साहित्य नंदिनी, मई 2022





डॉ. अवध बिहारी पाठक, सेंवढ़ा जिला दतिया (म.प्र.), मे. 9826546665

 

आलेख

तुम केवल श्रद्धा हो

कुछ समय पहले जगजीत कुमार सूद लिखित पुस्तक ‘‘आज कुछ मेरी सुनो’’ को पढ़ा था तब लगा कि रचना कृतिकार का एकान्त राग सा कुछ है। पर कालान्तर में यह रहस्य खुला कि यह कृति और उसके रहस्य सार्वजनीन और लोकोपयोगी हैं। कृतिकार का सोच लोकोत्तर है। अनुभूति के वैयक्तिक स्तर पर एक निष्ठ होकर भी कुछ ऐसा बनता है कि जो इंसानियत से लबरेज प्यार और विवके सम्मत कर्तव्य निष्ठा लेखक के चिंतन के आधार हैं। जो सामाजिक संबंधों के निर्वाह से ऊपर उठकर चिंतन को समग्र कायनात से जोड़ते दिखते हैं जिसे दर्शन शास्त्र ईश्वर तत्व से अवहित करता है।

रचना आत्मकथ्य के प्रारूप के बहुत निकट है पर समग्र रूप से इतिवृत्तात्मक है। एक परिवार के दो पात्रों के किशोरावस्था से प्रारम्भ होकर परिपक्व अवस्था तक पहुँचने का रचना विधान है। उनके परिवार, परिवेश, परिस्तिथि के चित्र हैं। जिनकी उपस्थिति में उनके व्यक्तित्व को नई छवि, आभा, विश्वास और मजबूती दी है। यह वही स्थल होते हैं जो रचना को पठनीय बनाते हैं। यथा- लेखक का किशोरावस्था में पिता से असहमति के वावजूद अध्ययन जारी रखना, माँ की अकाल मृत्यु के आघात ने उसे एकान्तिक बना दिया परन्तु जिन्दगी के लक्ष्य को वह नहीं भूला। दूसरी माँ का आना परन्तु पिता के सम्मान में कहीं कोई कमी नहीं आने दी। पिता की सम्पन्नता पर आश्रित न रहकर अपनी योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर कम्पनी में नौकरी मिल गई। ईमानदारी ने उसे सहयोगियों और बाजार क्षेत्र में सम्मान दिलाया, परन्तु स्वाभिमान पर आँच न आने दी। इससे नैतिकता का एक बहुत बड़ा मॉडल उसके अन्तर विकसित होता चला गया। इन कारणों से इस पात्र का चरित्र प्रेरणास्पद है। इस ऊँचाई तक उठाने में श्री डी. के. बहल का अभूतपूर्व योगदान रहा। बकौल सूद साहब- ‘बहल साहब ने हर परिस्थिति और आपत्ति में जिन्दगी को सुचारु रूप से चलाने का रास्ता दिखाया’। इसी बीच सूद साहब का विवाह हुआ पत्नी कमल ने जिन्दगी चलाने में पूरा सहयोग दिया। वह जगजीत सूद के लिए देवी, सहचरी, प्राण सबकुछ थी। जहाँ भी व्यतिक्रम हुए कमल से उसे संभाला। लोक जीवन में कुछ आदर्शो को इस पुस्तक में फलित होते देखा जा सकता है। इस व्यक्ति को अपराजित जिजीविषा का प्रतीक पुरुष कहा जाये तो अतियुक्ति न होगी।

इस रचना का दूसरा पात्र लेखक की दिवंगत पत्नी कमल है। जिसमें विवके, सादगी, सरलता, कर्तव्यनिष्ठा, परिवार और परिचय क्षेत्र में लोकप्रियता की मिशाल खड़ी दिखती है। अपने कष्टों को भूलकर पति और बच्चों की कल्याण कामना की। इस प्रकार से कमल को नारीत्व की सुपठित प्रस्तावना कहा जा सकता है। आज भी कमल की उपस्थिति परिवार में है और वह परिवार का सम्बल बने यह परिवार की कामना है।

कुल मिलाकर यह रचना जितनी अनगढ़ गद्य से स्वाभाविक बन पड़ी है, उतनी ही अभिव्यक्ति की सहजता से प्रभावशाली भी उसके भीतर संवेदना के झोंके पाठक को आहलादित कर देते हैं। यह रचना लोक जीवन में पारिवारिक, सामाजिक आदर्शों की स्थापना में मदद कर सकती है जिनकी आज के समाज को जरूरत है।

__________________________________________________________________________________


श्री जगजीत सूद एक ऐसी शख्सियत हैं जिसने जीवन के आरंभिक काल से ही चुनौतियों से खेलना शुरु कर दिया था। नतीजतन- आज जिस मुकाम पर हैं उससे सिद्ध होता है कि केवल प्रतियोगी ही वास्तविक नायक होता है। (only challangers are champions)

आत्म विश्वास से भरपूर श्री जगजीत सूद साकारात्मक संभावनाओं के पुंज हैं। अपने व्यापार में तो वो अग्रिम पंक्ति में हैं ही- अब उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में भी अपना दखल बढ़ा लिया है। उनकी संस्था 'CAN FIGHT CANCER'  रोगियों की सेवा में समर्पित है। साहित्य, कला एवं संस्कृति के दायरे में भी उन्होंने अपना स्थान बना लिया है।

ये तीन पुस्तकें इस बात का प्रमाण हैं। 


अभिनव इमरोज एवं साहित्य नंदिनी परिवार की ओर से शुभकामनाएँ एवं हार्दिक अभिनंदन। -संपादक

***********************************************************************************

समीक्षा



लाइफ @ ट्विस्ट एंड टर्न. कॉम

अब दुनियाँ  बदल गई है। किसी समय कहा जाता था कि बहुत सारे बावर्ची खाने का स्वाद बिगाड़ देते हैं। जिसने और जब ये कहावत गढ़ी होगी तब उसे शायद ये पता नहीं होगा कि बावर्ची आखिर बावर्ची ही होते हैं और वे एक- दूसरे का काम केवल तब बिगाड़ते हैं जब वे आपस में दुश्मन हों। दोस्तों पर ये कहावत लागू नहीं होती।

यही कारण है कि कभी कभी भोजन और भी स्वादिष्ट हो जाता  है। बल्कि अगर इसके स्वाद की बात की जाए तो कई अनुभवी हाथ लग जाने से यह किसी अचार की तरह सौंधा और चटपटा बन जाता है।

हाल ही में नीलम कुलश्रेष्ठ, मधु सोसी गुप्ता, डॉ. सुधा श्रीवास्तव, निशा चंद्रा, डॉ. प्रणव भारती, डॉ. मीरा रामनिवास वर्मा के समवेत मानस से निकला उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला। अनुभवी और प्रतिष्ठित लेखिकाओं की ये साझा कृति पढ़कर आनंद तो बहुत आया पर साथ में ये दुविधा भी रही कि इसे भेंट करते हुए नीलम जी का तकाजा था कि इसकी कमियां बताइए।

हिंदी साहित्य में तीन लेखकों के साझा उपन्यास का जिक्र तो है पर शायद छह रचनाकारों का इकट्ठा काम पहले नहीं आया। इस रूप में इसकी सराहना ही की जानी चाहिए।

वनिका प्रकाशन की यह अनूठी और नायाब प्रस्तुति बेहतरीन है।

मातृभारती ऑनलाइन प्रकाशन पर प्रकाशित भारत के इस द्वितीय डिजिटल साझा उपन्यास की तुलना ‘‘अचार‘‘ से कर देने से नीलमजी की बात भी रह जाएगी। अचार जितना स्वादिष्ट होता है उतना पौष्टिक नहीं होता।

रचनाकारों के अपने समृद्ध अनुभव और विशेषज्ञता ने उपन्यास को सशक्त किया है। आधुनिक जीवन शैली, भाषा और सरोकारों का यह उन्मुक्त चित्रण सभी वर्ग के पाठकों को अच्छा लगेगा, तय है।

इसका कथानक रूपरेखा व संयोजन नीलम कुलश्रेष्ठ का है। नीलमजी की स्त्री विमर्श को लेकर गहरी समझ उपन्यास के लिए सार्थकता के दरवाजे खोलती है जिन्हें सभी रचनाकारों की परिपक्व दृष्टि मोहक बंदनवारों से सजाती है।

सभी को हार्दिक बधाई!

श्री प्रबोध गोविल, राही संस्थान, जयपुर, मो. 9414028938

***********************************************************************************

समीक्षा



खाली हथेली एवं उत्तरायण कहानी संग्रहों पर टिप्पणी

विचार का अपना कोई न कोई उत्स होता है और उनके द्वन्द्व से रचना का जन्म होता है। विचार जब रचनाकार को भीतर तक चटकाता रहता है तो स्थूल रूप में बदला लेने के लिए रचनाकार के पास शब्द का हथियार होता है। ये कहानियाँ जितना यथार्थ को परिभाषित करती हैं उतना ही अन्दर की बैचेनी को परिणामित करती हैं। जहाँ रचनाकार को अपने भीतर बैठे जीवन के सारे आदर्श लँगड़े, बेवश, असहाय प्रतीत होते हैं। रचनाकार ज़िन्दगी को खूब कसकर पकड़ना चाहता है किन्तु जब उसकी निजता को चोट पहुँचती है तो उसे लगता है कि सारा खेल समाज और व्यक्ति के बीच पैदा हुआ, भौतिकता का दिया हुआ है, अस्तु हथेली को खाली रखना ठीक है कुछ देर उसके बीच रेत के कण रखे रहने से तो खाली रखना अच्छा, क्योंकि खालीपन में उसके रीते अन्तराल की ध्वनि उसमें कहीं न कहीं जीने का सम्बल बनी रहेगी। खाली हथेली के पात्रों की वेदना और उससे उपजी टूटन जितनी समाज-देश की है उतनी वैयक्तिक भी, क्योंकि व्यक्ति समाज, परिवेश, परिस्थिति और निजता के द्वन्द्व से मुठभेड़ करता है। खालीपन हथेली का ही नहीं वह समूची इन्सानियत का नाकारापन है और न कहीं भी पात्रों में किनारा खोजने का दृढ़ संकल्प और इसी से लगता है कि खाली हथेली के पात्र और कथानक कहीं न कहीं अपनी छù ऐंठ में गुम हैं। ऐसे में रचनाकार को खाली हथेली रखने में ही उसके अपने निजत्व की सार्थकता प्रतीत होती है तो उसका दोष नहीं, दोष इंसानी नीचता का जो खुद को अपने तोडने में मसरूफ है।

उत्तरायण की लगभग सभी कहानियाँ पश्चिमी संस्कृति के द्वारा इंसानियत को चोटिल करने के प्रतीक रूप में देखी जानी चाहिए, तथाकथित विकसित और भौतिकशील जागरण में स्त्री हो या पुरुष या नई पीढ़ी के युवा उसके समानान्तर चलने के उपक्रम में अपने भीतर का कुछ खोते हुए नजर आते हैं, जो वस्तुतः उनकी निजता होती है, ये मॉडल एक जीवनादर्श से उनकी दूरी बढ़ रही है। जो मनुष्यत्व को खोने की भयंकर हानि है।

आज पिछले आदर्श सोंधी मिट्टी से जुड़ी संस्कृति और उसकी सहजता क्रत्रिम विज्ञान और तथा कथित विकास से त्रस्त है। स्त्री और पुरुष पात्र अपनी ऋजुता को खो बैठने की ओर बेतहाशा भाग रहे हैं। इससे सबसे बड़ी हानि मन, हृदयका, और अपने पन का टूटना है। उत्तरायण कहानियों के अधिकांश पात्र इस तरह टूटे हैं कि वे बिल्कुल अकेले खड़े दिखते हैं, बचा रहा है उनके साथ उनका दम्भ। कहीं स्त्री का मन बागी है तो कहीं पुरुष मन बागी है, चोर है डाकू है। अपने आपको ठगने का पराक्रम दिखाना उत्तरायण की कहनियों का लक्ष्य है।

दो कहानियाँ पहली ‘‘सावित्री नं. 3’’ और दूसरी ‘‘मरीचिका की बीस बरस की बेटी’’ जो माँ को बिना बताये अपने, पिता से मिलने की इच्छा व्यक्त कर डालती है....पृष्ठ-52। सावित्री ओर बेटी दो ही पात्र उत्तरायण में जीते हुए दिखते हैं, क्योंकि सावित्री ने अपने पति को पूर्णता देने वाली कमला के चरण स्पर्श किए। यहाँ सावित्री में पुरुष की पराधीनता दिखाना लक्ष्य नहीं, स्त्री का बल्कि दो पूरक तत्वों की पूर्णता का उल्लास है सावित्री में। जबकि मारीचिका की पुत्री में पति-पत्नी के सम्बन्धों में एक नैसर्गिक पूर्णता को खोज है। अस्तु दोनों ही उत्तरायण में जीते हैं और अन्य पात्र दक्षिणायन में भी भटक रहे हैं एक नया सबेरा पाने की खोज में।

इस तरह से खाली हथेली और उत्तरायण दोनों ही कहानी संग्रहों में लेखिका की कोशिश एक कटु यथार्थ को आदमी के सामने परोसना है। ताकि वह स्वम् को पहिचाने यहाँ यथार्थ के साथ-साथ सामंजस्य बैठाने की भी पुकार है। अस्तु दोनों संग्रहों की कहानियाँ पढ़ने योग्य और एक नई चेतना के उदय का अवाहन करती हैं।  


डॉ. अवध बिहारी पाठक, सेंवढ़ा, जिला दतिाया (म.प्र.) मो. 9826546665

सुदर्शन प्रियदर्शिनी, लेखक: सुदर्शन प्रियदर्शिनी

***********************************************************************************

समीक्षा

भोर की किरणों सी सकारात्मक  - ‘‘खुसुर पुसुर’’

आदरणीय कन्हैया लाल पांडेय जी से वड़ोदरा में उनका सन 2006 में उनका उसी शहर में वहीं लिखा, शिल्पायन प्रकाशन,देल्ही  से प्रकाशित काव्य संग्रह ‘भीगी हवाएँ‘ भेंट में मिला था और अब सन 2021 में पोस्ट से उनका लघुकथा  संग्रह ‘खुसुर पुसुर ‘भेंट में मिला है। बहुत धन्यवाद व आभार!  सन 2006 में मुझे उनके काव्य संग्रह की इन पंक्तियों को पढ़कर बहुत गहन आध्यात्मिक अनुभूति महसूस हुई थी,

‘‘ढूँढ कर मिल न पाएं 

जब तुम्हें विश्रांति के क्षण,

तब मुझे आवाज़ देना शांत स्वर से 

मैं वहीं उस सप्त सुरमय  गीतिका में 

एक अनुपम ताल लय  पर

 रच नया संगीत तुमको फिर मिलूँगा 

जानते हो शांत नीरव नभ,सकल जलथल,

प्रकृति, सौंदर्य, रचना ही यहाँ 

संगीत की उत्पत्ति का कारण नहीं है,

मैं  जहां हूँ वहां फिर उत्पन्न शाश्वत 

रागिनी मुझसे हुई है. ‘‘

‘तुम और मैं ‘कविता से साभार,

अपने ‘बांसुरी ‘काव्य संग्रह के लिये इन्हें रेल मंत्रालय से मैथली शरण पुरस्कार व लघुकथा संग्रह ‘मनके ‘के लिये प्रेमचंद पुरस्कारों के साथ अनेक पुरस्कार व सम्मान  इन्हें साहित्य में प्रतिष्ठित कर चुके थे।   

भविष्य के गर्भ में क्या अनमोल छिपा है कौन जान सकता है ? हम क्या पांडेय जी भी कैसे जान सकते थे कि वे सप्त सुरमय गीतिका में ही रेलवे के जिम्मेदार उच्च पद पर होने के साथ सन 2007 से एक साधक की तरह 

साधना करने लगेंगे। आरम्भ से लेकर अब तक के फिल्मी गीतों की शास्त्रीय राग को पहचानने की साधना व उसे लिपिबद्ध करने के लिए उन्हें विश्व के संगीत प्रेमी पहचानने लगेंगे। साहित्य सर्जन के लिए  अनेक पुरस्कार पाने के बाद अब तक वे संगीत मर्मज्ञ की तरह प्रतिष्ठित हो चुके हैं।  रेलवे से मेंबर ऑफ बोर्ड की तरह रिटायर होने के बाद भी  संगीत क्षेत्र में आज तक उनकी ये तपस्या चल ही रही है। इस संग्रह की अंतिम लघुकथा ‘तीन अवस्थायें ‘में इनकी या किसी भी प्रशासनिक रेलवे अधिकारी के  जीवन के तीन  रूप दर्शाती है। खुशी ये है कि कन्हैया जी रिटायरमेंट के बाद की शुष्क व अनुपयोगी ज़िन्दगी नहीं  जी रहे  निरंतर कला साधना से समाज को कुछ दे रहे हैं।  

आपके दो लघुकथा संग्रह आ चुके थे। बिजनौर में जब डॉ. नीरज शर्मा व जितेंद्र जीतू जी से इनकी मुलाकात हुई तो लघुकथा लेखन की फिर योजना बनी। इन दोनों ने सुझाव दिया कि आपने इतनी संगीत साधना की है तो संगीत पर आधारित लघुकथा लिखें। उन दिनों मैं इनके साक्षात्कार के कारण नेट से संपर्क में थी.मैंने अचरज से पूछा कि आप संगीत पर आधारित लघुकथा कैसे लिखेंगे। पांडेय जी ने अपनी लघुकथा ‘भैरव‘ ख्शास्त्रीय राग, मुझे मेल कर दी। इसको पढ़कर मुझे वही अनुभूति हो रही है जो उक्त कविता की पंक्तियों को पढ़कर हुई थी।

इसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं,

‘‘हमने भैरव के स्वरुप का ध्यान कर क्षमा माँगी और शिवजी के चित्र के सामने नतमस्तक हो गये।‘‘

 मैं शिवजी के कारण आध्यात्मिकता की बात नहीं कर रही। इस लघुकथा को आपको पूरा पढ़ना पड़ेगा कि शास्त्रीय राग साधना कैसे आध्यात्मिक है। इस संग्रह में ‘भैरव ‘के साथ संगीत की दुनियां से संबंधित  अन्य दुर्लभ लघुकथा पढ़ने को मिल रहीं हैं। शायद ये प्रथम बार है जब संगीत क्षेत्र पर इतनी लघुकथाएं लिखीं  गईं हैं जैसे‘ कानसेन‘, ‘बिहाग‘, ‘भूपाली ‘, ‘जुगलबंदी‘, ‘उस्ताद‘, सरंक्षण ‘, ‘अंकशायिनी ‘‘पंडित जी की जिद व्यवधान’‘, ‘तानपुरा आदि।

ऑडीशन ‘में स्त्रियों की वही आदिम कथा है जो किसी भी क्षेत्र की हों यदि तथाकथित गुरुओं से समझौता  कर लें तो कहाँ की कहाँ पहुँच जातीं हैं। ‘बैंजो ‘में जब मालिक के साथ उनका बेंजो जला दिया  जाता है तो ये शब्द ‘वाद्यों  की हत्या‘ दिल को छू जाता है  लेकिन ‘धन्यवाद‘ में पुराने रिकॉर्ड्स के संग्रह, ख्वाद्यों के सरंक्षण की बात, को दो मित्र बचाकर उन्हें म्यूज़ियम में सरंक्षित कर देते हैं। यहाँ वाद्यों के सरंक्षण की चिंता ही नहीं है बल्कि ‘परिवर्तन‘ द्वारा मूल शास्त्रीय संगीत के सरंक्षण की बात भी गम्भीरता से सन्देश  देती दिखाई है। ये बात किसी शास्त्रीय संगीत गुरु से नहीं कहलवाई गई बल्कि एक साधरण गायक कहता है,‘‘मैं रागों व वाद्यों में सुविधानुसार परिवर्तन अवश्य करता हूँ लेकिन उनके शास्त्रीय स्वरुप में कभी नहीं करता।‘‘ 

मैं ‘ट्रैफिक जाम‘ लघुकथा के कथ्य से बिलकुल सहमत नहीं हूँ जिसमें नौशाद के गीत को सुनने के लिए रिक्शे में बैठे एक रईसजादे ट्रैफिक जाम करवा देते हैं। आज के कुछ फिल्मी गीत कम नहीं हैं, बस आज की जनता इतनी जागरूक हो गई है कि वह किसी रईसजादे का रौब नहीं मानती। इन्हें पढ़ते हुए मुझे लगा कि संगीत की दुर्लभ लघुकथाओं को एक अलग खंड में संयोजित किया जाता तो अधिक अच्छा था। 

पांडेय जी ने ये पुस्तक अपनी माँ आदरणीय कमला पांडेय जी को समर्पित की है। उनका फुटपाथ के लोगों को कम्बल बांटना, अनुशासित जीवन जीना ही इन्हें मिले संस्कार का उद्गम स्थल दिखाता है। धर्मनिरपेक्ष नवरात्रि का सन्देश देता कमला पांडेय जी का ‘कन्या भोज‘ भी है। यहाँ परिवार की बात करते हुए इस अवसाद काल में सकारात्मकता खोजी गई है ‘वर्चुअल फैमिली‘ में। कोरोना पर आधारित इनकी लघुकथाओं ने इनके लेखन को आज से भी  जोड़ा है। मुझे परिवार रहित कर्नल के अकेलेपन ने बहुत द्रवित किया क्योंकि अकेली स्त्री पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा है।

इस संग्रह को पढ़ना ऐसा है जैसे हम ज़िंदगी के कोलाज में से गुजर रहे हैं। इन लघुकथाओं में शहरों, गाँवों से लेकर विदेशों की बात तो है ही, साथ ही जीवन से जुड़ी  छोटी चीजों जैसे टेलर के यहाँ नाप देना, मांझा बनाने वाले,परात, देग यहां तक कि रुमाली रोटी तक की बात की गई है। ‘फैमिली  वैल्यूज‘ के साथ यहाँ ‘फैमिली वाले‘ ‘बच्चे’, ‘नौकर दादा‘, ‘परिवार‘, ‘ऊपर वाला कमरा‘, ‘लो चच्चा और पीयो‘ के बीच परिवार के लोगों की स्वाभाविक ‘खुसुर पुसुर‘ की भी आहट  है। ‘तितलियाँ‘ में लड़कियों के लिये बिना भाषण दिये एक प्यारा सा सन्देश है।  

‘मूंछें‘ व ‘मेम  साहब‘ जैसी व्यंग का तड़का लिये हुए  रचनायें बहुत दिलचस्प हैं खासकर ये उदाहरण ‘-दस बजकर दस मिनट जैसी ‘मूंछें’ या ‘सेवक’ गण वही अच्छे होते हैं जो कम  पढ़े  लिखे हों लेकिन शादी के विज्ञापन की तरह गृहकार्य में दक्ष हों।‘

गुजरात के क्षेत्र के आदिवासियों की बात भी है जो बसों की यात्रियों को लूटते समय उनकी पिटाई भी करते हैं। उनकी मान्यता है कि बिना मेहनत पैसा नहीं कमाना चाहिए ये बात एक लघुकथा बताती है। मुझे तो इंदौर के आस पास रात्रि में जाने वाली बसों की लूटपाट के विषय में पता था। ये बात एक लघुकथा बताती है। इंदौर से रात होते ही बसें एक कारवाँ बनाकर निकलतीं हैं जिससे आदिवासियों की हिम्मत न हो लूटने की।

ये संग्रह संगीत की लघुकथाओं के कारण अलग हटकर तो है ही। ऐसे लोग अक्सर रसहीन साधक बनकर रह जाते हैं लेकिन पांडेय जी परिवार, रिश्तेदारी में भी सहज रूप से सक्रिय हैं। 

मैं स्वयं अपने को जिंदगी की लेखिका मानतीं हूँ इसलिए मुझे इस पुस्तक ने प्रभावित किया है। ग्रामीण परिवेश की ‘दूरियां‘, विदेशी की ‘मुटा‘ संवेदना से भिगोकर रख देतीं हैं लेकिन कुछ अपनों से जुड़ी लघुकथाओं को लेखक रेखाचित्र बनने से नहीं बचा पाए हैं। ऐसे ही कुछ लघुकथा संस्मरण का आभास देतीं हैं। अब ये समीक्षकों पर निर्भर है कि वे किसे लघुकथा गिनें, किसे संस्मरण या कुछ और। किसी समीक्षक के लिए जीवन के इतने ढेर से सकारात्मक भावनाओं से भरे रंग समेटना आसान नहीं होगा। 

पुस्तक -‘खुसुर पुसुर‘ ख्लघुकथा संग्रह, ध् लेखक -श्री कन्हैया लाल  पांडेय / समीक्षक -नीलम कुलश्रेष्ठ 

मूल्य - 320 रु / प्रकाशक -वनिका पब्लिकेशंस, देल्ही


श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ, -अहमदाबाद, मो. 09925534694

ईमेल:kneeli@rediffmail.com

***********************************************************************************

समीक्षा

‘ख़ुद से गुजरते हुए’


समीक्षक : डॉ. विनोद कुमार


लेखिका : सुश्री संगीता कुजारा टाक, राँची, मो. 9234677837

शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संगीता कुजारा टाक को प्रथम कविता पुस्तक खुद से गुजरते हुए अपने वजूद से टकराती हुयी कविताओं का एक चेतनशील संकलन है। इन कविताओं में जीवन की गुत्थी को सुलझाने, उससे निपटने की कोशिश भी नजर आती है जो पकड़ में नहीं आती बार बार छुट जाती है। उसको टटोलने की ब्याकुलता आपको इन कविताओं में लगातार मिलेगी। ये कविताएं जीवन की बहुत सारी प्रक्रियाओं से होकर गुजरती हैं।

इन कविताओं में प्रेम की गहराईयां हैं, जहां जन्म है और मृत्यु है और विराट से साक्षात्कार भी। संग्रह की सबसे पहली कविता हैशटैग ब्लैकहोल चकित करती है। जहां कवयित्री कहती है-

मैं

तुम्हारी

ब्लैकहोल

बनना चाहती हूँ!!

विज्ञान ने यह प्रमाणित किया है कि आखिरी क्षणों में हम ब्लैकहोल से गुजरते है जहां से कोई लौटकर नहीं आता। कवयित्री का प्रेम इतना अथाह है कि वह ब्लैकहोल से लौटकर आना नहीं चाहती। उसे स्त्री होने का भी बोध है। जहां वह कहती है-

खुश्क रेत में

धँसते पाँव!

यह रेगिस्तान

मेरे संघर्षों की गाथा है

और फिर यह व्यक्त करना कि-

सबने लिया है कुछ न कुछ

उधार मुझसे...

एक औरत से!

कविता उधार में स्त्री विमर्श का गहन बोध है। जहां कवयित्री ने अपने आप को प्रकृति के साथ सम्वद्ध कर लिया है इसलिए भी कि प्रकृति सिर्फ देती है। प्रकृति जो स्त्री का पयार्य है। अपने आप को प्रकृति के साथ जोड़ लिया है कवियत्री ने... वह बड़ी गहराई से वो कौन है कविता में कहती है-

बताओ कि

कौन तय करता है जंगल के रूल्स

कि हर जानवर को पता है

अपने हिस्से का नियम

कि किस पक्षी को कितनी ऊँचाई से उड़ना है

और कितनी तय करनी है दूरी

मुझे बताओ

कि किस ने तय किया

साँसो की आवाजाही का नियम

पेड़, पौधे हों या जानवर,

कीड़े, मकोड़े या पंछी

या हों हम इंसान

किसने रचा यह जन्म और मृत्यु का खेल

प्रेम की उद्दात लालसा है कवयित्री में इसलिए वह अपना प्रेम प्रकृति में ढूंढती है जहाँ झील है, पर्वत है, खिले हुए फूल हैं और अनहद नाद तभी तो वह कहती है अपनी कविता प्रेम में-

कल

जिस पौधे से

बातें की थीं

तुम्हारे बारे में

देर रात

सब से छुप कर

माली बता रहा था

आज उस में फूल उग आए हैं

प्रेम के साथ स्त्री का गहन संबंध है लेकिन जब हम समाज में पाते हैं कि स्त्रियों की दशा दोयम दर्जे की है तो कवयित्री अंदर से चित्कार उठती है वह चाहती है खुद को बांध लेना। खुद के पास लौट आना। वह सामने से गुज़रती है लेकिन उसका प्रेमी उसे आवाज नहीं देता और ना उसे अपने पास लौट आने के लिए कहता है। कवयित्री  के अंदर की चिंगारी धधकती है। वह किसी के ख्यालों में डूब जाती है लेकिन उसे लगता है कि यह निरर्थक है। वह कफस में टुकुर टुकुर ताकती उस परिंदे की तरह है जो आज़ाद होना चाहती है नीले आसमान में अपनी खुशियां बंटोर लेना चाहता है लेकिन वह जानती है उसका कोई आसमान नहीं। उसका कोई समुद्र नहीं। वह प्रकृति की लय में  डूबना चाहती है लेकिन उसके अंदर एक खौफ तारी है कि पता नहीं सामने कोई काला सा समुद्र है उसके पास से वह लौट नहीं सकती।

अपने अस्तित्व का अहसास कराती ये कविताएं अनुभूतियों और सम्वेदनाओं का प्रतीक मात्र है। प्रेम की तीव्रता को जैसे जीया है कवयित्री ने लगता है वह सब बेमानी है। प्रेम सागर पर तैरते हुए विशाल हिमशिला की तरह है जिसका एक भाग नजर आता है दूसरा नजरों से दूर चला जाता है।

संगीता कुजारा टाक की कविताओं में चेहरों के अन्दर अनेक चेहरे हैं। मुखौटों के अन्दर अनेक मुखौटे हैं। कविताएं और जिन्दगी गडमड हो गयी हैं। एक को दूसरे से अलग करना मुमकिन नहीं। कविताओं में अपने एहसासत की कीमत अपने वुजूद से टकराकर अदा करनी पड़ती है।

ऐसी सच्ची अनुभूतियों के बनने में रचनाकर को रास्तों के नदी-नालों में टूटे हुए नावों के हिस्से और ऊपर दीखते हुए मस्तूल अधिक मिलते हैं। नदी-नालों में कमल कम, सेवाड़, जलकुम्भी अधिक है। वह तो कलाकार की आँखों में संचित चेतना की दीप्ति और विश्वास है कि एक-दो फूल, थोड़ी-सी हरियाली का साथ पकड़कर, अनुभूतियों को, आवश्यकता पड़ने पर कभी अपनी आत्मा को आग में, तो कभी पानी में बदलकर उनको अपने साथ एक विद्यमानता की हस्ती देखकर रखता है, वरना कई-कई कलाकार कई-कई बार इन नदी-नालों में बहुत अरसे तक खोए रह जाते हैं और कुछ तो कई बार खाली हाथ ही आते हैं।

***********************************************************************************

समीक्षा





समीक्षक: डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ

संपादक: डॉ. श्याम बाबू शर्मा

कवि: डॉ. राम प्रकाश


अमानवीयकरण और अवमूल्यन का प्रतिरोध करता हलफनामा

लंबे समय से काव्य-सर्जना में संलग्न डॉ. राम प्रकाश की प्रतिनिधि कविताओं को डॉ. श्यामबाबू शर्मा ने सम्पादित-संकलित किया है। ‘फटा हलफनामा’ की ‘बिन कहे रहा न जाय’ शीर्षक सम्पादकीय में यही संकेत है कि समय के सवाल इन कविताओं में पूरी सिद्दत के साथ मौजूद हैं। कवि के सामने सर्वाधिक ध्यानाकर्षक सवाल मनुष्यता के क्षरण और हनन से संबद्ध है। ‘साँप’, ‘एक आदमी’, ‘खंडहर’, ‘कटी जिह्वाओं का लोक’ आदि कविताओं में आदमी के जानवर बल्कि उससे भी बदतर होने की विडम्बना है। ‘साँप’ का अनुभव है कि ‘जहरीलेपन में / आदमी उसका भी बाप है’ और ‘एक आदमी’ का इतना पतन है कि वह छीन सकता है ‘आम आदमी की जीभ की मिठास’। क्रूर व्यवस्था भी मनुष्यता के लोप में सहयोग करती है, बल्कि बाध्य करती है और लोग अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को खुशी-खुशी गवाँ देते हैं। ‘कटी जिह्वाओं का लोक’ में यही हादसा है-

हम नहीं बोलेंगे

हमें नहीं चाहिए कटी जीभें

चिपका कर रखेंगे अपनी जिह्वाएँ

कवि चिंतित है कि देश में सर्वग्रासी अवमूल्यन ने अच्छी चीजों और विशेषतः मानवीय मूल्यों के लिए संकट पैदा कर दिया है। नैतिकता का कवच और ईमानदारी के कुंडल आज के संदर्भ में भार-स्वरूप हैं (यक्ष-प्रश्न), बहुत सी बस्तियाँ ‘विश्वास के बीज/आशाओं के बादल’ की बाट जोह रही हैं (सपने), बेवजह रिश्तों की हत्या हो रही है (बेवजह भी मिलते थे लोग)। यह सब इसलिए हो रहा है कि स्वार्थ की फसलें लहलहा रही हैं और ज़मीर की मिट्टी से ‘संवेदना की उर्वर शक्ति’ नष्ट हो गयी है। मनुष्य से बेहतर तो पेड़ हैं, जिनमें परस्पर सद्भाव बचा हुआ है। इस 

आपाधापी और अव्यवस्था के प्रतिरोध की क्षमता कवि की दृष्टि में सिर्फ कलम में है। सच्ची कलम कभी शांत नहीं बैठ सकती: ‘अन्याय से लड़ेगी / अव्यवस्था से झगड़ेगी’ इसलिए कि उसमें संवेदना बची हुई है। डॉ. राम प्रकाश की दृष्टि में लेखन संवेदनाविहीन होकर सार्थक नहीं हो सकता-

और संवेदना रहित लेखन / न तो शब्द होता है / और न अर्थ होता है / वह होती है / अक्षरों के श्मशान की चहारदीवारी / या फिर / भावों की जली चिता की राख

स्वयं डॉ. राम प्रकाश की कविताएँ संवेदना-पोषित हैं। ‘हक रोटी पर’, ‘हामिद भाई की रफू की दुकान’, ‘बेरोजगार की आत्मकथा’, ‘शहर जाते हुए’, ‘रमुआ का कौशल विकास’ और लम्बी कविता ‘फटा हलफनामा’ में वंचितों और उत्पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और आत्मीयता व्यक्त हुई है। ‘फटा हलफनामा’ का विजन सकारात्मक परिवर्तन के प्रति आश्वस्तिकारक है-

अब कोई नहीं कर पायेगा नर-संहार / अब कोई भूमि बंजर न होगी / अब कोई हलफनामा न होगा / होगा तो- / केवल अन्याय का अंत

अपने अनुभूत तथ्य, आक्रोश और 

प्रतिरोध-भाव को अभिव्यक्त करने में सक्षम भाषा कवि के पास है। ‘मैंने देखा है’ की भाषा में स्मृतियों को सँजोती भाषा तरंगापित सुगंध की तरह पुरइन, चकिया, कटरी, आँच, फाग जैसे आँचलिक शब्दों से भरपूर है और ‘रमुआ का कौशल विकास’ में नाड़ा, अनमनी, तुरपाई, शीला, आदि शब्दों ने रमुआ की नियति के 

निर्धारण में योग दिया है। सपाट बयान के स्थान पर व्यंग्य, फैण्टेसी, पूर्वदीप्ति, बिम्ब-प्रतीक की सहायता से बनी आकर्षक कहन प्रभावित करती है। ‘औरत लड़की नहीं बन सकती’ में औरत-संहिता तोड़ने को - ‘माना जाता है, गंभीर अपराध / जिसमें है प्रावधान / प्रताड़ना से लेकर सजा-ए-मौत तक’। ‘यह लड़की संविधान नहीं जानती’ में इसका प्रतिपक्ष भी है - ‘भगा सकती है हर प्रकार के कुत्तों को / कुत्तों से अपने आपको बचाना / वह जानती है’। प्रतिरोध के तेवर ‘कबीर’ कविता में नयापन लिए हुए हैं। यहाँ आम आदमी कबीर को नहीं जानता पर ‘मौका आने पर / कबीराना अंदाज में / सड़क पर उतर आता है।’ एक कविता ‘प्याज हूँ मैं प्याज’ में प्याज शास्त्र-धर्म से निंदित-बहिष्कृत वर्ग का प्रतीक बनी है। बिम्बों-अप्रस्तुतों के प्रयोग प्रायः अन्तर्वस्तु के अनुरूप हैं। ‘राजनीति की चील’, ‘अँगरखा भविष्य का’, ‘तीसरी बार जैसे माँ बुला रही हो वापस’, ‘गांधीकालीन कड़ाही’, ‘सत्ता का गरम मसाला’ आदि प्रयोग अर्थ-संप्रेषण में सक्षम हैं। कई कविताओं में एकदम अंत में कहानी की चरमसीमा जैसी कौंध ‘विजन’ को चमका जाती है। ‘वे और उनकी असभ्यता / दोनों प्रणम्य हैं’, ‘आरामगाह में अलसाये मनुष्य ने / यह सब नहीं देखा’, ‘कि एक अरब लोग मिलकर / एक आदमी को सुधार नहीं सकते’ आदि समापन पंक्तियाँ उस संदर्भ में पठनीय हैं। ‘सपने’ में कवि ने साहित्यकारों, कलाकारों से वंचितों के लिए सपने लाने का जो आग्रह किया है, वह उसकी अपनी कविताओं में प्रायः साकार हुआ है। 

संदर्भ- ‘फटा हलफनामा’, डॉ. राम प्रकाश, सम्पादक- डॉ. श्यामबाबू शर्मा, प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, 

पी. सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेन्ट, बस स्टैण्ड, सीहोर-466001 (म. प्र.), प्रथम संस्करण 2021

डी-121, रमेश विहार, अलीगढ़-20200, मो. 09837004113

***********************************************************************************

समीक्षा



तीन गुमशुदा लोग: तीन कहानियों का नाट्य कोलॉज

साहित्य की हर विधा में नवोन्मेष एवं नवीन प्रयोग महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आते हैं। ऐेसे परिवर्तन रेखांकित भी हो जाते हैं, खासकर तब जब वे नई विचारधारा, नव-विमर्श एवं नवयुग से सामंजस्य बिठा सकते हों। नई कहानी और नई कविता तो इसके बड़े साक्ष्य हैं ही, अन्य विधाओं में भी नव-प्रयोग सामाजिक बदलाव के कारण एवं माध्यम दोनों ही बन रहे हैं। काव्य एवं नाट्य विधाएँ सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रभावी रही हैं, जो अपने समय की आवाज बनकर उभरती रही हैं। दृश्य एवं श्रव्य तकनीक के उच्चीकरण के साथ मूल नाट्य विधा प्रायः हाशिए पर जाती हुई लगी, किंतु अपनी शास्त्रीय बनावट के कारण इसे हाशिए पर लगा पाना किसी के लिए आज तक संभव नहीं हुआ। समय की नब्ज पकड़कर रखने वाले नाटककारों ने विषय, कथ्य, उद्देश्य को लेकर नए प्रयोग किए और सोचने पर मजबूर किया।

ऐसा एक बार फिर अनुभव हुआ जब प्रताप सहगल के नए नाटक ‘तीन गुमशुदा लोग’ के पाठ से गुजरना हुआ। अभी तक प्रताप सहगल के पारंपरिक विषयों को लेकर लिखे गए नाटकों को पढ़ने का अवसर मिला था। उनके ‘अन्वेषक’ एवं ‘बुल्लेशाह’ ने पारंपरिक विषयों का नाटक होने के बावजूद अपनी ठोस प्रस्तुति से बहुत प्रभावित किया था। ऐतिहासिक चरित्रों को संजीदगी से लेकर सहगल जी ने उनके साथ पूरा न्याय किया था। किंतु ‘तीन गुमशुदा लोग’ नाट्य कोलाज से गुजरते हुए दिल्ली जैसे महानगर की आपाधापी, अर्थसत्ता की मानसिकता, तज्जन्य नैराश्य और जीवन की वस्तुनिष्ठता का कसा हुआ विवेचन देखने को मिला। वस्तुतः यह किसी भी महानगर में होने वाली भागदौड़, अपने अस्तित्व की विस्मृति और उसका पुनर्शोध, अकेलेपन एवं महत्त्वाकांक्षाओं की मिली-जुली परिणति का कोलाज है।

‘तीन गुमशुदा लोग’ वस्तुतः उन तीन प्रकार के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो आज के परिवेश में किसी न किसी महत्त्वाकांक्षा, उधेड़बुन या आधुनिकताबोध की जद्दोजहद में जी रहे हैं। यह वर्तमान मानसिकता का एक सूक्ष्म अध्ययन है, जो इस काल को ठीक से प्रतिंिबंबित करता है। तीन कहानियों के कोलाज में पहली कहानी ‘जुगलबंदी’ है, जो महानगर के एक अनपढ़ व्यापारीनुमा प्रकाशक एवं एक उदीयमान लेखक की बेमेल युगलबंदी को लेकर चलती है। एकबारगी तो ऐसा भी लगता है कि यह लेखक एवं प्रकाशक की युगलबंदी न होकर सिर्फ एक प्रकाशक की अनपढ़ता और चालाकी की युगलबंदी है। वह प्रकाशन को एक व्यवसाय मात्र समझता है और पुस्तक को व्यापारिक ‘माल’ जैसा मानता है। रूप सिंह उन प्रकाशकों का प्रतिनिधि है जो अपनी जुगाड़बुद्धि से पुस्तकांे का शीलहरण करते हैं और नवोदित लेखकों को प्रसिद्धि का सब्जबाग दिखाकर शोषण करते हैं।

रूपसिंह की दृष्टि में शराब और शबाब जीवन के वे जरूरी तत्त्व हैं, जिनकी मदद से सारे काम निकाले जा सकते हैं। ऐसा लगता है कि जीवन के सारे गुर रूपसिंह को ज्ञात हैं और वह किसी को भी अपने साधनों के सहारे साध लेने में सक्षम है। नाटक का पहला दृश्य एक कोठे पर खुलता है, जहाँ हमारा परिचय रूपसिंह और लेखक मनीष से होता है। वह चाहता है कि मनीष कुछ ऐसे शौक पाले जिससे उसका फायदा उठाया जा सके। रूपंिसंह का स्पष्ट मानना है कि बिना शराब पिए और कोठे पर गए कोई सफल लेखक हो ही नहीं सकता। इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि आज के लेखकों में यह विशिष्टता प्रायः पाई जाती है।

रूपसिंह की लंपटता, वाचालता, चमचेपन और कामनिकालू स्वभाव को देखकर कभी-कभी घिन-सी होने लगती है तथा स्पष्ट होने लगता है कि आज पुस्तकों का संसार इतना मैला क्यों हो रहा है। मजे की बात यह है कि प्रकाशन के धंधे में रूपसिंह जैसे न जाने कितने अनपढ़, अज्ञानी और लुटेरी मानसिकता के लोग घुस आए हैं जो ठीक उच्चारण तक नहीं कर सकते। उसकी अज्ञता को दिखाने के लिए प्रताप सहगल ने एकदम बाजारू भाषा का प्रयोग किया है जिसका रूपसिंह के किरदार को यथावत दिखाने में अद्भुत योगदान है। प्रकाशक को परकासक, शुरू को सुरू या फिर परेसानी, सबद जैसे उच्चारण बता देते हैं कि प्रकाशन की दुनिया में आज कैसे लोगों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।

किंतु इस कोलाज की सबसे सशक्त, प्रभावी और ध्यानाकर्षक कड़ी की बात की जाए तो वह है दूसरी कहानी ‘क्रॉस रोड्स’। आत्महत्या की मनःस्थिति का विशद विश्लेषण करती हुई यह कहानी पाठक या दर्शक को बहुत दूर तक ले जाती है। कहानी से गुजरते हुए एक अत्यंत गंभीर, दार्शनिक और उन्मीलक विमर्श से गुजरना होता है, जिसमें मिस्टर वेंकटरमण की आत्महत्या की गुत्थी को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तरीके से सुलझाने की कोशिश की गई है। वस्तुतः यह हताश-निराश मनुष्य के मन की परतों को अलग-अलग ढंग से खुरचने का प्रयास है। 

अरुण, संजना, अमरनाथ और श्याम मोहन के माध्यम से आत्मघाती व्यक्ति की मानसिकता को पढ़ने की जो कोशिश की गई है, उसमें बहुत से निष्कर्ष भी सामने आते हैं। वस्तुतः आत्महत्या करने वाला व्यक्ति प्रायः बुद्धिजीवी होता है और न जाने कितनी वैचारिक जटिलताओं का शिकार होता है। इस नाटक में भी वेंकटरमण किसी कॉलेज के अंगरेजी विभाग में प्राध्यापक है, जो स्वयं में 

बौद्धिकता का प्रतीक है। सामान्यतः आत्महत्या का विरोध करने वाला वेंकटरमण स्वयं आत्महत्या कर लेता है। वह अपने आसपास के दबाव, पसंद-नापसंद को झेल नहीं पाता। हालाँकि कहानी में आत्महत्या के कारणों का रहस्योद्घाटन नहीं हो पाता, किंतु उस मानसिकता के अनेक पहलुआंे से साक्षात्कार जरूर होता है।

सही कहा जाए तो यह कहानी आत्महत्या पर चलाया गया एक बौद्धिक और मनोवैज्ञानिक विमर्श है, जो अंततः संकेत देता है कि आत्महत्या किसी भी संकट का परिहार नहीं है। लेखक अपने मतों को सुदृढ़ करने के लिए नाटक के चरित्र तमाम वैश्विक मनोवेत्ताओं के शोध एवं निष्कर्ष को दिखाता हुआ चलता है। दरअसल, यह एक बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक चेतना की पटकथा है, जिसे पढ़ने-देखने-झेलने के लिए अत्यंत गंभीर किस्म के व्यक्ति की जरूरत है। ऐसा नहीं लगता कि पहली कहानी ‘जुगलबंदी’ का दर्शक-पाठक ‘क्रास रोड्स’ को आत्मसात कर पाएगा। हाँ, क्रास रोड्स का दर्शक पहली कहानी का आनंद जरूर ले पाएगा। जहाँ पहले नाटक की निचली परत में व्यंजना है, विसंगति है और किंचित हास्य है, वहीं दूसरी कहानी में बौद्धिक बल, सहानुभूति, किंचित निराशा या त्रासद स्थिति का बोध है। 

इस नाटक के संवाद में भी लेखक ने काफी सतर्कता एवं संवेदनशीलता बरती है। क्योंकि विषयवस्तु अत्यंत गंभीर है, विमर्श की माँग करती है, इसलिए इसकी भाषा बौद्धिक है तथा अंगरेजी शब्दों एवं वाक्यों का प्रयोग बहुतायत है। नाटक के लगभग सभी पात्र उच्च शिक्षित एवं उच्च पदस्थ हैं। कॉलेज से जुड़े होने के कारण उनकी भाषा आज के महानगरीय उच्चवर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। रेखांकित करने वाली बात यह भी है कि जगह-जगह लेखक तमाम निष्कर्ष देता जाता है जिनमें से कुछ वाक्य सूत्रवाक्य बन जाते हैं। उदाहरणार्थ, अरुण कहता है- “शरीर निष्क्रिय हो तो मन अतिरिक्त रूप से निष्क्रिय हो जाता है।” आगे वह एक जगह कहता है- “शायद आत्महत्या कायरता का शिखर बिंदु है।” संदेह नहीं कि ऐसे वाक्य मनःस्थिति एवं समाज का गहन अध्ययन करके लिखे गए हैं। अच्छी बातें भी बहुत हैं संवादों में। अब यही बानगी देखी जाए- ”जीने के बहुत कारण हैं मेरे पास। मरने के लिए उनसे बड़ा कारण होना चाहिए।“ सच तो यह है कि इतनी गंभीर प्रासंगिक स्थिति का विश्लेषण करने वाली रचना में इतना कुछ तत्त्व तो मिलना ही चाहिए।

तीसरा नाटक भी दूसरे की भाँति आज के महानगरीय समाज में संबंधों के बीच प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन, जीवन की आपाधापी एवं इन्हीं के बीच अपना अस्तित्व तलाशने एवं बचाए रखने की जद्दोजहद है। किस प्रकार आज का युवावर्ग, मझली पीढ़ी एक साथ खुली और बंद दोनो है, यह नाट्य कोलाज की तीसरी कड़ी ‘मछली मछली कितना पानी’ में देखने में मिल जाता है। एकाध बार तो ऐसा लगता है कि यह भी ‘क्रास रोड्स’ का एक दूसरा रूप है, किंतु थीम और प्रस्तुति में थोड़ा ढलान की ओर। मानवीय 

संबंधों के द्वैत में अद्वैत हो जाना एक आदर्श स्थिति हो सकती है, किंतु यहाँ ऐसा लगता है कि आज के दंपती द्वैत एवं 

अद्वैत दोनों से ही बचना चाहते हैं। अपने प्रेम संबंधों में वे अद्वैत दिखना तो चाहते हैं, किंतु अपने द्वैत को, यानी अलग अस्तित्व और ईगो को बचाए रखना चाहते हैं। 

कथा नायिका प्रिया और नायक मनोहर दोनों ही बौद्धिक समाज के व्यक्ति हैं। दोनों ही अखबार से जुड़े हैं। मीडिया की कार्यपद्धति, खोखले एवं चोचलेपन को वे नजदीक से देखना चाहते हैं। प्रिया बौद्धिक होने के साथ अनिंद्य सुंदरी भी है, जिसकी सुंदरता की गहरी मोहर हर देखने वाले के दिल पर लग जाती है। संभवतः इसी कारण मनोहर से उसका विवाह भी हुआ है। प्रिया के माता-पिता का दामाद के रूप में मनोहर को स्वीकार न कर पाना आज भी उसी मानसिकता को दिखाता है जो भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही है। पुत्री के दांपत्य जीवन में उनका दखल गाहे-बगाहे चलता रहता है, जो मनोहर के लिए सिरदर्द-सा बन जाता है। नैरेटर के बहाने या फिर संवादों के बहाने पति-पत्नी में कहीं होड़ तो कहीं अहंकार की बानगी दिखती जाती है।

धीरे-धीरे वही होता है जो आज के तथाकथित विकसित समाज में मिल रहा है। विडंबना तो यह है कि प्रेम के नाम पर अपनी पसंद के प्रेम विवाह में दरारें आ रही हैं। स्वतंत्रता स्वच्छंदता में बदल रही है। मनोहर प्रिया की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, बिस्तर में भी। प्रिया की इस धारणा का संकेत हमें मनोहर से ही मिलता है। उसकी जापान की यात्रा बेहद सफल है, वह प्रसन्न होकर आती है। संकेत यह भी है कि जापान मंे डायरेक्टर से उसके संबंध भी बनते हैं और वह अपनी इस स्वच्छंदता को पूर्ण आजादी के रूप मंे परिभाषित करती है। मनोहर का यह कहना कि प्रिया जैसे चाहे रहे, बस उसे उसका हिस्सा मिलता रहे, आज के दांपत्य जीवन के क्षरण और गलन का जीवंत उदाहरण है।

तीसरी कहानी कुछ तेज चलती है। नाटक में दृश्य विभाजन नहीं है और फेडआउट-फेडइन तकनीक के सहारे इसे जोड़ा भी गया है और अलग भी किया गया है। हाँ, शायद कहानी की माँग होगी, विस्तारण एवं संवाद नैरेटर के हिस्से में कुछ ज्यादा ही पड़े हैं। संवादों के साथ न्याय किया गया है। तीनों कहानियों में गुमशुदा पात्र हैं उसके नायक। पहली में लेखक मनीष, दूसरी में मिस्टर वेंकटरमण और तीसरी में मनोहर। ये गुमशुदा व्यक्ति न होकर वे चरित्र और भाव हैं जो इस दौड़ते-भागते समाज में डूब रहे हैं। इतना कहा जा सकता है कि नाटककार ने जीवन को बहुत नजदीक से देखा और समझा है। दूसरी और तीसरी कहानी में समाज और व्यक्ति का जो बारीक और मजबूत ताना-बाना बुना गया है, वैसा पहली कहानी में नहीं है। यह भी हो सकता है कि बाद के दोनों नाटकों की विषयवस्तु के आगे विसंगतियों के भरपूर पैकेज के बावजूद ‘जुगलबंदी’ हल्की दिख रही हो। हाँ, इस कोलाज को मंचित होते देखना ज्यादा सुखद होगा।

पुस्तक का नाम: तीन गुमशुदा लोग / (कथा नाट्य कोलाज) / लेखक: प्रताप सहगल / प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन मुंबई / पृष्ठ: 81 / मूल्य: रु 200/- 

लेखक, प्रताप सहगल, दिल्ली, मो. 9810638563, 


समी.: श्री हरिशंकर राढ़ी, दिल्ली, मो. 9654030701

***********************************************************************************

समीक्षा

तरल कहानियों का चाक्षुक सुख: ‘मैनिकिन’


कहानियां चलती हैं, रुकती नहीं। रुकी हुई कहानियों की रूह मुरझा जाती है। सतत कहानी का करिश्मा कुछ अलग होता है। वह अपने साथ कुछ भी नहीं ढोता। हल्का सहज और सामान्य-सा चलने लगता है। कथानक में बोझ या भार उसे प्रश्नांकित नहीं करते। पात्रों - चरित्रों के आधार पर कहन-कला फैलती, बढ़ती जाती है और स्थितियां सिमटती-फैलती कहानी कह जाती हैं। यही गौरीशंकर रैणा की कथा-रचना का कमाल है। मैनिकिन और अन्य कहानियां चलती हैं, महसूस करवाती हुई। बढ़ती हैं अपना स्पर्श देकर और संवेदना एक विरामबिन्दु पर मानो ‘स्टिल’ में तबदील हो जाती हैं।

चाक्षुक सुख का एहसास करवाती कहानी को आप पढ़ेंगे तो एक-एक डिटेल, किरदार को मूर्त करने लगती है। कथानक में जहां और जब भावना जगती है, नए सिरे से सवाल पैदा कर जाती है। स्थितियां पात्र को नचाती नहीं, नैरेटर ‘रचाव’ में उनका आनंद लेने लगता है। एक-एक हरकत, जिज्ञासा के साथ आशा के कपाट खोलती है कि बोलती- बतियाती कहानी आप में समा रही होती है। स्थिति से आगे इसलिए गौरीशंकर रैणा मुझे गति के कद्दावर कथाकार लगने लगते हैं। स्थूल से सूक्ष्म की ओर प्रयाण करती हैं मैनिकिन की कहानियां।

किसी कवि-कथाकार की कहानी को आपने जरूर पढ़ा होगा। कभी कथाकार-कवि की रचना को कहानी के रूप में महसूस किया होगा। भाषा का एक मुलायम- मखमली परिवेश जो वहां मिलता है, उससे कुछ अलग और आगे, ये ‘मैनिकिन’ की कहानियां हमें दे रही हैं। एक नाटककार-डायरेक्टर- प्रोडयूसर जब ‘कथा’ को डील करता है तो हिदायतें भी बयान को मूर्त कर जाती हैं। नाट्य - कर्मी कथाकार का अनुभव-संसार उसके भोगे - झेले भर को ही यहां नहीं दिखा रहा, देश-काल को भी समझा रहा है। शब्दों से अलग क्रिया-प्रतिक्रिया के अंदाज में यहां कहानी को बुना और तराशा जा रहा है।

“विदोद कुमार को याद आया कि उसे विंडो - शॉपिंग का काम सौंपा गया है। शीशों में खड़ी मैनिकिन को फिर से सजाना है। उसके बदन पर ज़री को कीमती साड़ी लिपटानी है। उसे एक दुल्हन की तरह संवारना है। फिर बाजार की एक तरफ खुलने वाली शो-विंडो में उसे बैठाना है। मूक, किंतु सुंदर, आकर्षित करने वाली, मगर बेजान (पृ. 8) इसी कथा में आए भोज्य पात्र, पानी का डिब्बा, ब्रीफकेस, सफेद चप्पल, नीली हरी लाइट, मानों सब कुछ ही ‘रूपमती साड़ी स्टोर’ का हिस्सा हो जाते हैं। “उसका दम घुट रहा था। उसे लगा कि अभी यह मैनिकिन एक साथ हंसेंगी या रोएंगी। इनकी गूंज बेसमेंट की दीवारें चीरती हुई आसमान तक जाएगी, बिल्डिंग ढह जाएगी, न्यूयार्क के टॉवर की तरह सब उसके नीचे दब जाएंगे - मैनिकिन, वर्कर, मालिक, नौकर, राहगीर, कार वाले, विनोद सभी।” (पृ. 12)

और यह कथा प्रवाह जहां सम्पन्न होने को है, उससे पहले का बयान - “मैं आज पुतलियां देखकर आया हूँ। मैंने उनकी आवाजें सुनीं, जैसे दर्द से वे तड़पती थीं वैसे ही यह भी तड़पती है। अब इस अंधकूप से निकलना चाहिए इसे। यह वहीं खुश रहेगी। पुतलियों के देश में। यहां कितने ही कष्ट सहे हैं इसने। पहले घर से बेघर हुई, फिर जम्मू में इसकी टांग टूट गई, उसके बाद बायपास सर्जरी, फिर ट्यूमर, नरक की पीड़ा क्या इससे ज़्यादा होगी? नहीं, हम बेकार ही इतने तामझाम में लगे हुए हैं। मरे हुओं को ज़िंदा रखने के लिए। (पृ. 15 मैनिकिन) जी हां, हम यों ही मृतकों को जीवित रखने के यत्न में छटपटाते, संघर्ष में लगे रहते हैं। विनोद की पत्नी, मैनिकिन, नियति और मानव स्वभाव! समाज की इसी संवदेना का नाम मैनिकिन हो सकता है।

गौरीशंकर रैणा ने जम्मू-कश्मीर की त्रासदी को झेला है। आतंक के साए में क्या-क्या नहीं हो रहा। इसी मानसिकता से निकली स्थितियों को रचनाकार ने कहानियों में जो ट्रीटमेंट दिया है, बड़े फलक पर खुलता और बोलता चला आया है। हिंदू-मुसलमान और भारतीयता को लेकर भी इस संग्रह की कहानियां याद की जाएंगी। साम्प्रदायिक- सौहार्द, भाईचारा, ‘दर्जी और पंडित जी’, कफ़न सीने का पुण्य और बहिष्कृत होता व्यवहार, यह सब गौरीशंकर रैणा को बड़े कथाकारों की पंक्ति में ला बिठाता है। महजबीन, कादिर की दुल्हन, वसंत बाग का उसका घर और रुढ़ियां, पुण्य कहानी जैसी सरलता हमें कम भारतीय कथाओं में मिलती है। स्निग्ध और तरल संबंधों का जीवन ही कुछ दूसरा होता कल्पनाशीलता को विस्तार देकर यथार्थ गढ़ना गौरीशंकर रैणा की दूसरी बड़ी प्रवृत्ति है। इस तरह समाज, देश या परिवार ही नहीं, तनाव या स्थिरता के प्रतिमान भी सामने आये हैं। एक स्तर पर कथानक में एक्शन विस्तार पाता है तो सक्रियता बनाए हुए स्थितियां गतिमय हो जाती हैं। चलना, घूमना या टहलना भर नहीं, कथा में आवाजाही पाठक को बांधे रखती है। उत्सुक्ता के अंश, आगे और आगे, खोजते- तलाशते, बढ़ते और नयापन गढ़ जाते हैं।

कहानी ‘गमज़दा’ हो या ‘हाइवे’, ‘लौटते हुए’ हो अथवा ‘यू-टर्न’, गोरीशंकर रैणा ने कथ्य में नवीनता को गूंथा है। प्रमुख पात्रों के चरित्र के साथ न्याय किया है। जिस संभ्रात का हिस्सा हम हैं, वहीं आस पास से आदर्श और यथार्थ की होड़ में, महज़ सहज ‘बात’ कह जाना, रचनाकार की प्रतिभा की सम्पन्नता कही जाएगी।

‘बोर्डिंग पास’ जैसी कहानियों का वातावरण प्रायः विदेशी भाषाओं के साहित्य में पढ़ने को मिलता है। ‘निजता’ के स्तर पर, अपने देश या फिर परदेस की स्थिति का चित्रांकन, मां, बाप, नायिका अथवा नायक के चरित्र - स्वरुप को भी उजागर कर रहा है - “बाहर खड़े पोर्टर फुसफुसा रहे थे कि कितने खुशकिस्मत हैं, ये फिल्मी लोग, और वे हैं जो जिंदगी भर सामान ही ढोते रहते हैं और फिर किसी दिन थक हारकर दम तोड़ देते हैं। (पृ. 57) ऐसी विसंगतियां, दर्शन के स्तर पर, गौरीशंकर रैणा की कहानियों में कई जगह ‘पहचानी’ जा सकती है - “वह अकेली है, बहुत अकेली उसकी जिंदगी में बहुत से ऑटोग्राफ लेने वाले हैं, न जाने कितने प्रशंसक हैं, कई प्रोडयूसर हैं, जो उसके पीछे - पीछे चलते हैं। कई एक्सप्लाइटर्स हैं जो उसकी सुंदरता को बेचते हैं, कई डायरेक्टर्स हैं, मगर उसका अपना कोई नहीं।” (पृ. 61, बोर्डिंग पास)। ‘आर यू आलसो लाइक दैम?’ यों भरोसे की कहानी है ‘बोर्डिंग-पास’, जहां पहचान- परख - प्यार परवान चढ़ सकते हैं।

गौरीशंकर रैणा की कहानियों ने हिंदी की श्रेष्ठ पत्रिकाओं में समय-समय पर स्थान पाया और पाठकों को बांधा, खींचा है। रैणा अधिक कहानियां लिखने वाले कथाकारों से अलग, नयी ज़मीन पर किसी ताज़ा कथानक को पकाकर ही हमारे सामने लाए हैं। शायद इसलिए अंग्रेज़ी, पंजाबी या अन्य कुछ भारतीय भाषाओं में संपादकों ने भी गौरी शंकर की कथा प्रतिभा को “वीज़ा’’ प्रदान किया है। कश्मीरी, उर्दू के अतिरिक्त गौरी शंकर रैणा की कहानियां अन्य भाषाओं में इसलिए भी जा सकती हैं कि इनमें टी. वी. पर चलते नाटकों-सा रूपांतर पाया जाता है। फिल्मी स्थितियों-सा गतिमय परिवेश, सक्रियता, इनके कथानक सौंपते चलते हैं।

किताब घर प्रकाशन ने गौरी शंकर रैणा की श्रेष्ठ कहानियों को ‘‘मैनिकिन’’ शीर्षक से छाप कर हिंदी पाठक की ज़रूरत को भी पूरा किया है। आज जम्मू-प्रदेश पर कश्मीर के माहौल पर, बहुत कम सक्रिय रचनाकार हिंदी में कहानी कह रहे हैं। राजनैतिक, सामाजिक या आर्थिक मंच पर प्रायरू जम्मू-कश्मीर चर्चा में है। सौहार्द, सहिष्णुता और सहृदयता की भावना जगाने, इसे बनाए रखने की भी बहुत ज़रूरत है। पलायन करके आए परिवार पीछे बहुत कुछ छोड़ कर आए लोग, स्मृतियों में गृहगंध तलाशते चेहरे, स्वप्नमयी संसार में ही नहीं, वास्तव में जुड़ना और जुड़े रहना चाहते हैं। गौरीशंकर रैणा की इन दसों कहानियों की तरह एक श्रृंख्ला यहां भी भाईचारे की, मैत्री व अंतरंगता की, प्रस्तुत कहानियां उभारती हैं।

तेरह नवम्बर सीट, मोम की मरियम, यू-टर्न या ऐसी अन्य कहानियों में रैणा जी का चाव, कसाव, तनाव, रचनात्मक स्तर पर प्रयोगधर्मी भी कहा जाता है। भाषा का इकहरापन व इसकी सरलता यहां पाठक का संबल बनती है। हिन्दी-उर्दू या मुहावरे की भाषा में इसे चरित्रनुकूल पहचाना और पढ़ा जाना चाहिए। प्रकाशक का भी एक अलग और बेहतर कथा संग्रह देने पर बधाई। यों चाक्षुक सुख की तरलता में ये ताज़ी कहानियां पाठकों को संतुष्ट - सम्पन्न भी करती हैं।

समीक्षक: डॉ. फूलचन्द मानव, ढकौली जीरकपुर, मो. 9646879890

लेखक: डॉ. गौरीशंकर रैणा, नोएडा, मो. 9810479810

***********************************************************************************

चर्चा के बहाने 

रेनू यादव

फेकल्टी असोसिएट

भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग

 गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, 

यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर, 

ग्रेटर नोएडा दृ 201 312

ई-मेल- तमदनलंकंअ0584/हउंपसण्बवउ



पुस्तक - समय का अकेला चेहरा 

लेखक - नरेन्द्र पुण्डरीक

विधा - काव्य

संस्करण - प्रथम, 2021

प्रकाशन - लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली


आदमी की आदमीयत को बचाने की माँग करता 

‘समय  का अकेला चेहरा’

व्यक्ति समय के अनुसार निर्णय लेता है, बदलता है अथवा समय का हिस्सा बन जाता है। किंतु समय को चुनौती समय ही देता है और अपना पुराना चोला उतार कर नया पहनता है तथा समस्त संसार उसी चोले का आलंबन लेकर अपने को पुरातन या आधुनिक कहने लगता है। नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताओं में आधुनिक बार-बार पुरातन को चुनौती देता हुआ दिखाई देता है। आधुनिक समय भूत भविष्य की गलियों में एक साथ आवाजाही करते हुए वर्तमान में लौट-लौट कर समय का कड़वा सत्य, अंतर्द्वन्द्व, पीड़ा, संत्रास, बुर्जुआ एवं सर्वहारा वर्ग तथा जाति-धर्म-संप्रदाय में भेद-विभेद, राजनीति का दोहरा चेहरा, मानव से प्रेम करने की ललक और आदमी की आदमीयत को बचा लेने की चाहत को अभिव्यक्त करता है। 

कवि उन रचनाकारों में से हैं जिन्होंने जाति-धर्म-संप्रदाय को दृढ़ता से खारिज करते हुए आम आदमी के साथ खड़े रहने को अपना मानवीय-धर्म एवं कवि-कर्म समझते हैं। आदमी को आदमी न कहना वोट बैंक की राजनीति हो सकती है, जाति की राजनीति हो सकती है, विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों को अलग-अलग खाँचे में बाँटने की साजिश हो सकती है, पर कवि की मजबूरी नहीं हो सकती। ‘अब तक जितनी दुनिया बनी थी- 1’, ‘हमेशा एक स्त्री की मार में - 2’, ‘जो एक कवि में बची हुई है - 3’, ‘गाँव में मुसलमानों की कोई मस्जिद नहीं थी - 4’, ‘जिनके जीवन की कोई कथा नहीं होती - 5’, ‘यह दुनियाँ अच्छी कैसे बनती है - 6’ छः भागों में विभाजित काव्य-संग्रह ‘समय का अकेला चेहरा’ आदमी की आदमीयत का चेहरा है जो भारतीय संस्कृति, मूल्य एवं परंपरा के दोहरे मापदंड़ों के बीच परिवार, समाज, राजनीति से सीधे संवाद करती है।

कभी संत कवि कुंभनदास ने कहा था -“संतन को कहां सीकरी सों काम ? / आवत जात पनहिया टूटी, बिसरी गयो हरि नाम। / जिनको मुख देखे दुःख उपजत, तिनको करिबे परि सलाम” 

यह पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं। राजनीति से संचालित बुर्जुआ वर्ग के पंजों में फँसा आम आदमी उन्हें सलाम ठोकने के लिए विवश है तथा इसमें न तो कोई संकोच है और न ही प्रश्न कि सलाम क्यों ठोकना पड़ेगा? कवि “आदमी की भाषा का / टोपी और चोटी से क्या मतलब” कहते हुए वे आदमी के सारे स्वार्थपूर्ण प्रवंचनाओं को रेखांकित करते हैं। धन और सत्ता के मद में इंसानों को छोटा समझना, वोट की राजनीति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर आदमी आदमी में फर्क तथा चोटों और घावों को क्षेपक बताकर उस पर नए घाव करके अपनी स्वार्थ सिद्ध करना आदि राजनीति के स्वार्थी हथकंडों को सामने ले आते हुए इस देश की विडंबना पर चिंता व्यक्त करते हैं, जहाँ मानवीय धर्म से परे दिखावे और छलावे की राजनीति अधिक है। “जब गांधी महज गांधी / होकर रह गये थे और / कपड़ा जवाहर लाल हो गया था”  या “जैसे श्रीमान् जी के कपड़ों से / श्रीमान् जी की नहीं / अडानी-अम्बानी की गंध आती है” पंक्तियों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि यह दिखावा कर्म से अधिक जुमलेबाजी और परिधानों पर आकर टिक जाती है और स्टेट्स में बदल जाती है। आम आदमी और पूँजीपतियों के परिधान मात्र एक प्रतीक है, सच तो यह है कि जीवन-शैली से लेकर सोच-विचार की खाई दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। जिसके प्रति कवि चिंतित दिखाई देते हैं और बार-बार धुमिल की स्मृति दिला जाते हैं।  

कवि सत्ता की राजनीति, सत्ता के लिए राजनीति और सत्ता को देखते हुए राजनीति के बीच पिस रहे लोकतंत्र में आम आदमी को सचेत करते हुए जाति, धर्म, संप्रदाय के विरोध में खड़े नजर आते हैं। आज राजनीति अपनी सकारात्मक छवि खोकर जाति-धर्म-संप्रदाय की राजनीति हो गई है। वे कहते हैं कि भारतीय समाज की जड़ों में पैठी जातिवाद का विष मात्र सामाजिक व्यवहार में ही नहीं बल्कि शिक्षा-तंत्र को भी विषैला बना दिया है जिसमें “सबके चेहरे एक जैसे होते हुए भी / उन्हें उसमें सबके खून के रंग / अलग अलग दिखाई देते थे” अथवा “कैसे एक रंग के भीतर / आदमी के मन की तरह / कई तरह के रंग छिपे होते हैं”। बदलते समय में सत्ता की राजनीति पर ‘कोई इस देश का हिन्दू पहले इतना हिन्दू नहीं था आदमी था’ कटाक्ष करते हुए नजर आते हैं और भारत को एक सर्वधर्म-समभाव के रास्ते पर पुनः खड़ा देखना चाहते हैं। साथ ही कवि सत्ताधारियों को भी इस सत्य से आगाह करने से नहीं चूकतें कि जनता जिसे कुर्सी पर बैठाती है तो कुर्सी छीन भी सकती है - “इस देश का लोकतंत्र / गौरेया चिड़िया की तरह है / जिसका सीधापन सबको अच्छा लगता है / लेकिन जब कोई सत्ता के मद में / उसके पंख नोचकर उसे रूंड करता है / तो उसे कोई बचाने के लिए नहीं खड़ा होता”। 

राजनीति मात्र आम जनता की मानसिकता को ही संचालित नहीं करता बल्कि भूख में जलती रोटी की गिनती को भी नियंत्रित करता है, जिससे आदमी के पास भूख से अलग सपने देखने का समय न हो। ‘किस बूते अपनी धरती पर टिकते’ कविता में भूख और सपनों से मिला-जुला मन फाँसी पर लटकने की चाह और उस चाह से बाहर निकलने के संघर्ष को बयाँ करते हुए कवि नानी दादी की कहानियों से लेकर बाजारवाद की सच्चाई से रूबरू करवाते हैं। 

इस संग्रह में लोकतंत्र में राजनीति के बाद दूसरा प्रमुख मुद्दा है - सदियों से चली आ रही वर्चस्वादी सत्ता की राजनीति में हाशिए पर खड़ी स्त्री। कवि की स्त्री सामान्यतः रिश्तों में बंधी माँ, पत्नी, बुआ और एक सामान्य स्त्री के रूप में सामने आती है। माँ पिता द्वारा अधिकृत लालटेन को फख्र से उठाने वाली या बच्चों की इच्छाओं में सर्वस्व निछावर कर अपने सपनों को परिवार में विलीन कर देती है। किंतु जब वे पत्नी के साहचर्य के रूप में स्वयं को देखते हैं तब उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं को सहज अपने में समाहित कर उसकी वर्जित इच्छाओं की अभिव्यक्ति का आलम्बन बन (पैर दबाना, रसोई घर में सहायता करना, उसकी बातों को ध्यान से सुनना) निर्धारित मर्दवादी मापदंड़ों को तोड़ते हुए दृष्टिगत होते हैं। दूसरी तरफ हाशिए पर खड़ी स्त्री जो दरवाजे पर बँधी गाय के रूप में सदियों से अपनी मुक्ति की राह देख रही है और “बुआएँ गाँव का ऐसा अखबार थीं / जिसकी इबारत पढ़ने का साहस / अभी समय ने अर्जित नहीं किया था” के माध्यम से विधवाओं की पीड़ा और संत्रास से अपरिचित दुनियाँ मात्र उन्हें सूचना साँझा करने का माध्यम समझती है, के उतार-चढ़ाव को अत्यंत बारीकी से प्रस्तुत करते हैं। साथ ही वे बताते हैं कि वर्चस्ववादी मानसिकता के कारण हमेशा एक स्त्री की प्रताड़ना में दूसरी स्त्री उसे बचाने के बजाय उसकी प्रताड़ना में सहभागी बन जाती है, जबकि जाति-धर्म की लड़ाई में पुरूष अपनी जाति के साथ खड़े दिखाई देते हैं। कवि अपनी कविताओं में स्त्रियों के अलग-अलग रूपों एवं स्वभाव पर प्रकाश डालते हैं - जैसे कि आज्ञाकारी, सहनशील, मुखर और आधुनिक समय में मापदंड़ों को तोड़ने वाली स्त्रियाँ। ‘मैंने पद्मावती को नहीं देखा’ कविता में परम्परा और संस्कारों का श्रृंगार करने वाली पद्मावतियों पर कटाक्ष करते हुए कवि विद्रोह को अपने अंदर ज़ज्ब कर जीने वाली स्त्रियों के लिए लिखते हैं- 

“हालाँकि इस देश में ज्यादातर 

औरतों की देह में आग नहीं होती 

न चीखों में होते हैं शब्द” 

कवि के अनुसार पद्मावती की भाँति इस देश में सभी औरतों के अपने-अपने अँधेरे हैं, कुएँ, नदियाँ, पोखर, चूल्हे, बटलोई आदि है जिसमें वे जीने के लिए विवश हैं। किंतु इस कविता की आखिरी पंक्ति पूरी कविता का भावबोध बदल देती है। पद्मावती का मुक्ति के लिए अलाउद्दीन का आना अथवा अपनी मुक्ति के लिए पद्मावती का अलाउद्दीन का इंतजार करना ऐतिहासिक आस्थागत विरोधाभास को दर्शाता है। किंतु इस विरोधाभास में वर्तमान समय की विसंगतियाँ जुड़ी हैं। कवि के अनुसार आज कल अलाउद्दीन जैसे लोगों को ही मुक्ति के लिए आवाज उठाते हुए देखा जा रहा है, जिसमें स्त्रियों की स्थिति ‘आसमान से गिरकर खजूर में लटकने’ जैसी होती है। दूसरी तरफ इस कविता में लीक से हटकर जीने वाली स्त्रियों का भी भाव हो सकता है, जो संस्कारों का चोला उतार फेंक अपने जीने के अर्थों को बदलते हुए अधिक बुरा और कुछ कम बुरा होने की स्थिति में कुछ कम बुरे के चयन को महत्त्व दे रही हैं अथवा सुविधाजनक वातावरण के लिए अलाउद्दीन जैसे लोगों को भी स्वीकार कर रही हैं।   

कवि स्त्रियों के अतिरिक्त जब पिता का वर्णन करते हैं तब वे कभी स्वयं को पिता के रूप में पाते हैं तो कभी पिता के स्नेहिल छवि में भावुक हो जाते हैं। माँ के साथ-साथ चलने वाले, समाज में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले, डायरी के पन्नों में भावनाओं को दबा कर रखने वाले तथा आवश्यकतानुसार सख्ती से फैसला लेने वाले और घर के इकलौते लालटेन पर कब्जा के माध्यम से वर्चस्ववादी सत्ता को दर्शाते हुए पिता को सुदृढ़, सशक्त एवं विशुद्ध स्नेहिल व्यवहार में समाज में अनिवार्य स्थान रखने वाले बेहद सरल छवि का वर्णन करते हैं। 

इस संग्रह के तीसरे खंड ‘जो एक कवि में बची हुई है’ में कवि कर्म को प्रकाश में ले आते हैं। कवि का मानना है कि एक कवि ही है जो समय के दुर्दान्तता का प्रतिरोध कर सकता है। यही उसकी ताकत है। ‘हर कहीं होता है थोड़ा-थोड़ा’, ‘इसी उजाले में’, ‘फिदा हुसैन’, ‘हल्के मामा’, ‘बाकी तो यह दिल्ली है’ आदि कविताएँ कवि की समय के प्रति अस्फुट प्रतिरोधी स्वर है। जबकि जाति, धर्म, सम्प्रदाय तथा राजनीति में इनका स्वर मुखरित हुआ है। 

अंततः एक समय ही है जो हर पल बदलते हुए सबसे अधिक बलशाली होता है। वह अपनी चेहरे पर पड़ती झुर्रियों को अपने में समेटे कभी बुढ़ा नहीं होता और अनंत कहानियों को अपने दामन में भरकर तटस्थ रहने का साहस करता है। कवि समय की मार में समय की उपयोगिता को दर्शाते हुए जीवन जीने की जीजिविषा में आदमीयत को बचाए रखने की माँग करते हैं, जो समय को भी जिन्दा रखेगा और खुद भी। कवि की दृष्टि में भारतीय संस्कृति में आधुनिक युग में यदि कुछ जीवित है तो समय है, वही द्रष्टा है, वही स्रष्टा है और वक्ता भी। द्रष्टा, स्रष्टा  और वक्ता को समझने के लिए यह काव्य-संग्रह पढ़ना जरूरी है। 

___________________________________________________________________________________

समाचार




गुजरात साहित्य अकादमी, गांधीनगर के अधीन, हिन्दी साहित्य अकादमीके वर्ष 2019 के लिए ‘श्रेष्ठ पुस्तक पारितोषिक’ से सम्मानित बहुभाषी लेखिका मल्लिका मुखर्जी (सेवानिवृत्त सीनियर ऑडिट ऑफिसर, कार्यालय, प्रिंसिपल डायरेक्टर ऑफ ऑडिट, गुजरात, अहमदाबाद)

रविवार 20 मार्च 2022 को अहमदाबाद के एच. के. हॉल में, गुजरात साहित्य अकादमी के अधीन, हिन्दीसाहित्य अकादमी के तत्वावधान में, अकादमी के अध्यक्ष आदरणीय पद्मश्री डॉ. विष्णु पंड्या जी की अध्यक्षता में, हिन्दी साहित्य के वर्ष 2018, 2019 तथा सिन्धी साहित्य के वर्ष 2019, 2020 के श्रेष्ठ पुस्तक पारितोषिक वितरण समारोह सम्पन्न हुआ। वर्ष 2019 के लिए हिन्दी में मौलिक गद्य लेखन की श्रेणी में मेरे हिन्दी चैट उपन्यास (सह लेखक- अश्विन मैकवान) “यू एंड मी...द अल्टिमेट ड्रीम ऑफ लव” का श्रेष्ठ पुस्तक पारितोषिक के लिए चयन हुआ था। समारोह में मुझे प्रशस्ति पत्र, ट्रॉफी और रुपये 7000/- की राशि से सम्मानित किया गया।

किशोरावस्था से ही लेखन में रुचि रही है, लेकिन वर्ष 1972 के अपने कॉलेज काल के सहाध्यायी/मित्र अश्विन मैकवान से सोशल मीडिया पर वर्ष 2018 में मिलना, फिर उनके साथ संवाद की नई शैली में आत्मकथात्मक उपन्यास लिखना मेरे जीवन की एक असाधारण घटना है। मैं इस पारितोषिक का सारा श्रेय मित्र अश्विन को देती हूँ। 24 जून 2020 को उन्होंने इस दुनिया से विदा ली। वे जहाँ भी हैं, मेरा संदेश उन तक पहुँचे।

समारोह में अकादमी के महामात्र आदरणीय डॉ. जयेन्द्र सिंह जादव तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री एवं हिन्दी साहित्य भारती के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष, आदरणीय डॉ. रवीन्द्र शुक्ल जी उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरुआत गुज़राती भजन “धूणी रे धखावी बेली अमे तारा नामनी...” से हुई। आदरणीय डॉ. जयेन्द्र सिंह जादव ने गुजरात साहित्य अकादमी की साहित्यिक गतिविधियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी, जिसमें अकादमी से प्रकाशित होने वाली पुस्तकें तथा गुजराती पत्रिका “शब्दसृष्टि” को ऑनलाइन उपलब्ध करवाने की बातें भी शामिल थीं। 

आदरणीय डॉ. विष्णु पंड्या जी का संभाषण भी हमेशा की तरह रोचक रहा। उन्होंने सभी विजेताओं को बधाई देते हुए अकादमी के आगामी कार्यक्रमों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अकादमी नई पीढ़ी के लेखकों को प्रोत्साहित करती है। अकादमी की नई बन रही पाँच मंजिला इमारत “झवेरचंद मेघाणी भवन” की जानकारी का सभी ने गर्मजोशी से स्वागत किया। आदरणीय डॉ. रवीन्द्र जी ने अपने प्रासंगिक प्रवचन में पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए कई महत्वपूर्ण विषयों पर बात की। साहित्य के प्रभाव के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘साहित्यकार को अपना पात्र विकसित करना चाहिए।’ कविता के लिए उन्होंने कहा, ‘जो कविता लिखी जाती है वह कविता होती ही नहीं। जो लिख जाती है, जिसका अवतरण होता है, वह कविता है।’ भारत की संस्कृति, भारतीय विचारधारा, भारतीय दर्शन को योजनाबद्ध तरीके से कैसे नष्ट किया गया, इस पर विस्तृत चर्चा में डॉ. रवीन्द्र जी ने कहा कि एक भारतीय के रूप में हमें भारतीय इतिहास से अवगत होना चाहिए।

समारोह के अन्य आकर्षण थे, गुजरात के जाने-माने कवि/गजलकार श्री हरद्वार गोस्वामी जी के गुजराती गजल संग्रह “लखचोरासी लागणी” का विमोचन तथा कवि सम्मेलन। गुजरात के सुप्रसिद्ध कवि गण 

आदरणीय विनोद जोशी, तुषार शुक्ल,राजेश व्यास ‘मिस्कीन’, काजल ओझा-वैद्य, रमेश चौहाण, रक्षा शुक्ल, प्रणव पंडया, अंकित त्रिवेदी को सुनना श्रोतागण के लिए एक आह्लादक अनुभव रहा, जिनमें प्रिय सखियाँ नीता व्यास, भावना भट्ट,संगीता, प्रीति ‘अज्ञात’ तथा स्मिता ध्रुव भी शामिल थीं। मौलिक गद्य लेखन की श्रेणी में ‘हस्ताक्षर’ वेब पत्रिका की संपादक/संस्थापक एवं‘कर्मभूमि’साहित्यिक संस्था की सह संस्थापक प्रीति ‘अज्ञात’ को उनकी पुस्तक ‘दोपहर की धूप’ के लिए तथा भावना भट्ट को उनके कविता संग्रह ‘कहाँ हो तुम’ के लिए सम्मानित किया गया। 

इस शानदार समारोह के आयोजन के लिए गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष आदरणीय पद्मश्री डॉ. विष्णु पंड्या जी, आदरणीय महामात्र डॉ. जयेन्द्र सिंह जादव जी तथा उनकी समस्त टीम का हृदयतल से धन्यवाद।

-मल्लिका मुखर्जी, अहमदाबाद, मो. 9712921614 

***********************************************************************************

प्रेस विज्ञप्ति

दामोदर खड़से को शताब्दी सम्मान प्रदान

इंदौर, मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति का वर्ष 2021 का ‘शताब्दी सम्मान’ मध्यप्रदेश के महामहिम राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल के करकमलों से साहित्यकार डॉ. दामोदर खड़से को एक विशेष समारोह में प्रदान किया गया। इस अवसर पर लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, सांसद श्री शंकर लालवानी, समिति के प्रधानमंत्री श्री सूर्य प्रकाश चतुर्वेदी, मप्र साहित्य अकादेमी के निदेशक विकास दवे, समिति के उपसभापति श्री सूर्यकांत नागर, वीणा के संपादक 

श्री राकेश शर्मा सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। 

डॉ. खड़से को यह सम्मान साहित्य के प्रति उनके समग्र योगदान के लिए दिया गया है।

***********************************************************************************

प्रेस विज्ञप्ति

श्री कौतुक के कविता संग्रह का 

लोकार्पण

शासकीय श्री अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय द्वारा 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर श्री सदाशिव के कविता संग्रह इस दौर से गुजरते हुए का लोकार्पण संपन्न हुआ विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पद्मश्री श्रीमती सुमित्रा महाजन जी ने विद्यालयों से आए विद्यार्थियों एवं साहित्यकारों को संबोधित करते हुए संग्रह की कविता का जिक्र किया इस अवसर पर मुख्य अतिथि सांसद शंकर लालवानी विशेष अतिथि श्री जयंत भिसे, अलाउद्दीन खा,संगीत अकादमी के निर्देशक, पद्मश्री भालू मोडे, श्री मंगलेश् व्यास, जिला शिक्षा अधिकारी, श्री अनिल भंडारी ने भी संबोधित किया प्रारंभ में दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों का स्वागत हुआ जिला पुस्तकालय की ग्रंथपाल श्रीमती लिली डाबर ने स्वागत उद्बोधन दिया, श्रीमती सुमित्रा महाजन, द्वारा, श्री कौतुक द्वारा पिता पर लिखी गई कविता, का वाचन किया,संस्था मातृभाषा उन्नयन संस्था के द्वारा नगर के विशिष्ट जनों का सम्मान किया गया कार्यक्रम का संचालन श्री हरेराम वाजपेई जी ने किया इस कार्यक्रम की सफलता पर श्रीमती सुमित्रा महाजन ने ग्रंथपाल लिली डाबर की सक्रियता की भूरी भूरी प्रशंसा की....

***********************************************************************************

प्रैस विज्ञप्ति


साहित्य अकादेमी का प्रवासी मंच कार्यक्रम

दिव्या माथुर ने प्रस्तुत कीं अपनी रचनाएँ

नई दिल्ली। 26 अप्रैल 2022; साहित्य अकादेमी के प्रतिष्ठित कार्यक्रम प्रवासी मंच में आज यूके से पधारी दिव्या माथुर ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। उनकी कहानी ‘2050’ अलका सिन्हा ने अपनी आवाज में प्रस्तुत की। कहानी की विषय-वस्तु अमेरिका में बच्चे पैदा करने के लिए ली जाने वाली अनुमति और उससे जुड़े विभिन्न यांत्रिक मुद्दों से भावनाओं को ठेस पहुँचने जैसे विषय पर आधारित थी। इस काल्पनिक कहानी में दर्शाया गया था कि आने वाले समय में कोई भी राष्ट्र अपने यहाँ बच्चा पैदा करने के लिए विदेशी दंपती का स्वास्थ्य, पैसा, घर और पति-पत्नी की आईक्यू ही सबसे महत्त्वपूर्ण होगी। कहानी का संदेश था कि आने वाले समय में किसी भी राष्ट्र का लक्ष्य होगा कि उनके देश में न कोई गरीब होगा न कोई बीमार और न कोई बेकार। इसके बाद उन्होंने अपने स्वरचित कुछ छोटी कविताएँ और ग़ज़लें प्रस्तुत कीं, जोकि एक स्त्री की मनोदशा पर बहुत संवेदनशील दृष्टि से लिखी गई थीं। ‘मेरी ख़ामोशी’ शीर्षक से अपनी कविता में उन्होंने खामोशी की तुलना गर्भाशय से की, जिसमें की एक झूठ पल रहा है। ‘दायरे’ कविता में उन्होंने एक स्त्री के यथास्थितिवादी जीवन का रूपक उस जानवर में प्रस्तुत किया जो बलवान होते हुए भी खास दायरे में चक्कर लगाता रहता है। उनके रचना-पाठ के बाद उपस्थित श्रोताओं अनिल जोशी, लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, अलका सिन्हा, नारायण कुमार, विज्ञान व्रत, रमा पांडेय, रेखा सेठी, साधना अग्रवाल, नरेश शांडिल्य आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में ओम निश्चल, बी.एल. गौड़,, जितेंद्र सोनी, बलराम अग्रवाल आदि अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित थे।

कार्यक्रम के आरंभ में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने दिव्या माथुर जी का स्वागत साहित्य अकादेमी की पुस्तकें भेंट करके किया। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी के संपादक (हिंदी) अनुपम तिवारी ने किया। 

-श्री अजय शर्मा सह-संपादक, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, मो. 9868228620

***********************************************************************************

प्रैस विज्ञप्ति


साहित्य अकादेमी में स्वच्छता पखवाड़े का समापन

स्वच्छता का महत्त्व विषय पर हुआ व्याख्यान

नई दिल्ली। 29 अप्रैल 2022; साहित्य अकादेमी द्वारा मनाए जा रहे स्वच्छता पखवाड़े का समापन ‘स्वच्छता का महत्त्व’ विषय पर प्रख्यात पत्रकार एवं लेखक अमरनाथ ‘अमर’ के व्याख्यान से हुआ। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संस्कृति में स्वच्छता हमेशा से जीवन का अभिन्न अंग रही है। जीवन से जुड़े हर पर्व और उत्सव की शुरुआत घर और आस-पास के परिवेश की स्वच्छता से ही होती थी। हमारी परंपरा में केवल बाहरी स्वच्छता ही नहीं बल्कि मन-मस्तिष्क की स्वच्छता के लिए भी अनेक क्रिया-कलाप शामिल थे। आगे उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने स्वच्छता की नई परिभाषा देते हुए, उसे पूरे देश में प्रचारित किया, जिसे देश के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छता मिशन के रूप में फिर से चर्चा में ला दिया है और अब देश की जनता में स्वच्छता के लिए एक महत्त्वपूर्ण जागृति और जागरूकता देखी जा सकती है। उन्होंने विभिन्न साहित्यकारों की पर्यावरण और स्वच्छता संबंधी कविताओं को सुनाते हुए कहा कि वर्तमान समय में कोरोना महामारी ने एक बार फिर स्वच्छता के महत्त्व को केंद्र में ला दिया है।

व्याख्यान के आरंभ में अमरनाथ अमर का स्वागत साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने अंगवस्त्रम् 

द्वारा किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में साहित्य अकादेमी द्वारा स्वच्छता पखवाड़े के दौरान दिल्ली कार्यालय एवं अन्य क्षेत्रीय कार्यालयों द्वारा किए गए विभिन्न आयोजनों की जानकारी देते हुए कहा कि इस दौरान अकादेमी के दिल्ली स्थित मुख्य कार्यालय में ‘पर्यावरण और साहित्य’ विषय पर परिसंवाद, परिसर की सफाई और वृक्षारोपण आदि कार्यक्रम किए गए। उन्होंने अकादेमी के सभी कर्मचारियों के सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि स्वच्छता की जरूरत निरंतर है और इसे हम सभी मिलकर ही प्राप्त कर सकेंगे। व्याख्यान में ललित कला अकादेमी तथा संगीत नाटक अकादेमी के अधिकारी और कर्मचारी भी उपस्थित थे।


***********************************************************************************

Popular posts from this blog

कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      

अभिनव इमरोज़ दिसंबर 2021 अंक

भारतीय साहित्य में अन्तर्निहित जीवन-मूल्य