साहित्य नंदिनी, अप्रैल 2022







 समीक्षा

क़मर मेवाड़ी ‘रचना संचयन’ से गुज़रते हुए

‘‘कूव्वत-ए-तामीर थी, ऐसी खसो खा साख में।


आँधियाँ चलती रही औ आशियाँ बनता गया ।।’’ -अज्ञात


डॉ. अवध बिहारी पाठक

सं. माधव नागदा

जब तामीरी की हिम्मत खड़ी होती तो घास-पात जैसी चीज़ों से आँधियों के झोंकों के बावजूद आशियाँ बन कर के ही रहता है। ऊपर लिखित अशआर मुझे क़मर मेवाड़ी रचना संचयन देखकर के याद आये और बारबार उन परिस्थितियों पर दृष्टि जाती रही, जिनमें इतनी छोटी उमर में लेखन की बेचैनी उभरी और कहानी-कविता बनकर बह निकली। जिसने उनको अपनी घनी विरल आर्थिक तंगी के बावजूद एक साहित्यिक पत्रकारिता आन्दोलन खड़ा कर दिया वह भी बिना किसी संरक्षण के। जिसमें केवल उन कुछ ही आत्मीय मित्रों का सभी प्रकार का योगदान था। संबोधन जैसी पत्रिका वैचारिक मंच पर खड़ी कर दी और एक चिंतन वृक्ष भी जो हिन्दी साहित्यिक पत्रिकारिता के इतिहास में अन्यतम है। यानी एक पत्रिका का 50 वर्ष तक संपादन, संचालन और प्रकाशन का एक रिकार्ड। हिन्दी में यहाँ तक कि उनके निवास राज्य राजस्थान में भी साहित्य को लेकर तब खेमे बन गए थे। उन सबकी चिंता किए बिना यह प्रकाशन जारी रखा और आज उससे विरत होकर एक सम्पन्न चमक से लैस हो उस पार खड़े हैं, बेदाग़, लोकप्रिय, सही चिंतक, लेखक और हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में मील के पत्थर के रूप में। इस रचना संचयन को मैं निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत देखना चाहूँगा-

  1. बेबाक सम्पादन- इस पुस्तक के संपादक माधव नागदा जी ने सम्पादन में अपनी प्रबुद्ध चेतनापरक समझ से काम लिया है। रचना के प्रारम्भ में एक समृद्ध भूमिका जो क़मर मेवाड़ी जी की रचनाओं से एक सघन पहचान बनाने में पाठक की मदद करती है। यानी कि यह किताब क़मर मेवाड़ी के रचना साहित्य पर फोकस है। भूमिका में रचनात्मक योगदान को वर्गीकृत रूप में देखा जा सकता है। यहाँ सम्पादक का श्रम बोलता दिख रहा है।
  2. सम्पादन की वस्तुनिष्ठता- इस पुस्तक में कमर साहब के मित्रों, सहायकों उनके निजी परिवेश में रह आये लोगों के आलेख हैं। जिनमें क़मर मेवाड़ी के लेखकीय पक्ष के चित्र हंै। व्यक्ति चित्र सरीखे जैसे इनमें आदर भाव, क़मर साहब के संघर्ष लेखकीय चेतना को भीतर तक खँगाल कर रख दिया है। कुछ आलेखों में क़मर साहब की कभी-कभी गड़बड़ाई हुई मनोदशा के बारे में भी चर्चा है यथा उपन्यासकार मासूम रज़ा की तरह गद्य में खिलन्दड़े शब्द और गालियों का प्रयोग भी जो निबन्धकारों की, समीक्षकों की अपनी मनोवृत्तियों का परिचय देता है। जहाँ कमर साहब के प्रति उनका केवल पूजा भाव नहीं उनका यथार्थ भी सामने आया है। जो वस्तुतः क़मर साहब की युगीन समसामायिकता के प्रति क्रोध का प्रतीक है और वस्तुतः क्रोध और बखेडा़ करना उनकी प्रवृत्ति है जो स्थायी भाव नहीं। थोड़ी देर बाद वह सामान्य स्थिति अंगीकार कर लेता है।
  3. क़मर साहब की लेखकीय प्रयोग धर्मिता- हिन्दी की विधाओं को देखें तो पहले वे कहानियों की ओर गये। वहाँ से शुरुआत हुई, इसके बाद कविता, उपन्यास, संस्मरण सब कुछ लिखा, परन्तु यह सब समय की चाल को देखकर ही लिखा। ये प्रयोग किसी न किसी विधा मंच से अपनी अन्तद्र्वंद्व, पीड़ा, आक्रोश, पीड़ित के प्रति अपनी संवेदना प्रक्रट कर सके हैं। यह पुस्तक बताती है कि वे पूरे ज़माने को विद्रोह खड़ा कर देने को प्रेरित करते हैं। यहाँ तुलछा जैसे पात्र हैं। अन्य कोई उनका लेखन ग़रीब, शोषित, पीड़ित जन को संवेदना दे सका और विरोध में खड़े हो साहस भी। उनके पात्र साहसी हैं। 
  4. परन्तु उनके लेखन का मूल स्वर कविता में झलकता है इसी किताब में त्रिलोकी मोहन पुरोहित जी ने बहुत ठीक कहा जो कविता को त्रिआयामी सिद्धान्त से विवेचित करता है। उनकी कविता का स्वर पहले से लगातार तीखा और संघर्षी होता गया। दूसरे में मज़लूमों को खड़ा होने का संदेश में और तीसरे में पीड़ित के साथ स्वयं ही संघर्ष के लिए लठ्ठ लेकर खड़े दिखने के तेवर। यहाँ वे धूमिल के साथ खड़े दिखते है। धूमिल कहते है ‘‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए। इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। क़मर मेवाड़ी जी भी कहते हैं कि मैं कविता को मरने नहीं दूँगा।’’ एवं असद ज़ैदी और बृजेन्द्र रेही कविता में सुलगते रहेंगे। (पृष्ठ 200)’’ यदि मुझे कहने दिया जाये तो कहूँगा कि उनका कविता पक्ष मज़बूत और संवेदनशील है। कहानी, उपन्यास के पात्रों में बेचैनी है विद्रोह है परन्तु कविता तो जैसे बरस ही पड़ती है और कहने लगती है कि ज़रा धैर्य रखो, अभी बरसने का मौसम नहीं है, वे अवसर की फिराक मंें जैसे कि फिराक गोरखपुरी रहा करते थे। अपनी बात कहने की किसी अवसर की प्रतीक्षा में। कुल मिलाकर कहा जाये तो क़मर मेवाड़ी एक चेतना सम्पन्न कवि लेखक हैं जो समकालीनता को पढ़कर उसका सामना करने के लिए जीवन भर प्रतिबद्ध रहे।
  5. निर्भीक सम्पदान क्षमता- थोड़ा पीछे चलकर देखें कि वे बहुत निर्भीक भी हैं। प्रसिद्ध संस्मरणकार कान्तिकुमार जैन के संस्मरणों में बुढ़ार के एक ठाकुर साहब (नाम याद नहीं रहा) को अश्लीलता दिखी तो दूसरी ओर इलाहाबाद के अभिनव ओझा को जैन साहब के भाषागत शब्द रूपों का प्रयोग गलत दिखा जो जैन साहब ने भाषा बोली की परिवर्तनशील प्रवृत्ति और आदत को देखकर किए थे ग़लत दिखे। तब मैंने एक आलेख कान्तिकुमार के पक्ष में नहीं उनकी भाषा और विधागत गद्य की परिवर्तनशील प्रवृत्ति के पक्ष में लिखा, जो उन दोनों की आलोचना के विरोध में जाता था। क़मर साहब ने अपने संस्मरण विशेषांक में मेरा लेख छापा और उसकी प्रतियाँ उन सज्जनों को भेजी जो वस्तुतः स्वयं लेखक रूप में उसी अंक में जिसमें मेरा लेख था शोभित हो रहे थे। यह जानबूझकर विरोधी स्वरों का छापना क़मर साहब के निर्भीक सम्पादन का प्रतीक है। उन्होंने चिन्ता नहीं की पाठक का लेख मेरे इन लेखकों को नाराज़ कर देगा। उनकी यह दृष्टि ‘संबोधन‘ के प्रायः सभी अंकों में देखी जा सकती है।


कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क़मर मेवाड़ी की रचनाओं पर केन्द्रित यह रचना संचयन उनके सारे लेखन का प्रतिनिधित्व करने में समर्थ है इसके लिए नागदा जी और क़मर जी को मेरी शत्-शत् बधाईयाँ।

सेंवढ़ा, जिला दतिया, मो. 826546665

___________________________________________________________________________________

प्रतिक्रिया


सम्यक् मार्ग के पथिक (काव्य संग्रह): डाॅ. मेधावी जैन


सुश्री किरण यादव

डॉ. मेधावी जैन

कविताओं का शुभारंभ ही एक सुंदर कविता से किया गया है। प्रथम कविता से ही मालूम पड़ता है कि नये पथ की रचना का आगाज़ किया है। मेधावी जी की कविताओं में कोई्र किसी तरह का लाग-लपेट नहीं होता। बेहद खूबसूरत अंदाज़ में हर कविता बड़े बेबाक ढंग से कहने की पुरज़ोर कोशिश करती है। 

धर्म की परिभाषा हो या आत्मविश्वास की बात हो उनकी क़लम तरोताज़ा उत्साह से अपनी यात्रा में लीन रहती है। उनकी रचनाओं का संसार इतना अनंत है कि वह खुरदुरी, बंजर ज़मीन में भी पड़े बीज को उगाने, और रण के क्षेत्र में भी अपना वजूद स्थापित करने में सक्षम हैं। कहीं मध्यम पथ है, कहीं चेतना की शांति है, ईश्वरीय खोज के स्वपन संकेतों में कह सुहावने मौसम सी अचेत चेतना को चेताती एकाग्र भाव से चिंतन में डूबी रहती हैं। मुझे लगता है हर कविता हिम्मत और हौसले को आगे बढ़ाती सकारात्मकता के गुणों से लबालब भरी हुई हैं। मैं मेधावी जी के लेखन से प्रेरित होकर हमेशा कुछ न कुछ नया सीखती हूँ जो मुझे मेरे बिखरते आत्म-विश्वास और उन अकेले क्षणों में विश्वास की डोर से थामें अपनी ओर बरबस खींचती हैं। कविताओं में आत्म-दर्शन, अध्यात्म, ऊर्जा, रिश्ते, अपनापन, हर समय पथ-प्रदर्शक की भांति बढ़ते चलो की प्रेरणा हैं। उनकी रचनाओं का संसार असीम है।

पाठक पढ़ते हुए आत्म मुग्ध तो होगा ही और कलम को भी नमन करेगा प्रिय मेधावी जी स्वयं की ऊर्जा का सदुपयोग कर समाज को कुछ न कुछ दे सकने की चाह रखती हैं। ऐसे अद्भुत काव्य-संग्रह के लिए डाॅ. मेधावी जैन जी को अशेष बधाई। सभ्या प्रकाशन जिन्होंने इतनी सुंदर कृति पाठकों को परोसी है। पढ़ने वालों के लिए वरदान ही है।


इसी पुस्तक से 

धर्म की परिभाषा 

वस्तु का स्वभाव धर्म है 

एवं उसे ज्यों का त्यों जानना दर्शन

जाने कहां से बीच में आडंबर आ मिले 

ज्ञान के प्रति समाप्त हुआ आकर्षण


भेद विज्ञान

वस्तु जो है

वह जानने हेतु

जो वह नहीं है

उसे संपूर्णता में जान लेना

वस्तु की समग्रता को जान लेना है

एवं यही भेद विज्ञान है

___________________________________________________________________________________

प्रतिक्रिया

उड़ना तुझे अकेला है: डॉ. मेधावी जैन

सुश्री किरण यादव

डॉ. मेधावी जैन

प्रिय मेधावी जैन जी की यह पुस्तक ‘उड़ना तुझे अकेला है’ बाकी अन्य किताबों से एकदम भिन्न हैं, क्योंकि वो समय ही ऐसा कठिन क्रुर था उसके बारे में सोचते हैं तो रूह कांप उठती है। वैसा ही एक समय उनकी कलम ने अपने शब्दों में व्यक्त किया है। किस तरह पूरे परिवार ने उस भीषण नियति का सामना किया है। सभी पात्र आपके समक्ष बात करते सजीव नज़र आते हैं। कहीं सब परीक्षा में फेल हुए तो कहीं क्रुर समय की भेंट की भावनाओं को दबाए एक जुट हो, एक दूसरे के साथ बने हुए हैं। इससे हमें यह संदेश भी मिलता है कि समय चाहे जैसो भी हो, अगर हम सयुक्त परिवार में रहते हैं तो हर भीषण से भीषण विपत्ति का सामना, साहस और हिम्मत से कर सकते हैं। परिवार के बेटे जो माता-पिता के प्रति इतने समर्पित हैं, और बहुएँ जो अपनी सास को अपनी माँ की तरह उनके साथ उस भयानक कोरोना काल में जब वह बिमारी से ग्रस्त हैं उनकी देखभाल में भी पूरा परिवार कोई कसर नहीं छोड़ता है। पढ़ते वक्त कहीं आँखें नम हुई तो कहीं उनके लेखन को नमन किया क्यूंकि वह एक समय को देखती हैं, दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारियों को तो कभी कर्म को आगे रखती है, हिम्मत से और सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत रहती है। हमारी सकारात्मक सोच कभी हमें झूकने हारने नहीं देती, आपकी अंतरात्मा कभी आपको चेताती है कि किस तरह आपको अपने कर्म पथ पे हर हाल में चलते रहना है।

यह संदेशात्मक पुस्तक है। अगर हम ऐसे ही पढें़ तो कोरोना का क्रुर समय ही दिखेगा लेकिन भीतरी दृष्टिकोण से पढ़ें तो बहुत सीखने को मिलेगा जो मैंने स्वयं महसूस किया है।

चाहे कितने भी घनघोर बादलों में सूर्य क्यों न छिपा हो। बुराई के बादल अवश्य हटते हैं। मौसम जरूर बदलते हैं। हर लड़ाई का अंत होता है।

अपनी प्रिय क़लमकार को ढेरों बधाईयाँ, स्नेह, प्यार, उनकी कलम और प्रखर होकर साहित्य और समाज की सेवा करती रहें...           -दिल्ली, मो. 98914 26131

डाॅ. मेधावी जैन की महत्त्वाकांक्षाओं का बहता हुआ नीर, जिज्ञासाओं के आवेग से बहता हुआ अंतस की खोज में निरंतर गति से अब एक सरिता का रूप धारण कर चुका है।

मेधावी जी के आत्म विकास की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी सकारात्मकता, समर्पण, सेवा एवं सौहार्द भाव हैं। आध्यात्मिक रूझान, कर्मसिद्धांत और जैन दर्शन ने उनकी विचार धारा को संपुष्ट ही नहीं बल्कि परिष्कृत, सशक्त एवं संप्रेषणीय भी बनाया है। यह पुस्तक हमारे दृष्टिकोण को सकारात्मकता का पुट प्रदान करेगी। 

शुभकामनाओं के साथ, 

देवेंद्र बहल, संपादक, ‘अभिनव इमरोज़’ एवं ‘साहित्य नंदिनी’

___________________________________________________________________________________

समीक्षा

मौत और मौत के आसपास- ‘वहां लाल गुलाब नहीं थे’


डॉ. (श्रीमती) विजय शर्मा

सुश्री नीलम कुलश्रेष्ठ

मौत के कई कारण हो सकते हैं। उम्र, हारी-बीमारी, दुर्घटना, हत्या-आत्महत्या। मगर सबसे दुःखद होती है आत्महत्या और उससे भी अधिक वीभत्स होती है हत्या को आत्महत्या का जामा पहना कर प्रस्तुत करना। मगर समाज में यह कार्य लगातार होता है, आए दिन होता है। वैसे तो पुरुष की हत्या को भी आत्महत्या के लिबास में दिखाने की कोशिश की जाती है मगर स्त्री की हत्या को आत्महत्या कह कर प्रचारित करना बहुत आम बात है। सब जानते हैं यह हत्या है मगर गवाही देने के लिए कोई आगे नहीं आना चाहता है। और दुष्ट लोग यह अमानवीय कार्य कर शान से समाज में रहते हैं। इस तरह के जघन्य कार्य मायके में कदाचित होते हैं, हाँ, ससुराल में कभी स्टोव फट जाता है इसी कहानी  के पुण्या के सांय सांय करते घर के सामने से गुजरते नायिका अपनी नन्ही बेटी नम्रता का अपने  हाथ से कस कर जकड़ लेती है। उसी आदिम स्त्री प्रश्न से टकरा रही है ‘...पता नहीं, नम्रता की बेटी, उस की भी बेटी की बेटी, उस की भी बेटी की बेटी....पता नहीं वह कौन सी बेटी होगी, जो यह लड़ाई जीत पायेगी...सिर्फ एक इनसान के रूप में सही ढंग से जीने व पहचाने जाने की लड़ाई...?

कभी भरे-पूरे सम्पन्न घर, नौकर-चाकर वाले घर की मालकिन भी पानी भरने जाती है और पाँव फिसलने से डूब कर मर जाती है। इस हत्या का कारण कभी दहेज का लालच होता है, कभी विवाहेतर प्रेम। 

लेकिन कई बार आदमी काँपता रहता है, चाह कर भी हत्या नहीं कर पाता है। भले ही वह अपनी आँखों से अपनों के विवाहेतर शारीरिक संबंध देख ले। अंदर बर्फ जम जाती है। अफीम उसका इलाज नहीं होता है, लेकिन आदमी अफीम की शरण में जा कर इस दारुण जघन्य वितृष्णा  से बचने का प्रयास करता है। 

कुछ जीनियस न जाने कैसे  मर जाते हैं और उनके साथ उनके अजूबे भी समाप्त हो जाते हैं जिंदगी रुकती नहीं है बस उसकी जगह नए अजूबे आ जाते हैं। कभी बटमार-लुटेरों का राज था, नक्सलाइट, माओवादी से लोग परेशान रहते हैं लेकिन उन सफेदपोशों का क्या जो ड्र्ग्स का धंधा करते हैं और जो उनसे टकराने की कोशिश करता है उसे डराने का भरपूर प्रयास करते हैं। हम माने या न माने पशु-पक्षी आदमी से अधिक संवेदनशील होते हैं उन्हें आगामी खतरे का आभास पहले हो जाया है और वे दूसरों को भी इससे आगाह करने का प्रयास करते हैं। 

विद्वान गौतम सान्याल  के अनुसार ‘बयान  से परे’ विश्व की  उन कुछ उन्नीस बीस कहानियों में से एक है जो ‘एनीमल इंस्टिंक्ट’ पर लिखी गईं हैं।  

अगर पृथ्वी पर कोई असंवेदनशील, अमानवीय है तो वह आदमी ही है। अपने प्रयोगों के लिए, स्वाद के लिए जानवरों को सताता है, उनकी हत्या करता है, आवारा कुत्तों को कभी ज़हर देकर भी मारा जाता है। कोई धर्म के नाम जानवरों की हत्या करता है।

नीलम  जी की ‘गिनी पिग्स’ कहानी भी क्लीनिकल ट्रायल पर बहस करती  है- ये अंश पढ़िये- ‘बाजार में उपलब्ध एक एक दवा किसी वैज्ञानिक की निष्ठा व किसी की भुगती हुई पीड़ा का परिणाम है। हम जो अस्पताल से अपने अजीज़ों को सही सलामत घर लातें हैं कहाँ सोच पातें हैं इसके लिए कितनी ज़िंदगियां मुसीबत में पड़ गईं होंगी। समृद्ध देशों की दवाई की कंपनियों के भी एजेंट्स   भारत व अफ्रीका में मानव शरीर तलाशते फिरते हैं .लगभग दो सौ मेडिकल काॅलेज क्लीनिकल ट्रायल से जुड़े हुए हैं।’

‘निचली अदालत’ का विचार मंथन भी इच्छा मृत्यु ‘के इर्द गिर्द उलझकर रह गया है...’गुज़ारिश’ फिल्म का वह दादी वाला, घुंघराले बालों वाला खूबसूरत जादूगर तो कैसे इच्छा मृत्यु के लिए तरसता था, शायद इसलिए कि वह हर समय होश में रहता था। इच्छा मृत्यु... यानि मर्सी किलिंग... यानि  यूथनेशिया... ये शब्द कितने  खूबसूरत उच्चारण से भरा है और इसका अर्थ कितना  विकृत है .दुनियां की सबसे बड़ी नियामत जीवन!... अपने जीवन को आदमी सबसे अधिक प्यार करता है... यदि उसे ही समाप्त  करने की इच्छा उत्पन्न हो जाये तो ? .....तो वह आदमी कितने कष्ट का जीवन जी रहा होगा.... पापा अर्द्ध बेहोशी में अपना कष्ट महसूस ही नहीं कर पा रहे... कष्ट में तो वह जी रही है। वह पापा के लिए यूथनेशिया मांग रही है... या अस्पताल के भरे पुरे माहौल में अकेली घूमती वह अपने लिए ?

ये कुछ विचार हैं जो एक कहानी संग्रह से गुजरते हुए मिले। 11 कहानियों का यह संग्रह मुझे बहुत पहले, करीब एक साल पहले बैंगलोर में मिला था। फिर हमने साथ में एक फिल्म ‘आर्टिकल- 15’ भी देखी थी। असल में वह पहली प्रति थी जो मुझे बहुत प्रेम और आदर के साथ दी गई थी। कहानियाँ पढ़ ली थीं मगर व्यस्तता के कारण लिखना नहीं हो पा रहा था। मैं बात कर रही हूँ नीलम कुलश्रेष्ठ के कहानी संग्रह ‘वहाँ लाल गुलाब नहीं थे’ की। ‘जली हुई लड़की’, ‘विभाजन’, ‘मातम पुर्सी’, ‘बस एक अजूबा’, ‘वहाँ लाल गुलाब नहीं थे’ की कहानियाँ हमारे आसपास के परिवेश, हमारे समाज से उठाई गई कहानियाँ हैं। इन्हें शब्दों में गूँथने का काम नीलम कुलश्रेष्ठ ने किया है। इस गूँथने के लिए वे बधाई  की पात्र हैं।

इस पुस्तक का कमाल ये है कि इसमें क्लीनिकल ट्रायल से हुई मृत्यु, इच्छामृत्यु (यूथनेशिया) किसी के जन्म देने के दृश्य से लेकर किसी की मृत्यु से पहले जान जाने वाले दृश्य को चित्रित करना व मृत्यु के रहस्य के सामने सारी समझदारी का हाथ मलते, खाली हाथ रह जाना- सब कुछ शामिल हैं। मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं। एक बार पुनः धन्यवाद !

पुस्तक -‘वहां लाल गुलाब नहीं थे’ (कहानी संग्रह)

लेखक - नीलम कुलश्रेष्ठ 

प्रकाशक - अनुज्ञा बुक्स,  दिल्ली 

मूल्य - 300रु  

समीक्षक -डॉ (श्रीमती) विजय शर्मा, जमशेदपुर

___________________________________________________________________________________


पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

मेधावी तुम्हारी नई पुस्तकें मिलीं, धन्यवाद और बधाई!

कोविड-19 के तुम्हारे अनुभव तुम्हारा भोगा हुआ यथार्थ हैं जो बिना लाग लपेट तुमने शब्दों के माध्यम से हम तक पहुँचाया है! कितनी भौतिक परेशानियाँ और मानसिक तनाव तुम और तुम्हारे परिवार ने झेला है, उसका जीवंत साक्ष्य हैं तुम्हारी कृति ‘उड़ना तुझे अकेला है।’ यों भी बड़े बुजुर्ग कह गए हैं- हंसा जाए अकेला।

तुम सक्षम हो, नई-नई मंज़िलें पार कर आगे बढ़ती जाओ।

मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।


चन्द्रकांता, गुरुग्राम, मो. 9810629950

  ******

आपकी 2 नई पुस्तकें प्रप्त हुईं। बहुत धन्यवाद! पढ़ते पढ़ते धन्य हुई !

कविता संग्रह आपकी छवि के अनुरूप अति गहरा , बल्कि यूं कहना चाहिए कि रस गन्धहीन शुद्ध आत्मा की छुअन कराने वाला पाया !

करोना के आपके अनुभव अद्वितीय लगे।

करोना से जूझता एक परिवार जो कि सम्पूर्णतया भौतिक साधनों से सम्पन्न है और इससे भी बढ़कर भावनात्मक स्तर पर भी जुड़ा हुआ है, वह कैसे-कैसे झंझाओं से गुज़रता है और किस प्रकार इनसे निकलता है , इस सबका सजीव चित्रण पाया। बहुत गहरी अनुभूतियों से ओतप्रोत आपकी लेखनी ने दिल को छू लिया !ऐसी लेखनी को शत शत नमन !

वीना भाटिया 

(पूर्व अंग्रेजी प्रोफेसर, 

दिल्ली विश्वविद्यालय) 

                                                                          ******


Wonderful book. I finished it last night .

Few lines were very touchy ; it is even ringing in my mind .

Mrs. Anita Agarwal

(Kathak Dancer)

                                                                          ******

एक अकेला अवतरे 

मरे अकेला होय 

मरते विरिया न इस जीव का 

साथी सागा कोय 

जैन दर्शन में 

बारह भावनाओं में इस प्रथम भावना 

एकत्व भावना का चिंतन 

हर कोई करता 

इसी से संसार से विरक्ति 

के भाव आते 

जितने भी तीर्थंकर हुए 

उन्होंने इन द्वादश भावनाओं का 

ही चिंतन करके वैराग्य 

को प्राप्त किया 

और संसार से विरक्त होकर 

वन की ओर प्रस्थान किया 

जभी अपने अंतस की 

अनुभूति का उनको 

आनंद मिला 

जो रहता त्रिकाल 

एक बार हो जाने के बाद ,,,,

आपकी नवीन कृति 

‘उड़ना तुझे अकेला है’ का 

शीर्षक पढ़कर ही 

मन में भाव आया यही 

कैसे करोना काल में 

हर व्यक्ति को 

इस प्रथम भावना का 

अनुभव करा दिया 

कैसे कैसे हर व्यक्ति ने 

उस समय को झेला 

कैसे कैसे द्वंद्व रहे 

व्यक्ति के मन में 

कोई रह गया दूर अपनों से 

कोई चला गया 

अपनों को छोड़कर के 

कैसे परिवार के सदस्यों में द्वंद उठे 

कौन क्या कर पाया कर्त्तव्य अपने 

कैसे संयुक्त परिवार में रहते हुए 

निभा पाया कोई अपना फर्ज 

इन सबका सजीव चित्रण 

पढ़ने को मिला 

आपके इस लेखन में 

सहज सरल भाषा में 

जो उतर जाता 

पाठक के दिलों में सहजता से 

मानो कुछ अपना ही 

लिखा गया इसमें ,,,

भावों को प्रस्तुत किया है इसमें 

आपने किसी साहित्यिक अलंकरण के 

इसी से पढ़ने वाले को लगता 

जैसे उसी के संग गुजरा 

ऐसा मेरे संग में 

मानो पाठक के भाव पढ़ लिए 

आपने और उतार दिया 

उसे इस कृति में ,,,,

यही तो सार्थकता होती है 

किसी भी लेखन की 

जब लेखक के 

कहे हुए शब्दों से जुड़ जाता 

व्यक्ति स्वयं से ,,,,

सबसे अच्छी बात 

आपने छुआ है उन द्वंद्वों को 

जो अक्सर होते 

संयुक्त परिवारों में 

और उनके होते हुए भी 

हर कोई स्वीकारता निर्णय उनके 

इसी से संयुक्त परिवार टिके भी रहते 

सुन्दर प्रस्तुतीकरण भावों का 

बनी रहे सृजनता !

जय जिनेन्द्र जी !!

अनिल जैन ‘‘राजधानी‘

                                                                          ******

Congratulations. Keep it up to inspire us in our difficult time when we can't share those feelings. When we listen to your valuable podcasts or read poems we get our solutions .

Thank you for being in our life . 

Kavita Bordia, Artist

                                                                          ******  

Did not know how extremely difficult, dangerous and trying time you all have been through. All I can say now is thank God you escaped the looming catastrophe.

The family's self evident fighting spirit, positive attitude, promptness in reacting to the demands of the situations, singleminded devotion, poise and the will to sacrifice, that saved the situation, are motivating and an example to emulate.

Lastly, an earnest prayer for peace and bliss to the departed noble soul, your respected Papa ji and heartfelt condolences. The book is extremely well written. It should get the recognition due. Do work for its wide circulation and publicity. It will be a pleasure to see the the book displayed on book stalls and shops.

Regards and good wishes to all of you.

Mr. Hari Singh Sidhu

Lt Col (Retd) at Indian Army, Corps of Engrs 

                                                                          ******  

Dear Medhavi,

Have been reading your book regarding experiences of corona in family, shared experiences and thoughts are so real and practical which amazed me. 

Pray God gives you more and more insight in depicting incidents and make them feel real on ground. 

Mrs. Sheela Dutt 

(Medical Superintendent, Batra Hospital, Delhi)

                                                                          ******

कोरोना-महामारी से असाधारण और सफलतम संघर्ष कर लेखन से उभरी तथा निखरी आपकी दैवीय शक्ति को शत शत प्रणाम।

Mr. Suresh Jain

Retd- IAS 

Bhopal 

                                                                         ******    


करोना महामारी काल में, परिवार की सेवारत मेधावी की मानसिकता का विवरण

जीवन व्यक्ति का, परिवार का

झझावातों के बीच जब आ खड़ा होता है

तब नदी की बाढ़ की तरह

सब कुछ नष्ट करने पर तुला होता है

ऐसे ही एक बवंडर में फँसी वह

अस्थिर कगार पर टिके

एक बड़े पत्थर को

संभालने की कोशिश कर रही थी

अपनी पूरी ताकत लगा

असमानांतर स्थिति से जूझ रही थी

प्रकृति का खेल बूझ रही थी

सावित्री को लड़ना था सिर्फ यम से

उसे लड़ना था दुर्दम से

पूरी फौज अड़ी थी

राह रोके खड़ी थी

परिवार की नींव का पत्थर ढह चुका था

जो अब नींव था

अधर लटका था

चारों ओर मौत का तांडव

हर दिशा से घेरता बवंडर

माँ को समझाती

बच्चों को दुलारती

हाथ पैर मार रही थी

दिशाएँ खोज रही थी

लगा मुसीबतें टलने को है

रास्ते मिलने को हैं

तभी वह भयावह पल आया

स्वयं को आसुरी लहर के सम्मुख खड़ा पाया

पर वह टूटने वाली नहीं थी

हार कर भटकने वाली नहीं थी

इधर उधर झाँक कर

चुनौतियाँ आँक कर

कदम बढ़ाती रही

रास्ते बनाती रही

प्रबल मनोबल था

अदम्य साहस था

बस दृढ़ प्रतिज्ञ हो

थोड़े पर मजबूत सहारे ढूंढ़ ही लिये

आशा के अनेक दिये बाल ही लिये

आँखों में काजल की लकीर सजाई

मानो मृत्यु की लक्ष्मण रेखा बनाई

मन प्राण लगा कर

खींच ही लिया नीचे

अस्थिर कगार पर टिके अपने पत्थर को

झेल नहीं पाई लहर उसकी मजबूत टक्कर को

उसने भाग्य पर संदेह नहीं किया

विश्वास को और पक्का किया

मन में विश्वास रखना भी कर्म है

हार मानना हर हालत में जुर्म है

वह ठान चुकी है

नहीं हारेगी

जीवन के उलझे फंदे सुलझा लेगी

तानेगी घर पर चंदोवा तारों का

जब नींव का पत्थर सहेज कर सँवार लिया

तो कौन रोकेगा रास्ता बहारों का


रेखा जैन, दिल्ली यूनिवर्सिटी

___________________________________________________________________________________

समीक्षा

समीक्षा खंडित होती शाश्वत अवधारणाएँ


श्री गोविन्द सेन


श्री सदाशिव कौतुक

सदाशिव कौतुक अनुभव सम्पन्न वरिष्ठ साहित्यकार हैं। गद्य-पद्य की 61 कृतियों में समीक्ष्य कहानी संग्रह खंडित होती शाश्वत अवधारणाएँ इनका चैथा कहानी संग्रह है। कौतुक जी की कहानियाँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। इनमें वर्तमान में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विडंबनाओं को सहज ढंग से पाठकों के सामने रखा गया है। संग्रह की भूमिका में प्रतापसिंह सोढ़ी लिखते हैं-“कहानी में मुख्य बात अनुभव का सम्प्रेषण होता है, जिसके माध्यम से कहानीकार संवेदनात्मक स्तर पर पाठक से संपर्क स्थापित करता है। कहानी का विधागत चरित्र उसमें संप्रेषित होने वाले अनुभव, जीवन स्थितियाँ और परिवेश के विशिष्ट स्वरूप से निर्धारित होता है। कहानी का अलग से कोई सत्य नहीं होता, जीवन का सत्य ही कहानी का सत्य होता है। संग्रह की इन कहानियों में जीवन का सत्य प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित हुआ है।‘‘ कौतुक जी की कहानियों के संदर्भ में उक्त पंक्तियाँ एकदम सटीक ठहरती हैं। 

इन कहानियों में जीवन मूल्यों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त हुई है। कहानियों के अधिकांश पात्र ग्रामीण, गरीब और दलित पृष्ठभूमि के हैं। किन्तु इनमें दीनता नहीं है। निराशा का भाव नहीं है। ये स्वाभिमानी पात्र हैं जो मानवीय गरिमा की रक्षा और अपने हक के लिए संघर्षरत हैं। इन पात्रों की जिजीविषा श्लाघनीय है। ग्रामीण और शहर की अनेक समस्याओं को कहानियों में बखूबी उठाया गया है। आंचलिकता के पुट ने कहानियों को विश्वसनीय और सजीव बना दिया है। इन कहानियों में निमाड़ अंचल बोलता है। कथा के प्रवाह में निमाड़ी के अनेक शब्द, संवाद, मुहावरे और कहावतें आ गए हैं जिससे उनकी कहानियाँ सच के और अधिक करीब आ गई हैं। ये एक आत्मीय संसार रचती हैं। परिवेश निर्माण में भी ऐसी भाषा बहुत उपयोगी होती है। इन कहानियों में लोक कथाओं का-सा रस है जिसके कारण पाठक लोक से तत्काल जुड़ जाता है। 

सदियों से दलितों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार होता आया है। संग्रह में दो कहानियाँ सीधे-सीधे दलितों के दमन से जुड़ी हुई हैं। इनमें दलितों के प्रति सवर्णों का घृणित रवैया बखूबी उभर कर आता है। दलित पात्रों की जिजीविषा और प्रतिकार को भी इनमें जगह मिली है। ‘होलिका दहन’ का ठाकुर मोतीसिंह दलित बस्ती की खूबसूरत लड़की राधिका को पाने के लिए षड्यंत्र रचता है। वह उसे पत्नी का दर्जा न देकर रखैल बनाना चाहता है। वह स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए अनवर और राधिका की शादी को हिन्दूमुस्लिम का रंग देकर सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश करता है। ‘फिरि फिरि ढूँढे घास में’ आदिवासी शोषित-दमित लड़का गोरेलाल है जो सेठ तोंदूमल से अपने पिता की मौत का बदला लेना चाहता है। सेठानी उससे जबरन संबंध बनाती है। जब उसे खबर मिलती है कि वह पिता बनने वाला है तो उसके प्रतिशोध का ताप कम हो जाता है। 

‘आशा निराशा’ कहानी बेरोजगार और गरीब किन्तु ईमानदार-सिद्धांतवादी युवक शंकर की कहानी है। जब लोक निर्माण विभाग में उसकी टाइम कीपर की नौकरी लगती है तब दादा-दादी, माता-पिता और भाईबहन सभी खुश हो जाते हैं। परिवार में सभी के स्वप्न उसकी नौकरी से जुड़े थे। किन्तु शंकर को विभाग में चल रहा भ्रष्टाचार रास नहीं आता है। वह नौकरी छोड़ कर चला आता है। सच्चाई का नायक नरेश अपनी बेटी गरिमा से उसकी माँ की ‘सच्चाई’ छिपाता है किन्तु उसके मंगेतर और अपने होने वाले दामाद अतुल को अपनी पत्नी की चरित्रहीनता के बारे में अवगत करा देता है ताकि बाद में उसकी बेटी को उस सच्चाई के कारण कोई कीमत न चुकानी पड़े। कहानी ‘अंजामे गुलिस्ताँ’ क्या होगा में रिश्तेदारों के बीच में  ईष्र्या-द्वेष, घृणा, अंधविश्वास और मूर्खताओं के घाल-मेल को पेश किया गया है। विश्वासघात भी विघटित होते पारिवारिक मूल्यों की दिलचस्प कहानी है। इस कहानी के नायक प्रभात को उसका छोटा भाई धोखा देता है जिस पर उसे अटूट विश्वास था और जिसे उसने संतान की तरह पाला-पोसा था। हाशिये पर कहानी का नायक सुखदेव अपने बच्चों को गाँव ले आता है। वह अपने गाँव को पचास साल पहले छोड़ आया था। गाँव में उसकी जड़ें थीं। उस गाँव में घोर गरीबी में उसने जीवन बिताया था। वह शहर में सुख-सुविधाओं में पले-बड़े अपने बच्चों को अपनी जड़ों से परिचित करवाना चाहता है। इस बहाने वह गाँव में आए बदलाव को बारीकी से रेखांकित करता चलता है। सुखदेव का दोस्त रामलाल सोलंकी कलगी-तुर्रा गाने के लिए आसपास के गांवों में मशहूर था। पता लगता है कि वह हार्ट अटैक से गुजर गया है। गाँव से कई कलाएं लुप्त होती जा रही हैं जिनसे गाँव की पहचान बनती थी। सुखदेव को चिरपरिचित लोककला ‘कलगी-तुर्रा‘ के हाशिये पर चले जाने का गहरा दुख था। 

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘खंडित होती शाश्वत अवधारणाएँ’ एक लोककथा पर आधारित है। लोककथा के अनुसार पहले मनुष्य वृक्ष पर फल के रूप में रहता था। पर जब वह धरती पर आ गया तब उसने धरती को तबाह कर दिया। मनुष्य के लोभ का कोई अंत नहीं है। प्रकृति मनुष्य की जरूरत को पूरा कर सकती है उसके लोभ को नहीं। कहानी में मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों को चित्रित किया गया है। दोनों के बीच का संतुलन बिगड़ने से मनुष्य को अनेक प्राकृतिक प्रकोपों को झेलना पड़ा रहा है। ‘कोरोना’ जैसी महामारी उसी का प्रतिफल है। कोरोना कहानी कोरोना-काल में गाँव में छूटे हुए एक मजदूर परिवार की दुश्चिंताओं को प्रकट करती है। माँ और बहन दिल्ली मजदूरी करने गए मांग्या के लिए चिंतित हैं। कोरोना की महामारी के बीच उसकी कोई खबर नहीं मिल रही है। 

अक्सर प्रेम-कथाएँ या स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की कहानियाँ सेक्स, उत्तेजक, मादक, अबूझ या कुहासा-कथाएँ बनकर जाती हैं। अच्छी बात यह है कि कथाकार ने प्रेम कहानियाँ के लिए ऐसा कोई सस्ता हथकंडा नहीं अपनाया। ‘हनी ट्रेप’ एक भ्रष्ट, अश्लील और अमर्यादित समाज का चित्र खींचती है। पतन होता है तो वह चैतरफा होता है। कहानी में नैतिक पतन को दर्ज किया गया है और उन कारकों की पड़ताल की गई है जो इसे बढ़ावा देते हैं। ‘फांसी घर’ कहानी का प्रारम्भ प्रेम कथा की तरह होता है पर अंत में वह प्रेमअपराध कथा बन जाती है। ‘उसने वादा पूरा किया’ में प्रेम का एक उदात्त रूप देखा जा सकता है। ब्लर्ब पर भालचन्द्र जोशी ने कौतुक जी के लेखन पर उल्लेखनीय टिप्पणी की है-‘‘सदाशिव कौतुक ने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। कठिन और दारुण दुखों को न सिर्फ करीब से देखा है, बल्कि उसे भोगा भी है। यह अनुभव और यथार्थ उनकी रचनाओं में स्पष्ट नज़र आता है।‘‘ इस संग्रह में कुल जमा 12 कहानियाँ हैं। अब ये कहानियाँ पाठकों की अदालत में प्रस्तुत हैं। ये कहानियाँ अपने समय के सवालों से जूझती हैं। इनमें आसपास का जन-जीवन प्रतिबिम्बित हो रहा है। पाठक इनमें अपना अक्स देख पाएंगे। आशा है सरल शिल्प की इन कहानियों को पाठक पसंद करेंगे।


किताब: खंडित होती शाश्वत अवधारणाएँ (कहानी संग्रह) 

लेखक: सदाशिव कौतुक 

प्रकाशक: साहित्य संगम, इंदौर 

मूल्य: 200/-

समीक्षक: गोविंद सेन राधारमण कॉलोनी, मनावर, 

जिला-धार, (म.प्र.), 

मो. 9893010439, Email : govindsen2011@gmail.com


___________________________________________________________________________________

समीक्षा

‘‘हमेशा देर कर देता हूँ मैं’’ 

श्री अशोक प्रियदर्शी

श्री पंकज सुबीर

पुस्तक: हमेशा देर कर देता हूँ मैं (दस कहानियों का संकलन) 

लेखक - पंकज सुबीर

प्रकाशक - राजपाल एंड संस, 1590, मदरसा रोड कश्मीरी गेट दिल्ली-110006 

संस्करण प्रथम 2021, 

मूल्य Rs. 295

सचमुच। पंकज सुबीर की दस कहानियों का ताज़ा संकलन ‘हमेशा देर कर देता हूँ मैं‘ मुझे मिला, तो एक-दो दिन तक इसे अपने टेबुल पर पड़ा रहने दिया, जैसे कोई देव विग्रह हो। फिर पढ़ना शुरू किया तो नियम बनाया कि एक दिन में बस एक कहानी पढ़ूँगा। वजह यह कि लगा, दस ही तो कहानियाँ है, दस दिनों में खत्म हो जाएँगी, तो फिर क्या पढूँगा ? खैर। किताब पूरी हुई। कुछ दिनों तक इन कहानियों का नशा तारी रहा। सोचता रहा, इस पर लिखना तो है। इसी बीच सीधे हिमालय से बरास्ता दिल्ली आती हुई प्राणलेवा शीतलहर। बकौल एक भोजपुरी उक्ति ठंड का कहना है कि वह वरिष्ठ नागरिकों को छोड़ेगा नहीं, चाहे वे कितनी भी रजाइयाँ ओढ़ लें। इस छह पाँच में दिन निकलते गए और मैंने पाया, इस कहानी संकलन पर लोगों की समीक्षाएँ आ गई हैं, यानी आनी शुरू हो गई है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। सच, हमेशा देर कर देता हूँ मैं भी।

बहरहाल, हम पंकज सुबीर की कहानियों में घटनाओं का सिलसिता, चाहे वे छोटी छोटी गतिविधियाँ ही हों देखने-पढ़ने के आदी रहे हैं। मुझको लगता है कि इधर पंकज सुबीर की कहानियों में नरेशन-विवरण बढ़ता गया है। गो फिर भी सुबीर टच तो इन कहानियों में है ही। सुबीर- टच यों कि या तो प्रसंग ऐसे होंगे जो आपके जाने सुने नहीं होंगे। या परिचित प्रसंगों के भी जिस निष्कर्ष पर पहुंचने का अनुमान आप लगा रहे होंगे वे गलत साबित होंगे। पंकज सुबीर इसीलिए पंकज सुबीर हैं। पहली ही कहानी, जिसके शीर्षक को ही पुस्तक का नाम दिया गया है, उसके प्रसंग प्रायः जाने सुने हैं। लंबी चाची की भूख भी अस्वाभाविक नहीं लगती। कोई भी कच्चा कहानीकार लंबी चाची की भूख को मन्नी शांत करा देता। ऐसे दृश्य सिरजने का अपना मज़ा था। लेकिन अपराध-बोध से ग्रसित लंबी चाची ने बंधान में कूदकर जान दे दी है। अपराध-बोध? इससे तो भर गया है मन्नी। जफर के परामर्श पर हिम्मत बाँधता है मन्नी, पर देर हो चुकी है। मुनीर नियाजी की गजल की पंक्तियाँ एक अजीब से कलात्मक काव्यात्मक अवसाद में डुबो देती हैं कहानी को, और जो कहानी एक साधारण सी यौन कथा होती वह असाधारण मनोवैज्ञानिक कहानी बन जाती है। यही हैं पंकज सुबीर।

दूसरी कहानी ‘बेताल का जीवन कितना एकाकी‘ को पढ़ते हुए सन साठ के दशक का दौर याद आ जाता है जब राजा निरबंसिया‘ जैसी कहानियाँ लिखी जा रही थी, दो-दो कहानियाँ एक साथ एक दूसरे से टकराती, अलग होती और अंततः एक समग्र प्रभाव छोड़तीं। ‘बूढे़’ की कहानी में दो कहानियाँ है, कुछ-कुछ फंतासी शैली में रचित, और जो कह जाता है कहानीकार वह है आज के जीवन का त्रास बाल बच्चे पढ़ लिखकर विदेश में सेटल हो जाते हैं और रह जाता है पिता या रह जाते हैं पिता माता, अकेले बिसूरने को। बेटे बेटियों की जिंदगी में वे क्यों दखल दें? और अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से जी चुके बुजुर्गों को अपने परिवेश से कट कर जीना रास भी आएगा क्या। विदेश ही नहीं, स्वदेश में भी उच्च पदस्थ बेटे-बेटियों के बड़े शहरों में अपनी दुनिया बसा लेने पर बिसूरना ही शेष रह जाता है माता-पिता के जीवन में। आज की ज़िंदगी की यह त्रासद तसवीर यों फंतासी की शैली में पंकज सुबीर ही लिख सकते हैं शायद।

तीसरी कहानी ‘मर नासपीटी‘। इस कहानी को दो कोणों से देखा जा सकता है। पहला तो यह कि एक हिंदू कथाकार मुसलमान चरित्रों को लेकर इतने मज़े से कहानी सुना रहा है कि लगता है, यह सारा परिवार परिवेश उसका जाना सुना हो। आपसी सद्भाव जगाने बढ़ाने का एक तरीका यह भी है, जैसा रामचन्द्र शुक्ल ने कहा था, एक दूसरे की कहानियों को जानना-समझना। यह तो हुई एक बात। यहाँ हलीमा और जरीफा की गोतियारो की लड़ाई का अंत जो दिखाया है कहानीकार ने वह अत्यंत कलात्मक काव्यात्मक है। नहीं, हलीमा और जरीफा एक दूसरे के बाल नहीं नोच रही .... हलीमा पागलों की तरह (मर नासपीटी, मर नासपीटी) कहती हुई टिन की छतों पर पत्थर फेंक रही है और जरीफा उसके सामने घुटनों के बल बैठी रो रही है। इस काव्यात्मक कथा को आप स्वयं पढ़ें।

‘खोद खोद मरे ऊँदरा, बैठे आन भुजंग उर्फ भावांतर‘ संकलन की चैथी कहानी। कुछ-कुछ लेखक के उपन्यास अकाल में उत्सव की याद दिलाती हुई। नहीं, कथा- साम्य नहीं है यहाँ, किंतु किसानों की बेचारगी की प्रामाणिक कथा है, कुछ वैसी ही प्रामाणिक। लंबे और एक अर्थ में असमाप्त किसान आंदोलन को हम देख चुके हैं। जिन्हें किसानी का निकट का अनुभव नहीं है वे नहीं समझ पाएँगे इस रहस्य लोक को। हम तो लहर गिन कर भी पैसे कमाना जानते हैं। तुम डाल-डाल, हम पात-पात ! और यह कहानी आंचलिकता का स्वाद भी देती है, गो समस्या सार्वदेशिक ही है। मजदूर झोपड़ियों में ही रहते हैं, उनके बनाये महलों में अमीर बसते हैं। पुनः कथाकार की पीठ थपथपाने की इच्छा होती है, इसलिए भी कि उसका कथा-वितान कितना बहुआयामी है। और ‘मूंडवे वालों का जलवा‘ खालिस किस्सागोई के अंदाज में कही गई कहानी और पैसों के फूहड़तम प्रदर्शन का रोमांचक आख्यान। इस कहानी का दर्द अपनी जगह, इसकी कथा-कथन की शैली बाँधती है। पैसे हैं तो दिखाना भी पड़ता है भाई ! बाप रहें कि जाएँ।

छठी कहानी ‘पत्थर की हौदें और अगनफूल‘। पुनः इस कहानी की बुनावट भी खास है। प्रारंभ करते हुए लगता है कि यह कहानी जनजाति बहुल क्षेत्र में किसी अंदरूनी स्थान की प्रागैतिहासिक खोज कर रही है, फिर अंधविश्वास में फँसी भोली महिलाओं को शिकार बनाने वाले कथित संत-महात्मा का रहस्य खुलता है। सर्वाधिक आकर्षक है कहानी में व्यंजना-वृत्ति का प्रयोग, भूख पीताम्बर गुदेनिया में भी जगी है, लेकिन बड़ों की भूख पहले शांत होनी चाहिए। पहले पहुँच चुके हैं राकेश अस्थाना हार कर लौट रहे हैं पीताम्बर। शोषण की इस कथा की प्रस्तुति चैंकाती है। परिचित कथा को यों भी परोसा जा सकता है कि लगे कि सारा परिवेश अपरिचित है।

सातवीं कहानी कैद पानी। ‘इलाहाबाद के पथ पर‘ निराला को जो मजदूरनी पत्थर तोड़ती दिखी थी वह नए रूप में गाँव से दूर दबंग द्वारा ‘क़ैद किए गए पानी‘ की मुक्ति की लड़ाई लड़ रही है। हाकिम तरुण विश्वकर्मा ‘ललकारते हैं‘ और गाँव की उपेक्षिता पानी को कैद करने वाले ताले और सीकढ़ को तोड़ रही है। काश! सच में ऐसा होता। हम होंगे कामयाब एक दिन होंगे क्या?

‘वास्को-डी-गामा और नील’ नदी थोड़ी गझिन कहानी है। रूपकात्मक प्रतीकात्मक। वास्को- डी-गामा खोजने चला था कोई और देश, पहुँच गया कहीं और वास्को-डी-गामा है वासु कोहली और उनकी खोज है और नील नदी है नीलोफर। और दोनों की लाशें मोर्चरी में पड़ी है। इधर पंकज सुबीर की कहानियों की बुनावट सरल -रेखीय नहीं होती। लेखक को इस गझिन बुनावट के लिए जितना दिमाग लगाना होता है, कहानी को ‘डिसाइफर‘ करने के लिए पाठक भी तो कुछ दिमाग लगाए। शुक्ल जी ने लिखा था- कविता कोई रसगुल्ला नहीं है कि मुँह में रखिए और हलक के पार हो जाए। कवि को जैसे कविता लिखने के लिए श्रम करना पड़ता है, कविता का पाठक भी उसका अर्थ समझने के लिए कुछ श्रम करे। कहानी भी सदैव मुँह में घुल जाने वाला रसगुल्ला नहीं होती। ‘चर्चे-ऐ-गुम‘ संकलन की नौवीं कहानी, अपेक्षया सरल बुनावट वाली, फिर भी मुँह में घुल जाने वाले रसगुल्ले सरीखी नहीं है तो यह सीधी सी कहानी, हाकिमों को अनुकूल कर ऐसी जमीन को हड़प जाने वाली जिसका लंबे समय से कोई दावेदार नहीं है। किंतु पंकज सुबीर इस कहानी में एक धार्मिकता वाला पुट जोड़ते हैं। चर्च गुम नहीं हुआ है, उस जमीन पर शहर की सबसे मशहूर मिठाई की दुकान है। इस मिठाई की दुकान से शहर के हाकिम-हुक्काम सभी उपकृत हैं, तो भला अब चर्च की जमीन कहाँ और कैसे मिले। चर्च गुम हो गया है, जमीन सहित।

और संकलन की अंतिम कहानी, दसवीं ‘इलोई !इलोई! लामा सबाख्तानी‘ यह कहानी ‘हंस‘ में छपी थी। इस कहानी के शीर्षक को पढ़ कर दो विपरीत टिप्पणियाँ मुझको याद आई। एक तो यह कि कहानी का शीर्षक ऐसा हो जो पाठक के मन में कुतूहल जगाए। लोग ‘उसने कहा था‘ की बात करते थे - किसने कहा था? क्या कहा था? यह कुतूहल जगाता है शीर्षक और इस कुतूहल के शमन की विकलता में पाठक कहानी पढ़ता जाता है। याने शीर्षक चैंकाने वाला हो। दूसरा प्रसंग याद आता है ‘बच्चन जी‘ की प्रसिद्ध कविता ‘दो चट्टानें‘ का। इसी नाम के संकलन पर बच्चन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। कविता की प्रवेशिका में बच्चन जी ने लिखा है कि ‘पहले में इस कविता का शीर्षक ‘सिसिफस बरक्स हनुमान‘ रखने जा रहा था, फिर मुझको लगा कि हिंदी के आम पाठकों का जो हाल है, वे कहेंगे या पूछेंगे - हनुमान तो हनुमान, यह सिसिफस क्या बला है? और पाठकों को चैंकाना मुझको उचित नहीं लगा, इसलिए मैंने सीधा-सा शीर्षक रख दिया दो चट्टानें। एक चट्टान वह जिसे श्री हनुमान आज भी हथेली पर उठाए घूम रहे हैं। (लोक कल्याणार्थ) और दूसरी चट्टान वह जिसे अहर्निश सिसिफस ठेल कर पर्वत पर चढ़ा रहा है। (करना ही यही है)। सिसिफस का सारा उद्यम व्यर्थ है। खैर- थोड़ा डायवर्शन हो गया। मूल बात यह कि कहानी का यह शीर्षक कुतूहल तो जगाता ही है, किन्तु कहानी लंबी इसलिए हो गई है कि इसे इतिहास-कथा जैसा विस्तार दिया गया है, किंतु कहानी जहाँ जाकर खत्म होती है, पाठक सन्न रह जाता है, एक प्रकार के अवसाद से भरा। कथाकार का कौशल इसमें है कि अंत का यौन प्रसंग जुगुत्सा नहीं जगाता, मजा नहीं देता, खिन्न कर देता है, पाठक को एक प्रकार के अवसाद से भर देता है। कहानी दादी नानी की कहानी की तरह चलती है और एक राज खोलती है। कहते हैं ईसा को सलीब पर चढ़ाया गया था, तो मृत्यु से ठीक पहले वह चिल्लाकर बोले थे इलोई, इलोई लामा सबाख्तानी याने ‘हे ईश्वर हे ईश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?‘ 

इस कहानी को ही नहीं, संकलन की सभी दस कहानियों को आप स्वयं पढ़ें। पंकज सुबीर के कथा- लेखन का कौशल ही यह है कि वे सीधी-सादी कथा को भी यों प्रस्तुत करते हैं कि आप उसके तिलस्म में कुछ देर के लिए उलझे रह जाते हैं। 

-समी. अशोक प्रियदर्शी, राँची, मो. 9430145930

___________________________________________________________________________________

समीक्षा

लाइफ / ट्विस्ट एण्ड टर्न.काॅम : (उपन्यास)
प्रेम और छल : सशक्तिकरण

डॉ. आशा सिंह सिकरवार

मातृभारती ऑनलाइन प्रकाशन पर प्रकाशित डिजिटल साझा उपन्यास में डॉ. सुधा श्रीवास्तव, डॉ. प्रणव भारती, नीलम कुलश्रेष्ठ,मधु सोसी गुप्ता, डॉ. मीरा राम निवास और निशा चन्द्रा आदि लेखिकाओं ने सहभागिता की है।

उपन्यास का कथानक रूपरेखा और संयोजन नीलम कुलश्रेष्ठ का है।

‘‘लाइफ / टिवस्ट एण्ड टर्न.काॅम‘‘ साझा उपन्यास का कवर पेज बहुत कुछ कहता है जिस पर स्त्री की तस्वीर अंकित है जिसकी एक आँख खुली है और एक आँख बंद। इसका अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति पर आँखें बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए, एक आँख खुली रखनी चाहिए।

स्त्री प्रेम के चंद शब्द सुनकर पुरुष के पीछे पीछे चल पड़ती है। न आगे सोचती है न पीछे का सुनती है। नतीजतन छल और विश्वासघात का शिकार हो जाती है। अनेक बार स्त्री सदमे में चली जाती है ,वह छले जाने की पीड़ा सह नहीं पाती है। डिप्रेशन जैसी जानलेवा बीमारी की शिकार हो जाती है।

पुरुष आगे बढ़ जाता है परन्तु स्त्री  अपनी जगह से नहीं छूट पाती। इसका मतलब स्त्री का हृदय आज भी निश्छल प्रेम से भरा है। इसके पीछे भी पितृसत्तात्मक  व्यवस्था है जिसने पुरुष के लिए विकल्प बनाए हैं और स्त्री के लिए नहीं। इस अर्थ में स्त्री-पुरुष की तुलना में अधिक संवेदनशील है, इसलिए उसे अपनी संवेदनशील प्रकृति की सुरक्षा स्वयं करनी होगी और अपनी आँख हमेशा खुली रखनी होगी ताकि छली न जाए।

उपन्यास के नाम लाइफ / टिवस्ट से ही ज्ञात होता है कि किसी खास घटना का संकेत है ,जिसके घटने से पूरा जीवन ही बदल गया है। जिदंगी में एक ऐसा मोड़ आया है जिसमें जीवन और मृत्यु का प्रश्न खड़ा हो गया।

उपन्यास की कथावस्तु एक ऐसी स्त्री की कथा है जिसे प्रेम में धोखा मिलने की वजह से मन मस्तिष्क दुख में डूब गया है। विषाद में डूबे हृदय को उपन्यास की करुण कथा का विषय बनाया है। आज तकनीकी युग में, भौतिक सुख सुविधाओं में शिक्षा और मूल्यों का हृास हुआ है।नयी पीढ़ी का युवक भी उतना ही असंवेदनशील है जितना पिछली पीढ़ी का पुरुष। आधुनिक जीवन शैली ने नयी पीढ़ी की संवेदनशीलता छीन ली है।फैशन में रची बसी यह पीढ़ी प्रेम को भी फैशन की तरह ही जीवन का हिस्सा मान कर जी रही है। वह किसी अन्य के दुख के लिए स्वयं को उत्तरदायी नहीं समझती है।

आधुनिक शैली में लिखा गया इस उपन्यास में तीन पीढ़ियों की स्त्रियों की उपस्थिति और साझा अनुभव का एक मुकम्मल पोथा है । नयी पीढ़ी को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास गंभीर समस्याओं और सवालों के जवाब की खोज में जब निकलता है तब वर्तमान जीवन की ,ना कि खुद को बोल्ड कहने वाली अत्याधुनिक नयी पीढ़ी की खोखले ,दंभी व्यवहार की पोल खुल जाती है। आधुनिक दिखने की दौड़ में जीवन मूल्यों में पिछड़े गए हैं।

उपन्यास मुख्य कथा के साथ  छोटी - छोटी प्रासंगिक कथाएँ भी साथ -साथ चलती हैं। दामिनी, कावेरी और मीशा तीन पीढ़ियों का जो जिंदगी से टकराव है जिसमें पहली  पीढ़ी दामिनी समझदार और सकारात्मक दृष्टि लेकर नयी पीढ़ी से अपना ताल मेल बिठाने में  सफल होती  है, जबकि कावेरी पति के रहते और मृत्यु के बाद भी यातना में पिसती है।शंकी पुरुष चाहे जितनी सुख सुविधा अपनी पत्नी को दे दे , परंतु वह कभी भी प्रेम नहीं दे सकता है। वैवाहिक संबंध प्रेम और विश्वास की नींव पर खड़ा है।

इसमें शंका की कोई गुंजाइश नहीं है। यह संबंध स्त्री पर एक तरफा बोझ की तरह आ गिरा है। पुरुष भौतिक सुख देने के बावजूद भी स्त्री का आत्मिक पक्ष जीत नहीं पाया है इसके पीछे अकारण शंकाओं की भूमिका रही है। प्रेमी की उपस्थिति गौण है फिर भी कावेरी को अधेड़ उम्र में भी दंश झेलने पड़ते हैं। दंश देकर पुरुष स्त्री से प्रेम कैसे प्राप्त कर सकता है ?

आज कल सोशल साइट्स पर तीव्रतर नयी पीढ़ी सक्रिय हो गई है। रेशमी पर्दों की सच्चाई ने एक भटकाव को जन्म दिया है। नयी पीढ़ी की स्त्री मीशा अपने कालेज में  एक युवक के रहन- सहन से आकर्षित होकर  प्रेम में पड़ जाती है, कुछ दिनों में ही उसे धोखे का अहसास हो जाता है। इस प्रेम संबंध विच्छेद के कारण मीरा के मन- मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है। यदि प्रेम होता तो वह छोड़ कर क्यों जाता ? यह समझने के लिए वह जे़हनी तौर पर तैयार नहीं होती।

स्त्री-पुरुष के बीच जो प्राकृतिक अन्तर है अर्थात् स्त्री स्वभाव जुड़ने का निमित्त बनता है जबकि पुरुष की प्रकृति इस जुड़ाव को एकदम से खारिज कर देती है और वह जब चाहे तब निर्णायक भूमिका में दिखाई देता है।

जैसे जैसे शिक्षा और समाज का विकास हुआ पुरुष से स्त्री की मूल्यगत अपेक्षाएँ बढ़ी हैं। स्त्री-पुरुष के बीच जो संवेदनात्मक अन्तर था उस खाई को पाटने का कार्य नयी पीढ़ी के हिस्से में था दोनों को ही प्रेम को स्वीकार कर समाज का नव निर्माण करना था पर ऐसा नहीं हो पाया। यह उपन्यास युगों से चली आ रही स्त्री की पीड़ा का अंकन है।

आज की युवा पीढ़ी रहन सहन को महत्व  देती है पर वास्तविक जीवन और स्थितियों को समझती नहीं है, इस पीढ़ी को प्रेम का अर्थ ही नहीं मालूम , इसलिए बाजारवाद ने बाॅयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड वाले खेल में नयी पीढ़ी बर्बादी की कगार पर है। इससे समाज में जिन समस्याओं को जन्म दिया है - डिप्रेशन, आत्महत्या, अकेलापन, भटकाव   इत्यादि हैं। उपन्यास में बखूबी इन समस्याओं को अंकित किया गया है।

उपन्यास में अत्यधिक पात्रों की भरमार के कारण कथावस्तु में बिखराव मिलता है। एक के बाद एक घटनाएँ निरंतर घटित होती हैं। जिसके कारण मुख्य कथा का विकास जितना होना चाहिए था उसमें बाँधा उत्पन्न हुई है। जिसके पीछे एक कारण मुझे यह भी लगता है कि चार मस्तिष्कों से  एक कथावस्तु पर कार्य करना कतई आसान नहीं रहा होगा। एक लेखिका द्वारा यदि लिखा जाता तो  चिंतन की भावभूमि अधिक संवेदनात्मक और मुखर  होती है।

फिर इसमें भी एक भय यह काम करता है  कि नयी पीढ़ी पर अपने विचार थोपने का आरोप भी बना रहता,इसलिए यह मानकर चलते हैं कि छःलेखिकाओं द्वारा लिखा गया यह उपन्यास नयी पीढ़ी के लिए अमूल्य निधि साबित होगी। जिस पीढ़ी ने बल्कि देखा ही नहीं भोगा भी है देश और दुनिया के अपने अनुभव को नयी पीढ़ी से साझा भी किए हैं।

‘‘ ये कैसा इश्क है अजब-सा रिस्क है ‘‘ मीशा गीत गा तो रही है परंतु इस गीत के बोल को महसूस नहीं कर रही है। गीत गाते हुए एक आधी नयी पीढ़ी रिस्क (खतरा) उठा रही है क्यों कि वह प्रेम को भी कपड़े की तरह नित समझ नए पहन रही है।

आज काॅलेजों में लड़कियाँ प्रेम में पड़ने से पहले सुरक्षा नहीं देखती हैं और अपने जीवन को खतरे में डाल लेती हैं।

नयी पीढ़ी इतनी जल्दी डिप्रेशन का शिकार हो रही है कि उसके पास सोचने समझने का वक्त नहीं है। दामिनी और कावेरी दोनों मीशा को डिप्रेशन में संभाल रही हैं। स्त्री ही स्त्री को समझती है यहाँ सार्थक प्रतीत होता है।

नीरा जैसी सशक्त स्त्री  सामने आती है जो महिला सशक्तिकरण की बात ही नहीं करती बल्कि महिला सुरक्षा के लिए जागृति फैलाने में सक्रिय भूमिका निभा रही है। यहाँ प्रश्न यह खड़ा होता है कि देह की सुरक्षा स्त्री को मिल भी जाए तब भी  समाज में स्त्री को मानसिक सुरक्षा कैसे प्राप्त होगी  ?  आज एक तरफ स्त्री के साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा है वहीं स्त्री को मानसिक क्षति पहुंचाई जा रही है।

पति के रहते असुरक्षा का भार ढोती स्त्री की सुरक्षा का भार कौन उठाएगा ? जिस समाज में स्त्री जी रही है वहाँ उसे हर कदम पर अपमान सहना पड़ता है, पति द्वारा आशंकाओं पर ज़लील होना पड़ता है वह कुछ नहीं कहती है, कहे भी तो क्या ? विवाह के बीस इक्कीस साल बाद भी पति पत्नी पर शक करे ,ठीक विवाह की वर्षगांठ पर कावेरी का  हृदय इस चोट को सह जाता है बच्चों की ख़ातिर।

इतना ही नहीं पति की मृत्यु के बाद समाज एक विधवा स्त्री के साथ कैसा सलूक करता है ? सभी आधुनिक परिवेश में जीते अवश्य हैं पर आज भी शादी- विवाह या धार्मिक कार्यों में विधवा स्त्री के साथ अछूत जैसा व्यवहार किया जाता है। इस उपन्यास में सामाजिक  मूलभूत समस्याओं  पर जोर दिया गया है। संदर्भ-‘‘कितना भी औरत अपने को मज़बूत बनाए लेकिन उसके आस पास की दुनिया कितनी क्रूरता से याद दिलाती रहती है कि तुम्हारा पति क्या गया तुम अशुभ हो गईं।‘‘

जहाँ भी कथा में संवाद हुए हैं वे सार्थक बन पड़े हैं  - ‘‘आज सबसे बड़ा मसला उसकी अस्मिता और हिफ़ाज़त का है। घर और बाहर दोनों ही जगह उसके अस्तित्व को ललकारा जाता है। स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई जाती है इसलिए उनकी सुरक्षा व भावात्मक सहायता के लिए कुछ न कुछ करते रहना चाहिए ‘‘

पुरुष मानसिकता में बदलाव की दरकार करता है। यह उपन्यास स्त्री पर पड़ रही चोट को लगातार इंगित करता चलता है। रोज़मर्रा के जीवन में स्त्री छोटे-छोटे दंश सहती हुई भीतर से टूट रही है। बाजारवाद से ढंके समाज को अंदेशा तक नहीं मिल पाता है और स्त्री आत्महत्या तक पहुँच जाती है।

तरक्की पाने के मोह में दूसरी तरफ एक ऐसा भी पुरुष है जो शिक्षित स्त्री को अपने बाॅस के पास भेजने में हिचकिचाता नहीं है। दो मोर्चे पर संधर्ष कर रही स्त्री भी उपन्यास में हताश दिखाई पड़़ती है सशक्तिकरण के सभी शब्द खोखले दिखाई पड़़ते हैं।

स्त्री क्या सोचती है ? क्या समझती है ? उसे फर्क नहीं पड़ता है। परिणाम स्वरुप जबरन अपने फैसले को थोपता है, जिसके कारण वह आत्महत्या कर लेती है। लेखिका ने इस घटना को भी उपन्यास में एक प्रेरक संदेश की तरह स्त्री के स्वाभिमान की रक्षा हेतु चित्रित किया है।

लिंग भेद की समस्या आज भी यथावत है, आज भी परंपराओं में दबी कुचली स्त्रियाँ हर घर में मौजूद है। जहाँ बेटी पैदा करने पर घर में उदासी का माहौल देखने को मिलता है अथवा ताने, दंशों से छलनी कर दिया जाता है।

इसमें पितृपक्ष की भूमिका संदेह में है। एक संवाद जो समाज की मानसिकता उजागर करता है पिता का यह कहना-‘‘समझा-बुझाकर आया हूँ अब सब ठीक है गलती तो हमारी ही बेटी की थी सास को उल्टा जवाब दे रही थी इसलिए उसे घर से बाहर निकाल दिया।‘‘

असुरक्षा का भाव स्त्री के भीतर इतना घर कर गया है कि तकलीफ होने पर वह किसी से कुछ नहीं कहती है। चुपचाप सह जाती है और पूरा का पूरा सशक्तिकरण एक ओर रखा रह जाता है जब पितागृह से कोई साथ खड़ा नहीं होता है। बाहर से चमकदार दिखने वाले समाज की खोह भीतर से सड़ी है जिसमें स्त्री निरन्तर संघर्ष कर रही है।

दामिनी, यामिनी, कामिनी तीन बहनों के घर परिवार में  आत्मीयता एवं सुख-दुख के बीच रची बसी उपन्यास की कथा व्यापक फलक पर समकालीन समस्याओं से जुझती है बल्कि उपाय भी खोज लेती है इस अर्थ में नई है।

शुरुआत में जहाँ प्रिशा जैसी बोल्ड पत्रकार का परिचय मिलता है जो सेनेटरी नैपकिन पर लेख लिखकर कई पुरस्कार जीत लेती है और समाज में सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत करती है। स्त्री पत्रकारिता कितना कठिन कार्य है इसका भी संकेत मिलता है। उपन्यास देह की सुरक्षा से शुरु होता है और अंत तक आते  -आते मन की सुरक्षा के प्रश्न पर टिक जाता है।

सबसे दुखद घटना थी कि डिप्रेशन से बाहर आने के लिए डाक्टर, दवा, योगा ,गीत , संगीत नृत्य, मोटीवेशन लोगों के पास से गुज़रते हुए लेखिका ने एक परिपक्व सोच को छुआ कि मीशा विषाद से नहीं निकल पा रही है क्यों कि वह हिस्टीरिया जैसी बीमारी की भी शिकार हो गई है। यहाँ   लेखिकाएं सीधे सीधे समाज की रूढ़ियों और परंपरावादी सोच को आईना दिखा देती है।

उपन्यास में पात्रों की संख्या यह बताती है कि रिश्तों नातों के नाम पर हमारे पास एक लम्बी फहरिसत है पर भाई बहन ही खुल कर आपस में बात नहीं कर पा रहे हैं। परिवार को मालूम नहीं है कि एक मासूम बच्ची प्रेम के नाम पर कितनी यातना भोग रही है। स्त्री पात्र सभी विश्वसनीय हैं। एक दूसरे से गहरा जुड़ाव भी देखने को मिलता है।

विकल्पहीनता के दौर में स्त्री अपने अस्तित्व को बचाने के लिए किस तरह स्वयं को तैयार करती है यह भी एक बहुत बड़ा प्रश्न है  ? उपन्यास में चारों तरफ सतर्क दृष्टि कार्य करती है।

एक परिपक्व निर्णय के साथ उपन्यास में सकारात्मक दृष्टि के साथ किस तरह अंत होता है यह जानने के लिए पाठक वर्ग उपन्यास की खोज में निकलेगा, उसे रोचकता में एक जिंदगी का मूल्यांकन अवश्य प्राप्त होगा।

उपन्यास में मनोवैज्ञानिक से वैज्ञानिक तथ्यों तक पहुंचना मात्र मानसिक या काल्पनिक भटकाव न होकर यथार्थ की ज़मीन पर बुनियादी समस्याओं से जुझना ही लेखन का उद्देश्य स्पष्ट कर दिया गया। उपन्यास की भाषा शैली अपने आधुनिक होने के कारण अपने परिवेश को दिखाने में सक्षम है।

अतः हम कह सकते हैं कि आज भी स्त्री जीवन कठिन है सबसे ज़्यादा नयी पीढ़ी के सामने डिप्रेशन का खतरा खड़ा  है। देह और मन दोनों ही स्तर पर स्त्री संघर्षरत है। स्त्री अपने आप से जो अंदरूनी लड़ाइयाँ लड़ रही है जिसका एक दृश्य समाज के समक्ष प्रस्तुत हुआ है जिसमें वह एक दम अकेली है। उपन्यास का उद्देश्य सटीक और सार्थक है। मन-मस्तिष्क के बीच संतुलन बनाकर नयी पीढ़ी (स्त्रियाँ) जिंदगी में सक्रिय भूमिका निभाएंगी और परिपक्व दृष्टि के साथ संपूर्ण आत्मनिर्भर बनेंगी, हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करेंगी एवं इस उम्मीद के साथ यह उपन्यास पाठक के हाथों में सौंप रही हूँ। सभी लेखिकाओं को हार्दिक शुभकामनाएं एवं अभिनन्दन। एक महत्वपूर्ण विषय को उपन्यास की विषयवस्तु के रूप में चयन किया।

-वनिका प्रकाशन, बी-14,आर्य नगर, नई बस्ती, बिजनौर-246701 (उ.प्र.), प्रथम संस्करण-2021, मूल्य-200

मो. 9337244343

-समी. डॉ . आशा सिंह सिकरवार, अहमदाबाद, संपादक: कंट्री आफ इंडिया समाचार पत्र लखनऊ

मो. 7802936217

___________________________________________________________________________________

समीक्षा

कई अछूते पहलुओं को छूता: हजार दिनारा लौंडा

डाॅ. वन्दना शर्मा

सुश्री लता अग्रवाल

डॉक्टर लता अग्रवाल साहित्य के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम है। जहां तक मैं लता जी को जानती हूं वे चूंकि शिक्षा के क्षेत्र से आती हैं अतः किसी भी विषय की गहराई में उतरकर उसकी पूरी पड़ताल करना उनका स्वभाव है। यही प्रवृति हमें उनके लेखन में भी मिलती है। वे एक ही विषय को लेकर विविधता के साथ उस पर लेखन करती हैं। अतिशयोक्ति न होगी यदि कहूँ कि यह उनकी मौलिक पहचान है। वर्तमान में वे ऐसे ही गंभीर विषय (थर्ड जेंडर) के समंदर में उतरी हैं और परिणाम स्वरूप कई अनमोल मोती वे पाठक जगत से सांझा कर रही हैं। प्रमाण है थर्डजेन्डर पर केंद्रित उनका लघुकथा संग्रह ‘‘दहलीज का दर्द‘‘, कविता संग्रह ‘‘सिसकती दास्तान‘‘, उपन्यास ‘‘मंगलामुखी‘‘ और अब आप लेकर आईं हैं थर्ड जेंडर पर ही आधारित कहानी संग्रह ‘‘हजार दिनारा लौंडा’’। जहाँ तक इस विषय को लेकर मेरी जानकारी है, लघुकथा संग्रह पर उनका संग्रह अब तक का दूसरा संग्रह है। किन्नर आधारित एकल कविता और कहानी संग्रह अब तक मेरी जानकारी में नहीं है। इस दृष्टि से मुझे यह पहला एकल कहानी संग्रह लगता है।

खैर! हम बात करते हैं, ‘‘हज़ार दिनारा लौंडा‘‘ की, संग्रह का नाम ही आकर्षित करता है। विकास पब्लिकेशन कानपुर से प्रकाशित इस संग्रह में 16 कहानियां संग्रहित हैं जो किन्नर जीवन की कई अछूते समस्याओं से समाज को अवगत कराती हैं। प्रथम कहानी ‘‘बुलबुल‘‘ में पीड़ा है उस वर्ग की जिसे अपने इस रूप के कारण बचपन में ही अपनों से दूर कर दिया है। जो बचपन अभिलाषी है ममता के आंचल का, पिता के दुलार का वह व्यतीत होता है अनजाने लोगों के बीच। जिनकी भाषा,आचार, विचार,व्यवहार सब कुछ अलग होता है।

‘‘आप सम्पूर्ण हो बाबा‘‘ एक ऐसी बेटी के उद्गार है जिसकी परवरिश हुई किन्नर के हाथों, लोग भले ही उन्हें अधूरा कहें लेकिन एक बेटी की नज़र में संपूर्ण है उसके पालनहार।

किन्नर को अर्धनारीश्वर का रूप माना जाता है। उनके सीने में पिता का दुलार है तो मां की ममता भी। सामान्य समाज द्वारा रेल की पटरी पर फैंकी एक कन्या को नौ किन्नर मांओं का स्नेह मिलता है कहानी ‘‘कन्यादान‘‘ में। कहानी ‘‘छंगा‘‘ कूड़े से उठाए एक ऐसे बालक की कथा है जिसके जन्मदाता ने उसके अधूरेपन को अस्वीकार कर दिया और कूड़े पर सुअर बच्चे के पैर के कुछ हिस्से को अपना भोजन बना गए। बड़ी मार्मिक कथा है।

‘‘ट्रेफिक सिग्नल‘‘ उनके व्यवसाय में सेंध लगाने वालों से प्रतिशोध है। तो ‘‘मुक्ति‘‘ जबरदस्ती देह मंडी में उतारी गई किन्नर की शारीरिक और मानसिक व्यथा है। जिसके पास मुक्ति का एक ही रास्ता है जीवन से मुक्ति।

‘‘अधूरा‘‘ तथा ‘‘धरती के देवता‘‘ कहानी उनके जीवन के सकारात्मक पक्ष को दर्शाती है कि माता पिता यदि साथ हैं तो वे हर जंग जीत लेंगे। उनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं। यह समुदाय भी राजनीति से अछूता नहीं रहा। गुरु पद को हासिल करने किस तरह अपराध के गर्त में उतरते हैं इसका खुलासा करती कहानी ‘‘गद्दी के लिए गद्दारी‘‘। इसके साथ उनके जीवन में गिरिया के स्थान को भी दर्शाती है।

आखिर किन्नर भी इंसान हैं, उनमें भी भावना है। किसी को टूटकर चाहना कोई गुनाह तो नहीं किंतु जब प्यार के नाम पर मिले धोखा तो उनका मन रूदन कर कह उठता है ‘‘मितवा कैसी मीत‘‘।

लेखिका उनके नकारात्मक पक्ष को भी चिन्हित करना नहीं भूलतीं कहानी ‘‘दादागिरी‘‘ और ‘‘शगुन अपशगुन के बीच‘‘ एक में उनकी अपराध प्रवृति है तो एक में समाज को अंधविश्वास से उभारने का प्रयास। ‘‘मरजानी जिनगी‘‘ अपने पेट की खातिर लोगों के समक्ष हाथ पसारने की कसक को दर्शाती है।

‘‘पलीता‘‘ कहानी एक ऐसी समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करती है जिस पर हमारा ध्यान नहीं गया। ये किन्नर समुदाय सामान्य समाज की बेटियों की परवरिश,ब्याह करती हैं। किंतु वृद्धावस्था में उन्हें इनसे मिलती है उपेक्षा, कई स्थानों पर उन बेटियों ने धन के लोभ में अपनी ही पालिताओं की हत्या तक कर दी। दुखद स्थिति है।

देश प्रेम का ‘‘जज्बा‘‘ दर्शाती है कैसे रजवाड़ों में किन्नर समाज ने अपने प्राणों का बलिदान देकर भी देश की रक्षा की। इस बात से हम अनभिज्ञ हैं।

बड़ी बात इस विषय पर लेखिका का कार्य महज़ चार दिवारी के भीतर का लेखन नहीं है। सतत तीन वर्ष किन्नर समुदाय के सानिध्य में रहकर उन्होंने जो जानकारी हासिल की है उसी यथार्थ को उन्होंने अपने लेखन का आधार बनाया है।

अब बात करती हूं संग्रह की शीर्ष कहानी ‘‘हजार दिनारा लौंडा‘‘ की, यह भी एक ऐसे पात्र की कथा है जिसकी जबरदस्ती खासी (लिंग काट नपुंसक) बनाया गया और एक अच्छा भला चरित्र खलनायक बन बैठा।

कुल मिलाकर ऐसे संवेदनशील विषय पर लता जी का लेखन सराहनीय है। पाठक जगत द्वारा खुलकर उनकी इस कृति का स्वागत किया जाएगा बहुत बधाई लता जी। 

-डाॅ. वन्दना शर्मा, पत्रकार कालोनी, भोपाल

___________________________________________________________________________________

द कश्मीर फाइल्स फिल्म समीक्षा

डॉ. निशा नंदिनी भारतीय 

निर्माता: तेज नारायण अग्रवाल, अभिषेक अग्रवाल, पल्लवी जोशी, विवेक अग्निहोत्री

निर्देशक: विवेक अग्निहोत्री

कलाकार: अनुपम खेर, दर्शन कुमार, पल्लवी जोशी, मिथुन चक्रवर्ती, पुनीत इस्सर अतुल श्रीवास्तव 

कश्मीरी पंडित को बेदखल करने का घाव 32 साल बीतने के बाद भी हरा है। जिन लोगों ने इसे भोगा है उनके लिए तो यह नासूर है। यहां हुए नरसंहार के बारे ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। यह सब तब हो रहा था जब भी कोई हलचल नहीं हुई थी। ‘द ताशकंद फाइल्स’ के ज़रिये निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मौत को लेकर कुछ खुलासे किए थे। अब उन्होंने कश्मीर की सबसे गंभीर समस्या पर फिल्म बनाई है। 

यह फिल्म दर्शाती है कि किस तरह से कट्टरपंथियों ने कश्मीरी पंडितों का जीना बेहाल कर उन्हें कश्मीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। तत्कालीन फारूख अब्दुल्ला की सरकार तमाशा देखती रही। जबकि उनकी नाक के नीचे से कश्मीर की आज़ादी की मांग और पंडितों के साथ दुर्व्यहार का नंगा नाच हो रहा था। पुलिस और मीडिया को भी फिल्म कटघरे में खड़ा करती है। युवा पीढ़ी का ब्रेनवॉश किया जा रहा था। कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार को देखकर आप चक्कर खा सकते हैं। इस फिल्म को लेकर लोगों में उत्सुकता है क्योंकि लोग उस समय की सच्चाई जानना चाहते हैं। 

फिल्म के पहले सीन में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। कुछ कश्मीरी मुस्लिम लड़के, शिवा नामक हिंदू लड़के से कहते हैं कि वह पाकिस्तान जिंदाबाद कहे। इसी बीच मुस्लिम युवाओं की भीड़ आती है और पंडित के घर में आग लगा देती है। उनका कहना है- रालिव, त्सालिव या गालिव अर्थात् या तो मुस्लिम बनो, या मरो, या कश्मीर छोड़ो। 

पुष्कर नाथ पंडित (अनुपम खेर) की कहानी के ज़रिये कश्मीर के हालात दिखाए गए हैं। कुछ आतंकी पुष्कर के घर में घुस जाते हैं क्योंकि पड़ोसियों ने विश्वासघात किया है। अपने ससुर पुष्कर नाथ को बचाने के बदले में उनकी बहू को अपने पति के खून के साथ चावल खाने पड़ते हैं। ऐसा हकीकत में भी हुआ है। यह ऐसा सीन है जिसे देख सिनेमा हॉल में सन्नाटा पसर जाता है। कुछ लोग आंखें बंद कर लेते हैं। 

पुष्कर नाथ कश्मीर छोड़ देता है। उसके पोते का प्रोफेसर राधिका मेनन (पल्लवी जोशी) कश्मीर की आज़ादी को लेकर ब्रेनवॉश कर देती है। मरने से पहले पुष्कर अपने पोते से वादा लेते हैं कि मरने के बाद उनकी अस्थियां कश्मीर स्थित उनके घर में विसर्जित की जाएँ। 

पुष्कर की मृत्यु के बाद कृष्णा कश्मीर जाता है जहां उसके दादा के दोस्त ब्रह्मा (मिथुन चक्रवर्ती), डॉक्टर महेशकुमार (प्रकाश बेलावड़ी), हरी नारायण (पुनीत इस्सर) और विष्णु राम (अतुल श्रीवास्तव) से उसकी मुलाकात होती है। इनमें से कोई पुलिस में था तो कोई पत्रकार। ये लोग कृष्णा को 1990 में हुए हालातों के बारे में बताते हैं। सच्चाई जानने के बाद वह सभी को इस बारे में बताने का फैसला करता है। 

वह कहता है कि कश्मीर में हुई इस घिनौनी घटना के बारे में हमें क्यों नहीं बताया गया। उसका यह कहना कई सवाल खड़े करता है, जैसे क्या तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकारों ने इस मामले को दबाया था। क्या मीडिया ने अपना रोल सही तरीके से नहीं निभाया था? विवेक ने फिल्म की कहानी को सच्चे दस्तावेजों और सच्ची कहानियों को जोड़कर आगे बढ़ाया है। नदीमार्ग हत्याकांड का भी उल्लेख है जिसमें 24 हिंदुओं को लश्कर-ए-तोयबा के लोगों ने हत्या कर दी थी। लोगों को कटिंग मशीन से चीर दिया गया था और फिल्म के क्लाइमैक्स में आतंकियों का सरगना बिट्टा (चिन्मय मंडलेकर) भी एक महिला को ऐसी ही सजा देता है। 

फिल्म को लेकर अहम सवाल इसकी सत्यता है। क्या जो कुछ दिखाया गया वो सच है ? इसका जवाब यह है कि विवेक ने कई सच्ची घटनाओं को फिल्म से जोड़ा है। काफी रिसर्च भी की है। फिल्म में दिखाई गई बातें सच्चाई के करीब हैं। 

गैर-मुस्लिमों के लिए आतंकियों ने कश्मीर में जैसी स्थिति पैदा की थी ज्यादातर बातें आपको फिल्म में मिलेंगी। 

निर्माता ने कई बातें समेटने के चक्कर में फिल्म को बहुत लंबा कर दिया है। फिल्म की अवधि अगर कम होती तो इसका असर और अधिक होता। 

अनुपम खेर ने कमाल की एक्टिंग की है। वे खुद भुक्तभोगी हैं इसलिए इमोशन्स को अच्छी तरह समझते हैं। अपने अभिनय के बल पर वे कई जगह दर्शकों की आंखों में आंसू ला देते हैं। दर्शन कुमार, मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, चिन्मय मंडलेकर सहित सारे कलाकारों का अभिनय शानदार है। कश्मीरी पंडितों के साथ जो बर्ताव हुआ है उसे परदे पर देखना भी आसान बात नहीं है, इसी से उनकी पीड़ा को समझा जा सकता है। यह फिल्म इतिहास का एक पन्ना है जिसके बारे में कम लोग जानते हैं, सच्चाई से रूबरू होने के लिए यह फिल्म हर भारतीय को देखनी चाहिए। 

भारत माता की जय

वंदे मातरम् 

तिनसुकिया, असम 

ईमेल: nishaguptavkv@gmail.com

___________________________________________________________________________________

प्रेस विज्ञप्ति

साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव 2022 का तीसरा दिन

साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव का तीसरा दिन

स्वतंत्रता के बाद नाटक के विकास पर हुआ परिसंवाद

रंगमंच पर संकट हमेशा रहा है और रहेगा भी - भानु भारती

पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अपने रचनात्मक अनुभव

नई दिल्ली। 12 मार्च 2022य साहित्य अकादेमी द्वारा मनाए जा रहे साहित्योत्सव के तीसरे दिन आज 1947 के बाद भारत में नाटक का विकास विषयक परिसंवाद का आयोजन किया गया। उद्घाटन वक्तव्य देते हुए प्रख्यात रंगकर्मी भानु भारती ने हिंदी नाटककार भुवनेश्वर का संदर्भ देते हुए कहा कि हमारी प्राचीन नाट्य परंपरा तो श्रेष्ठ थी ही लेकिन आधुनिक रंगमचं परंपरा में भी विशिष्टता के सूत्र निहित है। भुवनेश्वर के एब्सर्ड नाटक इसका उदाहरण हैं। उस समय उन्होंने जो भी कुछ कल्पित किया था वह आज भी सजग रंगमंच का आधार है। भाषायी रंगमंच पर संकट हमेशा रहा है और रहेगा भी लेकिन उसकी जिजीविषा ही उसे बचाए रखेगी। सत्र के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने कहा कि नाटक में जो अजूबे का तत्व है, वह ही उसे अनोखा और विशेष बनाता है। कर्नाटक के आदिवासी नाटक हां या वहाँ के कालजयी नाटक सभी मानवता के नजदीक हैं। उन्होंने नाटकों के तीन चरण बताते हुए पारसी थियेटर, साहित्यिक नाटक और आधुनिक नाटकों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कला माध्यमों पर तकनीक के प्रभुत्व को घातक बताते हुए कहा कि सच्ची मानवीय संवेदना ही कलाओं को जिंदा रखती है। परिचर्चा सत्र, जोकि सतीश कुलकर्णी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ, में रबिजीता गोगोई ने असमिया नाटक, संगम पांडेय ने हिंदी नाटक, राजा वारियर ने मलयाळम्, पी. बीरचंद्र सिंह ने मणिपुरी और अभिराम भडकमकर ने मराठी थियेटर की पिछले 75 वर्षों की यात्रा को प्रस्तुत किया। सभी ने अपनी-अपनी भाषाओं के नाटकों के विभिन्न चरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि सबसे पहले नाटक राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत थे लेकिन तब भी हमने अपनी प्राचीन परंपरा के अनेक नाटक और शिल्प को समकालीन रूप देते हुए प्रस्तुत किया था। हर भाषा में नाटक के लिए उसके खत्म होने का संकट ही उसे पुनर्जीवित रखता है और उससे जुड़े लेखक-कलाकारों को दिशा प्रदान करता रहता है, क्योंकि रंगमंच का दर्शकों से प्रत्यक्ष संवाद ही उसे अन्य कला माध्यमों से महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक साबित करता है।

इससे पहले पुरस्कृत लेखकों ने लेखक सम्मिलन के अंतर्गत अपने रचनात्मक अनुभव पाठकों से साझा किए। सम्मिलन की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की।

‘आमने सामने’ कार्यक्रम में असमिया, बाङ्ला, गुजराती, हिंदी, तमिळ एवं तेलुगु भाषा के लिए पुरस्कृत लेखकों से क्रमशः भुवनेश्वर डेका, सुबोध सरकार, विनोद जोशी, चंदन कुमार, मालन एवं एस. नाममल्लेश्वर राव ने बातचीत की।




प्रेस विज्ञप्ति

साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव 2022 का चैथा दिन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर साहित्य का प्रभाव विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

स्वाधीनता ही साहित्य का आधार और स्वप्न है - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

भारतीय भाषाओं में फैंटेसी और साइंस फिक्शन लेखन विषयक परिसंवाद संपन्न

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य को महत्तर सदस्यता अर्पित

नई दिल्ली। 13 मार्च 2022, साहित्य अकादेमी के साहित्योत्सव के चैथे दिन का मुख्य आकर्षण तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ था, जो ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर साहित्य का प्रभाव’ विषय पर केंद्रित है। संगोष्ठी का उद्घाटन वक्तव्य देते हुए प्रख्यात हिंदी कवि, समालोचक एवं अकादेमी के महत्तर सदस्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि स्वाधीनता मानवीय शब्दकोश का सबसे पवित्र शब्द है। उसकी चेतना, मनुष्य ही नहीं जीव मात्र में नैसर्गिक रूप से विद्यमान होती है। वह मनुष्य का चरम मूल्य है। दुनिया भर के मनुष्य ने स्वाधीनता के लिए जितने बलिदान दिए हैं, शायद ही किसी अन्य मूल्य के लिए दिए हों। स्वाधीनता ही साहित्य का भी आधार और स्वप्न है। दुनिया का अधिकांश साहित्य उसी की अभिव्यक्ति है। आगे उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के साथ-साथ जो साहित्य लिखा जा रहा था, वह अधिकांशतः उससे प्रभावित भी था और उसे प्रभावित भी कर रहा था। हिंदी में जिसे छायावाद काल कहा जाता है उसे ‘सत्याग्रह युग’ भी कहा गया है। अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी ही नहीं, उस समय का संपूर्ण भारतीय साहित्य स्वाधीनता की चेतना से आंदोलित था और उसे प्रेरित तथा गतिशील कर रहा था।

अपने बीज वक्तव्य में प्रख्यात अंग्रेजी लेखक हरीश त्रिवेदी ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम पर साहित्य का प्रभाव व्यक्तिगत, अन्तरंग किंतु सूक्ष्म और स्थायी था। उस समय के राजनीतिज्ञ जो लिख रहे थे वह सृजनात्मक साहित्य तो नहीं था लेकिन उसका प्रभाव किसी कविता या कहानी से कम प्रभावित करने वाला नहीं था और उस समय उसकी ज्यादा जरूरत थी। साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन पूरी दुनिया से अलग और अनोखा था क्योंकि इसमें कोई सेना शामिल नहीं थी बल्कि यहाँ की आम जनता और साधू संतों से लेकर सभी शामिल थे। उन्होंने वाचिक साहित्य द्वारा अपनी बात दूर-दूर तक पहुँचाई और साहित्यकारों ने अपनी वाणी से इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अपने शब्दों से प्रेरित किया। साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि लेखकों का काम देश को आजादी दिलाने के बाद भी खत्म नहीं हुआ बल्कि अब परिदृश्य और जटिल हुआ है तथा लेखकों को ज्यादा संघर्ष करने की जरूरत है। आज संगोष्ठी में तीन अन्य सत्र नंदकिशोर आचार्य, दामोदर मावजो और चंद्रकांत पाटिल की अध्यक्षता में संपन्न हुए।

इसी दिन अपराह्न 2.30 बजे 1947 के बाद ‘भारतीय भाषाओं में फैंटेसी और साइंस फिक्शन लेखन’ विषयक परिसंवाद का आयोजन हुआ, जिसमें देवेंद्र मेवाड़ी ने उद्घाटन वक्तव्य देते हुए कहा कि आज साहित्य एवं विज्ञान नजदीक आ रहे हैं। आगामी समय विज्ञान-साहित्य का होगा। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से फैंटेसी और विज्ञान कथा-साहित्य बहुत तेजी से लिखा जा रहा है। साहित्य की मूलधारा के लेखकों ने भी विज्ञान कथा-साहित्य का लेखन किया है। परिसंवाद के विचार सत्र की अध्यक्षता कश्मीरी लेखक जमां आजुर्दा ने की तथा रजत चैधुरी (अंग्रेजी), जोसेफ तुसकानो (मराठी), कमलाकांत जेना (ओड़िआ), जर्नादन हेगडे (संस्कृत) और इरा. नटरासन (तमिल) ने अपने आलेख प्रस्तुत किए।

आज प्रख्यात संस्कृत विद्वान, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक गुरु जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य को साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान-महत्तर सदस्यता से सम्मानित किया गया। स्वामी जी के साथ संवाद सत्र के अंतर्गत साहित्य अकादेमी के संस्कृत परामर्श मंडल के संयोजक अभिराज राजेंद्र मिश्र, रमाकांत शुक्ल एवं रामसलाही द्विवेदी ने संवाद किया।



प्रेस रिलीज   12‐3‐2022

डाॅ. दर्शन सिंह ’आशट’ छठी बार पंजाबी साहित्य सभा पटियाला के सर्वसम्मित से अध्यध चुने गये, पटियाला पंजाबी युनिवर्सिटी पटियाला में कार्यरत साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता और शिरोमणि पंजाबी बाल साहित्य लेखक डाॅ. दर्शन सिंह ’आशट’ छठी बार पंजाबी साहित्य सभा पटियाला के सर्वसम्मित से अध्यध चुने गये हैं। आज 12 मार्च को भाषा विभाग पंजाब पटियाला के लेक्चर हाल में आयोजित पंजाबी साहित्य सभा पटियाला के हर दो वर्ष बाद होने वाले चुनाव में उन्हें साहित्य सभा के बड़ी संख्या के लेखकों ने यह जिम्मेदारी फिर सौंपी है।  इस अवसर पर बोलते हु, डाॅ. दर्शन सिंह ’आशट’ ने कहा कि वह नई पीढ़ी में मातृ भाषा के प्रति जागरुकता पैदा करने और सेमीनारों व रुबरु कार्याेक्रमों के माध्यम से सभा की गतिविधिओं को बढ़ावा देंगे ताकि नई पीढ़ी के मन में साहित्य और भाषा के प्रति चेतना की लहर फैल सके।

इस दौरान श्रीमति विजेता भारदवाज को मुख्य सचिव चुना गया जब कि प्रोफेसर गुरबचन सिंह राही को सरप्रस्त की जिम्मेदारी सौंपी गई। श्री देवेंन्द्र पटियालवी को प्रेस सचिव, कहानीकार बाबू सिंह रेहल को सीनियर उपाध्यक्ष और लघुकथाकार रघबीर सिंह मेहमी को वित सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई। डाॅ. दर्शन सिंह ने कहा कि जल्द ही सभा की आशमी योजनायों की रुपरेखा तैयार करके अमली तौर पर लागू किया जायेगें।



फोटो कैप्श्न:

1. डाॅ. दर्शन सिंह ’आशट’ को सर्वसम्मित से अध्यक्ष और श्रीमति विजेता भारदवाज को मुख्य सचिव चुने उपरान्त पुष्प हारों से सम्मानित करते हु, सभा के साहित्यकार।

2. डाॅ. दर्शन सिंह ’आशट’






Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

अभिनव इमरोज़ दिसंबर 2021 अंक

भारतीय साहित्य में अन्तर्निहित जीवन-मूल्य