची, अच्छा बिन्दू भाभी...जी मैं टुन्नी, उपमा बोल रही हूँ, लन्दन से...जी, भाभी, हाँ, आप लोग मेरी प्रतीक्षा न करें, संस्कार कर दें, मैं आऊँगी, हाँ...आऊँगी, क्रिया की रसम तक पहुँचने की कोशिश करूँगी...।‘‘ 

नीलू मुझे कमरे में पहुँचा देती है। मैं ऑफिस के कपड़े उतारकर हलकी-सी नाइटी डाल लेती हूँ। नीलू चाय का प्याला थमा जाती है, “चलिए मम्मी, रिलैक्स, बिस्तर में बैठिए, और डोंट वरी, ओल्ड मैन हैड टु डाई, क्या उम्र होगी उनकी?‘‘ 

“शायद नब्बे या नाइंटी फाइव...जब मैंने हिन्दुस्तान छोड़ा था तब वह साठ के थे, पर बहुत स्ट्रांग, बड़ी प्रभावशाली परसनैलिटी थी उनकी।‘‘

“और आपके पापा?‘‘

“अपने पापा और माँ को मैंने देखा ही नहीं, बुआ बता रही थीं कि कार एक्सीडेण्ट में वे दोनों चल बसे थे...बस बुआ ही मेरे लिए सब कुछ थीं।‘‘

‘‘तब तो आपको जाना चाहिए मम...आप उनकी अकेली ग्राण्ड डॉटर हैं... आपको ही करना चाहिए उनका फ्यूनरल...।‘‘

“नहीं, नीलू...लेट इट बी ओवर...मैं बाद में चली जाऊँगी...जरा खिड़की खोल दे नीलू, मेरा दम घुट रहा है।‘‘ 

नीलू ने खिड़की खोल दी, फुदककर एक कबूतर खिड़की की चैखट पर आकर बैठ गया। 

‘‘चीअर अप मम्मी, देखिए आपका ‘एंजिल‘ आ गया।‘‘ नीलू मुड़कर चली गई। मैंने अपनी प्लेट में से एक बिस्कुट उठाकर ‘एंजिल‘ को दिया, वह चोंच में दबाए मुझे देखता रहा फिर खिड़की के चैड़े पट्टे पर आराम से बैठ गया। मुड़-मुड़कर कभी मेरी तरफ देखता कभी अपनी झिल्लीयुक्त आँखों से मुझसे कुछ प्रश्न करता...पता नहीं क्या सम्प्रेषित हो रहा था उन आँखों से? पर कुछ था जो मुझे मेरठ की नौचंदी तक लौटा रहा था...और मुझे याद आ रहा था वह कबूतर जो “यमपुरी-नाटक‘ के अन्तिम दृश्य में दम तोड़ता फड़फड़ा रहा था। 

वह एक छोटा-सा कामचलाऊ हाल था जिसकी दीवारें कच्ची लकड़ी की बनी थीं। उसके एक भाग में एक मंच बना था और मैली फटी दरियों पर चवन्नी वाले बैठे थे, पीछे की थोड़ी सी बेंचों पर हम। एक बौना जो बाहर जोकर बना टिकट बेच रहा था, वही टिकट बेच लेने के बाद रामनामी चादर ओढ़े सूत्रधार बना मंच पर स्वर्ग-नरक की परिभाषाएँ समझा रहा था। उसका विचार था कि स्वर्ग तो किसी को प्राप्त नहीं होता, नरक ही अगर मिलता है तो क्यों न उसका नजारा कर लिया जाए। मेरे साथ तमन्ना, हयात और सलमान भी थे। मंच पर परदे बदलते थे-पहला दृश्य एक तेल भरे कड़ाहे का था जिसके नीचे आग जल रही थी, कड़ाहे में उबाले जा रहे थे कुछ स्त्री-पुरुष जो चीख रहे थे, चिल्ला रहे थे, उनके साथ-साथ पर्दे के पीछे से यमदूतों की वीभत्स अट्टहास को भी सुना जा सकता था। बौना सूत्रधार दार्शनिक मुद्रा में बताता था कि सजा पाते ये सब स्त्री-पुरुष और कोई नहीं, झूठे, धोखेबाज और चोर ही नहीं चरित्रहीन भी थे। 

मंच पर एक के बाद एक दृश्य बदलते थे। कभी मंचित होता था कि कुछ मनुष्यों को दीवारों में चुनवाया जा रहा है जिसके साथ बौने की रनिंग कमेण्ट्री भी कम दिलचस्प नहीं थी। “देखिए भाइयो, यह आदमी रण्डीखोर है, अपनी सती-सावित्री औरत को छोड़कर इधर-उधर मुँह मारता घूमता है।‘‘

चवन्नी वाले जोर-जोर से हँसते और सीटियाँ बजाते, उनके साथ लम्बे दाँत दिखाते हुए नरक के दूत भी हँसते, कहकहे लगाते। अगला चित्र परदे पर नहीं था, नंगी स्त्री का एक पुतला था जिसके सिर पर एक दाँतों वाला आरा था। औरत को दोनों ओर से पकड़े थे दो वीभत्स से यमदूत-‘ही ही ही...‘ सूत्रधार बौना फिर ठहाका लगाता है, “यह बेवफा औरत है, इसके दो टुकड़े कर दिए जाएँ।‘‘ 

मंच पर आरा चलने की एक अजीबोगरीब प्रक्रिया आरम्भ हुई और स्त्री के पुतले के दो कटे हुए भाग धड़ाम से धरती पर गिर पड़े थे। दर्शकों ने देखा, लकड़ी के पुतले से बहता लिसलिसा लाल खून स्टेज पर फैलता हुआ। चवन्नी वालों की तालियों से हाल गूंज रहा था और बौना कह रहा था, “देखो बेवफा होने का अंजाम।‘‘ भयानक यमपुरी हँसी, टूटी गर्दन वाला फड़फड़ाता कबूतर। मेरे भीतर एक कौतूहल मिश्रित क्रोध थर्राने लगा था। ‘चलो टुन्नी निकल चलें यहाँ से...,” तमन्ना ने कहा था और बिना कुछ बोले मेरे काँपते जिस्म को बेहोशी से बचाता सलमान बाँहों में समेटकर बाहर ले आया था।

“एंजिल, तुम्हें पता है, दादाजी को क्या सजा मिली होगी?” मेरे मन ने पूछा, “तुम तो यमपुरी नाटक के चश्मदीद गवाह हो,‘ मैं तो इतने वर्षों से कभी रोई भी नहीं थी, अतः वैसी ही निर्विकार बैठी कबूतर के उड़ जाने की प्रक्रिया देखती रही। तभी हेमंत आ गए, “ओह तो मर गया वह बूढ़ा, इतनी बड़ी प्रॉपर्टी पर कुण्डली जमाए बैठा था। चलो अच्छा हुआ, तुमसे नफरत करने वाला एक तो कम हुआ, क्यों करता था इतनी नफरत तुमसे?‘‘ 

“इसलिए कि मेरा जन्म उनके अपने इकलौते बेटे के लिए मनहूस साबित हुआ था, वह कहते थे कि मैं माँ और पापा को खा गई हूँ और बस इसलिए उन्हें मेरा सारा वजूद अपना एक अपमान लगता था, जिसे वह सह नहीं पाते थे,‘‘ मैं मशीनी आवाज में बहुत पुराना वाक्य दोहरा गई। 

“और उसके बाद तुम्हारा उस मुसलमान लड़के से इश्क-वह भी तो काफी सेंसेशनल रहा होगा! और वह हादसा, तभी तो आधी मेडिकल की पढ़ाई छुड़वाकर तुम्हें रातोंरात यहाँ फिंकवा दिया गया था। मेरे पापा ने सहारा न दिया होता तो तुम किसी मैण्टल हॉस्पिटल में होती।‘‘

“हजार बार दुहरा चुके हो तुम इस दास्तान को और उतनी ही बार मैं तुम्हें समझा चुकी हूँ हेमंत कि मेरा किसी से भी कोई इश्क-विश्क नहीं था, पर तुम हो कि छोड़ते ही नहीं हो उस बात को।‘‘

“क्यों, प्यार नहीं करती थीं उसे तुम...?‘‘

“इतने साल से किसी को प्यार न कर पाने की सजा ही तो भुगत रही हूँ, अगर कर पाती तो पता नहीं कितना सहना पड़ता मुझे?‘‘ 

“तो अपने हाथ पर लिखा अपने आशिक का नाम मिटा क्यों नहीं देती तुम... जब भी तुम्हें छूता हूँ एक काले बिच्छू-सा घूरता है मुझे, प्यार करते समय लगता है जैसे हमारे जिस्मों के बीच कुछ सरसरा रहा है।‘‘

“तुम्हें पहले दिन ही बताया था हेमंत, ये ‘अल्लाह‘ है उसका नाम नहीं, तुम अपने पाकिस्तानी दोस्त से पढ़वाकर तसल्ली भी कर चुके हो फिर भी छोड़ नहीं पाते। तुम्हें बताया तो था, उस अनपढ़ मीरासी गोदने वाले को ‘अल्लाह‘ के अलावा कुछ लिखना ही नहीं आता था। इससे पहले कि हम कुछ कहते-सुनते उसने मेरी बाँह पकड़ ली। मैं जो मुसलमान नहीं थी ‘अल्लाह‘ के नाम लिखी गई।‘‘

‘‘सुनो उपमा, इसकी प्लास्टिक सर्जरी करवा लो।‘‘

“नहीं, क्यों...सच को झूठ में बदलने के लिए? अब तो मौत के बाद यमपुरी में ही फैसला होगा। देखते हैं उन गुनाहों की क्या सजा होती है, जो इन्सान ने खुद नहीं किए होते?‘‘

“एनी वे, मेरा ख़्याल है, तुम एक ट्रिप मेरठ का लगा ही लो। इससे पहले कि  तुम्हारे चाचा...रिश्तेदार सब कुछ हड़प लें, वहाँ जाकर सारी प्रॉपर्टी का हिसाब-किताब कर लो...‘‘

“मुझे उस प्रॉपर्टी से कुछ लेना-देना नहीं है।‘‘

“मुझे तो है,‘‘ वह कोनिएक का पूरा गिलास गटक जाता है, “इसी पैसे के लिए ही शादी की तुमसे...नहीं तो...नहीं तो कौन करता तुमसे शादी?‘ वह हँसता हुआ ‘बार‘ में चला जाता है। उसकी हँसी यम देवता के गणों की हँसी जैसी वीभत्स लगती है। मैं जानती हूँ, क्यों ये नाटक मेरे कुछ कमजोर पलों में दोहराया जाता है, क्यों वह पूरी रात ‘बार‘ के स्टूल पर लटका कोनिएक पीता रहता है। उस समय तक, जब तक. उसके पैर जवाब नहीं दे जाते। नींद उसकी पलकों को पथरीला नहीं बना देती और मैं एक मोटी-सी रकम का चेक उसके पर्स की तह में नहीं रख देती, तब तक। 

सुबह सब सामान्य हो जाता है, वह उतने ही प्यार से नीलू से बोलता है, लाड़ लड़ाता है जैसे सब पिता करते हैं और मैं बस उस पल की ख़ातिर अपने मशीनी खोल में लौटती हुई उसी दफ्तर की ओर चल पड़ती हूँ जिस दफ्तर में मेरा काम रुपयों के ढेर में बदल जाता है। कर्तव्य हमेशा बोझ होता है और मैं वह बोझ कन्धों पर उठाए सालों से इसी रफ्तार से चली जा रही हूँ। आज अचानक लगा कि भगवान का नाम लूँ, किसी मन्दिर में माथा टेक लूँ या वैसा ही कुछ, परन्तु मैंने तो भगवान को कभी याद नहीं किया, क्योंकि मेरे लिए वह एक लोकातीत रहस्य के रूप में था। मेरी उसके हाथ कभी घनिष्ठता नहीं थी, मेरी किसी पूर्णतम अभिव्यक्ति में उसका कोई साथ ही नहीं था-न ही मैंने उससे कभी किसी मार्गदर्शन की इच्छा व्यक्त की थी। मुझे तो अपना ही कुछ पता नहीं था, फिर भगवान को जान पाने का प्रश्न कहाँ उठता था। मैं सिर्फ अपने ऑफिस के काम को मेहनत से करती थी, शायद इसलिए भी कि वह मुझे मेरे अस्तित्व में समाए रखता था। 

मेरठ की वह हवेली अभी भी वैसी ही अकड़ी खड़ी थी जिसे मैं बीस साल पहले मुड़कर कभी न देखने के लिए छोड़ गई थी, पर मैं उस समय भीतर से तटस्थ थी। मैंने सोचा तो था, पर मेरे पैर बिलकुल नहीं काँपे थे और मैं दरवाजे से भीतर आ गई। आँगन का खुला परिवेश उससे जुड़ा बराण्डा और फिर बुआ का कमरा था, जहाँ बुआ अब नहीं थी परन्तु दादाजी के दूर-पार के रिश्ते के भतीजे उनके बेटे-बहुएँ, एक अनजान परिवार से घर भरा था। वह सब मुझे अपनी उपस्थिति से और भी अनमना कर रहे थे। उनकी आत्मीयता आवश्यकता से अधिक मधुर थी पर मैं जैसे उसमें जरा भी दिलचस्पी नहीं ले पा रही थी। इस परिवार का अपनापन मुझे सवालिया बना रहा था, विश्वास करूँ या नहीं? मैं बार-बार सोच रही थी, इन्हें मेरे यहाँ से चले जाने का इतिहास, मेरे देश-निकाले की सजा का कारण अवश्य ही पता होगा। मेरे पलायन की गाथा इस कमरे की दीवारों में बन्द है। यहाँ के पुराने दरबान, माली जो आज भी है। वह, साक्षी हैं कि इतने वर्ष में क्यों लौटी। पता नहीं ये लोग मुझे किस दृष्टि से देख रहे हैं पर उनके व्यवहार की मिठास, अनूठी भारतीयता मुझे लपेट रही थी, हर आने-जाने वाले से बिन्दू भाभी ‘हमारी ननद हैं‘ कहकर मिलवातीं और गिरधारी काका, ‘बिटिया रानी‘ कहकर दुलार करते । प्रेमा चाची के व्यवहार में भी एक दुलार-भरा आह्वान था जो मुझे घेर रहा था। कोई गले मिलता, कोई बच्चा पाँव छूता, कोई कसकर ओली में दबाता। यहाँ एक अपरिचित-सा, अद्भुत छुअन का पुलक था जो मुझे रोमांचित कर रहा था। ऐसा अपनापन तो लंदन में कभी भी अनुभव नहीं किया था, न ही नीलू कुछ जानती है, इस भारतीय शिष्टाचार के बारे में, मैंने सोचा।

तभी प्रेमा चाची ने कहा, “बहुत बीमार रहे बाबूजी, और तुझे देखने की भी बहुत इच्छा थी उनकी, पर बस ख़बर ही नहीं भेजने दी उन्होंने, मैंने तो बहुत समझाया, बिटिया को माफ कर दो, बुलवा लो पर...।‘‘ 

माफी की बात से मेरे कान लाल हो गए मैं चुप रही। कल्पना करती रही कि यदि उनके जीते-जी आती तो पता नहीं क्या होता...क्या? उसकी तो मैं कल्पना ही नहीं कर पा रही थी पर अपमान की वह कथा पता नहीं किस रूप में किस तक कैसे पहँची है? मेरी सोच तोड़ते हुए चाची ने कहा, “शायद मौत का क्षण ऐसा होता है, जब पता चलता है प्रेम कितना है...मौत इन्सान को सच्चाई के किनारे ला खड़ी करती है और जिस प्रेम की आँच जीते-जी नहीं होती वह मृत्यु के क्षण हो जाती है।‘‘

मैं हैरान उन्हें देखती हूँ...वह किस सन्दर्भ में बात कर रही हैं, क्या जानती हैं - वह? मैं फिर सोच के रास्ते चलती अतीत की एक पगडण्डी पर रुककर भटकने लगती हूँ कि, अन्त में अपने ही घर में, मुझे कोई पराया, मेरे ही कमरे तक पहुँचा जाता है। मैं सामान रखवाती हूँ, कन्धे पर का कोट, स्वेटर उतारती हूँ, तभी बिन्दू भाभी एक झटके से मेरी बाँह खींचकर उस पर उर्दू में लिखे ‘अल्लाह‘ को पढ़ती हैं। फिर मुस्कराकर कहती हैं, “अच्छा तो ये है वह नाम...।‘‘

मैं हतप्रभ उसका चेहरा देखती रही जिस पर अनेक हाव-भाव आ-जा रहे थे। “प्लीज बिहेव योर सैल्फ...,” मैंने बाँह को साड़ी में लपेटते हुए कहा और बाथरूम में चली गई। बहुत देर तक गर्म पानी में नहाती रही पर मेरा मन उस घटना के आसपास भटकता रहा जो इतने वर्ष पहले इस स्थान पर ही घटी थी पर आज भी उतनी ही जीवन्त है जितनी तब थी। 

तमन्ना मेरी बहुत प्यारी सहेली थी-बहुत साधारण से चेहरे वाली तमन्ना, बहुत मजाकिया स्वभाव की थी। हम दोनों की खूब घुटती थी। पहली क्लास से लेकर कॉलेज तक हमारा साथ बना रहा था। उन्हीं दिनों तमन्ना का एक चचाजाद भाई सलमान यहाँ के मेडिकल कॉलेज में पढ़ने आ गया था। हम दोनों उसके भव्य व्यक्तित्व, बम्बइया स्वभाव से खूब डरते रहते थे। वह भी हमेशा हमारे कस्बाई मेरठ की बुराइयाँ करता रहता था। उसके सामने हम एक हीनभाव में जकड़े रहते थे, पर फिर धीरे-धीरे उसे हमारा सब कुछ, व्यवहार, रास आने लगा और फिर धीरे-धीरे हमारी मित्रता पनपने लगी। पहली बार हम उसे ‘नौचंदी‘ दिखाने ले गए वह बहुत प्रसन्न रहा। उसे लगा, जैसे वह बम्बई के स्टूडियो के किसी फिल्मी सेट पर आ गया है। फिर उसे हम लोग पकड़कर ‘यमपुरी नाटक‘ दिखाने ले गए जो हमारी उस नौचंदी का खास आकर्षण था। वह बहुत कौतूहल से भरा उसे देखता रहा फिर ‘मौत का कुआँ‘ देखा। नौचंदी में घूमते-घूमते हम शरीर पर नाम गोदने वाले एक मीरासी के पास आकर ठिठक गए। हम सब बड़ी हैरानी से भरे उसकी सारी प्रक्रिया देखते रहे, “हाउ फैसीनेटिंग...चलो हम सब भी अपनी बाँह पर कुछ लिखवा लेते हैं।‘ सलमान ने कहा। 

“अपनी बाँह पर क्या लिखवाओगे सलमान, मेरा या उपमा का नाम?” तमन्ना ने हँसकर कहा। उसकी हँसी सअर्थ थी। 

“अरे‘ गुलाबी होते हुए कहा, “छि! कैसी बातें करती है, तमन्ना, पागल है क्या?‘‘

“अरे आप लोग झगड़िए नहीं, मैं तो किसी का नाम नहीं जानता, पढ़ा-लिखा नहीं हूँ न-बस एक ही नाम आता है मुझे...” इससे पहले कोई कुछ कहता, उसने झटके से मेरा हाथ पकड़ा और पलक झपकते मेरी साफ गोरी बाँह पर काले रंग से ‘अल्लाह‘ लिख दिया, तमन्ना भी मेरे साथ चीख़ी।

“ये क्या किया बाबा? आपने, हिन्दू लड़की की बाँह पर अल्लाह लिख दिया। इसके घर वाले नाराज हो जाएँगें।‘‘ 

मैं पीड़ा और घबराहट से रो रही थी, बुआ डाँटेंगी और दादाजी? वह तो मुझे जीवित ही नहीं छोड़ेंगे। मेरे कन्धे पर हाथ रखकर सांत्वना दे रहा था सलमान और मीरासी से कह रहा था, ‘‘बाबा, हो सके तो मिटा दो ना, बेकसूर लड़की बेकार में सज़ा पाएगी।‘‘ 

“एक बार लिखा तो वह तो मिट नहीं सकता-फिर खुदा का नाम है किसी शैतान का तो नहीं।‘‘ वह एक भयानक शैतानी हँसी हँसा था। 

मेरी वकालत के लिए सलमान और तमन्ना मेरे साथ मेरे घर तक आए। दादाजी गोल कमरे में अपनी सोटी के सहारे खड़े थे। हमेशा ही उनकी आँखें मुझे देखते ही जैसे गुस्से की लालिमा से भर जाती थीं, जैसे मेरे चेहरे पर मेरे माता-पिता का एक्सीडेण्ट वह साफ-साफ घटित होता हुआ देख लेते थे, पर उस दिन मैं इतना स्तब्ध थी कि मुझे पता नहीं चला कि दादाजी और तमन्ना का आपस में वार्तालाप क्या हुआ और वह दोनों कब चले गए। 

उस हवेली की दोपहर बड़ी भयानक होती थी। बड़े-बड़े कमरों के दरवाजे खिड़कियों पर भारी परदे पड़े होते थे या खस की टट्टियों की चिके जिन पर पानी का छिड़काव करके नौकर-चाकर अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाते थे। रात से पहले रात आ जाती थी और मजबूरी उसे सोकर काटना होता था। उस दोपहर भी मैं सन्नाटे में पसरकर सो रही थी कि अचानक मुँह पर पट्टी बाँध दी गई। हाथ पलंग की निवाड़ से बाँध दिए गए और मेरे सभी वस्त्र फाड़ दिए गए या नोचकर फेंक दिए गए और सोटी से नंगे बदन पर मार बरसायी गई। बेहाशी और दर्द के मध्य जो चेहरा मैं देख पाई थी वह इतना अपना था कि स्तब्ध रह गई। एक सहम प्राणों तक उतर गई, जिस नौकर ने पट्टियों के बन्धन खोले वह बोला था, “नहीं, किसी से कुछ मत कहना, रोना भी नहीं,‘‘ और मेरी आँखों के छलछलाए, आँसू वहीं ठहर गए, पत्थर जैसी हो गई थी मैं। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ, किसने क्या कहा, बुआ ने क्या कहा, मैं तो बेहोशी, होश और चीखों के बीच अस्पताल के बिस्तर पर से घर के बिस्तर पर पड़ी रही। गोदने वाले हाथ पर प्लास्टर बँधा था। मेरे आसपास बस बुआ होती थीं और कोई नहीं। मेरे बोलने और काँपने के मध्य बुआ ही अधिक रोती थीं, मैं नहीं। एक दिन आधी रात को अपने को हवाई अड्डे पर खड़ा पाया और उसके बाद लंदन शहर में। सोच की अहमियत मेरी उस समय की स्थिति के मध्य कहीं नहीं थी। शायद सच यही था कि जीवन-बहता है-बड़े-बड़े व्यवधान फलाँग कर भी बहता है, इसलिए बहे जा रहा था। बुआ ही मुझे जीवित रह जाने की स्थिति तक लाने में सहायक हुई थीं और वहाँ श्री मेहरा साहब, जो मुझे हवाई अड्डे से अस्पताल, फिर कॉलेज तक ले जाने में सहायक हुए थे। बुआ उन्हें मेहरा साहब कहती थीं और मैं मेहरा अंकल। एम.बी.ए. के इम्तहान के बाद बस उन्हीं के बेटे हेमंत से मेरी शादी हो गई। बुआ भी नीलू के जन्म के बाद स्वर्ग सिधार गईं और उनके साथ मेरा एक अतीत हमेशा हमेशा के लिए मर गया। बुआ मेरे लिए एक खूंटी थीं, जिस पर मैं अपनी दुविधाएँ टाँग दिया करती थीं और वह हँसकर उनका समाधान पकड़ा देती थीं। समय बड़ी तेज़ी से बीच से निकल गया, सब कुछ सामान्य होता चला गया। मात्र मेरी बाँह पर लिखा ‘अल्लाह‘ का नाम वैसा का वैसा ही गुदा रह गया। 

पुराने माली और दरबान के हाथ ख़बर भेजने पर भी जब तमन्ना मुझसे मिलने नहीं आई तो मेरे पैर अपने आप उसके घर की ओर मुड़ने लगे। सुबह के नाश्ते के बाद मैं किसी से बिना कुछ कहे पैदल टहलती हुई तमन्ना के घर की ओर चल पड़ी। उस सड़क से मेरी पहचान पुरानी थी, पर जैसे अब वहाँ एक अजनबीपन फैल गया था। उसका स्वरूप और आकार बाजार में बदल गया था। फिर भी दायाँ मोड़ मुड़ते ही मुझे दुकानों के घने जंगल के पीछे ‘आफताब मंजिल‘ की बुर्जियाँ दिखाई देने लगीं। मैं सारे छोटे-बड़े रास्ते फलाँगकर कोठी के खास दरवाज़े के आगे आ खड़ी हुई। दरवाजा खुला था। भीतर आते ही एक अजीब वीरानी हाथ लगी। उस अहाते में छोटे-बड़े कुछ घर बनते नजर आए। मैं ड्योढ़ी के दरवाज़े की तरफ चलती चली गई। कितने ही जामुन के पेड़ हुआ करते थे यहाँ, बरसात के दिनों में उन्हें खाते-खाते हमारी जुबान काली पड़ जाया करती थी और कबूतर-तमन्ना की वालिदा , सफेद कबूतर पालती थीं पर अब वह ‘कबूतर-बाड़ा‘ खाली-सा नजर आया। ड्योढ़ी के दरवाज़े पर एक मुलाज़िम मेरा रास्ता रोककर खड़ा हो गया। 

“तमन्ना बीबी हैं क्या?” मैंने उससे पूछा।

“आप अन्दर आएँ।‘‘ उसने कहा और बैठक का दरवाज़ा खोल दिया। वही चिरपरिचित बैठक थी, थोड़ी बहुत अदल-बदल के साथ नए-पुराने फर्नीचर को जमा दिया गया था। दीवार की तस्वीरें भी पहले जैसी नहीं थीं। मैं खड़ी ही हुई थी कि किसी दरवाज़े से निकलकर मेरे सामने सलमान आ खड़ा हुआ। उसे वहाँ देखकर मैं चैंक गई। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह वहाँ होगा।

“तुम...इतने साल बाद, कहाँ गुम हो गई थीं?‘‘ उसने कहा। 

“पहचान लिया तुमने, पर तुम यहाँ कैसे? बम्बई से आए हो?‘ . 

‘‘मैं अब यहीं रहता हूँ, टुन्नी...नहीं उपमा-यही नाम है न तुम्हारा?‘‘

‘‘हाँ, चलो तुम्हें याद तो है,‘‘ मुझे लगा बहुत वर्षों बाद मेरे भीतर एक अजीब सी लहर आलोड़ित हो रही है, “तमन्ना कहाँ है...बुलाओ तो उसे,” पुराने फर्नीचर की पुरानी बाँध मुझे अतीत में लौटा रही थी। 

“तमन्ना तो बच्चों के साथ सिंगापुर गई है...उनकी छुट्टियाँ थीं न...।‘‘ मैं देख रही थी, सलमान चश्मे के साथ और भी अच्छा लग रहा है-बालों पर हल्के कदमों से उतरी सफेदी भी उसे आकर्षक बना रही थी।

“ओह कितने बच्चे हैं उसके? और उसके शौहर...?‘‘

‘‘मैं हूँ ना, तुम चली गईं तो क्या करता, उसी से शादी कर ली,‘‘ वह हँसा “दो बच्चे हैं हमारे।‘‘

मैं पता नहीं क्यों उसकी आँखों में कुछ खोजती हूँ, पता नहीं क्या?

“ओह...” मैं स्थिति से उबर रही थी। बात-बात में साधारण रूप वाली तमन्ना से चिढ़ता सलमान, बड़ा सोफिस्टीकेटेड, नखरे झाड़ता सलमान, देहातिन-सी तमन्ना की साधारण-सी गृहस्थी जी रहा था, शायद जीवन इसी विरोधाभास का नाम है।

“अरे आओ बैठो...कहाँ हो आजकल...? पता चला था लंदन में हो, तुम तो ऐसी रुखसत हुईं यहाँ से, कभी लौटी ही नहीं।‘‘ 

“हाँ, बस लंदन में पढ़ती रही बिजनेस मैनेजमेण्ट का कोर्स किया था और अब प्रैक्टिस करती हूँ...और तुम...?‘‘ मैं आराम से उसी दीवान पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गई जिस पर मैं और तमन्ना उकडूं बैठकर घण्टों बातें किया करते थे। मैं धीरे-धीरे काल के उस खण्ड तक पहुँच रही थी, जो बहुत साल पहले उम्र के एक हिस्से में हमने जिया था।

सलमान का दरबान भागता हुआ-सा आया, कहने लगा, ‘‘बाहर बडे बाजार में तो बड़ी मारपीट चालू हो गई है, आप दरवाज़ा बन्द कर लीजिए, मैं मेन गेट पर ताला डाल आया हूँ।‘‘

“आखिर हुआ क्या, क्यों लड़ रहे हैं ये सब लोग...?‘‘ मैं हैरान थी।

“अरे वही नीलोफर का किस्सा है जी,‘‘ दरबान ने बताना शुरू किया, “वह कोई राज्यपाल का बेटा था उसका आशिक। उनकी साँठ-गाँठ दो साल से चल रही थी, कुछ हुई होगी बात, वह छोकरा कल रात दिल्ली से यहाँ आया और दनदनाता हुआ नीलोफर की सीढ़ियाँ चढ़ गया। बस, पिस्तौल दाग दीय 32 बोर की लाइसेंसशुदा पिस्तौल थी उसके पास। रात को बात उठी नहीं अब सुबह नीलोफर की लाश लोगों को मन्दिर के सामने पड़ी मिली। बस तब से झगड़ा चालू है...पहले मन्दिर के सामने लड़ाई-झगड़ा हुआ, अब यहाँ बड़े बाजार में नीलोफर के घर के सामने हो रहा है। बात फिर आशिकी की नहीं रहती न, बात हिन्दू-मुसलमान की हो जाती है। मुसलमानों ने चालीस हिन्दू मार डाले हैं...,” उसने बड़े गर्व से बताया।

“यहाँ आते वक़्त तुम्हें कोई टेंशन नहीं मिली उपमा?‘‘

“नहीं...मुझे तो कुछ खास पता नहीं चला, होगा भी तो मैंने ध्यान नहीं दिया, जब से यहाँ आई हूँ अपने परिवेश से उबरने का मौका ही नहीं मिला।‘‘ 

“अब आप जाएँगी कैसे?‘ दरबान ने कहा, “बाजार बन्द हो रहा है, कफ्र्यू लगने वाला है, आप तो फँस गईं यहाँ...?‘‘

“मैं पहुँचा दूँ तुम्हें उपमा...,‘‘ सलमान ने चिन्तित होते हुए कहा।

मेरी जाने की इच्छा भी नहीं थी, लौटकर जाना भी किसके पास था। कौन था जो प्रतीक्षा कर रहा था, फिर भी कहा, “हाँ, अगर इतनी टेंशन है तो मुझे लौट जाना चाहिए,‘‘ मैं चप्पल पहनकर उठ खड़ी हुई। 

सलमान के मुलाज़िमों ने बहुत कोशिश की पर बाहर इतना हल्ला था कि मेरा, एक हिन्दू स्त्री का, निकलना सम्भव नहीं था। फोन काम नहीं कर रहे थे, घर पर किसी से कुछ बताकर भी नहीं आई थी कि मैं कहाँ हूँ, कहाँ जा रही हूँ और उसकी भी मुझे विशेष चिन्ता नहीं थी। ‘आफताब मंजिल‘ का ये समय अपने अतीत के छोड़े हुए पलों से मुझे जोड़ रहा था। वह समय जो मेरे जीवन में सदा ही तटस्थ खड़ा रहा था। 

“तो क्या करें उपमा? तुम्हारे घरवाले परेशान हो रहे होंगे?‘‘ सलमान ने मौन के गहराते धुएँ को तोड़ते हुए कहा। 

“तुम्हें तो मेरे यहाँ बैठने से परेशानी नहीं है सलमान, नहीं तो मैं जा सकती हूँ... मेरे हाथ पर लिखा ये ‘अल्लाह‘ मुझे मुसलमान करार देकर इस उत्तेजित भीड़ से निकाल ले जाएगा। 

“ओह हाँ...देखें तो, यह अब तक है तुम्हारे हाथ पर। उस दिन नौचंदी के मेले के बाद तो तुमसे मुलाकात ही नहीं हुई। मालूम हुआ था, तुम बीमार हो और फिर पता ही नहीं चला, तुम्हें कौन-सा तिलिस्म गायब कर गया?‘‘

“इस लिखे हुए का तिलिस्म।‘‘ मैं उसके आगे अपनी बाँह फैला देती हूँ। वह देखता है, अपनी उँगलियों से छूता है। 

वह स्पर्श, उसकी ऊष्मा और वह वर्षों पुराना मौन हमारे बीच आकर ठहर जाता है, “क्या तुम जानते हो सलमान, इसको लिखवाने की कितनी बड़ी सजा मिली थी मुझे? इतने साल में उर्दू में लिखा भगवान का यह नाम कितना मिस अंडरस्टुड होता रहा, तुम्हें मालूम है सलमान? ये तुम्हारी भाषा मेरे लिए मायने बदलकर...कितने टुकड़े कर चुकी है मेरे, तुम्हें पता है....?” मैं अचानक बह निकली थी...बड़े सालों का रुका बाँध टूट चुका था। 

“क्या कह रही हो, हमें तो कुछ भी ख़बर नहीं हुई, मुझे या तमन्ना को कुछ भी बताया नहीं गया,” उसकी उँगलियों की सहलाहट मेरी बाँह पर बढ़ने लगती है। 

उसी समय एक कबूतर, खिड़की की सींखचों के बीच आकर बैठ जाता है, उसकी फड़फड़ाहट मुझे और भी अनमना कर देती है, परन्तु मैं यादों की रहगुज़र पर चली जा रही थी। 

“हाँ, जब पहली बार दादाजी की निगाह इस पर पड़ी तो उन्होंने मेरे निर्वस्त्र शरीर पर इतनी मार बरसायी...मेरे हाथ-पैर तोड़ डालने का पूरा प्रयास किया। उनकी दलील थी कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ और हाथ पर तुम्हारा नाम लिखवा लाई हूँ। मेरे शरीर की बहुत अधिक दुर्गति हुई...बुआ का ख़्याल था कि वह रेप भी था। मेरी आत्मा इस दर्द से आज भी नहीं उबरी सलमान...जब मैं लंदन पहुँची तो मेरी कहानी थोड़ी बदल दी गई...कहा गया, मुसलमान लड़के के घरवालों ने मेरा ये हाल किया था। उस मल्टीपल फ्रैक्चर से मेरा शरीर तो जुड़ गया पर मन के अन्दर का विश्वास हमेश के लिए टूट गया। सलमान...मेरा शौहर भी तो मेरे सच से इनकार करता है, उसे मेरे चरित्र पर विश्वास नहीं  होता। बार-बार उस झूठे किस्से को दोहराकर हेमन्त मेरा अपमान ही  नहीं करता मार-पीट भी करता है। खुलेआम दूसरी औरतों के साथ चला जाता है। कुछ कहती हूँ तो और टार्चर करता है,‘‘ मैं बाहर की तरफ देख रही थी, रात गहराने लगी थी, बाहर का आकाश स्वच्छ था। भीतरी-बाहरी झगड़ों से परे. दमकता हुआ और सलमान के स्पर्श का अपनापन मुझे सहारा दे रहा था। “आई एम सॉरी उपमा, मेरी वजह से तुम्हें इतनी तकलीफें उठानी पड़ी और मुझे कानोंकान ख़बर भी नहीं हुई। ...तुम्हारी बेकसूरी के लिए मैं कुछ कर सकता हूँ? पर तुम्हारे दादाजी को ऐसा गुनाह नहीं करना चाहिए था। नफरत क्या इतनी ख़ौफ़नाक होती है? क्यों करते थे वह तुमसे इतनी नफरत?‘‘

‘‘बस. मेरा वुजूद उन्हें बेपनाह नफरत से भरता था. उन्हें लगता था मैं पापा और मम्मी का एक बहुत सिली सस्टीट्यूट हूँ, पापा और मम्मी की जगह मेरा खड़ा होना उन्हें एक चिढ़ से भर देता था। वह चाहते थे मुझे कभी न देखें...,” सलमान ने धीरे-धीरे मेरे काँपते शरीर को बाँहों में भर लिया, “रोओ मत उपमा, प्लीज,‘‘ एक अनजान अपनापन, अजनबी-सी शीतल लहर मेरे तपते अस्तित्व को भर रही थी। ‘‘तुम नहीं जानते सलमान, मैं उस घटना के बाद कभी खुलकर रो भी नहीं सकी,‘‘ मेरे भीतर एक स्रोत-सा फूट रहा था। झरना-सा बह रहा था और मुझे लग रहा था इतने साल से रूपायित मैं ‘मैडम-टुसैड‘ के किसी जमे हुए मोम के पुतले से पिघलकर सहज हो रही हूँ, अपने वास्तविक परिवेश में लौट रही हूँ। सलमान के शरीर में घुल रही हूँ, पहली बार मनुष्य हुई हूँ। 

तभी दरवाज़ा खुला और भौचक्के होकर मैंने देखा, पुलिस के वर्दीधारी एक आफिसर के साथ हेमंत खड़ा था। हेमंत ने दौड़कर एक निर्मम झटके से मुझे सलमान की बाँहों से बाहर घसीट लिया और कहा, “मैं तो पहले ही जानता था, ये और कहीं नहीं जाएगी, यहीं होगी ये कमबख्त, अपने यार के डेरे पर और देखो तो बनती ऐसी है थी जैसे सती सावित्री हो । देखा आपने एस.पी. साहब? आपके कानून में किसी हरामखोर हिन्दू औरत की मुसलमान से इश्क लड़ाने की प्रेम करने की क्या सजा है?” उसकी देहाती जुबान लंदन में रहकर भी नहीं बदली थी। 

इससे पहले एस. पी. कोई सजा तजवीज करता, हेमंत का चिर-परिचित थप्पड़ मेरे गाल पर इतने धमाके से पड़ा कि मैं थर्राकर गिरने को हो आई, पर तभी मैंने महसूस किया कि सलमान के दो सशक्त हाथ मुझे सहारा देकर स्थिति से उठा रहे हैं। में अपना सन्तुलन समेटती हेमंत के सामने तनकर आ खड़ी हुई और उतना ही करारा थप्पड़ मैंने भी उसके गाल पर दे मारा। पता नहीं कहाँ से मेरे स्वर फूटकर निकले, “एस. पी. साहब, पहले ये बताइए कि आपके कानून में बदचलन, जुल्म करने वाले शौहर के लिए क्या सजा है? दूसरे मैं कोई हिन्दू नहीं हूँ एस. पी. साहब, मुसलमान हूँ। देखिए मेरी बाँह पर गुदा हुआ, ये, मेरे ‘आशिक का नाम,‘‘ मैं उन सबके सामने बड़ी शान से अपनी बाँह फैला देती हूँ। 

वह सभी हैरानी से देखते हैं, एक फड़फड़ाता जख्मी कबूतर खिड़की के घुटन भरे सींखचों से छूटकर उड़कर उस आकाश की ओर उड़ रहा था जो कफ्र्यू के दंगों के बाद साफ हो चुका था।

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यात्रा-वृत्तांत

पिरामिड के इस पार-मिस्र

इजिप्ट या मिस्र के नाम के साथ मन में एक रेतीली मिट्टी का गुबार उठता है, एक धुंधलका-सा आँखों के सामने छाने लगता है-धुंधलका जो रोमांचक है, तिलिस्मी है। मिस्र एक ऐसा देश है जहाँ मिट्टी जैसे तत्व में मृत्यु को मिला-जुलाकर ऐसे विशालकाय पिरामिड तैयार किए गये हैं, जिन्हें देखकर सहसा अपनी आँख पर विश्वास नहीं होता। मृत्यु और मिट्टी को एकाकार होते इसी धरती पर देखा जा सकता है। सफर के बीच मेरे मन में अचानक फैज की ये पंक्तियाँ उभर आती हैं

याद की रहगुज़र 

जिस पे इसी सूरत से मुद्दतें बीत गई हैं 

तुम्हें चलते-चलते 

खत्म हो जायें जो दो-चार कदम और चले 

मोड़ पड़ता है जहाँ दश्ते-फरामोशी का

जिससे आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो। 

मैं और तुम का भेद मिटाने वाला यह मिस्र देश, पता नहीं मन में एक बेचैनी-सी भरता है। इस देश के इतिहास ने जन्म से अधिक जीवन और जीवन से भी आगे मृत्यु को भव्य और विशाल जाना है। यह एक ऐसा देश है जिसका विश्वास मृत्यु-पर्यंत आने वाले जीवन की पुनरुक्ति पर टिका हुआ है-चेतन से अधिक अचेतन के प्रति चिन्तित। “टु स्पीक ऑफ डैथ इज टु मेक दैम लिव अगेन‘‘-जिसका अर्थ है-यहाँ मृत्यु जन्म के ऊपर एक घटना है जिसके लिए उत्सवी अनुष्ठान आयोजित होते हैं और जश्न मनाए जाते हैं, शायद इसलिए कि संसार सीमित है, मनुष्य का जन्म सीमित है-परन्तु परमात्मा असीम है।

भारत के दर्शन-शास्त्रियों ने भी मृत्यु को ‘सद्गुरु‘ कहा है और एक घटना मात्र, जिसके माध्यम से जीवन को समझ पाने का सूत्र हाथ लगता है। परन्तु मिट्टी? मिट्टी तो एक सम्भावना है और शायद यही कारण है कि मनुष्य जितना जीवन्त है, उतना अधिक मिट्टी की पूजा करता है, उसके आकार की पूजा करता है। सोना और चाँदी जैसी धातुएँ पूजा-योग्य नहीं होतीं, वह मुर्दा होती हैं, प्राणहीन, मरे हुए शरीरों पर के आभूषण मात्र । परन्तु मिट्टी उनकी महान पूजा और गहरी आस्था की वस्तु है।

ये पिरामिड इस पुरातन सूत्र की गहनता को हमें एक गम्भीर दार्शनिक की भाँति समझा रहे हैं। पिरामिड्स के रूप में मिट्टी, उसकी पथरीली शिलाओं में बन्द मनुष्य का अस्तित्व सीमित कहाँ है, उसे एक असीम के सिंहासन पर आरूढ़ करके गौरवान्वित किया है। मिस्र के ये पिरामिड्स जैसे हमसे कह रहे हों-“जहाँ कुछ भी मरता नहीं है, वहाँ जीवन शाश्वत है।‘‘ पिरामिड्स के भीतर की मौत बड़ी उद्बोधक है, चैंकाती है, जगाती है हमें, जो अपनी नित्यप्रति की दिनचर्या के एनेस्थेसिया या बेहोशी में चलते जा रहे हैं। पिरामिड के भीतर की मौत जैसे हमें हमारे अस्तित्व से बाहर खींच रही है-अनन्त निद्रा की एक विधा सिखलाकर जैसे ये पिरामिड बयान कर रहे हैं कि मौत में भी आशा का एक स्फुलिंग चेतन है। मृत्यु से आगे भी एक जीवन है, नया-नकोर, इस जीवन के दुःखों से परे सुखपूर्ण, शायद इसी कारण गीजा के इस मृत्यु-स्थल पर मिस्र के अनेक शासक, राजे-महाराजे, शहजादे-शहजादियाँ, अमीर-उमरावों के साथ दास-दासियाँ भी एक खूबसूरत रत्नजड़ित मौत की चादर लपेटे हुए आज भी (भौतिक रूप से) मौजूद हैं।

इस देश के इतिहासकारों ने उन्हें एक अनूठा अमरत्व प्रदान किया है। वे कभी नहीं मरते, जीवित हैं, इन तिकोने पिरामिड्स के गहरे अँधेरे कक्षों में, सरसरा रहे हैं। पता नहीं, मृत्यु पश्चात् की वह यात्रा, वह जीवन उन्हें प्राप्त हुआ या नहीं जिसके तहत वे यहाँ हजारों वर्षों से विश्राम कर रहे हैं। और जो, उन्हें, उस मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होने वाला था। तो क्या ये पिरामिड कड़ी हैं जीवन और मृत्यु के मध्य, एक विश्रामस्थल?

पिरामिड के अस्तित्व में जीवन और मृत्यु, स्वर्ग और धरती, देवता और मनुष्यता, अँधेरा और उजाला सभी कुछ संजोया हुआ है। पुरातन मिस्रवासी पिरामिड को सृजनहार प्रभु का पूज्यस्थल और सिंहासन-जैसा पवित्र मानते थे, इसी कारण पिरामिड का बिलकुल ऊपरी पत्थर वह बिन्दु था जिसके माध्यम से भगवान का स्पर्श किया जा सकता था। जब सूर्य की पहली किरण इस कोण पर से होकर तिकोने पिरामिड के शरीर पर फिसलती हुई धरती पर उतरती थी तो मिस्रवासी मानते थे कि भगवान ‘रा‘ या ‘ज्योति के भगवान‘ ने उनकी धरती की मिट्टी को अपने स्पर्श की छुअन से जीवन्त कर दिया है और उसी छुअन से पिरामिड के गर्भगृह में अनन्त निद्रामग्न सभी शासक, शहजादे भी जाग उठेंगे और अपनी प्रजा के दुःख को अपने अस्तित्व में आत्मलीन कर लेंगे। इस प्रक्रिया को (पुनर्जीवित) कहते हैं। प्रकृति की मृत्यु पर विजय जैसा भाव था यह। पुराने मिस्रवासी अपने जीवन का एक ऐसा खाका बुनते थे जिसके ताने-बाने में भौतिक इच्छाएँ आत्मिक विश्वासों के साथ गूंथी जाती थीं, परन्तु अब वह खाका धुंधलाता जा रहा है।

केअरो मिस्र की राजधानी है, इसके हृदयस्थल के निकट बहती है नील नदी। नील नदी से ही इसका अस्तित्व अर्थवान है अन्यथा दूर-दूर तक फैले रेगिस्तान एक विस्तृत अन्धड़-से मुँह बाए बैठे नजर आते हैं। इजिप्ट का 96 प्रतिशत क्षेत्र रेगिस्तान है। नील नदी के पुल से गुजरते ही गीजा का क्षेत्र आता है जहाँ ऐतिहासिक पिरामिड तीन हजार साल से अपनी अनूठी मुद्रा में अकड़े खड़े हैं।

गीजा प्रदेश में तीन पिरामिड हैं-एक बहुत बड़ा, दूसरे दो उससे कुछ छोटे। ‘खूफू‘ नामक बड़े पिरामिड को मिस्र के द्वितीय शासक ने 2551-2528 ई.पू. में निर्मित किया था। आज भी यह पिरामिड विश्व की सात अविश्वसनीय वस्तुओं में से एक माना जाता है। इसके विशालकाय क्षेत्रफल में रोम का ‘सेंट पीटर्सबर्ग कैथीड्रल‘ लंदन के ‘सेंट पौल्स कैथीड्रल‘ तथा ‘वैस्ट मिन्निस्टर्स एबी‘, फ्लोरेंस और मिलान के ‘कैथीड्रल‘ आदि एक साथ समा सकते हैं। इनको बनाने के लिए सेंडस्टोन, ऐलाबास्टर आदि पत्थरों की जो शिलाएँ प्रयुक्त हुई हैं, उनका भार पाँच टन से लेकर पन्द्रह टन तक है। खूफू की ऊँचाई 481 फीट थी जो अब घटकर 450 फीट रह गई है। इस पिरामिड की एक दीवार की शिलाओं की गणना 755 है और दूसरी दीवार की 746-इसमें एक बिलकुल छोटा-सा खिड़कीनुमा रोशनदान है जो आत्माओं का बाहरी संसार से सम्पर्क बनाये रखने के प्रयोजन से निर्मित किया गया था।

ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस के अनुसार एक पिरामिड बनाने के लिए एक लाख कार्यकर्ता दिन-रात काम करते थे। पिरामिड के निर्माण में नियुक्त कार्यकर्ता क्रय किए हुए दास-दासियाँ नहीं थे वरन् अपने कार्य में दक्ष, चुने हुए कुशल कारीगर और शिल्पी थे जिन्हें भवन-निर्माण कला की सूझबूझ थी। पिरामिड-निर्माण का कार्य विशेष रूप से उस मौसम में होता था जिस मौसम में खेतों में काम समाप्त हो जाता था और मिस्र के अधिकतर भू-भाग में बाढ़ का प्रकोप रहता था। सोचकर देखें तो आश्चर्य होता है, इतने अधिक कार्यकर्ताओं को सँभालना, उनमें काम वितरण करना, सहेजना, उनके रहने-खाने की व्यवस्था करना कितने जोखिम और सूझबूझ का बायस रहा होगा।

पिरामिड में भीतर जाने का एक संकरा-सा रास्ता है जिसमें झुककर ही जा सकते हैं। हमारा गाइड बताता है, “शासकों के सम्मुख सिर झुकाकर जाना ही हमारी सभ्यता है, इसीलिए यह मार्ग इतना तंग है।‘‘ सिर नवाये हम पिरामिड के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके मुख्य तीन कक्ष हैं। पहले कक्ष में वैसे तो इस समय कुछ भी नहीं है परन्तु हमारा गाइड बताता है कि यहाँ जो मूर्तियाँ थीं वे पुनर्जन्म की द्योतक थीं। दूसरे कक्ष में छोटा मन्दिर था जो मृत आत्माओं का पूजा स्थल था और जो उनके जीवन की निरन्तरता को घोषित करता था। तीसरे कक्ष में मृत शरीरों को ममी रूप में रखा जाता था। 

पुराने मिस्रवासियों का विश्वास था कि एक समय ऐसा आयेगा जब कभी दिवंगत शासक और उनके राज्य कर्मचारी जी उठेंगे और पुनः अपना कार्य सँभालेंगे। अविश्वास होता है इस विश्वास पर। इतिहास साक्षी है कि समय≤ पर धन और धरा के लिए पुत्र ने पिता की हत्या की, राज्यसत्ता हथियाने के लिए भाई ने भाई का खून किया, राज्य कर्मचारी ने अपने शासक का, ब्रूटस ने सीजर को मौत के घाट उतार दिया। उसी इतिहास में इतना गहरा विश्वास कि मृत शासकों के शरीर को पुनः जीवित हो जाने के लिए सहेजकर रखा मिस्रवासियों ने। मात्र शासक ही नहीं, उनके जीवनकाल में प्रयुक्त होने वाली हर वस्तु-उनकी बेगमें, शहजादे-शहजादियाँ, राज्य-कर्मचारी, दास-दासियाँ, घोड़े-पलँग और राज-गद्दियाँ, खाना-पीना सभी कुछ उनके साथ पिरामिड की इन दीवारों के भीतर दफन कर दिया। ऐसे गहरे विश्वास और आस्था की मिसाल इतिहास में और कोई नहीं है। 

पिरामिड के साथ एक मन्दिरनुमा कक्ष है, जहाँ मृत शरीर को ममी में बदला जाता था। इस स्थल को ‘एम्बामिंग टैम्पिल‘ कहते हैं। ममी बनाने के लिए सबसे पहले मृत शरीर के भीतर के कोमल अंगों को निकालकर घड़ेनुमा तीन पात्रों में रखकर बन्द कर देते थे। उसके पश्चात् शरीर को पूरी तरह औषधियों से लेप कर सुरक्षित किया जाता था। औषधियाँ सूख जाने पर उन पर पतली सफेद पट्टियाँ लपेटी जाती थीं-इन शरीर को ‘ममी‘ कहते थे। सुरक्षा के लिए इस ममी पर लकड़ी के कवच या अन्य धातुओं के दो या तीन कवच चढ़ाए जाते थे। ये कवच या कॉफिन शरीर के आकार के होते थे और उन पर अनेक प्रकार की सजावट की जाती थी। ये कवच सोने-चाँदी के नक्काशीदार ही नहीं, एक कलाकृति जैसे खूबसूरत होते थे।

उन दिनों मिस्र निवासियों का विश्वास था कि प्रत्येक शरीर में दो विशेष शक्तियाँ होती हैं जिन्हें ये लोग ‘बा‘ और ‘का‘ कहते थे। यह भी मान्यता थी कि आत्मा या उसकी अतीन्द्रिय शक्तियाँ मृत्यु पश्चात् भी जीवित रहती हैं, अतः पिरामिड की दीवारों पर रंगीन चित्र बनाये जाते थे। ‘बा‘ की प्रस्तुति वृक्षों के ऊपर बैठे पक्षी के रूप में होती थी। ‘का‘ को आत्मा के सृजनात्मक या मौलिक परीक्षण का केन्द्र समझा जाता था, जो जीवन से भी महान था। ‘का‘ जीवन में सदा ही समाविष्ट रहता था और शत्रुओं से आत्मा की रक्षा करता था। अनेक प्रकार के भगवानों और देवताओं के चित्र भी दीवारों पर बनाये गये थे-उनके हर रूप की अपनी शक्तियाँ होती थीं, कहीं बैल का सिर, कहीं सारस पक्षी का सिर, कहीं गाय, कहीं लोमड़ी का सिर मनुष्य शरीर पर लगा होता था। लोमड़ी के सिर वाले देवता का नाम ‘अनुबिस‘ माना जाता था, जो कब्रिस्तान में ही रहते हुए मृत शरीरों की देखभाल करते थे।

सब देवताओं में प्रमुख ‘रा‘ या सूर्य देवता को माना जाता था, ‘रा‘ भगवान को ही समूचे विश्व का सृजनहार और शासकों को आश्रय देने वाला मानते थे। पिरामिड में इन चित्रों के अतिरिक्त घर में काम आने वाले सभी पदार्थों के साथ तरह-तरह के भोजन-मदिराएँ, सोने-चांदी के आभूषण, वस्त्र, मिट्टी या धातुओं के बने बर्तनों के साथ-साथ कभी-कभी जीवित सेवक-सेविकाओं को भी दफन कर दिया जाता था। कयामत के दिन उनके न्याय-कक्ष में हृदय को सच्चाई के पलड़े में तोलने की प्रथा थी, अतः हृदय के स्थान पर किसी एक खास पक्षी के पंख को रख देते थे। यह एक प्रकार से उनके दैवी विश्वास को समर्पित होता था। 

मिस्र के निवासी जादू-टोने में भी विश्वास रखते थे तथा उनके जीवन पर धर्म का बहुत प्रभाव था। यह बात अलग है कि किसी भी स्त्री या पुरुष को भगवान में उतनी निष्ठा या आस्था नहीं थी, जितनी मन्दिरों के बाहरी आडम्बरों और क्रिया-कलापों में उनका विश्वास था। गणनाशास्त्री और पुजारी सूर्य, चाँद और नक्षत्रों को देखकर गणनाएँ करते थे और उन्हीं के अनुसार जीवन की कार्य-प्रणाली निश्चित होती थी। खेती-बाड़ी आदि भी उन्हीं गणनाओं के हिसाब से की जाती थी। इन्हीं गणनाओं के सहारे पिरामिड आदि के पत्थर जोड़ते-तोड़ते समय यहाँ के निवासियों ने ज्योमेट्री, खगोलशास्त्र, भवन-निर्माण कला आदि में पारंगतता हासिल कर ली। यही नहीं, चिकित्साशास्त्र, औषधियों के रसायनिक विकास, जलपोत आदि बनाने की कला, न्यायशास्त्र आदि में भी अपने को पारंगत कर लिया। 

इतना जानने के उपरान्त भी मिस्र-निवासियों का विश्वास था-‘‘मृत्यु के उपरान्त भी जीवन की निरन्तरता है, सार्थकता है‘‘ और वे अपनी आस्थाओं पर दृढ़ रहे। ‘हमारा‘ शहर का सीढ़ीनुमा पिरामिड मिस्र का पहला पिरामिड माना जाता है। इसकी सीढ़ियाँ उस समय भी अपने शासकों के लिए स्वर्ग जाने का मार्ग गढ़ती थीं, आज भी गढ़ती हैं। यह पिरामिड मिस्र की भवन-निर्माण कला के क्षेत्र में आज भी अद्वितीय मिसाल माना जाता है। इसमें आज भी चित्र अपनी फीकी पड़ती छटा के साथ देखे जा सकते हैं। सभी चित्र जनजीवन के हैं, बलि चढ़ते पुजारियों, मछली पकड़ते मछुआरों के या पत्थर काटने वाले परिवारों के। 

यों तो सारे पिरामिड अन्दर से खाली हैं, उनके भीतर की सभी प्रतिमाएँ, ममी आदि अजायबघर में पहुँचा दी गई हैं। पूरा केअरो शहर एक ओर हजारों साल पुरानापन जीता है, दूसरी ओर नया प्रगतिशील बीसवीं सदी का जीवन। अजायबघर की चारदीवारी के बाहर एक आधुनिक संसार भी है और भीतर हजारों वर्ष पूर्व का संग्रहालय भी अपनी भव्यता से सिर उठाये खड़ा है। इसके भीतर पुराने भित्तिचित्र, प्रतिमाएँ, ममी, ममी के बनाने की प्रक्रिया के बहुत से चित्रों के अतिरिक्त ममी के साथ दफन किए हुए घर के सामान, जवाहरात, आभूषण-वस्त्र और सबसे देखने योग्य है तूतमखामन का ठोस सोने से बना कवच । तूतमखामन का यह बहुमूल्य सोने का कवच आज भी चमक रहा है। उसके ऊपर बने चेहरे की बड़ी-बड़ी काजल-अंजित आँखें उसी अन्दाज से देख रही हैं जैसे वर्षों पहले उन्होंने मृत्यु के क्षण को आते हुए देखा होगा। सभी दर्शनीय पात्र एक अजीब-सी अनुभूति से मन को अभिभूत कर जाते हैं... आश्चर्य जैसा मनोभाव हर पल साथ चलता है।

बेशकीमती ममी को 26 नवम्बर, 1922 में हावर्ड-कार्टर नामक पुरातत्व-वैज्ञानिक ने अपनी टिमटिमाती मोमबत्ती के प्रकाश में खोज निकाला था। तब से आज तक यह पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केन्द्र रहा है, उसे देखकर दाँतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती है।

‘गीजा‘ के तीनों पिरामिड्स के बिलकुल सामने अपने मायावी रूप से पहरा दे रहा है एक अकेला ‘स्फिंक्स‘ । इसका शरीर शेर का है और चेहरा मनुष्य का। यहाँ के निवासियों का विश्वास है कि इस आकार के कारण यह ‘स्फिंक्स‘ पशु की शारीरिक शक्ति और मनुष्य के मस्तिष्क की बुद्धि के समावेश का एक भव्य प्रतीक है। इसके माथे पर कोबरा भी विराजमान है, जो यहाँ के शासक होने का द्योतक था। यह भी कहा जाता है कि ‘स्फिंक्स‘ में ‘रे-हाराक्थी‘ नामक देवता का भी निवास है। बारहवीं शताब्दी में अरब के प्रसिद्ध डॉक्टर अब्दुल लतीफ ने इस ‘स्फिंक्स‘ को देखकर लिखा-‘इसके शरीर में सौन्दर्य और चेहरे पर सौम्यता दोनों की छाप है, यही नहीं, इसकी मुस्कान में मधुरता के साथ एक विशेष गम्भीरता भी घुली हुई है।‘ पाँच हजार साल से यह स्फिंक्स उदास आँखों से आते-जाते पर्यटकों को निहारता, मोहता रहता है और शायद उसी ने उसी पथराई उदास मुद्रा में अपने शासकों को ममी में ढलते देखा होगा। 

पिरामिड के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करके हम गर्म रेगिस्तान पर चलते हुए जब शहर की देहरी तक आते हैं तो ताँगेवाले, रंगीन सजावट से लैस ऊँट और ऊँट-सवार हमें घेर लेते हैं। शहर का शहरीपन अचानक जैसे बर्दाश्त नहीं होता, हम पैदल ही चल पड़ते हैं। शहर को शहर की गलियों में कदम-कदम चलकर ही तो देखा जा सकता है। केअरो की जिस गली में हम चल रहे थे वहाँ दोनों ओर गन्दगी, कूड़े के ढेर, खुली नालियाँ, मटमैले बच्चे, सब्जी या फल की दुकानें, तरबूज की दुकानें जिनमें थोड़ी मात्रा में मुरझाई हुई तरकारियाँ एक दर्द की सिहरन-सी मन में भरती थीं। नानबाई की दुकानें एक खास खुशबू से माहौल को एक भूख से भर रही थीं। सड़क के दोनों ओर के मकान टूटते और ढहते हुए-वे घर, कोठरियाँ, कमरे, उन पर पड़े मैले-से पर्दे उड़-उड़कर घर के हालात का पर्दाफाश कर रहे थे। नकाब डाले या नकाब उलटे पर्दानशीं जवान औरतें, उनकी झाँकती-सी आँखें, घर के दालान या देहरी पर बैठी बूढ़ी औरतें अपने पोपले मुँह से बकझक में लगी थीं-सब कुछ जैसे थका हुआ था, बेदम। 

अचानक मुझे लगा, सारा परिवेश बहुत पहचाना हुआ है, अपना है, अपने अलीगढ़ जैसा है। हवाओं में घुलता एक झीना अपनापन मेरे अस्तित्व पर आ गिरता है और मैं उसे ओढ़कर बहुत अनमनी हो जाती हूँ। बचपन से अब तक इन पर्दो की रहस्यात्मकता और काले नकाब के पीछे छुपे चेहरों के बँधे उद्गारों ने मुझे जकड़ रखा था। आज फिर अचानक जैसे उसी आइने के सामने आ खड़ी हुई थी जिसे वर्षों पहले अलीगढ़ की किसी बन्द हवेली के अँधेरे माहौल में पड़ा छोड़ आई थी। चलते-चलते मेरे पैर एक सफेद रंग से पोती हुई छोटी-सी मस्जिद के आगे आ रुकते हैं। अलीगढ़ का सैय्यद जिस पर अहमद ड्राइवर और उसकी बीवी बतूलन ईद के दिन हमसे माँगकर चादर चढ़ाते थे, ऐसा ही तो है। मस्जिद की दीवारों पर हरे रंग से बेल-बूटे बने हैं, चमकती रुपहली पत्ती लगी है। अन्दर बहती लोबान की सुगन्ध भी तो उस अगरबत्ती की गंध से मेल खाती है जो सैय्यद पर लोग जला जाते थे। मेरे मन में वही भक्तिभाव लहराने लगता है जो सैय्यद को देखकर जगता था। प्रायः ऐसा होता कि रास्ता चलते समय जब हमारे कदम ठिठककर किसी खंडित प्रतिमा, मन्दिर के अधमुंदे 

द्वार के सामने पड़ जाते और हम एक मौन नमन में झुकते, तो वास्तव में अपने भीतर के किसी मध्यबिन्दु पर जैसे सारे विचार समाधिस्थ होने लगते थे। उसके फलस्वरूप अपने मन में हमें एकाग्रता ही नहीं, एक अजीब-सी शान्ति की भी अनुभूति होती थी। 

सुशील किसी दुकान पर कैमरे की फिल्म खरीदने में व्यस्त हो जाते हैं। मैं चलती हुई एक मकान के पर्दे के पास खड़ी होकर उसके पीछे झाँकने का प्रयास करती हूँ-जानना चाहती हूँ वहाँ की जीवन-पद्धति को, विशेष रूप से उसे जो पर्दो के पीछे साँस ले रही है। सहसा एक औरत बाहर आती है, नवयौवना है, सुन्दर भी, उसने लम्बा-सा लाल रंग का चोला-जैसा पहना है, सिर पर कसकर कपड़ा बँधा है-परन्तु उसके चेहरे पर, विशेष रूप से गहरी भूरी आँखों में लबालब भरी हुई एक तरल संवेदना है जो छलछला रही है-जैसे वह उठने को प्रस्तुत हो। कुछ है जो मुझे छू रहा है, कुरेद रहा है कि मैं उसे जान लूँ। शायद वह भी मुझे जानना चाहती है। मैं आस-पास देखती हूँ। हम दोनों की भाषा भिन्न है-मैं भी कुछ कहती हूँ, वह भी कुछ बुदबुदाती है, पर्दा उठाती है, शायद मेरे लिए भीतर आने का आमन्त्रण है।

पर्दे के पीछे एक दालान जैसा है, जिस पर घुटनों के बल एक सिकुड़ी-सिमटी-सी वृद्धा बैठी है। वह स्त्री कम, काले कपड़ों की एक गठरी-जैसी अधिक प्रतीत होती है। पता नहीं वह युवती की क्या है, माँ या सास? तभी सुशील गाइड के साथ मुझे ढूँढते हुए आ जाते हैं-मैं आग्रह करती हूँ उस गाइड से कि मुझे उस औरत से मिलवा दे-मुझे पता करके बता दे कि इस धरती की इस गली की इस औरत का, इक्कीसवीं सदी की पर्दानशीं इस औरत का जीवन और इस टूटते-ढहते घर के अस्तित्व का आज के युग में अर्थ क्या है?

मेरा प्रश्न उस तक पहुँच जाता है। मैं उस चेहरे पर घुमड़ती एक घटा को देख सकती हूँ...उसकी आवाज में तुर्शी है जैसे कोई पिघला हुआ शीशा शीतल फलक पर बहे और चटककर टूट जाये। उसने जो भी कहा, गाइड के शब्दों से जो मुझ तक पहुँचा, वह कुछ इस प्रकार था- “संसार के इस भू-भाग में रहना एक शून्य में रहने जैसा है। समय की यहाँ या शायद मेरे लिए कोई अहमियत नहीं है। दिनों का हिसाब रखना मुझे नहीं आता। हम औरतों के जीवन में न तो कोई छुट्टी है, न कोई सप्ताहान्त । हमारे जीवन का न तो कोई ध्येय है, न ही कोई प्रयोजन, न ही कोई प्रेरणा हमें सपना दिखाती है। एक सपाट जीवन है जहाँ गति को कोई नहीं जानता। एक शीतल ठहराव ही हमारी नियति है। मेरी दादी-सास, साठ, सत्तर-अस्सी साल पहले यही जीवन जीती थीं, मेरी सास ने भी यही जीवन जिया होगा, अपनी कोठरी के कुहासे से दालान तक आना और इस दरवाजे के पर्दे को उठाकर बाहर के संसार को देखना भर उनकी एकमात्र यात्राएँ थीं। यह भी सच है कि इस घर की औरतें अपने जीते-जी यह देहरी फलाँगकर नील नदी के तट तक कभी नहीं गईं। मैं आज जीवन के उसी कगार पर खड़ी हूँ जिस पर वह भी एक दिन खड़ी थीं, अन्तर मात्र इतना है कि मैं गली के बाहर आकर दो-एक बार नील नदी के तट तक जा चुकी हूँ और मेरी उँगलियों ने पिरामिड के सख्त खुरदरे पत्थरों को छुआ है।‘‘

“क्या प्रेरणा देते हैं तुम्हें ये पिरामिड?‘‘

“एक प्रतीक्षा, इस जन्म के बीत जाने की, इस जन्म की मृत्यु के बाद आने वाले एक सुखद जीवन की प्रतीक्षा जब मैं किसी और घर या गली में रह सकूँगी, जहाँ पर्दे नहीं होंगे, चेहरे पर नकाब नहीं होगा, दमघोट घुटन नहीं होगी। घर की टूटती-ढहती दीवारें नहीं होंगी-खुलापन होगा और होंगी विमान यात्राएँ-जीवन से मुक्तता की ओर ले जाती हुईं।‘‘

एक खँूटी पर बाँस की खपच्चियों का बना पिंजड़ा है जिसमें कुछ चिड़ियाँ बन्द हैं। सहसा वह औरत एक हाथ से पिंजड़े को घुमाती है, चिड़ियाँ फड़फड़ाती हैं और वह औरत हाथ में पकड़ा पर्दा छोड़ देती है-वह पर्दा मेरे और उसके बीच एक मटमैली दीवार-सा तन आता है। मैं उसको अदृश्य हाथों से छूती हूँ, एक छलछलाता अपनापन जुड़ता है-अलीगढ़ में भी या हिन्दुस्तान में भी तो अनन्त ऐसी गलियाँ हैं, घर हैं, पर्दे हैं जिनके भीतर की घुटन ऐसी है,...ऐसी ही है...मैं चलने लगती हूँ तो मन में मेरे समानान्तर फैज की यह नज़्म भी चलने लगती है

दिल ये कहता है कहीं और ले जाये जहाँ, 

कोई दरवाजा अबसवा हो न बेकार कोई 

याद फरियाद का कशकोल लिये बैठी हो 

महरमे-हसरते-दीवार हो दीवार कोई 

न कोई साया-ए-गुल, हिजरते कुल से वीरां 

ये भी कर देखा है सौ बार कि जब राहों में 

देस-परदेस के बेमेहं-गुजरगाहों में 

काफिले-कामत-

ओरुखसार-लब-ओ गेसू के 

पर्दा-ए-चश्मा पे यूं 

उतरे हैं वे-सूरत-ओ-रंग 

जिस तरह बन्द दरीचों 

पे गिरे बारिशे-संग 

और दिल कहता है हर 

बार चलो लौट चलो 

इससे पहले कि वहाँ 

जायें तो ये दुःख भी न हो 

ये निशानी कि वो दरवाजा खुला है अब भी

और उस सहन में हर सूं यूं ही पहले की तरह

फर्शे-नौभीदी-ए-दीदार बिछा है अब भी

ध्वनि और प्रकाश के कार्यक्रम से ये कथानक उमड़ते हैं-

चलते-चलते हम फिर उस गैलरी तक पहुँच जाते हैं जहाँ पर पिरामिड के इतिहास का ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम आरम्भ होने वाला है। तीनों पिरामिड, उनके आगे बैठा स्फिंक्स कभी हरी, नीली या नारंगी रोशनियों में चमकता है। संगीत और ध्वनि से एक वातावरण बनता है जो हमें इतिहास के उस काल में ले चलता है जब यहाँ के सब शासक जीवित थे। रेगिस्तान की रेत उड़ती है, हर कण जीवन्त हो उठता है।

होमर की एक दंत-कथा के अनुसार, ““वैली ऑफ किंग्स‘ की इस घाटी में एक देवता था, उसका एकमात्र पुत्र था मैमन। मैमन बहुत होनहार राजा था और देश के लोग उसे बहुत चाहते थे। एक दिन आर्किलिएस नामक दूसरे राजा ने उसे मौत के घाट उतार दिया। यहाँ शवों का अन्तिम संस्कार नहीं होता था, इसलिए मैमन की माँ हर सुबह अपने बेटे, मृत शरीर को बाँहों में लेकर सहलाती थी। जैसे ही सूर्य की पहली किरण धरती पर उतरती, मैमन के निर्जीव शरीर में जीवन का संचार हो जाता था।‘‘

दूसरी एक कथा पत्थरों से उमड़ती है सूर्य के प्रकाश की महत्ता उन दिनों बहुत थी, सूर्य के प्रकाश की ऊष्मा से बालू पत्थरों की बनी प्रतिमाओं के मध्य उकेरे गये छेदों से गर्म किरणें टकराती तो मृत शासकों की एक कराह यहाँ की रेतीली हवाओं में सरसराती थी और उसके साथ कई करुण संगीत के स्वर उभरते थे। पूरी दो शताब्दियों तक ये प्रतिमाएँ गीत गाती रहीं और लोग दूर-दूर से आकर उन्हें श्रद्धांजलियाँ अर्पित करते रहे। 

कहते हैं, एक बार रोम के शासक भी यहाँ आये थे और कॉलोसस की मूर्तियों के संगीत को मन्त्रमुग्ध होकर सुनते रहे। सूर्य के उगने के बाद जैसे-जैसे हवाओं में उष्णता बढ़ती गई, संगीत के स्वर उभरते रहे, रेगिस्तान की जलती हुई रेत का संगीत सिहरता रहा-सेप्टीमस सरवस नामक एक कारीगर को मूर्तियों की खंडित अवस्था पर दुःख हुआ, उसने इस अजीबोगरीब प्रतिमा का जीर्णोद्धार करने की ठान ली। प्रतिमा को अपना खोया हुआ रूप तो प्राप्त हुआ परन्तु जो संगीत टूटे हुए वक्षस्थल से उठता था, वह उस जुड़े हुए वक्षस्थल के बाहर ही थमा रह गया। स्वर रूठ गये और गीत उन प्रतिमाओं ने फिर कभी नहीं गाया। सूर्य की किरणों ने लाख सिर पटका, मनुहार किए पर कॉलोसस के होंठों से कोई गीत नहीं फूटा। डेढ़ हजार साल से ये प्रतिमाएँ इसी मुद्रा में पर्यटकों को निहार रही हैं और जैसे उनकी इस नश्वर समाधि पर नश्वर प्राणी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे ये मौन प्रतिमाएँ एक हठधर्मी प्रहरी-सी मिस्र की इस धरती पर पहरा ही नहीं दे रहीं, अनन्त फैले रेगिस्तान को अपनी सूनी निगाहों से देखती हुई एक निरन्तर असमाप्त-सा तप जी रही हैं।

पिरामिड की धमनियों में एक नया बिम्ब उभरता है-देवताओं की धरती पर क्लिओपेट्रा का जो अपने को भगवान ‘रा‘ की पुत्री मानती थी। वह मिस्र में नहीं जन्मी थी, मैसीगेनिया से आई थी और मिस्र की न होते हुए भी मिस्र पर उसने सत्रह साल की छोटी उम्र से छयालीस साल की उम्र तक राज किया। उसकी राजनीति प्रेम की थी, अपने शरीर के अद्भुत सौन्दर्य और उसकी उद्दाम इच्छाओं को ढाल बनाकर उसने राजनीति के दाँव-पेंच लड़े थे।

एक स्वर उस ‘शो‘ का यह भी था कि-

क्लिओपेट्रा ने रोम के महान शासक जूलियस सीजर से, जिससे उसे एक पुत्र भी प्राप्त हुआ, राजनैतिक सम्बन्ध रखे। सीजर की मृत्यु के बाद उसने रोम के दूसरे शासक एण्टोनी के साथ भी एक अद्भुत जीवन जिया। एण्टोनी महान राजनीतिज्ञ होते हुए भी क्लिओपेट्रा के अमानवीय रूप के आकर्षण-तले दब गया था। इतिहास के दो महान शासकों को अपने शारीरिक और राजनैतिक मोहपाश में गूंथकर जीने वाली क्लिओपेट्रा जैसी महारानी ने मृत्यु को भी जिया था। ऑक्टेवियन के कर्मचारियों ने जब उसे जीवित पकड़ने का प्रयास किया तो वह अपनी स्वर्ण-शय्या पर सोलह शृंगार से सज्जित मृत पड़ी थी। जहरीले सर्प के विष से उसका सुन्दर शरीर नीला पड़ गया-फड़फड़ाती हुई उसकी आत्मा शायद सीजर, एण्टोनी के देश में भटक रही थी। परन्तु उसका शरीर ममी के रूप में उसी धरती पर संजोकर रखा गया है। 

वह अगस्त मास की तीस तारीख थी और आज अगस्त की आठ तारीख है। मैं सोच रही हूँ, यही महीना था, सपना हो या सच, क्लिओपेट्रा की खनखनाती हँसी रेत के उस गुबार में उठती हुई मुझे घेर ले रही है। ग्रीक लेखक प्लूटार्क ने कहा था-‘‘क्लिओपेट्रा की हँसी संगीत के उस राग की तरह है जिसमें अनेक तार एक ही साथ झनझनाते हैं।‘‘ 

फिज़ाओं में काले साये, रोशनियों में गूंजती अतीत की ध्वनियाँ, कॉलोसस का करुण संगीत और क्लिओपेट्रा की हँसी इस संसार से उड़ाकर हमारे अस्तित्व को इतिहास की किसी गली में पहुँचा आती है। जिन्दगी रुक जाती है, पल ठहर जाते हैं, मृत अतीत वर्तमान में जी उठता है और भारी मन लिये हम वहाँ से उठते हैं। 

मृत्युलोक जैसे इस केअरो शहर का जन-जीवन सामान्य है। ये हवाएँ जो हमें सहलाकर हमारे भीतर एक अजीब प्रकार के सन्नाटे का सृजन करती हैं, यहाँ के निवासियों को उतना ही मदमस्त बनाती हैं। अपने शरीर को गालाविघा से ढंक ये लोग मजे से गधे पर चढ़े घूमते नजर आते हैं। नील नदी में सैर करने के लिए रात के समय तैरते हुए भोजनालय में भोजन करना अपने आप में एक अनुभव है-भीतर से सारा परिवेश वातानुकूलित ही नहीं, पाँच-सितारा होटल जैसा खूबसूरत है-तरह-तरह के खाद्य, मदिराएँ मेज पर सजी हैं-संगीत और नृत्य का रंगारंग प्रोग्राम साथ-साथ चलता है-यहाँ का प्रसिद्ध बैली नृत्य भी प्रस्तुत किया जाता है।

नील नदी के नीचे जल पर तैरता यह पोत एक सपने जैसा है-अनिर्वचनीय। बीच-बीच में ‘नेफरतिती‘ की ममी की नकल का पहनावा पहने एक ज्योतिषी आ जाता है-हर मेज पर जाकर वह हाथ देखता है और भाग्य का लेखा-जोखा मिर्च-मसाला लगाकर सुनाता है। बहुत से लोग उत्सुक होकर सुनते हैं। मनुष्य के हृदय में एक बहुत ही बड़ी शक्ति है, चेतनता या वह भावना जो स्वप्न-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय होती है। मनुष्य पूरा जीवन इसी एक भाव के आधार पर व्यतीत करता है और शायद इसी भाव की तीव्र अनुभूति होगी, जिसने मिस्र के पौराणिक निवासियों को उत्साहित किया होगा कि वह मृत शरीर को ममी में ढाल दें और पिरामिड की संरचना करके फिर से जी उठने के भाव को जीवित रखें।

यहाँ एक कथा बहुत प्रचलित है कि किसी मॉनेस्ट्री में कुछ गणनाशास्त्री और साधक रहा करते थे। उस आश्रम के निकट उन लोगों ने एक खाई खोद रखी थी जहाँ वह मृत संन्यासियों, पीरों को दफना देते थे। जब फकीर मर गया तो उसे भी खाई के उस तहखाने में डाल दिया गया और मुँह को चट्टानों से ढाँप दिया। बहुत बार भूल हो जाती है-मनुष्य मृत नहीं होता, उसे मृत मान लिया जाता है। बहुधा यह भी होता है कि मनुष्य जब मरता कभी है तब न दफनाकर किसी और तारीख दफनाया जाता है। 

फेंके जाने पर फकीर को होश आ गया। जब उसे स्थिति का पता चला तो घबराकर उस तहखाने से छूटने का प्रयास करने लगा। युक्तियाँ तलाशने लगा पर बड़ी तीव्रता से निराश भी होने लगा। खाई के बन्द परिवेश में कब्रिस्तान की उस सीलनभरी मौत का धुआँ उसे घबराहट से भरने लगा। वह प्रतीक्षा करने लगा, गुफा के घुटन-भरे अँधेरे गलियारों में भटकने लगा। मन में जीने का भाव प्रबल था। अतः जीवित रहने के लिए वह मुर्दो का मांस खाने लगा और नालियों में रिसता पानी अपने होंठों की प्यास बुझाने के लिए प्रयोग करता रहा। उसे प्रतीक्षा थी कि जब कोई संन्यासी या पीर मरेगा और खाई के पत्थर उसके मृत शरीर के लिए द्वार बनायेंगे तो वह उछलकर बाहर आ जायेगा।

आश्चर्य ही था, उस मॉनेस्ट्री में सात साल बाद मौत हुई और सात साल की इस लम्बी प्रतीक्षा के बाद वह फकीर खाई से बाहर निकल आया, यही नहीं, उसके पास सामान की एक बड़ी गठरी भी थी। यह सामान वह मृत शरीरों और उनके साथ दफन किये हुए सामान में से छाँट लाया था जिन्हें वह सात साल तक जोड़ता रहा था, नया जीवन चलाने के लिए। लोग उसे देखकर घबराये, उसे पहचाना भी नहीं, क्योंकि वह तो मर चुका था। सब उससे एक ही सवाल करते थे कि वह कैसे इतने साल सड़ते-गलते मृत शरीरों के बीच अकेला जीता रहा-आश्चर्य था, ऐसी अद्भुत जीजिविषा के साथ। 

पूछने पर फकीर ने कहा, “आशा के सहारे, किसी के मरने की आशा के सहारे, कोई मरकर मरघट में उतारा जाये तो उसके लिए खोले गये द्वार से मैं बाहर आ जाऊँ। अब सात साल बाद आशा सफल हुई।‘‘ मृत्यु पर भावना की विजय हुई और यही भाव विश्वास, यही जिजीविषा, इन पिरामिड्स के केन्द्र-बिन्दु में शायद आज भी जीवन्त है। 

मैं पिरामिड के इस पार खड़ी हूँ, मेरा होना बड़ी दूर का है, मैं उनसे अछूती और अस्पर्शित हूँ। मैं मात्र द्रष्टा हूँ, एक पर्यटक परन्तु ये पिरामिड शायद, एक ग्राहकता हैं, पैसिविटी-ये मनुष्य के दुःख और मृत्यु को सोख लेते हैं। ये शरीरों का रूपान्तरण कर सकते हैं। मुझे भी लगता है, जैसे ये एक द्रष्टा की तरह हजारों वर्षों से खड़े हैं-सबको देख रहे हैं परन्तु स्वयं को नहीं देख पा रहे। चलो, मैं इनसे 

प्रेरणा लेकर अपने आपको देखना प्रारम्भ करूँ, दृश्य से द्रष्टा हो जाऊँ-कि मुझे अपना ‘होना‘ दृष्टिगोचर हो जाये और फिर से मैं एक और यात्रा पर चल पडूं-जिसे खोजने निकलूँ वह मिल जाये, जो शायद इस जीवन में सम्भव नहीं। -कुसुम

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साक्षात्कार

स्त्री अभी भी हाशिये पर है

(जनाब मजीद अहमद से बातचीत)

अलीगढ़ में बिताए हुए दिन, वहाँ की संस्कृति और भाषा कुछ चेहरे-आपके लेखन में अकसर दस्तक देते रहते हैं...

मेरा जन्म अलीगढ़ में हुआ। मेरे दादाजी बैरिस्टर थे और उन्होंने चार साल लंदन में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी। उन चार वर्षों में वह शाकाहारी रहे और घर पर भी वैसा ही नियन्त्रण रहा। मेरी दादी के पिता आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के मित्र थे और इसी कारण मेरी दादी भी कट्टर आर्यसमाजी थीं। जालंधर विद्यालय से उन्होंने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की थी। विवाह के बाद अलीगढ़ के आर्य समाज की स्थापना और उत्थान में उन्होंने बहुत योगदान किया। परन्तु अपनी तीन बेटियों और मेरे पिता श्री सुरेन्द्र कुमार के जन्म के बाद असमय ही स्वर्ग सिधार गयीं। मेरे दादाजी ने अकेले अपने बच्चों को पाला-पोसा और शिक्षित किया। मेरे पिता ने इलाहाबाद के यूनियन क्रिश्चियन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की थी। शायद यही कारण रहा होगा कि उन्हें साहित्य और कला से लगाव था। 

मेरी माँ सुशीला रानी रावलपिंडी की थीं, परन्तु इससे पहले वह अलीगढ़ की सरजमीं पर अपनी कुछ पहचान बना पातीं वह भी जैसे कुल की रीति निभाती हुई मेरे दो भाइयों और अंतिम संतान के रूप में मुझे छोड़ कर जाने किन गुमनाम अंधेरे की खाइयों में समा गईं। मृत्यु दुर्घटना है, परन्तु मृत्यु बहुत से जीवन परिवर्तित कर देने का कारण भी है। तभी तो सभी कुछ घटित हुआ था उस घर में! मुझे मेरी संतानविहीन बुआ यशोदा रानी ने गोद ले लिया और मेरी माँ की तस्वीर को भी घर के किसी फालतू कोने में दफन कर दिया गया। परन्तु मिटा देने पर भी क्या कुछ आत्माएं और उनका प्रभाव समाप्त हो जाता है? दुःख का बोध, एक घुटा-घुटा-सा खालीपन जाने कैसे हृदय की सबकोंशस या आत्मा की चेतनता में ऐसे आ बैठता है, जैसे गहरे पानी में बड़ा-सा सिल-पत्थर । क्या दुःख का अस्वीकार यह नहीं कहता कि जो भीतर गहरा बैठ गया है, वह दुःख निरोध का प्यासा है। मुझे बचपन से लेकर अब तक अपनी माँ के अस्तित्व का अचानक धुलीपुंछी स्लेट-सा गुम हो जाना, उनके ‘स्व‘ का, उनके ‘बीईंग का नथिंगनैस‘ के कुहासे में खो जाना कभी भी सहन नहीं हुआ। जो साथ-साथ जन्मते हैं वह संगठित रहते हैं, पर मैं अपने भाइयों से अलग आगरा में अपनी बुआ के घर ‘कुसुम पुरी‘ के रूप में पली-बड़ी हुई। साधारण-सा घर, साधारण-सा जीवन परन्तु असाधारण रूप से धार्मिक और सीधा-सच्चा। महाप्राण ‘निराला‘ की पंक्तियाँ बरबस याद आ रही हैं 

बाहर मैं कर दिया गया हूँ।

भीतर पर भर दिया गया हूँ।।‘ 

मेरे पिता की भव्य कोठी ‘साकेत‘ आज भी अलीगढ़ में मैरिस रोड पर शान से सिर उठाये खड़ी है। आज भी उसी कतार में कितने ही नवाबों के घर हैं-नवाब छतारी, नवाब रामपुर जो अब एक पुरानी ढहती संस्कृति को सीने में दबाये एक बुझी हुई साँस जी रहे हैं। 

आगरा में स्कूल की शिक्षा समाप्त करने पर मैं अलीगढ़ वापिस भेज दी गई, एक पितृसत्तात्मक आग्रह अधिकार के तहत। सोलह वर्ष की उम्र में न तो आशा रानी मुझे बेटी के रूप में स्वीकार सकीं और न ही मैं उस अतरंगता स्नेहिल आवेग में बह सकी जो एक माँ से प्राप्त होता है। किसी का किसी के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं था। हमारे बीच एक अदृश्य दीवार थी। शरीर मेरा आवरण था तो, परन्तु ‘मैं‘ नहीं थी वहाँ। अलीगढ़ के मुस्लिम कॉलेज में बी.ए. में दाखिला लिया। एक नया वातावरण, नये मुसलमान मित्र। मैं प्रयास करके निरन्तर अपने, अपनेपन में काँटों के साथ प्रेम के फूल भी आरोपित करने का प्रयास करती थी। घर में दादाजी हवन करते थे, उसमें सम्मिलित होना पहले तो हम सब के लिए किसी मजबूरी जैसा था, बाद में वह अनुष्ठान कम से कम मेरा तो भावनात्मक सम्बल बन गया। अलीगढ़ के सूने-निर्जन में वही बस मेरा संवाद बन गया-अपने और परमात्मा के मध्य। मैंने अपनी आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया‘ में भी लिखा है कि मैंने अपने अपनेपन को किसी आलोक के प्रति निराश्रित अवस्था में एक काले गोल चिह्न के रूप में पढ़ने की मेज़ के सामने की दीवार पर लगा दिया था। आज फिर वह शून्य-सा काला बिन्दु स्मृति में जागा है तो मैं देख पाती हूँ कि मेरी अनेकानेक निराश इच्छायें, अमूर्त कामनायें सिमट कर एक काले चिह्न में समायी हुई थीं। उन्हें देखकर मैं अपनी धड़कनों पर नियन्त्रण पा लेती थी। शीन काफ निजाम ने भी तो कहा था

सर नगूँ है साइतों के सिलसिले।

दूरियाँ ही दूरियाँ हैं, फासले ही फासले।‘ 

हाँ, उस बीच मेरा संवाद, मेरा Communication पुस्तकों से बढ़ता चला गया। घर में बहुत ढेर सारी ग्रंथावलियाँ थीं, और लगभग सभी प्रचलित हिन्दी, अंग्रेज़ी की पत्रिकायें भी निरंतर आती थीं, जिससे साहित्य से जाने-अनजाने मेरा सम्बंध जुड़ता चला गया। वैसे भी आगरा में मेरे पापा श्री विशनदास पुरी ने मुझे साहित्य से प्रेम करना सिखाया था। जब मैं छोटी-सी थी तो वह कहते थे-यह कविता पढ़ो कुसुम, ‘वर्डसवर्थ‘ की है

“My heart leaps up when I behold a rainbow in the sky. So was it when I was a child. So it is When I am a man. A child is father of a man.”

उन्हें हिन्दी नहीं आती थी, परन्तु अंग्रेज़ी की पुस्तकें पढ़ते थे और मुझे कंठस्थ कराते थे। मैं घर के काम में बुआजी का हाथ बंटाती तो कहते, ‘नहीं‘, तुम इसके लिए नहीं बनी हो। तुम्हें कुछ बनकर दिखाना है। ‘‘Not just a house wife.” शायद वही वाक्य मेरे अवचेतन में मूलमन्त्र का रूप ले एक आलोक स्मृति-सा रह गया, इसीलिए मैं “Just a house wife.” नहीं रह पायी। शायद आज उसी ने मेरे ‘स्व‘ को, मेरी ‘रूह‘ को धुंधलाने से बचा लिया।

जिन दिनों मैं मनोविज्ञान में एम.ए. कर रही थी तो मेरे बड़े भाई ने मुझे एक पुस्तक भेंट की ‘The diary of Anne Frank‘ वह एक यहूदी नवयुवती ‘ऐनी‘ की गाथा थी, जो नाजियों के जुर्म से छुपकर हालैण्ड के एक घर में करीब दो वर्ष तक रही थी और अंत में किसी ‘कंसन्ट्रेशन-कैम्प‘ में उसकी मृत्यु हो गई। मृत्युपरांत ऐनी की डायरी लोगों के हाथ लगी और उसी के आधार पर यह पुस्तक लिखी गई थी। मेरे लिए वह पुस्तक एक आत्ममंथन जैसी थी। मैं भी अपनी कुण्ठाएं दीवार पर बने शून्य से उतार कर अपनी डायरी में खारिज करती रही और कुछ समय बाद लिखने लगी! जैसे- “खड़ी तो रहूँगी मैं उस खण्डहर की तरह। जो दर्शनीय तो है, पर जिन्दगी की धड़कनों से ढका हुआ।‘‘ वह मेरी कवितायें भी थीं और गद्य भी। घर के पुस्तकालय में और कॉलेज में हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के माध्यम से बहुत-सी कालजयी रचनायें, मेरे अंतस् में अपनी छाप छोड़ने लगीं-मुड़ कर देखती हूँ तो लगता है वह सारी रचनायें, ग्रन्थ, ‘मास्टर पीसेज‘ उन लेखकों की ‘ईगो-ग्राफीस‘ हैं-उनके ‘स्व‘ का एक दर्पण, जो उनकी आत्मा से सम्प्रेषित होकर मुझ तक आया था। उनकी समूची ‘फिक्शनल-डेंसिटी‘ मेरी मानसिकता पर अपना प्रभाव बनाने लगी, एक ‘वस्तुनिष्ठ सह-सम्बंध।‘

इससे पहले कि मैं अपनी कोई निश्चित राह तराशती, अपनी दुविधाओं के मध्य अपने ‘ऐक्य‘ को ‘यूनाइट‘ करती जोड़ती, कुछ करती मैं खंडित होती चली गई। सिर झुका कर मैंने विवाह कर लिया और अपने एकत्व से उठ कर अनेकता के संसार में चली गई। वह परिवार जो मेरे लिए नितान्त अजनबी था और अनजाना था, उस घर का ठेठ, पंजाबी, मिडिल क्लास परिवेश अब मुझे अपनाना था। 

आज साहित्य-जगत् में कुसुम अंसल एक चर्चित नाम है, लेकिन कुसुम पुरी से कुसुम अंसल की जो संघर्ष-यात्रा है, उसे कम ही लोग जानते हैं। आप बताइए कि साहित्य के संस्कार आपको अलीगढ़ में अपने पैतृक परिवार से मिले या आपने उन्हें स्वयं अर्जित किया? 

मजीद भाई, अब आपका यह प्रश्न मेरी कुसुम पुरी से कुसुम अंसल होने की यात्रा। मैं तो अलीगढ़ से दिल्ली चली आई थी। दहेज के बहुत से सामान में एक सूटकेस भी था, जिसमें मेरी वे सब पुस्तकें थीं जिनसे मुझे लगाव था, जैसे महादेवी वर्मा की ‘यामा‘, ‘नवनीत‘ द्वारा प्रकाशित उर्दू की शायरी के ‘शेरो-सुखन‘ के अंक, शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की ‘देवदास‘, रवीन्द्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि‘ आदि। परन्तु जिस घर में मैंने प्रवेश किया था उसकी माँग भिन्न थी। संयुक्त परिवार, सास, ससुर, ननद, देवर। वह श्रम का पसीना चाहता था, मेरा अलसाया जीवन-दर्शन नहीं। मैंने भी अपनी साड़ी के पल्लू को कमर से खोंस लिया और सभी गृह कार्यों को सहजता से हाथ में उठा लिया। खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने-तहाने तक। धनाभाव भी था ही और कठिनाइयाँ भी कम नहीं थीं। पर मैं उन्हें हँस कर झेल गई। अपने तीन बच्चे और पति के व्यावसायिक संघर्ष के लिए जुटी रही। समय बीतता गया। उस अनेकता की भीड़ में मेरा अपना एकत्व जाने कहाँ पीछे रह गया। मैं अपनी आत्मा और शरीर दोनों को ही देखना भूलसा गई। भावनाएँ-विचार, रिश्तेदारों, भीड़ का कोलाहल और संघर्ष में अनेक वर्ष विलीन होते चले गये बेआवाज़ । बच्चे थोड़े बड़े हुए। समय हाथ आया, तो, एकाएक मुझे अपने भीतर अजीब-सी घुटन महसूस होने लगी। यकायक मुझे लगा जैसे संसार की उस भीड़ में अजनबी-सी अकेली खड़ी थी मैं! अपने ही निज के अस्तित्व से बेखबर कहाँ जा रही हूँ? 

जब अपने परिवेश के आस-पास दृष्टि डाली तो घर के छोटे-छोटे कमरों में मेरा दम घुटने लगा। गहरे मानसिक तनाव से ग्रस्त मैं लोदी गार्डन जाकर किसी घने पेड़ की छाया के नीचे बैठ जाती। मेरे शरीर की कैमिस्ट्री में अलीगढ़ का बगीचा था, हरी घास थी, जामुन, केले और आम के पेड़ थे, प्रकृति का भरपूर साहचर्य । शायद वही था जो मेरी चेतना पर दस्तक दे रहा था। उसी बीच मेरी एक मित्र मुझे मिलने आयी। उसने जाने कैसे झाँक लिया मेरे भीतर, वह भी अत्यंतिक गहराई से? उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उठा लिया, “अरे कुसुम, तू जी रही या जून भुगत रही है? क्या हो गया है तुझे? तू कॉलेज में तो पूरे क्राउड में अलग थी, एक ‘ब्राइट इंडीवीज्युअल‘, अब क्या होती जा रही है तू? पूरी ‘बहनजी‘ ! मैंने तेरे फ्रैक्चरड मैटाबोलिज़्म को देख लिया है, चल उठ, आ मेरे साथ।‘‘ 

मजीद भाई, अलीगढ़ की संस्कृति उन दिनों आज से कहीं अधिक भिन्न थी। हिन्दू-मुसलमानों के झगड़ों, तनाव आदि के बावजूद वहाँ के वातावरण में आपसी भेदभाव कम था। मेरे घर में जहाँ हवन होता था, आर्यसमाज के, उस समय के मुख्य प्रचारक गुरुस्वरुप स्वामी धु्रवानन्द महीनों तक रहा करते थे। अकसर शाम को हमारे घर के लॉन में उनका प्रवचन होता था जिसमें और शहर के अन्य प्रमुख लोग भी भाग लेते थे। हम बहन-भाइयों को मंच पर सस्वर मन्त्रेच्चारण भी करना होता था। वहीं दूसरी ओर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मजाज का लिखा तराना ‘यह मेरा चमन, यह मेरा चमन, मैं अपने चमन की बुलबुल हूँ‘ वे मेरे अवचेतन को कहीं न कहीं से प्रभावित भी कर रहे थे। जब इस पंक्ति को ऊँचे स्वर में गाया जाता था, “ज़र्रात का बोसा लेने को सौ बार झुका आकाश यहाँ तो मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते थे। अद्भुत था वह समय भी स्वीकृति और अस्वीकृति का, जहाँ कोई भेदभाव का प्रश्न नहीं था। मेरे मन के मध्य अपने शिक्षा-स्थल के प्रति जो भक्तिभाव पनप रहा था, वह बुनियाद पत्थर जैसी मेरे संस्कारों में आज भी मौजूद है। अलीगढ़ में, जनवरी के महीने में ‘नुमाइश‘ भी लगा करती थी जहाँ चार दिन के रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। एक दिन मुशायरा, कवि-सम्मेलन, संगीत-सम्मेलन और अंतिम दिन उच्चस्तर के नाटक मंचित होते थे। हम सब साल भर उसकी प्रतीक्षा करते थे। कवि-सम्मेलनों में डॉ. हरिवंशराय बच्चन की ‘मधुशाला‘, भवानीप्रसाद मिश्र की ‘मैं गीत बेचता हूँ।‘ गोपालदास ‘नीरज‘ का गीत ‘कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे‘ के साथ-साथ पुष्पा हंस के पंजाबी गीत, आसा सिंह मस्ताना की ‘हीर‘...आदि मेरी स्मृतियों में आज भी ताज़ा हैं। अलीगढ़ में उन दिनों होटल आदि नहीं थे तो अकसर कोई न कोई कवि हमारे घर ही ठहर जाते थे। तलत महमूद उन दिनों सिनेमा के लोकप्रिय ग़ज़ल गायक थे। परन्तु हमारे घर पर मुझे याद है, उन्होंने गाया था, “यह जीवन है उपवन तू उसमें फूल खिला।” वह सभी कछ मझे एक अजीब-सी सिहरन से भर देता था. फैस्सीनेट भी करता था। परन्तु मेरा कभी किसी लेखक, संगीतज्ञ से कोई परिचय नहीं कराया जाता था। मैं दूर से सभी कुछ देखती थी जैसे कोई खिड़की के बाहर झमाझम बरसते पानी को देखता है, पर छू नहीं पाता। 

एक और घटना मैं भुला नहीं पाती, तब मैं शायद पाँच-छह बरस की थी जब भारत और पाकिस्तान का बँटवारा हुआ था। हमारे रिश्ते के बहुत से परिवार लाहौर और रावलपिंडी से अलीगढ़ आ गये थे। एक अपनी पुरानी पड़ी कोठी में मेरे पिता ने उन्हें ठहराया था। महाराज रक्खे गये थे और परिवार की बुआ, चाची सब मिलकर खाना बनवाती थीं। पूरा दिन घर में एक आपाधापी मची रहती थी। 

पापा की ताई जी लाहौर से आयी थीं। लाहौर में ताया जी की शायद शुगर मिल थी। एक बहुत बड़ी हवेली थी और उनके नाम की वहाँ प्रसिद्ध सड़क थी, जिसे ‘लाला भगवानदास रोड‘ कहते थे। बड़ी ज़मीन-जायजाद, भरा-पूरा घर, दौलत, सोने-चाँदी के बर्तन, ज़ेवरात छोड़ कर ताई जी एक सफेद धोती में लिपटी पथराई-सी हमारे गेस्टरूम में ठहराई गईं थीं। वह रात-बिरात गेट की तरफ भागतीं, पकड़ने पर पूरे आवेग से चिल्लातीं, ‘मुझे छोड़ दो! मुझे अपने घर जाना है।‘ वह उस तूफान को, अचानक बरपे कहर को, झंझवात को स्वीकार नहीं कर पाईं और वैसे ही उसी चोट खाई बेसुधी में स्वर्ग सिधार गईं। उनकी दो गोद ली हुई बेटियाँ थीं, विद्यावती और गौरां। विद्या बुआजी 

गाँधी जी की विचारधारा से प्रभावित थीं। जब तक गाँधी जी थे, वह उनकी सेवा में उनके साथ रहीं। बाद में दिल्ली के निकट ‘पट्टी कल्याण‘ में मृत्युपर्यंत तक एक आश्रम में रहीं और उन्होंने अपना सारा जीवन दुखीजनों की सेवा में बिता दिया। वह शायद बाल विधवा थीं। गौरां बुआजी शिमला में रहती थीं, उनके भी कोई संतान नहीं थी, उनके पति डॉक्टर थे, परन्तु वह समाजसेवा के कार्य करती थीं। उन्होंने गरीब महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए आश्रम स्थापित किये थे। मेरा उन दोनों से मिलना होता रहता था, उनकी उज्ज्वल चरित्रवता, सेवा में संलग्न निष्कपट व्यवहार मुझे दैवीय लगता था। वह दोनों ही भौतिक रूप से ही नहीं वैचारिक रूप से भी अति गौरवर्णी और रूपवान थीं। बाद में गौरां बुआजी को दिल्ली में ‘जमनालाल बॅजाज पुरस्कार‘ भी मिला था, मैं तब भी उनके साथ थी। मैं मन ही मन उनके सेवाभाव से बहुत प्रभावित थी, और चाहती थी उन जैसी बन सकूँ।

मेरे आगरा वाले पापा ने मुझे पुस्तकों के प्रति प्रेम, साहित्य से मेरा परिचय कराया था, वह चेहरा, सीधा सच्चा निष्कपट प्रेम करने वाला व्यक्ति, मेरे लिए बहुत 

महत्त्वपूर्ण है। उन्हीं का आशीर्वाद रहा होगा जो मेरी हर रचना में एक अदृश्य सुगंध-सी सम्मिलित है। सारे अन्तर्विरोधों के बावजूद मुझे लगता है कि, उन्हीं के पकड़ाये सूत्र सच्चाई, धार्मिकता, निःस्वार्थ प्रेम, व्यवहार मेरे शरीर के हर कोने में जाने-अनजाने आकर समा गये हैं।

दिल्ली आने के बाद आप थिएटर से जुड़ीं। उस समय के अनुभव बताने के साथ-साथ यह भी बताइये कि आपने थिएटर छोड़ क्यों दिया? 

अपनी मित्र का हाथ थाम कर ‘इप्टा‘ के परिसर में आकर मैं खड़ी तो हो गई थी और यह भी सच है कि इतनी अचानक घटी घटना ने मुझे कुछ भी सोचने-विचारने का समय भी नहीं दिया था। पर जैसे निश्चय अपने आप हो जाते हैं, तो तय था कि मुझे अभिनय करना है। भविष्य का चुनाव जाने किसने किया? अपने आप हो गया या अनजाने में? न तो मेरे पास कोई अभिनय की शिक्षा की डिग्री थी न ही कोई सर्टिफिकेट, बस मैं थी अकम्पित, अकेली, केवल अपने वजूद के साथ खड़ी हुई। पहले ही दिन मुझे मेरा रोल समझा दिया गया, नाटक की स्क्रिप्ट हाथ में थमा दी गयी। बातें हुईं, छोटे-छोटे चाय के गिलासों में चाय भी पी गयी। किसी ने भी मेरे चेहरे को मिसेज अंसल के चेहरे से नहीं जोड़ा (उस समय तक हमारी कई बहुमंजिला इमारतें कस्तूरबा 

गाँधी मार्ग और बाराखम्भा रोड पर सिर उठाये खड़ी थीं)। मैं तो बस वहाँ एक किरदार थी उन्हीं जैसी। शारदा बरुआ, कंवल अजीम (जो प्रसिद्ध सिनेमा के अभिनेता शाहिद कपूर की माँ हैं) राजेन्द्र सिंह मेरे सह-अभिनेता थे। निर्देशक थे अजीज कुरैशी, जो गालिव के कई नाटक कर चुके हैं और अभिनय में कार्यरत हैं। ग़ालिब पर व्यंग्य नाटक था-‘ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे ।‘ जिसमें मैं आधुनिक ग़ालिब की महबूबा थी। मुझे अभिनय के समय पैंट या शरारा पहनना होता था। पूरा नाटक त्रिवेणी सभागार में खेला जाता था और मुझे दर्शकों के मध्य से एन्ट्री लेनी होती थी। मैंने बड़ी सार्थकता से अपने उस रोल को निभाया, ‘इवनिंग न्यूज‘ की कटिंग आज भी मेरे पास कहीं रक्खी हैं, जहाँ मुझे अभिनय के लिए सराहा गया था। वहीं उसी वार्तालाप के बीच सलमान रिज़वी जो हम सबसे बहुत छोटा था, शायरी सुनाता रहता था, उसी से मैंने शेयर किया कि मैं भी कॉलेज के जमाने में कुछ न कुछ लिखती थी, कवितायें, कहानियाँ और दो छोटे उपन्यास भी लिखे रक्खे हैं। और फिर सभी ने मुझसे पूछा, ‘लिखा था तो उसे छपवाया क्यों नहीं?‘ 

हाँ, वह नया नकोर प्रश्न, वह वाक्य मेरे मन में दस्तक देने लगा, ‘हाँ, छपवाना भी कुछ होता है। पर मैंने तो कभी उस विषय में कुछ सोचा ही नहीं।‘ बस घर आकर अपनी पुस्तकों के संदूक को टटोला। अधिकतर पुस्तकों को दीमक खा चुकी थी, जो बची-खुची थीं उन्हें झाड़-पोंछ कर साफ किया, अपनी नोटबुकें सहेजीं, उसमें से निकाल कर एक पुराने उपन्यास की पांडुलिपि सलमान को देते हुए कहा-‘सलमान पढ़कर बताना छपवाने लायक है क्या?‘

उसने कहा-ठीक है, वह उसे ले गया। कुछ दिन बाद उसे लौटाते समय उसने कहा, ‘इसे फिर से लिखो, बहुत ‘टीनएजरस‘ जैसा है।‘ हाँ, और यह भी एक बहुत 

महत्त्वपूर्ण घटना थी, मेरे नाटकीय अस्तित्व के बीच, जो जीवन में एक नये किरदार की भूमिका निर्धारित करने चली आयी थी। 

‘इप्टा‘ के ऑफिस में शबाना आज़मी की माँ शौकत आज़मी और क़ैफी आज़मी से भी मुलाकात हुई थी। वहीं भीष्म साहनी भी आते-जाते थे। एक नया पृष्ठ जुड़ रहा था जीवन में। हाँ, यह बात अलग थी कि अपने घर के वातावरण में मेरे इस नये रूप को लेकर काफी अंसतोष था। हर शाम मैं गाड़ी उठाकर चली जाती थी, एक फॉर्मूलाबद्ध घर की एक साधारण-सी खाना पकाती गृहिणी और ऐसा निर्भीक कदम ? ‘कुछ तो लोग कहेंगे! लोगों का काम है कहना।‘ मैं जरा भी नहीं लड़खड़ाई, विद्रोह जैसा एक अक्खड़पन व्यवहार में पसर आया था। नाटक के लिए पूरी टीम के साथ थ्री टायर ट्रेन में लखनऊ, कानपुर की यात्रायें भी कर आई। वह सब सम्भव रहा इस कारण भी, कि सुशीलजी मेरे साथ थे, उनका विश्वास मेरा सम्बल था और हाँ वही, मेरी पूरी जीवन-यात्रा की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति हैं जो पद्मासन जमाये मेरे अंतस् में बैठी है। नाटक दो वर्षों तक चला था, पता नहीं अब नाटक उतना समय चलते हैं या नहीं? पर मेरे व्यक्तित्व को नयी अभिव्यक्ति देने के लिए वह उतने दिन मंचित हुआ था शायद।

अब आपने पूछा है नाटक मैंने क्यों छोड़ दिया? ‘ग़ालिब‘ के समाप्त हो जाने के बाद बहुत दिन तक दूसरा नाटक नहीं हुआ और फिर जो नाटक किया जाना था, उसका रोल मुझे बहुत पसंद नहीं आया। इस बीच सुशीलजी भी मेरे शाम के समय रिहर्सल पर जाने पर थोड़ा-सा असंतुष्ट रहने लगे थे। एक बार प्रणव को खसरा निकल आया था, और वह तेज बुखार से तप रहा था, परन्तु मुझे जाना था, तो मैं चली गई परन्तु ऐसी ही घटनाओं ने मुझे मंच के आकर्षण से पीछे खींच लिया। मैंने अभिनय छोड़ दिया परन्तु कलम उठा ली। सलमान के सुझाव को मानकर अपने पुराने उपन्यास को नये सिरे से लिखना आरम्भ किया।

सत्तर के दशक के थिएटर और आज हो रहे थिएटर में आप किस तरह की समानताएँ और किस तरह के फर्क देखती हैं? 

मेरा मानना है कि सत्तर के दशक और आज के समय के थिएटर में समानतायें भी हैं और अन्तर भी। सत्तर के दशक तक आते-आते नाटक जीवन के निकट और निकटतर आ गया था, जो वास्तविक अधिक था काल्पनिक कम । कुछ ऐसा जैसे घर के रोशनदान से हम किसी की जीवनचर्या, घटनाओं को देख रहे हों। नाटकों के पुराने रुप से अलग जहाँ मुख्य चरित्र धीरोदात और सर्वगुणसम्पन्न होते थे। आज के नाटक का मुख्य पात्र चोर-उचक्का भी हो सकता है और भिखारी भी। आज के समय में नाटक के क्षेत्र में प्रयोग भी बहुत हो रहे हैं-जैसे नुक्कड़ नाटक या ‘मोनोलौग‘, जहाँ एक ही अभिनेता पूरे कथानक को अकेले ही मंचित करता है। अपने दो नाटक लिख लेने के बावजूद मैं नाटक के क्षेत्र में अपने को बहुत समर्थ नहीं पाती हूँ इसी लिए इस विषय में अधिक नहीं कह पाऊँगी।

आपकी साहित्य-यात्रा का ग्राफ उत्तरोत्तर बढ़ा है और आपने अनेक विधाओं में लिखा भी है। एक विधा से दूसरी विधा में शिफ्ट करने के पीछे कौन-से कारक हैं।

जहाँ तक मेरी साहित्य-यात्रा के ग्राफ के विकास का प्रश्न है, मैं स्वयं नहीं जानती ऐसा क्यों हुआ। पहले तो आपको बता दूं कि अपने उपन्यास ‘एक और पंचवटी‘ की सफलता, उसका अन्य भाषाओं में अनुवाद हो जाना मेरे लेखकीय अस्तित्व के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समय था। उससे पहले मैं किसी भी लेखक को विशेष जानती-पहचानती नहीं थी, अपने पापा के कहने पर मैं जैनेन्द्र जी के घर चली गई थी और उसकी पंचवटी‘ के पहले संस्करण की भूमिका उन्होंने ही लिखी थी। जब थोड़ा-बहुत अन्य लेखकों से परिचय हुआ तो लगा, विवाह के बाद से तब तक, बारह-चैदह वर्ष के उस लम्बे अन्तराल में हिन्दी साहित्य से मैं नितान्त अनभिज्ञ रही थी। एक लम्बे समय से कुछ पढ़ा ही नहीं, क्या लिखा जा रहा है? बस मैंने हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. करने की ठान ली। मनोविज्ञान में एम.ए. होने के बावजूद मुझे चण्डीगढ़ विश्वविद्यालय में दाखिला मिल गया। उन दिनों वहाँ प्रो. यश गुलाटी थे, वही मेरे निर्देशक नियत हो गये। उन्हीं दिनों मुझे दूरदर्शन से ‘सीरियल‘ लिखने का निमन्त्रण मिला। दूरदर्शन के निर्देशक हरीश खन्ना, हमारे परिवार को जानते थे और मेरे लेखन को पढ़ चुके थे। मेरे नाकटकार रूप को भी देख चुके थे। दूरदर्शन पर उस समय केवल ‘हम लोग‘ आता था। वह चाहते थे मैं महिलाओं पर एक सीरियल लिखू। उन्होंने अपने दफ्तर बुलाकर मुझे अपनी सारी योजना समझाई, बताया कि मुझे इक्कीस ‘एपीसोड‘ लिखने हैं और हर ‘एपीसोड‘ कम से कम तीस पृष्ठ का होना चाहिए। मैंने ‘कॉन्ट्रेक्ट‘ पर हस्ताक्षर तो कर दिये, परन्तु फिर अपनी पढ़ने की मेज पर खाली कागजों के निकट बैठकर, सोचती रही, क्या हर चुनौती को स्वीकार कर लेना चाहिए? मन में पूरा का पूरा झंझावात चक्कर मार रहा था। ‘एपीसोड‘ का ‘ए‘ तक तो जानती नहीं, कैसे लिखूगी? आस-पास कोई सहायक मित्र, गाइड, कोई भी तो नहीं था। जिधर देखती, एक गहरा शून्य, धुंधलाता अंतरिक्ष नजर आ रहा था, परन्तु जब ओखली में सिर दिया तो मूसल का क्या डर। जाना था उस अविजित क्षेत्र में, और सच कहूँ मजीद भाई, नहीं जानती मैंने कैसे वह तीस पेज का पहला ‘एपीसोड‘ लिखा और बाकी के ‘एपीसोड‘ की रूपरेखा बनाकर खन्ना साहब को उनके दिये निहित समय में पकड़ा भी आई। और महा आश्चर्य कि मेरा सीरियल स्वीकृत भी हो गया। जीवन में ऐसे ही जाने कैसे, किस कोने से परिवर्तन दबे कदम घुस आते हैं कि पता ही नहीं चलता। वही अदृश्य रूपों से अंतस् की दीपशिखा को एक कोने से उठा कर दूसरे कोने में रख देते हैं। और वही रोशनी, वही प्रकाश जीवन की दिशा का रुख मोड़ देते हैं। मेरे साथ भी वही हुआ, अपने शोध कार्य के साथ जहाँ मैंने बहुत-सी पुस्तकों, ग्रंथों, आलोचनाओं को पढ़ा, नोट्स बनाये चण्डीगढ़ की यात्रायें कीं, वहीं दूसरी ओर ‘एपीसोड‘ की विधा को भी अपने नजरिये में ढालना आरम्भ किया। परिणामस्वरूप मैं अपने आस-पास के सामाजिक वर्ग की गतिविधियों को सतर्कता और एक विशेष दृष्टि से देखने लगी थी, क्योंकि वही तो मुझे लिखना था। बेनकाब करना था उन सब परिवेशगत, अतिशयोक्तियों या कुरीतियों को, जो समाज के दलित, शोषित मथित-व्यथित और पीड़ित वर्ग को जाग्रत कर दर्शकों को चैंका सकें। वैसी ही प्रभावोत्पादक भाषा का चयन करना था। मेरा विषय ‘स्त्री‘ था, स्त्री के विभिन्न रूपों का प्रतिबिम्बन, उनकी सरल-चित्रता से लेकर विशिष्टताओं की कोलाहल-मुखरित अभिव्यक्ति, जिसमें आपसी सम्बन्धों का खोखलापन मुख्य था। ‘तितलियाँ‘ नाम से वह दूरदर्शन पर दिखाया भी गया था। वह एक अलग दास्तान है, उसकी भूलभुलइयां में अभी नहीं जाना चाहती।

आपका लेखन से उठकर दूरदर्शन के माध्यम की साहसिक यात्रा के अनुभव क्या थे? 

जब बात विधा के परिवर्तन पर आ रुकी है तो यह समूची प्रक्रिया मेरे विकास की एक अद्भुत सीढ़ी जैसी थी ‘मैटामार्फोसिस‘, जैसा कि मैंने कहा, मेरा ‘सीरियल‘ स्वीकृत हो चुका था। स्वीकृति का वह मामूली-सा दफ्तरी पर्चा उस समय एक लाख रुपये में विकता था, जिसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी। परन्तु वह पर्चा लगभग एक साल तक मेरे ड्रार में पड़ा रहा और मैं अपने शोधकार्य में व्यस्त रही। तभी एक दिन खन्ना साहब का फोन आया कि “एक महिला प्रोड्यूसर हैं शोभा डॉक्टर, जो ‘हम लोग‘ भी बना रही हैं। वह आपका लिखा ‘सीरियल‘ प्रोड्यूस करना चाहती हैं।‘‘ मैं उनसे मिलने के लिए तैयार हो गई। पता चला वह मुम्बई में रहती हैं, और वहीं बुलाया है मीटिंग के लिए। फिर एक नयी चुनौती? सुशील जी को बताया इससे पहले कि वह उस विषय में सोच-विचार करते शोभा डॉक्टर ने हमें फोन करके मुम्बई आने का निमन्त्रण दे दिया। नियत दिन सुशील जी ने मुझे हवाई अड्डे पर उतार दिया। लो यह टिकट, बिजनेस क्लास का है। अब से तुम्हें ही हैन्डल करनी होंगी अपनी सारी की सारी यात्राएं।‘ वह चले गये और मैं जैसे किसी अदृश्य-सी प्रवेश-परीक्षण के द्वार पर अकेली खड़ी रह गई। उस दिन तक मुझे बिजनेस और इकॉनमी क्लास का भेद भी मालूम नहीं था। मेरे सम्मुख अब दो परीक्षाएँ थीं, एक तो दूरदर्शन के उस परिवेश में अपने आपको स्थापित करना था, वह भी एक ऐसा क्षेत्र जिसके बारे में मैं कुछ नहीं जानती थी। दूसरा अपना घर-परिवार, जिसके सामने अपने आपको स्थापित करना, प्रमाणित करना, अपनी क्षमता या समर्थता के अनुसार कुछ बनके दिखाना था। चली तो आई थी, उस नियमित बँधी बँधायी गृहस्थी की नियमावली के बाहर, बिना किसी से सलाह-मशवरा किए, और आगे जाने के अतिरिक्त मेरे पास अब कोई विकल्प भी नहीं बचा था। मेरा हवाईजहाज आकाश में उड़ रहा था। चित्त के गह्वर में ढेर सारे प्रश्न थे, परन्तु यह भी कि कहीं भी, पश्चाताप नहीं था। हाथ में ‘तितलियाँ‘ की पांडुलिपि थी, जो एक दीप्त लौ-सी बनकर मेरे भीतर जल-बुझ रही थीं।

सच यह है कि मैंने सप्रयास अपने लेखन की विधाओं को बदला नहीं था, यह सब नियति थी या जाने क्या? जो मेरी कलम के दिशा परिवर्तन पर आकर हावी होती चली गई थी। 

‘जो कहा नहीं गया‘ हिन्दी में किसी स्त्री रचनाकार की पहली आत्मकथा है और यह भी माना जाता है कि हर आत्मकथा अर्द्धसत्य होती है। आप अपनी आत्मकथा के सम्बन्ध में क्या कहना चाहेंगी? 

कोई भी आत्मकथा अपने जिये हुए जीवन की वास्तविकता की कथा-यात्रा होती है, उसमें अपनी ओर से कुछ घटाया या जोड़ा नहीं जा सकता। केवल अपने उम्र भर के अर्जित अनुभवों को हम अपने कल्पनाशील विस्तार से जोड़ते हैं। जैसे बड़े हवेलीनुमा घर में मेरा बचपन बीता था, कठोर नियन्त्रण था, जिसके परिणामस्वरूप एक सूना अकेलापन जिया था, केवल पुस्तकें ही मेरे सहचर्य में शामिल थीं। और शायद वही मेरी आत्मा में ‘क्रिएटिव-लैजर‘ जैसा एक केटेलिस्ट का कार्य कर रही थीं। विवाह के बाद मैंने आर्थिक संघर्षों को, संयुक्त परिवार के अर्थहीन कोलाहल मिश्रित परिवेश को जिया था, जहाँ किसी अय्याशी या दखलअंदाजी की गुंजाइश नहीं थी। मेरी दिनचर्या एक तपस्या जैसी थी, एक श्रम का स्वेद था हर दिन, जिसमें हवन और वेदान्त की शिक्षा भी सम्मिलित थी। वहीं सारे अन्तर्निहित तनाव, आत्मान्वेषण तथा घटनायें जो भी थीं उन्हें ही कागजों पर उतारती चली गई। अब उसमें 

रमणिका गुप्ता जैसी लेखिकाओं वाला या अन्य आत्मकथाओं में से उबलता ‘चीप-थ्रिल‘ या दाँवपेंच नहीं है, इसके लिए तो उसमें दोष मेरा नहीं है, मेरे जिये हुए जीवन का है, जिसे मैंने पूरी ईमानदारी से ‘ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया‘ जैसी भावना से लिखा था। That was the time my self perservated self, my delicate desires underwent a heroic transformation in my consciousness.

आपने अपनी आत्मकथा में जीवन के संघर्षों का उल्लेख किया है और कुछ मूल्यगत द्वन्द्वों का भी। इस पर हुई एक संगोष्ठी में कथाकार राजेन्द्र यादव ने कहा था कि यहाँ से कुसुम अंसल की लेखकीय यात्रा शुरू होती है, क्या आप इस बात से सहमत हैं? 

हाँ, शायद आत्मकथायें इसीलिए लिखी जाती हैं कि लेखक अपने आत्मद्वन्द्व को अपने अन्तर्मन के गहरे अंधेरे 

धुएँ से बाहर आ जाने दे। मनोविज्ञान में एक शब्द है, एक विधा है ‘केथार्सिस‘, (आत्मरोचन), जिसे मनोरोगों से मुक्त करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

रोगी ‘हिप्नोसिस‘ या बेहोशी में अपने भीतर की उन सभी कुंठाओं को अनजाने में कह जाता है, जिन्हें वह शायद चेतन अवस्था में कभी बयान नहीं कर सकता था। उन्हें इस प्रकार कह देने से शायद मन के भीतर की गहरी जमी हुई अवसाद की परतें और उन पर लगा फफूंद अपने आप मवाद-सा बन कर बाहर बह आता है. और रोगी रोगमुक्त हो जाता है।

हो सकता है, आत्मकथा लिखने की विधा शायद इसी कारण आरम्भ की गई थी कि लेखक अपने जीवन की उन तमाम कुण्ठाओं को कह डाले जो उसे जीवन भर असहज करती रही थीं। मुझे याद नहीं मैंने क्योंकर अपनी आत्मकथा लिखना आरम्भ किया, पर जब एक धुन सवार होती है, तो हम लिखते ही हैं, वह जो कलम अपने आप लिखवा लेती है स्वयं से। हाँ, उस गोष्ठी में कृष्णा सोबती भी थीं और भी बहुत से वरिष्ठ लेखक भी, अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आये शैलश ज़ैदी ने अपना आलेख भी पढ़ा था‘अकेलेपन को चीरती प्रतिमा‘ । राजेन्द्र यादव हमेशा मेरे अच्छे आलोचक रहे। मेरी कहानियाँ ‘हंस‘ में छपती थीं, उनमें भी हमेशा कुछ न कुछ कभी ढूँढ़ लेते थे, जो मेरे लिए ‘आई-ओपनर‘ का कार्य करती थीं और शायद मेरी सहायता करती थीं। यह भी सच है कि उसके बाद रेखाकृति‘ और वृन्दावन की 

विधवाओं पर लिखा गया उपन्यास ‘तापसी‘ आया, जिसके ग्राफ शायद पहले उपन्यासों से अधिक मार्जिन थे। 

क्या आप मानती हैं कि ‘जो कहा नहीं गया‘ वह कहना अभी शेष है, यदि कहना है तो वह पाठकों के समक्ष कब आ सकेगा? 

‘जो कहा नहीं गया‘ (1996) को छपे हुए अठारह-उन्नीस वर्ष व्यतीत हो गये। वह सारा ‘मैटर‘ जो उस समय तक मेरे मन में दस्तक दे रहा था, वह समूचा अनुभवों का कच्चा चिट्ठा मैं लिख चुकी हूँ। परन्तु इतने वर्षों में मेरे जीवन में बहुत से उतारचढ़ाव आये, अनेक घटनायें-दुर्घटनायें भी मेरे अपनेपन को तोड़ती-जोड़ती रही हैं, वे शायद पहले जिये जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं, और भी ऐसा बहुत कुछ है, जो कहा जा सकता है। इस बीच मैंने बहुत कुछ पढ़ा, ढेर-सा ज्ञान अर्जित किया और महत्त्वपूर्ण उपन्यास.कहानियाँ भी लिखीं! पुरस्कार भी प्राप्त किये हैं। परन्तु जाने क्यों मन में बसी उदासी कभी नहीं टूटी। उपलब्धियों के रंग-बिरंगे पुष्प सुगंध तो बिखेरते रहे परन्तु मेरे भीतर के प्रकोष्ठ में उनकी महक कभी नहीं पहुँची। पता नहीं अब ‘जो कहा नहीं गया‘ का दूसरा भाग लिख पाऊँगी या नहीं, समय ही बतायेगा। 

आज की कहानियों के ज्यादातर पात्र मध्यम या निम्न वर्ग के होते हैं। आपके पात्र किस वर्ग से आते हैं?

सभी कहानियाँ काल्पनिक नहीं होतीं, मेरा ऐसा मानना है। मात्र सपना देख कर जीवन के निष्कर्षों को जिया नहीं जा सकता, निर्देश भी नहीं दिये जा सकते, उन्हें वास्तविकता के दृष्टिकोण से देखना होता है। मैंने भी अपनी कहानियों के पात्र और उनके कथानकों को अपने आस-पास के परिवेश से ही उठाया है। जिस प्रकार के समुदाय-समाज परिवेश में मैं रह रही हूँ उन्हीं को निकट से देखा है, उनकी कठिनाइयों, उनके आपसी रिश्तों-

सम्बन्धों को, कुण्ठाओं को ही जानने-समझने का प्रयास किया है। अपने लेखन में जहाँ मैंने धनाढ्य वर्ग से जुड़ी समस्याओं का वर्णन किया है वहीं उनकी परिवेशगत निराशाओं और दुःख को भी प्रतिबिम्बित करने का प्रयास किया है। यह भी सच है कि इस वर्ग को लेखकीय वर्ग में एक दूरी से देखा जाता रहा है। एक उपेक्षा भरी, कम्युनिस्ट दृष्टि जो अमीर है वह बेईमानी से, निर्धन का शोषण कर रहा है। परन्तु यह सच नहीं है। मुझे याद है ‘एक और पंचवटी‘ की गोष्ठी में कहा गया था कि ‘कुसुम जी की नायिका हवाई जहाज में सफर करती है, वातानुकूलित कमरे में रहती है। उन्हें क्या पता दुख क्या होता है?‘ परन्तु दुख मात्र भूख नहीं होता, धूप में नंगे पैर चलना एक मात्र कष्ट नहीं होता, कष्ट मानसिक भी होता है जो हृदय की गहराइयों में अग्निशिखा-सा जलता-बुझता रहता है, अच्छे-भले शरीर को घुन की तरह चाट जाता है। शायद यही कारण रहा होगा कि जाने-अनजाने मैं उसी वर्ग की छवि को अपने लेखन में स्थान देती रही। वह वर्ग जहाँ मैं रहती हूँ और जो मेरे आस-पास अपनी सभी विषमताओं के साथ बिखरा पड़ा है, मैं उसे भी पाठकों के सामने प्रस्तुत करना चाहती हूँ। 

इस वर्ग के लिए बाकी लेखक क्या सोचते हैं, मैं यह भी जानने का प्रयास करती हूँ। अनामिका ने बहुत पहले मेरे लिए एक आलेख लिखा था-‘कुसुमजी की स्त्रियाँः और उनकी वर्ग के कठघरे से बाहर आने की कसक।‘ उसका एक अंश है “धन की समृद्धि के बीच भी घुटन और तनाव के महीन सिलसिले तन सकते हैं। और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा‘ के बरअक्स ‘और भी गम हैं जमाने में गरीबों के सिवा ।‘ सीधा आ टॅगता है-दिनेशनन्दिनी डालमिया, कुसुम अंसल, सुनीता जैन, प्रभा खेतान, निर्मला भुराड़िया, मधु कांकरिया आदि के लेखन में। मृदुला गर्ग, जया जादवानी, निर्मला गर्ग, अलका सरावगी और भारतीय अंग्रेजी लेखन की वे सब प्रसिद्ध लेखिकाएँ एक खास वर्ग की होने के बावजूद अपना वर्ग-हित साधती नहीं दिखाई देतीं, क्योंकि इनमें ज्यादातर के रुपये-पैसे इनके अपने कमाए या उगाये हुए तो नहीं, न ही उनके अपने हैं (दुनियां भर की बस 2.2 प्रतिशत सम्पत्ति स्त्रियों के नाम पाई गई हैं।) जहाँ तक इनके साहित्य का सवाल है-उसके सजग अध्ययन-मनन के बाद इस नतीजे पर पहुँचा जा सकता है कि इनमें अधिकांश समुदाय जीवन की वृहत्तर चिन्ताओं से एकात्म है।’’

तो यह है बाहरी लेखकों का नज़रिया हमारे लेखन के प्रति। औरों की बात मैं नहीं जानती, परन्तु अपनी उन अनसोई रातों और अपनी अथक परिश्रमरत दिनचर्या को देखती हूँ तो उदास हो जाती हूँ...यही होता है मूल्यांकन? ‘तापसी‘ उपन्यास के प्रायः सभी पात्र, वृन्दावन की विधवायें। आश्रमों में निराश्रित, दुख भोगती, सड़क पर भीख माँगती विधवाओं की गाथा को भी मैंने ही लिखा है। उनका वर्ग मध्यम वर्ग से भी हीन, सड़कछाप, उसे भी मेरी लेखनी ने ही उकेरा है, फिर मुझे, केवल धनाढ्य समुदाय से ही क्यों जोड़ा जाता है? ‘खामोशी की गूंज‘ उपन्यास में भी ऐसे ही अलग-अलग वर्गों के पात्र हैं जो मैंने चयनित किये हैं। मैं हमेशा प्रयासरत रही कि जिन्हें निकट से देखू उनका ही वर्णन अपने कथानकों में करूँ और शायद मैं ऐसा कर भी पाई, तो फिर....? 

आपकी कुछ कहानियाँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेकर आपका दृष्टिकोण क्या है? 

यह संसार स्त्री और पुरुष की ही संरचना है। संसार में जो भी कुछ घटित होता है उसमें स्त्री और पुरुष सामान्य रूप से शामिल रहते हैं। यह प्रायः माना भी जाता है कि वे दोनों एक दूसरे के पूरक‘ हैं। ब्रह्मा यदि शिल्पी है तो सृष्टि उसका शिल्प। पूरी सृष्टि, समूचे महाग्रंथ, इतिहास की साक्षी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पाने, प्रेम करने और साथ-साथ जीने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं। न जाने कितने ही आनन्दलिप्सु शासक-योद्धा कुछ संघर्ष मात्र संघर्ष ही नहीं युद्ध, महायुद्ध भी कर बैठते थे। जितना सहज है यह सम्बंध, उतना ही जटिल भी। स्त्री-पुरुष सम्बंधों को लेकर तो पूरा एक ग्रंथ लिखा जा सकता है, क्योंकि इतनी विविधताएँ हैं स्त्री और पुरुष के अपने-अपने निजी ‘रोल‘ को निभाने में मर मिटने के, कि प्रायः हर कहानी उसकी संघर्षमयता, उठापटक, और नेपथ्य-ध्वनि को पकड़ पाने के लिए लिखी जाती है। ‘एक और पंचवटी‘ में मैंने मानवीय प्रेम के जिस त्रिकोण की रचना की है, उसमें मेरी साध्वी उसी में तटस्थ खड़ी है। उसके हृदय में प्रेम केवल एक पुरुष के प्रति है। वह जो भी है उसके मनप्रभ में समा चुका है। उससे उपलब्ध प्रेम का एक कण, सुख का एक अमूल्य अंश पा लेने पर उसे लगता है जैसे उसे दिशा मिल गई है वह जो अपर्याप्त था, पर्याप्त है। वह उसी के सहारे उसी को सम्बल मानकर पूरा जीवनयापन कर लेगी। उसकी वह 

अंधी आस्था उसकी सर्वोच्च उपलब्धि जैसी है। आज के इस उपभोक्तावादी समाज में कहाँ है ऐसी निर्मल सोच? ऐसी शुद्ध मानसिकता? मेरी दृष्टि में स्त्री-पुरुष के प्रेम में स्वयं का विसर्जन, आत्मसमपर्ण तथा आत्मवहन एक दीवानगी की ज़िद के साथ ही श्रेयकर लगता है। ‘विरूपीकरण‘ कविता-संग्रह की पंक्तियाँ हैं

‘वह शरीर 

मेरे लिए तो नहीं 

रचयिता ने रचा

तुमने भोगा

और एक तरह से मैंने जिया भी। 

मेरे स्त्री, पुरुष पात्र अधिकतर वाह्य भौतिक यथार्थ के स्थान पर आत्मिक धरातल पर एक उत्कृष्ट-सा भाव-बोध जीने का प्रयास करते हैं। मैंने प्रयास किया है कि मेरे रचे कथा-संचार में स्त्रीयोचित मान-सम्मान सुरक्षित रहे, वह ऐन्द्रिक अनुभूतियों से ऊपर उठकर जीवन के वास्तविक सच को, अपने अस्तित्व के ‘स्प्रिरिचुअल एस्थेटिक‘ को पाने और जीने का प्रयास करें। शायद इसका यह भी कारण रहा होगा कि मैंने स्वामी प्रबुद्धानन्द से आठ वर्ष तक वेदान्त की शिक्षा भी ग्रहण की थी। तभी मेरे लेखन में मेरे पात्र ‘मानहीन विवर्जयेत्‘ का अनुपालन जैसा करते हैं। यह सब मेरे लेखन में जानेअनजाने होता चला गया और उसमें जाने कैसे नितान्त रूढ़िवादी संदर्भ और दार्शनिकता आ घुली जो मेरे पात्रों की दैहिक सीमाओं को छटपटाहट के उस पार ले जाने के प्रयास में सक्रिय रही। मैंने लिखा

‘तुम गहराई में छुपा 

सौन्दर्य का, शुद्ध और पूर्ण

वह एक अक्षर 

दे दो मुझे, जो हमें

एकात्म कर दे। 

‘हंस‘ में छपी कहानी ‘मेरे आशिक का नाम‘ काफी चर्चा में रही। उसकी बीज-भूमि के विषय में कुछ बतायें ?

जब मैंने ‘मेरे आशिक का नाम‘ लिखी, तो मन ही मन बहुत काँपी थी। कहानी ‘हंस‘ के लिए भेजी तो राजेन्द्र यादव का फोन आया-“अरे कुसुम, यह क्या लिख दिया आपने? इसमें तो स्त्री-विमर्श और स्त्रीवाद प्रतिध्वनित होता है।‘‘ 

मैंने उन्हें उत्तर दिया-“प्लीज यादव जी, मेरी भोली-भाली मानसिकता की इस कहानी को किसी ‘वाद‘ आदि के कठघरे में कैद मत करिये, उसे मेरी एक अभिव्यक्ति मात्र ही रहने दीजिये।‘‘ 

असल में अलीगढ़ की नुमाइश में एक आंचलिक मेले जैसा वातावरण होता है। वहाँ एक ओर ‘मौत का कुआँ‘ होता था या ‘दो मुँह एक शरीर‘ वाली स्त्री का प्रदर्शन, वहीं उसी एक कोने में शरीर पर नाम गोदने वाले फकीर जैसे लोग भी बैठे होते थे। उतने वर्ष पहले जहाँ तक याद पड़ता है मुझे लगता है उनमें से अधिकतर पढे-लिखे व्यक्ति नहीं थे। वहीं एक नाम गोदने वाला भी था जिसे उर्दू लिपि में सिर्फ ‘अल्लाह‘ लिखना आता था। मेरी नायिका ‘उपमा‘ के जीवन में वह पागल फकीर जीवन विडम्बनापूर्ण यथार्थ का रचयिता बन बैठा। पाब्लो नेरुदा की प्रसिद्ध कविता, ‘लैट मी एक्सप्लेन ए फ्यू थिंगस‘ की तरह गोदने वाले फकीर को या उपमा को अपनी सफाई पेश करने का मौका ही नहीं मिला, और फिर पाब्लो नेरुदा की पंक्तियाँ ही जैसे चरितार्थ हुई, कम एंड सी द ब्लड इन द स्ट्रीप्स, कम एंड सी द ब्लड इन द स्ट्रीप्स‘ ‘उपमा‘ की अस्मिता, शरीर को पहले कुचला, प्रताड़ित किया, उसके अपने ही सगे दादा जी ने, जो उसे अपने बेटे और बहू की मृत्यु का मूल कारण मानते थे। एक छोटा-सा उर्दू का शब्द जिस में ‘अल्लाह‘ समाया था, अपना प्रभुता-सम्पन्न अर्थ खो बैठा। उपमा के जीवन की दुर्भाग्यपूर्ण अतिश्योक्ति बन गया। सारा जीवन वह उन स्थितियों से जूझ कर ऊपर उठती है, एक सफल प्रतिरोध कठिन से कठिनतर पढ़ाई भी करती है और आर्थिक रूप से स्वावलम्बी भी हो जाती है, परन्तु पुरुष के चंगुल के ‘सैडिस्म‘ से मुक्त नहीं हो पाती। उर्दू लिपी में हाथ पर काले अक्षरों में गुदी हुई इबारत उसे साधारण मनुष्य नहीं रहने देती, बार-बार प्रताड़ित होने का बहाना बन जाती है। तभी एकाएक स्थितियों के नाटकीय परिवर्तन के क्षणों में उसका खोया स्वाभिमान बन जाती है। एक साहसिक यात्रा, स्त्री-शोषण से ऊपर उठकर ‘अल्लाह‘ को ‘अल्लाह‘ के नैसर्गिक, भावों-भावोच्छलित अभिव्यक्ति में परिभाषित करने की तथा स्वावलम्बी चेतनासम्पन्न स्त्री की छवि को गौरवमय अलंकरण प्रदान करने की यात्रा एक अद्भुत क्रांतिकारी विद्रोही कदम और वही मुझे परिभाषित करना था। 

‘उसकी पंचवटी‘ उपन्यास पर फिल्म बनी, फिर आपने फिल्म का क्षेत्र भी छोड़ दिया? 

‘तितलियाँ‘ के फिल्मांकन के दौरान मैं लगभग हर महीने मुम्बई जाती थी। अब तक शोभा डॉक्टर से मेरी गहरी मित्रता हो गई थी। मैं उसके घर पर ही ठहरती थी। तब मुम्बई में मेरा कोई नाते-रिश्तेदार नहीं था। सबसे 

महत्त्वपूर्ण बात यह भी कि बहुत समय तक शोभा को पता ही नहीं चला था कि मैं ‘मिसेज अंसल‘ भी हूँ। वह मुझे प्रोफेशनल की तरह ट्रीट करती थी। अजनबी शहर में मैं अकेली टैक्सी में सफर करती शूटिंग की ‘लोकेशन‘ पर जाती थी। नादिरा बब्बर मेरे सीरियल का निर्देशन कर रही थीं। उनका व्यवहार भी बहुत रूखा, क्रूर और इतना बेइज्जत करने वाला होता था कि मैं उनसे मिलने के बाद अपने कमरे में चुपचाप रोती रहती थी। परन्तु चुनौतियाँ होती ही कष्टकर हैं, मैं जानती थी, इसीलिए चुप रह जाती थी। एक अभूतपूर्व अनुभव और भी था, वह था जिसने मुझे सभी यातनाएं सह जाने की ऊर्जा प्रदान की थी। अपने रचे हुए काल्पनिक पात्रों को, अपनी आँखों के सामने जब मैं सशरीर चलता या बातें करता देखती, तो मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठता था। मैं एक अनिवर्चनीय सुख से कॉपने लगती थी। अद्भुत थी वह अनुभूति।

उन कुछ दिनों ने मुझे साधारण लेखिका से उठाकर ‘प्रोफेशनल‘ जैसा बना दिया था। एक नया अध्याय था ज़िन्दगी का जिसमें आत्मविश्वास आ जुड़ा था। मेरी उस सपाट ज़िन्दगी का जहाँ मैंने केवल अपने कर्तव्य को जिया था, जहाँ मेरे अपने लिए प्रेम कभी नहीं था, न पिता के घर में, और न ही ससुराल में । मैं तो केवल पारिवारिक सदस्य थी। किसी की प्रिय, चहेती बेटी, बहू-जिठानी कुछ भी नहीं और उसे मेरे परिवार ने हर बार प्रमाणित किया था। विशेष रूप से जीवन की उस कठोर परीक्षा के समय जहाँ मुझे वास्तव में उनका सहारा चाहिए था, नैकट्य चाहिए था। प्रेम नहीं, हाँ अपनों की सेवा का परिश्रममिक जैसा परन्तु वह भी नहीं मिला कभी तब मैंने स्वार्थ का घिनौना चेहरा गहराई से देखा था। ‘मिसेज अंसल‘ होना तो सज़ा हो जाता है कभी-कभी। और उसे चुपचाप सहना भी पड़ता है, आप तो जानते हैं।

हाँ, मैं भटक गई थी। ‘पंचवटी‘ को जब बासु भट्टाचार्य ने फिल्म के लिए चयनित किया, तो मेरी मानसिकता में एक और चुनौतीपूर्ण प्रश्नचिह्न आ जुड़ा था-क्या पूरा कर पाऊँगी मैं उसे? दो-तीन सिटिंग्स के बाद बासुदा ने मुझे सामान्य से वार्तालाप में समझाया कि उपन्यास को दृश्यों में बदलना है, पर कैसे? कैसे? वह प्रश्न हृदय में छुपाये फिर से अपने यान की खिड़की से बादलों को घूरती दिल्ली लौट आई। अकेले कमरे में बैठकर जैसा भी बन पड़ा ‘पंचवटी‘ को टुकड़ों में विभाजित किया और लगभग सौ-दो सौ पृष्ठों का पुलिंदा टाइप कराया। जब मुम्बई पहुँची तो पता चला कि फिल्म मुम्बई में न बनकर नेपाल में बनेगी। बासुदा ने मेरी वह सारी श्रम-साधना, वह ‘स्क्रीनप्ले‘ देखा तक नहीं। मैं फिर रोती रही। मैं और बासुदा, शोभा डॉक्टर के साथ काठमाण्डू चले गये। वहाँ जाकर नये सिरे से ‘पंचवटी‘ का ‘स्क्रीन-प्ले‘ लिखा, तो मैंने नहीं, विधाओं ने मुझे चुना और आँसुओं, ऊहापोह, उदासियों के बीच इतना ढेर सारा काम कराया, जितना मैंने कभी सोचा भी नहीं था, न ही कल्पना की थी।

आपने जानना चाहा है कि फिल्म के उस इन्द्रधनी संसार को मैंने क्यों छोड़ दिया? हालाँकि धन अर्जित करना मेरे जीवन का ध्येय कभी भी नहीं था, फिर भी न तो सीरियल के लिए मुझे कोई धनराशि दी गई, न ही फिल्म से कोई पेमेन्ट मिला। आधी से अधिक फिल्म दिल्ली में शूट हुई थी। उसकी बहुत सी शूटिंग हमारे फॉर्महाउस पर होती थी। पूरी ‘कास्ट‘ के ठहरने की व्यवस्था, खाना-पीना, ‘सैट्स‘ की सज्जा से लेकर दीप्ति नवल को साड़ियाँ, गहने, मोटरें, ड्राइवर सभी कुछ जी-जान से सुलभ करा देना मेरा काम था। यही नहीं, संवादों को लिखना, सुधारना, उनकी कॉपियाँ बनाना सारा कार्य भी मैं ही करती थी। बाद में जब फिल्म परदे पर प्रदर्शित की गई तो उसमें से पहला वाक्य गायब था-‘कुसुम अंसल के उपन्यास ‘एक और पंचवटी‘ पर आधारित। मुझे एक छोटा-सा क्रैडिट मिला था ‘स्क्रीन प्ले बाई बासु भट्टाचार्य एण्ड कुसुम अंसल।‘ फिल्म के बाद मेरी उपलब्धि क्या थी? मेरे अथक परिश्रम के फलस्वरूप मुझे प्राप्त क्या हुआ था? एक बहुत आहत-सा अंतर्मन, जो अभी भी टीसता है। 

‘पंचवटी‘ का पैनोरमा में प्रवेश, और देश विदेश में उसकी स्क्रीनिंग भी मेरे लिए बड़ी संतोषजनक मनःस्थिति थी। जो भी हुआ था, वह क्यों हुआ था, नहीं जानती। परन्तु इस बीच मैंने सिने जगत को बहुत निकट से देखा, बहुत प्रकार के मानवीय वर्ग को भी निकट से देखने का अवसर मिला, सुरेश ओबेराय, अकबर और दीप्ति नवल जैसे प्रमुख अभिनेता ही नहीं कैमरामैन, लाइट बॉयेज आदि-आदि। एक बेहद विशाल लैंडस्केप जिसे मैं नहीं जानती थी। सीरियल के माध्यम से किरण खेर, आलोकनाथ (आलोकनाथ का वह पहला सीरियल था) आदि से भी मेरी मित्रता हुई थी। मनुष्यत्व के अनेक रूप जो शायद मैं अपनी बंधी बंधाई ज़िन्दगी में कभी भी देख नहीं पाती, वो सब मुझे देखने का अवसर मिला। उन सभी ने मुझे एक सर्जनात्मक गरमाहट जैसी दी थी। परन्तु बासु भट्टाचार्य अपने आप में एक पूरा ‘इन्सटीट्यूशन‘ थे। इतना प्रबुद्ध व्यक्ति, जो एक नहीं, किसी भी विषय पर बोल सकता था, सुकोमल वाक्य और बहुत भाव-भीने दृश्य फिल्मा सकता था, वहीं वह दूसरी ओर हिंसक पशु-सा क्रूर हो उठता था-‘सैडिस्ट‘ । उनकी निजी जिन्दगी में जो भी था, उसे रिंकी भट्टाचार्य ने अपने लेख और पुस्तकों में लिखा था, उस समय। परन्तु मैं उनके ज्ञान और उनकी विद्वता की कायल थी। मैंने उनसे बहुत सीखा था, जाना था, वह मेरी अमूल्य निधि है। बासुदा, किसी एक बंगाली कहानी ‘श्मशान‘ पर फिल्म बनाना चाहते थे और मुझे उन्होंने चुना भी था संवाद और पटकथा लिखने के लिए, उसकी रिकार्डिंग मेरे टेप में भरी हुई थी। बहुत वर्षों तक वह मेरे पास सुरक्षित थी-पर समय ने धुंधला दिया उस आवाज़ को। उनकी असाध्य बीमारी और मृत्यु, अस्पताल-प्रवास तथा मेरा अपने परिवार की उलझनों में लौट आना, एक लम्बी दीवार-सा मेरे उस नये कैरियर के बीच आ खड़ा हुआ। मुझे उनकी असमय मृत्यु का आघात आज भी टीसता है। वह जीवित रहते तो शायद मैं 

‘रेखाकृति‘ या ‘तापसी‘ पर फिल्म अवश्य बनाती।

‘तापसी‘ और ‘खामोशी की गूंज‘ उपन्यास विशेष रूप से चर्चित रहे हैं । मेरी जानकारी में दोनों ही उपन्यासों की कथा-भूमि अलग तो है ही, कथा-साहित्य में नयी भी है। इन उपन्यासों को लिखने के लिए आपने अनुसंधान भी बहुत किया है। दोनों उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया के किन बिन्दुओं को आप रेखांकित करना चाहेंगी? 

‘तापसी‘ के लिए मैं मीरा सीकरी के एक लेख के कुछ अंश को यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ, जो उन्होंने ‘तापसी‘ पढ़ने के बाद लिखे थे-“टाइम्स ऑफ इंडिया के मुख्य पृष्ठ पर स्वतन्त्रता दिवस के अगले दिन समाचार छपा था कि मध्य प्रदेश के एक गाँव की पंचायत की सरपंच को जिला 

अधिकारियों ने यह कहकर-‘चमार-चमारियों को झंडा फहराने का अधिकार नही‘ उसके पंचायत-क्षेत्र के चैराहे पर उसे झंडा नहीं फहराने दिया गया। 

पढ़कर मन प्रश्नों से घिर जाता है। सन् 2005 में भी स्त्री की स्थिति वहीं की वहीं है। स्त्री दलित हो या सवर्ण वह अभी भी हाशिये पर ही है। हम शहरों में स्त्रियों को स्वतन्त्र रूप से देखते हैं। पर शहर हो या गाँव क्या वे वास्तव में स्वतन्त्र हैं? उन्हें समाजपरिवार-राजनीति में कितने अधिकार प्राप्त हैं? अधिकार तो दूर की बात है, सुरक्षित जीवन भी उन्हें उपलब्ध नहीं।‘‘ 

मेरे सामने अभी-अभी पढ़े कुसुम अंसल के नये उपन्यास ‘तापसी‘ की तापसी आ खड़ी हुई है जो एक प्रश्न बनी मेरी चेतना पर दस्तक दे रही है। ‘तापसी‘ की भूमिका में कुसुम चित्रकार सैयद हैदर रजा की डायरी में पढ़े वाक्य को उद्धृत करती हैं, जो उनकी दृष्टि में उपन्यास की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त है।

‘एक शब्द-मैंने उसी से लिया और पूरे दृश्य के विरुद्ध रख दिया।‘

‘तापसी‘ यानी कि स्त्री ही वह शब्द है जिसे लेखिका ने परिवार, समाज, धर्म के सम्पूर्ण परिदृश्य के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। पर वह कुचले जाने पर भी खड़ी है सामने जल के प्रवाह में डूबती नहीं, मृत शरीर नदी में फेंक दिये जाने पर भी डूबता नहीं है, विस्मृत नहीं होता। आँख से ओझल होने पर भी निरन्तर हॉन्ट करता रहता है।‘‘ 

बस मेरे साथ भी वही हुआ। मैं तो मात्र तीर्थ-यात्रा करने, ‘बाँके बिहारी‘ के दर्शन करने वृन्दावन गई थी, परन्तु मेरी समूची तीर्थ यात्रा अनुसंधान यात्रा में परिवर्तित हो गई। सड़क पर हाथ पसारे भीख माँगती सफेद साड़ी के चिथड़ों में लिपटी, सिर मुड़ाये विधवायें मुझे हॉन्ट करने लगीं। मैं घर तो आ गई परन्तु उनका प्रेत जैसे मेरी आत्मचेतना से चिपक गया। मुझे लगा, कुछ करना होगा, जानना होगा कि उनकी यह स्थिति क्यों है? बस मैं लगभग महीने में एक बार वृन्दावन अवश्य जाती थी, इस बीच एक एन.जी.ओ. के साथ गरीब बच्चों का स्कूल भी स्थापित करने की योजना बना ली। उनमें अधिकतर बच्चे सपेरों के थे, जो अस्पृश्य समझे जाते थे। आज के परिवेश में मात्र सपेरे के रूप में जीविका नहीं चल सकती, इसीलिए उन्हें शिक्षित करने का ही हमारा ध्येय था। गोवर्धन में यह स्कूल आज भी है, जहाँ तीन सौ बच्चे पढ़ते हैं। उसके लिये बच्चों को ढूँढ़ने हम उनकी बस्तियाँ जिन्हें ‘नगला‘ कहते हैं, उसमें जाते थे। गंदे, मैले-कुचैले नालों में झोपड़ों में रह रहे उन परिवारों को उनकी संतानों समेत अपने स्कूल में आमन्त्रित करते थे, उन्हें शिक्षा और स्वच्छता की महत्ता समझाते थे। आरम्भ में स्कूल वहाँ के ‘कुसुम-सरोवर‘ के निकट बने ‘उद्धव मंदिर‘ के आँगन में चलता था। ‘उद्धव‘ की प्रतिमा भी बड़ी विकट है। उसकी बड़ी-बड़ी नीली आँखें मुझे बड़ी प्रभावशाली लगी थीं। उनमें जैसे भीतर तक गहरे देख पाने की विलक्षणता थी, वह भी मुझे कम ‘हॉन्ट‘ नहीं करती थीं। मेरे अवचेतन को दिन रात कुरेदती थीं। जाने क्या देखना चाहती थी वह मुझ में? स्कूल का कार्यभार और मेरा विधवाओं वाला शोधकार्य समानान्तर चलने लगा। जब भी बन पड़ता मैं पैदल ही वृन्दावन की गलियों में घूमने या कभी विधवाओं के भजनाश्रम में चली जाती, खनकते मंजीरों के मध्य उनके जाप को सुनती। उनके मृतप्राय शरीर और दुर्बल वाणी से उनकी बेबसी का करुणात्मक अतीत जानने का प्रयास भी करती और साथ ही अपने नोट्स बनाती, कैमरे से चित्र भी लेती थी तो मुझे कभी बाँके बिहारी मंदिर में पंखा झुलाती योगिनी मिल जाती, कभी गली में गाली-गलौज करती ‘हिजड़ा दासी‘ या गाय को रस्सी से खींचती ‘गऊर दासी‘ । वहाँ के निवासियों से भी वृन्दावन का इतिहास जानने का प्रयास करती थी। कभी कोई वाचाल-सा पत्रकार या रिक्शावाला मुझे उस मन्दिर के द्वार पर ले आता, जहाँ चमत्कार होते थे या प्रतिमाओं के पीछे साधु वेशधारी गुंडे-लफंगे, हत्यारे छुपे होते थे। जाने कैसे मैं कर पायी उतना सब? अब मुड़ कर पीछे देखती हूँ तो अपने पर ही विश्वास नहीं होता। परन्तु निरन्तर तीन वर्ष लगातार परिश्रम कर मैंने वह शोध कार्य पूरा किया, जिसका परिणाम है ‘तापसी‘ । एक स्त्री, एक शब्द, ‘विधवा‘ और अपने समूचे श्रम को उसके आस-पास संचयित कर दिया। निश्चय ही उस बीच मैंने दो बार नंगे पैर गोवर्धन की बीस किलोमीटर की यात्रा भी की और अनेक बार ‘बाँके बिहारी‘ के द्वार पर माथा टेका।

दक्षिण अफ्रीका की यात्रा के समय मैंने वहाँ की पुरस्कृत पुस्तक ‘द लोटस पीपुल‘ पढ़ ली थी। उसके लेखक आजिज हाशिम से भी मेरी छोटी-सी भेंट हो चुकी थी। दिल्ली लौट आने पर अधिकतर वहाँ के कहानीकार दीना पदायाची से मेरा पत्र-व्यवहार होता था। उन्होंने अपनी कुछ कहानियाँ भी मुझे भेज दीं। एक कहानी, जो गाँधी जी से जुड़ी थी, उसका मैंने हिन्दी अनुवाद किया और वह ‘हंस‘ में छपा भी था। लगभग इस पूरी प्रक्रिया में एक साल बीत गया, मुझे कोई राह नहीं मिल रही थी। मेरी जिज्ञासा और दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों के लिए कुछ लिखने की मेरी आकुलता दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही थी। यहाँ के किसी समाचार-पत्र या पत्रिका में दक्षिण अफ्रीका का कोई समाचार कभी नहीं छपता। केवल अंग्रेजी की एक पत्रिका ‘द इकोनोमिस्ट‘ में एक पृष्ट आता था, जिसमें कभी-कभी चैंका देने वाले समाचार होते थे। मैं उन्हें व्यवस्थित रखती थी। तभी एक बार दुबई में ‘आई फा‘ (फिल्म अवार्ड) में जाने का संयोग प्राप्त हुआ। वहाँ किसी फिल्म की प्रेस कॉन्फ्रेंस‘ चल रही थी। अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, जावेद अख्तर और शबाना आज़मी आदि उसमें प्रश्नोत्तर दे रहे थे। तभी श्रोताओं में से एक महिला ने उठकर अपने परिचय में कहा-“मैं दक्षिण अफ्रीका से आई हूँ। वहाँ पर मैं ‘लोटस रेडियो‘ की संयोजिका हूँ। अपने श्रोताओं के लिए जो भारतीय हैं, मैं यह जानना चाहती हूँ?‘‘ प्रश्न जो भी था, मैंने सुना नहीं, केवल इतना परिचय मेरे लिए पर्याप्त था। मैं ‘कॉन्फ्रेंस‘ के समाप्त होते ही उसके पीछे भागी और उसे रोककर बताया, ‘‘मैं एक भारतीय लेखिका हूँ आपसे मिलना चाहती हूँ। आप दोपहर को मेरे साथ भोजन कर सकती हैं?‘‘

वह थोड़ा सकपकायी फिर यकायक कहा, ‘हाँ, क्यों नहीं?‘

दोपहर को वह अपने पति सहित हमारे होटल में नियत समय पर आ गईं। उनका नाम सरिता था। उसने बताया जोहनसबर्ग में सपरिवार रहती हैं, वहाँ रेडियो पर उद्घोषिका है। मेरा पुस्तक लिखने का विचार जानकर छूटते ही उसने कहा, ‘हाँ, हम भारतीय जो वहाँ के निवासी हैं, उन पर यदि कोई पुस्तक लिखी जाये तो वह ‘सूटेबल बॉय‘ जैसी बन सकती है। हमारे पास बहुत कुछ है कहने को, बहुत से पुराने दर्द, अतीत में सहे हुए अंग्रेजों द्वारा दिये अपमानित घाव और उनसे ऊपर उठकर दबा-दबा-सा एक संघर्षपूर्ण इतिहास।‘ जोहनसबर्ग जाने पर (2007) उन्होंने मेरी बहुत सहायता की। वहाँ के कुछ भारतीय परिवारों ने अपने परिवार के उस धरती पर 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अपने परिवार की सचित्र कम्प्यूटर कॉपी या पुस्तकें छपवाई थीं। सरिता जी ने मुझे वे उपलब्ध करा दीं। मैं उनकी फोटो कॉपी बनवा कर साथ ले आई थी। डरबन में प्रो. सीताराम ने भी बहुत से भारतीय परिवारों से मिलवाया, जिन्हें निकट से जानने और उनके घरों के परिवेश को देखने, भोजन करने का भी अवसर मिला। डरबन में महात्मा गाँधी द्वारा बसाया ‘फोनिक्स‘ नामक छोटा-सा शहर भी देखने को मिला । वहाँ उनका छापाखाना भी प्रिसर्व किया गया है, जहाँ से उन्होंने पहला समाचार-पत्र भारतीयों के लिए निकाला था। ‘नेल्सन मंडेला‘ की जेल ‘रॉबन आईलैंड‘ भी मैंने देख ली। बहुतसी पुस्तकें, अखबारों की कतरनें, पुराने दस्तावेज जो भी समेट सकती थी, एक बक्सा भर कर ले आई। वह सभी मेरी रचना-प्रक्रिया के साक्षी हैं।

लगभग दो दशक से आप ‘संवाद‘ नामक साहित्यिक मंच को संचालित कर रही हैं। आपके मन में इस मंच की परिकल्पना कब और कैसे उत्पन्न हुई?

सन् 1974 में जब मेरा पहला उपन्यास ‘उदास आँखें‘ छपकर आया, तो मेरे मन में एक सवाल बार-बार दस्तक देता था, “पता नहीं मेरा उपन्यास कैसा है? पाठकों तथा अन्य वर्चस्वशाली लेखक, बुद्धिजीवी मेरे इस उपन्यास को किस श्रेणी में रखेंगे?” मैं नही जानती मुझे विश्वास है, ऐसे प्रश्न हर नवोदित लेखक के मन में सरसराते होंगे या नहीं? पर इतना जानती हूँ कि नोबेल पुरस्कार विजेता ‘विस्वाव शिंबोस्र्का‘ ने एक बार कहा था-‘मैं इतना 

महत्त्वपूर्ण मानती हूँ इस छोटे से वाक्य को, “मैं नहीं जानती?‘‘ है तो छोटा-सा वाक्य, पर इसकी उड़ान ऊँची है, यह जिन्दगी को इतना विस्तार देता है कि इसमें अनन्त आकाश सिमट जाए, जिसमें हमारी छोटी-सी धरती तैर रही है। अगर आइजक न्यूटन ने न कहा होता कि ‘मैं नहीं जानता‘ तो उसके बाग में सेबों की बरसात भी हो जाती तो क्या होता।‘ तो मेरे मन के किसी कोने में यह प्रश्न ‘मैं नहीं जानती‘ वर्षों तक अटका रहा। यही नहीं मेरी हर आने वाली रचना के साथ वह और अधिक गहरा होता गया। धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि यहाँ कोई किसी को नहीं पढ़ता, पढ़ लेता है तो चर्चा नहीं करता। मुझे दिल्ली का साहित्यिक परिवेश, परिदृश्य तो वास्तव में बहुत ही निराशाजनक लगा। मेरे बहुत से मोह भंग हुए, और यह भी पता चला कि राजनीतिज्ञों की तरह यहाँ भी वरिष्ठ लेखकों के खेमें, गुट या मठ हैं जिनके मठाधीश बडे-बडे आलोचक. पत्रिकाओं के सम्पादक आदि हैं। उनकी परिक्रमा, चाटुकरिता करने, पैर छूने, गुहार बजाने से लेखकीय समाज में आपका स्थान निर्धारित होता है, रचना की मैरिट या सशक्तता पर नहीं। शायद और कोई रास्ता भी नहीं है। मैं हैरान, हतबुद्धि अपना प्रश्न हाथ में उठाये खड़ी थी, वे साहित्यकार जो मनुष्य के चरित्र के अतिमार्जित रूप को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करते हैं, वे स्वयं एक गहरी हीनभावना ही नहीं, दृष्टिहीनता का शिकार थे। तो हुआ ये कि वह लेखकीय संसार मुझसे और मैं उससे जुड़ी ही नहीं, कारण जो भी रहा हो, परन्तु मुझे गुहार बजाना स्वीकार ही नहीं था। 

एक अनुभव और भी हुआ, साहित्य अकादेमी के एक वरिष्ठ अधिकारी को मैं अपनी नयी पुस्तक के विमोचन के लिए आमन्त्रित करने चली गई। फोन पर समय ले लेने के बावजूद एक घण्टा बाहर खड़े होकर प्रतीक्षा की। जब भीतर गई तो उनके पास पहले से एक महिला लेखिका विराजमान थीं। उन अधिकारी महोदय ने मुझे एक खाली कुर्सी पर बैठने का संकेत किया और अपने छोड़े हुए वार्तालाप में वैसे ही व्यस्त हो गये जैसे मेरा आना-न आना एक अर्थहीन प्रक्रिया हो। मैंने एक धृष्टता तो की ही थी, वहाँ चली गई थी, सोचा यह भी सही। अपनी पुस्तक और निमन्त्रण आगे बढ़ाया और उनसे आने का आग्रह किया। उन्होंने जिस मुखमुद्रा से उसे स्वीकार किया, जानती थी। मेरे अस्तित्व, मेरी पुस्तक, मेरे कार्यक्रम का उनके लिए कोई अर्थ नहीं था। मेरी ‘फ्रैक्चर्ड मैटाफिजिक्स‘ में और भी बहुत कुछ चूर-चूर हुआ। साहित्य अकादेमी पर हर लेखक का अधिकार बनता है। क्या अकादेमी का सबसे मुख्य ध्येय यह नहीं है कि वह आने वाली, नवोदित लेखकों की पीढ़ी को एक मंच दे, उनका मार्गदर्शन करायें, प्रमोट करें, अगर नहीं है, तो क्या है? कुछ थोड़े से बुद्धिजीवी बनाम लोग-लेखकगण जो उनकी चाटुकरिता करते हैं वही वहाँ के कार्यक्रमों में बार-बार आमन्त्रित होते हैं, बार-बार पुरस्कृत होते हैं। वहाँ के परिसर में कोई ‘कॉफीशॉप‘ या ऐसा कोई स्थान भी नहीं है, जहाँ लेखक, बुद्धिजीवी, सामान्य प्रवृत्ति के लोग बैठ कर साहित्य की, लेखन की गतिविधियों की चर्चा कर सकें। 

मेरा प्रश्न ‘मैं नहीं जानती?‘ जैसे का तैसा मेरी मानसिकता में दस्तक देता रहा। उन्हीं दिनों देवेन्द्र इस्सर का आलेख ‘आखिर हम साहित्य क्यों पढ़ें?‘ मुझे और अधिक उदास कर गया। देवेन्द्र इस्सर के शब्द मेरे मानस में घुमड़ने लगे, “हमारे युग में साहित्य की महत्ता या प्रासंगिकता क्या है? शायद इस प्रश्न ने पहले कभी इतना विचलित नहीं किया था जितना आज कर रहा है, इसका क्या कारण है? क्या यह हारी हुई लड़ाई है या हारी जानी है?‘‘ 

मुझे तो हार कभी स्वीकार ही नहीं हुई, जीवन भर चुनौतियों को मैंने आगे बढ़कर गले लगाया था। उस दिन भी एक छोटी-सी बैठक थी। दोपहर के भोजन पर डॉ. महीप सिंह, सरोज वशिष्ठ, कन्हैयालाल नंदन आने वाले थे। वहीं हम लोगों ने तय किया कि क्यों न हम लोग मिलकर एक ऐसा मंच तैयार करें। 

जहाँ बिना किसी राजनीति, दबाव, गुटबाजी से मुक्त हो, साथ बैठकर साहित्य पर चर्चा की जाये। साहित्य की विधाओं के साथ-साथ भाषा का भी कोई नियन्त्रण नहीं था, हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों को भी आमन्त्रित करना आदि हमारी योजना में शामिल था। एक ‘पेपर-नैपकिन‘ पर हमने उसका नाम चयनित किया ‘संवाद‘ । बस वहीं से शुभारम्भ हुआ हमारे ‘संवाद‘ का। अवश्य ही मेरी जिज्ञासा ‘मैं नही जानती‘ जैसे अन्य अनेक लेखकों को ‘संवाद‘ के मंच पर अब तक अपने-अपने, उत्तर प्राप्त हो गये होंगे। ऐसा मेरा विश्वास है। सन् 1993 में ‘संवाद‘ की पहली गोष्ठी ‘अंसल भवन‘ के सभागार में हुई जिसका संयोजन नासिरा शर्मा कर रही थीं। रामदरश मिश्र उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। कहानी पढ़ी थी सिम्मी हर्षिता ने, श्रोताओं में डॉ. महीप सिंह, मैं और सरोज वशिष्ठ थे। परन्तु बाद में अन्य लेखक आते गये, जुड़ते गये। कारवाँ बनता गया।

हम जानते हैं कि ‘संवाद‘ का न तो कोई अध्यक्ष है, न सचिव और न ही सदस्यता, सिर्फ एक संयोजक होता है, जो समय≤ पर गोष्ठियों का आयोजन करता रहता है, और ये संयोजक भी बदलते रहते हैं। संयोजकों के बदलाव और उनकी भूमिका पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेंगी? 

‘संवाद‘ की मैंने कोई भी निश्चित ‘ब्लूप्रिंट‘ या नियमावली निश्चित नहीं की। न ही उसका कोई कोषाध्यक्ष है और न ही कोई अध्यक्ष । नितान्त सीधा-सा अनौपचारिक एक मंच जहाँ हर प्रकार के साहित्यकार को अपनी बात कहने के लिए एक खुला ‘पैडस्टल‘-‘स्पेस‘ मिल सके। जहाँ पर कोई अध्यक्ष आदि जैसी ताजपोशी होती है वहाँ उस संस्था के चयनित उस लेखक की अपनी छवि में गर्व या ‘ईगो‘ आ घुलता है। धनराशि, या कोई चंदा, पारिश्रमिक जब किसी संस्था में आ जाते हैं तो कहीं न कहीं असंतोष उपजता है। इसीलिए सभी झंझटों से मुक्त ‘संवाद‘ की साहित्यिक सृष्टि की गई थी। हाँ, संवाद का संयोजन आरम्भ में नासिरा शर्मा ने दो वर्ष तक किया, फिर सुनीता जैन, प्रताप सहगल और मीरा सीकरी ने। इसका मुख्य कारण यह था कि हर नये आने वाले संयोजक के साथ नये विचार, नये लेखकों का समुदाय संवाद से जुड़ता जाये। प्रायः सभी ने एक गरिमा विशेष से ‘संवाद‘ के संयोजन की जिम्मेदारी को भरपूर निभाया। हमारा आपस में कभी भी कोई आपसी मतभेद नहीं उपजा। यही कारण है ‘संवाद‘ निरन्तर अपनी प्रतिष्ठा संजोये हुए है।

‘संवाद‘ में कौन-कौन से महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाये गये, जिन पर चर्चा हुई और कौन-कौन लेखक, पत्रकार इससे जुड़े रहे?

‘संवाद‘ की प्रत्येक गोष्ठी में जो महत्त्वपूर्ण प्रयास किया गया, वह था रचनाकर की आत्मतुष्टि। हमारा मुद्दा और ध्येय था साहित्य की सही और निःस्वार्थ आलोचना, उसका वास्तविक मूल्याकंन, जो अन्य गोष्ठियों में शायद भली भाँति नहीं होता। देवेन्द्र इस्सर ने अपने लेख में कहा है कि साहित्य और वस्तु जगत में एक फासला और अजनबीपन हमेशा से रहा। कुर्रतुल-ऐन हैदर भी ‘आग का दरिया‘ में इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं। 

‘समय के पैटर्न में तअलत जहाँ बैठी थी वही तअलत उसी पैटर्न में एक और जगह मौजूद थी। और इन दोनों बिन्दुओं के बीच बरसों का फासला था और इस फासले पर मनुष्य केवल आगे की ओर चल सकता था। आगे और आगे। पीछे जाना संभव नहीं था। यद्यपि सहस्त्रों तलअतें अनगिनत टुकड़ों में विभाजित अनगिनत जगहों पर मौजूद थीं, जैसे आइने के टुकड़ों में भी एक ही चेहरे के विभिन्न प्रतिबिम्ब ।‘ ‘संवाद‘ उस आइने के टुकड़े जोड़ता है। 

‘संवाद‘ के माध्यम से आपने ‘निरन्तर संवाद‘ संचयन प्रकाशित किया, जिसमें ‘संवाद‘ की विभिन्न गोष्ठियों में पढ़ी गयी रचनाओं को सम्मिलित किया गया, जो एक ऐतिहासिक उपक्रम था। इसे आगे न बढ़ाने के क्या कारण रहे?

‘संवाद‘ में पढ़ी हुई रचनाओं को ‘निरंतर संवाद‘ के रूप में सन् 2000 में प्रकाशित किया गया था। मैंने सारा पत्र-व्यवहार, रचनाओं को समेटना-जोड़ना अकेले ही किया था। परन्तु अब उतनी ऊर्जा नहीं रही, स्वास्थ्य भी अब मेरा साथ नहीं दे रहा। परन्तु आपको यदि लगता है कि ‘निरंतर संवाद‘ ने अपना कोई स्थान निर्धारित किया है तो मैं अवश्य प्रयास करूँगी कि पिछले चैदह वर्षों में ‘संवाद‘ में पढ़ी गई रचनायें संकलित करूँ और उन्हें एक नये संस्करण में प्रस्तुत कर सकूँ, साथ ही ‘निरन्तर संवाद‘ का एक नया दस्तावेज अपने पाठकों को उपलब्ध करा सकूँ। 

आपने ‘कुसुमांजलि न्यास‘ की स्थापना की है। इसके तहत साहित्यिक कृतियों को सम्मान और फैलोशिप भी दी जा रही है। इन दोनों गतिविधियों के अतिरिक्त क्या न्यास की और कोई गतिविधि है?

पिछले तीस वर्षों से मैं निरंतर लिख रही हूँ। अपने आस-पास की गतिविधियों से भी परिचित हूँ। इतने वर्षों में यह भी समझ में आ गया कि जो पुरस्कार साहित्यकारों को प्राप्त होते हैं उनके पीछे क्या-क्या राजनीतिक दाँव-पेंच जुड़े होते हैं। अधिकतर साहित्य सम्मान उचित रचना या उचित लेखक को प्राप्त नहीं होता। कुछ ही रचनाएँ हैं जिनका वास्तव में सही मूल्यांकन हुआ है। कुछ ऐसी ही मानसिकता के तहत मैंने ‘कुसुमांजलि-साहित्य सम्मान‘ की परिकल्पना की थी। मुझे प्रसन्नता है कि मेरे परिवार ने मेरी इच्छा का मान-सम्मान रखा और पिछले तीन वर्षों से ये पुरस्कार, ‘फैलाशिप‘ कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हो रहे हैं। 

अक़सर सम्मान विवादों और संशयों के घेरे में रहते हैं। क्या अभी तक दिये गये ‘कुसुमांजलि-सम्मानों‘ से आप संतुष्ट हैं?

सच कहूँ तो मैं अब तक दिये गये ‘कुसुमांजलि-सम्मानों‘ से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ, परन्तु मेरे हाथ बँधे हुए हैं। मुझे चयन समितियों के निर्णय का सम्मान करना पड़ता है, उसे मानना पड़ता है।

इधर आप क्या पढ़ रही हैं ?

पढ़ना मेरा व्यसन है। कुछ भी पढ़े बिना मैं रह ही नहीं सकती। हिन्दी की सारी पत्रिकाएँ-‘हंस‘, ‘नया ज्ञानोदय‘, ‘संचेतना‘, ‘कथादेश‘, ‘वागर्थ‘, अभिनव इमरोज‘ से लेकर साहित्य अकादेमी की ‘समकालीन भारतीय साहित्य‘ मेरे आस-पास बनी रहती हैं। आज के समय में जो भी साहित्य लिखा जा रहा है वह तो उनके माध्यम से प्रतिबिम्बित होता ही है, पुरानी कालजयी रचनाएँ और उनके लेखकों के जीवन-चित्रण, साक्षात्कार, विचारों से भी हमें यह पत्रिकाएँ अपडेट करती रहती हैं। 

इसके अतिरिक्त मैं अंग्रेजी साहित्य की पुस्तकें, जितना बन पड़ता है ‘बैस्ट-सैलर्स‘ पढ़ डालती हूँ। मैं अंग्रेजी में भी लिखती हूँ, इस कारण भी मुझे उन भारतीय लेखकों की रचनायें पढ़ना अच्छा लगता है जो मूल रूप से अंग्रेजी में ही लिखते हैं। एक सच यह भी है कि आज के कृतियुग में, उनको एक विशेष स्थान प्राप्त है। देश-विदेश में भी उनको मान्यता, एक विशेष आदरपूर्ण स्थान मिला है। भारत के अनेक शहरों में आजकल ‘लिटरेरी फेस्टिवल‘ हो रहे हैं। हम सभी यह भी जानते हैं कि वहाँ भारतीय लेखन के नाम पर हिन्दी के इतने सशक्त लेखन के बावजूद ‘हाईलाइटेड-फोकस‘ केवल अंग्रेजी में लिखी रचनाओं को ही प्राप्त होता है। यह अपने आप में एक पूरा षड्यंत्र जैसा है जिसके कारण हिन्दी की गरिमा और उसका लेखन, उसकी स्वायत्तता, प्रभुता किसी निष्ठुर साजिश का शिकार होती जा रही है। इस समस्या पर ‘विमर्श‘ एक अलग पक्ष है।

अभी हाल ही में मैंने एक जाने-माने पारसी लेखक साइरस मिस्त्री का उपन्यास ‘कौरपस-बिअरर‘ पढ़ा है। मुझे वह इतना अलग और अजीबोगरीब लगा कि मैं उसे आपसे शेयर करना चाहती हैं। भारत में रह रहे ‘पारसी समुदाय के जीवन और उनकी जीवनचर्या, विचार, आचरण के बारे में बहुत कम लिखा गया है। इससे पहले एक उपन्यास ‘फैमिली मैटर्स‘ पुरस्कृत हुआ था। जिसके लेखक थे-रोहन्तान मिस्तरी। उसके माध्यम से भी पारसी समुदाय के जीवन की एक अजीब-सी, अलग-सी जीवनचर्या पाठकों के सम्मुख रखी गई थी। परन्तु यह उपन्यास, ‘कौरपस बिअरर‘ या ‘शव-वाहक‘ एक ऐसी गाथा है जिसके बारे में शायद कोई नहीं जानता। इस उपन्यास का कथानक बम्बई में रह रहे पारसियों के उस अदृश्य-गुमनाम से समुदाय की रहस्यात्मकता को हमारे सम्मुख लाता है जहाँ चील, कौवे, परिन्दे उन्हें खा जाते हैं। उनका अलग संसार है। समूचे संसार से कहीं दूर स्थान विशेष पर वह अलग रहते हैं और उन्हें ‘अछूत‘, ‘अनटचेबल‘ माना जाता है। उनका काम केवल मृत शरीरों को अंतिम संस्कार हेतु ‘टावर ऑफ साइलेंस‘ पर अंतिम शवयात्रा के लिए लाना होता था, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं। मैं नहीं जानती थी ऐसा कोई वर्ग है? भारत में है? कम से कम मेरे लिए इस उपन्यास ने एक नये अद्भुत रोमांच के द्वार खोल दिये थे, जिसे पढ़कर भूला नही जा सकता। एक ऐसा कथानक जो मृत्यु की, शवों की ठंडी-जमा देने वाली वास्तविकता को एक दार्शनिक दृष्टि के साथ पाठकों के सम्मुख प्रतिबिम्बित करता है। पुस्तक पढ़ते समय आश्चर्य से मैं पथरा-सी जाती हैं। ऐसा अनुभव मझे कभी नहीं हआ था। जब भी पन्ने पलटती, पुस्तक के हर शब्द से उठकर एक शीत सिहरन मेरे अस्तित्व को कंपकंपा देती है। इस पुस्तक को (D.S.C. Prize 2014-SouthAsian Literature) से पुरस्कृत किया गया। अवश्य ही सायरस मिस्त्री, बधाई के पात्र हैं। मृत्यु को उन्होंने परिभाषित भी किया कुछ ऐसे

“Because if the dead are really dead and truly dead, still and void, snuffed out without a trace then everything we grow up believing in is a lie. All religion, theology, my father's life religion and prayers."

मृत्यु क्या है? एक शरीर की यात्रा-साँस लेने से घुटन तक-अगर मृत्यु ही जीवन का सत्य है, तो जीवन का सत्य क्या है?

साक्षात्कार

संवेदनहीन होकर कुछ नहीं लिखा जा सकता

(सुश्री चन्द्रकान्ता से बातचीत)

आप अपनी लम्बी साहित्य-साधना के दौरान जीवन के विभिन्न पड़ावों से गुज़री, इस बीच समयगत परिवर्तनों में, नैतिकता की परम्परागत अवधारणाओं में जबरदस्त विस्फोट हुआ। साहित्य तो समय का साक्ष्य होता है, जाहिर है बदलाव की आहटें वहाँ भी सुनायी पड़ती हैं। आप अपनी सृजन-यात्रा में आए बदलावों को किस रूप में आँकती हैं। 

चन्द्रकान्ता जी, अपनी साहित्य-साधना को मैं एक प्रवाहमान सरिता जैसा मानती हूँ, एक छलछलाती जलधार-जो अन्तर्मन में निरन्तर बहती है। उसी में बह कर आते हैं विचार, द्वन्द्व या अवधारणायें। यह भी शाश्वत सच है कि अपने हृदय के बाहर सभी कुछ परिवर्तनशील है। मौसम बदलते हैं, प्रकृति के रूप बदलते हैं। रात दिन में और दिन रात में ढलती है। आस-पास के नाते-रिश्तेदार, समाज से जुड़े व्यक्ति भी नित नये रूपों में रूपान्तरित होते हैं और वह सभी हमारे ‘स्व‘ को प्रभावित करते रहते हैं, जिसकी 

प्रतिध्वनि हमारे लेखन में, हमारे जाने-अनजाने आकर प्रवाहित हो जाती है। 

मैंने जब अपना पहला उपन्यास ‘उदास आँखें लिखा था, उस समय मैं केवल अठारह-उन्नीस वर्ष की थी। उस उम्र में मुझे लेखन के सामाजिक सरोकारों, किसी ‘वाद‘ या किसी ‘इज्म‘ (सात्र्र की थ्योरी ऑफ एक्सिटेन्शलिज़्म) आदि का कोई भी ज्ञान नहीं था। न ही मुझे उपन्यास के ‘शिल्प‘ की जानकारी थी। मैं अलीगढ़ विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की छात्रा थी और फ्रायड के ‘ड्रीम इन्टरप्रटेशन‘ से प्रभावित थी। मेरा वह छोटा-सा उपन्यास मात्र प्रेम की भावुकता, स्नेह, सहानुभूति और आपसी रिश्तों की आत्मीयता की एक साधारण-सी गाथा थी, जिसमें समाज को परखने, नवीन प्रयोग और सुधार का कोई तर्क विशेष शामिल नहीं था, और शायद उसकी वह कमअक्ल मासूमियत ही उसका विडम्बनापूर्ण यथार्थ बन गई थी। मैं लिखने से पहले जानती ही कितना थी? मेरी यह दिशा-शून्यता जैसी मानसिकता मुझमें शायद ‘एक और पंचवटी‘ आने तक कायम रही। आलोचनाओं के विस्फोट ने जैसे मुझे उस भावुकताजन्य मूर्खता से उठा कर एक ऐसी वास्तविकता के सम्मुख ला खड़ा किया, जिससे मैं परिचित नहीं थी। अचानक मुझे लगा कि मैं अपने परिवेश के जिस समुदाय में रहती हूँ, वह आम पाठक की दृष्टि में कहीं गिरा हुआ और हीन माना जाता है। उसे उपभोक्तावादी या बाजारवादी संस्कृति के कठघरे में कैद करके उसका मूल्यांकन किया जाता है।

मेरे लेखन का मूल्यांकन भी मेरी भौतिक उपलब्धियों के आधार पर हुआ। वह मेरी लेखकीय दीवानगी पर एक गहरा विस्फोट था। मैं अपनी सीधी-साधी मासूम मनोवृत्तियों की पोटली थामे हतप्रभ खड़ी रह गई थी। आश्चर्य हुआ कि भौतिक उपलब्धियाँ बढ़ने पर मनुष्य के मूल्यों का हनन हो जाता है, कौनसा न्याय है यह? किसने बनाया यह कानून? विश्वास, अविश्वास के पल बड़े कमज़ोर होते हैं। ‘एक और पंचवटी‘ की गोष्ठी थी। वहाँ जो भी आलोचना हुई वह अलग बात है। गोष्ठी के कार्यक्रम में हुए खर्च के पूरे पैसे संयोजकों ने मुझसे वसूले, जबकि वह संस्था, अन्य लेखकों से वैसा कोई हिसाब-किताब नहीं करती थी। पता नहीं वह एहसास था या अपमान नहीं जानती? मैंने अपने भीतर घर करते अंधेरे को घनीभूत नहीं होने दिया। अपने मन में एक खामोश-सा दिया जलाया जो मेरा अपना था। मैंने जाकर हिन्दी साहित्य में पी-एच.डी. करने का फॉर्म भर दिया और सन् 1987 में उसे पूरा कर लिया। मेरी जिज्ञासा थी कि मैं साहित्य को गहराई तक जान लूँ। रूमी के शब्दों में कहूँ “yesterday I was clever, so I wanted to change the world today I am wise, so I am changing myself. (कल मैं चतुर था, इसलिए मैं चाहता था संसार को परिवर्तित कर दूँ। परन्तु आज मैं बुद्धिमान हूँ, अतः अपने आपको बदलने के प्रयास में प्रयत्नशील हूँ।) 

कोई भी साहित्यिक रचना कालगत यथार्थ ही प्रस्तुत नहीं करती, उस यथार्थ को पुनर्सृजित करती है। आपकी कृतियाँ भी इस सच को प्रमाणित करती हैं। क्या आप लेखन के शुरुआती दौर से ही साहित्यर्ढन के इस महत्त्वपूर्ण पक्ष से वाक़िफ़ थीं? 

चन्द्रकान्ता जी, जब मैंने लिखना प्रारम्भ किया था उस समय किसी कालगत यथार्थ का कोई बोध नहीं था। मैंने अपने किसी भी आरम्भिक उपन्यास या कहानी में सप्रयास किसी इतिहास या यथार्थ का आरोपण नहीं किया। मेरा सारा आरम्भिक लेखन मेरी अव्यवहारिक नासमझी का बहाव मात्र था। हाँ, बहुत बाद में ‘तापसी‘ तक आतेआते मुझमें नैतिक, सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरुकता उत्पन्न हो चुकी थी। तब तक ‘स्त्री‘ की सांसारिक स्थिति उसकी उपेक्षा, हताशाओं, विक्षिप्तताओं का परिवेशगत गणितज्ञान मेरी समझ में आ गया था। वृन्दावन में आते-जाते विधवा के रूप में ‘स्त्री‘ का वह अमानवीकरण मुझे कोंच रहा था, हॉन्ट कर रहा था। उनके उस यथार्थ को मैंने यथा सम्भव बयान करने का प्रयास किया था अपने उपन्यास में। उन विधवाओं से बात चीत करके उनके आत्मपीड़ात्मक अतीत को जमा करते मुझे छह वर्ष लग गये थे। वहाँ एक विस्तृत केनवस मुझे प्राप्त हुआ था, जहाँ धर्म के दावेदारों के खोखलेपन में मिली-जुली थीं उनके शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न की दर्द भरी गाथायें। वही मेरा ‘हाईलाइटेड फोकस‘ था या एक सामाजिक दायित्व, जिसे मैंने ‘तापसी‘ का रूप दिया।

‘तापसी‘ के बहुत बाद मेरा उपन्यास ‘खामोशी की गूंज‘ भी दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों की परिस्थितियों, अंतर्वृत्तियों अतीत के कष्टों के इतिहास, सांस्कृतिक उलटफेर की एक कथायात्रा है। उसे लिखने के पीछे भी मेरा दो-तीन वर्ष का शोधकार्य जुड़ा है वह भी एक वर्ग विशेष के कालगत यथार्थ को पाठकों के सम्मुख रखता है। 

लेखक की मनोचेतना में सघन संवेदना, जिज्ञासा-भाव और देखे-भोगे को अभिव्यक्त करने की आकुलता तो बीज रूप में मौजूद होती है, लेकिन जब तक कोई अनुभव खंड, उसकी आन्तरिक मनोस्थिति, रिएक्ट करने की भावना को उद्वेलित नहीं करता, तब तक वह कलम नहीं उठाता। ऐसे बौने से परिवेशगत या मनोजगत से जुड़े कौन से प्रसंग रहे, जिन्होंने आपको रचानात्मक अभिव्यक्ति के लिए उकसाया? उन्हें अपने उपन्यास ‘एक और पंचवटी‘ के संदर्भ में परीक्षित करेंगी।

यह तो सच है कि अपने जीवन की रहगुज़र पर चलते-चलते हम बहुत-सी घटनाओं-दुर्घटनाओं के मध्य से गुज़रते हैं और बहुत से ऐसे मित्रों-पात्रों से भी टकरा जाते हैं जिनका जीवन हमें उद्वेलित कर जाता है। ऐसे बहुत से प्रसंग हैं मेरे अतीत के, या उन मित्रों के सान्निध्य के जिन पर मैंने कुछ न कुछ लिखा है। जहाँ तक पंचवटी का प्रश्न है, वह नितान्त काल्पनिक कथा है, मेरी अन्तरात्मा में जाने कहाँ से आ फंसी थी। परन्तु कुछ कहानियाँ जैसे ‘पानी का रंग‘, ‘उत्क्रमण‘ तथा बिल्कुल नयी कहानी ‘दिया, आग और पुरानी लालटेन‘ मेरी एकदम सच्चे चरित्रों की वास्तविकता पर आधारित हैं। ‘दिया आग और पुरानी लालटेन‘ अभी हाल ही में ‘अभिनव इमरोज़‘ (फरवरी 2014) में प्रकाशित हुई थी। मैं पिछले वर्ष शिमला गई थी और वहाँ एक पुरानी ‘हैरीटेज बिल्डिंग‘ देखी थी, जिसे किसी ब्रिटिशर ने सन् 1820 में बनाया था। उसने मेरे मन में एक तंतुजाल बुन डाला। उस बिल्डिंग की अंतिम तिकोनी कोठरी (ऐट्टिक) में एक पुस्तकालय था और एक खुफिया दरवाजा, जिसने मुझे जाने कैसे ‘डायरी ऑफ ऐनेफ्रेंक‘ की याद दिला दी। ‘नात्सी-क्रूरताओं‘ का एक आतंक शरीर में फुरफुराहट भर गया। दूसरे दिन अपनी एक पुरानी मित्र से मिलने गई, जिसे उसके पति ने एक भरापूरा खुशहाल जीवन जीने के बाद जीवन की इस अधेड़ दोपहरी में त्याग दिया है। तो, उसका वह गहरा अकेलापन, गहरी उदासीनता मुझसे झेली नहीं गई। बस कुछ यथार्थ, कुछ कल्पना ने ही मेरी कहानियों की निर्मित्ति की नींव डाली थी। ऐसे ही ‘पानी का रंग‘ की मेरी मित्र गुल या ‘उत्क्रमण‘ की कल्याणी, उनके जीवन को मैंने निकट से देखा है। उनके साथ अपने जीवन को शेयर भी किया है, जैसे ही उनके किसी टीसते जख्म ने मेरी इमोशनल मैमोरी में सिर उठाया, मैं अपने को रोक नहीं सकी और जैसी बन पड़ी कहानी, कविता लिख डाली। 

स्त्री होना और लेखिका होना, यानी पारिवारिक सामाजिक दुश्वारियों से गुज़रना। स्त्री लेखन, विशेषकर पितृसत्ता के विरुद्ध अपने सरोकारों को व्यक्त करने वाला लेखन चुनौतियों से भरा होता है। आपकी कहानियाँ ‘तुम्हारे मोहरे‘ हो या ‘मेरे आशिक का नाम‘, उपन्यास ‘एक और पंचवटी‘ हो या ‘खामोशी की गूंज‘ उसके स्त्री पात्र तमाम यातनाएँ और प्रताड़नाएँ सहती हुई अपनी अस्मिता और आकांक्षाओं के प्रति सचेत हैं। ‘तुम्हारे मोहरे‘ कहानी की रूबी पुरुष वर्चस्व के छल-बल को सिरे से नकारती, अपने फैसले आप लेती है। अधिकांश स्त्री पात्र पति-प्रेमी द्वारा देह, मन के शोषण का प्रतिरोध करती हैं। पुरुष सत्ता को चुनौती देती ऐसी कहानियों पर घर-परिवार की कैसी प्रतिक्रिया होती है? 

चन्द्रकान्ता जी, आपके प्रश्न को मैं तीन भागों में विभाजित कर रही हूँ। पहला तो स्त्री-लेखन में पितृसत्ता के विरुद्ध अपने सरोकार व्यक्त करने वाला लेखन वास्तव में अनेक चुनौतियों से भरा होता है परन्तु उन चुनौतियों को स्वीकारना ही तो हमारी रचना की महत्त्वपूर्ण चिंता या प्रयास है, रिश्तों के बनावटी खोल में जकड़ी आज की स्त्री का तिल-तिल कर पिघलना हम सभी महसूस करते हैं। समय ने अब करवट बदली है और उसके कसाव से स्त्री मुक्त भी हुई है। आखिर कब तक स्त्री अपनी घुटन, अपनी वेदनाओं. अभावों के मध्य पिसती रहेगी। उसकी चेतना में आखिरकार वह विद्रोह प्रस्फुटित हो चुका है। वही जीवन ‘तुम्हारे मोहरे‘ की रूबी या ‘मेरे आशिक का नाम‘ की उपमा जीना चाहती है। स्वतन्त्र और बंधनमुक्त हो अब उन्हें अवचेतन की वर्षों पुरानी केंचुली को उतार फेंकना ही उचित लगता है। उसी रूपान्तरित मनोबल को मैं अपने कथानकों के द्वारा प्रस्तुत करना चाहती हूँ। शायद इसलिए भी कि मुझे उनका यह रूप सराहनीय लगता है।

आपके प्रश्न का दूसरा भाग जुड़ता है पति-प्रेमी द्वारा शोषण के प्रतिरोध से! प्रायः पुरुष अपनी प्रत्येक भूमिका में स्त्री के विरोध में वर्षों से तना खड़ा है। ‘मेरे आशिक का नाम‘ में उपमा के ‘दादा‘ ने ही उसकी नग्न देह पर मार बरसायी, घृणा का वीभत्स रूप और भी था बलात्कार। क्यों सहती रहे स्त्री देह और मन से प्रताड़ित होती कब तक चुपचाप खड़ी रहे? कब तक? अब तो प्रत्येक वर्ग की स्त्री में उसके अपने वजूद की, एम-नैस (am-ness) या अवेयरनैस उसके भीतर सिर उठा चुकी है और वह एक नये परिवेश या एक नये रूप में प्रवेश कर रही है और यह परिवर्तन आवश्यक भी है।

मेरे परिवार के सदस्य मुझे पढ़ते ही कहाँ हैं। और अगर पढ़ते भी हैं तो उनकी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ मुझ पर कोई असर नही करतीं, वह मेरे निकट से निःशब्द गुजर जाती हैं। 

आपकी रचनाओं में जीवन के राग-रंग से लेकर वृहत्तर समाज और समय के विद्रूपों का जटिल संजाल है। ‘टूटा हुआ पुल‘ में जहाँ स्त्री को मात्र देह मानने की पुरुष प्रवृत्ति पर आक्रोश है, वहीं ‘एक मात्र मकान‘ में संकुचित दायरों और सोच को विस्तार देने की आकांक्षा। भोगवादी समय में मनुष्य का स्वार्थ केन्द्रित होकर संवेदनहीन हो जाने की एक बानगी ‘पानी का रंग‘ कहानी में है। इसी संवेदनहीनता और धार्मिक पाखंड की प्रतिक्रिया आपके उपन्यास ‘तापसी‘ में है। वृन्दावन की वंचित और प्रताड़ित विधवाओं का मार्मिक आख्यान रचते आपको किन दहशतनाक  अनुभवों से गुजरना पड़ा?

प्रायः प्रत्येक लेखक उसी दिशा में सोचता-विचारता और लिखता है जो उसके निकट बनी होती है। समाज के सभी पक्ष हम सब के जीवन में विविधताओं का एक संसार रचते हैं, जो अवश्य ही जटिल और विद्रूप है। निकट ही एक नवधनाढ्य उच्च अभिजात्य वर्ग से सम्बद्ध पात्र अपनी रहस्यात्मकता में लिपटे खड़े थे। उनकी समस्याओं, बदलती मानसिक अवधारणाओं, अपने को स्थापित करने की कुंठाओं के मनोविज्ञान को मैं जानती हूँ। सच कहूँ यह सब जाने-अनजाने हुआ। शायद इस कारण भी कि जिस परिवेश में मैं उठती-बैठती हूँ या मेरे अपने परिवार के सदस्य, मित्र, सम्बन्धी हैं उनके जीवन की जटिल अभिव्यक्ति, अस्तित्व के प्रति विवशता को मैंने निकट से जाना था समझा भी था। ‘टूटा हुआ पुल‘ में तीन मित्र और उनकी पत्नियों में एक अदृश्य अपनत्व है, जुड़ाव है, जिसमें विश्वास भी जुड़ा था। परन्तु एक आकस्मिक दुर्घटना ने उस विश्वास के अमूल्य तत्व ‘पुल‘ को तोड़ दिया था। दृश्य ऐसा था कि झूठ की कल्पना पर विश्वास करना पड़ा। न चाहते हुए भी, भीड़ और समाज की संवेदनहीन सस्ती फब्तियों को सहते हुए जीने के लिए मजबूर होना पड़ा। डॉ. अमित भारती ने मेरी इस कहानी के लिये जो विचार व्यक्त किये वह, उनमें ‘महानगरीय समाज का व्यक्ति इतना व्यस्त है कि उसे बच्चों और पत्नी की भावनाओं को समझने का समय नहीं मिलता, पत्नी केवल शरीर और कामवासनाओं का एक उपकरण प्रतीत होती है। अवसर मिलते ही उपभोग के लिए टूट पड़ता है। परन्तु मैंने वैसा नहीं चाहा था, उनके शारीरिक सम्बन्ध शायद बने भी नहीं थे और अगर थे भी तो क्षणिक और विडम्बना यह थी कि उसी समय मृत्यु उनके मध्य से गुज़र गई। परन्तु यह आलोचना इस बात की भी द्योतक है कि आपका पाठक या सड़क पर खड़ा व्यक्ति मृत शरीरों के उस दर्दनाक ‘पोज‘ पर चटकारे लेता है जो उनकी अपनी हीन, गिरी हुई चलताऊ मानसिकता का द्योतक है। जिसे मैंने चित्रित नहीं करना चाहा था। मेरा प्रयास उस ‘विश्वास‘ को जीवंत रखने का था, जो उनकी मित्रता का अमूल्य सूत्र था परन्तु जीवन में विश्वास या सच्चाई, या ईमानदारी जैसे मूल्यों को तह-दर-तह, उसकी परतों को समझना शायद सब के वश में नहीं होता। इसी कारण मूल्यांकन गलत हो जाते हैं। 

‘पानी का रंग‘ कहानी भी एक प्रबुद्ध महिला के शोषण के तंग लिबास की दास्तान है। उसका कसूर केवल इतना मात्र था कि उसने प्रेम किया था, और वही प्रेम उसके हर कदम पर परीक्षा के लिए हाथ में पत्थर उठाये खड़ा था। और वह ? वह अपने ‘स्व‘ के यथार्थ को बिअर के नशे में ढकेलती एक प्रकार के न होने के नकारात्मक, ‘रिडक्शनिज्म‘ में घुल रही थी। ‘पानी‘ जो उसकी आँखों से कभी नहीं बहा, ‘सेल्फपिटी‘ उसकी बुद्धिजीवी यथार्थ चेतना में कभी नहीं आई थी। उसे एकमात्र केवल उसकी मित्र ही जानती थी, वह मित्र, उसके कलाकार के मार्जित रूप और उसकी सभी अनैतिक प्रवृत्तियों के बावजूद उसके वास्तविक ‘वजूद‘ को जानती थी, प्यार करती थी। वह ‘पानी‘ गंदले गिलास, काई जमी झील से उठकर वाष्पीभूत होता उसके अपने चेहरे पर अनायास बह जाता है। मेरा वह ‘पानी‘ एक सच्ची मित्रता का प्रतीक है, जो अपने मित्र की भीतरी कशमकश या विक्षिप्तता का एकमात्र अन्वेशी है।

‘तापसी‘ उपन्यास तो बहुत सी समस्याओं से जूझता एक कर्मक्षेत्र जैसा है। स्त्री का एक नकारात्मक रूप ‘विधवा हो जाना‘, जिसे धर्म के नाम पर गहरे अपमान के गर्त में फेंक दिया गया था कि वह स्त्री, सफेद रंगविहीन कपड़े पहन, जीते जी एक नामविहीन शून्यता में परिवर्तित हो जाये। मैंने ‘तापसी‘ लिखने से पहले वृन्दावन की अनगिनित यात्राएं की थीं। विधवाओं की वास्तविकता जानने के लिए बहुत-सी अन्धेरी गलियों में पैदल चलकर गई थी। गन्दगी से अटी-पटी उन गलियों के एक छोर पर थे वे विधवा आश्रम, जहाँ हड्डियों के ढाँचों में सिकुड़ी मृत चेहरों वाली स्त्रियाँ मुझे भीतर तक सिहरा जाती थीं। उनके बुदबुदाते होंठों से कठिनता से किया जाता वह राधा-कृष्ण का जाप भक्तिभाव कम मशीनी अधिक हो गया था। कुछ चेतन था उनके शरीर में तो उनके बेजान हाथ भी केवल दो रुपये पाने के लिए पसरे होते थे। आज भी आप जायें तो आश्रम में प्रवेश करने पर आश्रम का अधिकारी आपके सौ रुपये के नोट के बदले दो रुपये के सिक्के दे देता है, जो आपको बाँटने हैं। मुझे पूरा विश्वास है वह रुपये बँट जाने के बाद अवश्य ही उस मठाधीश की संदूकची में फिर से वापिस लौट आते थे। यातनाओं का एक अदृश्य वर्तुल पूरे वातावरण में फ्रीज हुआ था। आज भी आप उसे अपनी आँखों से देख सकते हैं। मंदिरों में चढ़ते चढ़ावे, अनपढ़े, 

अधकचरे पुजारियों के लोलुप चेहरे, अटपटे जाप जिनमें भक्ति कम, धन की आकांक्षा अधिक होती है। किसी भी पढ़े-लिखे संवेदनशील व्यक्ति को वे विद्रूप दृश्य भीतर तक हिला देने के लिए काफी हैं। उनकी अधकचरी पुजारीगिरी कितने भोले-भाले व्यक्तियों को भटका रही है यह भी निरन्तर देखा जा सकता है। चन्द्रकान्ता, उस पर भी पूरा एक उपन्यास बन सकता है। एक और दृश्य जिसे मैं स्वीकार नहीं कर पाती थी कभी भी, पर वह है वहाँ आज भी। वह था गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा नंगे पैर कर लेने के पश्चात जब अंतिम छोर पर कदम पहुँचते हैं जहाँ गोवर्धन की पूजा की जाती है, अनेक भक्त अपनी मनोकामना पूरी करने के धन्यवाद हेतु बाल्टी भर-भर कर वहाँ दूध चढ़ाते हैं। मनो दूध अक्षत, रोली, पुष्पों के साथ मिल कर पूजा-अर्चना के नाम पर नाली में बह जाता है। जबकि गली के उसी मोड़ पर भूख से बिलबिलाते छोटे बच्चे, विकलांग भिखारी और जर्जर विधवायें फटकार खाती खड़ी की खड़ी रह जाती हैं। 

बहुत से दृश्य थे लूटपाट के। एक विचित्र अनुभव यह भी था, कि अपनी स्थिति जैसी भी थी, उससे कुछ पैसा बचाकर वह विधवायें अपनी साड़ी के छोर में कुछ धनराशि बाँध कर सम्भालती हैं, ताकि वह धन मृत्युपर्यन्त उनके अन्तिम क्रियाकर्म के काम आ सके। मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम यात्रा-संस्कार सम्पन्न हो जाये। यह भी पता चला कि एक वर्दीधारी व्यक्ति ने एक ‘एजेंसी‘ खोली और उन विधवाओं से वह रुपये रजिस्टर में बाकायदा जमा करवा लिये, उनके अंगूठों के निशान लिए और शायद किसी एक मृत विधवा का अंतिम क्रियाकर्म विधिवत् कर भी दिया, जिसके पश्चात् और पैसे जमा हुए। कुछ दिन बाद वह ‘मौत का एजेन्ट‘ अपनी मेज-कुर्सी और रजिस्टर लेकर गायब हो गया। कितना गिर सकता है इंसान! मनुष्य का घिनौनापन बहुत से रूपों में सामने आ खड़ा हुआ। शोषण के कितने विविध रूप हो सकते हैं, यह सब देखने को मिला। चन्द्रकान्ता, बहुत बार स्त्री की इस दुर्दशा पर रोने को जी चाहता है। अब मुड़ कर देखती हूँ तो लगता है मैं ‘तापसी‘ को और अधिक दर्दनाक बना सकती थी पर तब नहीं सोचा था, तो जैसे भी बन पड़ी मेरी यह है यातनाओं की कथायात्रा ‘तापसी। 

एक और ‘तापसी’ दूसरी ओर उच्चवर्गीय परिवारों की जीवन-शैली, आपसी संबन्धों के विरूपीकरण और टूटते-बिखरते परिवारों पर ‘तितलियाँ‘ जैसा सीरियल लिखा। दो विपरीत ध्रुवों के अनुभव जिस सहज कौशल से आपने इन कृतियों में सहेजे, वह चकित करता है। आपके लेखन की सम्पूर्णता में देखा जाये तो यह कहना क्या ठीक नहीं होगा कि आप जहाँ मानवीय जिजीविषा को ध्वंस करती व्यवस्था के विरोध में खड़ी हैं, वहीं भोगवादी समय की संवेदनशून्यता से भी वंचित हैं?

‘तापसी‘ के संबन्ध में मैंने केवल मानवीय जिजीविषा की बात की है और कुछ नहीं। मृत्योन्मुख विधवाओं का अपने अंतिम संस्कार के प्रति मोह, दूसरी ओर सारा का सारा भोगवादी समय या संसार उनके विपरीत मुँहबाये खड़ा है। उन्हें हर प्रकार से हर रूप में निगलने के लिए। ‘पानी का रंग‘ कहानी में ‘गुल‘ का पति, समीर, गुल को डिप्रेशन की धुंधली गलियों में ढकेल कर स्वयं एक ‘आर्ट क्यूरेटर‘ बना बैठा है। गुल की एकमात्र बहन भी केवल उसके बनाये चित्र, उनके अर्जित धन की पिपासा से सम्बन्ध बनाये रखती थी। उन दोनों को ‘गुल‘ के तिल-तिल घुलते शरीर और मन से कोई सरोकार नहीं था। भोक्तावाद के ऐसे अनेक चित्र हैं मेरे लेखन में। संवेदनशून्य होकर तो कुछ भी नहीं लिखा जा सकता। ‘तितलियाँ‘ भी आज के संवेदनहीन परिवारों के दिखावटीपन, दिन पर दिन टूटते परिवारों, और आपसी रिश्तों के स्वार्थी खोखलेपन की ही एक लम्बी कथायात्रा थी, परन्तु लिखने और मानवीय कोमल भावनाओं को मशीनी रूप से चित्रित किये जाने में काफी फर्क हैं ठीक कलम और कैमरे का अंतर। इसी कारण मेरा वह ‘सीरियल‘ वैसा नहीं बना, जैसा मैंने चाहा था। उसके बनने पर मैं प्रसन्न कम उदास अधिक हुई थी, सच तो यही है, इसीलिए मैं ‘सीरीयल‘ के संसार से लौट आयी। 

आपने अपनी आत्मकथा ‘जो कहा नहीं गया‘ के बारे में लिखा है कि ‘यह मेरे जीवन का सारतत्व है‘ ‘लैट मी रीलिव। क्या यह स्मृतियों का उत्खनन कर स्वयं को नये सिरे से जानने का उपक्रम है? कोई मनोवैज्ञानिक तुष्टि या पाठकों का सीधा संवाद?

उपन्यास लिखते समय किसी भी लेखक के हृदय में एक पृष्ठभूमि तैयार होती है, जिसका आरम्भ और अंत लेखक के हाथ में होता है। उपन्यास अवास्तविकता का एक ऐसा अनुसंधान है जिसमें अनेक चरित्रों के आधार पर एक ध्येय विशेष तक पहुँचा जा सकता है। उपन्यास स्थायी मूल्यों पर आधारित चित्रण और खोज है, उन पात्रों को जो अपने जीवन में कुछ ऐसे प्रतिमान रखते हैं, जिन्हें समाज की मान्यता प्राप्त होती है। आत्मकथा एक आत्मतर्पण है एक मनोवैज्ञनिक आत्मतुष्टि, या एक अस्थायी आवेशात्मक अनुभव, जिसका मूल्य निर्धारण रचयिता के हाथ में होता है, लेखक के हाथ में नहीं। आत्मकथा अपने आपको अपने से दूर रखकर, वस्तु-रूप में देखने का अनुभव है, जिसमें एक परख भी शामिल होती है। अपनी आत्मकथा को मैंने जैसा जिया था, वैसा ही प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। अपने बीते हुए समय की एक पुनरावलोकन जैसी थी। वह मेरी एक प्रकार की चरित्राभिव्यक्ति जैसी थी, उन सभी भूमिकाओं की जिन्हें मैंने निभाने में सारा समय खो जाने दिया। पहले किसी की बेटी थी, फिर पत्नी बनी, तत्पचात् माँ और संयुक्त परिवार में घर की बड़ी बहू के रूप में कितने ही किरदार पूरी ईमानदारी से निभाये। वह समय मेरी निमिति का था. मेरे अपने जीवन को सँवारने का था, उसे मैंने जिन परिवारजनों की सेवा में नष्ट हो जाने दिया। वह मेरी निःस्वार्थता और सच्चाई को कहाँ पहचान पाये, जिनमें मैंने अपने सपनों, इच्छाओं के साथ अपने स्वरूप को खो जाने दिया। कठोर परीक्षाओं के समय उन सभी ने हाथ छुड़ा लिए और जो कष्टों का दल-दल मुझे भोगने को मिला वह मेरे मनुष्यत्व पर किये सभी विश्वासों को हिला देने के लिए एक भयंकर तूफान जैसा था। मैंने नातेरिश्तेदारों के रूप में अनेक घिनौने वीभत्स चेहरे देखे, जिनके व्यवहार की थरथराहट ने मुझे भीतर तक टुकड़े-टुकड़े कर दिया। हाँ, अगर मुझे फिर से यही जीवन जीने को मिलता तो शायद मैं कुछ और बन पाती, शायद बेहतर इंसान या इस जन्म की सार्थकता को और प्रभावशाली बना पाती। सामाजिक हितों में भी और अपनी भावातीत मानसिकता को अकेलेपन से बचा पाती। परन्तु मेरी ‘एकला चलो रे‘ यात्रा में अभी भी कुछ बाकी है, जिसे जीना (री-लिव) चाहती हूँ। रूमी के शब्दों में कहूँ “there is a voice that dose not use words...listen.” उन्हीं निःशब्द शब्दों को कहना चाहती हूँ अपने मौन में, अपने लेखन में।

आपकी इधर की कविताओं में प्रेम, आपसी सौहार्द और मानवीय मूल्यों का अद्भुत विस्तार है। यहाँ बुद्ध भी है, क्राइस्ट भी है, गीता और कुरान भी। सभी धर्मों के ऊपर मानवीयता का उद्घोष। इस मनःस्थिति तक पहुँचने के लिए कौनकौन से पर्वत, सागर लाँघे? स्व से पर की यात्रा, उसका मकसद? 

जब लेखन आरम्भ किया था तो जाने-अनजाने ‘प्रेम‘ का सुकोमल भाव मेरे तरुण मन में प्रस्फुटित हुआ था। उस उम्र में किसी के भी मन में दो ही अवस्थायें होती हैं जाग्रत और स्वप्न । स्वप्न आँखों में, मन में, महत्त्वाकांक्षाओं के जुगनू भर देते थे। उन दिनों, उसी ‘प्रिज्म‘ से मैं सारे संसार को देखती थी। परन्तु उन इन्द्रधनुषी रंगों में प्रेम के साथ-साथ संस्कारबद्ध मानवीय मूल्य भी मन के किसी कोने से उपज कर सपनों में आकर घुलते जाते थे। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गई, संसार के रहस्य मेरे सामने खुलते गये। तो, बहुत से मोहभंग हुए पता चला एक साथ क्रूर पर वास्तविक, Idiologies are marred by corruption.” 

(सैद्धान्तिक विचारों पर भ्रटाचार हावी होता है) और मैं अपनी एक सुसुप्ति से जाग गई। एक ही विश्वास जिया मैंने ‘शिक्षा‘ Education या ज्ञान provided me liberation from my circumstances.” जीवन क्षणिक था, परन्तु ज्ञान की उपलब्धि का तो कोई अंत ही नही था। उसी मानसिकता की राह पर एकाएक स्वामी प्रबुद्धानन्द जी से भेंट हो गई। चन्द्रकान्ता जी, दस वर्ष मैंने ‘वेदान्त‘ की शिक्षा के तहत ‘केनोपनिषद्‘ ‘माण्डूक्योपनिषद्‘ आदि पढ़ डाले। वह मेरे भीतर के रक्त प्रवाह में शीत फुहार-सी अनुभूति के रूप में प्रवाहित होते चले गये। मैं अपनी सभी महत्त्वाकांक्षाओं से, स्वप्नों से दूर होती चली गई। जाने कैसा आकारविहीन या असंतुलित धरातल था वह? सत्य या स्वप्न, ऐसा कुछ, जो अस्तित्ववान नहीं होता, ‘न होने‘ में होता है कुछ होते चले जाना। मैंने तीर्थों में ईश्वर की खोज की, धर्मों के तथ्य को जानने का प्रयास भी किया, परन्तु हर तट से खाली हाथ लौट आयी। मैं स्वयं ही नहीं जानती कौन-सी यात्रा है ‘यह‘ और कहाँ ले जायेगी मुझे। परन्तु मैं चल पड़ी हूँ इतना कहूँ-

‘जाने कौन था दिये की तरह

रास्ते में जला गया है मुझे।‘ 

और मैं जल रही हूँ, जलती ही रहूँगी।

औद्योगिक घरानों की व्यस्तताओं के बीच साहित्य-साधना के लिए समय निकालना कितना सहज या कठिन है। फिर भी ‘संवाद‘ जैसी साहित्य संस्था में साहित्य का प्रचार भी प्रसार भी? 

यह सच है चन्द्रकान्ता जी कि हमारे घरों में व्यस्ततायें शायद और परिवारों से अलग हैं और शायद अधिक भी हैं, एक ‘सभ्यताओं के संघर्ष‘ जैसी। मैं औरों की बात नहीं जानती, कम से कम मुझे अपने घर को सुव्यवस्थित रखना होता है, सजा-धजा सुरुचिपूर्ण। कभी भी कोई अतिथि आये तो हड़बड़ी नहीं हो। उन्हें नाश्ता या भोजन, जो भी समय हो, परोसा जाये जो परिपूर्ण हो, सलीके से दिया जाये। उसकी व्यवस्था मुझे प्रतिदिन सुबह करनी होती है। मेरा लिखना यदि चल भी रहा हो तो मुझे बीच में उठना पड़ता है, तो अकसर क्रम टूट जाता है। विचारों की कड़ी बिखर जाती है। परन्तु वह मेरी ‘रोल-अदायगी‘ है। एक गृहिणी का कर्मक्षेत्र, जो मुझे करना ही है। उसके बाद अपने लेखकीय फोकस में लौटते हुए एक मानसिकता से दूसरी में प्रवेश करते हुए समय लग जाता है, या समय हाथ से निकल जाता है। मैं भी एक अनाम उर्दू के इस शायर की तरह केवल पुस्तकों में डूबना चाहती थी या चाहती हूँ

किताबों के करीं जाकर सुकूने दिल न पाओगे।

किताबें समुंदर बंद है तुम डूब जाओगे।‘ 

किताबों में जी-जान से डूब जाना चाहती हूँ आज भी, परन्तु कहाँ डूब पाती हूँ। कभी किसी ‘ऑफिशियल डेलीगेशन‘ का सत्कार करना होता है। कभी किसी सगे सम्बन्धी की शोकसभा में तेरह दिन ‘बैठना‘ पड़ता है। बहुत से विरोधाभास हैं, मैं कहाँ तक गिनाऊँ? खैर, छोड़िये ये सब अब मेरे जीवन में पूरा का पूरा ढल चुका है, मैं कर भी लेती हूँ। हाँ, मेरे भीतर के लेखक की जो चाह थी, एक अतृप्त-सी प्यास, सब से मिल-बैठने की, साहित्य को साहित्यकारों के माध्यम से जानने की, उसने मुझे प्रेरित किया कि किसी ऐसे स्थान पर चली जाऊँ, जहाँ कोई कॉफी-हाउस या ‘क्लब‘ जैसी जगह हो, जहाँ लेखक मिलते-जुलते हैं। आपसी चर्चाये करते हैं। परन्तु वैसा कुछ मुझे समझ में नहीं आया। अतः एक दिन एक छोटी-सी कॉफी के दौरान स्वर्गीय नन्दन जी, सरोज वशिष्ठ, डॉ. महीप सिंह ने सुझाया कि हम मिलकर अपनी एक गोष्ठी आरम्भ करते हैं, जहाँ कुछ लेखक बिना किसी गुटबंदी के, इत्मीनान से बैठ कर साहित्य चर्चा कर सकें। बस एक पेपर नैपकिन पर उसका नामकरण हुआ ‘संवाद‘ । ‘अंसल भवन‘ के एक हॉल में निःशुल्क एक शुद्ध साहित्यिक गोष्ठी उन तीनों की सहायता से निर्मित हई, जैसा कि आप उसकी गतिविधियों से परिचित भी हैं। प्रायः प्रत्येक भाषा के बुद्धिजीवियों तथा साहित्यकारों को मान-सम्मान देते रहे हैं हम। साहित्य को जानने की प्रक्रिया में उसके सार्वभौमिक मुद्दों, समस्याओं पर चर्चा करना, विभिन्न विचारधाराओं को केन्द्रित करना ही ‘संवाद‘ का ध्येय है, और रहेगा।

परन्तु मुझे लगता है ‘संवाद‘ सीधे-सीधे तो प्रवाहवान हुआ ही, उसे सभी भाग लेने वाले साहित्यकारों ने अपनाया भी और सराहा भी। 

खेमी-विचारधाराओं की सीमाओं में बँधे बिना आपने जटिल समय की समस्याओं और मानवीय सरोकारों को साहित्य में प्रश्रय दिया, लेकिन समीक्षकों का ध्यान उस ओर ज़्यादा नहीं गया। इसे साहित्य के लोकतंत्र में पनपती अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति कहें या नये सामंतों की मोनोपली? इसके प्रति आपकी क्या प्रतिक्रिया है? 

मेरा ऐसा मानना है कि हमारे आस-पास का यह सारा संसार स्वार्थपरकता के एक अदृश्य गहरे कोहरे में लिपटा हुआ विशाल जन-समूह है। एक भीड़ जिसमें सभी यात्री अपने-अपने मुकाम पर पहुँचने की आपाधापी में चलते चले जा रहे हैं। कभी तो रास्ते में आये पत्थर की नुकीली चुभन से दुखी होते हैं, कभी मन्दिर के दरवाजे के निकट माथा टेकते हैं। सभी के अपने विश्वास हैं, मान्यतायें हैं, दुख दर्द हैं। सभी का अपना एक ध्येय है। जीवन की उस रहगुजर पर जर्जर कपड़ों में लिपटा अंधा भिखारी भी है, चुनावों से जूझता जुलूस भी, नेता-अभिनेता और बड़ी-सी कार में बैठा साहूकार भी। एक ही वायुमंडल में साँस ले रहे हैं वे सभी। प्रत्येक सहयात्री की अपनी एक गति है, एक परिणति, जिसे उसे भोगना है।

परन्तु मुझे लगता है कि हम साहित्यकारों का अपना एक ही ध्येय है। अपनी रचना की सार्थकता को शिखर तक ले जाना। एक अच्छे विचारक की तरह जीवन को जीना और समझना. जितना हो सके ज्ञान अर्जित करना। मैंने जो भी लिखा. वह केवल इस कारण ही, कि उस पुस्तक विशेष की कथावस्तु ने मुझे प्रेरित किया था। वह प्रेरणा ही मेरी अभिव्यक्ति बन गई थी। साथ ही जीवन के सच और अपने आत्मा के सत्य को जमाने की एक यात्रा। 

अब साहित्य के सामंतों या समीक्षकों ने मुझे, मेरी आत्मा को, मेरे लेखन में परिलक्षित नहीं किया तो यह उनकी समस्या है, मेरी नहीं। लेखकीय गुटबंदियों से मैं बहुत दूर रहती हूँ। मैं किसी के आगे माथा नहीं टेक सकती, मेरा आत्मसम्मान मुझे इसकी इजाजत नहीं देता। मैं अपने लेखन में ही तटस्थ खड़ी हूँ इस बिन्दु तक, वही मेरी चाह है।

‘कोई एक बिन्दु, जहाँ 

कोई तादात्म्य नहीं, न सुख, न दुःख, 

न देह का ही, न मन का ही। 

उस छाया शून्य जगत में 

चलो अपनी आत्मा उतार दें।‘

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कहानी

                                  पानी का रंग

बहुत दूर छूट जाने पर भी वह छोटा-सा पहाड़ी इलाका, गुल के घर के तृप्त खुम्बा के फूलों का जामुनी रंग, उनका अहसास, गुल के घर की वह अजीब-सी खट्टी गन्ध मेरे साथ-साथ चल ही नहीं रही थी, पूरी तरह हावी थी मुझ पर। पता नहीं शहर था या गुल, या बस की ये झटकेदार यात्रा जो उस लहरदार पहाड़ी सड़क पर सीली गति से जैसे हम सब यात्रियों को जबरदस्ती घसीट-सी रही थी। ठीक वैसे ही जैसे मैं और गुल एक-दूसरे को घसीटकर घण्टों बातें किया करते या कभी एक ही कमरे में आमने-सामने बैठे इतना चुप रह जाते कि एक-दूसरे का अस्तित्व हमारे लिए खो-सा जाता था। मेरे आसपास के सभी लोग मेरा परिवार उसकी मेरी मित्रता को मिचमिची आँखों से देखते थे। गुल थी ही ऐसी। बिना नहाई देह, ढीले बेसुरे कपड़े, मैली-कुचैली-कुछ ही लोग होते हैं जो अपने शरीर को प्यार नहीं करते, बहुत कम! या शायद उनके जीवन में काम इतना अधिक होता है कि शरीर, उसकी अहमियत, किसी अँधेरी शून्यता में विलीन रह जाता है। जब मुझसे बरदाश्त नहीं होता था, खासकर उसके बिवाइयों फटे पैर, मैं उसे जबरदस्ती ‘पार्लर‘ ले जाती, उसका हुलिया सुधारने की प्रक्रिया में लगातार वह मुझे गालियाँ देती और पार्लर की रोजी दुगने पैसे लेती हुई बड़बड़ाती-“कहाँ से पकड़ लाती हैं आप इन्हें...आपकी दोस्त हैं वरना मैं तो इन्हें छूती भी नहीं...बाबा रे..., कितनी गंदी है?‘ 

“रोजी, वह बहुत अच्छी पेण्टर है...कोई मामूली शख्सियत नहीं।‘‘ रोजी की मुखमुद्रा में तो कोई अन्तर नहीं आता था परन्तु गुल अवश्य ही ट्रान्सफार्म सी होकर उस कगार पर पहुँच जाती थी जहाँ बहुत वर्ष पहले समीर के प्रेम में डूबकर बड़ी फिल्मी अदा से शिमला के ‘स्कैन्डल पोइण्ट‘ तक भाग गई थी। आज कौन कह सकता है कि कभी गुल सुन्दर रही होगी-अमीर बाप की लाड़ली बेटी गुल? समीर के मध्यमवर्गीय परिवार और एक के बाद एक तीन बच्चों को जन्म...तब से आज तक बस काम ही काम, अन्तहीन व्यस्तता-कभी बच्चों का महँगा स्कूल, कभी मकान की किस्तें-कितना कुछ था जो उसके व्यक्तित्व को तराश रहा था, कुरेद रहा था। कभी ब्रुश पकड़े पेण्ट करती, कभी सस्ते-सस्ते काम, पोस्टर या पत्रकारिता, पैसे के लिए कुछ भी करती। गले में पैंडल-सा झूलता चश्मा और दफ्तरी कागज जैसे उसके अस्तित्व का एक हिस्सा बन गए थे-उसका घर भी तो कैसा था? पहली बार गई थी तो उसके कमरे में सीली हुई हुमस थी, अजीब सी तुर्श खट्टी, फरमेण्टेड सी महक और घर के उस पसरे हुए सन्नाटे में गुल की दबीदबी सिसकियों की सरसराहट भी तो थी जो सारे वातावरण में धुएँ-सी घुटी हुई थी। कमरे के बाहर बरांडे में लाल-लाल आँखों से घूरता समीर अकड़ा बैठा था, खाने की मेज पर बेतरतीब पड़ी बोतलों में एक सुनहरा-सा पेय भरा हुआ था जिसे वह आराम से पी रहा था, परन्तु गुल के माथे पर लम्बी-सी चोट का निशान कुछ कहना चाह रहा था पर जिसे मुन्नू जी सहला रहे थे। वह तब भी हँस रही थी और तब तक फुर्तीले हाथों से बीअर के साथ-साथ ब्रैड भी बना चुकी थी बिल्कुल वैसे ही जैसे चित्रों के साथ पत्रकारिता के काम निबटाती थी। मैंने उससे कुछ नहीं पूछा था, न उसने ही कुछ कहा था-सवालों और जवाबों के दरमियान कभी कुछ नहीं होता। 

बस के शीशे में एक छोटी-सी पहाड़ी झील का प्रतिबिम्ब उभर रहा था। मैंने खिड़की से बाहर देखा झील के पानी में स्वच्छता का नामोनिशान नहीं था, वहाँ केवल काई जमी हुई थी-गहरी हरी काई-वैसा ही मैलापन...जिसमें मैले शाल में लिपटी गुल अपने उस पहाड़ी बगीचे के छोटे से मकान में घुटी रह गई थी। हमारी इस मुलाकात ने ठहरे हुए जल से काई हटा कर अच्छा किया या बुरा, पता नहीं? बस दो ही दिन तो गुजारे थे मैंने गुल के साथ। वहाँ वह भी थी, घर भी था, उस परिचित खट्टी गन्ध से रचा बसा। था तो वह पहाड़ी इलाका पर जैसे, मरुस्थल जैसा वीरान था, बगीचा भी तो सूख गया था-कहीं कुछ नहीं उगा था। शायद इसलिए कि वह वहाँ रह रही थी और पता नहीं जी रही थी या केवल चित्र पेण्ट कर रही थी। शायद इसलिए भी कि ज़िन्दगी का बयान चल रहा था और फैसला अभी बाकी था-वह थी, परन्तु दरवाज़ा खोले खड़ी औरत वह नहीं थी, बेतहाशा बोलती गुल, वह यह तो नहीं थी इतनी चुप? परन्तु गन्दगी के बावजूद कमरे में कुछ था, सृजनात्मकता की चमक से भरपूर, दीवार पर लगे दो-तीन चित्र उनकी कलात्मकता, वही था शायद, जो इस घर में जीवन्त था नहीं तो क्या था वह अदृश्य? उम्र? बीता हुआ जीवन, या समय? जो चेहरे पर इतने सारे पदचिह्न छोड़ जाता है? कि जादुई आँखें फीकी सी हो जाती हैं और चेहरा चेहरा न रहकर बीते हुए वर्षों का कटा-फटा अंकगणित। शायद इसीलिए मुझे देखकर उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं उभरा था, “तू आ गई‘‘ कहकर उसने मुझे भीतर आने का इशारा-सा किया-जैसे मेरा आना तय था मैं कभी उसे कभी उसके नए चित्रों को देख रही थी-सिक्के के दो रूप। उसके चित्र सचमुच सुन्दर थे। किसी में काले सलेटी रंगों में घुलता नरकंकाल-सा बना था किसी में पहाड़ी ढलान पर ढेर से जामुनी रंग पास की बोतल में भरे फूलों से मिल रहा था कुछ चित्रित या कुछ जीवन्त परन्तु अभी गीले थे उसके चित्र। “आ चल बैठ...‘‘ वह तब तक पानी ले आई थी, मुझे पानी पीना ही था, गन्दे से गिलास का मटमैला पानी मुझे पीना ही था क्योंकि मेरी उसकी मित्रता का बिन्दु पता नहीं क्या था? न शरीर, न घर की स्वच्छता, न खाना न पीना, न ही उसका पेण्टर होना-पता नहीं क्या? 

“कपड़े बदल आ...तब तक चाय बन जाएगी।‘‘ हाँ मुझे लगा, अपने साफ-सुथरे कपड़ों के साथ मैं उसके वातावरण में अजीब-सी या आउट ऑफ प्लेस लग रही थी। भीतर कमरे में चली गई तो कुर्सी पर एक शाल पड़ा देखा...अपना कुछ वैसा ही शाल निकालते याद आया, मेरी ननद का ऐसा ही शाल, किसी पार्टी में खो गया था, मुझे याद है उस पार्टी से गुल अचानक ही मुझे बिन बताए जल्दी चली गई। अक्सर पर्स से गुम हो जाते कुछ नोट शंकातुर तो करते थे फिर मैं उसकी चोरी की आदत से वाकिफ हो गई थी। अभी भी तो मैं अपना पर्स बाहर कुर्सी पर पड़ा छोड़ आई थी। चोरी या शक को बेवक्त की उदासी की तरह उतारकर मैं अपने काले काफ्तान पर शॉल लपेटती बाहर आ गई थी-साथ लाई किताबों और नमकीन के पैकेट उसके सामने रखती मैं उसके वातावरण में घुलने लगी थी...वह चाय का मग पकड़ाती कह रही थी-“इतना सारा लिख डाला तूने...सच बड़ी ऊर्जा है तुझमें...मैं तो बहुत काम नहीं कर पाती...जब से यहाँ आई हूँ...या, जब से मुन्नू जी गए हैं...कितने वर्ष हो गए... सच कुछ याद ही नहीं रहता विन्नी...आई हैव लॉस्ट ट्रैक ऑफ टाइम-यह पहाड़ी इलाका ही ऐसा है...गुमसुम-चुपचाप...सब कुछ भूला जा सकता है यहाँ, समय भी तो । यहाँ अर्थहीन है।‘‘ 

“तू भूल गई है क्या सब कुछ, सारे अर्थ, गुल...?” लम्बी-सी चुप्पी के बीच खिड़की पर लटका एक लम्बा-सा कागज जिसके दोनों ओर लम्बी घण्टियाँ बाँधी, थीं, मीठी-मीठी आवाज में बज रहा था जैसे कुछ कह रहा हो...पता नहीं क्या? 

“कैसे हैं मुन्नू जी!‘ मुझे वह दिन याद आ गया, बहुत वर्षों पहले, जब हम दोस्ती के साथ घरों में आने जाने लगे थे, मेरी बेहद सफाई पसन्द आदत, मेरा भगवान पर तटस्थ विश्वास, पूजा-व्रत, नियम, पर हर समय हँसी मजाक करने वाली गुल अचानक ही सुबह-सुबह गुरुद्वारे जाकर माथा टेकने लग गई थी। पता चला ‘चालिया‘ कर रही थी, पूछने पर बता रही थी चालीस दिन रोज ‘‘सुखमनी साहिब का पाठ और गुरुद्वारे में माथा टेकने से मन की मुरादें पूरी होती हैं।‘‘ बड़ी श्रद्धा से वहाँ के जल से मुन्नू के सूखते जिस्म की मालिश भी करती थी। अठारह-उन्नीस साल का मुन्नू पता नहीं किस बीमारी से ग्रस्त लाचार दिखता था। उसी की चिन्ता में घुलती गुल अपनी कुलीग जुबैदा के साथ किसी फकीर की दरगाह पर फूलों की चदरा भी चढ़ा आई थी। मुझसे भी वह ‘महा मृत्युंजय‘ का मन्त्र लिखवाकर ले गई थी, जो वह हर सुबह मुन्नू के माथे पर हाथ रखकर बड़ी श्रद्धा से पढ़ती थी और उस दिन गुल और मुन्नू दोनों अस्पताल में थे। इतने बड़े ऑपरेशन के समय कोई उसके पास नहीं था, न उसकी एकमात्र बहन-न बड़ा बेटा, बस समीर और कांपती टाँगों से कभी उठती कभी बैठती थी, माँ थी ना, माँ तो कुछ भी दे सकती है, अपने बेटे को। और शायद उसी की किडनी थी जो मुन्नू में प्राण बन कर समा गई थी, वह धीरे-धीरे ठीक होने लगा-घर पर भी वातावरण ‘इन्फैक्शन फ्री‘ रखने के लिए, अपने ऑपरेशन, अपनी दुर्बलता सभी को नकारकर गुल घर का सारा काम अपने हाथों से करती-न कोई आ सकता था, न जा सकता था-तिस पर पानी की तरह बहता पैसा, समीर की बढ़ती हुई खुन्दक, लड़ाई झगड़े...मारपीट...जो दरवाजों के भीतर उठते सिगरेट के धुएँ से शुरू होकर बीअर के भभके में समाप्त हो जाती थी। 

मुन्नू ठीक होकर किसी स्कॉलरशिप पर विदेश चला गया। इतने वर्षों में शायद एक या दो बार आया था, परन्तु अभी तक उसकी सभी महँगी, सस्ती दवाइयाँ गुल ही भेजती थी, विदेश में उसकी यह दवाइयाँ ? मैं पूछती तो कहती, “मुन्नू कहता है मुझे यही तो फायदा पहुँचा रही हैं।‘‘ समीर तब तक अवकाश प्राप्त कर चुका था, पैसों की तंगी में गुल सब उलटे-सीधे काम कर डालती, पोस्टर पेण्ट करने से लेकर पत्रकारिता तक, दफ्तर की नौकरी, अनुवाद का काम, यहाँ वहाँ भाग कर काम उठाना, पहुँचाना। कितने साल से चक्की के पाटों में पिस रही थी गुल। जिस्म बेचारा क्या करता, काम से थके हाथ...और फटे, बिवाइयों भरे पैर-यही नहीं बड़ी किसी सामूहिक जगह से पर्सो से पैसे चुरा लेना...क्या होता जा रहा था गुल को? फिर अचानक शहर छोड़कर यहाँ आ गई, यहाँ किसी जमाने में उसके पिता का सेब का बगीचा था, देखभाल करने वाले मैनेजर के लिए बना छोटा-सा घर, जिसकी काफी खस्ता हालत थी, उसमें यों अकेले रहना, मैं जैसे अपने को समझा रही थी-पहाड़ों में तिलस्मी ताकतें होती हैं- पहाड़ों में बसी शान्ति, शुद्धता, किसी को भी सहलाकर, अपने आप में लौटा लाती है, तभी तो तपस्वी संन्यासी अपना तप करने पहाड़ों पर चले जाते थे। गुल पता नहीं कौन-सा मसान साधती है? कैसी हो गई है कि पहचानना कठिन है।

‘‘मुन्नू की चिट्ठी आती है कभी?‘‘

‘‘बहुत दिनों से नहीं आई, मैं ही बूथ पर जाकर कभी-कभी फोन कर आती हूँ वह ठीक है, खुश है, एक अच्छी-सी अमरीकन लड़की से शादी कर ली है-दोनों पीएच.डी. कर रहे हैं...पढ़ना उसका ध्येय था ना...।‘‘

‘शादी’ ? मैंने प्रश्नचिह्न लगाया....।

“हाँ डॉक्टर ने अलाड कर दिया था... मैंने यहाँ भी पूछा था।‘‘ वह रोई नहीं थी, पर जहाँ तक मुझे याद है अस्पताल से डिस्चार्ज के समय डॉक्टर ने बताया था ‘ट्रांसप्लांट‘ के बाद ज़िन्दगी कुछ ही वर्ष आगे सरकती है...उसके बाद? एक दहशत की अदृश्य तलवार, कच्चे से उम्मीद के धागे से बँधी जैसे गुल के सिर पर झूल रही थी। वह उठकर भीतर वाले कमरे में चली गई, दरवज़ा बन्द हो गया, सवालों पर जैसे दरवाज़ा भेड़ दिया था परन्तु जवाब...दरवाज़े पर एक पुराना बदरंग मॉस्क लगा था भयानक राक्षसी चेहरे का लकड़ी का वह मॉस्क ही जैसे मेरे प्रश्न का उत्तर था, तभी तो जोर-जोर से हँसा था। परन्तु इस बार, दरवाज़ा खोलकर जो गुल बाहर आई थी, वह जाने कैसे मॉस्क की कठोरता से घुलती कोई और स्त्री थी, रबड़ की सी, यन्त्रचालित-सी आत्मविहीन. मिस्र की ममी जैसी जो कुर्सी पर ऐसे बैठ गई थी. जैसे उस तरह उसका बैठ जाना, उसकी वह मुद्रा तयशुदा थी, आकृतियों की दुनिया में जीने के लिए वह इतनी विवश क्यों थी? उसे किसी तरह उस खोल से मुक्त करने के लिए, उसे अक्स की प्रतिबिम्बता से वास्तविकता में लाने के लिए मैंने कुछ भी किया, लगातार बोलती रही, पानी पिलाया, चाय पिलाई उसे पढ़ना पसन्द था, कुछ पढ़ा भी पर वह थी कि अपनी उस समाधित्व, आकृति रिक्त स्थिति से बाहर नहीं आई। निराश होकर मैंने खिड़की से बाहर देखा डूबती हुई शाम रात में घुल रही थी, शहर की बत्तियाँ दूर कहीं टिमटिमा रही थीं। अतः मैंने उस ट्रान्सफाॅर्ड गुल को कुर्सी से उठाया, वह ढहती लड़खड़ाती मेरे साथ घिसट कर बिस्तरे तक आ गई, बदसूरत पैरों की चप्पल उतारकर उसे लेटा दिया, फटा मैला कम्बल उढ़ाते मेरे भीतर दर्द टीस मारने लगा। कैसे हाल में रह रही थी गुल? बड़े बाप की बिगड़ी हुई बेटी, कहाँ गया माँ की वसीयत का इतना पैसा? समीर दिल्ली में रहना पसन्द करता है, नई गाड़ी में कभी-कभी आता है-नया ‘शो-रूम‘...और गुल? कैसी फकीरी कैसी फाकामस्ती? सुबह गुल उठ गई थी, वैसे ही जैसे कोई भी साधारणतः अपने घर में उठता है-चाय पीते हुए दिल्ली में उसके न रहने की बात पर...गुल ही बताने लगी थी, “मेरी हड्डियों में मार खाने लायक दम अब कहाँ बचा है जो दिल्ली में रहूँ...और फिर मेरे समीर के बीच कभी पुल बँधा ही नहीं, अकेला एकतरफा प्रेम पैरों की तरह दिल को भी लहूलुहान कर देता है, विन्नी मैं हूँ ना तेरे सामने?‘ 

‘‘तु मुझे हमेशा पागल लगी थी, गुल, बिना आगा पीछा सोचे, समीर के प्यार में इतना डूब कई कि शिमला के ‘स्कैण्डल पॉइण्ट‘ से बिना माँ-बाप के बताए भाग गई तेरे माँ-बाप कितना विरोध करते रहे पर तुझ पर तो किसी फिल्मी मुहब्बत जैसा जुनून सवार था, समीर क्या था, क्या है? तेरे मुकाबले में...आज भी क्या है? कुछ बन पाया क्या?‘‘

‘‘प्रेम मैं आदमी पागल न हो तो वह प्रेम कैसा। विन्नी मैं तो जो भी करती हूँ दिल के कहने पर ही करती हूँ, फिर मुझे हिसाब किताब आता ही कहाँ है जो समीर की हैसियत के जोड़ तोड़ निकालती...कन्वैन्शनल शादी मेरे बस की बात नहीं थी जो हेमा की तरह मैं भी पापा के ढूँढ़े किसी अमीरजादे से सिर झुकाकर स्वीकार कर लेती।‘‘

‘‘हेमा कैसी है?‘‘

“ठीक है, माँ की छोड़ी कोठी में अड्डा जमाए बैठी है...समीर ने उस पर कोर्ट केस किया है..मैं भी तो बराबर की हकदार हूँ, वह कहता है। हेमा यहाँ आती है बगीचा और यह टूटा-फूटा घर भी हथियाना चाहती है...उसे भी लगता है मुन्नू जी? साल बीत रहे हैं ना...‘‘

“चल छोड़” मैं उसे डिप्रेशन के उस बिन्दु से वापस ले जाना चाहती थी। दरवाजे के निकट छोटी-सी उस बगीची में बहुत से फूल लगे थे, खास तौर पर जामुनी रंग के...बात बदलने के लिए ही कहा

“अरे बड़े सुन्दर फूल हैं, क्या नाम है इनका?‘‘

“अंग्रेजी में इन्हें ‘आइरिस‘ कहते हैं। तुझे पता है ये फूल कब्रिस्तान में कब्रों के निकट लगाए जाते हैं...?‘‘

‘‘तो तूने क्यों लगाया इन्हें?‘‘ 

“अरे ये तो हमेशा हमेशा से यहाँ थे, ‘सीमेन्ट्री ज्यादा दूर नहीं है ना यहाँ से, वह देख झील के उस किनारे पर...और फिर मुझे क्या फर्क पड़ता है-खैर, तू घबरा मत, मैंने उनका नाम बदल दिया है। मार्कण्डेय पुराण में नर्क के कगार के फूलों का वर्णन आया था, कि वह सभी फूल जामुनी रंग के होते हैं और उनका नाम है ‘तृप्तखुम्बा‘, अकेले निर्जन प्रदेश के फूल या शायद लावारिस-फूल।‘‘ अपने ही में खोई हुई गुल कह रही थी, “अपनी इस जिन्दगी में किसी भी चीज से मुझे लगाव नहीं हुआ विन्नी कभी किसी चीज ने मुझे आकर्षित भी नहीं किया। माँ के घर कितना कुछ था, बेशकीमती सामान, जेवर, कपड़े...फर्नीचर मैंने कभी कुछ नहीं उठाया, कुछ नहीं बाँधता मुझे...मैं शायद किसी भी नौस्टेल्जिया में जी ही नहीं सकती।‘‘ 

तभी खिड़की में टॅगी वह अजीब लम्बोतरी घण्टी हवा में हिलने लगी। “हल्लो मुन्नू जी” वह मुड़कर बोली-“इसे मुन्नू जी ने भेजा है, जापानी गुडलक का चिह्न बना है उस कागज पर, पिछले साल उन्हें अपनी थीसिस पर एक हजार डालर का पुरस्कार मिला था-उसी खुशी में भेजा। ये घण्टियाँ जब भी बजती हैं विन्नी मुझे लगता है मुन्नू जी मेरे पास हैं मुस्करा रहे हैं...वह ठीक हैं इतना मान सम्मान है उनका, उनके शरीर में मेरी किडनी ठीक से काम कर रही है...‘‘ और गुल अपने सपने में ही चलती भीतर के कमरे में गायब हो गई। जब बाहर आई तो शायद मेरे कारण ही साफ कपड़े पहनकर नहा-धो आई थी। “चल खाना रेस्तराँ में चलकर खाते हैं विन्नी मेरे पास कुछ खास नहीं है तुझे खिलाने लायक...।‘‘ 

“ठीक है‘‘ मैं उठ खड़ी हुई, मैं भी बाहर जाना चाहती थी, कल से कुछ खाया नहीं था-ना उसने ना मैंने... । “कल रात तू...अच्छा जाने दे ये बता कि तू क्या खाती है, बदबू मारती ओवर फरमेंटेड बीअर या घर की बनी बेस्वाद ब्रैड क्या ? मुझे तो लगता है तू खाना कभी बनाती ही नहीं ? और समीर...वह क्यों नहीं देखता तेरी जरूरतें...?‘‘ 

“तू ही तो है विन्नी, जो ठीक से जानती है...मेरी जरूरतें क्या हैं? और फिर समीर वह तो मेरे साथ कभी भी नहीं था...मेरे लिए प्रेम का रास्ता काँटों और उलझनों का था बस, और शादी का घोषणा-पत्र, कैसी अजीब सत्यता का?‘‘ पहली बार कहा था गुल ने-वह, जो मैं जानती थी। 

हमारा रेस्तराँ आ गया था, बीते हुए वर्ष गवाह थे कि किसी भी रेस्तराँ में बैठकर हमने कितना कुछ जिया था साथ-साथ, बेहिसाब बातें की थीं। हमारे चुपचाप बैठे पलों का भी लम्बा इतिहास थे ये रेस्तराँ । वहाँ के पेपर नैपकिनों पर रखी हुई हमारी रचनाओं की नींव, कहानियों उपन्यासों के अलावा उसकी चित्र प्रदर्शनियों के थीम, मेरे शोध कार्य का काम सभी कुछ जीवन्त हो उठा था। मुझे याद है ऐसे ही एक बार हम रेस्ताराँ में कॉफी पी रहे थे...समीर आँधी तूफान-सा आया और गुल को घसीटता हुआ ले गया-उसे शक था कि गुल अपने गुरु समान इन्दर से प्रेम करने लग गई है, उस दिन पहली बार मुझ पर समीर के व्यवहार का राज खुला था, मुन्नू जी के फोन करने पर जब गुल को देखने गई थी तो-समीर की मारपीट, मुन्नू की बीमारी, घर की हालत सभी कुछ...तब से जैसे गुल मेरे जिम्मे आ गई थी डॉक्टर, दवाइयाँ, उनके बिल...? 

तब गुल ने इतना भर कहा था, “गलत पैर रख देने से सभी कुछ गलत हो जाता है ना, बच्चे हो जाते हैं, आप किसी की मिल्कियत हो जाते हो...जिसका वजूद बैडरूम के डबल बैड से ज्यादा कुछ भी नहीं होता...इन्दर से प्रेम...वह हँसी थी, शरीर क्या फिर शरीर होता है क्या? विन्नी तुझे पता है कभी-कभी मौत भी अपने पीछे मृत लाश नहीं छोड़ जाती...।‘‘

छोटे से उस रेस्तराँ के कोने में एक गिलहरी मरा हुआ तिलचट्टा खा रही थी। मैंने बहुत दिन बाद गिलहरी देखी थी, “ओह...गिलहरी कैसे मजे से खा रही है अपने कमज़ोर शिकार को।‘‘

“सरवाइवल ऑफ फिटेस्ट...‘ गुल ने कहा। उसकी पीली आँखों में पिलाई तैर आई थी...मैं सोच रही थी उसकी ये पिलाई हमेशा की तरह किसी रोशनी की किरण से क्यों नहीं मिलती...इतनी बुझती हुई क्यों है?

रेस्तराँ का छोकरा दो प्लेटों में खाना रख गया था और उस दिन का अखबार भी ...‘‘जब भी बाहरी दुनिया की याद आती है विन्नी मैं यहाँ आ जाती हँ... यहाँ ‘त्रिवेणी जैसे पराँठे मिलते हैं, बस खाने के साथ अखबार भी पढ़ लेती हूँ...चलो देखें इस बार कौन-सा मिसाइल छूटा, किसने छू लिया चाँद को?‘‘ वह अखबार मेज़ पर फैला लेती है-एक पृष्ठ पर भुवनेश्वर के निर्वस्त्र साधु का चित्र छपा था जो ‘विशभ-संक्रान्ति‘ के अवसर पर नंगे पैरों जलते हए अंगारों पर चल रहा था परन्तु पैर नहीं जले थे उसके...।

“अजीब है न यह हठयोगी, आग भी अजीब है अपना कर्म नहीं निभाया, कैसे खड़ा है...निर्विकार...” मैंने कहा-“घड़ी दो घड़ी आग पर चलना तो तमाशा होता है, कुछ लोग तो उम्र भर आग पर चलते हैं...और चर्चा नहीं होती।‘‘ वह तेज जलती हुई कॉफी का कप उठाकर गटागट पी गई...एक ही घूट में, एक ही साँस में...। 

घर पहुँचे तो कमरे में कुर्सी पर एक बड़ी सजी-धजी महिला बैठी थी-एक ठण्डी-सी ‘हैल्लो‘ कहकर गुल भीतर चली गई। मैं वहीं बैठ गई, वह गुल से कुछ बड़ी लग रही थी-खूबसूरत साड़ी, कटे हुए बाल-गहरा मेकअप, बड़ा-सा पर्स जिसके साथ ही मेज पर उसकी लाई एक पत्रिका पड़ी थी ‘द टू मर्डर स्टोरीज‘ काली पृष्ठभूमि पर कुछ चेहरे बने थे और अधनंगी विदेशिनी के जिस्म से गिरता खून दर्द का चेहरा, या फिर बड़ी प्रभावशाली आँखों और लम्बे सफेद 

धुंघराले बालों वाले न्यायाधीश का चेहरा, कानून का चेहरा, आतंक का चेहरा । एकाएक हवा के झोंके से मुन्नू जी की भेजी पतली नन्ही-सी घण्टियाँ टुनटुनाने लगी....

“ये कब खरीदा तूने...खरीदा या चोरी किया?‘‘

“छिः, हेमा...ये तो मुन्नू जी ने भेजा है जापान से, उनको ऐवार्ड मिला न उसी खुशी में...‘‘

“कमाऊ बेटे कुछ भेजते हैं तुझे? या बस घण्टियाँ ही बजाते हैं...कितना पैसा बहाया उसके इलाज पर कुछ तो लौटाया...‘‘ 

“हेमा...पैसा ही तेरे लिए सब कुछ है...तू इतना सब तो ले चुकी मुझसे... और फिर तुझे पता ही है...कितना पैसा विन्नी ने दिया अस्पताल में, मिली ना विन्नी से...‘‘ फिर मेरी तरफ देखकर बोली...‘‘विन्नी ये है मेरी बहन हेमा...‘‘ 

“ओह‘ वह उठ खड़ी हुई...झटपट गुल की पेण्टिगें, उसके बनाये चित्र अखबार के काग़ज़ों में लपेटने लग गई...बस चार महीने में इतना ही बनाया, या ये तेरी विन्नी ले जाती है तेरी तस्वीरें...ये कब से आने लगी है यहाँ ?‘‘

अपमान से जलती मैं देखती रही। गुल बीअर का जग ले आई थी-चाय की केतली के साथ हेमा के लिए सैण्डविच हाँफती हुई बोली... “हेमा विन्नी यहाँ पहली बार आई है...उसे क्या लेना देना है...मेरी पेण्टिंग्स से।‘‘ यह जोर-जोर से साँस ले रही थी और एकाएक उसकी आँखों में पीला रंग हल्दी हो रहा था। मैंने ही कहा, “हेमा जी अच्छा हुआ आप आ गईं, इसको इलाज की जरूरत है-देख तो रही हैं कैसी हो गई है...आप इसे शहर ले जाएँ...इसे नशे की अँधेरी खाइयों से बचा लीजिए-कितनी बीअर पीने लगी है ये...?‘‘ 

“पहले ये बताओ तुम्हारा क्या इण्टरेस्ट है यहाँ, क्यों आई हो-किसलिए खर्चा करती हो गुल पर, क्यों इतने रुपए बहाए इसके और मुन्नू जी के ऑपरेशन पर?‘‘ मैं स्तब्ध उसको, गुल की एकमात्र बहन को फटी-फटी आँखों से देखती रही-मेरे पास जवाब भी क्या था? वही क्रूरता से बड़बड़ाए जा रही थी-“तभी मैं सोचती थी इसकी पेण्टिगें जाती कहाँ हैं? कीमत बढ़ गई है ना इनकी, समीर का शो रूम इन्हीं की बदौलत चल रहा है...लोग तभी तो पता पूछते हैं इसका।‘‘ 

गुल बीअर के गिलासों में डूबती जा रही थी, पहली शाम जैसी तन्द्रा टूटे हुए बादल सी...उस पर फिर मँडराने लगी थी। मैं उठ खड़ी हुई पर्स में टटोलकर देखा । वापसी का टिकट था परन्तु रुपए-पैसे नदारद थे-एकमात्र पड़ा सौ का नोट, कोने में फंसा रह गया था-काफी था सफर के लिए, सोच कर चल पड़ी टनटनाती घण्टी का डूबता स्वर और मास्क लगा वह दरवाज़ा मेरी पीठ पीछे बन्द हो गया था। 

अब तक बस किसी कच्चे रास्ते पर उतर आई थी, काई लगी झील ‘पितलायी आँखों से ओझल हो चकी थी। एकाएक पहाडी शाम और गहरे ढलान से नीचे जाती बस...दिल जैसे बैठा जा रहा था। मैंने आसपास देखा, सभी दहशत में थे-एक तरफ जानलेवा खाई दसरी तरफ यह गहरा ढलान...मैंने डिप्रेशन में डूबते अपने दिल से सवाल किया, या शायद बहुत पहले पुराने सवाल का जवाब माँगा, “गुल? मेरा क्या इण्टरेस्ट है इसमें? क्या?” परन्तु कुछ आत्माएँ जवाब नहीं देतीं या कुछ उत्तर अपने आप में समाविष्ट होते हैं उन्हें माना जाता है....कहा नहीं जाता...।

तभी एक लम्बी-सी रूलाई चीख में बदलती हुई...बस की छुटपुट आवाजों में खट्ट की आवाज से किसी चीज़ का गिरना, चीख में सम्मिलित होती कुछ और चीखें, बहुत से स्वर, चिल्लाहटें, “ठहरो” “रुको‘‘ जैसी दहशत धुन्ध के साथ बस की खिड़कियों में अँधेरे-सी भरने लगी। 

रिफ्लेक्स ऐक्शन, सभी ने मुड़कर देखा, एक बूढ़ी औरत जोर-जोर से दहाड़े मारकर रो रही थी, हतप्रभ-सी एक जवान लड़की बेहोशी जैसी स्थिति में उसके साथ बैठी थी। बूढ़ी औरत का जो स्वर समझ आया था, “हाय मेरा बेटा...हाय मेरे लाल इलाज तो होने देता, तू तो पहले ही चल बसा।‘‘

बस झटके से रुक गई थी, लोग अपने-अपने मशवरे दे रहे थे, “उतारो इसे,‘‘ “दिल का मरीज था, बुढ़िया इलाज के लिए शहर जा रही थी, रास्ते में ही दम निकल गया बेचारे का” “छोटी-सी नवब्याहता बहू...‘‘ बस ड्राइवर और कण्डक्टर यात्रियों से पूछताछ करने लगे...बूढ़ी माँ का सफेद बालों से घिरा कमज़ोर चेहरा जाने क्या-क्या कह रहा था...हाथ जोड़ रहा था, पैर छू रहा था, पर कानून दर्द से बड़ा है कानून...? “माई हम क्या करें, कानून है लाश बस में नहीं ले जाई जाती...तुझे उतरना पड़ेगा माई. यहीं इसी वक्त़।‘‘ सभी सहयात्री हाँ में हाँ मिला रहे थे ‘‘उतारो‘‘ ‘‘उतारो‘‘ ‘‘मैं कहाँ जाऊँगी...यहाँ जंगल है...मेरा बेटा...मेरे बच्चे के साथ ये सलूक...मेरे पास पैसे तक नहीं हैं...भाई के आसरे शहर जा रही थी, इलाज करवाना था।‘‘ 

दयावान यात्रियों ने चन्दा इकट्ठा किया-मेरा एकमात्र मुड़ा तुड़ा नोट-पैसे पास न होने का अफसोस गम...मौन को समझ न पाने की अपनी दुर्बलता-क्या कर सकता था कोई? जवाब फिर जहाँ खामोश हो जाते हैं। वहीं शब्दों की दलाली में घुला भीड़ का विकल्प उस निर्जीव शरीर को जमीन पर उतार रहा था-एक बूढ़ी एक जवान औरत...आसपास बस्ती का कोई नामोनिशान नहीं। यात्री जिद्दी आँखों से पता नहीं क्या देख रहे थे-बस चल पड़ी थी, परन्तु मैं उस गति में शामिल नहीं थी, एक मुर्दा हुए इतिहास में कुछ खोजना चाह रही थी, कानून का हृदयहीन चेहरा चाह रही थी कानून के स्टेल पुराने दकियानूसी चेहरे पर से सफेद बालों का झूठा, नकली विग उतार कर फेंक दूं कुछ तो देखे कानून, कुछ तो? मैं क्यों इतनी जोर से चिल्ला-चिल्लाकर रोने लग गई थी, पता नहीं, लोग मुझे घेर रहे थे-“आपकी रिश्तेदार थी क्या?” “इतनी फकीर सी, इस मेमसाहब की रिश्तेदार कैसे हो सकती है...‘‘ “बताइए तो क्या सम्बन्ध है आपका उसका...?” सारा संसार सिर्फ रिश्ते तलाशने में लगा है, स्वार्थ से बड़ी कोई दूसरी भावना नहीं है क्या? लगा मेरे भीतर कुछ टूट कर बह गया था, कुछ...जिसे मैं बहुत साहस से अब तक रोके हुए थी-रुका हुआ बाँध प्रपात हो गया था-आँसू का पानी किसी भी आँख से बहे, क्या केवल पानी होता है आँसू नहीं? पानी का रंग इतना अहम होता है क्या?

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आलेख

मुखर खामोशी: प्रताप सहगल

कुसुम अंसल का नाम उन लेखकों में रखा जा सकता है, जिन्हें हम बहुमुखी प्रतिभा का धनी मानते हैं। कविता, आलोचना, नाटक, कहानी उपन्यास, यात्रा वृत्तान्त, आत्मकथा आदि लेखन में दखल रखने के साथ-साथ उन्होंने फिल्म, रेडियो, टी.वी. आदि के लिए भी लेखन किया है। कुछ वक्त के लिए वे सक्रिय रूप में मंच से भी जुड़ी रहीं और फिर पूरी तरह से लेखन को समर्पित हो गयीं। हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी और पंजाबी में भी उन्होंने हाथ आजमाए हैं। 

‘खामोशी की गूंज‘ का संसार उन भारतीयों के जीवन के साथ जुड़ा हुआ है, जिनके पूर्वजों को सदियों पहले दक्षिण अफ्रीका में मजदूरी करने के लिए बसाया गया था। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने जिस तरह का व्यापार 1600 में भारत में शुरू किया था, वैसा ही व्यापार डच ईस्ट इंडिया कम्पनी ने दक्षिण अफ्रीका में 1664 के आस-पास शुरू किया था। यहां नील की खेती होती थी और वहां गन्ने की। नस्लवाद का वर्चस्व वहां भी था और यहां भी। यही नस्लवाद बाद में रंगभेद की सरकारी नीति में परिवर्तित हुआ और फिर प्रिटोरिया सरकार का गठन, नेल्सन मंडेला का उदय और दक्षिण अफ्रीका को 1994 में मिली आजादी से प्रिटोरिया सरकार की अपार्थी नीति का राजनीतिक अन्त तो हो गया, लेकिन सामाजिक रूप से जो समीकरण बने हुए थे, वे जहनी तौर पर अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।

सदियों पहले (एक मत के अनुसार यह समय सत्रहवीं शताब्दी का सातवां दशक है और दूसरे मत के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी का सातवां दशक। तीन सौ सालों का अन्तराल बड़ा अन्तराल है) लेकिन हम यह मान सकते हैं कि दक्षिण अफ्रीका का समाज सदियों से नस्लवाद एवं रंगभेद का शिकार रहा है। वहां के समाज की पहचान मोटे तौर पर तीन तरह से की जाती है। श्वेत-वर्णी यानी गोरे, भूरे (गंदमी या कलड) और काले। इन्हीं काले लोगों को अपार्थी कहा जाता है और यही लोग तथा कुछ अन्य जातियां दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासी हैं। गोरों ने वहां पहुंचकर अपना वर्चस्व स्थापित किया, भारत से पहले लोगों को ले जाया जाता रहा और फिर वे स्वयं जाने लगे। रंगभेद की नीतियों और गोरों के अत्याचारों का अफ्रीकी इतिहास सम्भवतः भारतीय इतिहास से भी अधिक तकलीफदेह है। ऐसे ही समाज में, जहां एक समय दुकानों और होटलों पर यह लिखा होता था कि कुत्तों और भारतीयों का प्रवेश वर्जित है, जीवेश का जन्म होता है। जीवेश के पिता प्रताप वहां के ही वासी कई सालों से हो चुके थे। इस तरह इस उपन्यास की कहानी का एक सिरा दक्षिण अफ्रीका से और दूसरा सिरा अन्विता के माध्यम से भारत के एक शहर चंडीगढ़ से जुड़ता है। इसी बीच उपन्यास में एक अमेरिकी सीरियल ‘रूटस‘ के बहाने दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर निगाह डाल ली गई है। यह इतिहास वह पृष्ठभूमि तैयार कर देता है, जिसमें अन्विता को अपना शेष जीवन व्यतीत करना है। जीवेश एक सुन्दर, स्वस्थ और कुशाग्र बुद्धि वाला युवक है, जो अन्विता के प्रति आकर्षित होता है और वे दोनों विवाह करके दक्षिण अफ्रीका में ही बसने का निर्णय लेते हैं। जीवेश का तो जन्म ही दक्षिण अफ्रीका में हुआ है, लेकिन अन्विता के लिए यह एकदम नया परिवेश है और उसके हाथ में है आर्किटेक्ट की डिग्री। एक ओर भारतीय संस्कारों से लैस जीवेश का परिवार, जिसमें उसके पिता प्रताप और मां लीला, दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका समाज में पला-बढ़ा जीवेश और उसके भारतीय मूल के कुछ मित्र और तीसरी ओर है अन्विता। यह उपन्यास एक तरह से मुख्य रूप से अन्विता की ही कहानी है। वह अन्विता, जिसे उसकी बुआ वती ने पाला-पोसा और पढ़ाया है, वह अन्विता, जिसने जीवेश से पागलपन की सीमा तक प्रेम किया है, वह अन्विता, जिसे अपनी इयत्ता और अस्मिता की पहचान बनानी है, वह अन्विता, जो न सिर्फ अपने विचार, बल्कि अपने व्यवहार में भी पूरी तरह से ईमानदार और कर्मठ है। इसी अन्विता को दक्षिण अफ्रीका में एकदम विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ता है। यहीं आकर उसके सामने भारतीयों की यातना की दास्तान खुलती है तो उसे सुब्रह्मणियम-जैसे सफल भारतीयों का साथ भी मिलता है। जीवन में मिली असफलता के चलते जीवेश का प्रेम भी धीरे-धीरे खंडित होता जाता है, दूसरी ओर अन्विता और उसके बॉस सुब्रह्मणियम में पारस्परिक आकर्षण बढ़ता चला जाता है। असफलता के पड़ाव लांघता हुआ जीवेश पूरी तरह से कुंठित होकर इधर-उधर भटकता है और अंततः ‘एड्स‘ का शिकार हो जाता है।

अन्विता की मानसिकता एक ऐसी आधुनिक नारी की है जिसके पास परम्परागत संस्कार तो हैं, लेकिन वह अपनी पहचान बनाने के लिए धीरे-धीरे अपने निर्णय स्वयं लेने लगती है। अन्विता एक ऐसी आर्किटेक्ट के रूप में दक्षिण अफ्रीका में प्रवेश करती है, जिसे न तो कोई जानता है और न ही उसकी आर्किटेक्चरल समझ की कोई पहचान है। उसके पास नए-नए आइडिया हैं, लेकिन उन्हें कोई जाने या समझे तो? ऐसे में ही सुब्रह्मणियम, जो स्वयं एक बड़े आर्किटेक्ट, कला के पारखी, मृदुभाषी और सत्ता के करीब हैं, अन्विता की काबिलियत को न सिर्फ पहचानते हैं, बल्कि उसे फलने-फूलने का अवसर भी देते हैं। ड्रग्स का शिकार कुंठित जीवेश अन्विता से दूर होता जाता है और सुब्रह्मणियम उसके करीब। इन दोनों के बीच सहज तरीके से बढ़ते हुए सम्बन्धों को कुसुम ने बहुत कोमलता और सूक्ष्मता से पकड़ा है। सहज तरीके से बढ़ते हुए सम्बन्धों की परिणिति अन्ततः एक बच्चे के आगमन के रूप में होती है। अन्विता का चरित्र तब और भी उजला हो जाता है, जब वह यह सब और कुछ भी अपने पति जीवेश से नहीं छिपाती। अन्विता की यह सोच एक तरह से ‘पोस्ट फेमिनिज्म‘ के एक फिनामनिआ के रूप में देखी जा सकती है।

लेकिन यह उपन्यास केवल और केवल अन्विता- जीवेश-सुब्रह्मणियम का प्रेम त्रिकोण नहीं है। इसमें जहां गोची जी के सत्याग्रह की दास्तान गूंजती है तो वहीं दक्षिण अफ्रीका के मूलवासियों के जीवन का अतीत और वर्तमान तथा दक्षिण अफ्रीकी समाज के कुछ विद्रूपों और विरोधाभासों को भी पकड़ा गया है।

उपन्यास में अन्य अनेक पात्रों का अस्तित्व अपने-अपने अनुभवों के साथ सहजता और सूक्ष्मता से उपस्थित है। जीवेश की मां लीला बिलकुल आज के भारत की मां की तरह से ही मौजूद है। अन्विता की आंटी वती का चरित्र अदभुत तरीके से नारी-स्वातंत्र्य का आख्यान है। एक ओर असंवेदनशील, ईर्ष्यालु और अन्विता की घोर विरोधी बहन नोनी है तो दूसरी ओर हर कदम पर साथ देती अन्विता की दोस्त बानो है।


इस उपन्यास में एक खास बात आर्किटेक्चर और स्थापत्य की वे बारीकियां भी हैं, जिनकी अपेक्षा अन्विता जैसी एक काबिल आर्किटेक्ट से की जा सकती है। कहा जा सकता है कि कुसुम अंसल जिस परिवार से सम्बन्ध रखती हैं, वहां हो रही बातों ने कुसुमजी को यह अन्तर-दृष्टि दी है, जिससे उन्होंने निहायत खूबसूरती से उन सब बारीकियों को अन्विता के चरित्र का हिस्सा बना दिया है। इसलिए बार-बार यह लगता है कि अन्विता दक्षिण अफ्रीका में न सिर्फ अपना, बल्कि भारतीय तथा दक्षिण अफ्रीकी समाज का भी बार-बार पुनरान्वेषण कर रही है। वह सम्भवतः अपना सारा काम और अपने सारे दर्द और तकलीफें खामोशी से झेलती हुई अपनी पहचान स्थापित करती है तो दूसरी ओर वहां बसा भारतीय समाज भी अभी तक खामोशी की कई प्रतिध्वनियों से परिवेश को भरता हुआ जी रहा है। इन सब नज़रियों से कहा जा सकता है कि यह एक सार्थक उपन्यास है, जिसे एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

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संस्मरण

इप्टा में अभिनय के वह दिन

मैं अपनी स्मृतियों मे टटोल कर याद करने का प्रयास करती हूँ, तो याद आता है, हां, वह वर्ष (1972) उन्नीस सौ बहत्तर, मेरे जीवन का बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष था। उस दिन, वह एक बेहद सूनी सी दोःपहर थी, मेरी एक मित्र ‘‘रेणु‘‘ अलीगढ़ से आयी थी - चाय पीते-पीते अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, कुसुम कहीं चलते हैं।‘‘

मैं शायद बहुत उदास थी - या एक डिप्रेशन मे थी, याद नहीं, पर मैं उठ कर खड़ी हो गई। साधारण सी साड़ी पहनी और उसकी मोटर कार में बैठ गई। जहाँ हमारी गाड़ी रुकी, वह शंकर मार्किट का आखीर ब्लॉक था। सीढ़ियां चढ़ कर हम ऊपर की मंजिल पर चले गये । दीवार के बोर्ड पर लिखा था ‘‘I. P. T. A.‘‘ (इंडियन प्यूपिल्स थियोरिटिकल सोसायटी)। मैं रेणु के पीछे-पीछे चलती गई।

जिस कमरे में हम दाखिल हुए, तो हैरानी से मैंने देखा, वहाँ नाटक का रिहर्सल चल रहा था । हमारे अचानक आ जाने से सब कुछ एकदम ठहर गया ... एक्शन, डायलॉग, संवाद। तभी एक बहुत ही साधारण से मझौले कद का व्यक्ति हमारे सामने आ खड़ा हुआ। चैक का आधी बांह का कुर्ता, मटमैली सी सफेद धोती और पाँव में चप्पल। एक नितान्त बंगाली परिवेश - बिखड़े हुए बाल- आँखों पर चश्मा, साँवला सा रंग- साधारण सी पर्सनैलिटी।

रेणु ने उनकी ओर मुखातिब हो कर कहा - ‘‘चंदू दा, सॉरी, मैं अब आपके नाटक पर काम नहीं कर पाऊँगी - मेरी जगह मेरी यह दोस्त, कुसुम मेरा रोल करेगी। और, कुसुम, ये नाटक के डायरेक्टर (निर्देशक) हैं, चंदू दा।‘‘

तब तक, शायद, मैंने उन्हें नमस्ते भी नहीं की थी।

चंदू दा एक आत्मीय स्वर में कहने लगे - ‘‘चलो, ठीक है‘‘। फिर उन्होनें मेरी ओर सरसरी नजर से देखा पर इससे पहले कि मैं उनसे कह पाती कि मैं शादी-शुदा हूं - तीन बच्चों की मां हूं और खासी मोटी भी हूं - कॉलेज के जमाने में किये गये नाटकों की बात कुछ और थी पर अब इस उम्र में क्या एक्टिंग कर पाऊँगी ? मेरे पास अभिनय का कोई सर्टिफिकेट भी नहीं हैं - ना ही कोई अन्य ट्रेनिंग - अनुभव।

परन्तु, चंदू दा ने अपनी फाइल से एक स्क्रिप्ट निकाला और मुझे पकड़ाते हुए कहने लगे ‘‘चलो कुसुम तुम्हारा रोल (किरदार) इस नाटक में ‘‘फरीदा‘‘ का है। वहाँ सामने स्टूल (छोटी चैकी) पर बैठ जाओ। रीडिंग चल रही है, अपनी लाइन्स पढ़ लो और पार्टिसिपेट करो। कम सीट डाउन।‘‘

और उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उस स्टूल (चैकी) पर बैठा दिया।

रेणु मुड़कर चली गई - 

नाटक का नाम था ‘‘ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे‘‘ जिसके लेखक थे मेहंदी भाई । भाग लेने वाले हम सब कलाकार - रीडिंग शुरू हो गई, एक भी मिनट बर्बाद नहीं हुआ। न कोई परिचय, न कोई पहचान - अभिनय-अभिनेता नाटक के लेखक सभी थे और हमारे निर्देशक चंदू दा। आश्चर्य! उन सभी ने मुझे ऐसे थाम लिया जैसे मैं वर्षों से उनके उस लिखे हुए नाटक के उस ड्राफ्ट, स्क्रिप्ट के लैंडस्केप पर कोई न कोई किरदार निभाती चली आ रही थी। कुछ ही घंटों में नाटक की रीडिंग समाप्त हो गई थी - मैं नहीं जानती मैंने शुरुआत कैसे की। परन्तु चंदू दा अपने अंदाज से मुझे समझाते चले गये। केवल मुझे ही नहीं, शारदा को ... सलमान को ... और हम सभी को कैसे खड़ा होना है, कैसे चलना है, किस तरह से डॉयलॉग डिलीवरी करनी है। औरों की बात मैं नहीं जानती परन्तु मैं न तो महत्वाकांक्षी थी, ना ही मुझमें अभिनय की कोई इच्छा, परन्तु जाने कैसे मेरा मन उस नये परिवेश में रमता चला गया। 

छोटे-छोटे चाय के गिलासों में चाय भी आ गई और हम नाटक की वैतरणी में बहते - बातें करते और चाय पीते गये। कुछ ही घंटो में मैं, हाँ, मैं, कुसुम अंसल, एक साधारण गृहणी के खोल से बाहर निकल कर, नाटक की महत्त्वपूर्ण अभिनेत्री बन गई थी। मेरे शरीर ने मुझे भुला दिया और मेरे अपनेपन ने मेरे कॉन्शियसनेस ने मेरे शरीर को। बस, नाटक मे लीनता मेरा मकसद बन गया था जो आगे चलकर एक अभिनेत्री से उठकर एक लेखिका होने तक चला था। उस नाटक ने मेरे जीवन को बदल दिया, जाने कैसे? कुछ कायाकल्प अचानक हो जाते हैं। असमान्य सा रूपान्तरण।

वह चंदू दा का निर्देशन था या नाटक का कथानक; पता नही क्या - पर हां, जब भी चंदू दा नाटक की बारीकी समझाते तो उनका सारा व्यक्तित्व अभिनय बन जाता था - उन्हें डायरेक्ट करने की कला आती थी। मैं आश्चर्य से देखती थी, वह बहुत मामूली सा व्यक्तित्व - पर कितने बड़े  बुद्धिजीवी - इनटलेक्ट्यूअल, जिसको अभिनय की बारीकियों की पूरी-पूरी सूझ-बूझ और जानकारी थी। उनको निर्देशन की महारत हासिल थी जिसका जादुई सा प्रभाव हम सभी पर पड़ता था। मेरे साथ शारदा बरुआ, अज़ीज़ कुरैशी, सलमान रिज़वी, रईस मिर्ज़ा, अरुण सहगल, राजेन्द्र सिंह और कंवल अज़ीम। हम सभी एक प्रकार के असाधारण अनुभव से गुजर कर अभिनेता बन रहे थे।

हमारा नाटक त्रिवेणी सभागार के खुले मंच पर अभिनीत होता था, मुझे दर्शकों के बीच से इंट्री लेनी होती थी। दादा ने ही चलकर सब समझा दिया था और मेरी उस अदायगी की, सराहना भी बहुत हुई थी। चंदू दा अपने पूरे तन-मन से नाटक में गहराई से इन्वॉल्व रहते थे । उनकी कमिटमेंट किसी तपस्या से कम नहीं थी।

चंदू दा की सादगी मे कोई प्रदर्शन नहीं था, ना ही कोई बाहरी दिखावा। वे कला के सौंदर्य-शास्त्र को कला के लिये जी रहे थे - नाटक के हर दृश्य में, हर कलाकार के अभिनय मे समोहित एक लहर की तरह बहते हुए - जिसमें गहराई होती है और गति भी। और शायद वही हमारे लिये एक मुल्यवान शिक्षा थीं; जिसे हमें अपने अभिनय में उतारना था।

चंदू दा - श्री परेश चन्द्र दास- बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे। मॉडर्न बंगाली थिएटर के आर्किटेक्ट - संयोजक। वे ‘‘प्रेसट्रस्ट‘‘ के सदस्य भी थे। उनको ‘‘कबूकी‘‘ जापानी कला का भी पूरा ज्ञान था। इसके अतिरिक्त कला और अभिनय पर उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपते थे। 

साधारण पर असाधारण।

उनकी स्मृति को मेरा श्रद्धा सहित नमन। -कुसुम


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नाटक: ‘उसके होठों का चुप’

रिश्तों की राख में छिपी विद्रोह की चिंगारी: डॉ. परमेश्वरी शर्मा

कुसुम अंसल का नाटक ‘उसके होठों का चुप‘ नारी हृदय को टटोलता, जाँचता, परखता और उसके द्वारा उठाए गए प्रश्नों की प्रतिध्वनि करता एक एहसास है जिसे वह आज तक कभी बेटी, कभी बहन, कभी माँ, कभी पत्नी बनकर सहती आई हैं, महसूस करती आई हैं। वह कभी किसी से कुछ नहीं कह पाई। यह एहसास उसके होठों का चुप बन कर रह गया है। कुसुम अंसल स्त्री से जुड़े अनेक प्रश्नों को बड़ी शिद्दत से उठा कर उसकी जीवन-त्रासदी को उघाड़ती चलती हैं, उसे वस्तु समझने वाली मानसिकता के विरुद्ध अपना आक्रोश दर्ज करती हैं। 

‘उसके होठों का चुप‘ पुरुष-प्रधान सामाजिक-व्यवस्था में अपना अस्तित्व खोजती दो सहेलियों की पीड़ा को परत-दर-परत खोलता चलता है। दोनों ही अपने वजूद को समाज के आईने में खोजती रहीं तथा अपने संस्कारों और जीवन-मूल्यों के कारण पुरुष की यातनाओं को चुपचाप सहन करती रहीं। उनका चुप ही उनके प्रश्न हैं। ये प्रश्न हैं- आज का समाज इतना मूल्यविहीन और असंस्कारी कैसे हो गया है? इसका जिम्मेदार कौन है? पुरुष, जिसने नारी को हमेशा भोग-वस्तु की दृष्टि से देखा है या नारी, जो हर यातना, हर गम सह कर, वह सब कुछ पुरुष को देना चाह रही है जो उसे नहीं मिला है? नन्दिनी और नज़्म शाहजहाँपुर जैसे छोटे शहर में पली-बढ़ी लड़कियाँ विवाह के बाद बड़े शहरों में आकर खुद को पहचानने की जद्दोजहद कर रही हैं। नज़्म के वैवाहिक जीवन में खालीपन, ऊब और नीरसता है क्योंकि उसके पति के दिमाग में उस के पहले प्रेम का भूत सवार है। पुरुष अहं के चलते वह उससे जुड़ ही नहीं पाता। दूसरी स्त्री नन्दिनी अपने आप को पति के अनुरूप ढालने का हर संभव प्रयास करती है। पूरी तरह से उसके रंग में ढल जाती है तब भी उसके दमन-चक्र से मुक्त नहीं हो पाई है। लेखिका ने जिस गहराई और बारीकी से स्त्री-जीवन की व्यथा को उभारा है वह उसकी बेहद सम्वेदनशील और गहन सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है। स्त्री-जीवन के सारे प्रश्न उस के व्यक्तिगत अनुभव की उपज हैं। कुसुम अंसल के अपने आत्मीय रिश्ते उसके लिए मानसिक संताप से कम नहीं रहे। अतः वह अपने सम्पूर्ण साहित्य में उसकी अभिव्यक्ति बार-बार करती रही हैं। रिश्तों में यदि आत्मीयता न हो तो वह बोझ लगने लगते हैं किन्तु स्त्री की तो जिन्दगी ही सामाजिक रिश्ते निभाने में बीत जाती है। चाहे वह मन से निभाए या बेमन हो कर, समाज की उससे यही अपेक्षा उसके जीवन की विडम्बना है। नज़्म के निम्नलिखित संवाद में थोपे गए रिश्तों के प्रति उचित आक्रोश कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है - “नन्दिनी! रिश्तेदार तो जबरदस्ती जिंदगी पर थोप दिए जाते हैं जिन्हें न चाहते हुए भी निभाना पड़ता है, उनका बोझ कैसा ठोस होता है भारी, पर दोस्त-दोस्त तो हम उसे ही बनाते हैं जिसे दिल चाहता है।‘‘ नजम पारिवारिक, सामाजिक मान-मर्यादा एवं संस्कारों को मानने वाली पढ़ी-लिखी लड़की, समाज के अन्तर्विरोधों, रूढ़ियों से बेहद क्षुब्ध। वह भाभी रज़िया, जिस का पति निकाह के बाद ही उसे घर छोड़कर विलायती मेम के साथ चला गया है तथा मन्नन की अम्मा की तलाक़शुदा ज़िन्दगी को पुरुष की निर्ममता मान कर न केवल सहानुभूति प्रकट करती है बल्कि उन दोनों को अपने साथ होने वाले अन्याय को सहने पर कोसती है- “मुझसे तुम दोनों का अकेलापन बरदाश्त नहीं होता ....बेक़सूर चुपचाप सज़ा क्यों भोगे। आपने तमअवसज क्यों नहीं किया, कोई शिकायत कुछ भी नहीं- क्यों नहीं किया।‘‘

कुसुम अंसल स्त्री-सरोकारों की लेखिका हैं। स्त्रीवादी दृष्टिकोण एक स्वस्थ मानवीय दृष्टिकोण है। इसी दृष्टिकोण के रहते वह पुरुष की निरंकुशता, नीचता, उत्पीड़न और भोगवादी मनोवृत्ति के विरुद्ध स्त्री को शक्तिशाली बनने और अपनी ताकत को पहचानने की प्रेरणा देती हैं। इसके लिए उसे बहुत कीमत चुकानी है। यह कीमत नज़्म चुकाती है। माता-पिता की परम्परावादी सोच और पुरुष समाज की विकृत मानसिकता का शिकार उसे बनना पड़ता है। पारम्परिक रिवाजों के अनुसार नज़्म का रिश्ता बचपन में ही उसकी फूफी के बेटे (सलीम) के साथ हो चुका था। विलायत में रहने वाला सलीम रिश्ते से इन्कार कर देता है क्योंकि नज़्म विलायती रंग-ढंग वाली लड़की नहीं है- “नज़्म बड़ी देहाती सी है ... ैीम पे दवज चवसपेीमक दवज हसंउवतवने उसकी विलायती जिंदगी, सपमि ेजलसम में फिट नहीं बैठेगी - उसे सपमि चंतजदमत चाहिए वसक ंिेीपवदमक बवनेपद नहीं।‘‘ 

सलीम के बहाने लेखिका ने पुरुष मानसिकता को आड़े हाथों लिया है, जो हृदयहीनता की सभी सीमाएं लांघते हुए नारी को वस्तु समझने में ही सुख का अनुभव करती है। लाइफ पार्टनर कैसा हो? क्या यह अधिकार केवल पुरुष को ही हासिल है? आखिर पुरुषों को यह हक किसने दिया कि वह जब चाहें रिश्ता जोड़ लें, जब चाहें तोड़ लें। यकीनन इस भारतीय व्यवस्था ने जिसने स्त्री की इच्छा-अनिच्छा की कभी परवाह नहीं की और पुरुष को निर्णायक की भूमिका में उतारा, क्यों यह व्यवस्था पुरुष की आज़ादी की तो समर्थक है किन्तु स्त्री की बात आते ही मान-मर्यादाओं का पिटारा खोल देती है? स्वयं स्त्री-सम्मान की बात होती है और इस सम्मान की सीमा निर्धारण का कार्य भी यह पुरुष समाज ही करता है। माता-पिता बेटी की शादी करके सम्मान महसूस करते हैं। पति-पत्नी से अपनी हर बात मनवा कर सम्मानित होता है। क्या ये पुरुष सत्ता द्वारा बनाई गई मान्यताएं नहीं हैं? नज़्म के माता-पिता सलीम के इंकार के बावजूद अपने परिवार और बेटी के सम्मान की ख़ातिर फूफी (सलीम की माँ) को निकाह के लिए राज़ी करते हैं। स्त्री जीवन की कितनी 

विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि फूफी जो एक परम्परावादी औरत है अपने भाई-भावज को बेटी के बोझ से मुक्त करने के लिए केवल निकाह की हामी भरती है -“आफताब भी तो छोड़ गया था रज़िया को वह रह ही रही है, यहाँ मुन्नन की अम्मा भी तो रहती है... सो नज़्म भी पड़ी रहेगी.....निकाह का बोझ तो उतर जाएगा आपके सिर से।‘‘ कितनी दकियानूसी सोच से बंधा है यह पुरुष-प्रभुता-सम्पन्न स्त्री समाज। कुसुम अंसल रूढ़-सामाजिक मान्यताओं, परम्पराओं और परम्परागत नैतिक प्रतिमानों का अन्धाधुंध अनुकरण करने वाली फूफी (जीनत) और नज़्म के माता-पिता की अवतारणा कर दर्शक/पाठक के मन में स्त्री विरोधी सोच के प्रति वितृष्णा जगाती हैं। इसके बरक्स आधुनिकता के फलस्वरूप सजग ‘वस्तु‘ बनने का ज़ोरदार विरोध करने वाली नज़्म है जिसके द्वारा लेखिका स्त्री के वजूद की स्थापना करती हैं तथा पुरुषवादी सोच को नकारती हैं- “अम्मी आप क्या कहे जा रही हैं। आप क्यों भूल रही हैं कि सलीम ने मुझे रिजेक्ट कर दिया है, मैं उसके लिए एक देहाती गंवार और बेवकूफ चेहरे के अलावा कुछ नहीं हूँ और आप क्या चाहती हैं मैं उससे शादी कर लूं। यह कैसे मुमकिन है।” स्त्री भी एक संवेदनशील प्राणी है। अपने सपनों के टूटने की पीड़ा उसे भी होती है। पितृसत्ता सदैव इस तथ्य को अनदेखा करती आई है। सलीम के इन्कार से तथा विरोध में अपने वजूद की रक्षा की खातिर लिए गए अपने निर्णय से नज़्म दुःखी भी हुई। आख़िर उसका भी हृदय है, संवेदना है। पुरुष दंभ के चलते उसकी पीड़ा और जागरुकता इस संवाद में देखी जा सकी है‘‘उस दिन सलीम के रवैये से जैसे मैं एक शर्मनाक खाई में गिर पड़ी थी, कितना अदना लगा था अपना वजूद, बेकार और बेमानी। फिर एकाएक, मुझे लगा कि जो हुआ अच्छा ही हुआ, काले बादलों से पहले, बिजली गिरने से पहले, हवाएं आँधी में तबदील हो गईं और मुझे ले उड़ीं।‘‘ निकाह करके सलीम उसे रज़िया और मुन्नन की अम्मा की तरह छोड़ कर चला जाए। दूसरे शब्दों में विवाहित होकर सिर से उतर जाने वाली सोच, अपने हक के प्रति सजग नज़्म को कतई पसन्द नहीं। इससे पहले कि यह बिजली उस पर गिरती वह अपने दोस्त इरफान से कोर्ट मैरिज कर लेती है। उसका यह निर्णय पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो स्त्री की भावनाओं को कुचलती आई है। नारी-जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह जिस पुरुष को निश्छल भाव से अपनाती है, वही उसकी कोमलता को अपनी रूढ़ मानसिकता से कुचल देता है। सलीम जैसे खुदगर्ज़ से नज़्म मुक्त होती है पर इरफान भी तो इसी खुदगर्ज़ समाज का हिस्सा है। लेखिका ने इस सत्य को गहराई से उघाड़ा है कि पुरुष चाहे कितना भी महान् बनने की कोशिश क्यों न करे, कितना बड़ा बुद्धिजीवी क्यों न हो, उसके जहन में स्त्री के प्रति उदारता नहीं आती, वह कभी उसे इंसान समझता ही नहीं। मानवीय-अधिकारों से नारी की वंचना का इतिहास बहुत पुराना है। आज वह उन अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है जबकि पुरुष समाज इसे भी बरदाश्त नहीं कर रहा। 

कुसुम अंसल स्त्री-अधिकारों की जबरदस्त पैरोकार हैं। एक तरफ वह पुरुष समाज के वर्चस्व, उनके दमन चक्र में पिसती स्त्री की पीड़ा को उद्घाटित करती हैं तो दूसरी तरफ उस परम्परावादी सोच, पुरुष-वर्चस्व के विरुद्ध अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़कर आगे आने वाली स्त्री की आवाज़ उठाती हैं। नज़्म की ज़िन्दगी इरफान से. विवाह के पश्चात् और भी खोखली हो जाती है क्योंकि उसके दिमाग़ में नज़्म के पहले प्रेम का भूत सवार है। वैवाहिक ज़िन्दगी में पति से जो अपेक्षाएं एक पत्नी को होती हैं, इरफान उन सबसे उसे वंचित रखता है। अपने वैवाहिक जीवन की सच्चाई को नन्दिनी के समक्ष प्रकट करते हुए नज़्म कहती है- “नन्दिनी! अब तुझसे क्या छिपाना, इरफान तो सिर्फ सज़ा देता है। मेरी कच्ची उम्र के उस इश्क को जो कभी परवान नहीं चढ़ा। पता नहीं ये मर्द इतने बतनमस क्यों होते हैं? इरफान जानबूझकर औलाद नहीं होने देता।‘‘ स्त्री पर एकाधिकार मानो पुरुष को ईश्वर ने लिख कर दिया है और स्त्री विरासत में मिले अपने संस्कारों और जीवन-मूल्यों को छोड़ नहीं सकती। पुरुष के लिए जो अधिकार हैं वही स्त्री के लिए दायित्त्व। नज़्म के ही शब्दों में- “सिंसिऐरिटी मेरी तालीम का बुनियादी हिस्सा है। सलीम का तो बस ख्वाब जिया था, इरफान ज़िंदगी का सच है। उसे अगर चाह नहीं सकी तो निभा तो रही हूँ।‘‘ निभाते हुए जीने की पीड़ा स्त्री-जीवन की ऐसी विडम्बना है जिससे सम्भवतः मुक्त होना कठिन कार्य है। धर्म शास्त्र में भी जो नियम 

बन्धन निर्धारित किए गए हैं, वे भी औरत को ही सज़ा देने के लिए हैं। वह पुरुषों द्वारा जारी किए गए फरमान हैं, उस में सब कुछ पुरुष मानसिकता से लिखा गया है। नन्दिनी के यह कहने पर कि खालीपन दूर करने के लिए एक बच्चा गोद ले लो। नज़्म अपनी विवशता प्रकट करती है- “अरे नन्दिनी ऐसा मुमकिन नहीं है। इस्लाम में बच्चा गोद लेना मना है।‘‘ इस्लाम धर्म के अनुसार जो औरत बच्चा देने में सक्षम नहीं है, उसे बच्चा गोद लेने की अनुमति नहीं है। इस रूढ़ नियम में बंधी नज़्म अपने जीवन का खालीपन नहीं भर सकती। पति उसकी पीड़ा और संवेदना को समझने के बजाय आरोपों से आहत करता रहता है। निरन्तर अपने वजूद की तलाश में संघर्ष करती नज़्म टूट जाती है।

एक ओर प्रेमी को जीवन साथी बनाने वाली और सहज-स्वाभाविक जीवन जीने वाली नज़्म को पुरुष और समाज की संकीर्ण मानसिकता का शिकार होना पड़ता है, वहीं नन्दिनी मल्टीनेशनल कम्पनी के मैनेजर से विवाह होने के बाद अपने प्रकृत व्यवहार को छोड़ कर कृत्रिमता का लबादा ओढ़ने पर विवश कर दी जाती है। बड़े शहरों की खोखली और कृत्रिम ज़िन्दगी के विषय में वह बताती है- ‘‘ऐसी अंग्रेजियत घुसी हुई है दिमागों में, बाबा रे, जो भी मिला, दोस्त या रिश्तेदार, मतलबी उंजमतपंसपेजपब और खोखला, मेरा तो दम घुटता था वहाँ की बनावटी ेवबपमजल में ... और देव उसे मेरा बवउचसमग कहकर मुझे ही डांटते थे। वहाँ मैं जिस किसी के घर जाती थी- वह अपनी तपबीदमेे दिखाने के लिए इंसानियत नहीं - दोस्ती भी नहीं चीजें आगे कर देते थे।” महानगरीय जीवन में रिश्ते नहीं, असलियत से बहुत दूर ओढ़ी हुई ज़िन्दगी जीने पर व्यक्ति मजबूर है और इस ओढ़ी हुई जिन्दगी को एटीकेट कहा जाता है। हम ‘उसके होठों का चुप‘ नाटक के पहले एक्ट के पांचवें दृश्य में महानगरीय जीवन विसंगतियों से रूबरू होते हैं। स्वच्छंदता के नाम पर फूहड़ता, बेमानी होते रिश्ते और उसमें नन्दिनी जैसी पत्नी जो केवल समझौते के लिए वह सब कर रही है जिससे वह पति से जुड़ी रहे। उसका यह जुड़ाव भी कितना खोखला है- जबकि देव उसका बँटा हुआ पति है। वह कई दूसरी औरतों से सम्बन्ध रखता है। लेखिका महानगरों की असली तस्वीर और वहाँ के जीवन के कटु सत्यों को उद्घाटित करती हैं।

कुसम अंसल स्त्री-जीवन की विडम्बनाओं के साथ-साथ अनेक ज्वलन्त प्रश्नों को भी उठाती चलती है। बच्चा गोद लेने वालों की मानसिकता की भी पोल खोली गई है। देव और नन्दिनी जब बच्चा गोद लेने अस्पताल पहुंचते हैं तो वहाँ लड़का नहीं लड़की उन्हें देने की बात होती है। दोनों का प्रतिरोध देखकर नन समाज-व्यवस्था पर व्यंग्य करती है- “पता नहीं हर हिंदू औरत लड़का ही माँगती है, हम क्या करें जितना बच्चा आता है सब लड़की, लड़की किसी को नहीं चाहिए होता है न। उसकी माँ को, न एडाॅप्ट करने वाली पार्टी को ...।‘‘ पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक घिनौना चेहरा कि जन्म देने वाली उसे पाल नहीं सकती और गोद लेने वाले भी लड़का चाहते हैं। ऐसे में इस देश में स्त्री के भविष्य को लेकर लेखिका का चिन्तित होना स्वाभाविक है। पुरुष तो स्त्री के भोग्या रूप को महत्त्व देता है पर स्त्री का क्या कहें जो पुरुष द्वारा प्रताड़ित होती है फिर भी पुरुष (लड़का) की ही कामना करती है। नन्दिनी केवल दिखावे के लिए या यूँ कहें देव को समझते हुए पश्चिमी रंग-ढंग में ढली हुई है। जबकि गोद ली बेटी का पालन-पोषण भारतीय संस्कारों वाली माँ की तरह करती है। कुसुम अंसल की भारतीय संस्कारों में आस्था है इसलिए वह कभी ‘भगवान के अस्तित्व में विश्वास हो तो आदमी कभी गलतियाँ नहीं करता‘ और कभी मातृभाषा प्रेम की अभिव्यक्ति नन्दिनी के द्वारा करवाती है। जबकि 

अत्याधुनिक पीढ़ी भगवान में आस्था या मातृभाषा प्रेम आदि को आउटडेटिट कह कर नकार देती है। पति बेटी के जन्म दिन पर लाई साड़ी को दकियानूसी विचार मानता है और स्वयं ऐसे कपड़े लाता है जो शरीर को ढकते कम और उघाड़ते ज्यादा हैं। ऐसे पारवेश में जहाँ एक बाप बेटी में खूबसूरत औरत देखने लगे- “उससे नाजायज सम्बन्ध जोड़ ले - तो एक माँ के लिए क्या बचता है। वह माँ जब रिश्तों की पवित्रता को अपने