अभिनव इमरोज़ जुलाई 2022







कविताएँ


डायरी-कविता: दो

लौट आया हूँ अपने ही शहर से 

जलावतनी का दर्द लिए तड़पता हुआ 

जैसे कोई शमशान घाट से लौटा हो

मासूम लोगों के कत्लेआम का... 

ज़िंदा रहने के लिए इस सब का क्या मतलब हो सकता है-

एक ज़िंदा शहर की चीर-फाड़, लूटपाट का 

‘क्यों तग़ाफुल मुझ से अय अब्रे करम बहरें सखा 

मैं ही क्यों महरूम तेरे फैजे आलमगीर से’

क्या सब ख़त्म? कुछ नहीं कर सकूँगा क्या?

(20 दिसंबर, 2019)


कौन बुला रहा?

आकाश चुप 

धरती चुप 

उतरता अँधेरा

समुद्री हिलारें चट्टानों से खेलतीं-टकरातीं 

टूटती डुबोती आतीं मुझ तक

ध्वनियों में लिपटे 

ध्वनियों के स्पन्दन

त्वचा के नीचे 

रग रग में 

अंतर्मन तक 

एक शांत अनुगूँज,

चुप्पी की गाँठे 

बोल रहीं जैसे

कौन बुला रहा?  

साभार: ‘किरदार निभाते हुए’ नरेन्द्र मोहन


कविता


मर ही क्यों न जाऊँ?

शब्दों का इतना तीखा आलोक 

वर्णन-व्याख्या-व्याख्यान का इतना अंधा शब्दाटोप 

पिचकी पड़ी सच की जान लहुलूहान 

क्या करूँ - 

किसी की जान बचाते हुए 

मर ही क्यों न जाऊँ, सुजान?


पहली बार देख रहा हूँ 

प्रेम (गूंगे का गुड़ कहते हैं जिसे) को इस कदर बड़बड़ाते 

एक ही साँस में 

दुहाई देते, कसमें खाते

झूठ का वितान तानते 

मूर्त को अमूर्त में मूर्तामूर्त में फेंटते 

री अजब-गजब सुजान - 

प्रेम के घर में यह कैसा कोहराम


कहती है सुजान - 

‘संभल कर, यह खाला का घर नहीं है’ 

‘जानता हूँ’

मैं हँसते हुए कहता हूँ 

मैंने देखा - 

वह हँसते हँसते 

मेरे साथ हो ली है


मैं ही मरा हूँ आसपास

वे दो दिन 

मेरे खून में रवाँ हैं अब भी

देखता हूँ डरे-डरे ऑफिस जाते पिता सुबह-सुबह 

सहमे से आतंकित लौटते शाम को 

चीख़ पड़ते सोये हुए रात को

14 अगस्त, 1947, लाहौर बनता पाकिस्तान 

15 अगस्त, कटता दो फाँक हिंदुस्तान

और जश्ने आजादी हर साल 

इधर भी उधर भी

उन दो दिनों की यादों ने खूब पागल बनाया मुझे 

कहाँ सोचा था 

वे दिन सचमुच दहलाते रहेंगे 

हफ़्ते में कई-कई बार

कुछ न कुछ हो ही जाता हर रोज 

कभी मरता पाश, कभी सफदर हाशमी 

आ चिपकती तलवों में 

खून सनी यादें और मैं सहमा-सा गिरता 

क्षत-विक्षत, बार-बार

विचार के भाल को फोड़ती 

एक गोली

और हत्या कलबुर्गी की

शब्द से बेदखल जैसे आसमान 

थर्राता रहा

और जश्न मनाती मोहम्मद इख़लाक के ख़ून की प्यासी

हत्यारों की भीड़

बाज़ के पंजे में एक गौरेया

अंतिम साँस तक एक चीख़ ढेर होती

दशहत में लब खुले हैं आज़ाद

बेख़्वाब

बेआवाज़

कलबुर्गी हो या मोहम्मद इख़लाक

मैं ही मरा हूँ- आसपास!

साभार: ‘किरदार निभाते हुए’ नरेन्द्र मोहन

कविता


खुद आकर देख क्यों नहीं लेते?

क्या हाल बताऊँ 

तुम दिल्ली से मुंबई से लाहौर पहुँच 

तड़प कर पूछते रहे, ‘मैं कहाँ हूँ-हिंदुस्तान या पाकिस्तान 

मेरा मुकाम क्या है?‘ 

और मैं लाहौर से दिल्ली आ गया, इन्हीं सवालों से बिंधा


मंटो! दिल्ली और लाहौर की गलियों की रौनक, यकीनन, 

बढ़ गयी है 

खौफ़ और दरिन्दगी भी 

किसी दिन खुद आ कर 

दोनों तरफ़ का नज़ारा देख क्यों नहीं लेते?


एक सुगन्धी (‘हतक‘) से काम नहीं चलेगा 

सारा शगुफ्ता और शगुफ्ता रफ़ीक जैसे पात्र 

तुम्हारी इंतजार में हैं, मंटो!


नये से नये कानून बने हैं 

अवाम की बेहतरी के लिए लेकिन ‘नया कानून‘ के लिए 

मंगू कोचवान जैसा जज़्बा और ललकार कहीं नहीं दिखती 

उँगलियों से झरती रेत में 

क्या कहीं कोई चमकीला ज़र्रा नहीं बचा मंटो!

चचा साम की याद तुमने खूब दिलाई 

शायद तुम नहीं जानते 

चचा साम कितने उदार हैं इन दिनों 

शांति के लिए कितने बेताब 

इराक हो या अफगानिस्तान 

बिन बुलाये 

झोंक देते हैं अपनी फौजें 

खोल देते हैं बम-बारूदों के भंडार 

दूसरों के लिए 

बिन मलाल


अमेरिकन गर्म कोट उधर 

और पतलूनें इधर 

लड़ती रहीं 

हथियारों की मार से टूटता-फटता रहा आसमान

और मचती रही तबाही 

इधर भी उधर भी 

क्यों सर खपाते हो 

पुरानी बात है, मंटो!


अब तो कई बारूदी सुरंगें हैं ज़मीन से 

आसमान की ऊँचाइयों से समुद्र की गहराइयों तक 

तुमको यकीन नहीं होगा मंटो। 

एक बार खुद आकर देख क्यों नहीं लेते?

हो सकता है तुम्हारे अफसानों में 

एक नहीं, कई ‘टोबा टेकसिंह‘ करवट लेने लगें।


साभार: ‘जितना बचा है मेरा होना’ नरेन्द्र मोहन

प्रस्तुति: सुश्री सुमन पंडित, नई दिल्ली, मो. 9818517717

सुपुत्री: स्व. डाॅ. नरेन्द्र मोहन


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संपादकीय

कुछ एक व्यक्ति विशेष दृष्टि से तो ओझल हो जाते हैं परंतु सृष्टि के धरातल पर हमेशा आप के चेतन में जीवित रहते हैं, उनके साथ रिश्ते की बुनियाद प्रेम, प्रेरणा, प्रोत्साहन और आपसी समझदारी जैसी अमूर्त सद्भावनाओं से पाली पोसी होती हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति विशेष ‘भराजी’ थे जिनके चले जाने का दुःख दो गुना हो गया क्योंकि मैं उनके वक्ते रुखसत कदम बोसी से महरूम रह गया-

यह ज़िन्दगी के कड़े कोस, याद आता है

तेरी निगाहे करम का घना घना साया।

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मेरे आदरणीय डाॅ. (कर्नल) एस. बी. कोतवाल जिनके ज़ेरे इलाज हूँ मैं आजकल। डाॅ. साहब के संपर्क में मैं 2004 में आया था और आज भी उनके संपर्क में हूँ। उन्होंने मेरा केवल इलाज ही नहीं किया बल्कि मेरा मनोबल भी बनाए और बढ़ाए रखा। यह मेरी खुशकिस्मती है कि मेरे जीवन में जो भी महानुभाव आए उन्होंने मेरे जीवन को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में समृद्ध ही किया है। मेरी खुशकिस्मत के संकेत मुझे बचपन से ही मिलने शुरू हो गए थे जब मैं अपने गुरुजनों के संपर्क में आया था। यह सब लोग आज भी मेरी ऊर्जा और प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। 

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विभिन्न मनःस्थितियों से उपजे कुछ दोहे

आदरणीय भाई साहब, 

आपके दोहे मैं दूसरी बार प्रकाशित कर रहा हूँ। इस बार के दोहे पढ़कर एक सुझाव देने से मैं अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ- वह यह कि आप आलोचना/समीक्षा से पल्ला झाड़कर अपने स्वर्गीय पूज्य पिता जी के नक़्शे कदमों पर चलते हुए काव्य विधाओं पर अपना हाथ अजमाएं। हिन्दी साहित्य संसार के लिए यह अविस्मरणीय योगदान सिद्ध होगा। 

उस ग्रंथ के प्रकाशन की जिम्मेदारी मैं उठाने को तैयार हूँ। 

डॉ. अवधबिहारी पाठक, सेंवढ़ा, दतिया (म.प्र.), मो. 9826546665


उम्मीदों के साज पर गाया मेघ मल्हार।

घन उमड़े बरसे उपल, रूठ गया करतार।। 1।।

तपा बहुत पिघला बहुत, मिली थोक में पीर।

तू क्या सब रोये यहाँ, मीरा मीर कबीर।। 2।।

दुनिया में जीना हुआ, एक तिजारती खेल।

हानि-लाभ जो भी मिले, पूरे मन से झेल।।3।।

जन हतप्रभ सा हो गया, तंत्र हुआ बेजान।

न्याय कचहरी में दिखे, बिल्कुल लहूलुहान।।4।।

आधा तुलसी ने कहा, ढाई कहा कबीर।

मीरा भोगा गह गये, बुल्लेशाह फफीर।।5।।

हृदयतंत्र पर ये धमक, बहुत हो गई देर।

यह भी क्या कम मिल गये चाहे देर सबेर।।6।।

मेरा अपनापन हुआ, रोज-रोज बदनाम।

जब-जब सपने में लिखी, चिट्ठी तेरे नाम।।7।।

एक किनारे पर खड़ा, देखूँ ढलती शाम।

कहा अनकहा जो रहा, लिखदूँ किसके नाम।।8।।

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संवाद

सच की एक सुलगती लकीर

(देवेन्द्र कुमार बहल से संवाद)

मंटो के साथ आप की सोहबत के बारे में पढ़ा है। मंटो आप के साथ-साथ, आप मंटो के साथ....

आपने सही फरमाया, मंटो को जानना-समझना, उसे पढ़ना, उसके अदब को लेकर कछ लिखना मंटो की सोहबत में रहना ही है। जैसे-जैसे आप उसे पढते हैं वैसे-वैसे वह आप के भीतर उतरता जाता है। उसे पढ़ते हुए या उस पर लिखते हुए मुझे पता ही न चला, वह कब मेरे साथ आ सटा और कब मेरे रचना मन में समाने लगा? मंटो के साथ होने की कुछ ऐसी आदत पड़ी कि आज तक छट न पाई। उसकी सोहबत है ही ऐसी। एक बार आप उसके साथ हो लिए तो आप देखेंगे वह साथ चलने लगा है और आप उसके साथ होने पर मजबूर हैं उसकी कहानियों की चर्चा करते हुए, उससे सहमत-असहमत होते हुए और कई बार उसके साथ लड़ते-झगड़ते हुए, लेकिन हर सूरत में उसकी सोहबत में।

नरेन्द्र मोहन जी, यह सोहबत क्या विभाजन के दिनों की देन है?

विभाजन और मंटो के साथ मेरा जो सम्बन्ध रहा है, उसे देखते हुए उसके साथ मेरी सोहबत को विभाजन के दिनों तक ले जाना स्वाभाविक ही है। न मंटो को विभाजन से अलगाया जा सकता है, न मुझे। हाँ, यह बात अलग है कि विभाजन मेरे बचपन की स्मृतियों और मेरे अवचेतन का हिस्सा है जब कि मंटो के साथ मेरा सीधा जुड़ाव बाद की घटना है। 12 साल का था मैं जब 19 अगस्त, 1947 को परिवार के साथ लाहौर से अमृतसर आ गया। और मंटो उस वक्त 36 साल का था जब वह जनवरी 1948 को बम्बई से लाहौर चला गया। मंटो ताउम्र उस त्रासदी की गिरफ्त में रहा, मैं भी उसे कभी भुला नहीं पाया हूँ। इसमें सन्देह नहीं, विभाजन ने मेरे अवचेतन, आप कह सकते हैं, लेखकीय अवचेतन का निर्माण किया है।

इसका मतलब है कि उन्हीं अनुभवों ने आप को विभाजन पर काम करने के लिए प्रेरित किया?

आप जानते ही हैं कि विभाजन विश्व इतिहास की एक बड़ी घटना, दुर्घटना है। इतिहास में वह घटनाओं और आँकड़ों के रूप में दर्ज है, लेकिन मेरे मन में वह तथ्य और घटना से कहीं ज्यादा एक भरा-पूरा हादसा है जो मुझे हाॅन्ट करता रहा है, मेरा पीछा करता रहा है। घटना तो बीत गयी लेकिन उसकी स्मृति कील की मानिंद मुझे हमेशा चुभती रही, सालती रही। इस स्मृति में वह इतिहास शामिल ही नहीं है, गुथा हुआ भी है। मैं जानता हूँ स्मृति इतिहास नहीं है, लेकिन इस स्मृति को इतिहास से बाहर रखना मेरे लिए संभव नहीं रहा। यही वजह है कि दोनों के दबाव में मैं छोटी कविताएँ, लम्बी कविताएँ, नाटक और अन्य रचनाएँ लिखता रहा। स्मृति में इतिहास को बुनने की कला के कई रूप-प्रारूप मेरी कविताओं और आलोचनाओं में, मंटो की जीवन-कथा ‘मंटो जिन्दा है‘, मेरी आत्मकथा ‘कमबख़्त निदर‘ और नाटकों में स्वतः आते गए हैं। मेरी लंबी कविता ‘एक अग्निकांड जगहें बदलता‘ में इतिहास और स्मृति की रेखाएं एक दूसरी को काटती-पीटती हमारे आज की त्रासदी की परतों को खोलने लगती है। ‘विभाजन की त्रासदी भारतीय कथा-दृष्टि‘ और ‘विभाजन  भारतीय भाषाओं की कहानियाँ‘ खंड एक, दो का सम्पादन मेरे लिए रस्म अदायगी नहीं है, विभाजन के उस कील की ख़लिश का नतीजा है जो अभी तक बरकरार है। मंटो की कहानी ‘टोबा टेकसिंह‘ से प्रेरित नाटक ‘नो मैन्स लैण्ड‘ जो कई बार मंचित हो चुका है, को विभाजन और मंटो की एक साथ नाटकीय उपस्थिति के तौर पर देखा जा सकता है। विभाजन मेरे लिए एक केन्द्रीय मेटाफर या रचना का विधायक बिम्ब बन चुका है जो लिखते हुए मुझे अक्सर घेरता रहता.

क्या आपने विभाजन के दिनों में मंटो को पढ़ा था?

नहीं, उस वक्त नहीं। वह बाद का फिनोमिना है, हालाँकि विभाजन की जड़ों से जुड़ा हुआ। मंटो और विभाजन को अपनी संवेदना का विषय बनाने में मुझे वक्त जरूर लगा, मगर यह सच है कि विभाजन मुझे मंटो तक ले गया।

कैसे? 

वही तो जलता हुआ जिन्दा तार है मेरे और मंटो के बीच जो गाहे-बगाहे मुझे और मंटो को जोड़ देता है। वही है जो मेरे और उसके बीच के अन्तराल को कम कर देता है और अनायास हमें एक वेवलेंथ पर ले आता है। देश के दो टुकड़ों में कटने के साथ, कटने का जो एहसास मंटो को हुआ वैसा ही मेरे जैसे लाखों लोगों को हुआ था। सीधे-सीधे न सही, प्रकारान्तर से, विभाजन ही है जो मुझे मंटो के करीब ले आया। मैंने जब मंटो की पहली कहानी ‘तमाशा‘ पहली बार पढ़ी तो मैं सात साल के उस बच्चे खालिद में बदल गया था जिसको केन्द्र में रखकर मंटो ने जलियाँवाला बाग के नरसंहार को दिखाया है।

आपने पहली बार मंटो को कब पढ़ा? 

बचपन की ध्वनियाँ घेरती रहीं, टूटती-बिखरती रहीं, आकार भी ग्रहण करती रहीं। हाँ, मैंने मंटो को सुना-पढ़ा बड़ी नाजुक उम्र में, किशोरावस्था और जवानी के बीच। बंटवारे के तुरंत बाद 19 अगस्त, 1947 को हम अमृतसर आ गए। तब मैं लाहौर के गली-कूचों को याद करता अमृतसर की गलियों में डोलता रहता-कभी दरबार साहब (स्वर्ण मंदिर) की तरफ निकल जाता, कभी जलियाँवाला बाग की तरफ। गली वकीलान, जहाँ मंटो का बचपन और जवानी बीती, हमारी गली के करीब ही थी। उस गली में लूटपाट का गवाह रहा हूँ। आगजनी में मैंने मकानों को जलते और मलबा बनते देखा था। आगजनी और लूटपाट के वे मंजर आज भी मेरे जे़हन में अंकित हैं।


बाऊ जी की ट्रांसफर पालमपुर हुई। वहाँ जाकर मैं भयंकर रूप से बीमार पड़ गया। स्कूल छूट गया। उन्हीं दिनों बाऊ जी हुक्के की गुड़गुड़ाहट के साथ कहानियाँ सुनाते रहते। छह महीने तक यह क्रम चला। बाऊ जी को उर्दू में महारत हासिल थी। मंटो की कहानियों को उन्होंने सीधे उर्दू से पढ़ा था। उर्दू, हिन्दी की किताबें और पत्रिकाएँ घर में आती रहती थीं। ये मेरी आवारगी और अकेलेपन के दिन थे। ऐसे ही किसी मौके पर मेरी नज़र पड़ी होगी मंटो पर यों ही चलते-चलते, रुकते, ठिठकते। मंटो से मेरा सीधा सामना 1958 में हुआ जब खालसा कॉलेज लुधियाना में मैं लेक्चरर बना। वहाँ लाहौर बुकशॉप में आना-जाना लगा रहता। कुमार विकल उन दिनों वहीं था। उन्हीं दिनों मंटो के अफसानों की दो किताबें मैंने खरीद कर पढ़ी थीं और मैं बुरी तरह हिल गया था। मुझे लगा अमूर्त रूप में मेरे भीतर जमे मंटो के बिम्ब मेरे सामने साक्षात् हो गए हो। 1960 में लुधियाना से खालसा कॉलेज, जालन्धर पहुँचा तो वहाँ के साहित्यिक माहौल ने नौजवान लेखकों, संगीतकारों और चित्रकारों की टोली ने मंटो और विभाजन सम्बन्धी मेरी धारणाओं को तेजी से बदला और मेरे अध्ययन को धार दी। 1967 में दिल्ली क्या आया कि मेरे लिए मंटो के संदर्भ कई आयामों में खुल गए। 1975 में विभाजन सम्बन्धी मेरी किताब ‘सिक्का बदल गया‘ (जिसमें मंटो शामिल था) जब आई तो कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी, देवेन्द्र इस्सर, महीप सिंह और कई भारतीय लेखकों ने उसे हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते वह किताब लेखकों-पाठकों के लिए संदर्भ-ग्रंथ बन गयी और उसके बाद यह सिलसिला किसी न किसी रूप में चलता ही रहा।

सबसे पहले मंटो की कौन सी कहानियाँ या नाटक आपने पढ़े? 

जहाँ तक याद आता है सबसे पहले ‘तमाशा‘ (जिस का जिक्र कर चुका हूँ) कहानी पढ़ी, साथ ही ‘स्वराज्य के लिए‘, ‘बू‘ और ‘हतक‘ जैसी कहानियाँ और ‘जेबकतरा‘ जैसा नाटक पढ़ा। 

आप की पसंद की कहानियाँ?

कुछ कहानियों का जिक्र कर चुका हूँ। ‘नया कानून‘, ‘शाहदौले का चूहा‘, ‘टोबा टेकसिंह‘, ‘खोल दो‘, ‘ठंडा गोश्त‘, ‘यजीद‘, ‘गुरमुख सिंह की वसीयत‘, ‘टिटवाल का कुत्ता‘, ‘खुशिया‘, ‘बाबू गोपीनाथ‘, ‘मम्मद भाई‘, ‘मम्मी...लम्बी सूची है। कहानी का कहानीपन तो इनमें है ही पर इन कहानियों की खूबी यह है कि ये वृत्तांत को तोड़ती चलती हैं। ये कहानियाँ विचार की किस तल्खी से या अन्त के किस अप्रत्याशित मोड़ से पाठक को हतप्रभ कर दें, कहना कठिन है।

‘मंटो की कहानियाँ‘ और ‘मंटो के नाटक‘ जैसी दो बड़ी पुस्तकों को तरतीब देने की बात आपके जे़हन में कैसे आई?

हिन्दी में तब तक मंटो पर कई संस्मरण छप चुके थे। कहानियाँ और ख़ाके भी कई पत्रिकाओं में आ चुके थे, मगर मंटो का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने वाली एक भी पुस्तक नहीं थी, हिन्दी में न उर्दू में। देवेन्द्र इस्सर द्वारा संपादित मंटो की चुनी हुई रचनाओं की पुस्तक ‘मंटोनामा‘ (1982) के सिवा और कोई बड़ी पुस्तक नहीं थी। सोचा क्यों न मंटो की कहानियों और नाटकों का संपादन किया जाए, लम्बी भूमिकाओं के साथ। यह भी लगा कि विभाजन के बाद के दिनों के हिन्दी कहानी के विकास को मंटो के संदर्भ के बिना समझना मुश्किल है। यह विचार आते ही मैंने मंटो की कहानियों और नाटकों की खोज और चयन का काम शुरू किया। मुझे लगा मंटो की कहानियों को एक पुस्तक में संपूर्ण रूप से बांधना सम्भव नहीं है, तो भी विषयों और शैलियों, प्रवृत्तियों और सरोकारों, रंगों और रूपों की विविधता की दृष्टि से एक पुस्तक संपादित की जा सकती है। ‘सआदत हसन मंटो की कहानियाँ ‘ 1990 और ‘सआदत हसन मंटो के नाटक ‘ 1991 उसी विचार और खोज का नतीजा है। यह पहली बार था कि इतनी बड़ी संख्या में मंटो की कहानियाँ और मंटो के नाटकों के सभी रंग, शेड्स, धाराएँ-अन्तःधाराएँ एक बड़े फलक पर प्रस्तुत हुईं। ये पुस्तकें खूब चर्चित हुईं। इनके कई संस्करण हुए और इस तरह मैं मंटो को भारतीय भाषाओं के लेखकों-पाठकों की स्मृति का हिस्सा बनाने का ज़रिया बना।

‘मंटो ज़िन्दा है’ जैसी जीवनी लिखने की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ?

बड़ा मुश्किल है यह बताना। किसी एक कारण की निशानदेही करना और भी मुश्किल है। मंटो का साहित्य और उसकी जिन्दगी इस तरह एक दूसरे में बिंधी हुई है, कई परतों में लिपटी हुई है कि आश्चर्य होता कि हिन्दी में मंटो के साहित्य और फन पर जहाँ महत्वपूर्ण काम हुआ है, उनकी जीवनी क्यों नहीं लिखी गयी? ‘दस्तावेज‘ के संपादक बलराज मेनरा और शरद दत्त एक अलग खंड में मंटो की जीवनी लिखना चाहते थे (दस्तावेज के भाग पाँच में उन्होंने इस तरफ संकेत भी किया है) मगर कई कारणों से यह संभव न हो सका। मंटो की ज़िन्दगी और उनका साहित्य मेरे सामने जब एक वेवलेंथ पर आ गए और मैं उन्हें लेकर एक उत्कर्ष बिन्दु पर आ गया तो मंटो की जीवन-कथा लिखने से मैं खुद को रोक न सका।

इतने बड़े काम को अंजाम देने के लिए ज़ाहिर है कई बाधाएँ आई होंगी? कई चुनौतियाँ झेलनी पड़ी होंगी? 

सबसे बड़ी चुनौती खुद मंटो था और वही सबसे बड़ा सहायक भी। कई तरह की विपरीत दिशाएँ वहाँ मिलती हैं। वह एक साथ कई सीरतों का मालिक है-अन्तर्विरोधों से घिरा। वह न खुद को बख़शता है, न किसी और को-खुदा को भी नहीं। उसकी जीवनी लिखना मेरे लिए निश्चय ही एक बड़ा अनुभव रहा है जो शायद मंटो पर किसी और तरह से लिखते हुए मुझे हासिल न होता। एक अनोखे रचना-क्षण में मंटो की जिन्दगी के बेहद उलझे हुए सुरों का एक धुन में जुड़ जाना और अन्ततः एक सिम्फनी में बदल जाना, मेरे लिए सीधे साक्षात्कार से कम न था। ऐसे ही एक क्षण में वह मुझे एक कौंध की तरह दसो दिशाओं में फैलता नज़र आया। उस कौंध को, उसके सभी रंगों-छवियों सहित जब मैंने पकड़ना चाहा तो कुछ पलों के लिए मेरे सामने अँधेरा छा गया।

कौंध में अँधेरा! मैं समझा नहीं......

मैं भी कहाँ समझा था। अंधेरे और प्रकाश की छाया-छवियों में मंटो मुझे कभी आधा नज़र आता, कभी अधूरा, कभी पूरा। तभी मैंने देखा मंटो ने जैसे अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया हो और मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा हो ‘चल मेरे साथ‘ और मैं उसके साथ चल पड़ा उसकी ज़िन्दगी लिखने के लिए।

आपकी जीवनी लेखन-प्रक्रिया क्या रही है?

तथ्य और घटनाएँ मेरे लिए समस्या नहीं थीं। उन्हें लेकर काफी शोध-कार्य मैं पहले ही कर चुका था। उस वक्त का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी यानी वे गलियाँ-कूचे, बाजार, शहर जहाँ मंटो का बचपन और जवानी बीती, मेरे देखे-भाले थे। मुझे यह तय करना था कि इनके साथ मेरा सलूक कैसा हो, इनके प्रति मेरा नज़रिया क्या हो? मेरे लिए अपेक्षित था कि मैं इनके भीतर से एक तटस्थ दृष्टिकोण अर्जित करूँ और मैंने पाया मंटो को लेकर यही सबसे मुश्किल काम है। उससे न्यूटरल या तटस्थ रहना बड़ा कठिन है।

ऐसे में आप कैसे आगे बढ़े? 

मेरे लिए जीवनी लिखना महज कथा लिखना या वृत्तांत लिखना नहीं रहा है। मेरे सामने चुनौती यह थी कि कथा और वृत्तान्त के साथ मंटो जैसे लेखक को उसके तमाम पहलुओं, तथ्यों और घटनाओं की प्रामाणिकता के साथ, मनोवैज्ञानिक गहराई में जिन्दा और समूचा पकड़ें? और जैसे ही मुझे लगा मैंने उसे पकड़ लिया, मुझे जो अभूतपूर्व अनुभव और थ्रिल महसूस हुआ, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। हिन्दी, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के लेखकों और पाठकों की मुझे जो प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, उनसे मुझे लगा कि विभिन्न भाषाओं और प्रदेशों के लोगों ने भी वैसा ही महसूस किया है जैसा मैंने। इससे मेरे अनुभव का निश्चय ही विस्तार हुआ। 

जीवनी लिखने की कला से वाकिफ लोग जानते हैं कि जीवनी के केंद्रीय चरित्र का चित्रण या निरूपण करते हुए आप उस चरित्र का वृत्तान्त कैसे पेश करते हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। चरित्र में दाखिल होना, उसकी दोहरी-तिहरी सीरत के आर-पार देखना, उसकी फितरत के कई पहलुओं को कई कोणों से जानना-पहचानना, अन्तर्विरोधों की जाँच-पड़ताल करना, उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना, उसकी विरोधी हरकतों का जायज़ा लेना और विपरीत मनोदशाओं को कई प्रकार से तानना और उनके सह-सम्बन्धों के सूत्रों की खोज करना जीवनी की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता की असली पहचान है। इसे वृत्तांत का विखंडन करना और उस चरित्र की अज्ञात या कम ज्ञात सच्चाइयों से साक्षात्कार करना भी कह सकते हैं। जीवनी लिखते हुए मैंने इस तरह के दृष्टिकोण से काम लिया है। मंटो के भीतर के कई मंटो इस जीवनी में से जब एक साथ सिर उठाते दिखते हैं तो वृत्तांत तक ठहरे-ठिठके हुए लोग भौचक्के से देखते रह जाते हैं कि आख़िर यह माजरा क्या है? जीवनी किस कदर मनोवैज्ञानिक और सृजनात्मक हो सकती है, यह समझना ऐसे लोगों के बस में नहीं है।

मंटो पर आपके काम को व्यापक मान्यता और शोहरत मिली है और ‘मंटो जिंदा है‘ को सर्वाधिक प्रामाणिक जीवनी कहा गया है..... 

इस बारे में मैं क्या टिप्पणी करूँ? इतना ही कह सकता हूँ कि मंटो पर काम करते हुए मैं सचमुच एक बड़े अनुभव से गुज़रा हूँ। मंटो को पढ़ना और उस पर लिखना जहाँ एक तरह की इन्वाल्वमैंट है, वहीं वह एक अनवरत खोज भी है। मंटो के बहाने एक हद तक मैं खुद को खोजता रहा हूँ। नये रंग, नई खुशबू और नयी आवाज़ें मुझमें दाखिल होती रही हैं। ‘मंटो जिंदा है‘ लिखते हुए मुझे लगा जैसे मैंने आगे बढ़कर मंटो की हरारत महसूस कर ली हो। मंटो को इस तरह से महसूस करने के क्षणों को मैं कैसे भुला सकता हूँ? आलोचकों ने नहीं, उसके पाठकों ने, बिना किसी लाग-लपेट के, ईष्र्या-द्वेष के मंटो को अपने आकलन में एक ऊँचाई पर खड़ा किया है। सहमति-असहमति के आर-पार, न किसी की लकीर को काट-पीटकर छोटा करना, न अपनी लकीर को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना-यही रास्ता है पाठकों तक पहुँचने का जो मैंने अपनाया है। विभिन्न भाषाओं के पाठक, लेखक और प्रबुद्ध-जन इस जीवनी को हिन्दी में लिखी पहली प्रामाणिक और संपूर्ण जीवनी मान रहे हैं, यह जानकर मुझे सार्थकता की अनुभूति हुई है।

मंटो पर इतना काम करने के बाद क्या आपको लगता है आप उससे मुक्त हो पाए हैं?

मंटो पर खूब लिखा है, मगर यह सच है कि मैं उससे मुक्त नहीं हो पाया हूँ। शायद मुक्त होना भी नहीं चाहता। जिन्हें हम प्यार करते हैं, उनसे क्या मुक्त हो पाना आसान है? पता नहीं अभी मंटो मुझसे क्या करवाना चाहता है? सोचता हूँ मंटो के पत्रों के आधार पर एक नाटक लिखँू। देखिए न, वह मेरा पीछा कर रहा है और मैं उसका।

मंटो के याद आने, उसके हमसे जुड़ने का मतलब क्या है?

आज के वक्त में जब हम अपने गिर्द कई तरह की विसंगतियों-विद्रूपताओं और विस्थापन के विकट सिलसिलों को फैलता हुआ देख रहे हैं तो मंटो की याद आती ही है और उसकी कहानियों के पात्र हमें हाॅन्ट करने लगते हैं। ‘टोबा टेकसिंह‘ के बिशनसिंह की ‘ओ पड़ दी गिड़-गिड़ दी, एक्स दी बेध्याना दी.....हिन्दुस्तान ऑफ दी पाकिस्तान ऑफ दी दुर फिट्टे मुँह‘ की बड़बड़ाहट सुनकर, बताइये क्या आप विचलित नहीं होते? ‘खोल दो‘ की सकीना की शर्मसार कर देने वाली हरकत से क्या आप डॉक्टर की तरह पसीने में गर्क नहीं हो जाते? दंगों से दहशतजदा होकर मर्दानगी गवां बैठने वाला ईशरसिंह क्या आज भी आपका पीछा नहीं कर रहा? ‘हतक’ की सुगन्धी क्या आज भी हमारे आस-पास नहीं मंडरा रही? यकीन मानिए, मंटो और उसकी कहानियों के पात्रों से हम आज भी घिरे हुए हैं। मंटो की कहानियाँ अपने समय की सीमा को लांघ हमारे आज से अनायास आ जुड़ती हैं। अतीत से वर्तमान से होती हुई ये कहानियाँ कला और सच की बेबाक अभिव्यक्ति के साथ भविष्य में दाखिल होने का आभास कराती है।

मंटो की अफसानानिगारी उसकी जिन्दगी का ही दूसरा पहलू है। आपने उनकी कहानी-कला पर काम किया है और जीवनी भी लिखी है। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

आपने सही सवाल उठाया है। मंटो के अदब और जीवन-कथा में गहरा तालमेल है। इस तालमेल के आधार पर मंटो के फन, जिन्दगी और मनोविज्ञान के कई अछूते पहलू उभर सकते हैं। उसकी जिन्दगी और साहित्य एक वेवलेंथ पर आती दिख सकती है, लेकिन दोनों को एक समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। मंटो की जीवनी लिखते हुए मैंने उनकी कहानियाँ, नाटक, ख़ाके, निबन्ध और खतूत परस्पर जुड़ते और आलोकित होते देखे हैं। मंटो का साहित्य और जिन्दगी एक दूसरे के समान्तर है, अलग-थलग नहीं है। एक न होते हुए भी उसकी कला और जिन्दगी में सच की जो सुलगती लकीर है, वह दोनों को बेजोड़ बना देती है। उसे पढ़ते हुए, उस पर लिखते हुए लगता है जैसे वह एक पेड़ हो और वह पेड़ आपके भीतर उग आया हो। आप ही बताइये क्या कोई अपने भीतर उगे पेड़ को टहनियों, पत्तों या तने के रूप में अलग-अलग करके देख सकता है? पता नहीं आपको लगे न लगे पर मेरे लिए मंटो की जीवनी यानी ‘मंटो जिन्दा है‘ अन्दर से बाहर की तरफ एक पेड़ की तरह उगी है। इसे लिखने में मेरी मदद खुद मंटो ने, उसके अफसानों और दूसरी रचनाओं ने जितनी की है, उतनी किसी और ने नहीं। 

साभार: ‘मंटो का इन्तज़ार’ नरेन्द्र मोहन

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लघुकथाएँ

-डाॅ. चंतना उपाध्याय, 49 गोपाल पथ कृष्ण विहार कुन्दन नगर अजमेर, मो. 9828186706


चिंता

राघव को एक वर्ष के लिए एक प्रोजेक्ट के सिलसिले मे नीदरलैंड जाना था। तो वह रागिनी से बोला... मै  टिकट बुक करवा कर पापा को फोन कर देता हूं।  पापा मम्मी भी डलहौजी घूम लेगे फिर श्यामगढ़ लौटते समय तुम्हे भी साथ ले जाएंगे।  वर्ना यहां डलहौजी मे तुम अकेली रहोगी तो मुझे चिंता बनी रहेगी।

श्यामगढ़ का नाम सुनते ही रागिनी का माथा ठनका..... उसने तुरंत ही राघव के फोन पर मिनी गेम आॅन कर रूचि को पकडा दिया....राघव  अपना फोन बिटिया के हाथ मे देख चुपचाप अपने दूसरे काम में लग गए। 

फिर रागिनी ने बडे ही स्टाइल से अपना फोन कान पर लगाया और बोली- क्या हुआ मम्मी, आपकी आवाज क्यो कांप रही है ?  लगता है आपकी तबियत ठीक नहीं... आपके पैरो की सूजन  कुछ कम हुई ? डाक्टर क्या कह रहे है ? ...अरे  वाह, फिर तो आप यहां आ ही जाएंँ यहां का शुद्ध हवा युक्त वातावरण आपको बगैर दवा भी अपने आप स्वस्थ कर देगा।  

 फिर वह राघव से बोली-मम्मी को डाक्टर ने दिल्ली के अशुद्ध वातावरण से दूर रहने को कहा है । वे आ ही रही है।  अब तुम्हे मेरी चिंता करने की जरूरत नहीं....यहां आने के लिए अब अपने मम्मी पापा को फोन मत करना।

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लघुकथाएँ

डाॅ. सारिका आशुतोष मूंदड़ा, पूना, मो. 9225527666

थोड़ा और.... 

ये कैसे लिख रहे हो पार्थ?  कितनी बार कहा है आपको थोड़ा छोटा लिखा करो, आपका काम सुंदर दिखेगा। मगर  जैसे उसने तो सुना ही नहीं । अब  दूसरे प्रश्न का उत्तर शुरू हो चुका था। उत्तर थोड़ा बड़ा था तो ज़्यादा स्पेस छोड़ा था रिया ने, मगर अब बड़ी राइटिंग और बड़ी हो जाने से  जगह फिर कम पड़ गई। 

मम्मी थोड़ा और स्पेस दिया करो ना, पार्थ मायूस सा किन्तु उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगा। वैसे तो ये राइटिंग की बात के लिए कहना कोई नयी बात नहीं थी, नया जो था वो ये कि और स्पेस की चाहत करना... जाने क्यों इस बात से उसे पार्थ के भीतर खालीपन के एहसास का बोध होता सा मिला। उम्र ही कितनी है उसकी ..आठ साल ,बच्चा ही तो है और वो भी ऐसा बच्चा जिसे समाज ने ‘विशेष‘  शब्द से आरोपित किया हो, हालांकि अब वो सामान्य बच्चों की तरह काफी कुछ कर रहा था, मगर बोलने में हुई देरी से कई बातें अभी भी सीख रहा था। मगर किसी को क्या परवाह.. एक बार जो राय बना ली तो बना ली। इस से उस बच्चे के विकास पर कितना असर पड़ता है, इस ओर सोचने का तो वक्त भी नहीं होता । पार्थ अब समझने लगा था अपनेपन और तिरस्कार के भावों को, तभी तो कई बार कह उठता  कि क्यों नहीं खिलाते वो मुझे अपने साथ? मेरे साथ क्यों करते हैं ऐसा?  कहीं ना कहीं वो पाना चाहता है  थोड़ा और स्पेस... अपने इर्द गिर्द के माहौल से,इस परिवेश से और रिया के पास भी नहीं है कोई विकल्प इस संवेदनहीन समाज का। मगर उसके पास जो है वो है ढेर सारा स्पेस और प्रोत्साहन... जिसे उसकी बांहों के घेरे में पार्थ भी महसूस कर रहा था। रिया बस यही सोच रही थी कि इतना तो उसका ‘विशेष बालमन‘ भी  समझने लगा है कि कहां उसे मांगना चाहिए थोड़ा और... , शायद किसी दिन ये सभ्य समाज भी समझ ही लेगा अपने स्पेस को थोड़ा और बढ़ाना। 

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आलेख

मंटो और मैं

‘मंटो जिंदा है‘ लिखते हुए मैंने मंटो को जाना-पहचाना ही नहीं हैं, उसे जिया और महसूस भी किया है। किसी लेखक का किसी दूसरे लेखक को इस तरह जीना कि वह करीबी दोस्त की तरह उससे बातें करने लगे, आगे बढ़कर उसे छू सके या वैसा एहसास कर सके, यह शायद किसी और माध्यम से नहीं, जीवनी लिखते हुए ही संभव है। मंटो की जीवनी लिखना, मेरे लिए निश्चय ही, एक बड़ा अनुभव रहा है जो शायद मंटो पर किसी दूसरी तरह से लिखते हुए मुझे हासिल न होता। एक अनोखे रचना-क्षण में मंटो की जिन्दगी के बेहद उलझे हुए तारों का एक धुन में जुड़ जाना और अंततः एक सिम्फनी में बदल जाना मेरे लिए मंटो से सीधे साक्षात्कार से कम न था। 

‘मटो जिंदा है‘ के लेखन अनुभव को बताना जरा मुश्किल ही है। क्या बताऊँ और कैसे? हर कृति की तरह इसमें भी लेखक की लेखन-यात्रा जितनी दिखती है उससे कहीं ज्यादा छिपी रहती है। ‘जब जरा गर्दन झुकाई देख ली‘, जैसा स्मार्ट कथन जुमले के तौर पर ठीक है, जीवनी के केन्द्रीय चरित्र की अपेक्षा, जीवनीकार लुका-छिपा ही रहता है, कभी-कभार बेशक सिर उठा ले। है न अजब और विरोधी-सी बात कि नाटककार की तरह अदृश्य-सा रहते हुए भी वह जीवन-चरित्र की परतों को, एक-एक कर उठाता-गिराता चलता है, छीलता-चीरता रहता है। 

मंटो को लेकर दो-चार बातें शुरू में ही शेयर कर लें तो अच्छा होगा। मंटो के शैदाई हैं, मुरीद हैं, घोर प्रशंसक हैं तो घोर विरोधी और निदंक भी हैं। जब मैं जीवनी लिख रहा था तो एक मित्र आए कहने लगे ‘क्या लिख रहे हो?‘ ‘मंटो की जीवनी लिख रहा हूँ।‘ ‘अरे, उस अश्लील, शराबी लेखक की जीवनी! तुम तो वैसे नहीं हो?‘

‘मैं जो भी हूँ, जैसा भी, लेकिन तुम लेखक की जिन्दगी को कभी समझ पाओगे, इस में मुझे शक है,‘ मैं थोड़ा तैश में आ गया, ‘तुम्हीं हो न जो छिप-छिप  कर, चटखारे लेकर मंटो की कहानियाँ पढ़ते रहते हो, ऊपर से तोहमत लगाते हो कि वह अश्लील है, शराबी है। अरे, कुछ तो गैरत दिखाओ...और सुनो, लेखक अपनी कृति के केंद्रीय चरित-नायक की तरह होता है ‘यह तुम से किसने कह दिया?‘ मैंने टेढ़ी नज़र से उसकी तरफ देखा। मेरे तेवर को भाँप कर वह ‘अच्छा अच्छा फिर मिलेंगे, . .कहता खिसक गया।

मैं सोचने लगा दोनों में जुड़ाव के आधार हों, मगर अलगाव के आधार भी क्यों न हो? क्या ‘आवारा मसीहा‘ के लेखक विष्णु प्रभाकर और जीवनी के चरित-नायक शरत बाबू समान गुण-धर्म के माने जा सकते हैं? इसी तरह मैं और मंटो अलग-अलग सीरतों के मालिक होते हुए भी, एक दूसरे में दाखिल हो गए हों तो क्या आश्चर्य? क्या कई तरह के अन्तर्विरोधों को झेलते हुए, विरूद्धों में संगति बैठाना, कान्ट्रास्ट में समान मनोभूमि या एकतान हो जाने की खोज, सृजनात्मक धरातल पर ज़्यादा आकर्षक और चुनौतीपूर्ण नहीं है?

मेरी सोच की प्रक्रिया चल ही रही थी कि एक और सज्जन आ धमके, ‘अरे, क्या मंटो-मंटो चिल्लाते रहते हो? क्या है मंटो? बड़ा सेक्युलर बना फिरता है, आखिर निकला कट्टर मुसलमान- भगोड़ा, अश्क के शब्दों में रणछोड़दास! बम्बई से लाहौर भाग गया। उसे मंटो पर आरोप-दर-आरोप मढ़ते देख मैं खुद को रोक न पाया। मैंने कहा, ‘क्या अंट-शंट बोलते रहते हो। अच्छा होता थोड़ा मंटो को पढ़ लेते। जानते हो तकसीम से पांच महीने बाद जनवरी 1948 में वह बम्बई से लाहौर क्यों चला गया? आखिरी दिनों में दोस्तों के साथ उसे जो तल्ख अनुभव हुए, बैचेन रूह के जिन उतारों-चढ़ावों से वह गुजरा, झूठ और फरेब के लिहाफों को उतारते हए फसादात की गहरी छानबीन करते हए, दहशत का मारा वह बम्बई से लाहौर क्यों भाग गया, तुम क्या जानो? वह लेखक जो अपनी कहानियों में मज़हब के आधार पर दो राष्ट्रों के सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाता रहा, उस पर कट्टर मुसलमान होने का इल्जाम! आखिर सोचकर बोला करो। तभी एक पढ़ा-लिखा लेखक मेरे पास आया, ‘अरे छोड़, वही मंटो है न, जो बम्बई आवास के दिनों में जिन्ना का ड्राइवर रहा।‘ मैं उस का मुँह देखने लगा।

वह चालू रहा- हूँ, जीवनी लिखने चला है, इतना भी नहीं जानता कि तंगहाली और फाकामस्ती के दिनों में उसने जिन्ना के यहाँ ड्राइवर की नौकरी की थी। क्या तुमने जिन्ना पर लिखा उसका संस्मरण ‘मेरे साहब‘ नहीं पढ़ा?‘

मेरा माथा ठनका। ‘मेरे साहब‘ जिन्ना पर उसके ड्राइवरों की निगाह से मंटो द्वारा लिखा गया रेखाचित्र है, मैं जानता हूँ, मैंने कहा, ‘मगर यार, तुमने डींगबाजी की सारी हदें ही फलांग दीं। बता जरा, इस बात से मंटो जिन्ना का ड्राइवर और जिन्ना उस का साहब कैसे हो गया? जिस मंटो ने कभी ढंग से साईकल नहीं चलाई वह जिन्ना का ड्राइवर. . .तौबा. . .तौबा!‘ मैं सोचने लगा कोई लेखक क्या इस कदर पूर्वाग्रहों और कमअक्ली का शिकार हो सकता है? मैं खुद को बड़ा मखबूतलहवास मानता हूँ मगर यह तो मुझसे कहीं ज़्यादा...‘ और मैं जोर से हँस पड़ा।

इसमें संदेह नहीं कि मंटो में विरोधी धाराओं का अजब मेल है। कश्मीरी पंडित है, साथ ही ठेठ पंजाबी हैं। जुबान तल्ख और नज़र पैनी है तो नज़रिया मानवीय है। ग़ालिब के शब्दों को उधार लेकर कहें तो ‘अजब आजाद मर्द‘ है और वैसा ही लेखक जो न किसी को बख्शता है न खुद को, जो खुदा से भी सीधा टकरा जाता है। उसकी कब्र पर यह कतबा (समाधि-लेख) लिखा है‘यहाँ सआदत हसन मंटो दफन है। उस के सीने में फने अफसानानिगारी के सारे इसरारो-रमाज दफन है। वह अब भी मनो मिट्टी के नीचे सोच रहा है कि वह बड़ा अफसानानिगार है कि खुदा।‘

ध्यान दे इस समाधि-लेख को देवेन्द्र सत्यार्थी ने क्या खूबसूरत फैटेसीनुमा मोड़ दे दिया:

‘मानो मिट्टी के नीचे पहुँचते ही मंटो ने फिर सोचा वह बड़ा अफसानानिगार है या खुदा। खुदा ने मंटो के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा- ‘वह टोबा टेकसिंह तुमने लिखा है?‘

मंटो ने कहा- ‘लिखा है तो क्या हुआ. . .? अगर तुमने बयालीस बरस आठ महीने और सात दिन उधार दिये तो इस का मतलब यह नहीं कि तुम मेरी कहानी के अच्छे नाकिद भी हो सकते हो. . .हटाओ यह अपना हाथ।‘

खुदा के चेहरे पर अजब-सी मुस्कराहट आई। उसने मंटो के कंधे पर से अपना हाथ उठा लिया और उसकी तरफ अजीब-सी नजरों से देखकर कहने लगा, ‘जा, तेरे सभी गुनाह मुआफ किये‘ और पलट कर चला गया। चंद लम्हों के लिए मंटो बिल्कुल खामोश रहा। वह उसकी तारीफ से बिल्कुल खुश न हुआ। वह बड़ा रंजीदा, उदास और खफा-खफा सा नज़र आने लगा

‘साला क्या समझता है? मुझे हरासाँ करता है। उसने मुझे बयालीस बरस, आठ महीने, सात दिन उधार दिये थे। मैंने तो सौगन्धी को सदियाँ दे दीं।‘

ऐसे बीहड़ लेखक की जीवनी लिखने का विचार जब मेरे मन में पहली बार आया तो मैं घबरा गया। इसलिए नहीं कि मैं उसे जानता नहीं था। 30-40 सालों में वह मेरा हिस्सा रहा था। मैंने उसकी कहानियों और नाटकों का संपादन किया था, टोबा टेक सिंह कहानी पर ‘नो मैंस लैण्ड‘ जैसा नाटक लिखा था। विभाजन के सूत्र में हम दोनों जुड़े हुए थे। पंजाबियत, लाहौर और अमृतसर जैसे शहरों को हमने जिया था। इन तमाम अनुभवों के बावजूद जीवनी लिखने के विचार से मैं सिहर उठा। तब तक मैंने मंटो को टुकड़ों में जाना था। अब मेरे सामने उसे कला-अनुभव में ढालने और लगभग मुकम्मिल रूप में पेश करने की चुनौती थी। दोस्तों, मेरे सामने अंधेरा छा गया। उस अंधेरे में अचानक मेरे हाथ एक चाबी लग गयी जिसे मैंने अंधरे में घुमाया तो अंधेरा सुलगने लगा, तार-तार होकर रोशन हो गया और जीवनी लिखने की राहें मेरे सामने खुलती गयीं। जरा सोचिए, अगर मुझे यह चाबी न मिली होती तो क्या यह जीवन-कथा लिखी जा सकती? जीवनी लेखन ऊर्जा की इस चाबी के बारे में क्या बताऊँ? हो सकता है इस लेख को पढ़ते हुए आप को यह चाबी अनायास मिल जाए?

हर लेखक के लिखने की प्रक्रिया, लेखन-यात्रा, लिखने की अवस्थाएँ और क्षण अपने ही होते हैं। लिखने से पूर्व लेखक के नेपथ्य में पता नहीं कब से तैयारी चल रही होती है। मेरे नेपथ्य में मंटो कब से पड़ा था, कहना मुश्किल है। शायद आप को यह कुछ अजीब-सा लगे कि सबसे पहले मैंने अंतिम अध्याय, उसकी जिंदगी के आखिरी कुछ घंटों का बयान ‘सो गए दास्तां कहते-कहते‘ लिखा। मैं देखकर हैरान था कि आखिरी कुछ घंटों में भी मंटो की ख्वाहिश एक अफसाना लिखने की थी। अंतिम अध्याय के बाद मैंने पहला अध्याय लिखा और फिर तो यह क्रम चलता ही गया और एक निरंतर तलाश में बदलता गया।

मैंने महसूस किया है कि जीवन-कथा महज़ कथा-वृत्तांत नहीं है। इसमें उस अनुक्रिया का ज़बरदस्त रोल है जिस में तथ्य और घटनाएँ स्पंदित होती जाती हैं। मैंने उस अंतक्रिया को थामे रखकर मंटो-आख्यान के नीचे की परतों में झांकने की कोशिश की है। यह कुछ इस तरह की सजन-प्रक्रिया है कि वृत्तांत या उसके बावजूद जरूरी तोड़फोड़ और डी-कॉन्सट्रक्शन के साथ कथा री-क्रियेट होती चले। इस तरह से जीवन-कथा कहने में खुद मंटो ने मेरी सब से ज़्यादा मदद की है। उसमें दाखिल होने का मतलब ही यह है उस की रचनाओं में दाखिल होना और उन रचना-क्षणों को झेलना जो मंटो और उस की रचनाओं के साथ-साथ सटे नजर आते हैं। हाँ, यह सच है कि इस सृजन-प्रक्रिया के हिस्से के तौर पर मृत्यु से जन्म, अन्त से प्रारंभ और पुनः अंतिम पड़ाव की तरफ की लेखन-यात्रा ने इस जीवनी के अन्दरूनी शिल्प का गुर मेरे हाथ में कुछ यों थमा दिया कि मंटो को जिन्दगी-भर के तनावों, संघर्षों और स्मृतियों को सहेजने का मैं माध्यम बन सका। अगले-पिछले. पर्वापर के संबंध जुड़ते-टूटते, बनते-मिटते रहे, यादें उभरती-बिखरती रहीं और मंटो रफ्ता-रफ्ता, हौले-हौले मेरे सामने रेशा-रेशा होता गया और मैंने उसे जीवनी के रूप में पहचानना शुरू कर दिया।

जीवनी लिखते हुए चार बातें मेरे सामने रही हैं एक, जीवनी से संबंधित सामग्री और स्रोतों की पहचान कैसे हो? उनकी प्रमाणिकता-अप्रमाणिकता की जाँच-परख कैसे करूँ? जो बात कही जाए उसके पुख्ता आधार के लिए हवाले, संदर्भ या संकेत तो चाहिए ही। यह देखना भी जरूरी है कि ये हवाले कितने प्रामाणिक हैं? लेखक द्वारा कही गयी बातें, उसकी आत्म-स्वीकृतियों, आत्म-कथन, साक्षात्कार, पत्र, दोस्तों द्वारा कही गयी बातें, लेखकों द्वारा लिखे गए निबंध और पुस्तकें काफी हद तक प्रामाणिक सामग्री मानी जा सकती है, हालांकि उनकी भी परख-पड़ताल चलती रहनी चाहिए। 

जहाँ तक स्रोतों की बात है, मुझे भटकना नहीं पड़ा। मंटो जिन शहरों में, जिन गली-कूचों में रहा था, वो मेरे देख-भाले थे। 1919 का जलियाँवाला बाग का नरसंहार जैसे मंटो के बचपन का हिस्सा था, वैसे ही मेरा भी। हाँ, रेडियो, टेलीविजन की आरकाइव्ज ने बेहद निराश किया। उसके रेडियो नाटक के ड्राफ्टों की बात छोड़िए। उसके अफसानों के किसी संग्रह का कवर डिजाइन तक न मिला। बम्बई के जिन स्टुडियोज में वह वर्षों तक काम करता रहा, जहाँ उसकी पट-कथाएँ फिल्माई गयीं, ‘आठ दिन‘ जैसी यादगार फिल्म, जिसमें उसने पागल का किरदार निभाया था, उसकी प्रतिलिपि न किसी स्टूडियो में मिली न फिल्म इंस्टीट्यूट पूना के अरकाइव्ज में। हाँ, मंटो के दोस्तों- अबू सईद कुरैशी, हसन अब्बास, बारी अलीग, बृज प्रेमी और उनकी किताबों से उसके बचपन और अन्य घटनाओं को तरतीब देने में ही नहीं, उनमें तारतम्य बैठाने और उनकी पुनर्व्याख्या करने में भी मदद मिली। घटना और स्मृति का तालमेल कुछ इस तरह बना कि उस की आदतें, शौक, पिता और अपनों के साथ उस की तिलमिलाहट, कई सीरतों में बंटा उसका व्यक्तित्व धीरे-धीरे खुलता गया, कई तरह के तूफानों से घिरी उसकी जिन्दगी के सूत्र मेरे हाथ लगते गए और इन्हीं के सहारे मैं उसके अदबी सफर की भी निशानदेही कर सका। जलियाँवाला बाग, भगत सिंह, बारी अलीग और विभाजन चार ऐसे केन्द्रीय सूत्र हैं जिन से उसकी भावनात्मक और बौद्धिक मानसिकता निर्मित हुए है। घटना, शोध और स्मृति के त्रिविध आयामों में प्रवेश करते हुए जीवनी लेखन मेरे लिए सहज होता गया।

दो, संलग्नता के बावजूद तटस्थता कैसे अर्जित करें? दोनों को एक साथ निबाहना कठिन रचना-कर्म है, खासतौर पर जब मंटो जैसी शख्सियत पर लिखना हो। वह कमबख्त एक बार आपको पकड़ ले तो फिर छोड़ता नहीं। आप उसका विरोध करें या पैरवी, एक बार उसे पढ़ना शुरू करेंगे तो पढ़ते ही जाएंगे और इस खतरे को मैंने जीवनी लिखते हुए भी शिद्दत से महसूस किया है और उससे पार पाने की कोशिश की है। मैंने जब भी थोड़ा फासला बना कर उसे देखने जाँचने की कोशिश की, वह बीच में आ टपका। उसकी टेढ़ी नज़र से बचना और उस से दूरी बनाए रखना मेरे लिए मुश्किल हो गया। उसकी नज़र लेखक की बेसरोकारी को गहरे सरोकार में बदलती जाती है। एक-दूसरे को काटती-पीटती, धंसती-उभरती कोलाज पेंटिंग- जैसी रंग-परतों में मैं दाखिल हुआ हूँ। मैं उन में डूबा हूँ तो एक ताजगी-भरे एहसास के साथ उन से बाहर भी आया हूँ। उस से जूझते हुए मैंने पाया है कि आप उस के पक्ष में या विपक्ष में जा सकते हैं, उस से तटस्थ रह पाना मुश्किल ही है। तीन, वृत्तांत के साथ कैसा सलूक किया जाए कि वह खुद बोलने लगे? जीवनी लिखते हुए वृतांत से बचा नहीं जा सकता लेकिन अतिरिक्त कथन और अतिरेक जीवनी को ले डूबता है। घटनाओं और चरित्रों में विवेकपूर्ण संतुलन साधे बिना वृत्तांत अपना आशय और मंतव्य गवां बैठता है। बहुत कुछ निर्भर करता है वृत्तांत की प्रस्तुति पर। वृत्तांत अगर अभिधा की ध्वनियों के साथ है, जैसा कि अक्सर नाटक में भी होता है तो उसकी मार दूर तक होगी और कई तरह के इमेजिज़ की चमक से वृत्तांत सजीव होता रहेगा। मंटो की जीवनी लिखते हुए मैंने वृतांत के साथ इसी ढंग का सलूक करने की कोशिश की है।

चार, जीवनी के जरिए इतिहास और इतिहास के जरिए जीवनी का पुनः सृजन कैसे हो? मेरी कोशिश रही कि मैं मंटो के जीवन-आख्यान के ज़रिए इतिहास के घटनाक्रम की पड़ताल करूँ। मंटो के ज़रिए उसके अफसानों और अन्य रचनाओं के जरिए इतिहास को नए सिरे से समझ सकँू, संभव हो तो इतिहास में छूटी हुई खाली जगहों को भर सकूँ।

दोस्तों, यह सच है कि मंटो की रचनाओं को, उन चार बातों के साथ जिनका अभी उल्लेख किया गया, उसकी जिन्दगी के साथ डी-कोड किये बिना कुछ हासिल होना मुश्किल है। मैंने वही रास्ता अपनाया हैं। मंटो की जीवन-कथा और उसके कथा-साहित्य में गहरा तालमेल है। इस तालमेल के आधार पर मंटो की रचना-मानसिकता और मनोविज्ञान के कई अछूते पहलू सामने आ सकते हैं। उसकी जिन्दगी और रचनाएँ एक वेवलेंथ पर आती दिख सकती हैं, मगर दोनों को एक समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए। मंटो का कलाकार बड़ा बेपरवाह लगता है पर है बडा सजग और निर्मम। ध्यान दें, मंटो ने वेश्याओं की जिन्दगी के एक बड़े हिस्से को, डार्क मैटर पर चढ़े हुए रहस्य के पर्दे को बड़ी बेबाकी से उठा दिया है। नयी तरह से सोचने और खोजने की बात यह है कि हम उस प्राणदायक केन्द्रीय कण को कैसे पकड़ें या खोलें जो मंटो की रचना-सृष्टि में सांस ले रहा है, जो आज भी उसे जिंदा रखे हुए है। यह बात और है कि एक पुलक-भरे क्षण में वह कण मेरी पकड़ में आया और छूट गया, मगर उस छोटे से वक्फे में उसकी कहानियाँ, नाटक, खाके, निबन्ध खतूत मैंने आलोकित होते देखे। उनमें एक ही सृजनात्मकता की कौंध थी, बिना किसी फाँक के। वह कण देखते-देखते गायब जरूर हो गया मगर तभी मैंने मंटो के पूरे साहित्य और ज़िन्दगी को कुछ इस तरह देख लिया जैसे वह कोई पेड़ हो और वह पेड़ मेरे भीतर उग आया हो। आप की बताईए कि क्या कोई अपने भीतर उगे पेड को टहनियों, पत्तों या तने के रूप में अलग-अलग करके देख सकता है? पता नहीं आप को लगे न लगे पर मेरे लिए यह जीवनी अन्दर से बाहर की तरफ एक पेड़ की तरह उगी है- मंटो की जिन्दगी, उसकी रचना-दृष्टि और रचना-सृष्टि के प्रतीक के रूप में। दरअसल, यह प्रतीक नहीं, एक constituting (विधायक) मेटॉफर है- उस क्षण और कण की सशरीर उपस्थिति। इस मेटॉफर को पाने में मेरी जितनी मदद खुद मंटो ने, उसके अफसानों और दूसरी रचनाओं ने की, उतनी किसी और ने नहीं।



जीवनी-लेखन यात्रा में मैंने अपने आलोचक को काबू में रखना ही बेहतर समझा है। अगर मैं उसे छूट देता तो बड़ी गड़बड़ होने का अंदेशा था जैसा कि मैं कई जीवनियों में देख चुका था। अपने वक्त के आलोचकों से कहीं बेहतर मंटो खुद अपनी कहानियों का आलोचक है। यह बात मुकदमों के दौरान दिये गये उसके तहरीरी बयानों से ही नहीं, निबन्धों और खतों से भी उजागर होती है। 

आधुनिकतावादी और प्रगतिवादी दोनों किस्म के आलोचकों ने उसे कोसा-लताड़ा। वे उसे कभी लेखकीय बिरादरी से बाहर करते रहे, कभी अंदर, मगर उसने डटकर लोहा लिया। दोस्तों, आलोचना के जिन दुर्दिनों से हम आज गुजर रहे हैं, उससे ज़्यादा बुरे दिन मंटो ने झेले थे और हार नहीं मानी थी। इसे कमतर न समझियेगा कि उसने अपने वक्त के आलोचकों को ठेंगा दिखाया और उनकी दखलंदाजी के बिना पाठकों की चेतना में उतर गया।

‘मंटो जिन्दा है‘ लिखते हुए मैं डिस्टर्ब हुआ हूँ तो नया कुछ करने और पाने की खुशी के दौरों से भी गुज़रा हूँ, गहरे ग़म और अवसाद के लंबे दौर भी मुझ पर तारी हुए हैं। मंटो के तनावों और संघर्षों की भीतरी तहों में भी उतरा हूँ। मुझे लगा लेखक के नाते वे तनाव और संघर्ष मेरे भी हैं, मेरे ही क्यों हर लेखक के हैं जैसे दोस्ती और दुश्मनी के तनाव अहमद नदीम कासमी के साथ, एक-साथ दोस्ती-द्वेष के जैसे इस्मत चुगताई, देवेन्द्र सत्यार्थी और अश्क के साथ, न खत्म होने वाले तनावपूर्ण संबंधों की एक लंबी श्रृंखला जुड़ी है मंटो के साथ। एक थे आगा शोरिश काश्मीरी जिसने ‘ठंडा गोश्त‘ के खिलाफ गवाही दी थी। आखिरी दिनों में मंटो लाहौर के कॉफी हाउस में बैठा था कहकहे-दर-कहकहे। मंटो ने शोरिश काश्मीरी का कंधा झिंझोड़ते हुए कहा ‘उठो।‘ शोरिश काश्मीरी ने ऐतराज किया- नहीं उठा। ‘एक गाली, दो गाली तीन गाली और फिर।‘ ‘मंटो ने कहा ऐस तो मैं मर जांदा ते अच्छा सी। तीन दिन बाद मंटो का इंतकाल हो गया।

कहते हैं आगा शोरिश काश्मीरी यों ही बेमतलब कॉफी हाउस के अन्दर-बाहर आता-जाता रहता और ‘ऐस तो मैं मर जांदा ते अच्छा सी, बड़बड़ाता रहता।

मंटो को मैंने निजी जिन्दगी में कसकते-तड़पते देखा है और उस कसक और तड़प को अपने किरदारों का कलात्मक ढंग से हिस्सा बनाते देखा हैं। मैंने विभाजन के अंधेरे में उनकी चीख सुनी है और उस हौलनाक एहसास को अफसानों में ढालते वक्त उसकी गज़बनाक हालत देखी है। मैंने उसे पागलखाने में देखा है और वहीं से वह इतिहास के पागलपन में उतर गया- ‘टोबा टेक सिंह‘ के बिशनसिंह के पागलपन में- ‘हिन्दुस्तान ऑफ दि पाकिस्तान ऑफ दी दुर फिट्टे मुँह।‘ दोस्तों, यह मंटो का ही टोबा टेकसिंह नहीं है हर लेखक का टोबा टेकसिंह है- किसी का कम किसी का ज़्यादा।

एक और संदर्भ लें- एक दिन जब अहमद नदीम कासमी मंटो से कहानी माँगने आया तो मंटो ने उसी दिन लिखित कहानी ‘ठंडा गोश्त‘ उसे थमा दी। कासमी ने कहानी पढ़ी और कहा- ‘नुकूश‘ के लिए यह कुछ ज़्यादा ही गर्म है। मंटो ने कहा तुम कल आना तुम्हें दूसरी कहानी दूंगा। कासमी अगले दिन पहुंचा। मंटो ने उसे कुछ लम्हें रुकने के लिए कहा। वह कहानी पूरी कर रहा था और उसके अंत पर अटका हुआ था। पाँच मिनट, दस मिनट, और मंटो ने कहानी कासमी के हाथों में दे दी। कासमी ने पढ़ी और अन्त पढ़कर सिहर उठा। कहानी थी ‘खोल दो‘ और उसका अन्तिम वाक्य था, ‘डॉक्टर सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया।‘ यह कहानी जब नुकूश में छपी तो बड़ा हो-हल्ला हुआ और छह महीनों के लिए नुकूश को बन्द कर दिया गया। दोस्तों, कहानी में आए ब्यौरे मेरे लिए स्मार्ट कथन नहीं है। इस कहानी के अंत को पढ़ते हुए एक पल मुझे लगा मैं डाक्टर हूँ जो सराजुद्दीन से कहता है, ‘खिड़की खोल दो‘। दूसरे पल मुझे लगा मैं सकीना हूँ जो बेजान हाथों से इजारबन्द खोलती है और सलवार नीचे सरका देती है। तीसरे पल मैं सराजुद्दीन में बदल जाता हूँ और खुशी से चिल्लाता हूँ- ‘जिन्दा है, मेरी बेटी ज़िन्दा है‘, और चैथे पल मुझे लगा, मैं ही वह डॉक्टर है जो सिर से पैर तक पसीने में गर्क हो गया। ये चारों पल जैसे ही जुड़ने लगे मुझे लगा मैं मंटो के आसपास हूँ। उसकी काया और रूह में प्रवेश कर गया हूँ। और बीस बरस पहले त्रिवेणी में मायाकृष्णाराव का मंटो की कहानी ‘खोल दो‘ पर परफार्ममेंस देखकर मैं स्तब्ध रह गया। बूढ़े सराजुद्दीन की पीड़ा को, अपने हम मजहब रजाकारों द्वारा बलात्कार किये जाने के बाद की सकीना की वहशत और दहशत को माया कृष्णा राव ने बड़े कौशल से दृश्यों और गतियों में मूर्त कर दिया है। बीस बरस बाद भी वह नृत्य मेरे सामने वैसे ही नुमायां हो जाता है और कहानी के नये-नये अर्थ मेरे सामने खुलने लगते हैं। ऐसे ही क्षणों में मंटो की जिन्दगी और कहानियाँ मेरे लिए एक दूसरे में घुलती गयी हैं। ‘खुशिया‘ कहानी के साथ भी यही हुआ। कुछ लोगों ने जब इसे बनावटी कहानी कहा तो मंटो ने तिलमिला कर कहा, ‘मैं हूँ वो खुशिया।‘ सत्यार्थी ने कहा, ‘काश मैं खुशिया होता।‘

आज 21वीं सदी के दूसरे दशक में कहानी पढ़ने के बाद जब मैं यह कहता हूँ- ‘मैं खुशिया हूँ तो उसकी ध्वनियों के अर्थ विस्तार को आप समझ सकते हैं।‘

-मंटो की ऊबड़-खाबड़, संकटों और चुनौतियों भरी जिन्दगी के उतारों-चढ़ावों में एक अन्तर्निहित लय है जिसे मैंने महसूस किया है और ऐसा करते हुए खुद को भी करीब से पहचाना है। यही वजह है कि यह जीवनी बनते-बनते बनी है और लेखक के लिए एक कला-फार्म प्राप्त करती गयी है। पता नहीं क्यों मुझे लगता रहा कि कोई है जो बराबर मुझे कोंच रहा हो कि लिख और मैं लिखता गया। इस अर्थ में लें तो मैं एक निमित्त नहीं तो और क्या है? इस जीवनी को लिखते हुए मैं महसूस कर रहा हूँ कि हिन्दी उर्दू का एक बहुत बड़ा लेखक और पाठक समुदाय बराबर मेरे साथ रहा है। इस ने मंटो के साथ मेरी पहचान इस कदर गहरा दी कि मैं हाथ बढ़ाकर उसकी हरारत महसूस कर सका।

मंटो की शाहकार (शिखर) कहानियों की खूब चर्चा होती है जैसे‘खोल दो‘, ‘ठंडा गोश्त‘, ‘टोबा टेक सिह‘, ‘हतक‘ ‘खुशिया‘ वगैरह-वगैरह, मगर बहुत-सी कहानियाँ अनदेखी रह जाती है। उनका कहीं कोई नोटिस ही नहीं लिया जाता। मुझे लगता है कि उन कहानियों के चर्चा के केन्द्र में आने से पाठ-पुनर्पाठ के बाद उनका एक नया पाठ तैयार हो सकता है। इसी तरह उन ख़तों से जो सैकड़ों की संख्या में है, उसकी जिन्दगी के कई अनछुए पहलू झलक मारते दिखते हैं। चचा साम के नाम उसके नौ खत अमेरिकन राजनीति और कूटनीति का कच्चा चिट्ठा तो खोलते ही हैं, पाकिस्तान की अमेरिकापरस्ती पर भी रोशनी डालते हैं। ये खत मंटो की राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदर्शिता के सूचक हैं। इन ख़तों में मंटो की कलम जितनी सच तब थी, उससे कहीं ज्यादा सच का खुलासा वह आज कर रही है और ‘पंडित नेहरू के नाम पडित मंटो का खत‘ जी हाँ चैंकिए नहीं, दोनों पंडित, दोनों काश्मीरी. ...खैर बात छोड़िए, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, और अभी मंटो ने अपनी गिरफ्त से मुझे छोड़ा कहाँ है? इस ख़त पर मंटो किसी और लेखन-यात्रा में मुझसे लिखवा ही लेगा। और आखिर में मंटो की जीवनी लिखने के कई दिनों बाद तक खुशी और राहत महसूस करता रहा, थकावट भी। एक दिन मैंने थके-थके स्वर में सुमन (बेटी) से कहा- ‘बहुत दिन हो गए, क्यों न आज एक पेग ले ही लूँ। उसने कहा- ‘क्यों नहीं पापा एक आध पेग तो ले ही लीजिए, पिछले छह महीनों से तो मंटो ही पी रहा था। और हम ठठाकर हँस पड़े।

साभार: ‘मन्टो और मैं’ नरेन्द्र मोहन

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डायरी के पन्नों से

साहस और डर के बीच 

14 जनवरी

डॉ. सादिक गहरे मनमुटाव में रहे मेरे साथ लगभग एक साल । दोस्त से अलग-थलग हो जाने का तीखा एहसास और साल-भर लंबा मानसिक तनाव। दोस्त के साथ दोस्ती में इस कदर दरार आ जाए कि महसूस तो हो मगर दिखे नहीं तो अफसोस होता है और दुख भी। खैर, वही हमारे प्यारे सादिक़ सब कुछ झटक आज शाम अचानक आ गए तो मैं देखता रह गया कभी उन्हें कभी अपने को। उसी अंदाज और प्यार से मिले जैसे पहले मिलते थे। न कोई गिला न शिकवा। बेटा खुर्रम उनके साथ। बेटी सानिया के निकाह का कार्ड उन्होंने मेरे हाथ थमाया और ताकीद की कि पहुँचना ही है बेटी सुमन को साथ लेकर। सुमन को अलग से ताकीद की। उनके आने से लगा हवा का एक ताज़ा झोंका करीब से गुज़र गया हो।

24 जनवरी 

आज डॉ. सादिक़ की बेटी सानिया का निकाह है। गुरचरण सिंह और अजीत कौर के साथ हम समय पर शादी स्थल पर पहुँच गए। बड़े पैमाने पर इंतजाम किये गए हैं। बहुत बड़ा पंडाल सजा है और खूब गहमागहमी है। एक तरफ विवाह का मंडप है जहाँ मुस्लिम रीति-रिवाज से विवाह की रस्में पूरी की जा रही हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी, उर्दू विभाग के तमाम लोग यहाँ मिल गए। एक तरफ से सादिक़ साहब भी लपकते हुए आ गए और गले मिले। भाभी साहिबा भी मिलीं। दोनों को भरपूर मुबारकबाद दी। वे हमें मंडप के भीतर ले गए जहाँ हम ने सानिया को अनन्त आशीषं दीं। एक कोने से मलिक राजकुमार आ निकला। सकुचाता-सा मिला। मैंने उसकी पीठ पर धौल जमाई तो थोड़ा खुला और हँसा। अजीब शख्स है खुल जाए तो खुल जाए नहीं तो सीलबंद।

15 अप्रैल

एक हैं ब्राजीली कवियत्री मार्था मेदेरस (Martha Medeiras) जिसने सन् 2000 में एक कविता लिखी थी‘। 'Morte Devagar' (To death slowly) जो उसी वर्ष नवम्बर में ‘जीरो होरा‘ पत्रिका में प्रकाशित हुई और उसका स्पेनिश अनुवाद 'Muere Lentamente' (Dying Slowly) नाम से हुआ। ताज्जुब देखिए कि मार्था मेदेरस की यह कविता 'You Start Dying Slowly' इन्टरनेट पर वर्षों से विश्व-विख्यात कवि पाब्लो नेरुदा के नाम से दिखाई जाती रही है और उन्हीं की मान ली गई है। अपनी कविता को पाब्लो नेरुदा (जिन्हें 1972 में साहित्य का नोबल मिला और जिनकी मार्था मेदेरस फैन रहीं) जैसे बड़े कवि पर चस्पा होते देखना मार्था मेदेरस (जन्म 20 अगस्त, 1961) और खुद पाब्लो नेरूदा के लिए अगर वे जीवित होते कितना दुखदाई रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। इस मनःस्थिति में उसने ‘पाब्लो नेरुदा फाउंडेशन‘ को इस बारे में लिखा तो फाउंडेशन ने स्वीकार किया कि यह पाब्लो नेरुदा की कविता नहीं है, गलती से उनकी मान ली गई है। इस स्वीकृति के बावजूद यह कविता नेट पर धड़ल्ले से नेरुदा के नाम पर चढ़ी रही, जो उसने कभी लिखी न थी। एक कवि के जीते-जी उसकी कविता को पाब्लो नेरुदा जैसे प्रसिद्ध कवि के खाते में डाल दिया जाना और मना करने पर भी ‘वेब‘ के हजारों लिंकस् का उसके पक्ष में खुल जाना, हैरतअंगेज है। प्रामाणिक रूप से गलती स्वीकारे जाने के बावजूद इन्टरनेट और ‘वेब‘ के इस सलूक और हिमाकत के लिए क्या कहा या किया जाए?

प्रिय पाठकों, दर्शकों, आइए, इस बात पर मार्था मेदेरस के साथ हँसते हुए, उनकी कविता आप धीरे धीरे मरने लगते हैं पढ़ते हैं-

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः 

करते नहीं कोई यात्रा 

पढ़ते नहीं कोई किताब 

सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ 

करते नहीं किसी की तारीफ 


आप धीरे धीरे मरने लगते है, जब आप 

मार डालते हैं अपना स्वाभिमान, 

नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं

मदद दूसरों की

आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः 

बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के, 

चलते हैं रोज उन्हीं रास्तों पर 

नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार, 

नहीं पहनते हैं अलग अलग रंग, या 

आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान


आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः 

नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को और 

उससे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे 

नम होती हों आप की आँखें, और 

करती हों तेज आप की धड़कनों को 


आप धीरे धीरे मरने लगते हैं, अगर आपः 

नहीं बदल सकते हो, अपनी जिन्दगी को, जब हों 

आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से, 

अगर आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते 

हों निश्चित को 

अगर आप नहीं करते हो पीछा किसी स्वप्न का 

अगर आप नहीं देते हो इजाजत खुद को, अपने 

जीवन में कम से कम एक बार, 

किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की 

तब आप धीरे धीरे मरने लगते हैं!!

ब्राजीली कवियत्री मार्था मेदेरस

यह कविता धीरे-धीरे मुझे अपनी परतों में लपेटती रहती है और जिन्दगी और कला का मिला-जुला स्वर मेरे भीतर गूंजता रहता है।

साभार: साहस और डर के बीच, नरेन्द्र मोहन

सूचना: डाॅ. नरेन्द्र मोहन के साहित्य के  बारे में अउाप सहज सम्पर्क कर सकते हैं: मो. 9818517717 

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गीत

बंद लिफाफों-सी यह दुनिया...


बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है 

सपने लेती चैन से सोती क्यों चिल्लाती है। 


जीवन में मनचाही चिट्ठी कब किसको आई 

जिसने जैसी चाही खुशियां कब कब हैं पाई? 

यह पथ एक दुरंगी बस्ती, वेग दिखाती है। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है। 


अपना होना, रोना धोना सब सह पाएंगे 

फिर भी यादों के दीपक उस पार लिवाएंगे 

दोराहे की बत्ती भी यह जंग सिखाती हैं। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है। 


अंदर हंसना जग में फसना जीवन लीला है 

खेल अजब यह रंगमंच पर क्या जोशीला है 

आने जाने की लय इसमें हर सुख पाती है। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है। 


मैं उछली, जग क्यों फिसला, जो जाग नहीं पायी 

संकट की घड़ियों में बैठी, भाग नहीं पायी 

मस्ती, मौज, मनोबल मनमानी महकाती है। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है। 


अखबारों सी अलग सुर्खियां नित्य यहां मिलती 

हेलमेल के चैराहे पर नूतनता खिलती 

पैसा ही क्यों प्रथम! प्रेम की गरिमा जाती है। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोती गाती है। 


तुम होंगे, सपने न रहेंगे ठोस धरा होगी 

हंसमुख चेहरों की नगरी में सफल सभा होगी

आती जाती सांस, सनातन सत्य सुझाती है। 

बंद लिफाफों सी यह दुनिया रोली गाती है।

प्रो. योगेश्वर कौर, 239, दशमेश एन्क्लेव, ढकौली, जीरकपुर 140603 (मोहाली) मो. 9417394849

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आकाशवाणी प्रसारण: 25/09/1972 भोपाल केंद्र


औसाफ़ ‘अभय‘, देवास (म.प्र.), मो. 9039914142


परिवार कल्याण पर एक गीत


जिनकी कम-कम है सन्तान 

घर है उनके स्वर्ग समान

वह तो धन्य है।


कम बच्चों के घर में रहती सुख-संतोष की माया 

इस माया को पाने वाला जीवन भर हर्षाया 

कितना सुखमय है वह जिसने कुन्बा नहीं बढ़ाया


उनके जीवन में है हर्ष 

उनके ऊँचे हैं आदर्श

वह तो धन्य हैं।


चमक उठी है किम्मत उनकी क्यों न मिटे अँधियारे 

आशाओं के दीप जले हैं उनके आँगन-द्वारे 

उनके दो-दो बच्चे जैसे नभ के चाँद सितारे 


उनका जीवन सुविधायुक्त 

हैं बह चिंताओं से मुक्त

वह तो धन्य हैं!


कम बच्चों पर मात-पिता सर्वस्व निछावर करते 

उनकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध बराबर करते

उनका उज्जवल जीवन वह उद्देश्य बनाकर करते


तभी तो पाते है सन्मान 

उनका क्यों न करे बखान

वह तो धन्य हैं।

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गीत

सूर्य प्रकाश मिश्र, वाराणसी मो. 09839888743  


समय के पार 

जी उठे प्रारम्भ के पल 

कीर्ति के स्तम्भ उज्जवल 

मौन पसरा देख बोले 

हाथ में पतवार लेकर 

जाना है समय के पार 


लेखनी आयुध तुम्हारी 

कम न आँको तीक्ष्ण है ये 

जागरण का मंत्र घोषित  

चक्रधारी कृष्ण है ये 


पग उठेंगे वक्ष खोले 

क्रान्ति की हुंकार लेकर 

जाना है समय के पार 


नियम पत्थर हो चले हैं 

पिघालने का मन नहीं है 

तंत्र की हठधर्मिता है 

मात्र अनुशासन नहीं है 


धैर्य के प्रतिमान डोले 

सो रहे अधिकार लेकर 

जाना है समय के पार 


संगठित श्रृंगाल सारे 

ध्वनि प्रदूषित आचरण है 

प्रश्न का उत्तर न देना 

मान्यताओं का क्षरण है


मधु मिली है गरल घोले 

शम्भु का अवतार लेकर 

जाना है समय के पार 


पूर्वजों की शपथ लेकर 

प्रगति रथ की गति बनेगा 

कर्म पथ का हर सिपाही 

शौर्य की संतति बनेगा 


युग खड़ा है द्वार खोले 

तुमुल जय जयकार लेकर

जाना है समय के पार  


अभयदीप 


लड़ना होगा क्रूर नियति से 

सपने सभी सबल कर लेना 

गहन साधना की बेला है 

दृढ़ विश्वास अटल कर लेना 


प्राण वायु संचित कर लेना 

कठिन युद्ध की आशंका है 

सच हो गया जानकी जैसा 

प्रहरी सोने की लंका है 


हे मूल्यों के अतुलित योद्धा 

इच्छा शक्ति प्रबल कर लेना 


सदा पराजित होती आई 

भले आज महिमा मण्डित है 

असुरों के ऐश्वर्य लोक की 

सारी आभा अतिरंजित है 


व्याकुलता की सघन रात्रि में 

अभयदीप प्रज्जवल कर लेना 


कठिनाई से हार मान ले 

ये वीरोचित ध्येय नहीं है 

कालखण्ड की कोई व्याख्या 

होती कभी अजेय नहीं है 


साहस, लगन, धैर्य की सरिता 

तीव्र और अविरल कर लेना 

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लघुकथा

सुश्री दीपमाला, अहमदाबाद, मो. 9654062118


गुब्बारा

सुबह ऑफिस जाते वक्त पतिदेव ने पूछा, कल का क्या प्रोग्राम है? मेरी छुट्टी है। कहीं चलना है क्या ? 

लीना ने कुछ जबाब नहीं दिया और अपनी रफ्तार से सुबह की रसोई, छोटी की ऑनलाइन क्लास की तैयारी मैं उलझी रही।

वैसे सुबह हमेशा की तरह व्यस्त ही होती है लीना की। स्वयं की योगा मेडिटेशन का ऑनलाइन सेशन, फिर सुबह का चाय नाश्ता, पतिदेव का टिफिन, कामवाला भाई....। और ना जाने क्या - क्या। दोपहर मैं सुस्ती मिटाने के लिए लेटी तो याद आया की कल तो कृष्ण जन्माष्टमी और रविवार भी है।

माँ....। बेटे की तेज आवाज आयी। देखो ना, हमारी एक छुट्टी और बेकार हो गयी। लीना ने प्यार से उसको झिड़का, “ डेड़ साल से छुट्टियाँ ही तो चल रही है। खैर कोई नहीं उसने मन ही मन शाम का प्रोग्राम बना लिया और पति के आने के पहले रात के खाने की तैयारी भी वो कर चुकी थी।

7 बजे घंटी बजी.....। छोटी ने दरवाजा खोला, अरे! पापा आप तो जल्दी आ गये। “ वो आज ट्रैफिक नहीं मिला ना “ पतिदेव ने जबाब दिया। थोड़ी देर बाद लीना ने उनको कहा, “ अभी मंदिर चलें। कल जन्माष्टमी है और भीड़ भी काफी होगी, लगभग साल हो गया कोविड़ के कारण मंदिर नहीं गए‘। पतिदेव ने झट से सहमति दे दी।

मंदिर के बाहर बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं थी फिर भी सुरक्षा की लिहाज से और कोविड़ प्रोटोकोल की पालना करवाने हेतु कुछ पुलिस कर्मी मौजूद थे। जस तस पार्किंग मिली और गाड़ी को खड़ा किया ही था कि लगभग 7-8 साल की गुब्बारे बेचने वाली लड़की क़रीब आ गयी। गुब्बारे देखते ही बेटी उछल पड़ी और लेने को मचल गयी। लीना ने उसे थोड़ा सब्र रखने को कहा, जब तक वो बच्ची उसको गुब्बरा लेने को उकसाती रही। “आंटीजी 20 रूपये का है, ले लोय खाना नहीं खाया है, भूखी हूँ और न जाने क्या क्या.....

लीना बोली दर्शन करने के बाद लेती हूँ, तो वह बेटी की तरफ नजरें घुमाती दिखी और दोनो ने आँखो ही आँखों में गुफ्तगू कर ली। बेटी अब ज़्यादा ज़िद करने लगी तो भाई ने अपने बड़े होने का फर्ज़ अदा किया “तुम्हें समझ नहीं आता ये गंदे है। करोना अभी भी है। क्या पागल हो? बिना सेनिटाइज की चीजें लेते है क्या?‘‘

लीना ने दोनो को चुप रहने का इशारा किया फिर उस गुब्बारे वाली लड़की को देखा, पतली सी काया, साँवला रंग, उनसुलझे से बाल और स्कर्ट - टॉप में कुछ कहती से नजर आयी। लीना ने पूछा, 

पढ़ने जाती हो? नहीं!!! सिर हिलाकर उसने जबाब दिया। क्या नाम है? काजल...। वह बोली कुछ इस अन्दाज में, कि नाम पूछ रही होय गुब्बारा तो ख़रीदती नहीं.

लीना बोली गुब्बारे से खेलती भी हो क्या? वो बोली, नहीं!!! “ये खेलने के लिए नहीं होते, बेचने के लिए होते है‘‘। माँ मारेगी यदि एक भी फूट जाएगा तो। सुबह गिनकर देती है। लीना का चेहरा कुछ मलिन सा गया। उसने अगले ही पल कहा दो गुब्बारे दो।

‘‘40 रुपये के होंगे आंटीजी‘‘। हाँ हाँ जानती हूँ लीना बोली। बेटी ने अपनी पसंद का गुलाबी रंग लिया और पूछा आज मेरे लिए दो!!!! लीना ने कहा ये दूसरा आपकी नयी दोस्त के लिए और झट से दूसरा उसकी तरफ बढ़ा दिया। कुछ अचकाई सी वह बोली.....। मेरे लिए। हाँ हाँ तुम्हारे लिए काजल। अपना ये गुच्छा मुझे दे दो और तुम थोड़ी देर यही खेल सकती हो। में इनको उड़ने नहीं दूंगी, लीना ने हँसकर कहा.

काजल और मेरी बेटी दोनो अपने गुब्बारो से खेल रही थी, उनके चेहरों की खिलखलाहट को देखकर लीना मन ही मन खुश हो रही थी और सोच रही थी, कृष्णा को तो पूरा संसार कल झूला झुलाएगा ही पर इस एक गुब्बारे ने काजल को पूरे संसार की सैर करवा दी। (मौलिक रचना)

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कहानी

सुश्री अर्चना ठाकुर, नई दिल्ली, Mob. 91 11 4567 9350

तुझपर कुर्बान

‘‘प्लीज डैड डोन्ट स्टार्ट डूइंग एनी इमोशनल ड्रामा अगेन। मैंने आपको सब बता दिया है न कि मैं यूएसए जाने का अपना पूरा मन बना चुका हूँ फिर बार बार एक ही बात आप क्यों दोहरा रहे है !‘‘

‘‘शायद कोई उम्मीद बची हो मेरे मन में कि तुम अपने देश में रुक जाओ।”

‘‘प्लीज प्लीज अब पैट्रीओटिक सीन मत क्रिएट करने लग जाइएगा डैड। मैं आपको पहले ही क्लियर कर चुका हूँ कि मेरे जॉब प्रोफाइल में जहाँ ज्यादा ऑपरचूनटि होगी वहीं का प्लेस मैं सलेक्ट करूंगा और यूएसए में मेरा बैटर फ्यूचर है फिर मैं यहाँ बस लाख तीन लाख के पैकेज पर क्यों रुक जाऊं। जब मैं डॉलर के लिए डिजर्व करता हूँ।”

‘‘बेटा क्या अपने कैरियर की बैटर ऑपरचूनटि ही देखोगे और कोई ज़िम्मेदारी नही बनती तुम्हारी और इस वक्त सच में मैं अपनी बात नहीं कर रहा बल्कि मैं सच में चाहता हूँ कि तुम अपने देश को वो सब कुछ दो जो तुम कुछ डॉलर के लिए दूसरे देश में देने जा रहे हो।‘‘

‘‘कुछ डॉलर डैड ? व्हाट आर यू सेईग डैड। यू नो डैड इसी तरह के इमोशनल ड्रामा के कारण हम इंडियंस अपनी तरक्की का खुद ही रोड़ा बन जाते है। देश-देश  क्या रखा है इस देश वाले फुलिश ड्रामा में दे रहा हूँ न टैक्स - बस जिनका काम देश को सँभालने का है मिल जाती है न उन्हें पेमेंट फिर मैं क्यों इस नोंसेंस के लिए अपना पूरा कैरियर बर्बाद करूँ।‘‘

“इसी तरह अगर सारी नई जनरेशन सोचती रही तो अपने देश की तरक्की के लिए कौन खड़ा होगा ? सभी पैसो के लिए दूसरे देश का मलबा उठाएँगे और अपने देश का भार कौन उठाएगा ? प्रतीक मैंने तुम्हे अच्छी से अच्छी एडुकेशन इसलिए नहीं दी की तुम एक दिन जब मौका आए तो दूसरे देश में बस जाओ। क्या अपने देश समाज के प्रति कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती तुम्हारी ? ये देश जितना देश की रक्षा करने वालो का है उतना तुम्हारा नहीं है क्या - क्या तुम्हारी कोई रिस्पोंसबेलटी नही है !!‘‘

‘‘ओह डैड - तो क्या आप चाहते है मैं भी फौजी बनकर बोर्डर पर बन्दूक लेकर खड़ा हो जाऊं !! ऑल दिस नोनसेन्स। आप ही बताए आप कौन सा फौज में थे - एक सिम्पल बैंक की नौकरी की फिर आपसे ऊपर उठकर मैं कुछ बैटर करना चाहता हूँ तब आप मुझे क्यों रोकना चाह रहे है। मैं फौजी तो नही !”

‘‘देश सिर्फ फौजी से नहीं चलता बेटा ? देश हम सबसे चलता है। हाँ तुमने सही कहा मैं फौज में नहीं था और इस बात का मुझे जीवन भर अफसोस रहेगा कि देश की सेवा मैं सीधे तौर पर नहीं कर पाया लेकिन अपने देश के प्रति अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए मुझे फौजी होने का इंतजार नहीं करना था। मैं जहाँ रहा अपने देश के लिए बेस्ट करता रहा। वैसे सोचा तो था कि मैं न जा सका तो तुम्हे फौज में भेजता पर तुमने आईटी चुना। मैंने इसका विरोध भी नहीं किया पर अब देश से बाहर तुम्हारी नौकरी मुझे मंजूर नहीं।” ‘‘ओह डैड नॉट अगेन। लगता है जैसे आप सच के सामने आंख बंद किए हैं। आप बस बेकार की कोई बात साबित करना चाहते है जबकि सच आपके सामने है कि ये देश फोर्थ वल्र्ड है और रहेगा ये कभी अमेरिका जैसे देश की तुलना में खड़ा नही हो सकता।‘‘

‘‘हाँ बेटा कैसे खड़ा होगा जब तक तुम्हारे जैसे भारतीय दूसरे देश की तरक्की में अपनी मेहनत जोड़ते रहेंगे।‘‘

‘‘आखिर आप चाहते क्या हैं ? मैं इस फोर्थ वर्ड में घुटनों के बल गिरा अपनी जिंदगी काट दूं। ये देश भुखमरी और गरीबी का है। यहाँ का आम आदमी हर दिन, रोज़ का खाना कहाँ से आएगा और कैसे बनेगा इसी में अपनी आधी से ज़्यादा उम्र काट देता है पर मैं ऐसा बिलकुल नहीं करने वाला। मुझे बेस्ट लाइफ चाहिए। फिर चाहे जो सेक्रिफाइज करना पड़े और बस बात यही खत्म करिए मैं न फौजी हूँ और न मेरे जाने से ये देश रुकने वाला है सो प्लीज लेट मी गो।‘‘

प्रतीक अपनी बात खत्म करता अब दो पल भी अपने डैड के सामने नही रुका और वे भी हताशा से उसे जाता हुआ देखते रहे। ये आज की जेनरेशन के सामने उनकी उम्र की हताशा थी जिसे आखिर वह किसके आगे व्यक्त करते पर सच यही था कि आज की जेनरेशन तरक्की के लिए इतनी तेज भाग रही थी कि उसे पता ही नही चलता कि कौन कौन उसके पीछे छूटता जा रहा है। यहाँ तक कि अपना देश भी उसके बहुत पीछे छूटता जा रहा है। वे बेबस से अपने इकलौते बेटे को विदा करने का मन बनाने लगे। अब यही सच था जिसका उन्हें हर हाल में सामना करना था।

प्रतीक कल ही अपनी नई जॉब के लिए यूएसए निकलने वाला था इसलिए उसके दोस्त उससे एक पार्टी की डिमांड कर रहे थे आखिर प्रतीक भी यही चाहता था कि वह सबको बताए कि वह अपनी लाइफ में क्या बेस्ट करने जा रहा है।

उसके सारे दोस्त शाम के सात बजे लियोपोल्ड कैफे कोलाबा में इक्कठे हो कर उसका इंतजार कर रहे थे।  शाम का वक़्त सब जगह भीड़ से गुलजार थी। उसके सारे दोस्त पार्टी के लिए व्यग्र थे पर प्रतीक अभी तक आया नहीं ंथा। वह अपना ट्रैफिक में फसा होना बता चुका था इसलिए सभी अपनी पूरी तैयारी के साथ उसका बेसब्र होकर इंतजार कर रहे थे। 

‘‘ओह गॉड अब तो बस आठ भी बजने वाले है। कहीं ये हमंे उल्लू बनाकर यूएसए तो नही निकल गया।” एक दोस्त की बात पर बाकी कसकर ठहाका मारकर हँस पड़ते है।

प्रतीक जल्दी से ट्रैफिक से निकलता हुआ कोलाबा पहुँच गया। एक तो रास्ते में वह फंसा हुआ था ऊपर से बार बार उसके डैड का फोन पर फोन आया जा रहा था। उसने बहुत सी रिंग जाने दी फिर कार पार्किंग पर लगाकर ही फोन कान से लगाए लगाए ही कैफे की ओर बढ़ने लगा।

“क्या हुआ डैड क्यों इतना कॉल कर रहे है ?‘‘ ‘‘बस यही पूछने के लिए कि तुम वापस कब आ रहे हो ?‘‘ ‘‘ओह डैड अभी तो पहुंचा ही हूँ मैं। वैसे भी यहाँ के इडियट ट्रैफिक में मैं एग्जोस्ट हो चुका हूँ - मैं आपको बाद में कॉल करता हूँ।” उनकी बाकी की बात सुने बिना ही वह कॉल कट करके मोबाईल अपनी पॉकेट में डालने लगता है। उसकी नज़रों के सामने अब कैफे था और उसके शीशे के पास उसे अपने दोस्तों की मौजूदगी दिख रही थी जिससे उसके चेहरे पर कुछ हलकी सुकून भरी मुस्कान आ गई। वह चारों ओर की कुछ ज़्यादा ही भीड़ से उबता हुआ उसे देखता आगे बढ़ रहा था। वहीं से टीवी का बड़ा सा स्क्रीन भी दिख रहा था जिसमे इंडिया वर्सेज इंग्लैण्ड का मैच चल रहा था शायद इस कारण भी कुछ ज़्यादा ही भीड़ वहां मौजूद थी।

उसकी नज़रों के सामने उसके दोस्त और उसके बीच दो लोग आपस में मोबाईल से बात करते हँसते हुए दिखते है जैसे उन्हें भी किसी का इंतजार हो और तभी पल में सारा नज़ारा बदल गया और पल में चहल पहल शोर में बदल गई। प्रतीक पल भर को समझ भी नहीं पाया कि अचानक पलक झपकाने भर के समय में क्या हो गया। वे दो अनजान इंसान किसी वहशी की तरह कैफे की ओर अपनी बन्दूक से दनादन गोलियां बरसा रहे थे। लोग बदहवास से भाग रहे थे। जाने कितने वही तुरंत कटे पेड़ की भांति गिर गए। बहुतेरे तो आखिरी बार पलक भी नही झपका सके। एक ही पल में वहां का नजारा इतना वीभत्स हो गया कि जिसे जहाँ जगह मिला वही भागकर अपनी जान बचाने की कोशिश करने लगा। पूरे दस मिनट तक मौत वहां अपना नंगा नाच दिखाती रही। वहशीपने का ऐसा क्रूर नज़ारा किसी की भी कल्पना से परे था। प्रतीक पल भर को समझ ही नहीं पाया कि उसकी नज़रों के सामने क्या हो रहा है। वह भी जान बचाने भीड़ के साथ भागने लगा। लोग बस बेतहाशा भागे जा रहे थे जाने कितनो पर गोलियां बरसती रहीं और वे बेदम से वही गिरते रहे।

प्रतीक भी किसी तरह से खुद को बचाता हुआ भीड़ के साथ भागता हुआ कहीं जा रहा था। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा किसी बड़े होटल की शरण में जा रहा था। वह नज़र घुमाकर देखता है कि वह ताज होटल के कोरिडोर में था। सब तरफ आवाजों का बेइंतहा शोर उमड़ रहा था। जमीं पल में सुर्ख लाल हो गई थी। जहाँ नज़र जाती बस बेबस इंसानी देह पड़ी नजर आती। ऐसे में उन गोलियों से बचने के लिए जिसे जहाँ जगह मिलती वही खुद को छुपाने की कोशिश करने लगता।

प्रतीक भी अंधी भीड़ के साथ ताज के कोरिडोर में आता किसी खम्बे के पीछे खुद को छिपा भी नहीं पाया था कि फिर वही दहशत वही निर्मम गोलियों की आवाज के साथ लोगो की आखिरी चीखे उसके कानो में पड़ने लगीं। वह घबराहट में सर उठाकर देख भी नही सका कि वह कौन है जो इंसानियत के इतने बड़े दुश्मन हो गए !! वह बस डर, दहशत, घबराहट और वेदना की चीख पुकार ही सुन रहा था। वे बेरहम गोलियां न बच्चो को छोड़ रही थी न औरतों, वृद्धों को ही बक़्श रही थीं।

इतना निर्दयी समय उनकी कल्पना से भी परे था। वह कारीडोर से होता होटल के अन्दुरुनी हिस्से में एक बड़ी भीड़ के संग भागा। वह घायल था। पर जिंदगी की उम्मीद का दामन कोई अंत तक नहीं छोड़ना चाहता था। सभी इधर उधर भागने लगे तभी फिर वही तड़तड़ की आवाज़ गूंजने लगी साथ ही कई लोग फिर कटे वृक्ष से फर्श पर गिर गए। प्रतीक को पता भी नही चला कब वह उन्ही घायलों के बीच वही गिर पड़ा।

वह घायल खम्बे के पीछे पड़ा था इसलिए उन नरपिशाचों की फर्श पर पड़े लोगो पर गोली बरसाने से वह बच गया। उसकी साँसे हलक में घुटी जा रही थी। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसके जीवन का ऐसा अंत होगा। उसे बस अहसास भर था कि उसके चारों ओर बस लाश ही लाश है। हवाओं में बारूद की गंध समां गई थी।

उसे पता भी नहीं चला कि कितना समय वह बेहोश रहा। उसकी तन्द्रा तो फिर किसी तेज धमाके की आवाज से टूटी। वह लगातार कई धमाको की आवाज सुन रहा था। साथ ही कई शोर और बीप जैसी आवाज। वह चाहकर कर भी खुद को हिला नही पा रहा था बस अपनी अर्धचेतना में उन आवाज़ों को सुनते अंदाज़े ही लगा पाया कि वह आवाज़ निश्चित रूप से ग्रेनेड की होगी। काले धुंए का गुबार और इसके पीछे भागते बेदम लोगों की चीख पुकार वह साफ साफ सुन पा रहा था पर उसका निस्तेज पड़ा शरीर इसके प्रति कोई हरकत नही कर पाया।

शायद आर्मी आ चुकी थी। अब जवाबी गोलाबारी की मिलीजुली आवाज़ थी। लाशो को वहां से हटाया जा रहा था पर बचाव के कार्य के साथ अभी भी किनारे पड़ी लाशांे पर किसी का ध्यान नहीं था उन्हीं के बीच अपनी अर्धचेतना में पड़ा प्रतीक अपनी साँसों की मध्यम पड़ती आवाजांे को साफ सुन पा रहा था साथ ही अपने परिदृश्य के टुकड़े में कई कमांडोज को भारी भारी लबादो और गन के साथ अपने आस पास मंडराते हुए उसने महसूस किया। उस पल उनकी मौजूदगी से उसके मन को कितना सुकून मिला ये उस पल शायद वही समझ पा रहा था।

उसका चेतना खोता हुआ मस्तिष्क अचानक चेतन अवस्था में आ गया और वह साफ साफ उनकी मौजूदगी देख रहा था। अपनी जान पर खेलकर वे कितने घायलों को अपने कंधे पर ढोते सुरक्षित पहुंचा रहे थे। कितने खुद भी घायल थे पर अपनी परवाह किए बिना वे लोगो को बचा रहे थे क्या ये सिर्फ ड्यूटी भर था या उससे भी कही 

अधिक !! प्रतीक सब देखता महसूस करता हुआ मन की परते कुरेदने लगा। वे वाकई कोई फरिश्ते थे जो अपनी जान पर खेलकर देश की सुरक्षा के लिए दुश्मन के आगे मजबूत दीवार बनकर खड़े थे जिसके पीछे हम आम लोग कितना सुरक्षित महसूस कर पा रहे थे।

क्या उनके कोई सपने नहीं होंगे उनके परिवार उनकी उड़ान सब बस देश के लिए कैसे सिमट गई। प्रतीक के घायल शरीर के अन्दर कुछ बदल रहा था जो मृत सपनों की ज़मी पर उम्मीद बनकर उगा था।

तभी कुछ काले लिबास में लोगो को कुरेदकर उन्हें जिन्दा है या नहीं देखने लगे। प्रतीक को खुद को बचाने का यही अवसर दिखा और वह अपनी भरसक कोशिश में अपने शरीर में हरकत करता है जिससे उनका ध्यान उसके ओर जाता है। वे पल में प्रतीक को अपनी ओर खींच लेते है।

अगले ही पल साफ हो गया कि उसने जिंदगी को नहीं मौत की आहट सुनी है। वे काले लिबास में आतंकी थे जो जिन्दा लोगो को होस्टेज करके अपनी ढाल बना रहे थे। अब मौत पक्की थी। प्रतीक की सांसे उसके शरीर में घुटने लगी। वे उसे गर्दन से पकड़कर घसीटते हुए ऊपर कही ले जा रहे थे कि पल में गोली चली और वह बेजान वस्तु की तरह नीचे गिर पड़ा। पर ये क्या वह जिन्दा था। वह धक्के से गिरा था न कि गोली से उसने किसी तरह खुद को उठाते हुए देखा पर किसी ने उसे पीछे की ओर धक्का देकर पीछे किया और जब तक क्या हो रहा है वह समझता वह पीछे की ओर गिर पड़ा।

अगले ही पल वह कई लोगों द्वारा किसी तरह बाहर निकाला जा रहा था पर अपनी वापस आई चेतना से वह सारा माजरा समझ चुका था। जब आतंकी उसे चारा बनाकर ऊपर की ओर लिए जा रहे थे तभी एक कमांडो ने उसे कवर करके बचा लिया पर खुद घायल हो गया। अब उन दोनों को बचाव टीम बाहर सुरक्षित लिए जा रही थी। उन लाशों के ताबूत से बाहर का नजारा कुछ अलग था। लोग अपनों के ज़िन्दा बचे होने की उम्मीद भरी नजर से उस जगह को देख रहे थे। इसी पल प्रतीक को अपने डैड की याद हो आई। उस दिन अचानक क्यों उन्होंने कॉल किया क्या उनका मन अपनों के प्रति डर महसूस कर रहा था !!

सोचता हुआ प्रतीक एक आखिरी नजर उस जवान पर डालता है और जो दृश्य उसकी आंखे देखती है उससे उसका रोम रोम जड़वत हो कर रह जाता है। प्रतीक को एम्बुलेंस में तो जवान को ढकी चादर से दूसरी वैन में ले जाया जा रहा था। अचानक उसकी सारी तन्द्रा वही। उस पल में सिमट कर रह गई।

अब उसके कान बस टीवी शो का कोई पुराना क्लिप याद कर रहा था जिसमे एक छोटी बच्ची जवान से पूछ रही होती है। ‘आपको ये ड्रेस पहनकर कैसा फील होता है ?‘

तब जवान मुस्कराते हुए कहता है- ‘बच्चा पता है जब ये ड्रेस पहन लेते है तो कुछ फीलिंग नाम की चीज नहीं होती बस देश ही दिखाई देता है और देश ही परिवार है जिसके लिए हम कुछ भी कर सकते हैं।‘

प्रतीक दर्द भींचते हुए अपनी आँखें कसकर बंद कर लेता है जिससे अंतरस दर्द की कोई बूंद उसकी आँखों के कोरो से लुढ़क जाती है।

न आसमान ही रोया / न ज़मी ही थर्रायी / न जाने किस घड़ी मौत चली आई / बस निशां बाकी दिलो पर रह गया / यादो में कोई ताबूत में सिमट गया / गया / बस सुकून की नींद सोया / वह सुकून से मुस्करा दिया / ऐ देश तुझपर कोई मिट गया ऐ देश तुझपर तेरा सपूत मिट गया होकर तुझपर कुर्बान....? समाप्त...जय हिन्द...

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लघुकथा

सुश्री सुमन चंदेल, मो. 8126228658, ईमेल: chandelsuman143@gmail.com


‘‘हेलो वाला हाय! ‘‘

‘‘कोई है उधर? ‘‘

‘‘पाय लागू जिज्जी...। ‘‘

वह थोड़ी- थोड़ी देर में पोक कर रहा था जबकि मुझे आज ही एक किताब के प्रूफ पढ़कर देने थे। मुश्किल से एडिटिंग की फ्रीलांसर बनी हूँ।

‘‘कैसे हो भुला ? ‘‘- मैंने टैक्स्ट किया। 

‘‘खूबसूरत हूँ। ‘‘ उसने लिखा। 

चल पगले! ये वहम कब से पाला है?‘‘- मैंने उसे छेड़ना चाहा।

‘‘माँ कहती है । ‘‘

‘‘माँ तो माँ है वीरा, तेरा मन बहलाने को कहती है।‘‘

‘‘क्या जिज्जी ! क्या मैं सच में सुन्दर नहीं?‘‘- उसने भी रुआंसा होने का नाटक किया। 

‘‘मजाक कर कर रही हूँ, बुद्धू। ‘‘

वह थोड़ा खुश हुआ।

‘‘अच्छा! मेरी खुबानी कहाँ हैं?‘‘-मैंने बात बदली। 

‘‘रास्ते में हैं।‘‘-उसने अब हँसता हुआ चेहरा बनाया।

‘‘अच्छा चल काम कर ले । आज के ऑक्सीटॉसिन का कोटा फुल हुआ‘‘, मैंने कहा।

‘‘जिज्जी, किसी दिन मुझे भी चकल्लस सूझ सकती है।‘‘-वह इतराते हुए बोला।

‘‘ चल भुला, तब की तब देखेंगे।- कहकर मैं रसोई की ओर बढ़ गयी।

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कविताएँ

सुश्री विभा रंजन ‘कनक’, नई दिल्ली, मो. 9911809003


‘‘अहिल्या’’ 

            

पत्नी थी पति की प्राणों प्यारी

अत्यंत सुंदर सौन्दर्य बना शत्रु

एक ऋषि  ने मोहीत हो

छल से कर दिया सतीत्व भंग उसका

वह र्निदोष पति द्वारा शापित

पाषाण बना दी गई

नाम था अहिल्या


अहिल्या

तुम युगों तक पाषाण रहीं

सच कहना

जिस क्षण शाप मिला

क्षण को विस्मित नहीं हुई

निष्ठा जड़ित प्रश्न नहीं उठे थे मन में

दृष्टि कातर नहीं हुई तुम्हारी


सतीत्व के बाणों को लेकर

पति के क्रोध धनुष पर

प्रश्न प्रत्यचां चढाऊं

पुछूं हे नाथ क्या दोष मेरा

मैने तो चहूंँ दिशा आपको ही देखा

किचिंत न संदेह किया


जब ज्ञात हुआ आपको

ब्यर्थ र्निमूल रहा यह क्रोध

क्या दंड़ र्निधारित किया स्वयं के लिये

प्रभु आपने

मुझे श्राप दिया पाषाण बनो

मैं बन गई पाषाण


सत्य कहती हँू सुनों

तुम भी कालातंर तक

पक्षताप ग्रसित दग्ध हृदय लिये

विरह की अग्नि कुण्ड में

युग-युगों तक जला करोगे..!

*****


डॉ. निशा नंदिनी भारतीय, तिनसुकिया, असम


विश्वास की डोर


तेरे विश्वास की डोर 

टूटे ना कभी भी 

रहूँ मैं जहां पर, रहे तू वहीं भी।

तेरे विश्वास की डोर..... 


देखा करूं मैं हर-पल तुझी को

तुझमें ही ढूंढूँ हर आशिकी को

तेरी आस पर मेरी दुनिया टिकी है।

रहूँ मैं जहां पर,रहे तू वहीं भी... 

तेरे विश्वास की डोर 

टूटे ना कभी भी...।


तेरे आसरे पर जीवन है मेरा

तेरे भरोसे पर चलता है डेरा 

यह नैया मेरी भंवर में खड़ी है। 

रहूँ मैं जहां पर,रहे तू वहीं भी... 

तेरे विश्वास की डोर 

टूटे ना कभी भी...।


कण-कण में पाया है मैंने तुझी को

बसाया है तन-मन में मैंने तुझी को

ये श्रद्धा की डोर 

हो ना कच्ची कभी भी।

रहूँ मैं जहां पर,रहे तू वहीं भी... 

तेरे विश्वास की डोर 

टूटे ना कभी भी...।

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कविताएँ

डाॅ. दलजीत कौर, चंडीगढ़, मो. 9463743144

नए साल के इंतज़ार में कविता

मैं फिर से

इंतजार में हूँ

कि कल

बदलेगी तस्वीर

और तकदीर।

एक उम्मीद

जागता साल

भविष्य के गर्भ में

कुछ अच्छा होगा।

आशा की डोर

थामे चला आता

नए साल को थमा

वही डोर चला जाता।

साल-दर-साल

दुनिया, देश, शहर, आदमी

कुछ नहीं बदलता

वादे, इरादे, योजनाएँ

छल करते राजा

छला जाता देश

और आदमी

तिल-तिल मरता

जीने की चाह में

हताश, निरीह आदमी

दिया जलाता है

उम्मीद का

कि

कल नया साल है !!

***

डॉक्टर परमजीत ओबराय, ईमेल: paramjitoberoi66@gmail.com

पैसा

पैसे के पीछे -

मनुष्य भाग रहा ऐसे,

पकड़म-पकड़ाई का खेल-

खेल रहा हो जैसे 

पुकार रहा-

उसे,

आ-आ छू ले मुझे 

सुन उसकी ललकार-

मानव है,

पाने को उसे बेकरार

करता जबकि यही-

भेदभाव,

सम्बन्धों का बन रहा-

आज यही आधार

अपने लगने लगे-

सब इसके,

समक्ष अब पराए 

संसार से आगे-

साथ न यह,

दे पाए 

माना पैसा जरूरी है-

जीने के लिए,

पर सब कुछ नहीं है

यह हमारे लिए। 

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कहानी

सुश्री अर्चना अनुप्रिया, नई दिल्ली, ईमेल: archanaanupriya123@gmail.com

‘‘काग़ज़ के टुकड़े’’


सुबह से ही घर में हंगामा था। सारी सोसायटी के लोग महेशनाथ जी के घर के आगे जमा हो रहे थे। कल रात कोई चोर महेशनाथ जी की तिजोरी ही चुराकर ले गया था। सभी जानते थे कि वह तिजोरी महेशनाथ जी को कितनी अजीज थी। हर वक्त वह उसे अपनी नजर के सामने रखते थे। घर के किसी भी सदस्य को उसे छूने तक की इजाज़त नहीं थी। बिना पूछे उनके कमरे में आने जाने तक की मनाही थी। लेकिन, आज तो उनके कमरे का नज़ारा ही बदला हुआ था। लोग कमरे में भरे पड़े थे और सभी एक-दूसरे से पूछने में लगे थे कि क्या हुआ, कैसे हुआ... वगैरह वगैरह..।

महेशनाथ जी के दोनों बेटे-बहू रह-रहकर अपनी किस्मत को कोस रहे थे। बड़ी बहू ने कहा-”मुझे तो पहले ही पता था कि तिजोरी में करोड़ों रुपये भरे हुए हैं। पिताजी जब भी इसे खोलते थे तो कमरे का पंखा बंद करवा देते थे...डरते होंगे कि रुपये कहीं उड़-उड़कर बाहर न आ जायें...अरे, हमें दे देते तो क्या बिगड़ जाता...यहाँ मर-मरकर पाई-पाई जमा करते हैं, तब जाकर किसी तरह घर का खर्च निकल पाता है...अपने ही खून हैं हम, कोई गैर थोड़े ही न हैं... आखिर चोर ले गया तो पड़ गई न कलेजे में ठंडक..हुँ..।”

जेठानी की बातें सुनकर छोटी बहू कहाँ पीछे रहने वाली थी। कहने लगी-”नहीं जीजी, मुझे तो लगता है, उसमें गहने रखे थे। आखिर माताजी के जाने के बाद उनके सारे गहने कहाँ गए..? पिताजी तो बैंक जाते नहीं हैं... तिजोरी तो इतना भारी थी कि एक बार सफाई के लिए पिताजी ने उसे दो आदमियों से उठवाया था। करोड़ों के सोने-हीरे के गहने होंगे उसमें... यहाँ पहनने के लिए एक ढंग की सोने की चूड़ी भी नहीं है... हमारे लिए ही संजोया था तो हमें दे देते.. कम से कम अपना शौक तो पूरा कर लेते हम..कल को बेटे-बेटियाँ ब्याहने हैं, उनके काम आ जाते...। इस घर में ब्याह करके हमें क्या मिला? दिन भर बस चैका चूल्हा करते रहो..। पिताजी ने हमारे साथ बिल्कुल सौतेले जैसा व्यवहार किया है। अब चोर ले गया तिजोरी तो क्या कर लेंगे वह ?..हाय-हाय हमारी तो किस्मत ही खराब है जो इस घर में शादी करके आये..।”

अपनी पत्नियों का रोना-धोना देखकर दोनों बेटे उन्हें सांत्वना देने लगे। उनसे भी रहा नहीं गया। अपने पिताजी को सीख देने लगे-”पिताजी, आजकल रुपये-गहने कोई घर में रखता है क्या ? आपको तो हम लोगों के ऊपर विश्वास ही नहीं है...हमें दे देते तो हम बैंक के लॉकर में रख देते... ये उमर आपके भजन करने की है..घूमिए, टहलिए, दोस्तों से मिलिए... दिनभर पैसे पकड़कर बैठना क्या अच्छा लगता है ? सही तो कह रही हैं आपकी बहुएँ... हम में बाँट देते तो हम अपना भविष्य अच्छा कर सकते थे...अब सब चोर उठाकर ले गया तो क्या मिला..?.. बताइए..? हमें तो जरा सी बात पर डाँट देते हैं... अब आपने इतनी बड़ी गलती की तो उसका क्या..?..सचमुच, हमारे साथ बड़ा अन्याय किया है आपने।”

बेटे-बहू की बातें सुनकर मुहल्ले वालों में भी कानाफूसी शुरू हो गई थी। सभी घुमा-फिराकर महेशनाथ जी को ही दोष दे रहे थे-” सठिया गए हैं चाचाजी, इतने लायक बेटे-बहू कहाँ मिलते हैं आजकल..? चाचाजी को उनके साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था..। अरे, धन अपना होता है कि बच्चे..? आखिर बच्चों के लिए ही तो दौलत जोड़ता है इन्सान... उनमें बाँट देते तो अच्छा नहीं होता क्या ?बेटे-बहू कितना करते हैं उनके लिए...बेचारी बहुएँ..एक पैर पर खड़ी रहती हैं दिन-रात...कोई और होता तो सारी दौलत लुटा देता ऐसे बच्चों पर...लेकिन चाचाजी को दौलत का मोह किस कदर जकड़े हुए है इस उमर में...हे भगवान..!..कैसे-कैसे लोग होते हैं दुनिया में...।”

सबकी बातें सुनकर महेशनाथ जी के पुराने नौकर , सेवकराम को अच्छा नहीं लगा। वह लोगों को बाहर जाकर बैठने के लिए कहने लगा। धीरे-धीरे लोग बाहर निकलने लगे। सेवकराम ने महेश बाबू को समझाना शुरू किया -”मैं तो कब से कह रहा था कि तिजोरी-विजोरी भैया-भाभी को सौंप कर हरिद्वार चलिए, पर आप मेरी सुनते ही कहाँ है ? माताजी भी कहते-कहते थककर चली गईं, पर पता नहीं देर रात तक जाग-जागकर क्या संजोते रहते हैं आप तिजोरी में ? अब चोर उठाकर ले गया सब...लोग दुनिया भर की बातें कर रहे हैं... भैया-भाभी आपसे दुःखी हैं। इन सबसे क्या मिल गया आपको? आप खुद भी तो दुःखी होंगे... आज माताजी होतीं तो सोचिए, क्या गुजरती उनपर..?”

इन सारे तहलकों के बीच यदि कोई बेफिक्र और निश्चिंत था तो वो थे... महेशनाथ जी। उन्हें अफसोस जरूर था कि उनके जीवन भर की पूँजी चोर चुराकर ले गए थे पर आज एक बड़ी सीख मिली थी कि कैसे दुनिया में आदमी अकेला आता है और अकेला ही जाता है। बेटे-बहू, रिश्ते-नाते, मित्र-सब बस अपनी-अपनी सोचते हैं...कुछ भी कर लो पर लोगों को दौलत की ही फिक्र ज्यादा होती है, इन्सान की नहीं... कम ही लोग ऐसे हैं, जो अपनी और दौलत की परवाह किए बगैर परिवार और लोगों की भलाई में लगे रहते हैं। उन्हीं लोगों में से एक थी-उनकी पत्नी, सुमिता। आज अपनी पत्नी की कमी उन्हें बहुत खल रही थी। सभी तिजोरी के लिए परेशान थे परन्तु किसी ने ये नहीं पूछा कि चोर ने आपको कोई चोट तो नहीं पहुँचाई न?... आप ठीक तो हैं न ?...सुबह से कुछ खाया कि नहीं?...अपनी दवाई ली कि नहीं?....सुमिता होती तो सबसे पहले यही तो पूछती..।

बाहर सबकी कानाफूसी और हाय तौबा का दौर अभी तक जारी था। लोगों ने राय दी कि पुलिस में शीघ्र ही खबर कर दी जाय। आखिर करोड़ों का सवाल है,ऐसे थोड़े ही छोड़ा जा सकता है...। तय हुआ कि बड़ा बेटा मुहल्ले के कुछ लोगों के साथ महेशनाथ जी को लेकर थाने जायेगा। महेश जी का जाना जरूरी था क्योंकि तिजोरी की विस्तृत जानकारी वही दे सकते थे। सब मिलकर महेशनाथ जी के कमरे में पहुंचे। सेवकराम से कहा गया कि पिताजी को दूसरी धोती और जूते पहना दे और उनकी छड़ी लाकर दे दे, तुरंत निकलना है। सुनकर सेवकराम बक्से से धोती निकालने लगा परन्तु महेश जी ने थाने जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि उनके बरसों की तपस्या रखी थी उस तिजोरी में, अगर उनकी तपस्या में शक्ति है तो चोर स्वयं ही आकर उनसे क्षमा माँगेगा...पुलिस के चक्कर में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है। उनकी यह बात सुनकर बेटा बिफर गया। ”अजीब करते हैं आप, पिताजी.. ये भी कोई बात हुई..? वो चोर क्यों वापस आयेगा भला..?..हम सबको दुनिया भर की सीख देते रहते हैं और खुद एक नागरिक का फर्ज निभाने की बारी आई तो पीछे हट रहे हैं..?”

बहुओं ने सुना तो भागती हुई अंदर कमरे में आईं--”ये क्या पिताजी.?. इतनी दौलत ऐसे थोड़े ही न छोड़ देंगे..? पुलिस में जल्दी खबर नहीं की तो समय पाकर चोर तो कितनी दूर निकल जायेगा, फिर तो कुछ भी मिलने से रहा..?”

लोगों में फिर से कानाफूसी शुरू हो गई। ”सचमुच, बुढ़ापे में दिमाग काम नहीं करता है आदमी का...भला सोचो..ये क्या बात हुई.?.. कहीं ऐसा तो नहीं कि चाचाजी को शॉक लग गया है, इसीलिए ऐसी बातें कर रहे हैं..? काठ मार गया लगता है...ऐसे में कितनों का दिमाग खराब होते देखा है हमने”-एक- एक कर सभी अपने-अपने अनुभव बताने लगे। कुछ औरतों को सहानुभूति सी हो गई। वे बहुओं को अलग से बुलाकर समझाने लगीं-”जब ऐसा शॉक लग जाये तो जरूरी है कि उस आदमी को थोड़ा रुलाया जाये...रोने से अंदर का गुबार निकल जाता है और आदमी नॉर्मल रहता है।” अब समस्या खड़ी हुई कि कैसे रुलाया जाये..? पिताजी कोई बच्चे तो हैं नहीं।कुछ अनुभवी औरतें इस समस्या का समाधान ढ़ूढ़ने में लग गयीं। महेशनाथ जी तक भी यह बात पहुंची। “इतने तमाशे से तो अच्छा है, मैं इनलोगों के साथ थाने चला जाऊँ,”- उन्होंने मन ही मन में सोचा और धोती बदलने के लिए अभी उठने ही वाले थे कि बाहर कुछ शोर सा सुनाई दिया- ”अरे पकड़ो इसे... नालायक... तेरी हिम्मत कैसे हुई....”,बेटे-बहू आवाज सुनकर बाहर की ओर लपके। महेशनाथ जी अभी कुछ समझ पाते या पूछ पाते तब तक उन्होंने देखा कि दो शख्स उनकी तिजोरी उठाए कमरे की तरफ चले आ रहे हैं, पीछे-पीछे मुहल्ले वाले और लपकते हुए बहू-बेटे...। छोटी बहू ने कहा-”मैंने तो कहा ही था कि गहनों से भारी है तिजोरी, भला चोर कितनी दूर लेकर भाग सकता था..?...तिजोरी न तो खुली होगी, न ही टूटी होगी नालायक से, सो करता क्या..? रास्ते में ही छोड़कर भाग गया होगा...भला हो इन दोनों भाईयों का, जो घर तक सही सलामत पहुँचाने आए..। ”तब तक उन दोनों ने तिजोरी जगह पर रख दी थी। बेटे-बहू की तो जान में जान आ गई। अभी वे कुछ पूछते इससे पहले ही वे दोनों शख्स महेशनाथ जी के चरणों में गिर पड़े--”हमें माफ कर दीजिए बाबूजी, हमसे भूल हो गई थी..हम रास्ता भटक गए थे, इसीलिए चोर बन गए थे...मौका देखकर हम खिड़की से अंदर आए और आपकी तिजोरी उठाकर चल दिए...पर आपके विचारों ने हमें रास्ता दिखाया, गलती का अहसास कराया...अब हम अपने किये पर शर्मिंदा हैं... आगे से ऐसा कुछ नहीं करेंगे।” “क्या...!..तुम दोनों ही चोर हो”- बेटे ने पूछा। “हाँ भैयाजी हमसे गलती हो गई..”- चोर ने जवाब दिया। यह जानते ही कि वे दोनों ही चोर हैं, पूरी भीड़ उन दोनों को मारने पर उतारू हो गई, पर महेशनाथ जी बीच में आए और सबको शांत रहने को कहा। सबकी राय हुई कि तिजोरी खोलकर देखा जाए, कुछ भी गायब हुआ तो इन दोनों को पुलिस में दे देंगे। तिजोरी खोली गई.. सब अपनी आँखों से करोडों रुपये और गहने देखने को उतावले थे। लेकिन, यह क्या..? तिजोरी में तो कागज भरे पड़े थे। सबकी आँखें आश्चर्य में डूबी थीं। स्याही से रंगे कागज कोई तिजोरी में  क्यों रखेगा ? किसी ने कहा-”अरे, जमीन-जायदाद की वसीयत होगी..।” इतना सुनना था कि भीड़ फिर से उतावली होकर देखने लगी-”इतनी जमीन थी चाचाजी के पास ? फिर तीन कमरों के इस छोटे से घर में क्यों रहते हैं, बड़ा घर क्यों नहीं ले लेते?” बेटे-बहू वसीयत के कागजात देखने के लिए उतावले हुए जा रहे थे।उन्होंने एक-एक कर सारे कागज देख लिए पर किसी में भी वसीयत लिखी नहीं दिखी...किसी में कविताएँ, किसी में कहानियां, किसी में दार्शनिक विचार...”ये क्या है पिताजी?”आश्चर्य में डूबे बेटे ने पूछा। अब महेशनाथ जी की बारी थी। बड़े ही शांत भाव से उन्होंने कहना शुरू किया-”मैं हमेशा से एक लेखक और कवि रहा हूँ। यह लेखनी ही मेरी पूँजी है। रात-रात भर जाग-जागकर मैं अपने अनुभव और दिल में छुपे चिंतन के भाव लिखता रहा हूँ। तुम्हारी माँ के जाने के बाद ये कलम और लेखन ही मेरे साथी हैं। अपने ह्रदय की हर बात, दुनिया की अच्छाई, बुराई, संस्कारों की बातें-सब मैंने इन कागजों पर उकेरने की कोशिश की है ताकि मेरे बाद जब बच्चे इसे पढ़ें तो उन्हें सही और गलत का अंतर पता चल सके, सही मार्गदर्शन मिले और उन सभी सवालों के जवाब भी, जो परेशानियों में रास्ता भटका सकते हैं। कविताओं में वो संस्कार छुपे होते हैं, जो इन्सान को सहृदय बना सकें। मशीनी दुनिया के लिए यह बहुत जरुरी है बेटा...हम इन्सान हैं, जीवन जीने आये हैं, दौलत इकठ्ठी करने नहीं। मैं अपने बेटों को, पोते-पोतियों को संस्कारों की वसीयत देना चाहता हूँ, दौलत तो वे खुद कमा लेंगे। मुझे अपनी लेखनी पर भरोसा था, तभी मैं थाने जाने से इन्कार कर रहा था। देखो..मेरे विचारों को पढ़कर इन दोनों चोरों के मन बदल गए। मुझे खुशी है कि रात भर जागकर लिखना काम कर गया।” चोरों ने कहा-”हाँ बाबूजी, जब हमने आपके विचार पढ़े तो हमें अपने ऊपर शर्म आने लगी...हमें लगा कि गलत रास्ते पर चलकर कभी सही मंजिल नहीं मिलेगी, समय रहते हम रास्ता बदल लें, यही हमारे लिए ठीक रहेगा। हमलोग बुरे नहीं हैं बाबूजी, दौलत की लालच और परेशानियों ने हमें गलत रास्ता दिखा दिया...लेकिन आगे से ऐसा नहीं करेंगे, हम वादा करते हैं।” महेशनाथ जी भावुक हो रहे थे और मन ही मन में संतुष्ट भी बोले-”चलो, मेरी कलम ने एक-दो को तो सही राह दिखायी। शायद आगे और लोग भी पढ़कर सही मार्ग अपनाने को विवश हो जायें। लेखकों के पास रुपये, गहने की दौलत कहाँ होती है और उनका वे करेंगे क्या? लेखकों और कवियों के पास तो विचारों और संस्कारों की दौलत होती है, जो कभी खत्म नहीं होती...लोगों को भले उनकी दौलत दिखाई नहीं देती पर उनमें युग के युग बदलने की ताकत होती है।” सुनकर बेटे-बहू सहित सारे मुहल्ले वाले मुँह बनाने लगे-”लो, खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। हम सब परेशान थे किसके लिए और मिला क्या..?..चलो भाई, सब अपने-अपने घर चलें, बहुत काम पड़ा है...। ”सब बड़बड़ाते हुए एक-एक कर जाने लगे। बेटे ने कहा-”यह क्या पिताजी, तिजोरी तो आप ऐसे सँभालते थे कि पता नहीं क्या है उसमें..? आज का पूरा दिन खराब हो गया। ऑफिस पहुँचने में देर हो गयी तो डाँट सुननी पड़ेगी, वो अलग”....”पिताजी पहले बता देते तो हम अपना काम तो निपटा लेतीं, अभी तक चैका-बरतन सब वैसे ही पड़ा है”-बड़बड़ाते हुए बेटे-बहू भी कमरे से निकल गए। दोनों चोर बार-बार माफी माँग रहे थे और महेशनाथ जी से अच्छे मार्गदर्शन के लिए आग्रह कर रहे थे। महेशनाथ जी कभी तिजोरी देखते तो कभी खुले दरवाजे को, जहाँ से अभी-अभी उनके बेटे-बहू निकल कर गए थे। मन ही मन में सोच रहे थे कि क्या दुनिया में सिर्फ उन्हीं कागजों का महत्व है जिनमें वसीयतें लिखी होती हैं या वे कागज भी अनमोल हैं, जिनमें समाज और देश के संस्कार बदलने की ताकत हैं...?

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कहानी

डाॅ. प्रकाश मनु, फरीदाबाद (हरियाणा),मो. 09810602327, ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

जरा आँख में भर लो पानी...!

अजीब हैं परमेश्वर बाबू...एकदम अजीब। लगता है, आज की दुनिया के तो हैं ही नहीं। पता नहीं, कहाँ से आया है यह बंदा और करना क्या चाहता है, जिसके लिए रात-दिन मारा-मारी, रात-दिन भागमभाग...! हमेशा साँस फूली सी रहती है और बिस्तरबंद तैयार। आज यहाँ, कल वहाँ, परसों कहीं और। पूरे देश की हजारों बार परिकमा कर चुके, पर चैन नहीं। पूछो तो एक ही जवाब, “अभी तो किया ही क्या है मैंने? मुझे बहुत काम करना है, बहुत काम। देश पुकार रहा है, भारत माता पुकार रही है...!”

सुनने वाले हैरान रह जाते हैं। यह कैसा बंदा है? इस धरती का तो नहीं लगता, जहाँ सबको अपनी-अपनी पड़ी है। सुबह से शाम तक जाने किस-किस तरह की आपाधापी में लगे रहते हैं लोग यहाँ। और कहाँ यह शख्स, जो अपना घरबार छोड़कर शहीदों की जीवनियों पर एक महाग्रंथ लिखने की तैयारी में रात-दिन दुबला हुआ जाता है।

जानने वाले बताते हैं, अभी कुछ बरस पहले तक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे परमेश्वरी बाबू। आराम का जीवन था, मजे में लिखते-पढ़ते थे।...पर दिल में एक उधेड़बुन सी थी कि इस देश को आजादी के लिए बहुत लोगों ने खुद को कुर्बान किया। कितने ही शहीदों का लहू बहा। पर हम तो ठीक से उनके नाम तक नहीं जानते। याद करना तो दूर की बात है। और उन शहीदों में से कुछ तो एकदम गुमनाम...! किसी न किसी को तो जगह-जगह घूमकर उनका पता लगाना चाहिए और फिर उन पर एक बड़ा सा ग्रंथ...!

और फिर यह हलचल बढ़ी तो बढ़ती ही चली गई। मन एकदम बेकाबू। उन्होंने फौरन नौकरी से इस्तीफा दिया और काम में जुट गए। 

घर वालों ने समझाया, दोस्तों ने भी, यह क्या परमेश्वरी बाबू...? भला यह कैसा पागलपन!...पर परमेश्वरी बाबू सोच चुके थे। मन ही मन काम की पूरी योजना भी बना ली थी। जगह-जगह घूमे। हर शहर, हर कसबे में गए। कुछ जगहों पर तो कई-कई बार।...और उनके हाथ लगा एक अनमोल खजाना, जो समय के साथ बढ़ता ही जाता था। इतनी जोशीली कहानियाँ थीं उसमें, कि कभी-कभी परमेश्वरी सुनाने बैठते तो सुनने वालों की आँखों में आँसू उमड़ते और दिल में जोश की आँधी...!

पूरे बीस बरस हो गए। परमेश्वरी बाबू की किताब अब काफी बड़ी हो गई है। वे सोच रहे थे, हाथ से लिखे पूरे डेढ़ हजार पन्ने हो गए। कम से कम चार-पाँच खंड तो बनाने ही होंगे। उन्होंने मन ही मन तय किया, जल्दी से एक बार आखिरी नजर डालकर पांडुलिपि प्रकाशक के हवाले की जाए, ताकि उनका यह जीवन यज्ञ पूरा हो। 

पर संयोग की बात। अगले ही दिन उनके बचपन के मित्र देवकांत घोषाल का पत्र आ गया। उन्होंने बड़ी कशिश के साथ लिखा था:

‘मेरे प्यारे मित्र परमेश्वरी, बरसों से तुमसे मुलाकात नहीं हुई। पर यह मत समझो कि मुझे कुछ पता नहीं। तुम्हारे काम की बराबर खबर रहती है। तुमने यूनिवर्सिटी की प्रोफेसरशिप छोड़ दी, इसकी भी। तुम्हें सनकी कहने वाले लोग बहुत हैं। कहें, पर अनगिनत चाहने वाले भी तो हैं।...इस छोटे से शहर सुरजापुर में भी तुम्हारे प्रशंसक बहुत हैं और ऐसे दो शहीदों की कथा तुम्हारे हाथों कलमबंद होने की प्रतीक्षा कर रही है, जिनकी याद ही रुला देती है। आओगे तो पता चलेगा और यह भी कि सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन तो सचमुच एक आँधी था। जोशीली आँधी, जिसमें सचमुच अंग्रेज सरकार के बड़े-बड़े कंगूरे ढह गए। ऐसा न पहले कभी देखा गया और न बाद में।... 

मेरा तो मानना है कि पूरा देश इसमें शामिल था। गाँव के कक्का की लाठी और बूढ़ी दादी का चरखा भी। यह सचमुच गाँधी की आँधी थी, महा आँधी..। उस समय पूरे देश में कैसा गुस्सा, कैसा उबाल था, जानना हो तो एक बार यहाँ आओ।...’ 

आगे बहुत भावुक होकर लिखा था देवकांत घोषाल ने:

‘शायद तुम्हें पता नहीं, मेरे प्यारे दोस्त परमेश्वरी, कि इस सुरजापुर की धरती पर ही तकली बाबू आकर रहे थे। उन्होंने पूरे सुरजापुर में अलख जगाया और फिर तहसील पर तिरंगा लहराते हुए शहीद हुए। और यहीं वह नन्हा शहीद हरींद्र जनमा था, जो भले ही आज नहीं है, पर उसकी यादों की पुकार हवाओं में उठती है तो मन विकल होता है।...वह तो देश पर अपनी जान कुर्बान करके वहाँ चला गया, जहाँ पुण्यात्मा जाते हैं, पर उसके बूढ़े दादा जी अभी हैं। गौरी दा। होंगे कोई पंचानबे बरस के।... 

कुछ बरस पहले तक अकसर सुबह घूमने जाते तो दिखाई पड़ जाते थे। आजकल नजर नहीं आते। लोग बताते हैं, अब थक से गए हैं। कोई कुछ पूछता है तो अकसर चुप ही रहते हैं। उस चुप्पी में क्या कुछ है, जानने की मेरी बहुत बार इच्छा हुई, पर कभी हिम्मत नहीं पड़ी। 

तुम कभी आओ तो मिलकर उनके घर चलेंगे। शायद उनके मुँह से सुन सकें हम वह कहानी, जो वे हर किसी को नहीं सुनाते, पर सुनाते हैं तो उनका खुद पर काबू नहीं रहता। पूरा शरीर हवा में पत्ते की तरह काँपने लगता है...! तुम मेरी बात सुन रहे हो न परमेश्वरी? मुझे तुम्हारे जवाब की प्रतीक्षा रहेगी।’

चिट्ठी में देवकांत ने घर का पता भी लिखा था, मकान नंबर 655, पीपल वाला चैक, बंगाली टोला, सुरजापुर।

’देवकांत घोषाल मित्र की चिट्ठी का इंतजार कर रहे थे। चिट्ठी तो नहीं आई, पर तीसरे दिन सुबह-सुबह चार बजे दस्तक हुई। उन्होंने दरवाजा खोला तो चैंके, “अरे, परमेश्वरी तुम....?”

परमेश्वर बाबू धधाकर मिले। बोले, “देबू, तुमने पहचान लिया? वाह, भई! मैं तो फिर भी बदल गया, पर तुम्हारा हुलिया तो बिल्कुल नहीं बदला...!”

देवकांत बचपन के मित्र को आदर से अंदर लाए। खिड़की के पास सामान जमाया। फिर बैठने के लिए बेंत की कुरसी सरकाते हुए बोले, “आओ बैठो मित्र। इतने बरस कहाँ रहे, जरा सुनाओ हाल।...वैसे मैं तो शुरू से ही जानता हूँ तुम्हें। आगरा कालेज में साथ पढ़ते थे अपन, तब भी तुम कई-कई दिन के लिए गायब हो जाते थे। और फिर लौटते थे तो तुम्हारे पास सुनाने को इतनी सारी बातें होती थीं, इतनी बातें कि महीनों तक खत्म ही नहीं होती थीं।...याद है न?”

इस पर परमेश्वरी बाबू हँसने लगे। बोले, “यह तो एक ऐसा कीड़ा है मित्र, कि एक बार काट लेता है तो उसका असर जिंदगी भर नहीं जाता।...मेरी हालत भी कुछ ऐसी ही समझो!”

फिर उन्होंने बताया, “सुनो देबू, हुआ यह कि अपने शहर इलाहाबाद में मैंने देखा। एक बूढ़े सज्जन थे, भालचंद। एक छोटी सी चाय की दुकान थी उनकी। उसी चाय की दुकान से पूरे घर का गुजारा होता था।...एक बार बातों-बातों में मैंने पूछा तो उन्होंने खोखली हँसी हँसते हुए बताया कि बाबू जी, एक बेटा था, वह देश की आजादी के काम आया। अब घर तो चलाना ही है किसी न किसी तरह!...सुनकर मैं सिहर गया। अरे, एक शहीद के परिवार की यह हालत...? किसी ने इस बारे में कुछ नहीं किया? जानकर दिल फटा जा रहा था। 

“मैंने बिना उन्हें बताए, अपनी तरफ से कोशिश की। बहुत चिट्ठियाँ लिखीं, ताकि उन्हें कुछ सहायता मिले।...कहीं कुछ नहीं हुआ तो हर महीने अपनी तनखा का एक हिस्सा देने की बात कही, ताकि उन्हें पैसे की कमी न रहे। पर उनका स्वाभिमान नहीं माना। बोले, बाबू जी, जब सोने जैसा लाल निछावर कर दिया देश पर, तो अब इन कंकड़-पत्थर का क्या करेंगे? जिंदगी तो जैसी भी है, गुजर ही जाएगी! पर अपने शहीद बेटे का सिर कैसे झुकने दूँ...?”

देवकांत बड़े ध्यान से सुन रहे थे मित्र की बातें। और परमेश्वरी अपनी रौ में थे, “देबू, सच्ची कहता हूँ। भालचंद की बात सुनकर बड़ा धक्का सा लगा। बल्कि भीतर एक किस्म का अंधड़ सा चल पड़ा।...मैं सोचने लगा, पता नहीं कहाँ-कहाँ, कितने लोग हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया? उनके बारे में खोज करके सबकी कहानियाँ लिखूँ तो शायद लोगों का ध्यान जाए। खासकर हमारे देश के नौजवान और बच्चे...! उनके भीतर सच्चाई है, जोश है। वे जरूर मिलकर कुछ करेंगे, जिससे हम कम से कम शहीदों को आदर से याद तो करें।...”

“तुम्हें लगता है, किताब से कोई फायदा होगा....?” परमेश्वरी बाबू की बात पूरी होते ही देवकांत ने सवाल किया।

परमेश्वरी बोले, “फायदा-नुकसान मैं नहीं जानता, मित्र। बस, देश के किशोरों और नौजवानों को यह बताने की दरकार कि हमें आजादी ऐसे ही नहीं मिली। कितनों ने इसे अपने खून से सींचा।...और ऐसे-ऐसे नौजवान थे, जिन्होंने ऊँची से ऊँची पढ़ाई की। पर देश की पुकार सुनकर आगा-पीछा कुछ नहीं सोचा और इस लड़ाई में शामिल हो गए। कितने ही घरों के चिराग बुझ गए।...आज वहाँ दीवारों में भी आँसू और सिसकियाँ सुनाई देती हैं। पर किसी को मतलब नहीं। तो क्या हमें भी कुछ नहीं सोचना चाहिए, देबू?”

फिर बोले, “एक तो ऐसी लड़की थी, जिसने उस अंग्रेज पुलिस अफसर को सरेआम थप्पड़ मारा था, जिसने औरतों के जुलूस पर लाठियाँ चलवा दी थीं। उसमें कई बूढ़ी औरतों को भी चोटें आई थीं।...बाद में पता ही नहीं चला, वह कहाँ गई? ऐसे कई युवक थे, जो अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थे, पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर देश के लिए अलख जगाने का फैसला किया। बहुत सारे पुलिस अधिकारियों और अंग्रेजी सरकार के अफसरों ने भी इस्तीफे दिए। सुख-सुविधाओं को ठोकर मारी और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। अपनी जानें दे डालीं, पर किसी के चेहरे पर पछतावा नहीं।...मैंने सब लिखा है, तुम पढ़ना। फूल जैसे बच्चों में भी अपार जोश था। वह 

आँधी थी ही ऐसी कि कोई खुद को रोक नहीं सकता था। लोगों को लगने लगा था, अब अंग्रेज जाएँ, जल्दी यहाँ से निकलें, वरना जैसे भी हो, हम उन्हें अपने देश से निकाल बाहर करेंगे...!”

कुछ देर बाद परमेश्वरी बाबू को याद आया, “हाँ देबू, तुमने चिट्ठी में लिखा था कि इस शहर में एक ऐसा नन्हा शहीद हरींद्र था, जिसने अपनी जान देकर भी तिरंगा फहराया! और तकली बाबा की शहादत।...मैंने भी कहीं पढ़ा है उनके बारे में। पर ज्यादा नहीं जानता। तो क्या चलें हम लोग...?” कहते-कहते देवकांत के चेहरे पर नजरें गड़ा दीं परमेश्वरी बाबू ने।

“सच पूछो तो, अंदर से हिम्मत नहीं होती, परमेश्वरी। लोग कहते हैं कि गौरी दा इन दिनों ज्यादा बात नहीं करते। पर...तुम आए हो तो चलेंगे। जरूर चलेंगे। मैं खुद बहुत दिनों से सोच रहा था। शायद आज मिलना हो पाए गौरी दा से...!”

देवकांत अपनी लहर में थे। बताने लगे, “एक बात बताऊँ परमेश्वरी, कभी इस शहर के सबसे धनी आदमी थे गौरी दा। बहुत बड़े कपड़ा व्यापारी, जिनके यहाँ सीधे मिलों से कपड़ा आता था और दूर-दूर छोटे-बड़े व्यापारी और दुकानदार उनके यहाँ से कपड़ा लेने आते थे। खूब सारे नौकर-चाकर, पर काम ईमानदारी से करते थे। परिवार में देशभक्ति की भावनाएँ थीं।...एक बार तो गाँधी जी भी आकर ठहरे थे उनके घर। वह चित्र बड़े आदर से उन्होंने अपनी बैठक में लगाया हुआ था। कई लोग कहते थे, अरे गौरी दा, बैठक में यह फोटो क्यों...? कहीं अंग्रेज सरकार की नजर पड़ गई तो...? इस पर उनका जवाब होता था, कि गाँधी जी तो हर हिंदुस्तानी के दिल में हैं। सरकार किस-किस को पकड़ेगी?...तो मित्र, इन्हीं गौरी दा का बहादुर पोता था हरींद्र। आगे की बातें तुम उन्हीं से सुनना।...” 

“तो फिर चलो, देबू। देर क्यों की जाए? चलते हैं अभी।” परमेश्वरी उठने को हुए।

“अरे, अभी तो आए हो, मित्र। नहा-धो लो। चाय पीकर फिर निकलेंगे।” देवकांत बोले।

’थोड़ी देर बाद ही दोनों मित्र एक रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा पुराने शहर की ऊबड़-खाबड़, तंग गलियों से होकर गुजरने लगा। कोई आधे घंटे में वे बड़े चैक के सामने एक पीले रंग के मकान के सामने जा पहुँचे। मकान के गेट पर दोनों ओर काले पत्थर के दो विशालकाय हाथी।

“शहर में सब इसे हाथी वाली कोठी कहते हैं।” देवकांत ने बताया।

परमेश्वरी बाबू ने दस्तक दी तो एक अधेड़ उम्र के नौकर ने आकर दरवाजा खोला। पूछने पर देवकांत ने उसे बताया, “गौरी दा से कहो, इलाहाबाद से परमेश्वरी बाबू आए हैं मिलने। शहीद हरींद्र के बारे में कुछ जानना चाहते हैं...!”

उसी नौकर ने उन्हें बैठक में ले जाकर बैठाया। कुछ देर में हाथ में छड़ी का सहारा लिए आहिस्ता-आहिस्ता चलते गौरी बाबू आए, तो परमेश्वरी और देवकांत ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया।

गौरी बाबू ने भी हाथ जोड़े और चुपचाप कुरसी पर बैठ गए। फिर ध्यान से उनकी ओर देखने लगे। कुछ देर बाद धीरे से बोले, “अब तो ये सब बीते युग की बातें हैं। वो जमाना कुछ और था, आज का कुछ और। आप क्या करेंगे जानकर...?”

परमेश्वरी बाबू बोले, “मैंने कहीं तकली बाबा के बारे में एक लेख पढ़ा था। उसी से हरींद्र की शहादत के बारे में भी पता चला।...देवकांत मेरे मित्र हैं, इसी शहर में रहते हैं। इनसे आपका पता चला तो रहा नहीं गया। इलाहाबाद से टिकट कटाया और आज यहाँ सुरजापुर...!”

कुछ देर बाद उन्होंने इसरार किया, “गौरी दा, कुछ थोड़ा सा आप बताएँ तो....!” वाक्य अधूरा ही छूट गया।

“अब कहाँ से शुरू करूँ, क्या बताऊँ आपको?” गौरी बाबू कुछ देर कशमकश में रहे। असहज से। फिर धीरे से उन्होंने सुर उठाया- 

अच्छा, आप...आप लोग इतनी दूर से आए हैं, तो याद करके कुछ बताता हूँ। कहने को बहुत बातें हैं, पर अब कुछ सूझता नहीं है। मेरा एक ही पोता था, हरींद्र। पूरे घर का लाड़ला। घर का चिराग।...मुझसे तो उसका कुछ ज्यादा ही प्यार था। अपने माँ-बाप से भी ज्यादा। वैसे बचपन से ही वह कुछ अलग सा था। बातें करने का शौकीन, कहानियों का भी। मेरे छोटे-मोटे काम दौड़-दौड़कर कर दिया करता था। फिर पास बैठकर कहता, “दादा जी, कहानी सुनाइए, कोई नई कहानी!”

अब मुझे ज्यादा कहानियाँ तो याद नहीं थीं। वह गुलामी का समय था। मन अंदर ही अंदर कचोटता था। तो मैं उसे सुनाया करता था कहानियाँ। ज्यादातर गाँधी बाबा की, तिलक महाराज की, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के जीवन की कहानियाँ। या फिर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानी। आजादी के लिए कितनी कुर्बानियाँ दी हैं लोगों ने। वही सब कहानियों की शक्ल में सुनाया करता था। और बड़े ही ध्यान से सुनता था हरींद्र। छोटा सा था, पर बड़ा समझदार। बोलता तो कम ही था। पर उसकी आँखें...! खूब बड़ी-बड़ी सी उसकी भावुक आँखें ही ज्यादा बोलती थीं, शायद सुनती भी थीं। मैं उसे देश के महापुरुषों के बारे में बताता तो उसकी आँखें बराबर मुझ पर टिकी रहतीं, जैसे एक-एक शब्द पी रही हों...

“पर बाबा, इतने बहादुर लोग हुए अपने यहाँ, फिर भी हमें आजादी नहीं मिली?” एक दिन उसने बड़े दुख से भरकर पूछा।

“इसलिए कि अब तक हममें उसके लिए तड़प नहीं है। जिस दिन सारा देश एक हो जाएगा, तो अंग्रेज पल भर भी यहाँ टिक नहीं पाएँगे।” मैंने उसे समझाया।

हरींद्र पसोपेश में पड़ गया, “पता नहीं दादा जी, यह कब होगा, कैसे होगा...?” फिर एकाएक बोल उठा, “अगर बच्चे मिलकर करें तो कुछ हो सकता है?”

“हाँ बेटे, क्यों नहीं? जरूर हो सकता है!” मैंने कहा तो हरींद्र के चेहरे पर तसल्ली नजर आई। क्या पता, वह क्या सोच रहा था।

उसी समय शहर में गाँधी जी की स्वदेशी की भावना को लेकर एक पाठशाला खुली। उसमें बहुतों का योगदान था, कुछ मेरा भी। नाम रखा गया, ‘स्वदेशी पाठशाला’। हरींद्र को मैंने उसमें पढ़ने डाल दिया। हरींद्र खुश था और रोज स्कूल की कोई न कोई नई बात बताता था। स्कूल में कई बड़े अच्छे अध्यापक थे जो उसे अपने विषय के अलावा देश के बारे में बहुत सी बातें बताते थे। हरींद्र को अच्छा लगता।

उन्हीं दिनों शहर में तकली बाबा आए। उनकी कहानी भी बड़ी अजब है। कहते हैं, वे बड़े उद्योगपति थे। पूना में कपड़े की बड़ी मिल थी। पर उन्हें सब बेकार लगा। उन्होंने सोचा, “भला मुझे कितना धन चाहिए? करूँगा क्या इतने पैसे का?” बहुत दिनों तक सोचा उन्होंने। फिर वह कारखाना मजदूरों को ही सौंप दिया और खुद गाँधी जी के चरणों में आ बैठे। बोले, “मैं सब कुछ छोड़ आया हूँ बापू। अब आप मुझे काम बताइए।”

गाँधी ने कहा, “मुझे तो बस एक ही बात कहनी है, स्वावलंबी बनो। खुद काम करने की आदत डालो।...और हाँ, कल ही सुरजापुर चले जाओ। वहाँ कुछ लोगों ने स्वदेशी विद्यालय खोला है। कभी-कभी वहाँ जाकर बच्चों को थोड़ा देश और आजादी की लड़ाई के बारे में बताओ। बड़ों को भी। धीरे-धीरे वहाँ लोगों में थोड़ी चेतना आएगी।...”

बस, तकली बाबा को दिशा मिल गई। सुरजापुर आए और यहीं उन्हें यह नाम ‘तकली बाबा’ मिला। असली नाम तो शायद बालकृष्ण बजाज था, पर वह तो किसी को याद नहीं। बस, वे तकली बाबा हो गए।...जगह-जगह जाते, लोगों को इकट्ठा करके बोलते, भाषण देते। पर हाथ में तकली रहती। थोड़ा भी खाली समय मिलता तो तकली चलाने लगते। काफी सारा सूत तैयार हो जाता तो किसी गरीब परिवार को दे देते। कभी किसी कार्यकर्ता को शाबाशी देनी होती तो अपने हाथ से बना सूत भेंट करते। कहते, “अब तो मेरे पास देने को बस यही है।” सुनने वाले कहते, “ऐसा क्यों कहते हैं? यह तो अनमोल उपहार है तकली बाबा!”

हर रोज वे किसी स्कूल में जाते और बच्चों से बातें करते। स्वदेशी स्कूल में तो रोज उनकी कक्षा लगती थी। बातों-बातों में बच्चों को देश की समाज की बातें बताते। कहते, “देखो, हमारा देश दुनिया के सबसे संपन्न देशों में से था। फिर आज हमारी यह हालत कैसे हो गई?” और फिर पूरी कहानी सुनाते। स्कूल के सारे बच्चे उन पर जान छिड़कते। छुट्टी वाले दिन उनकी कुटिया में जाते। कभी-कभी उनके साथ सभाओं में भी जाते। तकली बाबा के कहने पर बच्चों ने अपने घर में सत्याग्रह शुरू कर दिया कि सब लोग खद्दर पहनेंगे। और वाकई उनकी जीत हुई।...यों होते-होते सुरजापुर का माहौल बदलने लगा।

फिर आया सन् 1942 का अगस्त महीना। हवा में एक अलग गंध थी। जोश था। दीवानगी का आलम। हर चीज कुछ बदली-बदली सी लग रही थी। जनता आजादी के लिए बेकरार थी। लगता था, कुछ होगा, कुछ होकर रहेगा।...

गाँधी जी ने जब ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो!’ का नारा दिया तो शहर में भी जोश की आँधी उठने लगी। पर अभी तक वह लोगों के दिलों में थी। फिर कुछ ऐसा हुआ कि सारा मंजर ही बदल गया...!

असल में तकली बाबा ने तय किया था कि 9 अगस्त को सुरजापुर की तहसील पर तिरंगा फहराया जाएगा। कुछ भरोसेमंद कांग्रेस कार्यकर्ताओं को साथ लेकर वे उसकी योजना बनाने लगे। योजना को काफी गुप्त रखा गया था। फिर भी शायद अंग्रेज सरकार को कुछ भनक लग गई।

उस समय तहसीलदार एक अंग्रेज था। मि. हेरी रॉबस्टन। खासा जालिम। उसने सुना तो आगबबूला हो गया।

तकली बाबा शांत थे। एकदम चुप, गंभीर। लेकिन सब लोग जानते थे कि वे एक बार जो तय कर लेते हैं, वह टल नहीं सकता, चाहे कुछ हो जाए। कुछ भरोसेमंद कार्यकर्ताओं को उन्होंने साथ लिया था। पर उनका सबसे ज्यादा भरोसा था अपनी बालमंडली पर। उन्होंने एक दिन स्वदेशी स्कूल के अपने शिष्यों को बुलाकर कहा कि “देखो, 9 अगस्त को तहसील पर हमें अपना प्यारा तिरंगा झंडा फहराना है। हो सकता है कि झंडा फहराते समय मेरी जान चली जाए...पर तुम्हें वचन देना होगा कि उस दिन तिरंगा जरूर फहराया जाएगा। मैं नहीं तो तुम फहराना, ताकि वह हवा में लहर-लहर लहराए और लोग देखें। इससे लोगों के मन में भी जोश उमड़ेगा, डर खत्म होगा।...चाहे कुछ हो जाए, हमें यह करके दिखाना ही है। यह हिम्मतवालों का काम है, डरने वालों का नहीं। बताओ तो, तुममें से कौन-कौन ऐसे हिम्मती हैं जो किसी चीज से नहीं डरते?”

“हम...हम...हम...हम...हम!” पाँच आवाजें एक साथ सुनाई दीं। उनमें हरींद्र का स्वर सबसे तेज था। उसके चेहरे पर चमक थी। आँखों में आत्मविश्वास। बिना कहे ही उसकी आँखें कह रही थीं, ‘हाँ, यह मैं कर सकता हूँ। करूँगा, जरूर करूँगा।’ साथ ही राघव, बलवंत, सुखविंदर और आसिफ। ये पाँचों बच्चे पढ़ाई में भी अच्छे थे, खेल में भी। और जो काम उन्हें सौंपा जाता, वह जरूर पूरा होता था। उनमें दोस्ती भी ऐसी थी कि लोग देखते और हैरान होते थे।...

’गौरी बाबू कुछ थक से गए थे। थोड़ी देर साँस लेने के लिए रुके। बोलते-बोलते शायद आँखें भर आई थीं। उन्होंने पास में रखा रूमाल उठाया। आँखें पोंछीं। कुछ देर एकदम चुपचाप शून्य में आँखें गड़ाए कुछ देखते रहे। फिर हिम्मत की। कहानी का छूटा हुआ सुर फिर से पकड़ लिया...

आखिर वह दिन भी आया, जब तिरंगा फहराया जाना था। उस दिन तहसील पर पुलिस कुछ ज्यादा सतर्क थी। पर तकली बाबा वेश बदलकर पहुँच गए। जोगिया कुरता-

धोती। काली दाढ़ी, लंबे बाल। इस वेश में भला उन्हें कौन पहचानता? उनके साथ हरींद्र और बलवंत थे, जो उनका हाथ पकड़कर चल रहे थे। बाद में एक-एक करके आसिफ, राघव और सुखविंदर भी आ गए। अब इंतजार हो रहा था, सही समय का, जब अपनी योजना को पूरा किया जाए। और वह भी जल्दी ही आ गया। 

अंग्रेज तहसीलदार आया तो कुछ भगदड़ सी मची। पुलिस वालों ने दौड़कर उसे सैल्यूट किया। हेरी रॉबस्टन को तरह-तरह की बातें सुनने को मिल रही थीं। इसलिए वह चैकन्ना था। उसने सभी पुलिस वालों को अपने कमरे में बुलाया, ताकि जरूरी निर्देश दे सके।

यह शानदार मौका था। तकली बाबा भला कैसे चूक सकते थे? उन्होंने इशारा किया। एक साथ कोई दर्जन भर लोग अपनी तेजी से अपनी-अपनी जगह उठे और उस ऊँचे चबूतरे के पास आकर खड़े हो गए, जहाँ यूनियन जैक फहरा रहा था। तकली बाबा और उनके साथी पलक झपकते उस चबूतरे के ऊपर चढ़ गए। पाँचों बच्चे भी।...तकली बाबा ने साथियों के कंधों पर खड़े होकर बड़ी फुर्ती से यूनियन जैक उतारा। वे वहाँ तिरंगा फहराना ही चाहते थे कि किसी पुलिस वाले की निगाह पड़ गई। उसने वहीं से गोलियाँ चलानी शुरू कीं तो तकली बाबा खड़े न रह सके। तड़पकर नीचे गिरे। अफरातफरी मच गई। “मारो, पकड़ो...! पकड़ो...पकड़ो...! गोली...पुलिस...!” की आवाजें गूँजने लगीं। चारों तरफ हड़कंप।...

तकली बाबा की हालत खराब थी। गोली छाती में लगी थी, शरीर खूनमखून। कपड़े भी खून से लाल। असह्य वेदना थी, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जोर से नारा लगाया, “भारत माता की जय, गाँधी बाबा की जय...!!” 

“जय-जय...! भारत माता की जय...!” चारों तरफ से आवाजें सुनाई पड़ रही थीं। जनता भी जोश में थी। आसपास के बहुत से युवक वहाँ आकर खड़े हो गए और जोर से भारत माता का जय-जयकार करने लगे। पुलिस अब कैसे गोली चलाए, किस-किस पर चलाए?

तकली बाबा के साथियों का जोश और बढ़ गया। वे तकली बाबा की परिचर्या करना चाहते थे, पर घायल पड़े बाबा उसी हालत में निर्देश दे रहे थे, “जिस काम के लिए हम यहाँ आए हैं, उसे भूलो मत। मुझे छोड़ो, अपना लक्ष्य पूरा करो।...”

पुलिस की गोलियों और हवाई फायर के बीच भी किसी ने हिम्मत नहीं हारी। यूनियन जैक के चारों ओर घेरा और मजबूत हो गया। उसमें बहुत से जनता के लोग भी थे। तकली बाबा के गिरते ही हरींद्र को अपना कर्तव्य समझ में आ गया। वह झट बिजली की सी फुरती से तिरंगा फहराने के लिए आगे आ गया। उसके आसपास और बच्चे भी थे, जिन्होंने हरींद्र के चारों ओर घेरा बनाया हुआ था। सबने पलक झपकते हरींद्र को ऊँचा उठाया और जहाँ पहले यूनियन जैक था, वहाँ अब शान से तिरंगा झंडा लहरा रहा था। हरींद्र ने नारा लगाया, “भारत माता की जय...!” और देर तक जय-जय की आवाजें आती रहीं।

पर अफसोस, तभी एक गोली उसके सीने में लगी और वह कटे हुए परिंदे की तरह नीचे आ गिरा। फिर भी वह जोर-जोर से नारे लगा रहा था, “भारत माता की जय...भारत माता की जय...!” हरींद्र के दोस्तों ने उसे चारों और से घेरा हुआ था। देखते ही देखते और लोग भी घेरा बनाकर खड़े हो गए।

जो लोग तहसील में अपने कामों से आए थे, वे काम-धाम भूलकर इस ऐतिहासिक दृश्य के साक्षी बन गए थे। तिरंगे के आसपास लोगों का बेशुमार भीड़ थी। अब भी बीच-बीच में गोलियाँ चलतीं, पर लग रहा था किसी को गोलियों की परवाह नहीं है। इस बीच लोग हरींद्र और तकली बाबा के लिए पानी लेने भागे। कुछ लोगों ने झट अपने कपड़े फाड़े, तकली बाबा और हरींद्र को पट्टियाँ बाँधने लगे।... 

अजब दृश्य था। तहसील का पूरा अहाता भारत माता के जय-जयकार के नारों से गूँज रहा था। गोलियाँ चलतीं तो लोग जमीन पर लेट जाते, फिर खड़े होकर नारे लगाने लगते।

अंग्रेज तहसीलदार हेरी रॉबस्टन चैंका। यह हो क्या रहा है...?

वह गुस्से में फनफनाता हुआ बाहर आया, पर तब तक तकली बाबा के बहादुर शिष्य तिरंगा फहरा चुके थे।...तकली बाबा बुरी तरह घायल थे, हरींद्र भी। कुछ और लोगों को भी गोली लगी थी। भगदड़ में हरींद्र के साथी बच्चों को भी चोट आई। पर किसी को अपनी परवाह न थी। सब एक ही बात सोच रहे थे, जो तिरंगा फहराया गया है, उस पर कोई आँच न आए। पुलिस वाले लगातार ‘भागो, वरना गोली मार देंगे!’ की धमकी दे रहे थे। पर लोग डटे हुए थे। कोई अपनी जगह से हिला नहीं था। यहाँ तक कि हरींद्र के साथी बच्चे भी बेखौफ होकर उसके इर्द-गिर्द बैठे थे। 

इस पर अंग्रेज तहसीलदार हेरी रॉबस्टन को गुस्सा आ गया। उसने तिरंगे को देखा तो चीखते हुए बोला, “उतारो, उतारो इसे अब्बी...! आई से...!”

तकली बाबा वेश बदलकर आए थे, पर अब तक लोगों ने उन्हें पहचान लिया था। अंग्रेज तहसीलदार को भी पता चल गया था। वह चिल्ला रहा था, “पकड़ो टैकली बाबा को, अम सबको जेल भेजेगा...! कोई भागने न पाए...!”

पर भाग कौन रहा था...? लोग तो अपनी जान देने के लिए खुद-ब-खुद आगे आ गए थे। सबके चेहरे पर निर्भयता। जो बात तकली बाबा और उनके साथियों ने भी नहीं सोची थी, वह यहाँ देखने को मिल रही थी। जनता इस तरह जोश में घेरा बनाकर खड़ी थी, जैसे सब के सब आजादी के सिपाही हों।

तब तक साठ-सत्तर पुलिस वाले वहाँ पहुँच गए थे। सबके सब हथियारों से लैस। उन्होंने आगे बढ़कर तिरंगे को उतारने की कोशिश की, तो घायल तकली बाबा धीरे से बुदबुदाए, “तिरंगा मत उतरने देना...!” 

बस, बच्चे अपनी जगह अड़ गए, “नहीं, तिरंगा नहीं उतरेगा,...! नहीं उतरेगा...!!” साथ में और लोग भी।

बच्चों को बड़ी-बड़ी मूँछों वाले पुलिस सार्जेंट ने 

धमकाया, “देखो, बच्चा लोग हट जाओ, वरना गोली....!”


पर उसकी बात का कोई असर नहीं हुआ। तब अंग्रेज तहसीलदार धम-धम करता हुआ आगे आया। उसने उबलकर कहा, “जे झंडा किसने टाँगा...? जरूर टैकली बाबा, टुमने...? हमको पता, टुमने इस शहर की हवा खराब की है। लड़कों को बिगाड़ रहे हो। तुम्हें इसकी सजा...!” कहकर घायल पड़े तकली बाबा को उसने जोर से पैर की ठोकर मारी और सिपाहियों से कहा, “गिरफ्तार कर लो सबको।...जल्दी!”

पर तकली बाबा को ठोकर मारते हुए वहाँ जिन-जिन लोगों ने देखा, सबकी आँखों में खून उतर आया। इसकी इतनी हिम्मत...? और देखते ही देखते वहाँ जनता का सैलाब इकट्ठा हो गया। सड़क पर चलते लोग भी वहाँ आकर इकट्ठे होते जा रहे थे। सब जोश की लहर पर सवार। ऐसे गगन भेदी नारे लग रहे थे कि तहसील की दीवारों से भी गूँजने लगा था, “जय-जय, भारत माता की जय...गाँधी बाबा की जय!”

कुछ नौजवान छाती निकालकर अंग्रेज तहसीलदार के आगे आकर खड़े हो गए, “हमें मारो...! मारो गोली, मारो ठोकर....!!”

लोगों की आँखों में खौलते क्रोध की लपटें देखीं तो एकबारगी तो अंग्रेज तहसीलदार भी सहम गया। चुपके से कमरे के अंदर जाकर छिप गया। वहीं से उसने कलेक्टर को फोन किया, “सर, हालात ठीक नहीं हैं। आप और पुलिस फोर्स भेजिए!...जल्दी!”

कुछ ही देर में लारियों से धमाधम कूदते पुलिस वाले। बड़ी संख्या में और पुलिस दल आ गया। तहसील पुलिस छावनी में बदल गई थी। 

पुलिस ने तकली बाबा और हरींद्र दोनों को ही सरकारी अस्पताल में दाखिल करवाया। दोनों की हालत नाजुक। इलाज चल रहा था। कुछ और लोग भी गोलियों से घायल हुए थे। दो बच्चे राघव और आसिफ भी। वे भी अस्पताल में भरती थे।

अस्पताल के बाहर स्वदेशी स्कूल के बच्चे इकट्ठे थे। 

धीरे-धीरे शहर के सारे स्कूलों के बच्चे वहाँ इकट्ठे होते गए। सबके चेहरे गमगीन।

“तकली बाबा को ठोकर मारी तहसीलदार ने..! उन्हें गोली लगी, हरींद्र को भी...!” हवा में बस ये दो ही बातें गूँज रही थीं।

गौरी बाबू फिर थोड़ी देर साँस लेने के लिए रुके। चेहरा आरक्त। जैसे अंदर जोश की आँधी उठ रही हो, और उन्हें चैन न लेने दे रही हो। जल्दी वे फिर सुर में आ गए...

हाँ, तो...परमेश्वरी बाबू, शाम के समय वहाँ इतने बच्चे इकट्ठे हो गए थे कि पुलिस को जबरन उन्हें हटाना पड़ा। पर कोई घर नहीं जाना चाहता था। देखते ही देखते बच्चों का बड़ा सा जुलूस बन गया और वह शहर की ओर चल पड़ा। अब शहर की सड़कों पर नारा गूँज रहा था, “भारत माता की जय, गाँधी बाबा की जय...!”

बच्चों का यह जुलूस अभूतपूर्व था। देखते ही देखते पूरा शहर इसमें शामिल हो गया। किसकी हिम्मत थी जो इस जुलूस को रोक पाए?

उस दिन अंग्रेज तहसीलदार हेरी रॉबस्टन पुलिस के साए में छिपकर और डरा-डरा सा अपने घर गया। पूरे शहर में पुलिस की सीटियों की आवाज गूँज रही थी। पर लोग निडर थे, बेखौफ। 

उसी रात को हरींद्र ने और अगली सुबह को तकली बाबा ने दम तोड़ दिया। दोनों की एक साथ बड़े सम्मान से अंत्येष्टि हुई। अपने बलिदान से उन्होंने पूरे सुरजापुर को झिंझोड़कर जगा दिया।

अगले दिन तकली बाबा की कुटिया पर जाने वालों की अपार भीड़ थी। हमारे घर भी लोग टूटे पड़ रहे थे। उन पर लगातार पुलिस और सरकारी जासूसों की निगाह रहती थी। पर सुबह-शाम शहर में दोनों ही जगहों पर मेला लगा रहता।

गाँधी जी जेल में थे, पर उनके पास भी समाचार पहुँच गया था। जेल से छूटकर वे सुरजापुर आए तो लोग उन्हें सुनने के लिए उमड़ पड़े। गहरे दुख के साथ उन्होंने कहा, “मेरे प्यारे भाइयो, तकली बाबा का दुख तो मेरे अंदर, बहुत अंदर है। लगता है कि उसे सह भी लूँगा। पर हरींद्र...! वह तो छोटा बच्चा ही था। उसने अभी दुनिया देखी ही क्या थी? उसके दादा गौरीशंकर जी के घर मैं गया हूँ। वे सच्चे देशभक्त हैं। पर मैं क्या कहकर उनके दिल को समझाऊँ? मैं बिल्कुल नहीं जानता। सच पूछिए तो मेरा दिल करता है, मैं आप सबके सामने एक बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो पड़ूँ, तब भी शायद यह दुख हलका नहीं होगा...!”

कुछ देर रुककर बोले, “तकली बाबा लगातार मुझे चिट्ठियाँ लिखते थे कि बापू, इस शहर में बच्चे ऐसे वीर बहादुर हैं कि बड़ों को भी मात दें। पाँच बहादुर बच्चों की टोली है और उनका नायक है हरींद्र। उसके जोश का तो कहना ही क्या!...आज सारी दुनिया ने देख लिया कि वह सच्चा वीर था, सच्चा शहीद।...इसका सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि इस छोटे से शहर सुरजापुर में भी सभा में कोई दस हजार लोग इकट्ठे हो गए। इसका मतलब यह है कि अब लोगों को कोई डर नहीं। डरे तो वह अंग्रेज अफसर जो हमेशा पुलिस के साए में छिपकर आता-जाता है। आजादी के सिपाही को कैसा डर...?”

पूरे शहर की आँखें नम थीं। कुछ लोग तो फफककर रो रहे थे।

बापू की सभा समाप्त होने को थी। तभी चमत्कार...! एकाएक तेजी से चलता हुआ एक शख्स आया और उनके चरणों में जा गिरा। बापू कुछ समझ पाएँ, इससे पहले ही वह बोला:

“बापू, आप मुझे मारिए, मैं अपराधी हूँ। आज आप से और सब लोगों से माफी माँगने आया हूँ।...मेरी ही बंदूक से वो गोलियाँ चली थीं, जिनसे तकली बाबा और हरींद्र की जानें गईं। तब मैं सरकारी आदेश से बँधा था। मजबूर था...पर तब से मैं एक रात भी ठीक से सो नहीं पाया। मेरी बीबी और बच्चों ने मुझसे बोलना छोड़ दिया।...बापू, आज मैं उस सरकारी नौकरी पर लात मार आया हूँ। छोड़ दी नौकरी। मेरी आत्मा अब शांत है।...अब जितना भी जीवन है, आपके आदेश पर देश के लिए काम करूँगा। तभी मेरे पाप का प्रायश्चित होगा। आप मुझे आशीर्वाद दीजिए बापू, अपने कर्तव्य से कभी डिगूँ नहीं।...”

सुनाते हुए गौरी दा कुछ देर के लिए रुके। जैसे अपने दुख पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हों।

फिर धीरे से बोले, “अब न वह जज्बा है और न वह बात...! तकली बाबा, हरींद्र...शहादत! किसी को याद भी नहीं। जहाँ तकली बाबा की कुटिया थी, वहाँ अब ऊँची बिल्डिंग खड़ी हो गई है एक विधायक की। देश आजाद हुआ तो इस घर में बड़े-बड़े नेता आते थे। एक बार तो राजेंद्र बाबू भी आए। बोले, यह आजादी का पवित्र मंदिर है, जहाँ आकर सिर झुकाने का मन होता है! पर बाद में भुला दिया सबने। किसी को क्या फर्क पड़ता है?...खैर, आप आए तो यह सब याद आ गया, वरना तो...!”

फिर धीरे से उठे गौरी दा। डगमगाते कदमों से अलमारी तक गए। अंदर से एक फोटो निकाला, हँसता हुआ हरींद्र...! फिर एक और फोटो। उसमें पाँचों दोस्त तकली बाबा के साथ खड़े थे। तकली बाबा खद्दर के कुरते-पाजामे में, सिर पर खद्दर की टोपी थी। बच्चे गोल-मटोल। खुशदिल। मुसकराते हुए।

गौरी दा काँपती सी आवाज में कह रहे थे, “बस, एक यही निशानी अब बची है मेरे पास...! कभी-कभी सीने से लगा लेता हूँ तो बड़ी ठंडक पड़ती है।...”

परमेश्वरी बाबू की आँखें नम थीं। देवकांत घोषाल भी जैसे कानों से सुन रहे थे, और आँखों से वह सारा कुछ देख रहे थे, जो अभी-अभी गौरी दा ने बताया।

दोनों चुप। एक-दूसरे की ओर देखा, फिर कमरे की दीवारों पर नजर गड़ा दी। भूल गए थे, क्या कहना है क्या नहीं?

कमरे की एक दीवार पर सफेद कागज की शीट। उस पर टेढ़ी-मेढ़ी सतरों में लिखी कविता की पंक्तियाँ दिखाई पड़ीं, ‘उठो साथियो, बढ़ो साथियो... मातृभू गुहारती...स्वतंत्रता पुकारती...!’ परमेश्वरी को उस ओर ताकते देख, गौरी दा बोले, “यह कविता हरींद्र को प्रिय थी। अकसर गाया करता था। मैंने ये दो लाइनें लिखकर दीवार पर टाँग दीं, ताकि याद आती रहें...!”

“परमेश्वरी बाबू देश के शहीदों पर किताब लिख रहे हैं। इसमें यह पूरी दास्तान आएगी, जो आपने सुनाई...!” कहना चाहते थे देवकांत घोषाल, पर लगा व्यर्थ है।

उन्होंने फिर गौरी बाबू की ओर देखा। पर वे तो जैसे अपनी दास्तान सुनाकर स्मृतियों में कहीं और ही पहुँच गए थे।

परमेश्वरी बाबू और देवकांत उठे। दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया, तो बूढ़े गौरी दा के भी हाथ जुड़ गए। बोले, “आप लोग आए, अच्छा लगा। वरना तो आज किसको पड़ी है...!”

परमेश्वरी बाबू और देवकांत वहाँ से लौटे, तो जैसे पैर चल ही नहीं पा रहे थे। दोनों चुप, एकदम चुप। न परमेश्वरी कुछ बोल पा रहे थे, न देवकांत घोषाल। दोनों के दिल भरे हुए थे।

***********************************************************************************कहानी

श्री सदाशिव कौतुक,  सुदामा नगर, इन्दौर, मो. 98930-34149

एक हकीकत

‘‘तो सुन गौरव -कल-कल बहती नदी की तरह उसकी हँसी थी, नदी के बहाव जैसी ही उसकी चलने की अदा थी। उसकी चाल में बिना धुंघरू के ध्वनि थी, ताल थी, रिदम था। उसका चेहरा इतना चिकना था कि उस पर से नजर फिसल जाती थी। कच्चे -पक्के मकानों वाले गाँव में वह परी की तरह विचरण करती थी। जिस मकान में परिवार के साथ वह रहती थी, वह साधारण किसान का परिवार था। साधारण घर का सामान और छोटा सा आंगन था। पारिवारिक हालत को देखकर लगता था कि कभी घर को ताला लगाने की जरूरत नहीं पड़ी होगी। दुनिया की तमाम झंझटों से दूर चिमनी के उजाल में रात बीत जाती थी। खेती से आई उपज ही गृहस्थी की गाड़ी चलाती थी। तनाव रहित सरल जीवन था और सरल व्यवहार भी। तीज-त्यौहार पर ही कभी कुछ ठीक खाने का सुख मिलता होगा। गाँव की संस्कृति और लोकलाज से बँधा हुआ परिवार था।

उसके मकान से आठ-दस मकानों की दूरी पर मैं पंद्रह दिनों तक अपनी मौसी के यहाँ रहा। रोज ही उसकी एक दो झलक देखने को मिल जाती थी। उसने मुझे शायद ही दो-तीन बार देखा होगा। बड़ी सभ्यता में उसका आना-जाना रहता था। मैं रोज उसे मन भर कर देखने की कोशिश करता था पर सफल नहीं हो पाता था। मैं आँखों की प्यास बुझाने में असफल ही रहता था। गाँवों में लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ाया जाता इसलिये वह 8 वीं या 9 वीं तक ही पढ़ी थी ताकि चिट्ठी-पत्री और कोई धार्मिक किताब पढ़ सके। वह परिवार मेरी ही जाति का था। जैसे अधिकतर एक ही जाति के परिवार एक ही मोहल्ले में रहते है वैसे ही मेरी मौसी का मकान भी उसी मोहल्ले में था। सब आपस में काम से काम ही रखते थे। कभी-कभार मोहल्ले में जिसके घर पर टेलीविजन होता उसके घर कुछ बच्चे देखने आ जाते थे। यह संयोग ही था कि मेरी मौसी के यहाँ एक छोटा सा टीवी था जो एक कोने में छोटी टेबल पर रखा रहता था। मैं उसे सच्चे मन से चाहने लगा था, शायद मेरी आत्मा की आवाज पहुँची हो। एक दिन वह कुछ बच्चों के साथ मौसी के यहाँ टीवी देखने आ गई। मैं भी कमरे में ही बैठा हुआ था। मौसी ने उसे प्यार से बैठाया, वह भी हाँ करते हुए एक कोने में टीवी देखने बैठ गई। उसकी आँखें टीवी के अलावा कुछ नहीं देख रही थी और मैं था जो उस लड़की के अलावा कुछ नहीं देख रहा था। ऐसा लग रहा था कि उस पर सोलहवें साल का कोई असर नहीं हुआ। जैसा कि कहा जाता है कि लड़कियों की सोलह साल की उम्र का सोपान भटकाव का होता है पर वह तो अपनी उम्र से ही बेखबर थी। उसे देखकर मेरी मौसी को कुछ ऐसा लग रहा था कि मैं उस लड़की से आकर्षित हो रहा हूँ। वह मेरी मंशा भाँप चुकी थी।

इतना सुनते ही उसकी कोठडी का साथी गौरव उत्सुकता वश बोल पड़ा - ‘‘फिर क्या हुआ यार पूरब बता जल्दी बता, बड़ा मजा आ रहा है। तेरी कहानी सुनकर मुझे मजा आ रहा है, बड़ी दिलचस्प किस्सा है तेरे प्यार का।‘‘

‘‘किस्सा कहानी नहीं यह हकीकत है जिसे मैं सही-सही तेरे सामने रख रहा हूँ।‘‘ ‘‘चल बता यार फिर क्या हुआ।‘‘

‘‘फिर क्या ? एक दिन मौसी ने मुझसे सच उगलवा ही लिया। यों भी महिलाएँ ऐसे मामले को भांपने में बड़ी चतुर होती हैं।

मौसी ने मुझे अपने पास बुलाया, उसने आँखों में आँखें डालकर मुझसे पूछा दृ तेरे से एक बात पूँछु ।”

मैंने कहा- ‘‘हाँ मौसी बोलो। क्या मैं आपके घर पर अधिक दिन रूक गया, इसलिये तो नहीं ? मैंने खुद बुजुर्गों के अनुभव की बातें सुनी है वे कहते हैं- पहले दिन 

पावणा, दूसरे दिन पाई और तीसरे दिन अकल मारी गई।‘‘।

इतना कहकर मैं हँसने लगा। मौसी ने भी ठहाके लगाये और हँसी को रोककर बोली -‘‘बेटा। मैं जो बात कह रही हूँ वह तेरे लिये बहुत खुशी की बात है। अरे पागल मैं तो तुझे इस गाँव का जवाई बनाना चाहती हूँ। मैं सब समझती हूँ, मैंने बाल धूप में सफेद नहीं किये हैं। मैं उड़ते पंछी के पर गिन लेती हूँ तो तू किस खेत की मूली है। मौसी ने बड़ी चतुराई से एक प्रस्ताव मेरे सामने रख दिया। मुझे लगा कि मौसी सहज रूप से उसके मन की बात कह रही है पर वह मेरी नजरों को भाँप गई थी इसलिये वह मेरे मन की बात अपने मन से कह रही थी। अंधे को क्या चाहिये थी दो आँखे और वह मिल गई।

‘‘वाह यार बड़ा मजेदार दिलचस्प किस्सा है। बता यार बता फिर क्या हुआ।‘‘ बीच में गौरव ने टोक कर पूरब से पूछा।

‘‘अरे भाई । अब तुझे क्या बताऊँ। मुझे तो लगा मेरी मौसी ने मेरे लिये आसमाँ से चाँद को उतार दिया। मैंने शरमाते हुए मौसी से उस लड़की का नाम पूछा तो मौसी ने बताया उसका नाम पूर्वा है और तू पूरब । मेरी आँखे तो फटी की फटी रह गई। जैसे उपर वाले ने मुझे छप्पर फाड़ के दे दिया हो। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बोलूँ तो क्या बोलूँ, खुशी के मारे पागल हो जाने के कारण मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था।‘‘

फिर मौसी बोली- ‘शायद तू यही बोलेगा कि पूर्वा के माता-पिता क्या मान जाएँगे? अरे बेटा तेरी इस गरीब मौसी ने रिश्तेदारी में कई सम्बन्ध करवाये हैं। इसी कारण तो जात समाज में मेरी सबसे ज्यादा पूछ-परख होती है, कोई तो अच्छा इनाम भी देता है। तेरी यह मौसी तो भई ऐसा ही पुण्य कमाती है। जोड़ा तो भगवान तय करता है मैं तो थोड़ा सा टेका लगा देती हूँ और बात बन जाती है। किसी के घर बसने से अच्छी बात और क्या हो सकती है। बेटा, मेरा गरीब संसार है, मैं दान देकर पुण्य नहीं कमा सकती पर ऐसा काम करके लोगों की दुआ ले लेती हूँ। मैंने लड़की के माँ-बाप को तेरे बारे में सब बता दिया है। पढ़ा-लिखा है कोई अच्छी नौकरी मिल गई तो पूर्वा राज करेगी और अपनी बहन-जीजा की भी तारीफ कर दी। बस फिर क्या था, प्यासा तो पानी के कुँए पर जाता है पर यहाँ तो प्यासे के द्वार कुआँ आया था।‘‘

फिर बीच में बात काटते हुए मैंने कहा - ‘‘पर मौसी............

‘‘अरे पर वर क्या ? यही न कि लड़की की क्या राय है, इतना तो मैं भी समझती हूँ। तो सुन तुझे पूर्वा ने उस दिन ठीक से देख लिया था, जिस दिन वह मेरे घर टीवी देखने आई थी। तू भी कम नहीं था तू भी तो उसको 

घूर-घुर कर देख रहा था। पूरब तूने तो मुझे उस परिवार की समधन बना कर गाँव में मेरे भाव बढ़ा दिये। मौसी ने मेरे सर पर हाथ रखा और गालों पर प्यार से तमाचा लगाते हुए कहा -‘‘पूर्वा लड़की नहीं नगीना है नगीना, राजकुमारी से कम नहीं, कई रिश्ते आ रहे थे पर सबको रद्द करवा के तेरा काम बना दिया है। मेरी बहन-जीजा भी मुझे याद करेंगे। पूर्वा की कोमल-सुन्दर-गौरी हथेलियों से बनी रोटी जब खाएँगे तो मुझे बहुत दुआ देंगे। देख लेना भला।‘‘

‘‘पर मौसी मैं भी तो पूर्वा से बात कर लूँ, पूछ तो लूँ कि उसे मैं पसन्द हूँ या नहीं।‘ मौसी ने आँखे निकाल कर कहा-

‘‘गाँवों में ऐसी मूर्खता नहीं चलती। माँ-बाप ने कह दिया मतलब पत्थर की लकीर हो गई। लड़की से बात करके खेल बिगाड़ेगा क्या? गाँव वाले इसे अच्छा नहीं समझते समझा। अब ज्यादा अकल मत बघारे। तू जा। मैं बहन-जीजा से सब बात खुटा लूँगी। बेटा पूरब तू भी किसी राजकुमार से कम नहीं समझा, उन्होंने लड़की से पूछ कर ही निर्णय लिया होगा। लड़की ने हाँ भरी होगी तभी हाँ भरी है।‘‘

मैंने शर्म से सिर नीचे किया और चुप हो गया। मैं मन में लड्डू फोड़ते हुए अपने गाँव आ गया था।

‘‘फिर क्या हुआ ? शादी हो गई।‘‘ गौरव ने पूछा ‘‘करीब एक साल बाद मैं उसे ब्याह कर ले आया।‘‘ ‘‘शादी को अब कितने साल हो गये।‘‘ ‘‘यही कोई साढ़े चार साल।‘‘

तो फिर गाँव से शहर आने का निर्णय कैसे लिया?‘‘ पूरब ने फिर गाँव से शहर आने की दास्तान गौरव को सुनाई -

‘‘परिवार में माता-पिता, एक छोटा भाई एक छोटी बहन थी। थोड़ी सी खेती से गुजारा चलता था। मैं नौकरी के लिये बहुत भटका न नौकरी मिली न गाँव में काम था। पहले शहर में मैं आया एक-दो महीने में ऑटो चलाना सीख गया फिर पूर्वा को लेकर आया, किराये के दो कमरे लिये और किराये का ऑटो चलाने लगा। पूर्वा ने पढ़ने की इच्छा जताई तो उसे एक स्कूल में दाखिला करवा दिया। उसने दो वर्ष में ग्यारहवीं कक्षा पास कर ली। मैंने भी कर्ज करके ऑटो के लिये जो पैसा लिया था वह पटा दिया और ऑटो का मालिक बन गया। कुछ पैसा इकट्ठा हुआ, कुछ और कर्ज किया और दो कमरे का मकान खरीद लिया। पूर्वा को पड़ोसी के जरिये एक अस्पताल में नौकरी लगावा दी। अब हम दोनों साथ-साथ घर पर ताला जड़ के निकल जाते। मैं पूर्वा को अस्पताल छोड़कर सवारियों की तलाश में निकल पड़ता। अब कुछ पैसा घर भी भेजने लगा था। मेरी जिंदगी की रेल धीरे-धीरे पटरी पर आ रही थी। हम बहुत खुश रहने लगे थे। मैंने पूर्वा को मोबाईल भी दिला दिया था।

गौरव ने आश्चर्य से पूछा-‘‘तो फिर क्या हुआ ? तू जेल की सलाखों के पीछे कैसे आ गया?‘‘

‘‘क्या बताऊँ गौरव गाड़ी के दोनों पहिये साथ-साथ ठीक चलते हैं तो सब अच्छा चलता है, वरना जिंदगी नर्क में तब्दील हो जाती है। कभी ऐसा मोड़ आ जाता है कि जब सहन करने की सीमा खत्म हो जाती है तब मनुष्य को मरने या मारने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता।‘‘

‘‘तो ऐसी क्या बाधा खड़ी हो गई जिसे तू हटा नहीं पाया ?‘‘ ‘‘मैं तुझे बताऊँगा तो तू भी मेरा समर्थन ही करेगा। मैं तो आश्वस्त था कि सब ठीक चल रहा है परंतु करीब पाँच-छः महिने पूर्व की बात है वह घर पर देर से आने लगी। मैं उससे पूछता था तो वह बहाने बना देती और मैं चुप हो जाता। कभी-कभी तो वह दो-दो घंटे देर से आने लगी। मैं परेशान होने लगा, मेरी बेचैनी बढ़ने लगी, मुझे कुछ दाल में काला नजर आने लगा फिर भी चुप रहा। मुझे उस पर इतना विश्वास था और प्यार भी था कि उस पर शक नहीं कर सकता था। परंतु अन्दर ही अन्दर शक की सुई घूमती रहती थी। मेरा दम घुटने लगा था। किसी से बता भी नहीं सकता था। अब किसी किसी रात मुझे गहरी नींद आने लगी थी।

एक दिन शायद करीब सात बजे होंगे। मुझे एक सवारी को एक बड़े होटल पर छोड़ना था। जैसे ही मैं होटल के बाहर रूका तो मैंने पूर्वा को एक व्यक्ति के साथ बाहर निकलते हुए देखा। शायद वह मुझे देख नहीं पाई और उसे देखकर यात्री से तुरन्त पैसे लिये और घर आ गया। जब मैंने उससे पूछा कि दवाखाने से छुट्टी तो पाँच बजे हो जाती है, फिर घर आने में इतनी देर कैसे हो जाती है।

वह बोली- ‘‘कभी अस्पताल में इमरजेंसी केस आ जाता है, इसलिये बॉस रोक लेते हैं।‘‘

गौरव ने सचेत करते हुए कहा -‘तूने ठीक से हेरा-फेरी क्यों नहीं की, तू अपनी आशंका जाहिर तो करता ?‘‘

मैं तत्काल आवेश में इसलिये नहीं आया कि कभी-कभी हड़बड़ाहट में या खुमारी में समय से चल रही घड़ी पर भी शक हो जाता है जबकि वह बराबर समय बता रही होती है। मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था क्योंकि मैं उससे इतना प्यार जो करता था।

मैंने जहर का घूंट पी लिया क्योंकि मै उसे और सम्हलने का मौका देना चाहता था। या हो सकता है मुझे गलत फहमी हुई हो। मैं चैबीस घंटे पहरा तो नहीं लगा सकता था। अब उसका बर्ताव भी मेरे साथ ठीक नहीं होने लगा। बेवजह की बातें करके विवाद खड़ा करने लगी। वह चाहती थी कि मैं क्रोधित होकर उसे घर से बाहर निकाल दूं और उसे बहाना मिल जाए। इस तरह की बेरूखी के चलते अब मुझे सप्ताह में एक दो बार रात में इतनी 

बेसुधी की नींद आती थी कि मुझे सुबह देर से होश आता था। मैं परेशान हो जाता था। डॉक्टर को दिखाया तो सब कुछ ठीक निकला, पर स्थिति जस की तस रही।

एक रात मैं देर से आया। उसने दूध का गिलास रखा था, जिसे वह बार-बार पीने का आग्रह कर रही थी, दूध पर एक-दो बार मुझे शक हुआ। वह रसोई में गई तब मैने दूध पीछे की खिड़की से गली में डाल दिया और खाली गिलास नीचे रख दिया। मैं पलंग पर लेट गया और गहरी नींद का बहाना करने लगा। आधे घंटे बाद उसने मुझे देखा और मोबाइल लगाया। मैं देखता हूँ कि बीस मिनट बाद उसने दरवाजा खोला और उसका बॉस कम्पाउंडर अंदर आया फिर जो हुआ वह मेरी बर्दाश्त से बाहर था। मैं ऑटो चला कर घर-गृहस्थी चला रहा था और उसका ऑटो गैर मर्द चला रहा था। मैं धूप में जला, बारिश में भीगा, ठंड में ठिठुरा, नींद को नकारा, ईमानदारी से पैसा कमाया ताकि घर सुखी हो। मुझे क्या पता कि मैं इस छाँह में जल रहा था। जब लपटे निकलीं तो मैं बेकाबू हो गया। जब मैंने यह कुकृत्य देखा तो मेरे अंदर से कुछ वर्षों में हरा हुआ यह वृक्ष जड़ से उखड़ गया। वैसे गृहस्थी की गाड़ी विश्वास की डगर पर ही सफल हो सकती है और पति-पत्नी का विश्वास ही घर को स्वर्ग बना सकता है। उस बेवफा के द्वारा पूरा आइना दिखा देने के बाद कैसे विश्वास किया जा सकता था।‘‘

गौरव ने कहा - उसके माँ बाप को और मौसी को बुलाकर उसका तेरे साथ यह विश्वासघात बताता और उसके माँ बाप को सौंप देता। कम से कम उन्हें शर्मिंदा होने का अवसर तो दिया होता।‘‘

‘‘उसे घर से निकाल देता या घर से निकाल कर तलाक दे देता। उसके बाद दूसरी शादी कर लेता और फिर अपनी गृहस्थी जमा लेता। दुनिया बहुत बड़ी है तू इतनी छोटी मत समझ । जीना हो तो कई रास्ते खोजे जा सकते हैं। न तू हत्यारा कहलाता और न ही तुझे फांसी होती।‘‘

‘‘शादी ? उसके धोखे ने तो स्त्री जाति से मेरा विश्वास ही उठा दिया। मैं उसे इस विश्वासघात के बाद जिन्दा नहीं रहने देना चाहता था। उसे इस गद्दारी की सजा तो मैं अपने इन हाथों से ही देना चाहता था। मैं जैसे ही उठा दोनों ने मुझे देख लिया, मुझे देखकर वह कमीना तो काँपने लगा और पूर्वा ने मुझे उस पर हमला करने से रोकने की कोशिश की और उसे वहां से भगा दिया। मेरे हाथ में रसोई घर का चाकू आ गया। मैं अब ज्यादा सहन नहीं कर सकता था, मैंने पूर्वा के पेट में चार चाकू मारे और उसकी जिंदगी वहीं खत्म कर दी। पूरब की कहानी सुनने के बाद गौरव को बैरक में रात भर नींद नहीं आई थी। सुबह-सुबह झपकी लगी थी। सुबह चार बजे पूरब को नहला कर फाँसी घर में ले जाया गया था और फाँसी दे दी गई थी।

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अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की जन्मभूमि से सीमा शाहजी द्वारा रिपोर्ट

डाॅ. सीमा शाह जी, महात्मा गांधी मार्ग, थांदला (जिला झाबुआ म0प्र0), मो. 7987678511

‘‘झाबुआ जिले की माटी के वीर सपूत अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद’’


मैं डाॅ. सीमा शाहजी थांदला जिला झाबुआ से आपको यह पत्र व आलेख भेज रही हूँ मैंने 20 जूलाई 2019 को शहीद आजाद की जन्मभूमि भाभरा में जाकर जो भी वास्तविक जानकारियाँ हासिल की वह आपको प्रेषित कर रही हूँ। वहाँ दो महिलाओं श्रीमती रेहमत शेख और श्रीमती नूरजहाँ से मिली उन्होंने आजाद के विषय में जो बातें बताईं वो इस आलेख में लिखकर भेज रही हूँ। सौभाग्यशाली हूॅ कि मुझे अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद के बारे में जाननेे का अवसर प्राप्त हुआ।  डाॅ. सीमा शाह जी


23 जूलाई 1906 को देश गुलाम जरूर था पर आजादी के लिए छटपटा भी रहा था, तब वृक्ष से बंधे फटी साड़ी के किसी पलने में चन्द्रशेखर के रूप में एक पूत हाथ पांव फेंक रहा था। आज मैं उसी स्थान पर खड़ी हुई हूँ। आजाद स्मृति मंदिर में आजाद भारत की तीसरी पीढ़ी की संतान के रूप में। आजादी का व्यापक आसमान मेरी छत है। उम्मीदों ने पूरे संसार को अपने में समेट लिया है। लेकिन कहानी महज इतनी छोटी भी नहीं है, जैसा कि जन्मभूमि भाभरा में बुजुर्ग 84 वर्षीय नूरजहाँ आपा बयान कर रही है उनके अनुभवों की पोटली को जब मैंने खोलने का प्रयास किया तो बालक चन्द्रशेखर के विषय में कई अनछुई बातों का वर्णन लड़खड़ाती याद्दाश्त का हाथ पकड़कर जुबान कर रही है, लेकिन आंखे और पूरा शरीर मानो भावुकता के सावन में डूबा हुआ है। और मै उस पल को.... उस समय को महसूस कर रहीं हूँ, उतार रही हूँ - अपने भीतर, प्रणाम करते हुए उस माटी को जिसमें गुलगोथने बालक चन्द्रशेखर ने धूल-धूसरित होकर शरारते की होंगी, अपना बचपन जिया होगा। देश के लिए कुछ कर गुजरने की कसमें खाई होंगी सलाम है उन ममत्व भरी माँओं को जिनके अंतस से बालक आजाद के बचपन की बातें सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।   

कई बार वरिष्ठजनों से ‘‘आजाद’’ के बारें में बहुत कुछ सुना, जब-तब इस माटी के सपूत क्रान्तिकारी ‘‘आजाद’’ की बातें होती है जिला झाबुआ वासी गौरव से भर उठते है। मैं भी नमन करती हूँ स्वतंत्रता के इस महान गौरव को।

आज हम थांदला से भाभरा के लिए, मै, गायत्री भाभी एवं प्रेस फोटोग्राफर भाई महेश गिरि के साथ श्री ‘‘आजाद’’ की जन्मभूमि से साक्षात्कार के लिए निकले। मेरा मन आनंदित था कि मै उस माटी को वंदन करूंगी, जहाँ श्री ‘‘आजाद’’ ने जन्म लिया। अब वहाँ आजाद की कुटिया को शासन ने स्मारक का रूप दे दिया है। स्मारक के प्रबंधक श्री सरदार सिंह जी डाबर है, वे आत्मीयता से मिले हमने वहाँ की माटी को मस्तक पर लगाया, वीरभूमि को प्रणाम किया। एक क्षण ऐसा लगा कि हम आजादी के दिग्गजों का तीर्थ स्थल देखने आए हैं। वहाँ की फिज़ाओं में आजाद की बानी गुनगुना रही थी। इस भूमि की स्पर्शना से एक अनाहद नाद ब्र्रम्ह सा सुकून आपके आभा मंडल के इर्द-गिर्द छा जाता है। 

श्री सरदार सिंह जी डाबर से रूबरू होती हूँ उन्हांने बताया कि वे कई सालों से नगर परिषद् द्वारा नियुक्त है।

आजाद स्मारक को आजाद कुटिया नाम दिया गया है। यहाँ उन्होने चित्रमय संसार में चन्द्रशेखर आजाद और संदर्भित प्रसंगो से अवगत कराया।

कास्य की बेेहतरीन मूर्ति यहाँ के आकर्षण और क्रान्तिकारी शहीद चन्दश्षेखर आजाद से रूबरू होने का मौका देती है, श्री डाबर हमें ‘‘आजाद’’ के जीवन की कई बातों से अवगत कराते है, जब मैने उनसे पूछा तो मुझे किसी परिवार के सदस्य जो कि श्री आजाद के परिवार से आत्मीय रहे हो, मुझे मिलवाएंगे क्या ?

श्री सरदार सिंह जी बोले पुराने लोग परिचित संसार अब सिमट गया है। अनुभवों के जानकार लोग है, जो आजाद के परिवार को उनके पूर्वजो की सुनी बातों के आधार पर तथ्य दर तथ्य हमें कहते है गुनते है। उनसे हमने आग्रह किया की किसी बुजुर्ग महिला या पुरूष से हमें मिलना है तो आप मिलवा दीजिये तो डाबर सा. ने रहमत शेख को बुलवाया।

रहमत आपा ने मुझे मेरे प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि वे ‘‘आजाद’’ के घर के पड़ोस में ही रहती है, श्री आजाद को मंैने तो नहीं देखा मेरी सास ने देखा है। मेरी सास बताती है कि ‘‘चन्द्रशेखर’’ वो हमारे घर में बच्चो के साथ शरारते करता था बचपन से श्री आजाद को साहसिक बातें करने शौक था। कभी तो माँ जगरानी से नाराज होकर हमारे मेड़े (उपर मंजिल पर कमरें में) चढ़ कर सो जाता और फिर जगरानीजी ढूंढती हुई आती और नन्हे बालक को गोद में बिठा लेती सब गिले शिकवे भूल जाती।

मेरी सास का नाम मकसूदन था मकसूदन शेख और जगरानी देवी दोनो में बहनों सा अपनापन था। साथ-साथ घट्टी पिसती, साथ-साथ पानी भर कर लाती। घर दो थे, पर आत्मीयता संयुक्त थी। मेरे ससुर ओर सीताराम तिवारी ने साथ-साथ नौकरी की। दोनो भाई जैसे रहते थे।

‘आजाद’’ ने क्रान्तिकारियों के साथ देश की आजादी के लिए सशस्त्र क्रांति को आगाज किया था। उसमें लूट-पाट भी शामिल थी एक बार रेल में अंग्रेजो का खजाना लूट कर आए तो सभी क्रान्तिकारीयों ने वह पैसा गरीबों को बांट दिया मेरी सास ने इस संदर्भ में किशोर चन्द्रशेखर आजाद से पूछा तो 4 रूपये उनके हाथ में रखे मुठ्ठी बंद कर दी, चिल्लाना मत चाची, हम यह पैसा देश में जरूरतमंद लोगो में बांटते। और कभी तो देश की आजादी के लिए जैसे बम बनाना आदि कार्यो के लिए खर्च भी करते हैं ताकि भारतमाता की गुलामी की बेड़िया काट सकें, आजाद हवा में सांस ले सके।     

मैने पूछा आपा और भी पारिवारिक बातें जो आजाद के जीवन की हो बताइये। देखो बेटी मेरी सास बताती है कि उनके पास गाय थी तो वे दूध दूहने के बाद एक लोटा बडा दूध अपने लिए रखती ओर एक लोटा दूध जगरानीदेवी को चन्द्रशेखर और सुखदेव के लिए दे आती। कभी तो हमारा चूल्हा सांझा चूल्हा बन जाता था ऐसा वे बताती थी । 

वे बुजुर्ग थी, काफी ठिंगनी थी लेकिन बातचीत और उत्तर बराबर दे रही थी। और बेहद आत्मविश्वास की धनी। मुझे उनकी बातों में मानवता का, दया का, ममता भरें स्नेह का सागर लहराता नज़र आया। मैने पूछा रहमत आपा आप मुझे आपसे भी अधिक उम्र वाली किसी महिला से मिलवा सकती है क्या जो शहीद चन्द्रशेखर आजाद के बारे में कुछ बयंा कर सके जिसने जगरानीदेवी के साथ कुछ समय बिताया हो तब वे बताती है कि नूरजहां आपा से बात करो वो जगरानी देवी जी के साथ रही है। नूरजहां का घर थोड़े ही फासले पर है। 

मै गायत्री भाभी और प्रेस फोटोग्राफर महेशभाई चल दिए...

नूरजंहा 95 बरस की है। फिर भी याद्दाश्त अच्छी है और जब बात करती हैं तो पोपले मुंह से फूल झरते नज़र आते है और गुलगोथने बच्चे चन्द्रशेखर आजाद और सुखदेव माँ जगरानी जी और तिवारी जी की स्मृतियों का आगाज हवाओं में तैरने लगता है वक्त की छवियाँ प्रतिछवियाँ हमारे सामने एक क्षणांस रूबरू बिम्ब-प्रतिबिम्ब झिलमिलाने लगती है।

बेहद अच्छा अनुभव रहा कि उन्होने मुझ जैसी अपरिचित को...बेटी को आशीर्वाद की छाँह से तान दिया और नर्म अनुभवी हथेलियो से स्नेह दिया। ये पल मेरे लिए यादगार रहेंगे कि एक बुजुर्ग व्यक्ति सब-कुछ भूलकर स्नेह के दरवाजे खोल देता है, और चाहता है कि आत्मीय जन भी उससे स्नेह से बात करे ओर स्नेह का आचमन बनाए रखे। गोया मैं उनसे रूबरू होती हूँ प्रश्न पूछती हूँ।

वे बताती हैं कि मेरा पीहर यही है और ससुराल भी। आजाद के घर के सामने ही मेरी ससुराल है। मेरे पति जान मोहम्मद हैड साब थे। ‘‘आजाद’’ के हमसखा-हम उम्र थे। बचपन दोनों का साथ गुजरा, खाने से लेकर कबड्डी-कंचे खेलने पतंगे उड़ाने तक ।

आजाद मुझे पैसे दे जाते 4 रूपये, 5 रूपये या ज्यादा में 6 रूपये बस कि मेरी माँ का ध्यान रखना। मेरा ओर जगरानी जी का सुख-दुखः की बाते साझा करने की आदत थी मै जगरानी जी को पानी पिला देती थी कभी तो फलके गेहूँ या मक्का व प्याज के साथ रख आती कि खा लेना आपका अकेले में कहा बनाना होगा क्योंकि सुखदेव भी त्रिवेदीजी के साथ अलीराजपुर चला गया था।

जब आजाद शहीद हो गए तो उनकी माँ जगरानी देवी आजाद के मित्र भगवान दास माहौर के घर झांसी चली गई वही उनका इंतकाल हुआ।

आजाद चन्द्रशेखर की क्रान्तिकारी बातें सुन जगरानी देवी की खुशियाँ दो गुनी हो जाती थी वह कहती यह मेरा बेटा तो है, पर अब यह भारतमाता का सपूत बेटा है। जब उसकी मृत्यु का समाचार आया तो ‘‘डोकरी माँ’’ बहुत रोती थी उन्हें हम सभी समझाते थे।

वे जब तक भाभरा में रहीं हमारे चैके-चूल्हे, चक्की-खाना सब कुछ सांझे में चलता रहा जब वे झांसी चली गई फिर उनसे मिलना नहीं हुआ।

मैने इस गंगा जमुनी तह़जीब को महसूस किया आजाद की इस माटी से दो मोती प्रेरणा के मैने चुने सलाम किया उन ममत्व भरी माँओं को जिनके अंतस से ‘‘अमर शहीद आजाद’’ की बाते सुनी।       

साभार: अन्तर्जाल से


चंद्रशेखर आज़ाद के नारे

मेरा नाम आज़ाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है।

दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही हैं, आज़ाद ही रहेंगे।

जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं अंग्रेज़ों की गुलामी नहीं करूँगा।

मैं जीवन की अंतिम सांस तक देश के लिए लड़ता रहूँगा।

जब तक यह बंदूक मेरे पास है, तब तक मुझे कोई ज़िंदा नहीं पकड़ सकता।

अगर अभी भी तुम्हारा खून नहीं खौला, तो खून नहीं यह पानी है।

यदि कोई युवा मातृभूमि की सेवा नहीं कर सकता है, तो उसका जीवन व्यर्थ है।

सच्चा धर्म वही है जो स्वतंत्रता को परम मूल्य की तरह स्थापित करे।

मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ, जो स्वतंत्रता, सामानता और भाईचारा सिखाता हो।

देश अगर हाथ जोड़ने से आज़ाद हो जाता, तो यह जान लें कि भारत कभी गुलाम नहीं होता।

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