साहित्य नंदिनी, जून 2022

 

समीक्षा

समीक्ष्य पुस्तक - उस महल की सरगोशियाँ (कहानी संग्रह)

समीक्षा आलेख - वर्तमान ज्वलंत विषयों के कारण और कारक




समीक्षक: सुश्री सुषमा मुनीन्द्र, रीवा रोड, सतना, मो, 08269895950

सुश्री नीलम कुलश्रेष्ठ

शोधपरक लेखन के लिये ख्यात नीलम कुलश्रेष्ठ के सद्यःप्रकाशित कहानी संग्रह ‘उस महल की सरगोशियाँ’ की शोधपरक बारह कहानियों में ऐसे ज्वलंत विषय और पाश की भांति बाँध लेने वाला प्रस्तुतीकरण है कि कहानियाँ पढ़ते हुये लगता है किसी सम्मोहन में चले गये हैं। कहानियों में गुजरात की सरजमीं का विस्तार है। वहाँ की आबोहवा, संस्कृति, घरेलू साज-सज्जा, आंचलिक भाषा, खास रसोई, नृत्य, गाान, वाद्य जिसमें वह लाठी की तरह लम्बी विशिष्ट बांसुरी प्रमुख है जिसमें लोक कलाकार मदिरा भरते हैं कि बजाते हुये चुस्कियाँ लेते रहें......... जैसा विषद, वास्तविक विवरण तो है ही, प्रस्तुतीकरण भी ऐसा है कि कथ्य का कोई कोण, आयाम, अभिमत, बिंदु ड्रॉप नहीं हुआ है। कहानियों में शिक्षा, चिकित्सा, सरोगेसी, सहजीवन, अपराध, मानव तस्करी, बलात्कार, भ्रष्ट कानून और व्यवस्था जैसे सार्वभौमिक विषय कारण और कारक के साथ उचित और उपयुक्त तरीके से रेखांकित हुये हैं। स्त्री संदर्भ की बात करें तो कहानी ‘उस महल की सरगोशियाँ’ की रानी-महारानियों से लेकर कहानी ‘एक फेफड़े वाली हंसा’ की हंसा तक आते-आते स्थितियाँ किसी सीमा तक बदली हैं पर धारणायें नहीं बदलीं। पितृसत्तात्मक समाज में आज भी स्त्रियों को सर्वश्रेष्ठ दिमाग मानने में आपत्ति की जाती है कि स्त्रियों को गृहणीनुमा रहना चाहिये। स्त्रियाँ पत्रकार, अधिकारी, चिकित्सक, शिक्षिका बहुत कुछ हैं पर उन्हें उनके पद से जोड़ कर कम, उस स्त्री की तरह अधिक देखा जाता है जिसका आखेट किया जा सके। उसके साथ दैहिक विलास सम्भव न हो तो मानसिक विलास तो किया ही जा सकता है। कहानी ‘साक्षात्कार’ के कन्सट्रक्शन कम्पनी के मालिक जोशी जी ने जंगल साफ करवा कर चालीस एकड़ के विस्तार में अनूठा कलात्मक संग्रहालय बनवाया है। कथा नायिका संग्रहालय पर लेख लिखने के लिये जोशी जी से अनुमति लेने आती है। जोशी जी उसे दूसरे दिन अपनी गाड़ी में संग्रहालय भेजने का वादा करते हैं। यह कहानी स्त्री पर पड़ते दबावों को बारीकी से व्यक्त करती है। पति से साथ चलने का आग्रह करती है तो जवाब मिलता है ‘‘मैं क्या फालतू बैठा हूँ। परसों हमारे ऑफिस में इन्सपैक्शन है। फिर अगले हफ्ते हम लोग बाहर जा रहे हैं।’’ अर्थात पति उसके काम को महत्वपूर्ण नहीं मानता। पति को साथ ले जाना चाहती है संज्ञान होने पर जोशी जी सूचित करते हैं गाड़ी बिगड़ जाने से वह संग्रहालय नहीं जा सकेगी। अर्थात जोशी जी को उसके साथ एकांत चाहिये। देसाई उसकी टेलीफोनिक वार्ता सुन कर अनुमान लगाता है किसी की गाड़ी में जाने की बात हो रही है अर्थात वह भ्रष्ट राह पर जा रही है। जोशी जी का संताप तो इतना प्रबल है कि उसे संग्रहालय न दिखाकर संग्रहालय के कुछ छायाचित्र मात्र उपलब्ध कराते हैं जिसके आधार पर वह उत्तम लेख तैयार कर लेती है लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की योग्यता, क्षमता, काम, प्रतिष्ठा को स्वीकार करने का रिवाज नहीं है। ‘‘यदि वे आगे बढ़ कर कुछ करना चाहती हैं तो उनका आत्मविश्वास तोड़ा जाता है। यदि अविवाहित हैं तो कहेंगे पिता या भाई से अपना काम करवा लिया होगा। विवाहित हैं तो कहेंगे पति के बूते उछल रही है। कुछ लोग अश्लील बातें करेंगे कि औरतों को सफल होने में कितनी देर लगती है ? जरा लटके-झटके मार दिये ........... (कहानी - ले देख)।’’ लटके-झटके मारने का प्रबंध देखिये ‘‘सी, दिस इज एन एनादर एक्स्ट्रा रूम एडजेसेंट टु माई ऑफिस (कहानी - हैवनली हेल)।’’ यह आचरण पुरुषों के उस मानसिक दिवालियेपन को सिद्ध करता है जो जोशी में ही नहीं कहानी ‘प्यार ........... इस शहर में’, के पुलिस कमिश्नर का भी है। वह प्रताड़ित कर ससुराल से निकाल दी गई मिनिमा से पूँछता है ‘‘उसने (पति ने) क्या तुम्हें छुआ था ? किस-विस किया ...........।’’ इन्सपैक्टर भी अप्रासंगिक पूँछता है ‘‘तुम दो महीने की शादी में कितनी रातों में उसकी पत्नी बनी थी ?’’ यही वे जतन हैं जो स्त्री के आत्मविशस को तोड़ कर उसे स्त्रीबोध से बाहर नहीं आने देते। इसीलिये अधिकाँश स्त्रियाँ चाहे राजघराने की हों या झोपड़े की परिवार, समाज, थाने, महिला संस्थाओं में शिकायत न कर उत्पीड़न सहते हुये बलहीन, एकाकी, तनावपूर्ण जीवन जीती रहती हैं। कहानी ‘उस महल ........’ की महारानी बताती है ‘‘मैं राजमहल में अकेली होती थी इसलिये उनकी (ओहदेदारों की) धमकी से डर जाती। सारी-सारी रात, सोते हुये बच्चों के सिर पर हाथ रख कर बैठी रहती थी।’’ इसी असुरक्षा से मिनिमा जूझती है। उसका केस समाज सेविका से होते हुये थाने, समाज कल्याण विभाग, पुलिस महिला सेल तक जाता है पर न्याय नहीं मिलता। वह हताश है ‘‘कुछ होना नहीं है तो समाज कल्याण विभाग और पुलिस महिला सेल क्यों बनाये गये हैं ?’’ सचमुच। परिवार, समाज, नारी निकेतन, बाल सुधार गृह, शैक्षणिक संस्थान हर कहीं हिंसा बढ़ रही है। न्याय गायब हो रहा है। शिक्षा का प्रतिशत बढ़ने के साथ लोगों में सभ्यता और सदाशयता बढ़नी चाहिये लेकिन विद्रूपता बढ़ रही है। कहानी ‘योग के पथ पर’ की प्राध्यापक सुनयना जिसके पेपर अन्तरराष्ट्रीय स्तर के जर्नल्स में वाहवाही समेटते थे, को प्रोफेसर पी.के. विदुषी नहीं सुंदर युवा स्त्री मानते हुये पहुँच बनाना चाहता है। सुनयना विरोध करती है। वह उसे अश्ली्ल एस.एम.एस. और वीडियो भेजता है। उसकी आपत्ति पर कहता है प्रूफ कैसे करोगी मैं एस.एम.एस. भेजता हूँ ? वह जेण्डर कमेटी के प्रमुख से शिकायत करती है। तमाम सबूतों के बावजूद कमेटी पी.के.को क्लीन चिट देती है कि आरोप सिद्ध होने से संस्थान को अपयश मिलेगा। कितना दुखद है जो सुनयना प्रबुद्ध दिमाग और समृद्ध नसीब लेकर जन्मी, जिसने श्रमपूर्वक भारतीय प्रबंधन संस्थान में पढ़ाई की, प्राध्यापक बनी, वह कमेटी के अन्याय पर त्यागपत्र देकर पति के साथ दूसरे शहर में जाकर अपनी कन्सल्टेशन फर्म शुरू करती है। लेकिन पी.के. के असहनीय व्यवहार और संस्थान के अन्याय ने उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ कर डाला है। अंततः मानसिक शांति पाने के लिये यह टॉप एकेडेमिक युगल ध्यान योग की ओर प्रवृत हो गुमनामी की गर्त में चला जाता है। जबकि कहानी ‘फतह’ की सामूहिक बलात्कार से पीड़ित जिग्ना सामाजिक और कानूनी लड़ाई लड़ती है। बारहवीं में उत्तम अंक प्राप्त करने वाली अभावग्रस्त दलित ग्रामीण जिग्ना शहर आकर निःशुल्क आदिवासी कन्या छात्रावास में रह कर शिक्षक बनने का प्रशिक्षण लेती है। कुछ धूर्त प्रशिक्षक उसके साथ अक्सर बलात्कार करते हुये वीडियो बनाते हैं कि जिग्ना भेद खोलेगी तो वीडियो वायरल कर देंगे। एक शुभचिंतक का अवलम्बन पाकर वह एफ.आई.आर. कराती है। दोषियों को आजीवन कारावास होता है। दिवांग सर की पत्नी इस फैसले पर तलाक ले लेती है कि ‘‘पच्चीस वर्ष की नाजुक उम्र में वह (पत्नी) क्यों ऐसे मुजरिम दिवांग का इंतजार करे जिसे आजीवन कारावास हुआ है और जो बलात्कारी है।(76)।’’ यह पत्नी का स्वार्थ नहीं साहस है। समाज और अदालत दुराचारी को सजा दे भी दे लेकिन परिवार वाले उसके बचाव का हर सम्भव प्रयास करते हैं। यदि दुराचारियों को पाठ पढ़ाना है तो दिवांग की पत्नी की तरह उनका पारिवारिक बाहिष्कार करना होगा। (आखिर मी टू तक आने में स्त्रियों को सदियाँ लगी हैं) स्त्रियों को मुख्य धारा में बने रहना है तो कहानी ‘ले देख’ की रुही की तरह चुनौती स्वीकार करनी होगी। इस कहानी में भी फोटो वायरल कर देने की धमकी है। कॉलेज की छात्रा रुही जब होटेल के अपने कमरे में कपड़े बदल रही थी सहपाठी नीरव पर्दे के बीच की झिरी से मोबाइल पर उसका टॉपलेस फोटो लेकर इस धमकी के साथ कि यदि वह उसके मनमुताबिक नहीं चलेगी तो वायरल कर देगा, रुही के मोबाइल पर भेजता है। रुही आक्रांत है। वायरल होने पर परिवार और समाज उसे गुनहगार समझेगा। तथ्य जानकर माँ उसे अवलम्बन देती है चूँकि तुम दोषी नहीं हो, तथ्य को मत छिपाओ। स्वीकार करो। माँ उसे यूनीवर्सिटी की फाइन आर्ट्स फैकेल्टी में लगी एग्जीबिशन दिखाने ले जाती है जहाँ एक छात्रा ने प्लास्टर ऑफ पेरिस के भिन्न-भिन्न आकार के सफेद वक्षों वाली मूर्तियाँ बना कर संदेश दिया है देह पुरुष की हो अथवा स्त्री की, लज्जित करने के लिये नहीं है। रुही क्लास में नीरव का छल बता देती है। वीडियो में पर्याप्त रुचि ले रहे विद्यार्थी सत्य जानकर नीरव की भर्सना करते हैं। स्त्रियों को यदि अपनी योग्यता, क्षमता का भरपूर उपयोग कर वर्चस्व को बचाये रखते हुये प्रतिस्पर्धा में बने रहना है तो ‘हैवनली हेल’ की कथा नायिका की तरह दृढ़ता लानी होगी। इस कहानी में पुरुष अहम् और स्त्री स्वाभिमान के बेहतरीन ब्योरे हैं। दोनों की वाकपटुता बुलंद है। कथा नायिका, उद्योगपति के सम्मुख दृढ़ता बल्कि हठ के साथ खड़ी है। उद्योगपति के पास अथाह है। कथा नायिका के पास गियर्स बनवाने जैसा छोटा उपक्रम है। वह उद्योगपति की कम्पनी को गियर्स सप्लाई करती है लेकिन उसकी कृपा से काम नहीं बढ़ाना चाहती। उद्योगपति ऐसा व्यूह रचता है कि हर कोई उसे गियर्स में प्रयुक्त होने वाला कच्चा माल देने से मना कर देता है। वह समझती है उद्योगपति के भय से उसे कच्चा माल नहीं दिया जा रहा है पर वह कोशिश जारी रखती है और सफल होती है। कहानी का शीर्षक ‘हैवनली हेल’ उपयुक्त है। प्राप्य का असंतोष, अप्राप्य का पछतावा मनुष्य की फितरत है। जो है उसे महत्व न दे कर जो नहीं है उसका क्षोभ करते हुये अपने हिस्से के स्वर्ग को नर्क बना कर आहत रहते हैं।

पुस्तक में स्त्रियों को दुःख, दर्द, दंश ही नहीं वे दुष्चक्र और पाखंड भी व्यक्त हुये हैं जिनमें स्त्रियाँ लिप्त रहती हैं। यहाँ तक कि रानियाँ भी भ्रष्ट तंत्र में साझेदारी करती थीं। ‘उस महल .......... की कथा नायिका रानियों के जीवन पर सर्वे करते हुये महारानी विभावरी से मिलती है। विभावरी अपने त्याग, गौरव और महानता की गाथा बताती हैं कि किस तरह अपने समृद्ध स्टेट, पति, बच्चों के होते हुये नेत्रहीन कर्नल (महाराज) से विवाह कर उनके स्टेट आई और दोनों स्टेट में आवाजाही कर कौशलपूर्वक दोहरा दायित्व निभाती रहीं। बाद में कथा नायिका को ज्ञात होता है ‘‘कर्नल साहब कुछ वर्ष बाद ही एक सुबह अपने कमरे में मृत पाये गये। कारण बताया गया था हार्ट अटैक हुआ लेकिन नजदीकी रिश्तेदारों का शक यही (विभावरी ने साजिश रची) था (168)। ’’इसी तरह ‘हैवनली हेल’ की कथा नायिका की हमदर्द तरला कन्स्ट्रक्सन की ओनर तरला, कथा नायिका को आश्वस्त करती है कहीं से कच्चे माल का प्रबंध कर अपने इण्डस्ट्रियल शेड में गियर्स तैयार करवा कर ठीक वक्त पर उद्योगपति को सप्लाई करा देगी। लेकिन तरला गुप्त रूप से दस गुने दाम पर उद्योगपति को गियर्स बेंचती है। इसी तरह कहानी ‘एक फेफड़े वाली हंस’ की हंसा गृहस्थ बंसी के साथ सौगन्धनामे (सहजीवन) में रहकर गाँव में रह रहे उसके पति-बच्चों के साथ अन्याय करती है। नीलम कुलश्रेष्ठ लिखती है ‘‘क्या स्त्री ही छल का शिकार बनती है ? तमाम स्त्रियाँ मनचाहे रईस पुरुषों से संबंध बना रही हैं क्योंकि उनके शौक आसमान छूने लगे हैं। कुछ समय बाद इन संबंधों (सह जीवन) के सबूत दिखा कर लाखों रुपये ऐंठना चाहती हैं ......... तब वकीलों ने मैत्री करार (फ्रेण्डशिप कान्ट्रैक्ट) के कान्ट्रैक्ट की युक्ति निकाली। फ्रेण्डशिप कान्ट्रैक्ट दिखा कर पुरुष कह सकते हैं यह अपनी मर्जी से मेरे पास आती थी (27)।’’ वैसे हंसा ने शौक पूरा करने के लिये बंसी के साथ सौगन्धनामा नहीं किया है। भाईयों से मिले जहाँ जाना हो चली जाये जैसे तिरस्कार के कारण ठेला लगाने वाले बंसी का अवलम्बन लेती है। मदिरापान के लिये बंसी हंसा के रजत आभूषण, वस्तुयें चुराता है पर वह चुप रहती है कि छोड़ न दे। अर्थात हंसा विवाहित स्त्रियों की तरह ही पुरुष (पति) की बदमाशियाँ और जालसाजी सहती है। अर्थात जो स्त्रियाँ विवाह को प्रपंच मान कर मुक्ति के नाम पर लिव इन रिलेशनशिप में रहती हैं वे भी पूरी तरह दबावमुक्त नहीं हैं। वस्तुतः कोई भी चलन, कोई भी व्यवस्था ऐसी नहीं है जहाँ बंधन न हों। यह कहानी कई-कई परतें खोलती है। स्तब्ध करती कहानी ‘गिनी पिग्स’ भी कई परतें खोलती हैं। कुछ ड्रग कम्पनी, नर्सिंग होम से मिलीभगत कर मरीजों प्रमुखतः युवा मरीजों पर उन्हें बिना बताये अपनी नवनिर्मित औषधि का प्रयोग करती हैं। नर्सिंग होम में भर्ती युवा पुलिन इसी तरह के क्लीनिकल ट्रायल में मर जाता है जबकि चिकित्सक मिथ्याचार करते हैं - सीवियर जॉइन्डिस से मरा। पुलिन की कॉलोनी में रहने वाले वनिता और सुनील अपनी बेटी रुपाली के लिये जिस ड्रग कम्पनी के रिसर्च सेंटर में पदस्थ वैज्ञानिक लड़के रोशन को देखने जाते हैं वह ऐसी ही कम्पनी थी। सेंटर में क्लीनिकल ट्रायल के लिये आये युवकों की पाँत लगी थी। उन्हें ट्रायल से मिले पैसों से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। वे नहीं जानते प्रयोग के नाम पर उन्हें मौत दी जाती है। वे दवा के प्रयोग से बीमार हो जायें तो अनुबंध के अनुसार ड्रग कम्पनी उन्हें पैसा भी नहीं देती। वनिता और सुनील रुपाली का विवाह रोशन से फिक्स कर आल्हादित हैं। जबकि जानते हैं पुलिन की मृत्यु क्लीनिकल ट्रायल से हुई है। जानते हैं जिस जर्नलिस्ट दिवांग गाँधी ने ऐसे रैकेट के विरोध में ‘‘मध्यप्रदेश में एक शहर के अखबार ने यही भंडा फोड़ किया है कि शहर के मानसिक रोग अस्पताल के 233 रोगियों पर क्लीनिकल ट्रायल क्यों किया गया बिना उनके संरक्षकों की अनुमति के ? जो अबोध अपने बारे में नहीं बता पाते वे दवाईयों के असर के बारे में क्या बतायेंगे (24)।’’ जैसा सच लिखा और उसकी हत्या कर दी गई। जो रुपाली पुलिन की मृत्यु पर कहती है नर्सिंग होम पर केस दर्ज होना चाहिये वह भी इस विवाह से आल्हादित है। अच्छा होता वे रोशन से विवाह फिक्स न करते और उसे न करने का कारण समझाते। बहरहाल कहानी मन-मस्तिष्क को प्रकम्पित कर देती है। कहानी ‘धरती कम्प’ भी प्रकम्पित करती है। याद आ जाते हैं दूरदर्शन पर देखे, अखबारों में पढ़े वे दृश्य जब छब्बीस जनवरी को प्रातः गुजरात में आये भीषण भूकम्प में प्रभात फेरी लगा रहे स्कूली बच्चे दब कर मर गये थे। भूकम्प के बाद के जीवन को कौन किस अर्थ में लेता है कहानी में इसका जमीनी चित्रण है। एक ओर भूकम्प में अपने बच्चों को खोकर अभिभावक अकिंचन हो गये हैं, दूसरी ओर किरण अपने पति को मिले दो बड़ी इमारतों के कान्टैªक्ट से प्राप्त रकम से अपना जीवन स्तर ऊॅंचा उठा रही है, तीसरी ओर चार स्थूल स्त्रियाँ गये हुये लौटते नहीं जैसा सब्र कर मुआवजे की रकम से अपने शेष बचे जीवन को भलीभाँति जी लेने का अभ्यास कर रही हैं। जितने व्यक्ति उतनी सोच। जितनी सोच, उतनी असमानतायें। समस्त असमानतायें एक इस बिंदु पर आकर समान हो जाती हैं कि जीवन ही सबसे बड़ा सत्य है। इस सत्य में इतनी ताकत है कि लोग विषमताओं में भी जीने का उपक्रम नहीं छोड़ पाते। तभी तो कहानी ‘हूँ तो ठिंगली, नानी ठिंगली’ का दिवांग अपनी खो गई दस-ग्यारह साल की बच्ची ठिंगली के लिये वेदना की चरम पर पहुँच कर सोचता है काश यह लाश (उसे लाश की पहचान करने के लिये अस्पताल में बुलाया गया है) ठिंगली की होती। वे (पति-पत्नी) सब्र कर लेते ठिंगली मर गई (63)।’’ सचमुच। नाउम्मीदी उस उम्मीद से भली है जिसे फलीभूत नहीं होना है। यहाँ दो कहानियाँ समानान्तर चलती हैं। नौकरीपेशा दिवांग और हेतल कतिपय कारणों से तलाक चाहते हैं। तलाक मिलने की प्रक्रिया पूर्ण होने को है कि ठिंगली लापता हो जाती है। एक ओर ‘‘हम ग्लोबलाइज्ड हो रहे हैं इसलिये एक और नया शब्द चला है - सेक्स टूरिज्म। जिसके लिये जगह-जगह होटेल खुल रहे हैं। जिसके लिये औरतें, लड़कियाँ चाहिये... किड पोर्न के लिये बच्चे चाहिये। हर आठवें मिनिट में एक बच्चा गायब हो रहा है.... बाल मजदूरी, भीख मॅंगवाने, नौकर बनाने, ऑपरेशन कर अंग निकालने, खाड़ी देश की केमल रेस के लिये केमल की पीठ से बच्चों को बाँधने के लिये ट्रैफिकिंग हो रही है... (53)।’’ जैसी सूचनायें दिवांग और हेतल को आक्रांत कर रही हैं दूसरी ओर दिवांग का वकील मोबाइल पर स्मरण करा रहा है ‘‘बुधवार को कोर्ट में डेट ले रहा हूँ। अगली हियरिंग तक आपको तलाक दिलवा दूँगा।’’

‘‘ऐसे समय में हेतल को कैसे छोड़ सकता हूँ ?’’

कह कर दिवांग, वकील को उपेक्षित करता है। वस्तुतः दिवांग और हेतल का दुःख एक जैसा है। ठिंगली दोनों की संतान थी। संतान होते ही दम्पति पति-पत्नी कम संतान के माता-पिता अधिक हो जाते हैं। लेकिन वकील को अपना कर्तव्य करना है। वह फिर मोबाइल पर है - ‘‘आपकी बेटी को गुम हुये एक साल होने वाला है। मैं आपके छुट्टा छेड़ा (तलाक) के लिये अगले हफ्ते की डेट ले लूँ ?’’

इधर ठिंगली का बिछोह दिवांग और हेतल को इतना नजदीक ले आया है कि वह तलाक का इरादा त्याग देता है। संतान का मोह ऐसा ही प्रबल होता है भले ही उसे किसी अन्य के लिये जन्म दिया जाये। कहानी ‘रस.... प्रवाह’ में सरोगेट मदर सोनाली की पीड़ा हेतल की पीड़ा से अलग नहीं है। हेतल ने अपनी पुत्री खोई है। सोनाली को अपनी नवजात बच्ची को लंदन के स्मिथ दम्पति को सौंपना है जिनके लिये वह सरोगेट बनी है। सरोगेसी अमानवीय, असामाजिक है या नहीं है पर यांत्रिक उपक्रम है जो कारोबार बनता जा रहा है। सोनाली का विपन्न पति प्राप्त रकम से पुलकित है जबकि सोनाली मातृत्व भाव से आपूर है। उसके कोख के रस (तरल) में बच्ची का स्वस्थ विकास हुआ है। रस (दूध) पिला कर (जो भी दो-चार दिन पिलाने का अवसर मिला) बच्ची से समीपता बन गई है। वह बच्ची को नहीं देना चाहती पर पुख्ता कागजी खानापूर्ति के सम्मुख अधिकारविहीन है।

पुस्तक में इतने गहन-गहरे विवरण, आँकड़े, प्रसंग, शोध, भाव, अनुभाव, अभिमत हैं कि व्यापक चर्चा होनी चाहिये पर समीक्षा की स्थान सीमा है। इतना जरूर कहूँगी इन कहानियों की खूबसूरती है इनका प्रस्तुतीकरण। एक क्रम, एक सिलसिला निर्बाध यूँ बनता चला गया है कि पात्रों का अतीत में जाना न अवांतर प्रसंग की तरह लगता है, न लिंक टूटता है। आँकड़ों का दुरुस्त उपयोग हुआ है। पुस्तक खत्म होने पर लगता है जैसे सम्मोहन से बाहर निकले हैं।

यह कहानी संग्रह निश्चित रूप से साहित्य जगत को समृद्ध करेगा।

पुस्तक: उस महल की सरगोशियाँ, प्रकाशन वर्ष: 2019 मूल्य: 380/-, रचनाकार: नीलम कुलश्रेष्ठ, प्रकाशक: वनिका पब्लिकेशन्स, जीवन विहार अपार्टमेन्ट्स, एन ए -168, गली नं0 6, विष्णु गार्डेन, नई दिल्ली 110018 

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समीक्षा

मातृ ऋण से उऋण होने का बेहतरीन प्रयास





डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय, अध्यापक हिन्दी विभाग, 
डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर म. प्र. 9753207910

कुमार तिवारी

पुस्तक - कोसी अंचल का सृजनात्मक हिंदी साहित्य (कहानी-खण्ड) लेखक-वरूण कुमार तिवारी यह कोसी अंचल के कथा साहित्य जगत का दस्तावेजीकरण है। वरूण तिवारी का यह अत्यन्त उपयोगी और महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, जो कोसी अंचल की साहित्यिक समृ़िद्ध को रेखांकित करता है, उसके इतिहास, भूगोल और संस्कृति पर प्रकाश डालता है। हर संतान अपने माता-पिता की ऋणी होती है और जीवन भर अपनी-अपनी तरह से अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार उऋण होने का प्रयास करती है। कपूत हो या सपूत, माँ के लिए तो वह उसका आत्मज पुत्र ही है, उसी तरह कुमाता हो या सुमाता, बच्चों के लिए माँ बस माँ होती है। धरती माता की तरह नदियाँ भी हमारी माताएँ हैं। जो नदी हमारे गृह क्षेत्र में ग्राम्याँचल में बहती हो, वह तो सगी माता ही हो गई क्योंकि उस गाँव और क्षेत्र की भूख -प्यास मिटाने और वहाँ की धरती को हरियाली से ढँककर सुन्दर, स्वस्थ और मर्यादावान बनाने का दायित्व वही निभाती आई है। 

उद्दण्ड और पथभ्रष्ट ही सही लेकिन कोसी भी माँ है। यह स्वयं तो पथभ्रष्ट होना, बार -बार मार्ग बदलना नहीं चाहती होगी, अवश्य भौगोलिक कारण होंगे, कुछ अन्य नदियाँ, पहाड़ांे का पानी इसमें शामिल होकर इसे विरूप और उद्दण्ड बनाते होंगे। क्या यह अपने उद्गम स्थल से ही उद्दण्ड है ? इसका नाम कोसी क्यों है ? क्या यह कोस भर ही बहती थी पहले ? या कोसों दूर तक बहती है इसलिए ? या इसकी पथ परिवतर््ानशीला प्रवृत्ति और उद्दडण्ता के कारण दुखी होकर लोग इसे कोसते है। यह निरंतर कोसी जाती श्रापित नदी है इसलिए ? या उद्गम के समय ही कोसी गई इसलिए प्रतिशोध ले रही है ? या जिस तरह रावण अपने ऋषि पिता के बार -बार समझाने और मना करने पर भी न समझने वाली हठी और कामातुर माँ के कारण गलत नक्षत्र में, अशुभ मुहूर्त में गर्भस्थ हुआ और राक्षस बना। उसी तरह कोसी भी गलत मुहूर्त में जन्मी है, लोक का अहित करने के लिए ? मन कोसी के प्रति संवेदनशील हो गया है। मैंने देखा नहीं, सुना है कि यह अंचल कोसी की बाढ़ के साथ बहकर आई हुई रेत से भर गया है, धरती बंजर हो गई है। बाढ़ उतरने के बाद इसकी सिमटी हुई धारा में पनपती हुई मछलियाँ ही लोगों के दुर्दिनों का सहारा होती हैं। इस कोसी को क्या बंजरता ही मिली थी संसार से, जो यह तेरा तुझको अर्पण कर रही है? उसका व्यक्तिगत दुख क्या है ?

 कोसी को ‘बिहार का शोक‘ माना गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों में यह पूछा जाता है कि बिहार का शोक किसे कहते हैं, उत्तर होता है-कोसी। इसका मतलब हम समझते थे कि कोसी में हर वर्ष भयानक बाढ़ आती है जिसके प्रवाह में गाँव के गाँव बह जाते हैं, यह बिहार के लोगों को दुख और परेशानी देती है। यह एक बड़ा और प्रभावशाली पक्ष है किन्तु वरूण तिवारी जी ने इस ग्रन्थ की पूर्व पीठिका के अंतिम पैराग्राफ में बड़ी महत्वपूर्ण और सुन्दर बात कही है कि-‘‘जो कुछ मानवविरोधी है उसके बारे में जरूर लिखा जाए लेकिन जो बातें मनुष्य के पक्ष में जाती हैं उसकी भी अनदेखी न हो। प्रेम, करूणा, ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, सहानुभूति जैसे महान मानवीय मूल्यों की कमी वर्तमान परिदृश्य में हो सकती है लेकिन इसका सर्वथा लोप हो गया हो ऐसा भी नहीं है।‘‘ वरूण जी की यह दृष्टि मध्यम मार्ग पर खड़े होकर दोनों पक्षों को देखना और उनमें संतुलन बनाए रखते हुए आवश्यक के स्वीकार की प्रक्रिया है। कोसी बिहार का शोक है लेकिन जीवन भी तो है। इसी ग्रन्थ के पुरोवाक् में गंगा प्रसाद विमल ने लिखा है -‘‘कोसी अंचल वह भू-भाग है जहाँ खेत हैं, अनाज भरपूर होता है, अन्य प्राकृतिक 

संसाधन भरपूर हैं, जलवायुगत विभिन्नताओं की यह अद्भुत भूमि है, हिमालय से आने वाली अनेक नदियों का यह आरंभिक मैदान शरणस्थल भी है और तराई का क्षेत्र होने के कारण सघन हरीतिमा की प्रचुरता का भी अतुलनीय प्रदेश है।‘‘

कोसी की बाढ़ के कारण समस्याएँ हैं किन्तु अन्य नदियों के साथ इस अंचल को बनाए और बचाए रखने में नगण्य ही सही इसका योगदान भी तो होगा। कोसी को केन्द्र में रखकर इस नदी और इस अंचल की धरती के ऋण से उऋण होने का कवि और समीक्षक वरूण कुमार तिवारी का यह प्रयास सराहनीय है। ‘कोसी अंचल का सृजनात्मक हिंदी साहित्य ‘ के इस कथा खण्ड में वरूण जी द्वारा इस अंचल के कहानीकारों के कहानी संग्रहों को प्राप्त करना, स्वयं उनकी समीक्षा करना अत्यन्त परिश्रमसाध्य कार्य है। इन समीक्षाओं की समीक्षा तो की नहीं जा सकती क्योंकि मैंने इन कहानियों और कहानी संग्रहों को पढ़ा नहीं है। किन्तु मैं वरूण जी के समीक्षात्मक दृष्टिकोण को जानकर -समझकर यह कह सकती हूँ कि निश्चित रूप से उन्होंने इन कहानियों के साथ न्याय किया होगा। क्योंकि वे जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखते हैं। जीवन के सरोकारों को जानते हैं। 

इस ग्रन्थ में छोटी -बड़ी कहानियों के मिलाकर साठ से अधिक कहानी संग्रह हैं। जिनमें जीवन और जगत के तमाम रंग बिखरे हुए हैं। ये रंग इस बात को सिद्ध करते हैं कि दुख में संवेदनाएँ पैनी और धारदार हो जाती हैं, प्रतिभा का विकास होता है। कोसी ने उस अंचल की धरती को भले ही बंजर बनाया हो लेकिन हृदय की भूमि संवेदनाओं की फसल से लहलहा उठी है। इस संग्रह में अनेक महत्वपूर्ण कथाकारों के नाम हैं। रेणु जी तो मील का पत्थर हैं। वे भूतो न भविष्यति के अंतर्गत आते हैं। उनके बाद के लक्ष्मीनारायण सुधांशु, मधुकर गंगाधर, रामधारी सिंह दिवाकर, सरला राय, गौरीनाथ आदि। वरूण तिवारी ने समीक्षाओं के भीतर उदाहरण देते हुए अन्य साहित्यकारों की कई अत्यन्त प्रासंगिक टिप्पणियाँ उद्धृत की हैं। जैसे-डॉ. लक्ष्मीनारायण सुधांशु को प्रेषित एक पत्र में शिवपूजन सहाय अपनी आपबीती लिखते हैं-‘‘ कवियों के लिए गाँव के किसान बड़े भोले-भाले हैं, दूध के धोए हुए हैं, पर मुझे जो यहाँ अनुभव हुआ उसको क्या बताउँ। लोग खेत की फसल चरा देते हैं, लगे पौधों को काट देते हैं। बात-बात में झगड़ा- फसाद। जिसके मुँह में बोल नहीं वह गाँव में नहीं रह सकता है। मैंने जो साहित्यिकों की बहुत सी चिट्ठियाँ सँजोई थीं, अखबारों की कतरनें जमा की थीं सबको बदमाशों ने कुएँ में डाल दिया। अपनी मुसीबत क्या बताउँ। किसान भोले नहीं, भाले हैं। ‘‘(पृ. 233) इस टिप्पणी को पढ़कर कथाकार प्रेमचन्द की एक बात याद आई कि-‘जो मंदिर के जितने पास होता है वह भगवान से उतना ही दूर होता है। ‘ गाँव में रहने वाला ही, या गाँव में रहकर ही गाँव की वास्तविकता को जाना जा सकता है। 

वरूण तिवारी रणविजय सिंह सत्यकेतु के ‘अकथ‘ कहानी संग्रह की समीक्षा करते हुए कहते हैं -‘सांप्रदायिक दंगा समाज का रोग है। ‘चंद्रकांत राय के कहानी संग्रह ‘सॉरी । नो पॉलिटिक्स‘ की समीक्षा करते हुए सारांश प्रस्तुत करते हैं कि- ‘राजनीति अब भ्रष्टनीति हो गई है। उसका अपराधीकरण हो गया है। वैयक्तिकता और स्वार्थांधता के इस युग में माता-पिता से बच्चों की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। वृद्ध माता-पिता तो अवाँछित वस्तु हो गए हैं। सरला राय के कथा संग्रह ‘खुली आँखों के स्वप्न‘ में ‘नया माधो‘ कहानी शीर्षक को सटीक ठहराती है। वरूण तिवारी कहते हेैं -‘इन कहानियों में एक बेहतर समाज निर्माण का स्वप्न है। मूल्यनिष्ठा इन कहानियों की शक्ति है। मनुष्यता की सुगंध उनकी पहचान है। ‘रामधारी सिंह दिवाकर की दस प्रतिनिधि कहानियों के लिए वे लिखते हैं -‘इनमें एक ओर मनुष्य की जिजीविषा का गाढ़ा रंग है तो वहीं दूसरी ओर तथाकथित ‘विकास‘ पर विशाल प्रश्नचिन्ह भी है। ‘ वरूण तिवारी की इन टिप्पणियों को उद्धृत करने का तात्पर्य उनके अभिव्यक्ति कौशल, शब्दों के चयन, वाक्य विन्यास एवं कहानियों के मर्म तक पहुँचने की उनकी क्षमता को रेखांकित करना है। वे कहानियों से ऐसे अंशों का चयन करते हैं जो पूरी कथा के मर्म को स्पष्ट कर दे। गुरूमैता के कहानी संग्रह ‘यमुना का जल ‘ की कहानी ‘रिक्शावाला‘ का यह अंश हर रिक्शेवाले की पीड़ा को दर्शाने में और हर पाठक को इस पीड़ा का अनुभव कराने में सक्षम है -‘उसके जीवन-निशीथ में ऐसा अंधकार व्याप्त था, जो काटते नहीं कटता था। वह देश के असंख्य रिक्शेवालों की अज्ञात अंतर्व्यथा, असमर्थता, उत्कंठा, किंतु जिजीविषा का भार ढोता हुआ मेरे मर्म को झकझोर गया। जीने के लिए जीना उसके लिए कला ही नहीं तपस्या थी।‘ 

वरूण तिवारी का कवि व्यक्तित्व उनके समीक्षापरक गद्य में उपस्थित होकर उसकी भाषा को भावप्रवण बना देता है। गद्य काव्य की कसौटी भले ही है लेकिन कवि जब गद्य रचना करता है तो वह गद्य नीरस हो ही नहीं सकता बशर्ते कवि हृदय और बुद्धि में समन्वय और संतुलन बनाए रखे। वरूण तिवारी इस कला में कुशल हैं, दक्ष हैं, पारंगत हैं। उपभोक्तावाद और बाजारवाद का विषैला प्रभाव मानव जीवन पर ही नहीं बल्कि साहित्य पर भी आँधी की तरह छाता जा रहा है और दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, यहचिंता वरूण तिवारी को भीतर तक झकझोरती है कि नयी पीढ़ी और नया समाज राष्ट्र को किस दिशा में ले जाएँगे, कौन सा रूप देंगे। वे पुरानी परंपराओं और आधुनिक रीति-रिवाजों में से समन्वित रूप से कुछ ऐसा नया निकाल कर उसे आत्मसात् करना और समाज द्वारा भी वह आत्मसात् किया जाए ऐसा चाहते हैं जो मानवीय मूल्यों, भारतीय साँस्कृतिक मूल्यों के अनुकूल और लोकमंगल की दृष्टि से सर्वस्वीकार्य हो, प्रासंगिकहो, उनका रक्षक हो। इसी दिशा में और इसी प्रयास में उनकी रचनात्मकता सार्थकता प्राप्त करती है। साहित्यकार की महत्ता और उत्तरदायित्व को रेखांकित करता एक उद्धरण उन्होंने दिया है जो नवरंग प्रसाद जायसवाल की कहानी ‘तुम अपना बयान जारी रखो‘ संग्रह की कहानी ‘साहित्य का अंत ‘का एक अंश है-‘साहित्यकार के भावना-उद्भूत शब्द इंसान के हृदय में भावों को जागृत ही नहीं करते, भावों का विकास, संवर्धन, परिष्कार भी करते हैं। उच्चतर भावों को उत्पन्न करते, भावोत्कर्ष करते हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति का अंतर्जगत प्रकाशित होता, मानवीय मूल्यों को बल मिलता, भावात्मक एकता और सामाजिक संबंधों का संवर्धन होता है और जीवन का सौंदर्य उद्भाषित होता है। (पृ. 127) यह टिप्पणी विज्ञान और तकनीकी प्रधान कम्प्यूटराइज्ड और इंटरनेटीकृत भारतीय समाज की वर्तमान पीढ़ी को साहित्य के निकट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। साहित्य मनुष्य की संवेदनाओं को जीवित और जागृत रखकर उसे मनुष्य बनाए रखता है। जो अच्छा मनुष्य होगा वह अच्छा वैज्ञानिक, अच्छा प्रबंधक, अच्छा न्यायाधीश, अच्छा राजनैतिज्ञ, अच्छा समाजशास्त्री, अच्छा संगीतज्ञ आदि बन सकता है। 

यहाँ वरूण तिवारी के कथांश चयन करने का बौद्धिक कौशल उत्कृष्ट कोटि का है जो न केवल इन पंक्तियों के लेखक के दृष्टिकोण की महत्ता को रेखांकित करता है बल्कि इसका चयन कर वे स्वयं भी अपनी गुणग्राहकता को स्पष्ट कर देते हैं। हीरे को परखने के लिए जौहरी चाहिए। अच्छा जौहरी ही उस हीरे को तराश कर, प्रकाशित कर, उसे सार्थकता प्रदान करता है। वरूण तिवारी ने इस समीक्षात्मक ग्रन्थ में जितने भी कथाकारों का चयन किया है और कहानियों की समीक्षा करते हुए जिन कथांशों को उद्धृत किया है वह सराहनीय है। जो समीक्षात्मक सारांश प्रस्तुत किया है वह उनकी समीक्षकीय योग्यता को दर्शाता है। 

वरूण तिवारी परिष्कृत संस्कृत निष्ठ हिन्दी के साथ तद्भव हिन्दी भाषा के शब्दों का प्रयोग करते हैं तथा विषय के साथ प्रसंगानुकूल अंग्रेजी, उर्दू और लोकभाषा का उपयोग भी करते हैं। त्रुटिहीन भावप्रवण भाषा और सरल सहज अभिव्यक्ति शैली की प्रवाहमयता इन समीक्षाओं को सरस और पठनीय बनाती है। शोधार्थियों के लिए तो यह ग्रंथ उपयोगी है ही, उन जिज्ञासुओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो कोसी अंचल को संपूर्णता के साथ जानना चाहते हैं। इन कहानियों के दर्पण में तथा इस ग्रन्थ की पूर्व पीठिका, भूमिका, पुरोवाक् के माध्यम से इस कोसी अंचल को पूरा न सही लेकिन अधिकांशतः जाना जा सकता है। वरूण तिवारी इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ के लिए बधाई के पा़त्र हैं। 


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समीक्षा

बेनाम रिश्तों की कहानियाँ

श्री रामदास कृष्णा कामत




डॉ. रमेश यादव, समी. मुंबई, मो. 9820759088/7977992381

हाल ही में प्रकाशित रामदास कृष्णा कामत का कहानी संग्रह ‘बेनाम रिश्तों की कहानियां’ हिंदी साहित्य जगत में एक नए कलेवर के साथ, नए अंदाज में प्रस्तुत हुआ है। इसका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया जाना चाहिए। हिंदी में कामत जी की यह पहली पुस्तक है जो अपनी सरस कहानियों के चलते विशेष बन गई है। वे साधुवाद के भी हकदार हैं क्योंकि लेखन की उनकी मूल भाषा मराठी है और छह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस कहानी संग्रह में मराठी कहानियों का कलेवर और अंदाज साफ-साफ झलकता है। इससे मराठी में कहानी लेखन की शैली का संज्ञान लिया जा सकता है। संग्रह की अधिकांश कहानियां बेवजह विषय वस्तु से तनिक भी इधर-उधर नहीं भटकती, जिससे कहानी की कसावट बनी रहती है और सीधे लक्ष्य की ओर रुख करती हैं। मराठी में कहानी लेखन की यह प्रचलित शैली है। संग्रह की अधिकांश कहानियां संवेदनशील और मार्मिक हैं। इन्हें पढ़ते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि इस तरह की सामान्य एवं असामान्य घटनाएं हमारे पास-पड़ोस में अकसर घटती रहती हैं। शोध-बोध की दृष्टि रखने वाले कामत जी इन घटनाओं के जरिए एक विशेष कहानी को जन्म देते हैं, यह खास बात है। 

सामान्य-सी कहानी जब एक असामान्य मोड़ पर खत्म होती है तो, पाठक कुछ पल के लिए बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाता है। यही इन कहानियों का बल स्थान है इसलिए विशेष हैं। ‘काक ऋण’ नामक कहानी के मुख्य किरदार सोराबजी और एक कौवा के बीच बेनाम-सा रिश्ता बन जाता है। दोनों की भाषा सांकेतिक है पर समय के साथ एक दूसरे की भावनाओं को अच्छी तरह से समझने में दोनों माहिर हो जाते हैं। कहानी के टर्निंग पॉइंट पर कौवा बड़े ही नाटकीय ढंग से अपने अन्नदाता की जान बचाता है और उनके कर्ज से मुक्त हो जाता है। मगर सोराबजी को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बनाकर चल देता है। इंसान और पशु-पक्षियों के बीच सदियों से एक बेनाम पर लगाव भरा रिश्ता रहा है, इसके कई उदाहरण पुराणों एवं कथा-कहानियों में देखे जा सकते हैं। इसी तर्ज पर लिखी गई कहानी ‘कुर्बानी’ के मुख्य किरदार एक छोटा बच्चा इरफान तथा राजा नामक बकरा हैं। साथ रहते हुए दोनों के बीच बहुत कम समय में दोस्ती का रिश्ता बन जाता है। दोनों संवाद नहीं कर सकते थे पर एक दूसरे की भावनाओं को समझने लगे थे। कुर्बानी से पहले, रात में इरफान अपने मित्र राजा को हर बंधन से आजाद कर देता है ताकि ईद के दिन उसका मित्र बलि का बकरा बनने से बच जाए। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था। मासूम इरफान के माध्यम से धर्म विशेष की संस्कृति का बोध कराते हुए यह भाव स्पर्शी कहानी दिल को छू लेती है। 

कामत जी का परिवेश महाराष्ट्र और मुंबई है। मिनी भारत के रूप में मुंबई की अपनी पहचान है। नजरिया हो तो यहां हर मोड़ पर एक कहानी सूंघी जा सकती है, जिसका आभास संग्रह की हर कहानी में होता है। ‘समाजभूषण, रिश्ते, विसंगति आदि कहानियों के मुख्य किरदार समाज को आईना दिखाते हुए, दिशा देने का काम करते हैं। ‘भूख’ कहानी का मूंगफली बेचने वाला, विकलांग शारदा का सफल जीवन संघर्ष, ‘शक का जाल’ कहानी में माधवी का किरदार विशेष संदेश देते नजर आते हैं। इन घटनाओं को कहानी में पिरोकर रचनाकार लेखन के उद्देश्य को सार्थक करता नजर आता है। 

कामत जी एक सफल बैंकर भी हैं। राजभाषा अधिकारी न होते हुए भी उन्हें हिंदी से बेहद लगाव है। अधिकारी बनने के बाद ऑल इंडिया ट्रांसफर बैंकिंग का अविभाज्य घटक है। ट्रांसफर कब, क्यूं और कहां के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। अतः कहानी के पात्रों की तरह बैंकिंग जैसे व्यावसायिक जगत में निष्ठा से नौकरी करते हुए साहित्य और रंगमंच के यज्ञ में अपने सामर्थ्य भर की समिधा समर्पित करने वाले कुछ जीवट कर्मचारी भी देखें जा सकते हैं। डेबिट-क्रेडिट वाली आंकड़ों की इस दुनिया में किसी नटनी की तरह तार पर संतुलन बनाते हुए चलना पड़ता है। क्योंकि बैंक की नौकरी लगती तो सहज है पर पूरी तरह से जोखिम भरी होती है। ‘नजर हटी तो दुर्घटना घटी’ वाला जुमला यहां फिट बैठता है। ऐसे में एक बैंकर द्वारा कला, साहित्य, संस्कृति का रोग पालना किसी चुनौती से कम नहीं होता। इससे भी बड़ी बात यह है कि कला-साहित्य जगत में विशेष उपलब्धि हासिल कर लेने के बाद ऐसे कार्यपालक भी मिल जाते हैं जो प्रोत्साहन और सम्मान की बात तो दूर रही, सीधे प्रश्न दागते हैं - इससे ऑर्गेनाइजेशन का क्या फायदा? अब इन्हें कौन समझाए कि एक कलाकार, साहित्यकार कर्मचारी भी राष्ट्र की पहचान होता है, जैसे कि एक स्पोर्ट्समॅन कर्मचारी होता है। स्पोर्ट्स के लिए लिखित सुविधाएं और नियम हैं। पर कला-साहित्य से जुड़े कर्मचारियों के लिए ठोस प्रोत्साहन एवं सुविधाओं से संबंधित दिशा-निर्देश का बैंकिंग जगत में आज भी अभाव नजर आता है। जबकि ये लोग भी कर्मठता से अपने काम को अंजाम देते हैं और ऑर्गेनाइजेशन का नाम रोशन करते हैं। वो कहावत है ना - ‘भूखे पेट भजन न होय गोपाला ’ इसलिए इस चर्चा को छेड़ना जरूरी लगा। 

कहानी लेखन भी एक कला है। हर रचनाकार की सृजन शैली अपनी विशेषता लिए होती है। कहानी बुनने का सबका अपना एक ताना-बाना होता है। संग्रह की हर कहानी का केंद्र बिंदु एक मार्मिक और संवेदनशील कथा है। कुछ कहानियां छोटी, तो कुछ बड़ी हैं। संग्रह को दो भागों में विभाजित किया है - लघुकथाएं एवं लंबी कहानियां। मगर मेरी दृष्टि से ये सभी सिर्फ और सिर्फ कहानियां हैं। हिंदी में लघुकथाओं का मिजाज कुछ अलग होता है। संग्रह में आठ छोटी एवं पांच लंबी कहानियों का समावेश है। इनमें काक ऋण, कुर्बानी, बिदाई समारोह, डोनेशन, रिश्ते, नामदेव पाठक, समाज भूषण, भूख ये छोटी मगर एकदम क्लासिक कहानियां हैं। ये ‘देखन में छोटी लागे पर घाव करे गंभीर’ वाली शैली की हैं जो पाठकों को झकझोर कर रख देती हैं। पांच लंबी कहानियों में ‘सबूत, विसंगति, सरप्राइज गिफ्ट, शारदा और शक का जाल का समावेश है, जिन्हें पढ़ते हुए कहीं भी कल्पना विलास का आभास नहीं होता। कहानी के पात्र अपने किरदार के साथ न्याय करते नजर आते हैं तथा कथ्य और शिल्प की कसौटी पर खरे उतरते हैं। कहानीकार की यह विशेषता है। 

बैंक में चालीस साल की दीर्घ सेवा करने वाले कामत जी बैंकर के साथ-साथ एक साहित्यकार और कलाकार भी हैं। कलाकार के रूप में उन्होंने कई स्टेज शो भी किए हैं। बैंकिंग पत्रिकाओं के अलावा मराठी की साहित्यिक पत्रिकाओं में उनकी कई रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। लेखन, निर्देशन और अभिनय के उन्हें कई पुरस्कार प्राप्त हैं। अर्थात हरफनमौला व्यक्तित्व के धनी कामत जी कई लोगों के लिए एक आदर्श उदाहरण भी हैं जो नौकरी करते हुए भी कला-साहित्य की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामायाब हुए हैं, जिस तरह उनकी कहानियों के किरदार अपना विशेष अस्तित्व छोड़ते नजर आते हैं। दो साल पहले बैंक के प्रशिक्षण केंद्र, हैदराबाद में उनका ट्रांसफर हुआ। वहां उनके अंग्रेजी तथा हिंदी लेखन का दायरा बढ़ गया। इस कहानी संग्रह का बीजारोपण भी वहीं से हुआ। अपनी कुछ मराठी कहानियों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया जिसे हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं ने स्थान दिया। इससे प्रेरित होकर उन्होंने इस हिंदी कहानी संग्रह को अंजाम दिया। 

संग्रह की कहानियों की एक खासियत यह भी है कि इसमें कथा-कहन की रवानगी है इसलिए पठनीय हैं। एक कहानी पढ़ने के बाद अन्य कहानियां पढने के लिए पाठक लालायित हो जाता है। पाठकों को अंत तक बांधे रखने में ये कहानियां सक्षम हैं। इनमें कहीं धूप, कहीं छांव है, कहीं सुख, कहीं दुख है, कहीं पीड़ा, तो कहीं त्रासदी है। प्यार और घृणा भी है। अर्थात कहानियों की विविधता तथा उसमें निहित संदेश इन्हें रोचक बनाती हैं। लेखन की भाषा सहज और सरल है इसलिए सीधे पाठकों के दिल तक पहुंचती हैं। सभ्या प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक की साज-सज्जा, छपाई एवं मुखपृष्ठ कल्पक तथा काबिलेतारीफ है। इन कहानियों को विस्तार से पढ़ने के प्रति पाठकों की उत्कंठा बनी रही इसलिए कुछ कहानियों का सार संक्षेप परिचयात्मक स्वरूप में देने का यह प्रयास भर है। 

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समीक्षा

व्यंग्य की चासनी में कड़ाही की जलेबियाँ

समीक्षक : श्री हरिषंकर राढ़ी, बी -532 (दूसरा तल), वसंतकुंज एन्क्लेव (बी- ब्लॉक), नई दिल्ली -110070

मोबाइल: 9654030701

विसंगतियों में बढ़ोतरी के साथ साहित्य के बाजार मंे व्यंग्य की आवक इधर ठीक से बढ़ी है। सीधा, किंतु विचित्र-सा दुनियावी फॉर्मूला है कि जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य, समृद्ध और ज्ञानी होता जाता है, उसमें पाखंड, होशियारी और दिखावा बढ़ने लगता है। यानी सभ्यता अपने साथ विसंगति लेकर आती है। यह भी सत्य है कि हम एक हद तक विकसित हो चुके हैं, यानी पाखंडों और विसंगतियों को स्थायी आश्रय मिलने लगा है। अब विसंगतियाँ और पाखंड उन्नत अवस्था में हैं, तो ये साहित्य के दर्पण में चमकेंगे ही। कहने की आवश्यकता नहीं, व्यंग्य साहित्य का उत्पादन माँग से अधिक है। असली के साथ नकली व्यंग्य साहित्य भी बाजार में धड़ल्ले से चल रहा है। किंतु इस बीच कुछ व्यंग्य संग्रह आ जाते हैं, जो व्यंग्य के प्रति आश्वस्ति का भाव दे जाते हैं। उम्मीद कायम हो जाती है कि अभी कुछ न कुछ बचा है। 

इन दिनों रामस्वरूप दीक्षित जी के व्यंग्य संग्रह ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’ से गुजरना हुआ। इस संग्रह के शीर्षक एवं आकार को देखकर प्रथम दृष्ट्या कोई बड़ी उम्मीद तो नहीं जग रही थी, किंतु भूमिका की कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही आशंका निर्मूल होने लगी। अपनी भूमिका में ही लेखक ‘फॉर्म’ में आ जाता है और बिना पढ़े पुस्तकों की भूमिका लिखने परजीवी स्वनामधन्य लेखकों को सलीके से निपटा देता है। जाहिर है कि दीक्षित जी ने इस व्यंग्य संग्रह की भूमिका किसी भी मान्य परिषद से नहीं लिखवाई है, हालाँकि आजकल विरली पुस्तकें ही बिना किसी नेमी-टेमी की व्यावसायिक भूमिका के आ रही है। भूमिका लेखकों द्वारा दबाव या निजी स्वार्थों के चलते संबंधित कृति और लेखक के विषय में जो स्तुतिगान किया जाता है, उसे चीरते हुए दीक्षित जी लिखते हैं- ”वे अब तक सैकड़ों कबीर, परसाई, जोशी बना चुके हैं और मुझे भी बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं उनसे यह पाप नहीं करवाना चाहता। मैं जो हूँ, वही बने रहना   चाहता हूँ।“

ईमानदारी और स्वाभिमान हर विधा के लिए जरूरी होता है, किंतु व्यंग्य के लिए यह अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। जिसे यात्रा में अपनी टाँगों पर भरोसा नहीं होगा, भूमिका की वैशाखी का चयन वही करेगा। अपनी पठनयात्रा में मैं न जाने कितनी ऐसी किताबों से गुजर चुका हूँ, जिनकी भूमिका और फ्लैप तमाम साहित्यिक मठाधीशों ने लिखी तथा उसे साहित्य की कालजयी कृति के रूप में खड़ा कर दिया। लेकिन उसके चंद पृष्ठों से गुजरने के बाद ही सारी प्रशंसा मुट्ठी की रेत निकली। रह गई व्यंग्य की बात, जो लेखक अपनी सच्चाई को नहीं पहचान पाएगा, वह समाज की विसंगतियों को क्या पकड़ेगा? कहा जाए तो इस पुस्तक की भूमिका अपने आप में एक सशक्त व्यंग्य लेख है, एक भूमिकामात्र नहीं।

संग्रह में कुल एकतीस व्यंग्य हैं, जो जीवन और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लिए गए हैं। लेखक किसी एक विषय को लेकर अटका नहीं रहता और न उसकी कोई पक्षपाती मानसिकता दिखती है। विषयों के चुनाव में वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है। उसे दाल के बाजार से लेकर हिंदी साहित्य के पाखंडी लेखक-प्रकाशक, कवि और अध्यक्षता को आतुर, लेखन से चूके हुए तमाम सफेदपोशों मेें विसंगतियाँ दिखती हैं, जिन्हें पकड़कर वह हमारे सामने रख देता है। ध्यातव्य यह है कि वह सिर्फ शब्दचित्र नहीं खींचता, भाषा और शैली के प्रयोग से वह उन्हें सशक्त व्यंग्य में परिवर्तित कर देता है।

दीक्षित जी के इस संग्रह से गुजरते हुए व्यंग्य को लेकर एक प्रतिबद्धता दिखती है। उनके व्यंग्य में उद्देश्य ही नहीं, एक चिंतन मिलता है। चिंतनपरक व्यंग्य कम लिखे जा रहे हैं। आजकल के व्यंग्यकारों में बहुत से ऐसे हैं, जो समझ ही नहीं पाते कि वे व्यंग्य लिख क्यों रहे हैं? कुछ भी निरुद्देश्य सा ऊटपटाँग लिख देने या हल्का-फुल्का हास्य पैदा कर देने से व्यंग्य का उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। किंतु, यहाँ ऐसा लगता है कि इस संग्रह का लेखक अपने दायित्वों को लेकर सजग है। उसे व्यंग्य के माध्यम से समाज को एक दर्शन देना है।

दालों की बढ़ती कीमतों को लेकर संग्रह में दो व्यंग्य लेख हैं। सीधी-सी बात है, गरीब के चूल्हे की सबसे आवश्यक चीज दाल, जो पेट-पर्दे का मुहावरा बन चुकी है, आसमान चूमेगी तो प्रश्न उठेंगे ही। यह किसी भी सत्ता के लिए एक गंभीर ही नहीं, शर्मनाक स्थिति भी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा दिखता नहीं, सो लेखक ने दाल के बहाने कइयों पर प्रहार कर जाता है। इस प्रहार के लिए लेखक ने तकनीकी दृष्टि से अतिशयोक्ति को हथियार बनाया है। एक उदाहरण देखें -”तेरा मरद दिखता तो बड़ा सीधा-सादा है, उसे देखकर तो कोई अंदाज भी नहीं लगा सकता कि वह दाल खाता होगा।“ 

इन दिनों लेखकों में आई स्तरहीनता, लोलुपता, मठाधीशी, साहित्यिक कार्यक्रमों की अध्यक्षता का लालच, सम्मानों-पुरस्कारों की बंदरबाँट और सीकरी प्रदक्षिणा को लेकर लेखक बहुत व्यथित दिखता है। इन विषयों को वह कई बार उठाता है, अलग-अलग ढंग से उठाता है और जमकर उघाड़ता है। व्यंग्य ‘ऊपर उठा हुआ लेखक’ के प्रारंभ में ही वह लिखता है- “इधर कुछ दिनों से वह बतौर लेखक काफी ऊपर उठ गया है। ऊपर उठते ही उसका लेखन नीचे आ गया है। हिंदी का लेखक जब ऊपर उठता है तो सबसे पहले उसका लेखन गिरता है।” एक सत्य को इस प्रकार भाषायी मरोड़ के माध्यम से उद्घाटित करना अद्भुत लगता है। इसी लेख का उपसंहार करती हुई कुछ और पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं- ”हमारे यहाँ जब लेखक ऊपर उठ जाता है तो वह विषय पर नहीं, उससे ऊपर और अपने ऊपर बोलने लग जाता है।“ ऐसी कटूक्तियाँ ही किसी व्यंग्य को धारदार बनाती हैं और यह भी साबित करती हैं कि लेखक में अपनी बात को कहने का अलग सलीका है।

वैसे इस व्यंग्य संग्रह से गुुजरते हुए लगता है कि दीक्षित जी तमाम कवियांे, लेखकों और बुद्धिजीवियों के पाखंड और दिखावे से कुछ ज्यादा ही तंग हैं। वे साहित्य के क्षेत्र में कुछ ऐसा ही कर रहे हैं कि आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास। लिहाजा वे बार-बार इन्हीं के पीछे पड़े हुए दिखते हैं। ऐसे कई लेखों में एक लेख है ‘बिना बसंत के जीवन’, जिसमें आत्मकथा शैली में बसंत से वंचित और समृद्ध लोगों के बीच के अंतर को बहुत बारीकी एवं व्यंजनात्मक ढंग से दिखाया गया है। प्रारंभ ही वंचितों के पक्ष में खड़ा हो जाता है, जिसकी निचली परत में समझने के लिए व्यंग्य है कि बसंत जैसे मौसम और उत्सव बड़ों के चोंचले हैं। इस अव्यक्त व्यंग्य की मार गहरी लगती है। संग्रह के बहुत से लेखों को ंिचंतनपरक व्यंग्य इसलिए कहा जा सकता है कि इसमें लेखक कुछ न कुछ विचार देता चलता है। कुछ वाक्य तो सूक्ति जैसे लगते हैं। इसी शीर्षक में एक वाक्य है- ”जंजीर चाहे सोने की हो, आती बाँधने के काम ही है।“ जाहिर है कि ऐसे वाक्यों में अर्थ ठुँसे पड़े हैं। एक अन्य वाक्य देखिए, जिसमें मनोविज्ञान किस प्रकार प्रकट होता है-”व्यावहारिक जीवन में असफल होने पर आदमी सिद्धांतों में जीवन की सार्थकता तलाशने लगता है।“ इस लेख को दरअसल ललित व्यंग्य की संज्ञा दी जानी चाहिए। 

कवियांे, लेखकों और बुद्धिजीवियों के पाखंड को चारो तरफ से घेरते हुए जो व्यंग्य लेख इस संग्रह में हैं, उनमें ‘कवि का अभिनंदन’, ‘साहित्य में समर्पणवाद’, ‘अध्यक्षता की बीमारी’, ‘अथ हिंदी दिवस’, ‘वेश्या नहीं है लेखनी’, ‘प्रचारित होने की कला’, ‘अध्यक्ष: एक मनःस्थिति’ आदि प्रभाव छोड़ पाने में सफल रहते हैं।   ‘बुद्धिजीवी’ व्यंग्य से गुजरते हुए लगता है कि दीक्षित जी में व्यंग्य की मौलिक प्रवृत्ति है। उनकी दृष्टि व्यापक है। कोई ऐसा पूर्वाग्रह नहीं दिखता कि सरकार के विरुद्ध कोई विषय मिलेगा, तभी लिखेंगे। विषय के लिए बगैर भाग-दौड़ किए अपने परिवेश से बहुत कुछ उठा लेते हैं। उनकी व्यंग्य की प्रत्यंचा आसपास के बनतू टाइप लोगों को निशाने पर ले लेती है। वैसे सही पूछा जाए तो सत्ता, दुर्व्यवस्था और लूटपाट के लिए ये बुद्धिजीवी ही सर्वाधिक दोषी हैं।

आजकल के व्यंग्य संग्रहों और उनकी समीक्षा को लेकर ‘एक अप्रकाशित किताब के बारे मंे’ जुगाड़ू व्यंग्यकारों की भी खबर ली है। किस-किस तरह के व्यंग्य लिखे जा रहे हैं और किस प्रकार उनके पक्ष में मठाधीशी माहौल बनाया जा रहा है, उस पर यह व्यंग्य सटीक है। यथार्थवाद की ऊपरी परत के नीचे इसमेें वास्तविक व्यंग्य छिपा है। यह सच है कि विसंगतिकारों को रगड़ने का काम व्यंग्यकार का है। वह अपनी लेखनी के प्रहार से बहुत सारे वार कर सकता है, किंतु विडंबना यह है कि वह खुद विसंगति और पाखंड का वाहक बन गया है।

साहित्य से इतर जो व्यंग्य ध्यान खींचते हैं, उनमें ‘शेर और बकरी’ का उल्लेख आवश्यक है। इस व्यंग्य के बहाने लेखक ने शासक और शासित वर्ग की मानसिकता को बखूबी उतारा है। अपने यहाँ की लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावों के समय शेर और बकरी को एक घाट पर पानी पिलाने का जो उपक्रम घाट-घाट का पानी पिए नेता करते हैं, यह व्यंग्य उसी का कच्चा चिट्ठा है। यह व्यंग्य एक हकीकत है जो गहराई तक अर्थबोध कराता है। 

संग्रह में एक व्यंग्य है ‘व्यंग्य और विसंगति’ जो प्रथम दृष्ट्या व्यंग्य की दशा को लेेकर लिखा लेख प्रतीत होता है। लेकिन कुछ आगे जाने पर लगता है कि यह भी व्यंग्य है, किंतु एकदम विरोधाभासी शैली में। वस्तुतः विसंगतियाँ हमारे जीवन, समाज, तंत्र और व्यवस्था में इस तरह घुल-मिल गई हैं कि उनसे अलग हम सोच ही नहीं सकते। दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार, पाखंड एवं अवसरवाद को स्वीकृतियाँ मिल चुकी हैं। इसी असंगत व्यवस्था की स्वीकार्यता को चपेटने के लिए लेखक जिस युक्ति का सहारा लेता है, उसे सूक्ष्म व्यंग्य कह सकते हैं। लेकिन, जोड़ना यह भी पड़ेगा कि इस सूक्ष्मता पर ध्यान दिया जाएगा, तभी एक मार्मिक व्यंग्य के दर्शन होंगे। व्यंग्य में ऐसे प्रयोग अच्छे लगते हैं। लगभग इसी श्रेणी का दूसरा व्यंग्य है ‘छोटा आदमी, बड़ा आदमी’। इस व्यंग्य में सूक्ष्मता के साथ-साथ लेखक ने वक्रोक्ति का सुंदर प्रयोग किया है। बड़ा आदमी ‘उदार’ होता है, ‘स्त्री स्वातंत्र्य’ का पक्षधर होता है। ”छोटा आदमी बड़ा टुच्चा होता है। छोटा आदमी बड़ा काइयाँ होता है।“ जैसे वाक्यों के साथ उदाहरण देकर व्यंजना शक्ति को खूब उभारा गया है।

ऐसा नहीं है कि इस संग्रह में सब कुछ अच्छा ही अच्छा है। कुछ व्यंग्य ऐसे भी हैं जो यदि बहुत निराश नहीं करते, तो भी सामान्य या पिछड़े हुए लगते हैं। ‘सवा सोलह आने आज़ादी’, ‘साहित्य में समर्पणवाद’, ‘प्रचारित होने की कला’, ‘सर्कस, रोटी और बच्चे’ तथा ‘भीषण गर्मी से होने वाले फायदे’ कुछ ऐसे ही शीर्षक हैं जो अपने ही घर में औरों से पीछे छूटे हुए दिखाई देते हैं। ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि इनमें व्यंग्य है ही नहीं, किंतु जो धार अन्य शीर्षकों में है, वह इनमें नहीं है। हाँ, शीर्षकों की बात की जाए तो निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि इस संग्रह का शीर्षक कुछ और होता तो बेहतर होता। ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’, जिसे संग्रह का प्रतिनिधि व्यंग्य बनाया गया है, वह व्यंग्य का प्रतिनिधित्व वैसा  नहीं कर पाता, जैसा करना चाहिए। प्रतीकों के माध्यम से लिखा गया यह व्यंग्य बुरा तो नहीं है, फिर भी कई बार निरुद्देश्य लगता है। इधर बहुत से व्यंग्यकारों में एक चलन देखा गया है कि वे संग्रह का शीर्षक मजेदार दिखाने के लिए कुछ ऐसा कर देते हैं जो व्यंग्य की गंभीरता का तनुकरण कर देता है। इस संग्रह के व्यंग्य किसी गंभीर शीर्षक की माँग करते हैं। दूसरे, प्रूफ की कमियाँ खटकती हैं। खासकर विराम चिह्नांे को प्रकाशक ने काफी उपेक्षित किया है। जहाँ पेपरबैक में साफ-सुथरी छपाई लेखक के लिए बेहतर है, वहीं व्यंग्य जैसी विधा जिसमें भाषा और शब्दों से ही व्यंग्य की चासनी बनती है, में प्रूफ की गलतियाँ खटास डाल देती हैं।

व्यंग्य संग्रह ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’ से गुजरते हुए एक सुखद एहसास यह होता है कि रामस्वरूप दीक्षित व्यंग्य और मज़ाक में अंतर को बखूबी समझते हैं। वे कहीं भी व्यंग्य को मज़ाक नहीं बनने देते, चाहे वे व्यंग्य के किसी भी उपकरण का प्रयोग करते हांे। व्यंग्य उपजाने के लिए शब्दों के कतिपय अपारंपरिक प्रयोग करते हैं, किंतु वे उल्टा-पल्टा प्रयोग करके व्यंग्य को हास्यास्पद नहीं बनाते। यह भी कहा जा सकता है कि उनके तमाम व्यंग्य हास्य से दूर हैं। व्यंग्य एक गंभीर कर्म है, उसका उद्देश्य गंभीर होता है। हास्य के चक्कर में बनाई गई रचना को व्यंग्य मान लेना उचित नहीं होता। यह बात अलग है कि कभी-कभी व्यंग्य के साथ तीर्यक या विद्रूपात्मक मुस्कान आ जाती है। ‘कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ’ संग्रह में व्यंग्य का आशावाद देखा जा सकता है।

पुस्तक   कड़ाही में जाने को आतुर जलेबियाँ

        (व्यंग्य संग्रह)

लेखक   रामस्वरूप दीक्षित

प्रकाशक   इंडिया नेटबुक्स प्रा0 लि0

    सी-122, सेक्टर - 19, नोएडा, 201301

पृष्ठ 118 मूल्य: 250/ (पेपर बैक)


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पुस्तक समीक्षा 

‘सदियों का सारांश’ में समाहित सामाजिक सरोकार

लेखक - द्विजेन्द्र ‘द्विज’


आशुतोष आशु ‘निःशब्द’, आशुतोष आशु ‘निःशब्द’, सत्कीर्ति निकेतन, गुलेर, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश - 176033

इन्सान ने जब प्रगति के उत्तरोत्तर शिखरों को फ़तह करने की क़वायद शुरु की थी, उस जद्दोजहद में सबसे मुश्किल हालत तब पैदा हुए जब प्रगतिशील समूह परिस्थितियों को छोड़कर आपस में ही संघर्ष करने की ठान बैठे। ऐसे में तत्कालीन मनीषियों ने ‘सुलह के उपाय’ खोजने का निर्णय किया। दीर्घ मंथन से जो नवनीत सृजित हुआ उसमें निष्कर्ष यही निकला कि परस्पर संघर्ष से उत्पन्न मानसिक ऊष्मा को शांत करने के लिए संगीत एक अचूक औषधि है। सामवेद की उत्पत्ति की यही पृष्ठभूमि है। इसी आधार पर कालांतर में छंदकाव्य का बृहद इतिहास रचा गया। 

भर्तृहरि ने ध्यान की तुरीयावस्था में में कहा था कि संगीतविहीन मनुष्यों की स्थिति पृथ्वी की छाती पर विचरने वाले मूढ़ पशुओं के समान है। आधुनिक विज्ञान भी संगीत को अब एक चिकित्सा विधा के तौर पर देखता है। और विचारणीय है कि हमारे शब्दों में संगीत छंदों की लय पर गूंजता है। उस अनुगूंज से उत्पन्न स्पंद लहरियाँ हृततरंगों को अपनी थाप पर नचाने लगती हैं। तथा उस नृत्य का साक्षी, आत्मा आनंदित हो उठता है। 

यही कारण है कि छंदों की अनुपम महिमा के जानकार काव्य में शब्दों के वज़न पर ख़ास एहमियत देते हुए अल्फ़ाज़ की नक्काशी में सदियां बिता देते हैं। ग़ज़लगोई छंद की इसी का अनुसरण करती है। तथा ग़ज़ल के असली फ़नकार लयबद्ध शब्दों को संजोने और तराशने  जल्दबाज़ी नहीं दिखाते। कभी उनकी डायरी के पन्नों को उलट कर देखें तो उन सफों पर आढ़ी टेढ़ी लाइनों में कटे फटे शब्दों का ऐसा अंबार देखने को मिलेगा कि आप ग़ज़लगोई तफ़सील में उलझ कर रह जाएँगे। परन्तु थकिएगा नहीं, बल्कि उन्हीं कटी फटी इबारतों में सिमटा ‘सदियों का सारांश’ खोजिएगा। 

मैं सोचता हूँ कि प्रकृति के मातहत, बलिदान की अभीप्सा पाले पहाड़ के दीर्घकालिक एकांतिक संघर्ष का साक्षी बनकर, रचनाकार ने पहाड़ के सारांश को शब्दों में कैसे समेटा होगा? तभी ग़ज़लगो की समीक्षक आँखें मतला गढ़ती हैं - “ख़ुद भले ही झेली हो त्रासदी पहाड़ ने / बस्तियों को दी लेकिन हर ख़ुशी पहाड़ ने।” 

पहाड़ का संघर्ष इतिहास के पन्नों ने गौण दिखाया है। बिलासपुर को पंजाब से सीधे जोड़ने के लिए फोरलेन खोदने की कवायद में पहाड़ का सीना केवल छलनी नहीं किया जाता, बल्कि पहले बोटी-बोटी नोचकर उसे नंगा किया जाता है। उसके तन पर लिपटा वनस्पतियों का लिहाफ़ उधेड़ा जाता है। फिर पहाड़ के सीने से गाद निकालकर उसे किसी नदी मुहाने पर पल पल गलने के लिए छोड़ दिया जाता है। मग़र ग़ज़लगोई के उम्दा फ़नकार, द्विजेन्द्र ‘द्विज’ उस दर्द को ज़ाया नहीं बहने देते। 

सद्यप्रकाशित ‘सदियों का सारांश’, द्विज के इस ग़ज़ल संग्रह की यही ख़ासियत है कि हताश पहाड़ों के वज़नी दर्द को द्विज मात्राओं के वज़न में ऐसे तौलते हैं कि बहर के संतुलन में पहाड़ की पीड़ा सिसकती कूहलों के मानिंद अपने अस्तित्व को संजोए रखने के भरसक प्रयास में संघर्षरत दिखाई पड़ती है। लहलहाते पहाड़ों को कोरुओं की नज़र क्या लगी कि पहाड़ों को सुराहीदार होते देख द्विज का दर्द छलक उठता है - “ये ग़ार-ग़ार सीना ये रिसता हुआ वजूद / दामन किया है किसने झीना पहाड़ का।”

पृष्ठ 16 पर आप गज़ल संग्रह की प्रतिनिधि ग़ज़ल से मुख़ातिब होते हैं। यहाँ आप पाएंगे कि साक्षी भाव से उपजे वैचारिक दृष्टिकोण को द्विज ने नकारात्मकता में उलझने नहीं दिया है। सब तरह के विनाश को आँखों देखकर भी ग़ज़लगो हताशा में नीचे नहीं देखना चाहता। बल्कि ‘सदियों का सारांश’ दार्शनिकता ओढ़ लेता है - “हजारों सदियों का सारांश कुछ कथाएँ हैं / और इन कथाओं का सारांश प्रार्थनाएँ हैं।”

संगीत और कला का संगम जीव को मनुष्य बनाता है। यह चेतना की वह अवस्था है जहाँ विनाश को देखकर संवेदना मात्र उद्वेलित नहीं होती, बल्कि अपने हिस्से की ज़िम्मेदारियाँ निभाना भी बख़ूबी जानती है। द्विज की ग़ज़लों में वही संवेदना समाज को भी चेतन करने का हक़ अदा कर रही है। उपरोक्त अश’आर के नेपथ्य में द्विज जो कहना चाहता है वो यह, कि सदियों की विडंबनाओं को कुछ कथाओं में समेटकर हम मनुष्य केवल प्रार्थनाओं में उनका समाधान खोजने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि होना तो यूँ चाहिए था कि इतिहास से शिक्षा लेकर हम वर्तमान को सही बनाने के सृजनात्मक प्रयास करते। 

द्विज के छंदों में कटाक्ष है - “इसीलिए यहाँ ऊबी सब आस्थाएँ हैं / पलों की बातें हैं पहरों की भूमिकाएँ हैं।” द्विज केवल शाइर ही नहीं, दार्शनिक भी है। जो लोग 

द्विजेन्द्र से निजी परिचित हैं, वे उनकी शाइस्ता शखि़्सयत को बख़ूबी जानते हैं। मगर उनकी ग़ज़लों में हमारा परिचय विद्रोही द्विज से भी होता है। दो विशेष जाति समूहों से संबंध रखने वाला सम्माननीय व्यक्ति द्विज कहलाता है। पुराने ज़माने में वैद्यक वृत्ति के उपासकों को ‘द्विज’ कहते थे। क्योंकि जन्मना जाति के अतिरिक्त वे लोग विशिष्ट वैद्यक समूह के भी सदस्य होते हैं। उसी प्रकार अध्यापक होने के साथ-साथ द्विज की संवेदनशील वैचारिकता उन्हें भी ऐसे ही दो विशिष्ट समूहों की अग्रिम पंक्ति में स्थित करती है। लिहाजा द्विज केवल द्विज ही नहीं, अपितु द्विजेन्द्र भी हैं। 

उधर द्विज अपने अनुभव से जो दिखाते हैं, वो टिप्पणियाँ दिलचस्प होने के साथ-साथ चौंकाने वाली भी हैं - ‘जयद्रथ’, ‘शकुनि’, ‘दुर्याेधन’ हैं, अनुपस्थित हैं कृष्ण मगर / ऐसे में गांडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है।” वर्तमान परिस्थितियों में कौरवों का बिम्ब, ‘उत्पीड़न’ को रोकने में अर्जुन इसलिए असमर्थ नहीं है कि वो गांडीव चलाना नहीं जानता, प्रत्युत कथित ‘कृष्णों’ की भूमिका अर्जुन को स्पष्ट नहीं। मगर द्विज के दिल में छटपटाहट है। किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति का दर्द अश’आर में बह निकलता है - “ज़ह्न-ओ-दिल में ये कोई डर नहीं रहने देता / शोर अन्दर का हमें घर नहीं रहने देता।” 

यह केवल किसी एक ग़ज़लगो का दर्द नहीं है। बल्कि वो हरेक शख़्स जो संवेदनशील है, जिसका दिल अमानवीय यातनाओं की पीड़ा से बिलखता है, जो अपनी ही धरा से निष्कासित कश्मीरी पंडितों के दर्द से राबता रखता है, जो ध्रूवीकरण की राजनीति में पिसते धर्मों पर होती चोट से आहत होता है; उन्हीं सबके दर्द को द्विज की कलम बयान करती है। 

तीसवें सफ़े पर ये दर्द लावा बनकर इस कदर फूटता है कि कई हुकूमतें उसकी ज़द में आकर धूल फांकने लगती हैं - “भूख, बेकारी, गरीबी, ख़ौफ़, मज़हब का जुनूं / माँगिए दिल से दुआ इन बद्दुआओं के ख़िलाफ़।” 

मग़र ये बद्दुआएं किसकी देन हैं? 

आधी सदी बीतने को आई कि जब ‘गरीबी हटाओ’ का नारा बुलंद हुआ था। उसके बाद एक दशक बीतने को हुआ कि कहा ‘रोज़गार देंगे’, मगर वादों का गपोड़शंख ऐसा है कि कहता है - ये सब क्या मांग है? कुछ और बड़ा मांग कर देखिए, हम देने के लिए ही तो बैठे हैं! इसलिए मैं पूछता हूँ, कि वो कौन हैं, जो भूख, बेकारी और लाचारी जैसी बद्दुआएं देते हैं? द्विज की क़लम कहती है - “क्या तअज्जुब है जो ज़हरीला समर लगता है / जिस भी मिट्टी में सियासत का शजर लगता है।” 

क्या यह सच नहीं कि सियासत का दरख़्त किसी चीढ़ के मानिंद आतंकी होता जाता है। चीढ़ जैसी विस्तारवादी और उसी की तरह एकांतिक प्रगतिवाद की द्योतक, सियासत अपने नीचे और विटपों को पनपने का मौका नहीं देना जानती। और जहाँ इस दरख़्त के पत्ते झड़े, वहाँ केवल आगज़नी की वारदातें बढ़ सकती हैं, लेकिन नई पौध के लिए माक़ूल माहौल पैदा नहीं हो सकता। तभी मेरे दिल के ग़ुबार को द्विज शब्द देता है - “किसी के ठौर ठिकानों में पस्त रखता है / हमें वो पाँव के छालों में मस्त रखता है।” 

द्विज की ग़ज़लों में समरसता है। उनके अल्फ़ाज़ की ज़ेहनियत सदाशयी है। इसलिए आप सहज शब्दों में गुंथे द्विज के अनुभव से ख़ुद को सहजता से जुड़ा हुआ पाते हैं। पुस्तक ‘सदियों का सारांश’ संकलित सभी ग़ज़लें उम्दा हैं। उन सब को इस क़रीने से संजोया गया है कि भावार्थ की दृष्टि से प्रत्येक पिछली ग़ज़ल अगले सफ़े पर आने वाली ग़ज़ल से एक अघोषित जुड़ाव रखती है। और हर ग़ज़ल के नेपथ्य में आप पिछली ग़ज़ल की अनुगूँज को महसूस कर सकते हैं। 

समाज का ऐसा कोई पहलू नहीं जिसे द्विज ने छुआ नहीं। और इन ग़ज़लों को पढ़कर यदि दिल में हलचल नहीं हुई, तो समझिये कि इन ग़ज़लों को हमने दिल से पढ़ा नहीं। 

भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली से प्रकाशित इस ग़ज़ल संग्रह को द्विज ने ग़ज़लगोई के मशहूर फ़नकार और अपने मरहूम पिता, स्वर्गीय मनोहर शर्मा ‘साग़र’ पालमपुरी को समर्पित किया है। कुल 88 ग़ज़लों का सारांश 128 पन्नों में दर्ज हुआ है। आवरण सज्जा महेश्वर की है। और प्रकाशक एवं लेखक ने सम्पादन पर गंभीरता से कार्य किया है। कठिन उर्दू शब्दों का सरलार्थ प्रस्तुत करके अश’आरों के भावार्थ को सुलभ बनाया गया है। बहुत तोड़जोड़ करने पर केवल एक या दो टंकण की त्रुटियाँ सामने आती हैं। 

कुल मिलाकर सामाजिक सरोकार से सरोबार ग़ज़ल संग्रह ‘सदियों का सारांश’ दिल को सुकून देने वाला है। मूल्य 260 रुपये, पूरा पैसा वसूल है।    

पुस्तक का नाम - सदियों का सारांश, लेखक - द्विजेन्द्र ‘द्विज’, प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, मूल्य - रुपये 260/-, 



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चर्चा के बहाने 

समय के साथ रचनाओं के पुनर्पाठ की आवश्यकता



डॉ. रेनू यादव, गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा - 201 312


मनोविज्ञान जीवन का अहम् हिस्सा है और साहित्य को गहराई से समझने के लिए पात्रों के मनोविज्ञान को समझना अतिआवश्यक है। जैनेन्द्र का उपन्यास सुनीता को मनोवैज्ञानिक उपन्यास के अंतर्गत रखा जाता है किंतु मनोविज्ञान को आधार बनाकर लिखने वाले लेखक की प्रत्येक रचना को मनोवैज्ञानिक आलोचना के मापदंड़ों पर ही परखा जाए, यह आवश्यक नहीं। 

श्रीकान्त, सुनीता, हरिप्रसन्न तथा सुनीता, हरिप्रसन्न, सत्या के त्रिकोणिय पात्रों के माध्यम से जैनेन्द्र ने रिश्तों में अतृप्ति, आकर्षण, अंतर्द्वन्द्व, कुण्ठा, खालीपन को दर्शाने का प्रयास किया है। इन पात्रों को प्रेम की अतृप्ति ही एक दूसरे से बाँधने के लिए विवश करती हैं। देखा जाए तो इन पात्रों में प्रेम नहीं बल्कि मात्र आकर्षण दिखाई देता है, जिसकी तीव्रता कभी अधिक तो कभी कम होती है। चाहे वह आकर्षण अपने जीवनसाथी के प्रति हो अथवा परपुरूष या परस्त्री के प्रति। 

श्रीकांत का प्रेम सही अर्थों में अपने यायावर दोस्त हरिप्रसन्न के लिए दृष्टिगत होता है, जिसे सांसारिक जीवन में वापस लौटा ले आने के लिए वह अपनी पत्नी सुनीता को मोहरा बनाता है। श्रीकांत और सुनीता दोनों के वैवाहिक जीवन में असंतुष्टि की वजह श्रीकांत के द्वारा बार बार सुनीता को मानसिक रूप से हरिप्रसन्न के लिए तैयार करना भी हो सकता है। कोई भी पत्नी यह नहीं चाहेगी कि उसका पति उसे अपने दोस्त के हाथों में सौंपे। श्रीकांत के ऐसे व्यवहार से पढ़ी लिखी एवं सजग स्त्री सुनीता बार बार अनमना-सी ही व्यवहार करती है और अपनी सारी इच्छाओं को ताक पर रखते हुए अपने आपको घरेलू कामों में व्यस्त कर देती है। ऐसे में हरिप्रसन्न का घर में आना और श्रीकांत द्वारा बार बार उन दोनों को अकेला कर सुनीता को हरिप्रसन्न के करीब रहने के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करना या आज्ञा देना या अकेले रहने के लिए परिस्थिति का निर्माण करना आदि सुनीता के मन में हरिप्रसन्न के लिए विरक्ति से आसक्ति पैदा कर देता है। यह मात्र आज्ञाकारी पत्नी होने के नाते नहीं बल्कि हरिप्रसन्न का बौद्धिक, कलाकार एवं स्वतंत्र विचार सुनीता के विचारों के अनुकूल बन संबल बनता दिखाई देता है। इसी प्रकार हरिप्रसन्न भी सुनीता के स्वतंत्र एवं उन्मुक्त विचार के प्रति आकर्षित होता है, जो कि स्वाभाविक है। विवाह और आकर्षण के आलम्बन के बीच अंतर्द्वन्द्व में उलझी सुनीता पर आकर्षण विजय पाता है। इस चयन के निर्णय के पश्चात् श्रीकांत का अनायास ही दिख जाना उसकी अहमियत समाप्त हो जाने जैसी स्थिति की वजह स्वयं श्रीकांत है जो कि सुनीता को हरिप्रसन्न के साहचर्य की आज्ञा देता है और स्वयं को अपने मन से निकाल देने की भी। ऐसी स्थिति में सुनीता के मन में उसकी भावनाओं की उपेक्षा करने वाले पति से बदले की भावना भी हो सकती है। इन सबमें सत्या का आकर्षण सुनीता और हरिप्रसन्न के लिए खीझ बनकर निकलता है और सत्या के आकर्षण को सुनीता के चयन के पश्चात् गौण बना दिया जाता है। 

पूर्ववर्ती आलोचकों के अनुसार यह उपन्यास मनोवैज्ञानिक उपन्यास के अंतर्गत है किंतु जैनेन्द्र इसे पूरी तरह से मनौवैज्ञानिक उपन्यास बनाने में चूकते हुए दिखाई देते हैं। जैनेन्द्र कुंठित श्रीकांत और विचलित हरिप्रसन्न दोनों ही पुरूषों के बीच में सुनीता का वस्तुगत मूल्यांकन करते हुए दिखाई देते हैं। जहाँ नारी मन की गिरहें खोलने को उसके कपड़े उतार देने से मान लिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि कि इस उपन्यास के सृजन के औचित्य की अस्पष्टता के बाद भी आलोचकों ने इसे सही साबित करने के लिए अलग-अलग तर्क देते हुए एक ही निर्णय दिया है कि यह एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। देखा जाए तो इस उपन्यास में हरिप्रसन्न ही एक मात्र ऐसा व्यक्ति है जो निर्णय पर अड़ा हुआ है। आकर्षण के कारण उसके मन में सुनीता के लिए विचलन तो पैदा होता है पर नग्न सुनीता को देखकर विरक्ति के बोध से भर जाता है। जिसे आलोचकों ने उसे सांसारिक पथ पर वापस लौट आने की संभावना के साथ जोड़ा है। जबकि उसमें अनाकर्षण की संभावनाएँ और अधिक बलवति दृष्टिगत होती हैं अन्यथा वह सुनीता के साथ रत् हो कर उसका सहयोग करता, वापस नहीं लौट जाता। सुनीता का वस्त्र उतारना उसका हरिप्रसन्न के प्रति न तो आकर्षण को दर्शाता है और न ही अनाकर्षण को बल्कि वह एक यांत्रिक गति से समर्पण के लिए तैयार हो रही होती है जिसका पति उसे हरिप्रसन्न के पास जाने के लिए विवश कर देता है और हरिप्रसन्न एकांत में उसे देखकर विचलित-सा लगता है। यह नारी मन का अपने पति से बदले की भावना भी हो सकती है और यदि हरिप्रसन्न के प्रति आकर्षण बलवति हो जाए तब भी उस आकर्षण का विलय कर उसे पा लेने की चाह भी हो सकती है। हरिप्रसन्न से उसे अपेक्षित व्यवहार न मिलने पर वापस अपने पति (जिसने अपने दोस्त के पास उसे जाने के लिए सारा खेल रचा और स्वयं को मन से निकाल देने का आग्रह भी किया, हरिप्रसन्न के साथ जाते हुए जिसे देखकर स्वयं सुनीता ने अनदेखा कर दिया) के पास लौटकर खुशी खुशी लिप्त हो जाने जैसे यांत्रिक व्यवहार रचकर जैनेन्द्र नारी मन से अछूते रह जाते हैं और उसके साथ अन्याय करते हुए नज़र आते हैं। हरिप्रसन्न के मन के जालों को साफ करने की जिम्मेदारी सुनीता कत्तई नहीं हो सकती और यह करवाने वाला तो उसका पति बिल्कुल भी नहीं। किंतु यह भी समाज का ही हिस्सा है। अंततः लेखक पात्रों के छल में सुनीता को यांत्रिक बना वस्तु ही साबित करते हैं।

दरअसल इस उपन्यास का औचित्य भी संदेह के कटघरे में खड़ा दिखाई देता है। लेखक ऐसे रिश्तों के ताने-बाने से क्या संदेश देते हैं, यह गोल-गोल घुमावदार और भूल-भूलैया वाला प्रतीत होता है। जरूरी है कि साहित्य का पुनर्पाठ हो। 

पुस्तक - सुनीता, 

लेखक - जैनेन्द्र कुमार, 

विधा - उपन्यास, संस्करण - 15वीं, 2018, 

प्रकाशक - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, मूल्य - 120/-

रेनू यादव, फेकल्टी असोसिएट, 

भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग, 

गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,  यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा - 201 312

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समीक्षा

‘रोशनी या प्रकाश-पुंज’

श्री सन्दीप तोमर, -उत्तम नगर, नई दिल्ली, मो. 8377875009

रचनाकार-सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

पुस्तक- “रोशनी के अंकुर” {लघुकथा}

रचनाकार- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ 

प्रकाशक: निखिल पब्लिशर एंड डिस्ट्रीब्यूटर, आगरा 

प्रकाशन वर्ष: 2019

आलोचको को अब लघुकथाकारों ने अपनी ओर आकर्षित करना शुरू किया है, लघुकथाओं पर आलोचना लिखी जा रही है, जो इस विधा को एक सही स्थान देने के लिए आवश्यक भी है। आलोचक अब नए रचनाकारों को तवज्जो देने लगे हैं, यह भी एक सुसंकेत है, कुछ लघुकथाकारों ने आलोचकों की ओर अपना ध्यान आकृष्ट किया है, सविता मिश्रा ऐसा ही एक नाम है जिनकी लेखन क्षमता हमें चौंकाना नहीं छोड़ती, यह उनके और लघुकथा विधा दोनों के लिए ही एक शुभ संकेत हैं। इस रचनाकार की मौजूदगी लघुकथा लेखिकाओं को भी बहुत आश्वस्त करती है, एक बानगी देखिए- “चुप कर मुई! कोई सुन लेगा, समाज में इज्जत बाकी रहे इसके लिए बहुत कुछ करना होता है, और फिर मैं तो उसे मर्द के नाम पर छाँव दे रही हूँ। अब भले ही वह नामर्द है। उसकी भी इज्जत ढकी रहेगी और अपनी भी।“

“रोशनी के अंकुर” असल में न ही कहानी संग्रह है, न ही ये लघुकथा संग्रह, इसमें समाहित 101 रचनाएँ हैं, जो कहानी की रवानगी से शुरू होकर लघुकथा के कलेवर में प्रस्तुत होती है। कथानक के चयन से लेकर वाक्य-विन्यास की दृष्टि से अगर देखा जाए तो मालूम होता है कि कहीं लघुकथा के कथानक को कहानी के अंदाज में लिखा गया है तो कहीं कहानी के कथानक को लघुकथा के रूप में लिखा गया है। लेकिन एक बात महत्वपूर्ण है कि रचनाकार सामान्य पारिवारिक विषयों/ समस्याओं का भी अति-विशिष्टीकरण करने में सक्षम है। इन समस्याओ को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना ही रचनाकार की बड़ी विशेषता है। समाज में हो रहे परिवर्तन- आधुनिकीकरण, विकास, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, इत्यादि का पारिवारिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है, सविता इन सबका सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं, पीढ़ियों के न खत्म होने वाले अन्तर को “अनपढ़ माँ” में बखूबी दिखाया गया है, दाम्पत्य सम्बन्धो में संदेह हमेशा बना रहता है जिसको “कागज का टुकड़ा” में देखा जा सकता है। सविता हर पारिवारिक घटना पर मानो नजर गड़ाए बैठी हैं, कहीं आन्तरिक द्वंद्व को गहरे से निकाल पन्नो पर उकेर देती हैं, तो कहीं पारिवारिक रिश्तों में “प्यार की महक” को खोजने लगती हैं बनते बिगड़ते रिश्तों में “तुरपाई” के महत्व को भी वे रेखांकित करना नहीं भूलती। धागे के उलझने और रिश्तों के उलझने का अंतर-सम्बन्ध लेखिका ने दर्शाया है।

“रोशनी के अंकुर” पुस्तक सविता की संवेदनाओं का विस्तार है जो विभिन्न पात्रों के माध्यम से उभरता है। उनके पास संवेदनाओं के विभिन्न रंग है। ”तोहफा” कथा सकारात्मक सोच की एक बढ़िया पारिवारिक रचना है। “नियत” मनोवैज्ञानिक स्तर पर लिखी गयी सुन्दर रचना है। सविता की एक विशेषता ये है वे मात्र कथानक को विस्तार देने के लिए नहीं लिखती हैं। उनके लेखन में कथा के यथार्थ के साथ समाधान भी उपलब्ध है जिसे वे पात्र के माध्यम से समाज के सामने बड़े ही सहज ढंग से पेश करती हैं। ”माँ की सीख” में माँ कहती है-“जिन्दगी की कुछ तस्वीरें सबक सीखने-सिखाने के लिए भी ली जाती हैं।...” ये तस्वीरें है- लाल किले के कोने में पान के पीक, बदबूदार गन्दा कोना, पत्थरों पर लिखे आलतू-फालतू नाम, जगह-जगह लुढकी हुई पानी की खाली बोतलंे। लेखक का काम लिखना मात्र नहीं है- वह समाज को चेताने का काम भी करता है, समाज को जागरूक भी करता है, बहुत साधारण तरीके से लिखी गयी यह रचना समाज को बहुत बड़ा सन्देश दे जाती है। 

कथा ‘निर्णय” में कबड्डी-खिलाड़ी का सब्जी बेचना पूरी शिक्षा-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है। गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ी का बेटे द्वारा परिचय कराने पर नीलम के चहरे से ख़ुशी का काफूर होना, बेटे के भविष्य की चिंता की लकीरे उसके चेहरे पर उभर आना, देश में खेलो के महत्व पर सोचने की ओर इशारा करता है। ”अभिलाषा” एक मानवेत्तर रचना है जिसमें चूड़ियों के माध्यम से एक सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया गया है। “सच्ची सुहागन” में नायक जेब में महज दो सौ रूपये देख सामान खरीदने की योजना बनाता है, लेखिका यहाँ गरीबी का एक चित्र खींचती हैं, नायक सामान ले घर पहुँचता है। पत्नी के साथ संवाद- “बड़े खुश लग रहे हो, लगता है कल के लिए, बच्चों को भरपेट खाने को कुछ लाये हो, आज तो भूखे पेट ही सो गए दोनों।“- यहाँ लेखिका ने कहने का प्रयास किया है- माँ के लिए बच्चो से बढ़कर कुछ नहीं।

“राक्षस”लघुकथा के माध्यम से लेखिका परिवार में बच्चियों की सुरक्षा पर प्रश्न-चिह्न खड़ा करती हैं, रचना का कथानक एक वीभत्स घटना है-जहाँ पिता ही बेटी की अस्मिता को तार-तार कर देता है, यह समाज का घिनोना सच है जिससे लेखिका रूबरू कराती हैं। “बेबसी” द्वारा बच्चो के विवाह बाद रिटायर माँ-बाप से अपने व्यस्त जीवन से समय न निकाल पाने की लेखिका की वेदना सभी बुजुर्ग माँ-बाप की वेदना बन कर उभरती है।

“ठंडा लहू” व्यंग्यात्मक शैली की रचना है। जिसे पढ़कर हिंदी भवन दिल्ली के पास चाय बेचते साहित्यकार “लक्ष्मण राव” की याद आती है, कितने ही साहित्यकार हैं जो बहुत अच्छा लिखने के बावजूद प्रसिद्ध नहीं हो पाते, जिसका एक बड़ा कारण प्रकाशकों का बदलता स्वरुप है, इस रचना का पात्र परशुराम ऐसा ही एक पात्र है। 

“मन का बोझ” की शुरुआत लेखिका व्यंग्यात्मक संवाद से करती हैं, जिसमें खुद के पुत्र के दुर्घटना में मारे जाने पर पात्र में संवेदना जागृत होती है, यह आत्मग्लानि से आत्मचेतना की रचना है। “बदलते भाव” में लेखिका मार्के की बात कहती है-“छीन-झपटकर कोई कब तक जिन्दा रह सकता है भला, पाप का घड़ा एक न एक दिन फूटता ही है।“ संग्रह की एक रचना है -“आस” जिससे एक सन्देश प्रदर्शित होता है-“इंसानियत की पहचान इन्सान की नजदीकी से पता चलती है, सुनी-सुनाई बातों से नहीं।“ यहाँ एक बात और ध्यान देने की है- अभाव वस्तु की कीमत का अंदाजा लगा देता है। एक संवाद देखिये-“अन्न का अपमान नहीं करना चाहिए.... ये अमीर लोग क्या जाने इन दानों की कीमत, यह तो कोई मुझसे पूछे, जिसके घर में हांड़ी में अन्न नहीं, पानी पकता है।“ ये एक पंक्ति समस्त साहित्य पर भारी पड़ती है।

“खुलती गिरहें” पढ़कर अंदाजा होता है कि लेखिका इस सब्जेक्ट में विशेष दक्षता रखती हैं, इस रचना और लेखिका दोनों पर सामाजिक प्रभाव का असर है। यह असल में पलायन की रचना है, जिससे सन्देश जाता है कि विचार परिवर्तन ही रिश्तों को सहज करते हैं। एक संवाद इसी रचना से-“मैंने ही सासु माँ नाम से अपने दिमाग में कँटीली झाड़ियाँ उगा रखी थी। सब सखियों के कडुवे अनुभवों ने उन झाड़ियों में खाद-पानी का काम किया।“ असल में सास शब्द को लेकर समाज में एक अजीब सी रिश्तों की दूरी है, जिससे बाहर आने का सन्देश ये रचना देती है। “वर्दी” पीढ़ियों की सोच का अंतर दर्शाती रचना है जो ज्यादा प्रभाव तो नहीं छोडती, लेकिन पहले लिए गए निर्णयों का प्रभाव आगामी जीवन पर क्या पड़ता है, इस बात की पड़ताल अवश्य करती है। “टीस” से स्त्री-पुरुष के बीच चारित्रिक भेद का अंतर लेखिका पुनः उजागर करती है, किसी एक महिला के घर छोड़कर जाने की सज़ा समाज कई पीढ़ियों को देता है, जबकि कोई पुरुष घर छोड़ जाए तो उसे सहानुभूति मिलती है, लेखिका ने यहाँ समाज के दोहरे चरित्र पर सवाल खड़ा किया है। “ढाढस” में दो वर्गों के अंतर को दो संस्कृति के अंतर के तौर पर रखा गया है, लेखिका पढ़ाई की अहमियत को इंगित करते हुए सन्देश देती हैं कि शिक्षा इन संस्कृतियों के अंतर को कम कर सकती है।

लेखिका को अभी साहित्य के क्षेत्र में बहुत कुछ करना है तो बहुत कुछ सीखना भी है, जो बात पूरे संग्रह में अखरती है वह है, विषयों में विविधता का न होना, कथानक चयन में एक बने बनाये दायरे के इर्द-गिर्द घूमना। व्याकरण पर भी लेखिका को ध्यान देना होगा। “दर्द” रचना की पहली पंक्ति- शिखा अपनी पड़ोसन अमिता और बच्चों के साथ पार्क में घूमने गयी.... शिखा अपने बच्चों को आवाज दी... श्रेया, मुदित जल्दी आओ घर चलना है.... कोई पार्क का पहरेदार देखकर गुस्सा न करने लगे.... । एक ही रचना में इस तरह की व्याकरणिक गलतियों को टंकण की अशुद्धि कहकर नहीं बचा जा सकता। इस रचना का विषय पेड़-पौधों का दर्द है जिन्हें बोध कथाओं में खूब लिखा गया है, फिर इसमें नया क्या है? ”भूख” रचना में आँसुओं की नन्ही-नन्ही बूँदें तकिये की गोद में सोने चली थी,... ये किस तरह का प्रयोग है, मेरी पाठकीय नजर से बाहर की बात है। “आस” में अतः आधी टिफन भीखू को दे डाली...., यहाँ भी व्याकरण पर ध्यान देने की जरूरत है। “तीसरा” रचना को आखिर लेखिका ने क्यों लिखा उस पर सवाल हो सकता है लेकिन आत्मकथ्यात्मक शैली में लिखी रचना में -“अक्सर सोचती हूँ कि आखिर ऐसा क्यों करते हैं लोग” जैसे वाक्यों से बचना चाहिए। “निर्णय” रचना को अगर संवाद के साथ विवरणात्मक शैली को भी सम्मिलित किया जाता तो अधिक प्रभावी रचना होती। “समय का फेर” रचना स्वयं में समय की मांग करती है, लेखिका अगर इसे समय दें तो इस रचना कोई भी बेहतर ढंग से लिखा जा सकता है। 

अबोर्शन को केंद्र में रखकर लिखी इस रचना पर लेखिका को सुझाव देना चाहूँगा- लेखिका को भाग्य या गलत काम के प्रभाव पड़ने जैसे अवैज्ञानिक विचार से बाहर आना चाहिए। बच्चे न होना एक वैज्ञानिक कारण है, जिसकी वजह किसी डॉ का गर्भपात में लिप्त होना नहीं हो सकता। यह मानसिकता विल्कुल वैसी है जैसे शाप से सर्वनाश जैसी कल्पना करना। “नजर” और “मीठा जहर” औचित्यहीन रचनाएँ हैं, लेखिका को इस तरह की रचना लिखने से भी बचना चाहिए। “हाथी का दांत” में लेखिका ने “मोदी जी” शब्द का इस्तेमाल किया है। साहित्य वह होता है जो भविष्य में भी अपने समय का प्रतिनिधित्व करता है। “नेहरु” टायटल से ब्रांड बनने में सदी लगती है, “मोदी” टायटल को ब्रांड बनने में समय का इंतजार करना होगा। “टायटल के शब्द रचना को हल्का बनाते हैं और साहित्य को कालजयी होने से रोकते हैं, रचना मात्र समायिक होकर रह जाती है, पद “प्रधानमन्त्री” इत्यादि लिखना जोखिम से बचना भी होता है और रचना को समय से आगे ले जाना भी। रचनाकार को शब्द-संचयन के मामले में बहुत सचेत रहने की आवश्यकता है, इसे कथ्य और कथा विन्यास के हिसाब से भी एक कमजोर रचना ही कहा जायेगा।

लेखिका की अधिकांश रचनाएँ नारी-वेदना, नारी-विमर्श, नारी-सशक्तिकरण के इर्द-गिर्द घूमती हैं, लेकिन वे स्त्रीवाद की हिमायती न होकर स्त्री की अस्मिता की हिमायत करती है, जो लेखिका को स्त्रीवादी रचनाकारों से अलग करता है। उनके अन्दर की स्त्री-चेतना स्वाभाविक है। अधिकांश रचनाओं में लेखिका स्त्री के प्रति समाज के संकुचित दृष्टिकोण पर ध्यान आकृष्ट करती दिखाई देती हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो सविता के लेखन को सफल कहा जा सकता है। 

भाषा-शैली की बात करें तो सविता की भाषा काफी लचीली है, जिसमें वे बातचीत के अंदाज में अपनी बातें कहती जाती हैं। उन्हें किसी भी तरह से किसी विशेष शैली की जरुरत महसूस नहीं होती। कहीं-कहीं मुहावरों का प्रयोग भी किया गया है. हालांकि अभी यह सविता की पहली एकल किताब है तो इसमें शब्दों के प्रयोग में बहुत अधिक सावधानी दिखती नहीं है। कहीं-कहीं वे असावधानी से भी कुछ प्रयोग करती हैं। सामान्य शब्दों के साथ कहीं कहीं भारी-भरकम शब्दों जिनका पर्याय आम बोलचाल के शब्दों में भी उपलब्ध है, का इस्तेमाल भी लेखिका कहीं कहीं कर गई हैं जिनसे अर्थ पर तो नहीं लेकिन, वाक्य के प्रवाह और सौन्दर्य पर प्रभाव पड़ता है। “मन का चोर” सुनते ही चेहरा फक्क पद गया, बोली- इस बंटी ने लगा गिरा दिया होगा...  तू कुछ खाई की नहीं... “कथा है”- कितना अच्छा तो लिखी हो रूबी..... “मीठा जहर” ...”अरे दी आप भी न. ।“ ”भाई । फिर वह रोहित को सम्बोधित हुआ.... । ”बदलाव” लघुकथा में कुछ संवाद बहुत अच्छे हैं लेकिन अंत तक आते-आते लेखिका कथा-वाचिका की भूमिका में आ जाती है, यह रचना अंत तक आते-आते अपना अभीष्ट खो धरासाई हो जाती है, रचनाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह रचनाकर्म करते समय तठस्थ रहे। 

पाठशाला में मुहावरा का प्रयोग भी वे करती हैं......आग से रुई हुई जा रही थी। बहरहाल, कुल मिलाकर ये कह सकते हैं कि सविता के इन रोशनी के अंकुरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये रोशनी सीधी पाठकों की आँखों को खोए रखती हैं, और हमें यह मानना होगा कि ये अंकुर अपने आप में हिंदी साहित्य को विधागत स्तर पर और समृद्ध कर स्वयं एक वट वृक्ष बनेंगे। रोशनी के अंकुरों में काफी कुछ मौजूद है 

कुल मिलाकर पूरी पुस्तक पठनीय होने के साथ-साथ विचारणीय भी है। प्रकाशकीय स्तर पर कुछ वर्तनी संबंधी अशुध्दियाँ हैं, जिनसे कहीं-कहीं अवरोध भी उत्पन्न होता है। उन्हें नज़रंदाज़ भी नहीं किया जा सकता। साज-सज्जा की दृष्टि से पुस्तक आकर्षक है और आवरण-पृष्ठ उतना ही विशेष है जितनी सविता मिश्रा की रचनाएँ. रचनाकार को इस पुस्तक के लिए शुभकामनाएँ। 



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समीक्षा

पवित्र अनुभवों व प्रभावी प्रार्थनाओं का गुलदस्ता...

यादों के किनारे !!!


श्री मुकेश तिरपुड़े, रायपुर, छत्तीसगढ़, मो. 9340802123

सुश्री किरण यादव, नई दिल्ली, मो. 9891426131

अपने मन की भावनाओं, मन के विचारों को कविताओं का रुप देना सचमुच बड़ी कला है उससे भी बड़ी उपलब्धि है इसे सहज रूप में कागज के पन्नों पर सिलसिले वार प्रस्तुत करना !!

समकालीन हिंदी कविता की सुपरिचित कवयित्री किरण यादव जी के महत्वपूर्ण काव्य संग्रह यादों के किनारे में उन्होंने महत्वपूर्ण विचारों पर उल्लेखनीय कविताएं लिखी हैं !!

जीवन पथ पर निरंतर चलते हुए दो लोगों का साथ एक दूसरे के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, बहुत आवश्यक होता है इस विचार को उन्होंने अपनी इस कविता में बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है कि...

जहां छुपे हैं तुम्हारे/सारे ग़म/ज़ख्म, आंसू, सपने,/मैं ढुंढना चाहती हूं/तुम्हारे मन का गुप्त कोना/यहां वहां लिखी/अधुरी कविताएं, शेर, मिसरे, पंक्तियां !!/डायरियां, कुछ अनलिखे पन्ने/मैं तुम्हारे साथ रोना/हंसना, तड़पना चाहती हूं/जहां तुम बिल्कुल अकेले हो/मैं वहां आना चाहती हूं !!/( कविता शीर्षक - मैं वहां आना चाहती हूं/पृष्ठ...14)

एक अन्य महत्वपूर्ण कविता में उन्होंने सपनों के धीरे धीरे बेआवाज दरकने की पीड़ा को शिद्दत से व्यक्त किया है कि - बिना वादे के प्रतीक्षा करना/कितना मुश्किल है/जितना तेज आंधियों में/दीये को बचाना/जुगनुओ की मद्धम रौशनी में/जंगल का रास्ता पार करना/सपनों की छांव तले/बंजर बंजर भटकना !!/( कविता शीर्षक --वादा/पृष्ठ 19)

छोटी छोटी कविताओं में कवयित्री किरण जी ने प्रेम के महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियों को खूबसूरती के साथ साकार किया है जैसे कि नींद मुझे भी प्यारी है/पर मैं/आंखें खोल/तुम्हें देख लेती हूं !!

(कविता शीर्षक.... नींद/पृष्ठ 25 )

जिंदगी में सुख दुख के पल धूप छांव की तरह होते हैं हर दुख के बाद सुख की घड़ी आती ही है । जैसे कि हर अंधकार के बाद रौशनी आती है! वे लिखती हैं कि.....

आखिर भोर का सूरज/अपने नयन खोलता/सुनहरी किरणें बिखेरता/गहरी रात के बाद/प्रभात में मुस्कुराता है !!/

(कविता शीर्षक भोर का सूरज/पृष्ठ संख्या 33 )

बुढ़ी आंखें हमेशा पुरानी यादों की गठरी को अपने सीने से लगाए रहती है और नये दिनों की उजली धूप में पुराने दिनों की परछाइयां तलाशती रहती हैं।

इन बातों का बढ़िया जिक्र कवयित्री ने समय शीर्षक से लिखी गई कविता में किया है कि

बुढ़ी आंखें/समय का बदला/मंजर देख/अपना बीता हुआ/समय याद करती हैं/मेडे/खेतों की पगडंडी/और कच्चे घर/तलाश करती हैं !!

(कविता शीर्षक.... समय/पृष्ठ संख्या 35 )

रवि शीर्षक से लिखी गई कविता बरबस आकर्षित करती है वह लिखती हैं कि/रवि/रश्मियों की अद्भुत दिव्यता के साथ/अपने सुनहरे रथ पर आरूढ़ हो/जब यात्रा पर निकलता है/कुहु कुहु करते पक्षी/थिरकते पत्ते/मैदानों, पहाड़ों/नदियों की रमणीयता/खिल उठती है !!/धरा मुस्कुराती मन्द मन्द/अपने कोमल नेत्र खोलती/पल्लवित हो/तुम्हें नमस्कार करती है !!

(कविता शीर्षक --रवि/पृष्ठ संख्या 54)

ऋतुएं शीर्षक से लिखी गई कविता में कवयित्री किरण जी ने प्रकृति में परिवर्तन के स्थायित्व को प्रमाणित करती है कि

पेड़ों से झरते पत्ते/समय और जीवन का/परिवर्तन ही तो है/झरेगा/तभी नया उगेगा !!!

(कविता शीर्षक ऋतुएं/पृष्ठ संख्या....61 )

मन की इच्छाओं का कभी कहीं कोई अंत नहीं होता है।

काश कि इच्छाएं ठहर जाएं तो मन को कितना सुकून हो !! लेकिन इच्छाएं समय की तरह समय के साथ साथ परिवर्तन शील होती हैं। मन की इच्छाओं पर लिखी गई कविता इच्छाएं ध्यानाकर्षित करती है कि

मेरे मन की सभी इच्छाएं/मेंढक सी उछल रही हैं/पोखर में ठहरे पानी की तरह/उगने लगी है जलकुंभी !/चाहती हूं इच्छाएं ठहर जाएं !/झील की तरह/खिली रहे कमलों के जैसे/स्वच्छ निर्मल/और चाह है बस यही/गहन मौन में डूब/उतर जाऊं सागर में/यात्रा करुं उस पार की/समा जाऊं/सागर की असीम सीमाओं में !!

(कविता शीर्षक इच्छाएं/पृष्ठ संख्या 117 )

साधारण होना सबसे ज्यादा कठिन माना गया है सामान्य जीवन जीने से ज्यादा उत्तम कुछ भी नहीं है। सामान्य जीवन जीते हुए ही हम सब मानवता के करीब होते हैं और आम लोगों के सानिध्य में रहकर परम आनंद की अनुभूति को सहज रूप में प्राप्त करते हैं। सुपरिचित कवयित्री किरण यादव जी की महत्वपूर्ण कविता

सामान्य इन्हीं विचारों की पुष्टि करता है कि//मैं सामान्य हूं/सामान्य ही रहूंगी/पहेलियों में उलझना/चालाकियों में चलना/मुझे नहीं आता/जमीनी हूं/जड़ों से जुड़ी रहूंगी/मोहरें नहीं रखती पास/कि मुट्ठी में छुपाकर/जीभ तले दबाकर रखूं/

पर मन करता है/सीख लूं तिलिस्म/बन जाऊं हातिमताई !!

(कविता शीर्षक -- सामान्य/पृष्ठ संख्या 95 )

हिंदी की इस बहुचर्चित कवयित्री किरण यादव जी का यह दूसरा महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है। इससे पहले एक उल्लेखनीय काव्य संग्रह अन्तरयात्रा प्रकाशित और चर्चित हो चुका है। उनका यह दूसरा महत्वपूर्ण काव्य संग्रह यादों के किनारे प्रतिष्ठित बोधि प्रकाशन संस्थान जयपुर से प्रकाशित हुआ है।पेपर बैक संस्करण का मूल्य 150 रुपए रखा गया है। बढ़िया साफ सुथरी छपाई और त्रुटिरहित वर्तनी का बढ़िया शानदार प्रभाव इस काव्य संग्रह को शानदार और यादगार बनाता है।

मैं इस बढ़िया शानदार और यादगार काव्य संग्रह के लिए सुप्रसिद्ध कवयित्री किरण यादव जी और प्रकाशन संस्थान बोधि प्रकाशन संस्थान जयपुर को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ। 



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वातायन-यूके की शतकीय संगोष्ठी प्रवासी भवन-दिल्ली में आयोजित

हाइब्रिड मोड में आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ब्रिटेन में हिंदी साहित्य एवं शिक्षण में देश-विदेश के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारों और हिंदी प्रेमियों की सहभागिता रही। 

नई दिल्ली, 5 अप्रैल 2022। वातायन-यूके की गरिमापूर्ण सौवीं संगोष्ठी, जिसमें देश-विदेश के लब्ध प्रतिष्ठित लेखकों, साहित्यकारों और हिंदी-प्रेमियों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में भाग लिया, का शुभारंभ डॉ. एस. के. मिश्रा द्वारा संपादित एक लघु फिल्म से हुआ, जिसमें विश्व भर के हिंदी प्रेमियों ने वातायन-यूके की शतकीय संगोष्ठी के सुअवसर पर शुभकामनाएं प्रेषित की हैं। मनु सिन्हा द्वारा वंदना की प्रस्तुति के बाद विश्व हिंदी जगत की बेहतरीन प्रस्तुतकर्ता और पुरस्कृत लेखिका, अलका सिन्हा ने संचालन की बागडोर संभाली। 

संगोष्ठी के आयोजक-मण्डल, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, केन्द्रीय हिंदी संस्थान, वैश्विक हिंदी परिवार और अक्षरम, की ओर से श्याम परांडे जी ने स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय भाषाओं का प्रसार विदेशों में भी हो रहा है। वातायन-यूके की अध्यक्षा, मीरा मिश्रा कौशिक, ओबीई, ने अपने स्वागत-उदबोधन में कहा कि वातायन गत 19 वर्षों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्य, संस्कृति, कला और भाषा से जुड़े हिंदी प्रेमियों के लिए एक सशक्त मंच बनकर उभरा है, विशेषतः लॉकडाउन के दौरान, दिव्या माथुर, डॉ. पद्मेश गुप्त और अनिल शर्मा जोशी के मार्गदर्शन में वातायन-यूके की युवा टीम के साथ उन्हें भी कार्य करने का अवसर मिला।

ऑक्सफोर्ड बिजनैस कॉलेज के निदेशक डॉ.. पद्मेश गुप्त ने वातायन की स्थापना, उद्देश्य एवं उपलब्धियों पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए बताया कि प्रवासी भवन-दिल्ली में वातायन के 100वें कार्यक्रम का आयोजन ऊर्जा प्रदान करता है। 2 अप्रैल 2020 से लॉकडाउन संगोष्ठियों का आयोजन प्रत्येक शनिवार को होता आया है, इसके अतिरिक्त, प्रति वर्ष वातायन सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण, परिचर्चा, संवाद, साक्षात्कार, स्मृति-संवाद, लोक-गीत जैसी श्रंखलाओं के माध्यम से विश्व भर के सैंकड़ों लेखकों और हिंदी प्रेमियों को जोड़ा जा चुका है। वातायन की सहयोगी संस्था यूके हिंदी समिति के हिंदी पाठ्यक्रम को 50 से अधिक हिंदी संस्थाओं ने मान्यता दी है। 

 अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद के अध्यक्ष, पूर्व राजदूत वीरेंद्र गुप्ता जी ने कहा कि कोविड काल में वातायन-यूके ने हिंदी सेवा का जो कार्य अपने कंधे पर लिया है, वह बदलाव ला रहा है, वर्तमान पीढ़ी को भी अपने ही देश में हिंदी के लिए अपनी संकुचित मानसिकता का त्याग करना चाहिए। सुप्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपने उद्बोधन में कहा कि विश्व हिंदी सम्मेलन की परिकल्पना को साकार एवं सफल बनाने के पीछे ऐसे ही हिंदी प्रेमी संस्थाओं का अहम योगदान रहा है। भाषा के विकास के लिए सोचना होगा कि सिर्फ हम भारतीय ही केवल हिंदी में बोलें बल्कि इसे विदेशी मूल के लोग भी अपनाएं। राजभाषा राष्ट्रभाषा के प्रति जन जन की जिजीविषा हो इसके लिए वातायन यूके ने निरंतर सफल प्रयास किया है।


सुविख्यात लेखिका नासिरा शर्मा ने ब्रिटेन में हिंदी साहित्य और शिक्षण के संदर्भ में कहा कि पाठ्यक्रम ऐसा हो कि लोगों को हिंदी से स्वयं मोहब्बत हो जाए। उन्होंने हिंदी गोष्ठियों और सम्मेलनों में विदेशी मूल के लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करने की पैरवी की।

कार्यक्रम के अध्यक्ष, पूर्व कुलपति प्रोफेसर सच्चिदानंद जोशी ने हिंदी सिनेमा का उदाहरण देते हुए कहा कि फिल्म में किसी पात्र का शुद्ध हिंदी बोलना हास्य-परिहास का बोध कराता है, हमें ऐसे मिथक तोड़ने होंगे। हिंदी के प्रति अंदर से उत्साह पैदा हो और ऐसे सकारात्मक वातावरण का संयुक्त प्रयास से निर्माण होना चाहिए तभी हम हिंदी को आगे बढ़ा सकते हैं ।

दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर और ‘वातायन‘ की स्मृति संवाद शृंखला की समन्वयक डॉ. रेखा सेठी ने वातायन की साप्ताहिक संगोष्ठियों की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए कहा कि वातायन से जुड़े सभी लोग रचना करते हैं यह प्रयास सराहनीय है। उन्होंने एशिया, यूरोप और अमेरिका में हिंदी भाषा पाठ्यक्रम के विभिन्न चरणों को विस्तार से बताया। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय रचनाकारों द्वारा हिंदी शोध पर आधारित कार्यों का भी उल्लेख किया।

केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिन्दी की परीक्षक डॉ. अरुणा अजितसरिया, एम.बी.ई, ने ब्रिटेन में हिंदी शिक्षण को लेकर प्रारंभ, प्राथमिक एवं उच्च स्तर तक की शिक्षण व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ब्रिटेन में हिंदी शिक्षण अब तक एक लघु उद्योग के रूप में चल रहा है, इसे विस्तार देना होगा। ब्रिटेन से  सुरेखा चोफला ने  यूके हिंदी समिति द्वारा हिंदी शिक्षण के कार्यों का विस्तृत उल्लेख किया। 

नारायण कुमार जी ने भारतीय भाषाओं के साथ ही हिंदी के सतत् विकास पर जोर देते हुए कहा कि विश्व भर में हिंदी प्रेमियों के लिए वातायन एक सशक्त मंच के रूप में स्वीकारा जा रहा है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने भाषा में भविष्य की पैरवी पर बल देते हुए कहा कि पैनडैमिक काल की चुनौतियों में वातायन-यूके ने हिंदी के प्रचार और प्रसार में जो पहल की, वह सराहनीय है। केन्द्रीय हिंदी संस्थान की निदेशक, डॉ. बीना शर्मा जी के संक्षिप्त किन्तु सुंदर धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। 

वर्चुअल (जूम) कार्यभार संभाला आशीष मिश्रा, कृष्ण कुमार, चेतन जी और आस्था देव ने,  सभागार में उपस्थित थे वातायन-यूके की संस्थापक और लेखिका दिव्या माथुर, कोषाध्यक्ष शिखा वार्ष्णेय, अरुण सबरवाल और शुभम राय त्रिपाठी, वातायन-भारत की प्रमुख डॉ. मधु चतुर्वेदी, डॉ. मनोज मोक्षेंद्र,  हरजेंद्र चौधुरी, डॉ. एस के मिश्रा, आदेश पोद्दार, इत्यादि, विश्व के अनेक देशों से हिंदी प्रेमियों की वर्चुअल उपस्थिति स्मरणीय रहेगी, जिनमें सम्मिलित थे प्रो तोमियो मिजोकामी, प्रो लुडमिला खोंखोलोव, डॉ. तात्याना ऑरनसकाया, अनूप भार्गव, संध्या सिंह, आराधना झा श्रीवास्तव, डॉ. प्रभा मिश्रा, जय शंकर यादव, डॉ. के के श्रीवास्वव, अथिला कोठवाल, विवेकमणि त्रिपाठी, डॉ. निखिल कौशिक, जय वर्मा, डॉ. शिव पांडे, डॉ.. सुनील जाधव, कादंबरी मेहरा, शैल अग्रवाल, इत्यादि। 

शुभम राय त्रिपाठी, vatayanpoetry@gmail.com

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प्रेस विज्ञप्ति

साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार 

2021 की घोषणा

22 भाषाओं में पुरस्कार घोषित 

मैथिली और राजस्थानी पुरस्कारों की घोषणा बाद में 

नई दिल्ली 24 जून 2022।  साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष डॉ. चंद्रशेखर कंबार की अध्यक्षता में आज  रवीन्द्र भवन, नई दिल्ली में आयोजित अकादेमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार 2021 के लिए 22 पुस्तकों (अनुलग्नक ‘क’ के अनुसार) के चयन को अनुमोदित किया गया। अनुवाद पुरस्कार के लिए पुस्तकों का चयन समितियों की अनुशंसा के आधार पर किया गया है । संबद्ध भाषाओं में पुरस्कार उक्त वर्ष से तत्काल पहले के वर्ष  के पाँच वर्षों में (अर्थात् 1 जनवरी 2015 और 31 दिसंबर 2019 के मध्य) प्रकाशित  पुस्तकों पर दिए गए हैं।  

चयन समितियों के सदस्यों के नाम संलग्न अनुलग्नक ‘ख’ में दिए गए हैं, जिनकी संस्तुतियों के आधार पर अनुवाद पुरस्कार घोषित किए गए हैं। मैथिली और राजस्थानी भाषाओं में पुरस्कारों की 

घोषणा बाद में की जाएगी।

यह पुरस्कार इसी वर्ष आयोजित एक विशेष  समारोह में प्रदान किए जाएंगे तथा प्रत्येक अनुवाद पुरस्कार विजेता को पुरस्कार स्वरूप रु. 50,000/- की राशि तथा उत्कीर्ण ताम्रफलक दिया जाएँगा।

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प्रेस विज्ञप्ति

‘एक चिड़िया, अनेक चिड़ियाँ’ का आयोजन हुआ...



संजय भारद्वाज, पूणे  मो. 9890122603

पिछले तीन दशक में विशेषकर महानगरों में गौरैया की संख्या में 70% से 80% तक कमी आई है। महानगरों में बहुमंजिला गगनचुंबी इमारतों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इन इमारतों के प्रति स्क्वेयर फीट की कीमतों ने औसत 14 सेंटीमीटर की चिड़िया के लिए जगह नहीं छोड़ी। सुपरमार्केट और मॉल के चलते पंसारी की दुकानों में भारी कमी आई है। खुला अनाज नहीं बिकने के कारण चिड़िया को दाना मिलना दूभर हो गया है। खेती की ज़मीन बेतहाशा बिक रही है। फसलों पर कीटनाशकों का छिड़काव हो रहा है। घास का बीज चिड़िया का प्रिय खाद्य रहा है। अब हम घास भी हमने कृत्रिम कर डाली। छोटे झाड़ीनुमा पेड़ इनके बसेरे थे जो हमने काट दिए। चिड़िया जिये तो कैसे जिये? और फिर मोबाइल टॉवर आ गये। इन टॉवर के चलते  दिशा खोजने की गौरैयाँ की प्रणाली प्रभावित होने लगी। साथ ही उनकी प्रजनन क्षमता पर भी घातक प्रभाव पड़ा। अधिक तापमान, प्रदूषण, वृक्षों की कटाई और मोबाइल टॉवर के विकिरण से गौरैया का सर्वनाश हो गया।

उपरोक्त विचार ‘एक चिड़िया, अनेक चिड़ियाँ’ कार्यक्रम में सूत्रधार द्वारा व्यक्त किये गए। यह कार्यक्रम महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर पुणे में आयोजित किया गया था। 

साहित्यजगत में पहली बार गौरैया पर केंद्रित साहित्य की नाटक, लोकगीत, लोककथा, कविता, कहानी, लघुकथा जैसी विविध विधाओं और कलाओं द्वारा प्रस्तुत इस रंगारंग कार्यक्रम की निर्मिति क्षितिज द्वारा की गई है। 

विलुप्त होती गौरैया की साहित्य, पर्यावरण और विज्ञान की दृष्टि से पड़ताल इस कार्यक्रम की विशेषता है। देश-विदेश में अपनी तरह का यह प्रथम और एकमेव कार्यक्रम है।  महानगरों से गायब हो चुकी गौरैया को लौटा लाने के आह्वान के साथ आयोजन ने विराम लिया।

‘एक चिड़िया, अनेक चिड़ियाँ’ के लेखक, निर्देशक, सूत्रधार संजय भारद्वाज हैं। उन्होंने इस आयोजन को देश के विभिन्न महानगरों में प्रदर्शित करने के लिए व्यक्तियों, कॉर्पाेरेट, बड़े उद्योगपतियों से सहयोग का आह्वान किया। बड़ी संख्या में शहर के साहित्यकार, कलाकार और पर्यावरण प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित थे।


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