साहित्य नंदिनी जुलाई 2022





समीक्षा

‘इसलिए....इसलिए...इसलिए...’

डाॅ. अवध बिहारी पाठक,  सेंवढ़ा, दतिया (म.प्र.), मो। 9826546665 

डाॅ. उमा त्रिलोक,   डाॅ. उमा त्रिलोक, चंडीगढ़, मो.  9811156310


‘‘हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है, बड़ी मुस्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा’’...डाॅ. अल्लामा इक़बाल मुझे डाॅ. उमा त्रिलोक द्वारा लिखित पुस्तक ‘‘एक कत्आ अमृता के नाम’’ देखने को मिली बड़ी अजीब सी प्रस्तुति है इसकी जिसमें अमृता प्रीतम की अभिव्यक्ति के साथ लेखिका का अपना बहुत कुछ है। यह वस्तुतः अमृता के नाम खुली चिट्ठी है। अमृता ने स्त्री की पारिवारिक, सामाजिक स्थिति पर रचनाओं में आक्रोश व्यक्त किया उसे अपनी ज़िन्दगी में एक खुलापन अपनाकर प्रस्तुत किया परम्परा, रीति-नीति और सामाजिकताओं के भयंकर मकड़जाल से हटकर वह नायाब है, इसलिए उपरिलिखित पंक्तियाँ उनको दीदावर सावित करतीं हैं यानि विशेष दृष्टि सम्पन्न।

डाॅ. उमा त्रिलोक एक मौलिक चिंतक और लेखक हैं स्त्री दशा के प्रति उनमें बहुत ताप है जो अमृता के बहाने किताब में निसृत हुआ। पहले ही पृष्ठ पर लिखा है- ‘‘इस किताब में जहाँ क्यों है वहाँ ही मेरा दखल है वरना मैं कहीं हूँ ही नहीं, यह कहानी अमृता की ही है’’ इस पुस्तक में मुझे ऐसा नहीं लगा। लेखक ने दर्जनों क्यों लगाकर एक नए नज़रिये से देखा गया है जो अब तक नहीं देखा गया था अतः उमा त्रिलोक भी दीदावर की कोटि में आतीं हैं। प्रथम दृष्या उनके ‘‘क्यों’’ ठीक दिखते हैं आज अमृता तो हैं नहीं जो इन तमाम ‘‘क्यों’’ का उत्तर दे। अस्तु अमृत की नितांत निजी अनुभूति के सहारे हमें एक नया निष्कर्ष खोजना होगा।

लेखिका ने अमृता के बिल्कुल बगल में खड़ी होकर जो ‘‘क्यों’’ लगाये हैं वे उसका ताप है। अमृता में बदनामियाँ, बदसलूकियाँ झेली, दुःख सहे परन्तु उनमें कहीं भी घबराहट नहीं हुई। अमृता के जीवन में साहिर आया पर थोड़ी देर का अबोल सम्पर्क स्थायी नहीं रहा। अमृता तो बहती नदी थी न ठहरना न छूना। भले ही कोरे कागज पर साहिर लिखा हो परन्तु प्रत्यक्ष इज़हार नहीं। लोक से भी वह क्या कहती बाल्यवस्था में उसके भीतर एक राजन बैठा था न रूप, न नाम केवल आभासी छाया, उसको अमृता ने सुरक्षित रखा। अमृता ने धार्मिक फतबे, राजनैतिक चालबाजियाँ सब सहीं पर उसने अपना भौतिक भूगोल खुद रचा। इमरोज उसके जीवन में आया परन्तु दोनों के ही प्रारूप अलग थे, अनेक होकर भी एक और एक होकर भी अनेक। यहाँ मुझे मैत्रेयी पुष्पा की एक पुस्तक ‘‘गुड़िया भीतर गुड़िया’’ का नाम याद आता है बाहरी एपीयरेन्स में अमृता गुड़िया दिखती रही परन्तु उसके भीतर एक और गुड़िया छिपी थी जिसका स्त्रीरूप और चेतना सब अलग। उसके अभ्यन्तर में बैठा राजन सारे व्यतिक्रमों को रोकता रहा। पुरुषों के प्रति आकर्षण अमृता में होगा परन्तु उन्होंने लिखा है कि (मेरे छलावे, मेरे सयानेपन में आयी कसर हो सकती है, पर मेरी प्यास में कोई कसर नहीं......। पृष्ठ 90) उसके अपने प्यास के प्रति निष्ठा थी, जिन्दगी में आये प्रतिमानों के कुछ भुलावे उसका रास्ता विकृत नहीं कर सकते। उसके अन्तर में बैठी साजन की अमूर्त छाया बैठी रही, उसने हमेशा दुःख को खोजा है, तब फिर उसके पात्र भी कैसे प्रसन्न हो सकते थे उसके पात्र भी उसी की तरह दुःख की खोज में हैं।

यहाँ यह कहना प्रासंगिक है स्त्री सामाजिक इकाई का अंग है भले ही उसे दाम्पत्य भाव में रहना पड़े परन्तु हृदय स्थल पर एक कोना अपने प्रिय के लिए बचाए रखती है। भले ही वह कई पुरुषों के परिचय में आयी हो परन्तु सब उस कोने से बाहर ही रहे वहाँ उसका बचपन का राजन बैठा था जो अरूप, अनाम रहा। इस तरह अमृता ने अपनी इयक्ता को कायम रखा।

सारी भौतिक सुख-सुविधाएँ अमृता के पास थीं, परन्तु वह उनके एकरस नहीं हो सकी। उमा जी द्वारा उठाये गये तमाम ‘‘क्यों’’ के उत्तर इन बिन्दुओं के आलोक में देखने की मेरी कोशिश है। यहाँ हम देखेंगे कि अमृता के सामने जो नहीं था, वह उसके होने की प्रतीति से आक्रान्त हो जाती थी और जो सामने था वह उसे नहीं होने की मनोदशा से चोटिल कर जाता था। इनको निम्न बिन्दुओं में देखा जा सकता है-

1. नियति कहें या और कुछ- ‘‘बहुत छोटी उम्र में उसके मन पर तथाकथित पूर्व जन्म का एक साया छाया रहा’’....पृष्ठ 96। बिना नाम, रूप, आकार; उससे बातें करती, उसी का चिन्तन, उसने नाम दिया राजन, पिता की उपस्थिति में भी, पिता के कठोर अनुशासन कहिए या आतन्क, वही उसका सम्बल बना रहा। कहा जा सकता है कि बचपन में ही उसकी मनःस्थिति दर्शनशास्त्र की चपेट में आ गई थी और उसी ने अमृता को चिंतन के स्तर पर ‘‘असामान्य मनोदशा की मूर्ति बना दिया।’’ और जीवनभर उससे निजात नहीं मिली।

2. बचपन में माँ की मृत्यु- स्नेह से वंचित होने और पिता के कठोर पुरुषवादी नियंत्रण में ग्रस्त होने से भावुकता के अनाम क्षणों में वह उस नेह की खोज में जुटी रही। एक अनाम, अव्यक्त, अवसाद उसके मन पर छाया रहा। उसने प्यार पाने के लिए तमाम प्रयोग किए। परन्तु उसकी निष्ठा ने उसका रास्ता रोक दिया। तभी उसने कहा ‘‘लक्ख तेरे अम्बारों बिच्चों दस की लम्ब्या सानू, इक्को तन्दप्यार दी लम्मी ओह भी तंदइकहरी’’ ........पृष्ठ 76। उसकी निगाह में पुरुष आये परन्तु उसे प्यार का इकहरा प्यार मिला, वह उसके राजन का था अन्य पुरुष का नहीं।

3. साहिर में उसने अपने प्यार को खोजा बात नहीं हुई दोनों के मिलने की गवाह केवल हवा थी। यहाँ एक औरत अमृता का स्वाभिमान आड़े आये साहिर के द्वारा फेके गए सिगरेट के टुकड़ों का प्रयोग भी उसकी असामान्य मनोदशा के प्रतीक हैं। पंजाबी होकर शराब-सिगरेट का प्रयोग भी असामान्य मनोदशा का चिह्न है जो उसके वयस्क होने पर भी हावी रहा।

4. छोटी अवस्था में ही उसके मन में अकेलेपन ने उसके अपने अस्तित्व का प्रश्नबीज बो दिया था जो कालान्तर में विकसित हुआ स्वाभिमान के रूप में। समाज के पुरुषवादी पिता ने 16 वर्ष की आयु में एक सम्पन्न परिवार में विवाह कर दिया। विदा के समय वह छत पर अकेली रो रही थी। कोई औरत उसके पास न थी, ये माँ की याद अपनी अवस्था और पितृ गृह त्याग के दंश थे। स्त्री अस्मिता का यह भाव जोर पकड़ता गया। पतिगृह छोड़ बच्चों को लेकर पृथक रही, यह उसका स्वाभिमान था दूसरी ओर पीड़ा का सामना करने की जिद् भी मात्र बीस वर्ष की आयु में ही अमृता ने अपनी सारी भौतिक जरूरते और सांसारिक व्यवहारों को दफन कर दिया। इस उपक्रम ने उसे बदनाम कर दिया, उसके ऊपर धार्मिक फतबे जारी किए गए। एक स्वतंत्र और स्वायत्त मनःस्थिति में पुरुषों ने ताक झाँक की, कवि मोहनसिंह से तो उसने कह ही दिया मैं अपका आदर करती हूँ आप चाहते क्या हैं, साहिर का निधन हो ही गया था। सज्जाद में उसने क्षणिक प्रेम की झलक देखी उसे (मेरा खलील जिब्रान कहा......पृष्ठ 72) परन्तु राजन की जगह पर उसे नहीं पहुँचने दिया। इमरोज उसकी जिन्दगी में केवल सहायक के तौर पर रहा। वह अमृता के प्रेम की केन्द्रीयता को समझता था। फिर भी वह कहता था कि ‘‘मेरा इक सतर दा पाठ भी, ते अरदास बी, ओह सदा खिड़दी रबे महकदी रबे’’......पृष्ठ 12।

5. अमृता यथार्थवादी थी, कहना चाहिए कि उसका यथार्थ यथार्थोत्तर यथार्थ था। उसकी आहट को जीवन का सम्बल अमृता ने बना रखा था। स्त्री को एक पुरुष की छाया की जरूरत पड़ती है एक आसमान की मानिन्द किन्हीं जरूरतों के तहत नहीं, मानसिक भराव के तौर पर अमृता ने इमरोज को केवल उस भराव के साधन के रूप में माना। लेकिन उसका राजन अपनी जगह कायम रहा।

6. इमरोज की केन्द्रीय शक्ति अमृता रही वह अमृता के आकर्षण से नहीं बल्कि अपना जीवन, अपनी कला, अपना पुरुषपन भूलकर अमृता की छाया तलें सुकून खोजता रहा, यह इमरोज की जमाने में कहीं भी जगह न पाने से उपजी हताशा थी। इमरोज का समर्पण हो सकता है परन्तु पंगु था। अमृता ने भी इमरोज को एक खास खाने तक सीमित कर दिया था। क्योंकि मीरा के गिरधर गोपाल की तरह राजन भीतर बैठा था- ‘‘प्रेम गली अति साँकरी, जामें दो न समाय।’’

7. निराला ने कहा था ‘‘दुख ही जीवन की कथा रही’’ इसी तरह अमृता ने दुःख को खोजा कहीं भी समझौता नहीं किया। इससी से वह लगातार आक्रामक होती गई खुद के प्रति, समाज के प्रति, परिवार के प्रति, परम्पराओं-अकीदों के प्रति, इसी कारण से उसके सारे पात्र दुःख के परिवेश में ही जीते दिखे। जब उसके निजी घेरे में खुशी का नाम न था तो उसके पात्र कहाँ से चहक पाते, उनके तेवर संर्घर्षी हैं अमृता के मन में कहीं पश्चाताप, उलाहना नहीं। समाज को, देश को, परिवेश को स्त्री की स्वायत्तता को तुमने कैद कर रखा था। उसे तो तोड़ा ही तोड़ा जाना चाहिए इसके लिए पुरुष वर्चस्ववादी समाज ही जिम्मेदार है ऐसी उसकी स्थापना थी।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अमृता इसी स्वायत्तता के पथ पर दृढ़ता से कायम रही वह भी हिन्दी लेखिका 

रमणिका गुप्ता की तरह इच्छित सामाजिक जीवन जीकर राजनीति के क्षेत्र में कूद पड़ती जहाँ उसके समर्थक पाठक वर्ग और समाज का बुद्धिजीवी उसके साथ था।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन और लेखन उसके भीतर व्याप्त द्वंद्व के प्रतीक हैं।

‘‘इमां मुझे रोके है जो खीचे हैं मुझे कुर्फ,

काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे।......गालिब

यह शे‘र अमृता की प्रवृत्तियों पर ठीक बैठता है।

मेरा अनुमान है सब ‘‘क्यों’’ को निदान मिल जाना चाहिए।           

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समीक्षा

‘अभिनव इमरोज़’ का डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 
केंद्रित व्यक्ति विशेष दस्तावेज


        श्री हरिशंकर राढ़ी, वसंतकुंज एन्क्लेव (बी-ब्लाॅक), नई दिल्ली, मोबाइल: 9654030701

     डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी


अपने अब तक के छात्र से लेकर लेखकीय जीवन में किसी लेखक पर केंद्रित किसी साहित्यिक पत्रिका का इतना विशाल अंक मैंने नहीं देखा था, जितना डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पर केंद्रित ‘अभिनव इमरोज़’ का अंक! किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ जैसी लंबाई-चैड़ाई और मोटाई, उतना ही समृद्ध सजिल्द आवरण, अच्छी गुणवत्ता का कागज और छपाई। लेकिन इसके बाहरी रूप-रंग एवं आकार पर अचंभित होने, प्रशंसा करने का यह मतलब कतई नहीं कि यह पुस्तक कहीं से अपने कथ्य और सामग्री में कमजोर है। सूरत और सीरत दोनों में ही पुस्तक डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के कद के साथ न्याय करती है। प्रथम दृष्ट्या ही लगता है कि इसके संपादक ने डाॅ. तिवारी के उचित मूल्यांकन की मजबूत मानसिकता पहले ही बना ली थी, तब जाकर इस श्रमसाध्य कार्य को परिणाम तक पहुँचाया।

डाॅ। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने एक लंबी और गंभीर साहित्यिक यात्रा की है। अनेक विधाओं मंे उनकी गुरुतर साहित्यिक उपलब्धियाँ हैैं। उन सबकी विस्तृत पड़ताल करना बहुत कठिन कार्य है, किंतु इस दस्तावेज में ‘दस्तावेज़’ के संपादक पूरी तरह समाने की कोशिश की गई है। सामान्यतः इस दस्तावेज को तीन भागों में विभक्त करके देखा जा सकता है। पहला उनके व्यक्तित्व से साक्षात्कार कराते लेख, दूसरा उनकी आत्मकथा ‘अस्ति और भवति’ पर विमर्श, तीसरा अन्य विधाओं जैसे डायरी, कविता एवं आलोचना का पक्ष। तीसरे भाग में उनके साहित्य के विविध आयामों को दिखाया गया है, जो उनके साहित्य एवं व्यक्तित्व को विस्तार देता है, इसे भी किसी प्रकार कम करके नहीं आँका जा सकता।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित डाॅ. तिवारी की आत्मकथा ने अपनी विशेष जगह बनाई है। अपनी सहजता, सरलता और आडंबरहीन अभिव्यक्ति के कारण यह आत्मकथा पठनीय ही नहीं, मननीय भी है। आत्मकथा का एक सुंदर आख्यान भी है। अतः इस पर चर्चा-विमर्श स्वाभाविक है। किंतु इस अंक का प्रारंभ डाॅं. तिवारी से प्रो. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ के साक्षात्कार से होता है। इस साक्षात्कार की प्रशंसा इसलिए करनी होगी क्योंकि लगभग 12 पृष्ठ के इस साक्षात्कार में प्रश्नों का सरोकार साहित्य से अधिक है, लेखक के निजी जीवन से कम। निजी जीवन पर भी प्रश्न आए हैं, किंतु उनकी निजता साहित्यिक निजता से ज्यादा संबद्ध है, जीवनवृत्त से कम। किसी भी लेखक के निजी जीवन का प्रभाव उसके साहित्य पर पड़ता है, पंरतु स्थिति तब असहज-अनुपयोगी होती है, जब प्रश्न केवल भौतिक जीवनयात्रा से, जन्म-शिक्षा, विवाह और प्रांरभिक लेखन से जुड़े हों या वे साहित्यिक निर्मिति में कहीं से सहायक न हों।

डाॅं. तिवारी को जानने-पढ़ने वाले जानते हैं कि वे एक गंभीर चिंतक हैं। उनका अपना एक जीवन दर्शन है जो मानवता या लोक से जुड़ा है। प्रो. चमोला ने ऐसे कठिन प्रश्न भी रखे हंैं जिसका उत्तर कठिन हो सकता था, किंतु डाॅं. तिवारी अपने सहज स्वभाव की भाँति उन प्रश्नों के उत्तर भी सहज दिए हैं। विभिन्न विधाओं मंे अपने लेखन को लेकर किए गए प्रश्न के जवाब में डाॅं. तिवारी कहते हैं- “अभिव्यक्ति की बेचैनी अपनी विधा भीतर से स्वयं तय कर लेती है।” यह एक अनुभूत सत्य है, किंतु कुछ आलोचक बिना सोचे-समझे किसी लेखक की विभिन्न विधाओं में आवाजाही का उपहास उड़ाते हैं। एक प्रश्न मंे प्रो. चमोला पूछते हैं- “समीक्षक बनना आपको अपनी कविता के समीक्षकों के प्रतिवाद ने उकसाया अथवा समीक्षाा के क्षेत्र में आपकी कोई विशेष जीवनदृष्टि थी, जो आपको तत्कालीन परिवेश में नहीं दिखाई देती?” डाॅं. तिवारी जवाब में कहते हैं- “कोई समीक्षा लिखकर अपनी कविता का संरक्षण नहीं कर सकता। हाँ, सैद्धांतिक आलोचना के लिए मुझे अपने समय के आलोचकों ने जरूर उकसाया।”

इस साक्षात्कार से एक बात स्पष्ट होती है कि डाॅ.तिवारी साहित्य के समाज से अलग होने के अलग होने जैसी विचारधारा से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं रखते। साहित्य कदाचित समाज से अलग हो सकता है, किंतु उसे अलग होना नहीं चाहिए। एक प्रश्न के उत्तर में वे कहते हैं - “लेखक का सच और समाज का सच प्रायः एक होते हैं। लेकिन इनमें कभी-कभी विरोध की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। इसीलिए तुलसीदास ने कहा है, ‘कहब लोकमत साधुमत’ अर्थात् लोकमत और साधुमत दोनों में किंचित विराध भी होता है।” उनका मानना है कि भारत के लोगों की मानसिक बनावट और नैतिक मूल्य जो कुछ भी हैं, उसमें हमारे महाकाव्यों-‘रामायण’ और ‘महाभारत’ का बहुत बड़ा योगदान है। यदि वे दोनों महाकाव्य न होते तो हम वह न होते जो आज हैं।” कहने की आवश्यकता नहीं कि डाॅ. तिवारी का यह कथन एक गहरे चिंतन और सामाजिक अध्ययन को प्रतिबिंबित करता है। भारतीय परंपराओं को मानने और न मानने वाले- दोनों ही अपने-अपने ढंग से तिवारी जी की बात को मानेंगे।

अपनी आत्मकथा के विषय में (आत्मकथा ‘अस्ति और भवति’ के प्रारंभ में भी तिवारी जी ने बड़े संकोच से कहा है) कहते हैं कि उसे (आत्मकथा को) लेखक का ही नहीं, उस समय का भी प्रामाणिक दस्तावेज होना चाहिए जिस समय में लेखक साँस लेता रहा है। यह सच है, कि आत्मकथा तभी समयकथा और समाजकथा तभी बन पाती है जब वह व्यक्ति से निकलकर समष्टि की ओर जाती है।

लेखन में विशेष पंथ की ओर झुकाव, आलोचकों की गुटबंदी और राजनीतिक प्रतिबद्धता के चलते आलोचना जिस हद तक गिरी है, उस पर आए प्रश्नों का जवाब डाॅं. तिवारी ने बेबाकी से दिया है। लेखकीय परिवेश को लेकर संपादक ने अनेक कटु एवं गंभीर प्रश्न किए हैं, जिनके उत्तर साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एवं मननीय हैं। डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का साहित्य, चाहे वह किसी भी विधा में हो, किसी झंडे, वामपंथी या दक्षिणपंथी झुकाव से पृथक संवेदना, मानवता एवं गंभीर अध्ययन का उत्पाद है। कहा जाए तो उनकी यही प्रतिबद्धता पूरे साक्षात्कार में प्रतिबिंबित हो रही है।

साक्षात्कार के बाद लेखों की शृंखला में पहला लेख है सह-संस्मरण रेवतीरमण का ‘आस्था से ही कटते हैं जीवन के रास्ते’ है। यह आलेख डाॅ. तिवारी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर बहुत अच्छी बोहनी है। वे अपने लेख में उनकी जीवनी के साथ साहित्य को गूँथते हुए चलते हैं। इस लंबे आलेख में रेवतीरमण जी डाॅ. तिवारी की चुनिंदा कविताओं तथा अन्य प्रसंगों को साक्षी के रूप में पेश करते हुए एक मोहक तिलिस्म पैदा करते हैं। मंजुला राणा का लेख डाॅ. तिवारी की यात्रा का पड़ताल मात्र है, किंतु ए. अरविंदाक्षन अपने लेख ‘अत्तानं किन्न गवेसेय्याथ’ में बहुत गहराई में उतरे हैं। उन्होंने तिवारी जी के निबंधों एवं आलोचना पर विशेष दृष्टि डाली है। निबंध का स्वभाव ही गंभीर होना होता है। पहले तो निबंधकार उस पर अपनी चिंतन प्रवृत्ति का गहरा असर डालता है। भावों या तर्कों का वज़न ज्यादा होने के कारण उसकी भाषा का वाहन भी भारी होता है। ऐसी दशा में निबंधों एवं आलोचना की समीक्षा करना बड़ा दुष्कर होता है। किंतु यह कहना भी उचित नहीं होगा कि निबंध और आलोचना में पठनीयता एवं सरसता नहीं होती। यदि लेखक मानवीय  संवेदनाओं से ओत-प्रोत है तो उसकी सरसता वहाँ भी मिल ही जाएगी। एक सही समीक्षक रचना से गुज़रते हुए इन्हीं बातों को तो पकड़ता है। ए. अरविंदाक्षन ने डाॅ. तिवारी के निबंधलोक और आलोचना क्षेत्र मंे उनके मूल गुण को पकड़ा है। वे अपने लेख में कहते हैं- “अपनी परिस्थिति की संवेदना की, निबंधकार की चर्चा मनुष्य में निहित एक महाभाव की ओर बढ़ाती है और वह महाभाव है करुणा जो साहित्य का मूल स्रोत भी है। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की सभी रचनाओं में करुणा का यह महाभाव व्यापक तौर पर उपलब्ध है।”  

‘अस्ति और भवति’ को इस पुस्तक में विशेष महत्त्व दिया गया है, जिसका औपचारिक प्रारंभ अनंत मिश्र के लेख ‘अस्ति और भवति: मृत्यु के समानांतर जीवन की सार्थकता की खोज’ जैसे विशद लेख से होता है। यदि यह कहा जाए कि लेखक ने इस आत्मकथा की समीक्षा पर कुल 23 पृष्ठ तक की यात्रा की है तो संभवतः यह सही मूल्यांकन नहीं होगा। पृष्ठ-दर-पृष्ठ अनंत मिश्र ने इस आत्मकथा का जो विश्लेषण किया है, मूल्यांकन वह है। कहा तो यह जाना चाहिए कि एकमात्र यही आलेख डाॅ. तिवारी की आत्मकथा की विशिष्टताओं को समझने एवं रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है। उद्धरणों के लिए वे मुक्ता जैसी पंक्तियाँ उठाते हैं। कुछ उदाहरण देखिए- “कितनी सुंदर है यह सृष्टि जिसे वेद ने देवताओं का काव्य कहा है -पश्य देवस्य काव्यम्।” “पश्चिमी चिंतन मनुष्य कंेद्रित है। उसमें मनुष्य प्रकृति का सिरमौर है। वह अपने सुख के लिए प्रकृति का जैसे चाहे उपभोग कर सकता है।”

अपने लेख में अनंत मिश्र कुछ और स्थलों को उद्धृत करते हैं, जो निश्चित रूप से मन को कहीं न कहीं अलग से अपील करते हैं। तिवारी जी आत्मकथा में अपने गाँव के भूगोल का जिक्र करते हुए एक पाकड़ के पेड़ का उल्लेख करते हंैं। यह उल्लेख भौगोलिक उल्लेख न होकर किसी सिद्धहस्त निबंधकार के ललित निबंध की मिठास देता है। वे लिखते हैं- “मेरे गाँव के बाहर पश्चिम में पाकड़ का एक पेड़ है। अब वह बूढ़ा हो गया है। उसकी कुछ डालियाँ ठूँठ हो गई हैं, कुछ तने कट गए हैं और उसकी त्वचा सख्त हो गई है। वह वृद्धावस्था के रोगों से ग्रस्त और जर्जर हो गया है। मगर आज से पचास-साठ साल पहले वह जवान था।” जहाँ एक वृक्ष के वर्णन में इतनी जीवंतता होगी, वहाँ संवेदनशील स्थितियों और लमहों की कल्पना की जा सकती है।

क्रमशः रेवतीरमण और ओम निश्चल के भी लेख ‘अस्ति और भवति’ का कई कोणों से परीक्षण करते हैं। रेवतीरमण इस लेख में भी अपनी धार बनाए रखते हैं, जबकि ओम निश्चल अपने आलेख को ‘ऐश्वर्य की नहीं, संघर्ष की कथा’ शीर्षक देते हैं। इस लेख में ‘अस्ति और भवति’ की थाह लेने के साथ-साथ ओम निश्चल अन्य माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं एवं मूल्यांकनों को भी साझा करते चलते हैं, जिससे डाॅ. तिवारी के साहित्येतर बड़प्पन की झलक मिलती है। ‘अस्ति और भवति’ के इस अव्यक्त खंड मंे गोविंद मिश्र, राजेंद्र उपाध्याय, रवींद्र शोभणे, उदय प्रताप सिंह, सत्यव्रत तिवारी, रमाशंकर द्विवेदी और पूनम सिन्हा के लेख उल्लेखनीय हैं। इसमें रमाशंकर द्विवेदी एवं पूनम सिन्हा ने कई पृष्ठों तक लिखा है। दोनों के ही लेखों में आत्मकथा को पढ़ा ही नहीं गया है, उसे समाज एवं साहित्य से जोड़कर देखा गया है। वे आत्मकथा के मार्मिक प्रसंगों पर ठहरते हैं, बूझते हैं और फिर उसे रेखांकित करने योग्य टिप्पणी करते हैं। वहीं श्रीभगवान सिंह अपने लेख को सूत्रवाक्यीय शीर्षक देते हैं- ‘लघुता की ओर साहित्यिक दृष्टिपात’। निःसंदेह, जो भी डाॅ। तिवारी तिवारी की ‘अस्ति और भवति’ से गुजरा होगा, वह इस शीर्षक मात्र से ही आत्मकथा और इस लेख की गुुणवत्ता जान जाएगा।

ओम निश्चल के लेख प्रायः खोजपरक होते हैं। वे उन बिंदुओं पर हाथ धरते हैं, जो कई लोगों से छूट जाते हैं। ओम निश्चल अपने लेख की शुरुआत डाॅ. तिवारी के ठेठ पुरबिहा अंदाज और वेशभूषा के जिक्र से करते हैं- एक ऐसा व्यक्ति जो गोरखपुर के बेतियाहाता ही नहीं, विदेश तक धोती-कुरते और बंडी में हो आता है। ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा में अभिजातबोध होने के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता। ओम निश्चल ‘अस्ति और भवति’ से एक आत्मकथ्य उतारते हैं-“पीछे मुड़कर देखता हूँ, कैसा था वह जीवन जिसे जिया नहीं, बल्कि जो बह गया मेरी मुट्ठियों से, जैसे पानी बह जाता है। मेरे भीतर बैठा देवता मुझसे मेरी उम्र का हिसाब माँग रहा है। क्या दूँ, क्या विचारकों और विचारधाराओं का कूड़ा-करकट परोस दूँ उसके सामने?” यही आत्मालोचन और आत्मलघुता का बोध मनुष्य को श्रेष्ठ व्यक्ति और साहित्यकार बनाता है।

बीच में आलोक गुप्त का लेख ‘साधारण की असाधारणता का ‘दस्तावेज’ आता है। डाॅ. तिवारी संपादित पत्रिका ‘दस्तावेज’ को शायद ही कोई साहित्यप्रेमी और शोधछात्र न जानता हो। किंतु, यहां जिक्र ‘दस्तावेज’ पत्रिका का नहीं है। वस्तुतः ‘अस्ति और भवति’ का मूल्यांकन करते हुए साधारण से दिखने वाले डाॅ. तिवारी की असाधारणता का दस्तावेज माना गया है। उदयभानु पांडेय, लीलाधर जगूड़ी, वंदना मिश्रा तथा ज्ञानप्रकाश विवेक ने भी इस आत्मकथा पर पूरी शिद्दत से लिखा है।

डाॅ. तिवारी की आत्मकथा पर इन लेखों को पढ़ने के बाद लगता है कि आत्मकथाओं का महत्त्व है, बशर्ते उन्हें निजता से निकालकर सार्वजनिकता से जोड़ा जाए। जिसने भी डाॅ. तिवारी की आत्मकथा को नहीं पढ़ा होगा, वह इन लेखों से गुज़रने के बाद उसे बिना पढ़े नहीं रह पाएगा। श्रीभगवान सिंह लिखते हैं- “यह एक साहित्यकार की आत्मकथा है, किंतु विशुद्ध साहित्य साधना की कथा न होकर आत्मचेतन एवं बाह्यचेतन साधक की कथा है।” संभवतः इसके बाद कहने के लिए कुछ खास नहीं रह जाता।

आत्मकथा की पड़ताल के बाद संपादक ने डाॅ. तिवारी की डायरी ‘दिन रैन’ पर समीक्षात्मक लेख दिए हैं। ये लेख ‘दिन रैन’ को केंद्र में रखते हुए डायरी विधा की महत्ता के साथ-साथ ‘दिन रैन’ पर विमर्श करते हैं। हालांकि इस प्रखंड मेें अधिकांशतः आत्मकथा वाले लेखकों को ही दुहराया गया है। रेवतीरमण, ज्ञानप्रकाश विवेक, ओम निश्चल, रमाशंकर द्विवेदी ने ‘दिन रैन’ पर अच्छा लिखा है।

विशेषांक डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पर निकले और और उनकी कविताओं पर एक बड़ा क्षेत्रफल न दिया जाए, यह असंभव है। कविता से शुरू हुई डाॅ। तिवारी की साहित्य यात्रा लेखों, निबंधों, आलोचना के गं्रथों, आत्मकथा और डायरी तक भले ही समृद्ध होती गई हो, किंतु कविता तो उनकी हर रचना मेें है। लगभग 20 लेखकों-साहित्यकारों ने डाॅ. तिवारी की कविता पर आलेख दिया है, जो उनका कई दिशाओं से प्रकाश डालता है। एक बात अगर सर्वनिष्ठ है तो उनकी कविताओं में मानवीय मूल्यों और संवेदना को स्थान। डाॅ. तिवारी की कविताएँ नारा नहीं लगातीं, ढोल नहीं पीटतीं, चीख-चीखकर जगाने का दावा नहीं करतीं। वे किसी दुखते-रिसते दिल में घुसकर धीरे सहलाने, बोलने𝔠ाने लगती हैं। क्षणभर में वे कवि से निकलकर पाठक की अपनी अभिव्यक्ति, अपनी जुबान हो जाती हैं। संभवतः इसी विशिष्टता को उनके काव्यरूप में रेखांकित किया गया है। 

वैसे अच्छी बात यह भी है कि संपादक ने डाॅ. तिवारी के कविरूप को रेखांकित करते हुए इस दस्तावेज का प्रारंभ उनकी कविताओं से ही किया है। अनुक्रमणिका के बाद डाॅ. तिवारी की प्रसिद्ध ‘उड़ गई माँ’, ‘माँ नहीं थी वह’ और ‘माँ और आग’ कविताएँ दी गई हैं। बडी मार्मिक सी पंक्तियाँ हैं- ‘माँ का आँचल जल रहा था/जिसमें छिपाया करती थी वह हमें/....। सबसे पहले पैर जले माँ के/फिर सिर जला/जल नहीं रहे थे/माँ के अमृत पयोधर..। / हमने लपटें तेज कीं/और तेज की लपटें/माँ अकेली लड़ रही थी/लपटों से, हवा से, आकाश से।

पुस्तक के अंत में भी तिवारी जी की तब की कुछ अप्रकाशित कविताएँ दी गई हैं, जिन्हंे एक अच्छा उपसंहार माना जाएगा। अच्छा उपसंहार इस अर्थ में कि इस प्रयास में डाॅ. तिवारी के साहित्य एवं व्यक्तित्व के समानांतर अधिकांशतः बहुत गंभीर लेख दिए गए हैं, जिसका मृदुल अवरोह कविताओं के माध्यम से ही हो सकता है। वैसे तिवारी जी की कुछ अद्यतन डायरियाँ और उनकी हस्तलिपि में अनेक साहित्यकारों को लिखे पत्र भी दिए गए हैं, जो उनसे परोक्षतः रूबरू कराते हैं। इस पुस्तक में संग्रहीत डायरियाँ 2014-15 की हैं, यानी जब वे साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए थे। स्पष्ट तो नहीं लिखा है, किंतु पढ़ने से पता चलता है कि उस पद का दायित्व एवं चुनौतियाँ वे ठीक से समझ रहे हैं। संभवतः कुछ मित्र जैसे लोग कुछ न कुछ धर्मसंकट पैदा कर रहे हैं, जिससे डाॅ. तिवारी विचलित हो रहे हैं। किंतु तिवारी जी को तुलसीदास से बहुत सहारा मिलता है, ठीक वैसे ही जैसे भारतीय जनमानस को मिलता है। तुलसी बाबा को बार-बार कोट करते हुए अपनी अनुभूतियों को वे अप्रकट रूप से व्यक्त करते हैं।

डायरी के 11 अप्रैल 2014 पन्ने पर आत्मालोचन है, परिवेश का आकलन है। दिन-प्रतिदिन के अनुभवों एवं सामाजिक प्रतिक्रियाओं से जो अनुभूतियाँ होती हैं, उसे तिवारी जी ने बहुत गंभीरता से लिया है, उस पर सोचा है। दीवाली के बाद गाँव से लौटने के विवरण में उस पाकड़ के पेड़ का जिक्र बड़ी आत्मीयता से करते हैं जो उनकी आत्मकथा में बड़ी शिद्दत से आता है। यदि पत्रों की बात करें जिसकी छायाप्रतियाँ अंत मंे दी गई हैं तो एक बात कहनी ही होगी कि तिवारी जी भाषा और साहित्य में शुद्धता के पैरोकार रहे हैं। ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव के नाम 2005 में लिखे पत्र मंे वे एक पुस्तक के शीर्षक में आई किंचित अशुद्धि को लेकर बड़े सलीके किंतु तर्कपूर्ण ढंग से चेताते हैं। केदारनाथ सिंह तथा एकांत जी को लिखे पत्र भी भाषिक-साहित्यिक चिंताओं को ही व्यक्त करते हैं। ऐसे पत्र देकर संपादक ने पुस्तक को रोचक और समृद्ध ही बनाया है।

कविताओं बात की जाए तो अंत में तिवारी जी की कुछ चुनी हुई कविताएँ दी गई हैं, जो अलग-अलग स्वाद की हैं। अलग-अलग स्थितियों पर बात करती हैं। इनमें ‘सूटकेस: न्यूयार्क से घर तक’, ‘दाना माँझी’, ‘जगह’, ‘अथातः अन्न जिज्ञासा’, ‘जो पीछे छूट गए’, ‘निवेदन’ और ‘समर्पण’ हैं। ‘जगह’ कविता में वे लिखते हैं -

खड़े-खड़े मेरे पाँव दुखने लगे थे

थोड़ी-सी जगह चाहता था बैठने के लिए

कलि को मिल गया था

राजा परीक्षित का मुकुट

मैं बिलबिलाता रहा कोने-अँतरे

जगह, हाय जगह

सभी बेदखल अपनी-अपनी जगह से...

निश्चित रूप से कलि और राजा परीक्षित के मुकुट के प्रतीकों से कवि ने समाज की विसंगतियों, असमानताओं और अयोग्यता के प्रतिष्ठापन को बहुत सधे ढंग से कह देता है। कविता जब अपने संकेतों में बोलती है तो उसकी आवाज अधिक प्रभावशाली होती है। उसका असर गहरा होता है। प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भाषा और विश्व साहित्य पर मनन करने वाले लेखक हैं। चाहे भारतीय पौराणिक कथाएँ हों या किंवदंतियाँ, या फिर पश्चिम साहित्य के चरित्र हों, तिवारी जी उनका सम्यक और प्रभावी इस्तेमाल ठीक से जानते हैं। दूसरे, वे उन सूक्ष्म तत्त्वों को सहजता से पकड़ लेते हैं जो कविता के लिए जरूरी उपकरण हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पढ़ते हुए लगता है कि अपनी समझ बढ़ रही है और मैं एक अलग दुनिया देख रहा हूँ। छंदमुक्त कविता में यदि यह तत्त्व नहीं पाया जाता तो उसका अस्तित्व न होने के बराबर ही होता है।

डाॅ. तिवारी के काव्यपक्ष का मूल्यांकन करते हुए ए. अरविंदाक्षन अपने दूसरे लेख‘ कविता में बसा देश’ में कहते हैं- “विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविता जीवन के यथार्थ के दो स्तरों से जुड़ती है। पहला है हमारे भीतर और बाहर पसरा हुआ अनंत दुखों का रेगिस्तानी विस्तार और दूसरा है आस्था के चमकते ध्रुव का प्रकाशवृत्त। ये दोनों विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कवितआंे में ताने-बाने की तरह हैं, जो दुख का सही अनुभव कर सकता है, वही जीवन की वास्तविकता का आस्वादन भी कर सकता है।” इसी प्रसंग में कुंदन माली के विचारों को भी उद्धृत किया जा सकता है। वे अपने लेख ‘मानवीय गरिमा की संवेदनशील चिंता’ में लिखते हंै- “विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविता एक बेहतर और निरापद जीवन परिवेश के निर्माण के लिए आग्रहशील कविता है।“ वस्तुतः डाॅ. तिवारी ऐसे कवि हैं जिनका आदर्श जीवन दुखों को पार पाकर ही दिखता है।

पूरी पुस्तक में जगह-जगह सुरुचिपूर्ण ढंग से अलग-अलग समय, गतिविधियों, लोगों और स्थानों पर लिए गए तिवारी जी के छायाचित्र भी दिए गए हैं। देश-विदेश की यात्राओं और साहित्यिक सरोकारों के चित्र इस दस्तावेज को रोचक और महत्त्चपूर्ण बनाते हैं। ये चित्र एक साथ न देकर अलग-अलग पृष्ठों पर प्रसंगानुसार दिए गए हैं, या फिर बचे हुए स्थान को ठीक से भरने के लिए दिए गए हैं। दोनों ही स्थितियों में ऐसे चित्र व्यक्ति केंद्रित अंक के लिए आवश्यक होते हैं। हाँ, परंपरा के अनुसार ही अंत में डाॅ. तिवारी का जीवनवृत्त विस्तार में दिया गया है, जिससे उनके रचना संसार की पूरी जानकारी मिलती है।

संदेह नहीं कि ‘अभिनव इमरोज’ के इस दस्तावेज में डाॅ. तिवारी के साथ पूरा न्याय करने का प्रयास किया गया है। देवेंद्र कुमार बहल जी का साहित्यिक समर्पण वैसे भी रेखांकित करने योग्य है, किंतु यहाँ तो लगता है कि उन्होंने कोई कसर छोड़ी ही नहीं है। प्रशंसा करनी होगी इसके संपादक डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ की भी जिन्होंने साक्षात्कार से लेकर रचनाओं के चयन, लेखकों से डाॅ. तिवारी के विविध आयामों पर अच्छे लेख लिखवाने और अंततः उसे इस वृहदाकार ग्रंथ को भौतिक स्वरूप देने में बहुत मन से काम किया है। इतने बड़े अंक को निकालने मंे आर्थिक एवं दूसरे प्रकार के कितने पापड़ बेलने पड़े होंगे, यह तो प्रबंध संपादक देवेंद्र बहल जी और संपादक चमोला जी ही जानते होेगें। हाँ, इतना अवश्य कहना है कि व्यक्ति विशेष पर आश्रित यह दस्तावेज ‘दस्तावेज’ के संपादक के साहित्यिक अवदानों का पक्का दस्तावेज जरूर है।

पुस्तक: व्यक्ति विशेष दस्तावेज- 2 

(अभिनव इमरोज का डाॅ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पर विशेष प्रकाशन)

प्रबंध संपादक: देवेंद्र कुमार बहल, संपादक: डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’, प्रकाशक: सभ्या प्रकाशन

पृष्ठ: 430 (बड़ा साइज, सजिल्द)  मूल्य: 850/

समीक्षक संपर्क: वसंतकुंज एन्क्लेव (बी-ब्लाॅक), नई दिल्ली, मोबाइल: 9654030701

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परख

अलहदा-सा कुछ

श्री अशोक गुजराती, समी. संपर्क: अशोक गुजराती, महाराष्ट्र., मो. 9971744164, ई-मेलः ashokgujarati07@gmail.com

श्री राजेन्द्र नागदेव

वय बढ़ने के साथ व्यक्ति अंतर्मुखी होता चला जाता है। और क्यों न हो.. इतना दीर्घ जीवन उसकी पलकों के पीछे छिपा हुआ है। वह दृश्य-रूप लेकर उसके मुख़ातिब चाहे-अनचाहे आ जाना कोई अप्रत्याशित तो नहीं। वह क़तई अतीत-जीवी नहीं है, वर्तमान के प्रति सचेत है, सक्रिय है परन्तु वे पल-छिन, जो उसके आरपार होते रहे हैं, उनका भी हक़ बनता है उस पर। अधिकतर वह बैठे-ठाले तुलना करने से स्वयं को रोक नहीं पाता, जब वह अपने इस समय में कुछ अलहदा-सा महसूस करता है।

यानी वह एक प्रकार से मौजूदा वक़्त की समीक्षा करता हुआ कभी गुज़ारे अलग-से दिनों में पहुंच जाता है। ऐसे में उसकी उपस्थिति दोनों स्थानों पर होती है। हाल-फ़िलहाल फैलती अथवा फैलायी जा रही साम्प्रदायिक, धार्मिक, जातीय वैमनस्यता देख वह विचलित हो रहा है, दुखी हो रहा है और अतीत की विलोमित अनुभूतियों से दो-चार होने को विवश है।

राजेन्द्र नागदेव की कविता के स्वर इन्हीं कशमकश की स्थितियों से उपजे हैं। उन्होंने अपनी एक कविता में रेखांकित किया भी है- ‘मैं कभी अतीत हो जाता हूं, कभी वर्तमान/किस पल क्या होऊंगा, मुझे नहीं पता/उस रवानगी, फिर वापसी में मेरी इच्छा कहीं नहीं होती/मैं अवश हूं’। वे नेपथ्य (भूमिका) में लिखते  हैं- ‘हर रचनाकार के जीवन में वह समय आता है जब सामान्य कार्य-व्यापारों से मुक्त होकर वह अपने विषय में चिंतन-मनन की अवस्था में आ जाता है। अतीत उसके मानस-पटल पर फ़िल्म की तरह गुज़रने लगता है। वह स्मृतियों के दूसरे ही जगत में चला जाता है जहां से वापसी फिर कुछ कठिन होती है। इन कविताओं में मेरा वह वैयक्तिक संसार भी है। आज के मेरे कविता≤ में वह समय अक्सर ज़िद्दी बालक की तरह हस्तक्षेप करता रहता है।’

राजेन्द्र नागदेव के संग्रह ‘घूप में अलाव-सी सुलग रही रेत पर’ की सभी कविताएं अपनी ओर खींचती हैं। किससे शुरू करूं इस दुविधा को ताक़ पर रखते हुए मैं पहली कविता से ही प्रारंभ करता हूं। उस कविता का शीर्षक है- ‘यायावर’। इसमें प्रवासी पक्षी को बबूल के कंटीले कांधे पर बैठे देख उनको लगता है कि वह अपने पंजों से, चोंच से उनके मन-मस्तिष्क पर प्रश्न खरोंच रहा है। वे कहते हैं- ‘यायावरी/गमन-आगमन नहीं केवल/बहुत कुछ अदृश्य भी है उसमें’। क्या उस पंछी को तरल दर्पण में अपने पितरों का बिंब दिखाई दिया होगा..। कवि के अंदर घुल रही है यायावर की आत्मा- ‘मैं अतीत के धुंध-भरे आकाश में उड़ने को आकुल-व्याकुल/अपने पुरखों की खोज में निकल रहा हूं/मुझे धुंधला-सा इतना ही स्मरण है/उनके आशियाने/चिकनी शाखाओं पर नहीं/कांटों वाले बबूल पर थे’।

‘स्मृतियां मरती नहीं’ कविता में रक्त-रंजित अतीत की याद करते हुए वे कहते हैं- ‘हम कल कहीं खड़े थे ऐसी जगह जहां हमें नहीं होना था/आज और भी आगे निकल कर उस आकाश में चले गये हैं/जहां श्वेत कपोतों की उड़ानें निषिद्ध हैं/और बुद्ध के लिए जगह नहीं है’। इसके पश्चात वे अपने बचपन में गंभीर बीमारी से जूझने का मार्मिक वर्णन करते हैं। वे उस दर्दनाक अनुभव को भुला नहीं पाते- ‘मुझे लगता है/स्मृतियां यदि मर जाएं/उनका समाधि-लेख कुछ ऐसा होगा/-यहां स्मृतियां सो रही हैं/स्मृतियां कभी मरती नहीं/स्मृतियां आत्महत्या भी करती नहीं’। 

‘बस्ती पर बुलडोज़र’ में गिरायी जा रही इमारत के मलबे में कइयों के दबे होने की आशंका से ग्रस्त हो वे लिखते हैं- ‘देह का मरना केवल आदमी का मरना नहीं होता/आदमी का मरना/टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ बने सपनों का मरना भी होता है’। आये दिन हो रहे इस विनाश को अदालत की सहमति भी मिल जाती है। क्या गिराने के बजाय दंड का प्रावधान कर उसे नियमित कर लेना, यदि औरों को तकलीफ़ न दे रही हो, उचित नहीं लगता..। उसे पहले कैसे अनुमति दी गयी या उधर बेध्यानी जानबूझकर की गयी थी?..

शहर अपनी सीमाएं लांघकर जंगल अथवा खेती की ज़मीनों को हड़प रहा है। इस चिन्ता को वे केंद्रित करते हैं ‘दिन: कुछ रेखाचित्र’ में’..। ‘शहर बाहर फैलकर/अंदर इतना सिकुड़ गया है आदमी के मन की तरह/कि, वृक्षों के लिए जगह नहीं बची/वे सिर्फ़ बोन्साई बन रह सकते हैं/जड़ों पर जल पिलाते देखता हूं इधर-उधर/दो पांवों पर चलते-फिरते बोन्साई ही बोन्साई!’। उन्होंने अपनी कविता ‘मारा गया आदमी’ किसे समर्पित की है, देखें- ‘मन संवेदनशील हो तो समाज और राजनीति का भ्रष्ट चेहरा उसे व्यथित करता ही है और व्यथा शब्दों में अभिव्यक्ति पाने को बेचैन हो जाती है। अत्यंत कठिन है समय की धारा के विपरीत चलना, पर कुछ हैं जो इस धारा को मोड़ने की ज़िद करते हैं और इस प्रक्रिया में स्वयं को होम कर देते हैं। यह कविता ऐसी ही आत्माओं को समर्पित है.’

‘अंधे की लाठी’ बना बच्चा अंधे को रास्ता पार कराने के बाद- ‘बच्चा उस समय/शाला के किसी कक्ष में/शब्दों के हिज्जे सीख रहा होता है/और रंग, धर्म, जातियां/हिज्जों में घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे होते हैं’। ‘कवि और कविता’ में राजेन्द्र जी का पसोपेश झलकता है कि नून-तेल की फ़िक्र करे या कविता लिखे। ‘अस्पताल के बाहर’ फेंक दिये गये एक अति रोगी शख़्स को कुत्ते भंभोड़ रहे हैं और दर्शक मौन साधे तमाशाई बने हुए हैं। अस्पताल का निर्णायक ‘सफ़र’ कर रहा मित्र लगभग सभी निकटस्थों के प्रति निरपेक्ष हो गया है क्योंकि ‘अंतिम समय के सिकुड़े हुए दायरे में/सबके लिए जगह नहीं होती’। ‘लहूलुहान पगडंडियाँ’ में कवि बेसब्र हैं कि कैसे वह आनेवाली पीढ़ी के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत कर पायेगा जबकि ‘हम इन्द्रधनुष को चीर कर/रंगों को कर रहे हैं अलग...’।

‘मशीन पर लड़का’ ख़ुद मशीन बन गया है। इतना कि अपने संबंधों की दुनिया को भी बिसराने को मजबूर है। ‘हिरण जीवन’ एक हृदय-स्पर्शी कविता है जिसमें मरुस्थल में दौड़ रहे मरीचिका से भ्रमित प्यासे हिरण की उपमा जीवन को दी गयी है। कंकरीट और इस्पात के जंगलों से सघन नगर से चिड़ियां नदारद होती जा रही हैं, मानव के इस अतिक्रमण के लिए नागदेव जी ‘प्रायश्चित’ करते हैं। वे चित्रकार भी हैं। ‘स्टूडियो में बिल्ली’ में वे बिल्ली को कैनवास पर उतार कर उत्सव मना रहे हैं कि, ‘कला का संसार/कल्पना के ताने-बाने से बुना होता है’ इसीलिए मुंडेर पर बैठी बिल्ली अनायास उनके पास आकर तूलिका से साकार हो गयी। ‘कोलाज का आत्मकथ्य’ में वे स्वयं को टुकड़ों-टुकड़ों से रचित एक चित्र की तरह देखते हैं, जिसका व्यक्तित्व खण्डित ही रहा आया सदा। 

अक्सर ही नेता अपने लाव-लश्कर के साथ आम जनता के लिए रास्ते बंद करवा कर निकलते हैं। अटकी हुई एम्बुलेंस में चाहे किसीका दम उखड़ जाये। ‘महामहिम रुक गये हैं’ कविता में राजेन्द्र जी इसके विपरीत देखते हैं कि नेता का लावाजमा ऐसे में अचानक रुक गया है और मरीज़ की जान बच गयी है..। असल में वे सपने में थे। ‘नदी रो रही है/और आखों में आंसू नहीं हैं’ और ‘नदी जब सूखती है/पूरा समय सूख जाता है’ -ये ‘सूखी नदी’ की पंक्तियां दर्शा रही हैं देश की नदियों की हालत, जिसके उत्तरदायी निश्चित ही हम हैं। ‘दरबार में’ कविता अनीश्वरवाद को स्पर्श करती चली गयी है- ‘उसने सोचा, जिसकी तलाश है/उसके दर्शन खुली आंखों से नहीं हो सकते/खुली आंखों से क्योंकि वही दिखता है/जो हो/जिसका होना ही संदेह से परे नहीं/उसके लिए सपने में चले जाना/या फिर अंधा हो जाना बहुत ज़रूरी है/अचानक उसे महसूस हुआ/उसके आसपास अंधों की बहुत बड़ी भीड़ है’।

‘बरामदा’ कविता में तहस-नहस की वह ध्वनि है, जो विकास के नाम पर हमें सौंपी जा रही है..। ‘बूढ़ा ही ग़लत समय में/अपनी पाठशाला ढूंढने निकला था’ क्योंकि अब वहां कपड़ों-क्राकरी की दुकानें शान से चल रही हैं। उनकी कविता ‘ढलान’ का मर्म है- ‘उम्र की ढलान पर यात्राएं/सपनों-इच्छाओं में रहती हैं कहीं/मर चुके घुटनों/थके हुए पांवों में नहीं’। अपनी बितायी ख़ुशहाल ज़िन्दगी जब कगार पर आ पहुंचती है तो ‘एक दिन/हवा में घुल जायेगा/जीवन का उत्सव/छोड़कर अपने भग्नावशेष/इसी तरह 

धीरे-धीरे स्मृति से/ख़ारिज कर दिये जाने के लिए’। ‘उत्सव के खण्डहर’ की इन पंक्तियों से नैराश्य ज़रूर टपकता है लेकिन यही अटल सत्य भी है।

एक और ख़ासियत है राजेन्द्र नागदेव जी की- वे कविता के बीच-बीच में कोई बेहद गहन टिप्पणी या कटाक्ष कर देते हैं। परिणामतः कविता की श्रेष्ठता कई गुना बढ़ जाती है। मसलन, ‘सूरज मुझसे पहले बिस्तर छोड़/बबूल की डाल पर बैठा है’; ‘बच्चे ने अभी/धर्म, जाति, रंग, स्पश्र्य, अस्पश्र्य/शब्दों का ककहरा पढ़ा तो है/अर्थ पचा नहीं पाया/वह आदमी को अब तक आदमी समझता है’; ‘स्वप्न यथार्थ से अधिक मोहक/और मादक होता है’; ‘खण्डहर की दीवार से टिका/प्लास्टिक की गुड़िया का सिर/क्या कोई बच्ची खेली थी यहां!’; ‘मरे हुए पानी से भरी/कई जोड़ी आंखें हैं आसपास’; ‘हवा की आंखें नहीं होतीं...बहती रहती है निर्भेद’; ‘सपनों का मर जाना सबसे ख़तरनाक होता है’; 

‘उधारी की आग/लौटानी ही होती है हर किसीको/एक दिन सूद के साथ’; ‘कुछ आश्वस्तियों की नींव नहीं होती’; ‘पीपल के पेड़ पर बैठी चुड़ैलें/चेहरे पर पत्तियों के मास्क पहने/दूर-दूर से ही बतिया रही हैं’; ‘हथेलियां भर-भर/यादों की छोटी-छोटी मछलियों से भरा जल उलीचते हैं’; ‘दुनिया की नदी के किनारे पत्थर पर बैठा वह/पानी पर लिख रहा है अपना नाम’; ‘उत्सव के बाद भी/कुछ पलों तक रह जाते हैं हवा में उत्सव के खण्डहर’ इत्यादि।

कुल मिलाकर इस संग्रह की अधिकांश कविताएं पुरानी यादों को संजोती हैं। इसी के साथ आज के पतनोन्मुख परिदृश्य की विडम्बनाएं कवि को बेकल करती हैं। इससे पूर्व भी राजेन्द्र नागदेव के कविता संग्रह प्रकाशित एवं प्रशंसित होते रहे हैं। पूरी उम्मीद है कि यह संग्रह उनसे एक क़दम आगे बढ़ाते हुए पाठकों को झकझोरने में सक्षम सिद्ध होगा।

पुस्तक: धूप में अलाव-सी सुलगती रेत पर, विधा : कविता, कवि : राजेन्द्र नागदेव, मूल्य : एक सौ पचास रुपए, प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर, 




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प्रसंगवश

आशुतोष आशु ‘निःशब्द’, सत्कीर्ति-निकेतन, गुलेर, काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश, मो. 9418049070, ईमेलः  guleri.ashutosh@gmail.com   

आधुनिकवाद का भक्तिकाल और उसकी प्रासंगिकता

पिछले कल एक मित्र से यूँ ही चर्चा का दौर चल निकला। रूस और युक्रैन के बीच जंगी माहौल की पृष्ठभूमि पर राष्ट्रभक्ति जैसे जटिल विषय पर परस्पर संभाषण होने लगा। हँसते हुए मित्र ने मुझे चिकोटी काटी - “हाँ, आप तो राष्ट्रभक्ति पर बात करेंगे ही, दक्षिणपंथी जो ठहरे आप!” 

मैं खिलखिला कर हंस दिया। सदियों से मेरा पाला पोसा पंथनिरपेक्षता का दम्भ एक झटके में टूट कर बिखर चुका था। त्वरित प्रतिक्रियावश मेरे मुख से एक प्रश्न छूटा - “भाई सा’ब, मैंने ऐसा क्या कह-बोल दिया कि आप मुझे दक्षिणपंथी बूझे जाते हैं?” फिर अपने ही सवाल का जवाब भी मुझे स्वयमेव मिल गया। संस्कृति, सभ्यता और भारतीय दर्शनशास्त्रों पर बहुतायत में लिखता रहा हूँ, शायद इसलिए पुरातनता का लिहाफ़ ओढ़े हुए मेरी छवि उनकी नजर में दक्षिणपंथी सिद्ध हो रही थी।      

यही कारण हो तो मुझे आपत्ति नहीं। वेद पढ़ने और उनपर लिखते रहने की वजह से यदि मेरी छवि दकियानूसी विचारधारा की बनती हो तो मुझे प्रसन्नता ही है। अन्यथा मेरा प्रयास इतिहास के वातायन से समसामयिक शिक्षा के व्यावहारिक पृष्ठों को खोलकर समाज के सामने रखने तक ही सीमित था। वह भी इसलिए कि कहीं प्रगति के अंधानुकरण में हम और हमारी पीढ़ियां स्वयं से अनभिज्ञ न रह जाएँ।    

हमारी चर्चाओं की विशेषता केवल इतनी है कि हम विचारों की निजता से आसक्त होकर चर्चा नहीं करते। मंतव्य स्पष्ट होते ही चर्चा आगे बढ़ चली। और हम राष्ट्रभक्ति के मद में चूर, यूक्रैन के राष्ट्रपति, ज़ेलिंस्की की नेतृत्वशैली पर चर्चा करने लगे। रूस और उक्रैन के बीच वैचारिक मतभेद इतना बढ़ चुका है कि सामरिक हितों की सुरक्षा के नाम पर रूस समस्त सीमाओं को लाँघकर यूक्रैन से जा भिड़ा। 

कारण जो भी रहे हों, युद्ध को किसी भी दृष्टिकोण से जायज नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे ही कुछ बिंदुओं पर विचार-विमर्श हुआ और  चाय की चुस्कियां खत्म होते ही हम अपने-अपने रास्ते हो लिए। ऐसी विचारोत्तेजक चर्चाएं मुझे बेहद प्रिय हैं। इस चर्चा ने भी मेरे मस्तिष्क को वही खुराक पहुंचाई, जिसके दम पर मैं अक्सर कलम घिसने को विवश हो जाता हूँ। 

रूस-युक्रैन संघर्ष के समानांतर एक और चर्चा उभर कर सामने आयी। वह थी युक्रेनियन राष्ट्रपति ज़ेलिंस्की की राष्ट्रभक्ति। समस्त खतरों को झेलते हुए वह धीवर अभी भी देश में डटा हुआ है। शायद यह प्रशंसायोग्य निर्णय है! परन्तु देश के जान और माल का नुक्सान हो जाने के बाद भी ऐसे डटे रहने का कोई विशेष कारण ज़ेलिंस्की के पास निश्चित ही होगा। 

राष्ट्रभक्ति का नाम सुनकर मैं अक्सर असमंजस में पड़ जाता हूँ। भले अधिकतर लोग मुझसे सहमत न हों, परन्तु मेरे विचार में ‘भक्ति’ नामक साधना को अपर भौतिक विषयों से जोड़ देना, और फिर उसमें यथार्थवाद का दुराग्रह प्रस्तुत करना, यह मानवता के लिए एक बड़ी भूल सिद्ध होने वाली है। इस विचार के पक्ष में मेरे पास वैज्ञानिक तर्क तो नहीं हैं, परन्तु, जहाँ तक मैंने पढ़ा है, मैं केवल इतना जान पाया हूँ कि योग की चार विशिष्ट विधाओं में से ‘भक्ति’ एक है; ज्ञान, कर्म और राज अन्य तीन योग हैं। 

आप सोच रहे होंगे कि मैं कटाक्ष कर रहा हूँ। परन्तु नहीं...  सच मानिये कि मैं इस विषय पर बेहद गंभीर हूँ। ‘भक्ति’, यह शब्द वास्तव में योग के सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है। और योग की समस्त विधाएँ केवल परमचेतना को प्राप्त करने का साधनभूत अंग हैं। भक्ति भी उसी कैवल्यमार्ग का अनुसरण करती है जिस पथ को राजयोग अपने तरीकों से प्रशस्त करता है। योग में भौतिकता का कोई स्थान नहीं। अब विचार करिये कि क्या भक्ति को राष्ट्र के साथ जोड़कर देखा जा सकता है क्या? 

जब उस भक्ति नामक योग को हम राष्ट्र से जोड़कर देखने का प्रयास करते हैं तो वहाँ हमें कैवल्यता के दर्शन नहीं होते। प्रत्युत हम अपने आप को केवल भौतिक दुर्गुणों से घिरा हुआ पाते हैं। देश की सुरक्षा में संघर्षरत हम शत्रुओं से भी दो-चार हो रहे होते हैं। राष्ट्रभक्ति के नाम पर हम आत्मसमर्पण नहीं करना चाहते। जबकि ‘भक्ति’ के भाव में समर्पण ही मूल है। और समर्पण भी ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि वह समर्पण जो परीक्षा की पराकाष्ठा होने पर भी टूटने न पाए। और ऐसा समर्पणभाव राष्ट्र के साथ जुड़ने पर उसके मायने ही परिवर्तित हो जाते हैं।      

इसलिए प्रथमदृष्टया मुझे राष्ट्रभक्ति के सिद्धांत से विशेष परहेज है। राष्ट्रभक्ति ही नहीं, प्रत्युत व्यक्तिपरक भक्ति के प्रति भी मैं अपने विचार आरक्षित रखता हूँ। कारण स्पष्ट है, कि वर्तमान भक्तिवाद की विचारधारा में पारम्परिक समर्पण की संपूर्णता का सर्वथा अभाव है। 

किसी ने यदि भक्तियोग (वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भक्तिवाद) का गहनता से अध्ययन किया हो तो वह मेरे विचार से आंशिक सहमत अवश्य होगा। 

पारम्परिक भक्तिवाद निर्विकार इच्छित संभावना के प्रति समर्पित होना सिखाता है। संभावना कहने का अभिप्राय भी स्पष्ट रहे, कि हमारी आस्था उस निर्विकार ईश्वर की मूर्तिमय संभावना का ही अनुगमन कर रही होती है। भक्तिवाद का यह सिद्धांत अनेक मायनों में वैज्ञानिक कहा जा सकता है। 

मूर्ति वास्तव में निर्जीव होकर भी भक्तिमय उपासना की आत्मीयता से सजीव हो उठती है। भक्त अपनी ही आत्मा को मूर्ति के दर्पण देखना आरंभ करता है। निजसंकल्पों के सीमित दृष्टिकोण से बाधित होकर भक्त का आरम्भिक अनुभव भले ही अस्पष्ट दिखे, परन्तु कालांतर में आस्था के चिरबलवान हो जाने पर भक्त की आत्मा मूर्तिमय और मूर्ति भक्तमय हो जाती है। 

भक्त को मूर्ति में कैवल्यता, और उस कैवल्यता में आत्मा की सम्पूर्णता का ज्ञान हो जाता है। चूंकि अंत में ज्ञान ही होता है, शायद इसीलिए वेदों में कहा गया कि ‘सम्पूर्णता प्राप्त करने के समस्त सांसारिक उद्योग अंततोगत्वा ज्ञान में ही समाहित हो जाते हैं।’ 

मैं इस दृष्टिकोण वैज्ञानिक इसलिए भी कहता हूँ क्योंकि पारम्परिक भक्तियोग/वाद में परीक्षण का अंतिम परिणाम काल के समस्त खण्डों में एकसमान बना रहता है। चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर, रामकृष्ण परमहंस, मीरा बाई, गोस्वामी तुलसीदास और अन्य अनेक ऐसे उदहारण हमारे समक्ष उपस्थित हैं जिन्होंने भक्तियोग के सहारे कैवल्यता को प्राप्त किया तथा संसार के सामने निष्काम भक्ति के उच्चतम सोपान स्थापित किए। जिस प्रकार विज्ञान में निरंतरता की अपेक्षा होती है, उसी प्रकार भक्तियोग भी निरंतरता की अपेक्षा रखता है। 

दूसरा कारण यह भी कि निर्जीव मूर्ति में नैतिक अवमूल्यन की संभावना नगण्य है। अतः वहाँ कैवल्यता-प्राप्ति के परीक्षण में प्राप्यभाव (हाइपोथेटिकल टार्गेट) स्थायी बना रहता है। क्योंकि मूर्ति के आचरण में भ्रष्टाचार उत्पन्न होने की कतई सम्भावना नहीं है, इसलिए जिज्ञासु/अभ्यर्थी/याचक/भक्त यह नहीं कह सकता कि प्राप्य के ही पदच्युत हो जाने के कारण उसका परीक्षण असफल रहा है। अतः पारम्परिक भक्तिवाद/योग, जिसका लक्ष्य केवल कैवल्यता प्राप्त करना है, वास्तव में वैज्ञानिक है।  

अब आधुनिक भक्तिवाद में ये सब प्रतिमान कितने व्यावहारिक एवं यथार्थपरक हैं, यह विचारणीय विषय है। 

राष्ट्रभक्ति की यदि बात करें तो वहाँ प्राप्य वास्तव में कभी स्थायीभाव से विद्यमान नहीं रहता। राष्ट्र की वर्तमान अवधारणा किसी स्थान की भौगोलिक सीमाओं की स्थिति पर आधारित है। और सर्वविदित है कि वैश्विक पारिस्थितिकी में किसी भी देश की सीमाएँ अनन्तकाल तक स्थायी नहीं रह सकतीं। वर्तमान स्थितियों में भी वे निरंतर परिवर्तनशील बनी हुई हैं। 

दूसरा, उन सीमाओं को सुरक्षित रखना भी अपने आप में एक दीर्घकालिक संघर्ष है। इस दृष्टिकोण से राष्ट्रभक्ति में प्राप्य का विचार स्वयं स्थायी नहीं रह सकता बशर्ते, हम एक ऐसी आदर्श सामूहिक वैश्विक जीवनप्रणाली को अपनाने पर एकमत हो जाएँ जो समस्त धर्मों को दरकिनार कर केवल मानवीय मूल्यों पर आधारित हो। यह बहुत दूर का स्वप्न है। और यदि ऐसा हुआ तो पुनः, राष्ट्रभक्ति का अस्तित्व ही शेष न रहेगा। 

फिर भी, ऐसा होने तक भी राष्ट्रभक्ति व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि भक्तिवाद के मार्ग पर भौतिकता को प्राप्य की श्रेणी में नहीं रखा गया है। जबकि राष्ट्रभक्ति में आसन्न प्राप्य, भौगोलिक सीमाओं में आबद्ध देश नामक वह परिकल्पना है जो स्वयं एक भौतिक वस्तु है। और उस भौतिक वस्तु को सुरक्षित बचाए रखने हेतु सतत संघर्ष अपेक्षित है। 

इसके विपरीत, भक्तिवाद में प्रापक और प्राप्य के बीच कभी संघर्ष की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। और न ही प्रापक की साधना के परिणामस्वरूप संसार का विनाश होता है। जबकि राष्ट्रभक्ति के नाम पर होने वाले भीषण नरसंहार कोई और ही कहानी बयान करते हैं। 

उधर व्यक्तिपरक भक्ति तो और अधिक भयावह प्रतीत होती है। दो कारण हैं। 

एक, जिसे अपनी पूजा करवानी है, सर्वप्रथम उसे निर्विकार (कायिक, वाचिक, मानसिक विकार रहित) होना होगा। उसे अपने भक्तों के समक्ष सदाचरण, सदाशयता, नैतिकता के उच्चतम निज प्रतिमान स्थापित करने होंगे। तथा वैश्विक उन्नति के दृष्टिगत उन स्वघोषित प्रतिमानों को सार्वकालिक-सार्वभौम सिद्ध करना होगा। साधारण मनुष्य के लिए कदाचित यह असंभव कार्य है। 

इस सबके विपरीत, इतिहास साक्षी है कि व्यक्तिपरक भक्ति ने सृष्टि की विनाशलीला रचने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। 

दूसरे, व्यक्तिपूजा में उद्योगरत भक्त के हृदय में कैवल्य प्राप्ति का भाव समाहित नहीं होता। और मैं व्यक्तिपूजा को इसलिए भी बेहद खतरनाक मानता हूँ क्योंकि वहाँ प्रापक और प्राप्य के बीच केवल भौतिक उपलब्धि ही एकमात्र मूल उद्देश्य स्थायी होता है। तथा अपेक्षित उपलब्धि प्राप्त न होने की स्थिति में ऐसी दुराग्रही भक्ति का दुष्परिणाम केवल दो लोगों तक सीमित नहीं रहता। प्रत्युत संपूर्ण समाज की हानि तय है। 

तो क्या हम देश या व्यक्ति से प्रेम ही न करें? वास्तव में मेरा अभिप्राय यह नहीं। 

मेरा मानना है कि जो धरा हमारा पालन पोषण करती है, जिसकी मिट्टी में गिर पड़कर हम चलना सीखते हैं, जिसके प्रश्रय में हम अभय रहते हैं, जिसका पथप्रदर्शन हमें यथार्थ प्रगतिशील बनाता है, वो फिर धरा हो, व्यक्ति हो, या फिर समूह- हमें उसके प्रति सदैव निष्ठावान होना चाहिए। आशा है कि हम निष्ठा का अर्थ जानते हैं। चिंता केवल इस बात की है कि वर्तमान में हमारी निष्ठा भी संशय के कटघरे में खड़ी है। कुल मिलाकर अंत में हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि कृपया ‘भक्ति’ को केवल योग के लिए ही सुरक्षित रखें। तथा व्यक्ति, समूह अथवा राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को सुदृढ़ बनाकर देश की प्रगति में यथेष्ट सहयोग करें। 

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रिपोर्ट

काला सोना: समाज का वास्तविक प्रतिबिम्ब

डॉ. रेनू यादव, फेकल्टी असोसिएट, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग (हिन्दी), गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा - 201312, ईमेल: renuyadav0584@gmail.com

19 जून 2022 को ‘आखर हिन्दी पत्रिका’ के फेसबुक पेज पर ‘साहित्य संध्या’ के प्रथम कड़ी में डॉ. रेनू यादव की कहानी-संग्रह ‘काला सोना’ पर परिचर्चा रखी गई। यह संग्रह 2022 में शिवना प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इस परिचर्चा में प्रमुख वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोड़ा, सुप्रसिद्ध आलोचक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शालिनी माथुर, सुप्रसिद्ध कवि एवं माटी पत्रिका के संपादक नरेन्द्र पुण्डरीक जी थे, संचालन प्रो. प्रतिभा मुद्लियार ने किया तथा टेक्निकल सपोर्ट डॉ. शोभना ने संभाला।

इस पुस्तक पर चर्चा करते हुए सुधा अरोड़ा ने अपने वक्तव्य में कहा कि “रेनू की यह बात सबसे अच्छी लगी कि बहुत पारदर्शी, सरल और विषय को बहुत तंज के साथ पकड़ने का कौशल तथा भाषा में बोली का प्रयोग बहुत खूबसूरती के साथ किया है। काला सोना स्त्री चेतना को जगाने वाली है”। सुप्रसिद्ध आलोचक शालिनी माथुर ने कहानियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि “आज कल समकालीन कहानियों के प्रतियोगिता के होड़ में पड़े बिना लेखिका कहानियों को पूरी सच्चाई के साथ अपनी पूरी कुरूपता, अपनी पूरी नग्नता के साथ सामने ले आयी हैं। हमें खुशी है कि वे ऐसी कहानियों को सामने ले आयी हैं जो वास्तव में समाज को प्रतिबिम्बित करें न कि नए ट्रेंड का हिस्सा बने”। कवि नरेन्द्र पुण्डरीक ने स्त्री चिंतन पर विचार करते हुए कहा कि “रेनू की एक कहानी में कई कईं कहानियाँ गुथी हैं। कई कहानियाँ तो अपने  में उपन्यास को समेटे हुये हैं। कहानियों की भाषा का ओज, बेलागपन और कहन की शैली मौलिक है। वह उनकी इतनी अपनी है कि कटु से कटु यथार्थ को सहज सम्प्रेषणीय बना देती है।  आज जहाँ पूँजी तेजी मानव संवेदनाओं को गड्डमड करने में लगीं हैं। ऐसे समय में रेनू यादव की समकालीन कथा जगत में बहुत ही जरुरी हस्तक्षेप हैं”।   

प्रो. प्रतिभा मुदलियार ने कहा कि रेनू की कहानियों की दो बात मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती है, पहला उसकी भाषा और दूसरा उसका कहन। भाषा में आंचलिकता की सोंधी महक है और कहन में एक साधारण स्त्री की आत्मा को तलाशती है जो भीतर की आवाज़ लेकर बाहर निकलती है”। लेखिका रेनू यादव ने खुद अपनी कहानियों पर बात करते हुए कहा कि यदि इन कहानियों को पढ़कर एक भी व्यक्ति को, एक भी स्त्री को अपनी स्थिति का भान हो जाए और वह अपनी नियति बदलने की कोशिश करता है या करती है तो मैं समझती हूँ कि मेरा लेखन सफल हो जायेगा”। यह कार्यक्रम आखर पत्रिका के कार्यकारी सदस्य डॉ. शोभना के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। 



समीक्षा

रेत की मछली

पुस्तक - रेत की मछली

लेखक - कान्ता भारती

विधा - आत्मकथात्मक उपन्यास

संस्करण - 2012

प्रकाशन -  लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद

कभी कभी पीड़ा और जीवन में अंतर नहीं रह जाता।  अत्यधिक मोह में रहने वाली स्त्री लगातार पीड़ा सहते हुए पीड़ा में ही जीवित रहना पसंद करने लगती है।  उसे यह भूल जाता है कि उसका भी अपना कोई अस्तित्व है, वह सर्वस्व समर्पण के पश्चात् भी उस व्यक्ति को प्राप्त नहीं कर पाती जिसे वह प्यार करती है। ऐसी ही कहानी है धर्मवीर भारती की पहली पत्नी कान्ता भारती के इस आत्मकथात्मक उपन्यास की।  यह आत्मकथात्मक उपन्यास सुधा और चंदर के प्रेम को कालजयी बनाने वाले धर्मवीर भारती के अछूते एवं अप्रकाशित व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने वाली कथा मानी जाती है।  

स्त्री उपेक्षिता पुस्तक के अनुसार “मिसीलेट कहती हैं कि यह दुःख का विषय है कि पुरूष पर आश्रित रहकर जोड़े के रूप में ही अपने अस्तित्व को सार्थक कर पाने वाली स्त्री अपने को पुरूष से अधिक अकेला पाती है”। यह कथन कान्ता भारती की पात्र कुन्तल पर अक्षरशः सटिक बैठती है। जिस प्रेम के लिए घर वालों का विरोध कर कुन्तल और शोभन ने एक दूसरे का साहचर्य पाया था उसी शोभन का प्रेम और दैहिक जरूरतों का केन्द्र मुँहबोली बहन मीनल बन जाती है। मीनल के प्रेम में पड़े शोभन के लिए कुन्तल से किया हुआ व्यक्तिगत और सामाजिक प्रतिबद्धता का सूचक शब्द ज़िन्दगी भर साथ रहने का वादा एक छद्म बनकर रह जाता है और प्रेम में खोयी अस्तित्वविहिन कुन्तल टूट कर भी न टूटने वाले रिश्ते को बचाने की खातिर हर दिन मर मर कर जीती है।

हैरानी की बात है कि यौन-पिपाशु पति की हरकत एक बात गलती से देखा जा सकता है, दूसरी बार जानबूझ कर हो सकता है लेकिन तीसरी बार कोई बाध्य नहीं कर सकता और कुन्तल यह सब देखने के लिए बार-बार बाध्य है। विश्वास डगमगाते ही रिश्ते की नींव हिल जाती है और कुंतल रिश्ते के लिए विश्वास ही नहीं आत्मसम्मान को भी दाव पर लगा देती है।  लेखिका के शब्दों में ही कहें तो ‘जंगली लतर को उखाड़ कर फेंका जा सकता है पर जीवन में आयी मीनल जैसी जंगली लतर को फेंकना आसान नहीं’। 

यदि कुन्तल जंगली लतर को उखाड़ नहीं सकती थी, तो भी अनंत अचूक पीड़ा से स्वयं को बचा सकती थी।  यह मजबूरी ना समझ में आने वाली है कि शोभन और मीनल के एकात्म होने की इच्छा और साजिश को समझते हुए तथा अपना सहभागी न बनने की इच्छा और अवस्था में भी कौन सी ऐसी विवशता थी जो जड़ बने रहने के लिए बाध्य करती है ? कोई भी परिस्थिति मनुष्य के स्वाभिमान से बड़ा नहीं हो सकता, लेकिन स्वाभिमान के बार बार कुचले जाने की स्थिति में वह क्या था जिसे बचाने की वह कोशिश कर रही थी ? क्यों हम उस स्थिति का इंतज़ार कर रहे होते हैं कि सामने वाला हमें बुरी तरह से निचोड़ कर फेंक दे अथवा हम खुद ब खुद स्वयं को फिकवाने का इंतज़ार कर रहे हों ?

कुछ तो बचा रहने देती अपने अंदर जो जीने का कारण बन पाता... इसमें बेटी की क्या गलती थी कि जिस पति और उसकी प्रेमिका पर भरोसा न था उसके पास अपनी ममता को छोड़ आयी... क्या बेटी वह आखिरी हथियार थी जिसके बहाने पुनः अपने रिश्ते को वापस पाने की इच्छा थी ?

इस उपन्यास में ‘गुनाहों के देवता’ के गुनाह का चित्रण हो अथवा काल्पनिक, सर्वथा शोषण का उत्कर्ष से अधिक स्वयं का शोषण करवाए जाने का उत्कर्ष है, वह भी तब जब स्त्री पढ़ी लिखी हो। लेकिन ऐसा शोषण तभी संभव है जब स्त्री मोह के जाल में फँसकर स्वयं जल रही हो और जलती रेत में तड़फड़ाते हुए प्राण निकलने की प्रतीक्षा कर रही हो किंतु प्राण निकल न पा रहे हों। भोक्ता की व्यथा सदैव दूसरे के लिए सहानुभूति का कारण हो सकता है किंतु पीड़ा के उत्कर्ष तक पहुँचना असंभव होता है। यह उपन्यास कला की दृष्टि से कमज़ोर हो सकता है लेकिन भावनात्मक दृष्टि से पीड़ा के उस बहाव में ले जाती है जहाँ मन विषाक्त हो जाता है और पाठक भी मछली के साथ-साथ तड़फड़ाने लगता है। 

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लेख

डाॅ. रानू मुखर्जी, बड़ोदा, मो. 9825788781, E-MAIL : ranumukharji@yahoo.co.in


‘गिरीश कर्नाड ने नाटक विधा को
उसकी समग्रता में साधा है’

भारतीय साहित्येतिहास में साहित्य की अनेक विधाएँ विकसित हुई हैं। अन्य साहित्यिक विधाओ की अपेक्षा  नाटक का अपना एक अलग स्वरूप है। नाटक समाज के परिवर्तनों का चित्र समाज को दिखाता है। यह समाज के बदलते स्वरूप को उसकी सर्जनात्मकता संभावनाओं के साथ प्रस्तुत करता है।

गिरीश कर्नाड कन्नड के महत्वपूर्ण लेखक थे। साहित्य के अलग अलग क्षेत्रों में सक्रिय रहनेवाले श्रेष्ठ लेखकों के साथ यदि उनकी तुलना की जाए तो नाटक की विधा में उनका योगदान अन्यतम है ।कन्नड नाटकों के इतिहास में पहलीबार उन्होंने नाटक विधा को उसकी समग्रता में साधा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कई विवरणों सहित नाटक के ‘‘काव्यात्मक’’ सौन्दर्य को ‘‘तुगलक’’ और ‘‘हयवदन’’ में दर्शाया है।

नाटक को एक नया और बड़ा फलक देने में गिरीश जी ने अपार सफलता पाई है । संभवतः शुरूआत के दिनों में उनका रूझान काव्य की ओर था परन्तु बाद में नाटक देखने, लिखने और करने में उनकी रूचि बढ गई।

गिरीश कर्नाड (19 मई 1938-10 जून 2019) एक जानेमाने समकालीन लेखक, एक सशक्त नाटककार, कथाकार और फिल्म निर्देशक थे। वे कन्नड और अंग्रेजी दोनों भाषाओं मे समानाधिकार लिखते थे। उनका बचपन शिरसी में बीता। उनके पिता बंबई मेडिकल सर्विस के डाक्टर थे। वहां रहना उनके लिए एक अद्भुत अनुभव रहा। नाटक कंपनी आती तो शो देखने के लिए पास मिलते थे। मलेरिया से बिमार कंपनी के लोग दवाई के लिए उनके पिता के पास आते और कलाकारों से गिरीश जी का परिचय हो जाता था। शिरसी में रहते समय एक महत्वपूर्ण फायदा यह हुआ कि वहां बिजली नहीं थी और दो सिनेमाघरों में ढेर सारे नाटक खेले जाते थे। वही के हव्याक ब्राह्मण मौका मिलते ही नाटक खेलते थे अतः बच्चों को स्त्री पात्रों का अभिनय करने के लिए बुलाते थे। वहां नाटक करने से जो अनुभव हुआ, वह एक अद्भुत अनुभव था। वहां एक और माहौल से गिरीश जी का परिचय हुआ वह था कहानी सुनाने का। हर कोई हर किसी को कहानी सुनाता था। इस प्रकार से कहानी कहने की एक लोकप्रिय संस्कृति के बीच गिरीश बडे हुए और गिरीश जी में नाटक देखने का शौक पनपा (रस प्रसंग - पृ - 71 - 72 )। गिरीश कम्पनी नाटकों से अधिक प्रभावित थे। पारसी स्टाईल के कंपनी नाटक। धारवाड में उनके छः वर्ष के निवास के वक्त वे मराठी नाटककारों के संपर्क में आए। धारवाड में लगातार नाटक खेले जाते थे। इस प्रकार से थियेटर से उनका संपर्क और गहरा गया।

गिरीश कर्नाड आर्ट फिल्म के अभिनेता, दिग्दर्शन के रूप में जाने जाते हैं। अनेक संस्थाओं से जुड़ने के बाद फिर वहाँ से निकल गए। एक अस्थिरता एक उद्वेग उनके जीवन को घेरे रहा (नाट्यनान्दी - पृ 101)। 30 वर्ष की उम्र में लिखा ‘‘ययाति’‘ उनका पहला नाटक था। बहुत ही चर्चित नाटक रहा। परन्तु इस नाटक की ओर लोगों का ध्यान काफी बाद में गया। गिरीश जी कहते हैं , ‘मुझे ऐसा लगा कन्नड में लिखने से कोई लाभ नहीं। कोई नाटक नहीं करता है।‘ उनके विचार से ‘‘ययाति’’ जैसे नाटक में एक ‘‘इनस्टिक्टिव स्ट्रकचरिंग’‘ दिखाई देती है वह उनकी किसी अन्य फिल्म में नहीं दिखाई देती है। गिरीश जी कहते हैं, ‘ ‘‘ययाति’’ में चित्रलेखा के चित्रण में जो सफलता मुझे इक्कीसवें वर्ष में मिली उसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है।‘

मूलतः कन्नड भाषा में रचित ‘हयवदन‘ नाटक, स्त्री-पुरूष संबंधों की त्रासदी, अधूरेपन, बिखराव एवं त्रिकोण प्रेम को लेकर गिरीश कर्नाड जी ने एक महत्वपूर्ण नाटक रचा है। रचनात्मकता, कथावस्तु तथा शिल्प की दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण नाटक है। अपनी लोकप्रियता के कारण यह नाटक केवल भारतीय ही नही अनेक विदेशी भाषाओं में भी अनुदित हो चुका है। गिरीश कर्नाड ने ‘हयवदन‘ में मिथक, पौराणिक कथा, लोककथा, मनोविज्ञान को एक साथ मिलाकर आधुनिक मानवीय जीवन के संबंधों एवं प्रेम रहस्य को अति गम्भीरता से समझाने का प्रयास किया है। नाटक की नायिका पद्मिनी दो पुरूषों से प्रेम करती है। वह अपने पति देवदत्त की सौम्यता, विद्ववता कुलश्रेष्ठता एवं सम्पन्नता का मोह नहीं छोड़ पाती है और न ही कपिल के सुगठित, फुर्तीले और साँवले शरीर से आकृष्ट बिना ही रह पाती है। एक ओर प्रेम का मोह और दूसरी ओर वासना की आकांक्षा। दोनो तरफ से अधूरापन।

(नाट्यशास्त्र - पृष्ठ 101) हयवदन में नाटककार ने अपनी तीक्षण चिंताधारा और बहुआयामी कल्पनाशीलता से नाटक में बेताल- पच्चीसी का कथा प्रसंग उठाकर नया प्रयोग किया है। देवदत्त और कपिल के सिरों की हेरा- फेरी, रोमांच और रहस्य पैदा करता है। जिससे दो नए चरित्र कपिलदेही- देवदत्त और देवदत्तदेही - कपिल उभरकर नाटक को अधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाते हैं। यहाँ पद्मिनी अपनी इच्छानुसार कपिलदेही - देवदत्त को पाकर क्षणिक सुख का अनुभव कर देवदत्तदेही - कपिल का तिरस्कार एवं उपेक्षा करती है - ‘ चलो , देवदत्त ! इस उज्जड से क्या उलझना ? यहाँ से चलें।‘ ( नटरंग - खंड-26 अंक - 105 पृष्ठ 96) यहाँ आधुनिक स्त्री के वासनापूर्ण जीवन, स्वार्थ, सामाजिक संघर्ष एवं रहस्यमय चरित्र की अभिव्यक्ति होती है।

पारंपरिक एवं सामाजिक बंधनों को तोड़कर नारी अपनी इच्छानुसार अपनी शर्तों पर जीवन जीने की कोशिश करती है।

गिरीश कर्नाड परंपरा और आधुनिकता से बारबार टकराते हैं। इस नाटक में प्राचीन काल से चली आ रही देवी-देवताओं के प्रति आस्था धीरे-धीरे टूटती है।

नाटककार एक और बात स्पष्ट करना चाहता है वो यह कि एक - दूसरे का सर काटते हुए भी अपना ही सर काट रहें है, क्योकि तबतक सिरों की हेरा फेरी हो गई होती है। यह आज के सामाजिक जीवन का कटु यथार्थ है। आज का मनुष्य थोडी सी सुविधा के लिए दूसरों को हानि पहुंचाकर परोक्ष रूप से अपना ही नुकसान करता है। पूरे नाटक में दो संस्कृतियों की टकराहट है, स्त्री पुरूष संबंधों में टकराहट है, परंपरा और आधुनिकता की टकराहट है, मस्तिष्क और शरीर में टकराहट है, अंतर्मन और बाह्य जगत के बीच टकराहट है, विचारों और भावनाओं के बीच टकराहट तथा मनुष्य की विविध आन्तरिक गुत्थियां, सहज और मनोवैज्ञानिक ढंग से अभिव्यक्त हुई है ‘हयवदन‘ मेरा प्रिय नाटक है अतः मैंने इसपर विस्तृत रूप से लिखा है।

उन्नीसवीं सदी से ऐतिहासिक नाटक का लेखन भारतीय नाट्य-परंपरा का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। ऐतिहासिक नाटकों में बड़े पैमाने पर लम्बे, तेज-तर्रार ढंग से बोले गये संवादों की, दुस्साहसपूर्ण अभिनय की वेश भूषा की गुंजाइश रहती है। ये नाटक बीते युगों की स्मृति को जगाकर एक शौर्यपूर्ण वातावरण की रचना करते हैं। ‘तलेदंड‘ गिरीश कर्नाड जी की महत्वपूर्ण नाटकों मे से है। भारत की विशेष समस्या जातिप्रथा (cast-problem) को आधार बनाकर इसे रचा गया है। बसवण्णा नामक एक कवि और समाज सुधारक इस नाटक का केन्द्रीय चरित्र है। ई सन 1106 - 1168 के बीच मौजूद बसवण्णा को एक अल्पजीवी ‘वीरशैव संप्रदाय‘ का जनक माना जाता है। सन 1968 ई. से पहले के दो दशकों में कल्याण नगरी में हुई घटनाएं, कर्नाटक के इतिहास के लिए इस कालखंड में हुए चिंतक एवं द्रष्टा संत बसवण्णा ने कल्याण नगर में कवियों, कार्मिकों, रहस्यवादियों, दार्शनिकों को एक सूत्र में ऐसे पिरो लिया जैसे कभी कहीं एक स्थान पर न तो पहले हो पाया और न ही इसके बाद कभी हुआ। उन्होने देवता और आदमी सभी के बारे में संस्कृत छोड़ सामान्य भाषा में बात की। मूर्तिपूजा या मंदिर निर्माण का बहिष्कार किया। जो भी कुछ स्थावर था, जड़ था उसे छोड़कर मानव जीवन को ही प्रधान माना। जो गतिशील था उसे ही महत्व दिया। उन्होंने कठिन परिश्रम करके और समर्पित भाव से कार्य के सिद्धांत को स्थापित किया। नारी पुरूष की समानता पर बल दिया। जाति प्रथा का विरोध किया। इससे परंपरावादियों का भयंकर आक्रोश का सामना उनको करना पड़ा। और ‘‘शरणा आन्दोलन’’ आतंक और रक्तपात में डूब गया। इस पंथ से जुडे़ लोग ‘शरण‘ नाम से जाने जाते हैं। कल्याण नगरी ‘रक्त कल्याण‘ हो गई।

इस नाटक में होनेवाली घटनाओं को घटे आठ सौ साल से भी ज्यादा हो गए हैं।

फिर भी हमारी स्मृति में उन घटनाओ का आतंक आज भी बरकरार है। कन्नड भाषा के कवि, लेखक चिंतक बार बार उस युग की ओर मुड़कर देखते रहतें हैं और बार बार इसकी सार्थकता को अपने युग प्रसंग में समझने की कोशिश करते हैं।

‘तलेदंड‘ शिर्षक से गिरीश कर्नाड ने यह नाटक कन्नड में 1989 में लिखा, जब मंडल और मंदिर का प्रश्न पुरजोर पर था। इस ज्वलंत प्रश्न से यह स्पष्ट हो रहा था कि शरणाओं द्वारा उठाए गए प्रश्न हमारे समय के लिए कितने सटीक हैं। लेखक ने इस समूचे घटनाक्रम को बसवण्णा के जीवन से जुडे तमाम लोकविश्वासों को झटकते हुए - एक संस्कृतिक जनांदोलन की तरह रचा है ‘तुगलक‘ गिरीश कर्नाड द्वारा रचित एक विशिष्ट नाटक है। उन्होने स्वयं स्वीकार किया है कि कन्नड में ऐतिहासिक नाटकों का प्रायः अभाव सा है। निश्चय ही यही एकमात्र कारण नहीं हुआ होगा। उन्होने भारतीय इतिहास को पढना आरंभ किया। नाटक के लिए एक विषय की खोज में। ऑक्सफोर्ड में काफी समय रहते थे।

इतिहास पढते हुए उनकी नज़र तुगलक पर पड़ी। वह एक पागल राजा माना जाता है। उनके विचार से ‘‘यह एक बढ़िया विषय रहेगा’’। ऑक्सफ़ोर्ड में एक इन्डियन इन्स्टिट्यूट है। वहाँ उन्हे ‘तुगलक‘ पर काफी सामग्री मिल गई। उनके कहे अनुसार, ‘मैं वहाँ गया और बरनी आदि लेखकों के लेख पढे और नोट्स लिए। बाद में मैने महसूस किया कि इसमें बहुत सी बातें हैं जिन्हे उभारा जा सकता है। मंैने ‘‘तलेदंड’’ में उनका बहुत सा प्रयोग किया। सामग्री के बारे में पहले से ही निश्चय नहीं कर लेना चाहिए। खोज करते रहना चाहिए। आपको इतिहास में, पुराण में, लोकगाथाओं में, अद्भुत और वास्तविक मानवीय संबंध और चरित्र मिलेगें आपको ऐसी चीजें मिलंेगी जिनकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी। ‘‘तुगलक’’ में इमामुद्दीन की कल्पना मूल कथा के साथ जुड़ी है। गढ़ी गई कहानी और दंतकथा के रूप में प्रसिद्ध होने पर भी मुझे किसी बात की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं थी, उसने पाँच वर्ष तक के लिए प्रार्थना पर प्रतिबंध लगा दिया था। यह बात मूल ‘‘तुगलक’’ में है। इन सब ने मुझे बहुत उत्तेजित किया।‘ ( रंग प्रसंग जुलाई-दिसम्बर 99 पृ . 76) अपने चारों ओर कट्टर मजहबी दीवारों से घिरा तुगलक कुछ और भी था।

उसने मजहब से परे इनसान की तलाश की थी। हिन्दु और मुसलमान दोनों उसकी नजर में एक थे। तत्कालीन मानसिकता ने तुगलक की मान्यता को अस्वीकार कर दिया और यही ‘‘अस्वीकार’’ तुगलक के सर पर सनकों का भूत बनकर सवार हो गया। इस महान शासक के बृहद आदर्शों, स्वप्नों और आकाश को छूनेवाली आकांक्षाओं में, तदनंतर उसके आमूल पराभव में उन्हे भारतीय समसामयिक वस्तुस्थिति का बोध हुआ होगा। कुछ ही वर्षों में तुगलक की गगनचुंबी योजनाएँ धूल में मिट गईं, अपनी इच्छाओं की पूर्ति में बाधा बननेवाले सभी व्यक्तियों को उन्होने मौत के घाट उतार दिया और अंत मे उसने यही पाया कि अपने उलझन भरे अस्तित्व की छायाओं से वह जि़्ान्दगी भर लड़ता रहा। निपट अकेला, शवों के झुंड से और अपने ही हाथों किए सर्वनाश से घिरा हुआ वह उन्माद के छोर तक पहुंच गया। ‘तुगलक‘ अनुवाद बी.बी. कारन्त, भूमिका से) तुगलक ने पाया कि उसकी योजनाओं मे सर्वाधिक विश्वस्त व्यक्ति ही धोखा देते हैं।

उसे कोई नही समझता है, उसके सपनों का कोई भागी नहीं बनता है। अपने क्षुद्र हितों से हटकर देख पाने की क्षमता किसी में नहीं है। धोखे और विद्रोह के अतिरिक्त और किसी बात को कोई सोच नहीं पाता। अंत में उसकी अपनी सौतेली माँ भी, जिसके प्रति उसे लगाव था, उसे धोखा देती है। ऐसी प्रत्येक स्थिति का तुगलक को एक ही हल मालूम है.... तलवार की मदद से विरोधियों को खत्म कर देना।

बहुत ही सीमित साधनों की सहायता से कर्नाड अनेक आकर्षक चरित्रों की रचना में सफल हुए। सौतेली माँ, जो तुगलक के प्रति आसक्त है पर उसके और उसके वज़ीरे- आज़म नज़ीब में घनिष्ठता है, नज़ीब तुगलक के प्रति प्रतिबद्ध है, धार्मिक नेता इमामुद्दीन, जिसने तुगलक की सत्ता को चुनौती दी, दरबार का वाकया-नज़ीब बरनी-जो घटनाओं के चक्र से घबराकर अपने बादशाह को छोड़ जाता है। शहाबुद्दीन, रतनसिंह अज़ीज़, आज़म, जवान पहरेदार... ये सभी चरित्र अपनी समग्रता में कल्पित किये गए हैं। कर्नाड ने अपने इस चर्चित नाटक में तुगलक का कथानक मात्र तुगलक के गुण दोषों तक ही सीमित नहीं है इसमें उस समय की परिस्थितियाँ और तर्जनी भावनाओं को भी अभिव्यक्त किया गया है।

गिरीश कर्नाड के नारी पात्र बड़े सशक्त होते हैं। यह बात ययाति में अधिक उभरकर आया है। स्त्री पात्र- शर्मिष्ठा, देवयानी, स्वर्णलता और चित्रलेखा को पुरूषों से अधिक शक्तिशाली दिखाया गया है। कर्नाड स्वीकार करते हैं,‘ वास्तव में कई स्त्रियों ने मुझसे कहा कि मेरे स्त्री पात्र सबसे ज़्यादा विश्वसनीय हैं। यह भी कहा कि ऐसे पात्र भारतीय रंगमंच पर अन्यत्र उन्हे कम ही देखने को मिले। एक सेमिनार मे कहा गया, ‘‘अग्नि और वर्षा’’; के विशाखा जैसे पात्र भारतीय साहित्य में है ही नही। वह वास्तव में मौलिक स्त्री पात्र है, क्योंकि उनमे अपराध-बोध नहीं है। वह पहल करती है जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण जानती है। विशाखा हर बात पर काबू रखती है। उन्हांेने मुझसे पूछा, ‘यह कैसे संभव हो पाया ?‘ मैने ऐसी टिप्पणियों को सदा अपने लिए सम्मान माना है‘ (रस प्रसंग- पृ. 77)

संस्कार, वंशवृक्ष, कानून, अंकुर, निशांत, स्वामी और गोधूलि जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत एवं प्रशंसित फिल्मोंअभिनय निर्देशन। बलि नामक एक मौलिक नाटक के रचनाकार, मृच्छकटिकम पर आधारित फिल्मालेख,उत्सव के लेखन-निर्देशन तथा एक लोकप्रिय दूरदर्शन धारावाहिक के महत्वपूर्ण अभिनेता हैं।

1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1974 में पद्मश्री, 1992 में पद्मभूषण तथा कन्नड साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1994 में साहित्य अकदमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के विजेता गिरीश कर्नाड द्वारा रचित तुगलक, हयवदन, तलेदंड, नागमंडल, ययाति जैसे नाटक अत्यंत लोकप्रिय हुए और भारत की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद व मंचन हुआ है। प्रमुख भारतीय निर्देशक-इब्राहिम अलकाजी, प्रसन्ना, अरविंद गौड और बी. बी. कारन्त ने इनका अलग अलग तरीके से प्रभावी व यादगार निर्देशन किया।

सिनेमा के क्षेत्र में 1980 में फिल्म फेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ पटकथा-गोधूलि, बी.वी. कारंत के साथ) इसके अतिरिक्त कई राज्य स्तरीय तथा राष्ट्रीय पुरस्कार मिले।

इस प्रतिष्ठित नाटककार के जीवन में और अनेकानेक उपलब्धियाँ है। नाट्य विधा को एक उच्च स्तर तक पहुँचाने के लिए गिरीश कर्नाड जी का प्रयास प्रशंसनीय है।

संदर्भ ग्रंथ-

1. रक्त कल्याण - ले. गिरीश कर्नाड। अनुवाद - रामगोपाल बजाज।

2. तुगलक - ले. गिरीश कर्नाड। अनुवाद - बी.वी. कारन्त।

3. नाट्यनान्दी - ले. प्रो. भरत महेता गुजराती विभाग (म.स.वि.वि. बडौदा)

4. रस प्रसंग - जुलाई-दिसम्बर अंक 1999

5. नटरंग - खंड 26: अंक 105

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समीक्षा

पूर्ण-विराम से पहले...!!





समीक्षक : श्री सागर सियालकोटी, वरिष्ठ साहित्यकार, लुधियाना (पंजाब), मो. 9876865957


लेखिका सुश्री प्रगति गुप्ता

प्रकाशकः देवप्रभा प्रकाशन)


मैं अपनी बात ओशो के इस कथन से करूंगा। वह अपनी पुस्तक “भय-मुक्त जीवन” में लिखते हैं... “जिसे तुम प्रेम करते हो उसको, उसके ऐब-ओ-सबाब के साथ स्वीकार करो। अगर तुम्हारा प्रेम प्रगाढ़ है तो तुम्हारी प्रेम की प्रगाढ़ता के अनुपात में ही उस व्यक्ति में परमात्मा का जन्म होना शुरू हो जाता है।” यही इस उपन्यास का सार है। बात यहाँ लेखिका के ज़ाविये की है जो किस तरह बयान करती हैं।

देश भर की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपने वाली लेखिका के सम्मान और पुरस्कारों की फेहरिस्त का जिक्र करने में कई पन्ने सियाह करने पड़ेंगे। साहित्य जगत में आपका बहुत बड़ा योगदान है। आप बहुत ही संवेदनशील लेखिका हैं और तमाम सामाजिक पहलुओं पर पैनी नजर रखती हैं। जिंदगी के हर पहलू को अपने लेखन में पेश किया है। उनके लेखन में उनकी दानिशवाराना तबीयत का इज़हार होता है। उनकी शख्सियत बहुत वसीह है।

उनकी शख्सियत का रद्दे अमल करने वाला एक शेर कहँगा

‘‘जितनी बार भी देखा उनको एक नया अंदाज मिला/

इतने रंग कहां होते हैं एक शख्स की शख्सियत में।’’

उपन्यास की शुरुआत कुछ इस तरह होती है सुभोर प्रखर! कल रात तुमने मेरे व्हाट्सएप मैसेज को देख लिया पर कोई जवाब लिखकर नहीं भेजा। तुम मेरे किसी भी मैसेज को बगैर पढ़े और जवाब दिए सो जाओगे, मैं यह सोच भी नहीं सकती।”...सवेरे-सवेरे शिखा की फोन पर आवाज़ सुनकर प्रखर के चेहरे पर आई मुस्कुराहट उसके चाय के स्वाद को और बढ़ा देती ये उपन्यास का फ्लैश-बैक है, जो कथानक को आगे ले जाता है। लेखिका ने प्यार को जिन ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, वह लाजवाब है। लेखिका कहती हैं कि पुराने वक्त में घरों में खिड़कियां हुआ करती थी, छत की दीवारों पर झरोखें हुआ करते थे। गांव में नीम पर पीपल के पेड़ हुआ करते थे। जो अपनी मस्ती में झूमा करते थे। तब खिड़कियों से प्रेम झाँकता था ना कि अश्लीलता। लेखिका ने प्रखर और शिखा के माध्यम से यह ख्याल दर्शाया है कि तब प्यार में पाप नहीं हुआ करता था। जैसे पन्ना संख्या 21 पर लिखा है...

‘‘दरअसल शिखा तुम डरती हो मुझे स्वीकारने से क्योंकि स्वीकारते ही तुम खुद को छुपाकर नहीं रख पाओगी। अतीत तुमको कुछ भी स्वीकारने नहीं देता। जबकि आज स्थितियां बिल्कुल अलग है। तुम हमेशा से ही बहुत समर्पित थी। और आगे भी रहोगी। हमारी मूल प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। कुछ भी गलत सोचना तुम्हारी प्रकृति नहीं, तुमसे ज्यादा मैं तुम को पहचानता हूं।’’..

लेखिका इस बात को सिद्ध करती हैं अगर तुम्हारा नज़रिया साफ़ और शफ्फ़ाफ़ है, तो यह समाज यकीनन तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेखिका इस बात का भी ख्याल रखती है कि किरदार कहीं पर भी कमज़ोर ना पड़े। शिखा ने पारिवारिक मर्यादाओं को निभाते हुए समीर के लिए करवाचैथ, गणगौर और तीज के व्रत रखें। समीर इनको मानता नहीं था मगर चुप रहा। इसके उलट प्रखर ने यह सब प्रीति को नहीं करने दिया। ऐसी बातें कहीं ना कहीं नारी के अहम पर चोट करती हैं। लेखिका की इस ख्याल से जुड़ी प्रस्तुति कमाल है।

“अब एक अरसे बाद ईश्वर निमित्त के अधीन मिली हो- तो हमेशा मेरे अकेलेपन की साथी बनी रहना। अब कहीं वापस खो न जाना शिखा ....” ‘‘मैं भी तुम्हें कभी भूली ही नहीं थी प्रखर।’’

जब मोबाइल का युग नहीं था प्रेम में पागलपन जरूर था, मगर अंधापन नहीं था। आज प्रेम जिस्म का बाजार और व्यापार हो गया है। इस उपन्यास के किसी भी किरदार ने अपनी लक्ष्मण-रेखा को पार नहीं किया है। प्रेम को गंगा जल की तरह पवित्र समझा। रिश्तो की डोर को बांधकर अंतिम श्वास तक निभाया। उपन्यास में कहीं भी अश्लीलता नहीं है। हालांकि कुछ जगह शिखा और प्रखर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। वह दोनों भावनाओं में बहते हैं मगर संभल जाते हैं। जैसे पन्ना संख्या-86 ‘प्रखर ने जैसे ही शिखा को देखा, उसने उठकर गले लगा लिया। पहले तो शिखा थोड़ा सकुचाई पर वह स्वयं को प्रखर की बाहों में समा जाने से ना रोक पाई।’

यह स्वाभाविक है कि नारी तत्व मनुष्य को अपनी ओर खींचता है। यदि आदमी औरत की भावना और बहते वेग को समझ जाए, तो धरती स्वर्ग बन सकती है। शिखा ने भी समीर के साथ पूरी तरह न्याय किया। कभी अपने प्रेम की दुहाई नहीं दी। प्रखर और प्रीति ने भी अपने वैवाहिक जीवन को अच्छे से निभाया।

लेखिका एक समाजशास्त्री और मरीजों की काउंसलिंग भी करती हैं। वह समझ सकती हैं कि जब एक वरिष्ठ नागरिक अकेला रह जाता है, तो उसकी मनोदशा क्या हो सकती है। चाहे पुरुष हो या स्त्री दोनों को एक दूसरे के सहारे की सख्त जरूरत होती है। खासतौर पर जीवन-साथी की मृत्यु के बाद। आजकल कुछ संस्थाएं ऐसा काम कर रही हैं। पन्ना संख्या 140-141 पर लेखिका लिखती है... ‘‘प्रणय का क्या रिएक्शन होगा?’’... ‘‘यह सब तुम्हें नहीं मुझे सोचना है शिखा।’’

हम दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। तुमको पाकर खुद के जीते जी खोना नहीं चाहता। मेरी जीवन में पूर्ण-विराम लगने से पहले एक बार फिर से जीना चाहता हूं। उसी शिखा के साथ जो मेरी जिंदगी थी और हमेशा मेरे साथ-साथ चलती रही।” शिखा ने सहमति से अपना सर हिलाकर प्रखर को वापस गले लगा लिया और वह कविता भी मुकम्मल हुई।

इस उपन्यास की आलोचनात्मक पहलू देखें तो मुझे लगा कि प्रखर का कविता जिक्र कुछ ज्यादा है। दूसरी बात क्या समाज के प्रति प्रखर और शिखा सजग है? हालांकि उपन्यास का कथानक बहुत अच्छा है। घटनाक्रम और संवाद भी बहुत अच्छे हैं। उपन्यास समाज को सचेत करता है कि वरिष्ठ नागरिकों को भी अपनी भावनात्मक जिंदगी को जीने का हक़ है। वह घर का पुराना सामान नहीं है कि नौजवान या भावी पीढ़ी उनकी भावनाओं को किसी स्टोर में दफन कर दें। प्रगति गुप्ता जी ने सही मुद्दे को उठाया है। इस विषय पर समाज को सोचना पड़ेगा।

मैं प्रगति गुप्ता जी को इस कोशिश के लिए दिली मुबारकबाद देता हूं। और भविष्य में कामना करता हूं कि कुछ और नया पढ़ने को भी मिलेगा। उपन्यास का शीर्षक बहुत अच्छा है मेरी तरफ से देवप्रभा प्रकाशन को भी मुबारकबाद।           

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रिपोर्ट

भक्ति काव्य सम्पूर्ण जीवन का काव्य - अरुण कमल

आलोचक माधव हाड़ा को प्रो. शुकदेव सिंह सम्मान


वाराणसी। ‘भक्ति काव्य सम्पूर्ण जीवन का काव्य है। उसमें भूख, दुःख, पीड़ा, संताप और उदासी के कई बिम्ब हैं। भक्ति काव्य सत्ता और समाज का मुखर प्रतिकार करता है तो जीवन के विकल्प भी सुझाता है।’ उक्त विचार प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने ‘भक्ति काव्य क्यों पढ़ें?‘ विषय पर व्याख्यान में व्यक्त किए। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में आयोजित प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान समारोह में अरुण कमल ने कहा कि कबीर, सूर, तुलसी और मीरा आदि के यहां जो शब्द आये हैं उन शब्दों को देखिए तो समय और समाज की सच्चाई दिखाई देगी। भक्ति कविता भाषा और कला के दृष्टि से उच्चतर कविता है। भक्ति कविता  सिखाती है कि मनुष्य का सर मनुष्य के सम्मुख नहीं झुकता। 

समारोह में सुपरिचित आलोचक प्रो माधव हाड़ा को प्रो शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वीकार करते हुए प्रो. माधव हाड़ा ने कहा कि पिछले दो तीन दशकों में जो औपनिवेशिक ज्ञान परंपरा हावी हुई है उसने भक्ति काव्य को समझने की देशज शैली को प्रभावित किया है। कबीर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह कभी भी हमारे यहाँ जातीय मुद्दा नहीं रहे लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता ने उन्हें भी जाति के सवाल में खड़ा कर दिया। प्रो हाड़ा ने शुकदेव सिंह के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि परम्परा का मूल्यांकन करने में उन जैसे आचार्यों का योगदान हमेशा स्वीकार किया जाएगा।

इससे पहले विषय की प्रस्तावना रखते हुए प्रो आशीष त्रिपाठी ने कहा कि पिछले तीन दशकों से भक्ति काव्य को अपने अपने सामाजिक-राजनीतिक एजेंडे के रूप में पढ़ने और उसे व्याख्यायित करने की परंपरा विकसित हुई है। इसलिए भक्तिकाव्य जिन प्रगतिशील मूल्यों और समानता के भावो पर बल दिया है उसे आज बार-बार उद्धृत करने की ज़रूरत है।

समारोह में स्वागत वक्तव्य प्रो मनोज सिंह ने दिया। आयोजन में प्रो हाड़ा द्वारा संपादित कालजयी कवि और उनका काव्य शृंखला की छह पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। मध्यकालीन महान भारतीय कवियों यथा अमीर खुसरो,कबीर, रैदास, तुलसीदास, सूरदास और मीरा पर आई इन पुस्तकों को राजपाल एंड संज ने प्रकाशित किया है। इनके साथ हिंदी की प्रसिद्ध लघु पत्रिका बनास जन के ताजा ‘मध्यकालीन आख्यान’ विशेषांक लोकार्पण भी अतिथियों ने किया।  इस अवसर पर प्रो अवधेश प्रधान, प्रो बलिराज पांडेय, प्रो चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो वशिष्ट नारायण त्रिपाठी, प्रो श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो प्रभाकर सिंह आदि उपस्थित रहे। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. भगवंती सिंह ने एवं अतिथियों का परिचय डॉ. प्रज्ञा पारमिता ने दिया। संचालन डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने किया। 

रिपोर्ट - दिवाकर तिवारी



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रिपोर्ट


डॉ. नीहार गीते के कहानी संग्रह ‘‘पिया मेहंदी लिया दे मोतीझील से’’ के विमोचन सम्पन्न

जो नहीं कहा गया उसको कहने का उपक्रम ही कहानी है - श्री सत्तन

साहित्यकार ने परकाया में प्रवेश कर लिखा यह बात वरिष्ठ कवि एवं कुशल संचालक श्री सत्यनारायण सत्तन गुरु के हैं, जो उन्होंने वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीहार गीते के कहानी संग्रह ‘‘पिया मेहंदी लिया दे मोतीझील से’’ के विमोचन समारोह में अध्यक्षीय उद्बोधन में कहे।

मातृभाषा डॉट कॉम द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. विकास दवे, अध्यक्षता राष्ट्रकवि सत्यनारायण सतन ने की, एवं मंच पर वरिष्ठ कथाकार कृष्णा अग्निहोत्री मातृभाषा की सह संस्थापिका शिखा जैन, डॉ. नीहार गीते उपस्थित रहे।

श्री सतन ने आगे कहा कि लेखिका ने अपनी कृति में जिस अनुभव को जिया, उसे साहस के साथ बेबाकी से लिखा और सुंदर शब्दो का प्रयोग किया। लेखिका की मां कृष्णाजी सरस्वती है और बेटी रसवती। उन्होंने आगे कहा कि आलोचक, समालोचक का कार्य केवल गलतियां ही नही निकालना, कृति की अच्छाई भी बताना।

साहित्य अकादमी मध्य प्रदेश के निदेशक डॉ. विकास दवे ने कहा कि ‘लेखिका को लिखने के संस्कार बचपन में माँ कृष्णा जी से मिले, लेकिन उन्होंने पुस्तक लेखन में बहुत अधिक धैर्य रखा, यह नए लेखकों को सीखना चाहिए।’ लेखिका ने भोगे हुए यथार्थ को बहुत सुंदर तरीके से कहानी के रूप में प्रस्तुत किया, जो सराहनीय है।

चर्चाकार प्रोफेसर डॉ. किसलय पंचोली ने कहा कि श्लेखिका ने अपनी कहानियों में रिश्तों को बहुत अधिक महत्त्व दिया है। कुछ कहानियों के शीर्षक बहुत ही अधिक आकर्षक हैं, जो पाठको को बहुत आकर्षित करते हैं। कहानियों में नए नए शब्द गढ़े है, यह सुंदर प्रयोग है।

चर्चाकार डॉ. शोभा जैन ने कहा कि श्पुस्तक में 16 कहानियाँ हैं और सभी मानवीय मूल्यों की बात करती है। ऐसा लगता है जैसे लेखिका ने परकाया में प्रवेश कर लिखा है। हर कहानी पठनीय हैं जो पाठको के दिलो को छूती हैं।’

वरिष्ठ कथाकार डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री ने कहा कि  ‘नीहार हार बहुत हिम्मतवाली लड़की है और उसने बचपन में ही तय कर लिया था कि कुछ बेहतर लिखना है इसलिए वह बड़े लेखकों की रचनाएं पढ़ती भी थी। इसके बाद नीहार ने पुस्तकों, फ़िल्मों और टीवी प्रोग्राम की समीक्षा की और लेखन में स्थापित किया।

अपनी पुस्तक के बारे में लेखिका डॉ. नीहार गीते ने कहा कि ‘माँ कृष्णा अग्निहोत्री की कहानियों को पढ़कर लिखने के संस्कार आए और हिंदी के दिग्गज लेखकों को पढ़कर भी बहुत सीखा।’ इस मौके पर लेखिका ने अपनी पुस्तक के कुछ अंश भी पढ़कर सुनाए। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ।

अतिथि स्वागत डॉ. नीहार गीते, कामिनी, मुकेश तिवारी, राहुल गीते ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ.संगीता भरूका ने किया व अंत में आभार डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने माना।

कार्यक्रम में विशेष रूप से प्रो. सरोज कुमार, नर्मदा प्रसाद उपाध्याय, श्रवण गर्ग, डॉ. उषा गौर, डॉ. गरिमा दुबे, अलका भार्गव, ज्योति जैन, डॉ. दिवाकर भाई शाह, प्राचार्य डॉ. एस.पी. सिंह मंजुला भूतड़ा, प्रो. सौरभ पारिख मुकेश तिवारी, नितेश गुप्ता, प्रकाश चैधरी, प्रवीण जोशी, दर वर्गीस सुषमा दुबे, डॉ. सुरेखा भारती, आलोक वाजपेई, आशीष त्रिवेदी, रवलीन कोर, कविता वर्मा, बनवारीलाल जाजोदिया, नीति अग्निहोत्री, सतीश राठी, अमर सिंह चड्ाा, विजय सिंह चैहान, विनीता सिंह चैहान, हरेश दवे, विघ्नेश दवे , संध्या रॉय चैधरी, देवेंद्र सिंह सिसोदिया, अमृत कोर चड्डा, राकेश शर्मा, रुचि वाजपेई शर्मा, निरुपम वर्मा, पदमा राजेंद्र, डॉ. छाया गोयल, डॉ. उषा नेवेद, शुभा प्रकाश सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 

-डॉ. नीहार गीते, इंदौर, मो. 7974632703

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रिपोर्ट

विश्व वात्सल्य मंच ने 2 माह के बच्चे के टयूमर सर्जरी हेतु भेंट की सहायता राशि

विश्व वात्सल्य मंच, हैदराबाद, के तत्वावधान में 2 माह के बच्चे के ट्यूमर सर्जरी हेतु मेघा खोत को विश्व वात्सल्य मंच की ओर से कोषाध्यक्ष सीता अग्रवाल के सैनिकपुरी स्थित निवास स्थान पर रु. 50000 का चेक प्रदान किया गया।

संस्था की संस्थापक अध्यक्ष श्रीमती संपत देवी मुरारका एवं प्रधान सचिव राजेश मुरारका द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार 2 माह के लड़के को ट्यूमर हो गया है,अगर ऑपरेशन नहीं करवाया तो नाक से सांस लेने की तकलीफ हो सकती है और आँख भी जा सकती है । इसी कारण से विश्व वात्सल्य मंच ने सर्जरी के लिए रु. 50000 की सहायता राशि प्रदान की।

इसमें श्रीशा, रानी शर्मा, अर्चना दीवान, जयालक्ष्मी बोज्जा,  सुमन, शालिनी, सविता, जानकी, हरिता, वंदना, संगीता संघी, स्निग्धा योतिकर, वंदना नेवर, सीता अग्रवाल एवं विश्व वात्सल्य मंच के साथ लक्ष्मी मैडम का विशेष सहयोग रहा। 

इस अवसर पर उपाध्यक्षा एम. दीपिका, श्रीमती संपत देवी मुरारका, कोषाध्यक्ष सीता अग्रवाल, राजेश मुरारका,  जन संपर्क प्रमुख स्निग्धा योतिकर,  एस. कल्पना, मीडिया प्रभारी जयालक्ष्मी बोज्जा, अर्चना दीवान, मेघा खोत एवं बेटे की माँ उपस्थित थे । स्निग्धा योतिकर ने आभार व्यक्त किया ।          

 प्रस्तुति: संपत देवी मुरारका (विश्व वात्सल्य मंच)

email: murarkasampatdevii@gmail.com

 लेखिका यात्रा विवरण,  मीडिया प्रभारी,  हैदराबाद, मो. 09703982136

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प्रैस विज्ञप्ति

साहित्य अकादेमी द्वारा प्रवासी साहित्य की अवधारणा 

और प्रगति की दिशाएँ विषय पर चर्चा

नई दिल्ली। 15 जुलाई 2022; साहित्य अकादेमी में आज साहित्य मंच कार्यक्रम के अंतर्गत प्रवासी साहित्यः अवधारणा और प्रगति की दिशाएँ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया। सर्वप्रथम माननीय राष्ट्रपति के ओएसडी (हिंदी) राकेश बी. दुबे ने अपनी बात रखते हुए कहा कि प्रवासी शब्द को हम महाभारत में भी पा सकते है और प्रवास कभी भी सुख का कारण नहीं रहा है। उन्होंने कई प्रवासी रचनाकारों की रचनाओं को प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्तमान में लगभग 180 देशों में प्रवासी भारतीय रह रहे हैं और उनकी कहानियाँ कहीं न कहीं प्रभावित करने वाली हैं। उन्होंने हाल में ही आई अपनी पुस्तक जोकि ब्रिटेन के प्रवासियों पर आई है, का जिक्र करते हुए कहा कि जनसंचार माध्यमों में सबसे ज्यादा प्रवासी साहित्य का प्रचार ब्रिटेन में ही हुआ है। राकेश पांडेय ने कहा कि यह प्रसन्नता की बात है कि अब प्रवासी साहित्य का उल्लेख हर मंच पर प्रतिष्ठा के साथ किया जाने लगा है। उन्होंने प्रवासी साहित्य की अवधारणाओं को एक उचित परिभाषा में बाँधने के बारे में भी कहा। आगे उन्होंने कहा कि अभी भी कई अन्य देशों में प्रवासी साहित्य की खोज की संभावनाएँ हैं। प्रख्यात कवि एवं लेखक और कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर चुके सुरेश ऋतुपर्ण ने कहा कि प्रवासी साहित्य के लेखन में प्रवासी अनुभव ही केंद्र में होने चाहिए, न कि केवल वहाँ का प्रवास। कोई भी साहित्य तब तक ही जिंदा रहता है जब तक वह सृजनात्मकता की कसौटी पर खरा उतरता है। प्रवासी साहित्य के बारे में हमें यह अवधारणा छोड़नी पड़ेगी कि विदेश की धरती पर लिखा गया सभी साहित्य महान है। साहित्य अपने प्रतिमानों से ही महान और लोकप्रिय होता है। कार्यक्रम के अध्यक्ष केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने कहा कि यह उचित समय है कि जब हम प्रवासी साहित्य और प्रवासी साहित्यकारों के बारे में अपनी राय स्पष्ट कर लें। आगे चलकर हमें इनक बीच कोई भी वर्गीकरण करना उचित नहीं होगा। आगे उन्होंने कहा कि इस विषय पर शोध कर रहे छात्र-छात्राओं को भी प्रवासी परिवेश की झलक पाने के लिए उन देशों की यात्राएँ करनी चाहिए, जहाँ के प्रवासी साहित्य पर वह कार्य कर रहे हैं। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित प्रवासी साहित्य के विशेषज्ञों नवीन लोहानी, राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के दौरान भारी संख्या में लेखक, पत्रकार और विद्यार्थी उपस्थित थे।

के. श्रीनिवासराव

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