साहित्य नंदिनी, अगस्त 2022



शोध-पत्र

साहित्य एवं मनोविज्ञान का अंतर्संबंध


डाॅ. रेनू यादव 

साहित्य मन का सहचर है और मन साहित्य का उद्गम स्थान। मन की भूमिका के बिना साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती। हर मन में थोड़ा या बहुत साहित्य अवश्य बसता है, किंतु यह आवश्यक नहीं कि हर कोई अपनी अभिव्यक्ति को शब्द दे सके। 

मनोविश्लेषणवाद के जनक सिगमंड फ्रॉयड के अनुसार मन की तीन अवस्थाएँ चेतन, अवचेतन तथा अचेतन में से अवचेतन मन में दीर्घकालीन याददास्त, संवेद और एहसास, आदत, लत एवं सहसम्बन्ध, तादात्मीकरण, रचनात्मकता, परासंपर्क, प्रज्ञा आदि समाहित है और इसकी (अवचेतन मन) अभिव्यक्तियाँ इदम्, अहम, पराअहम् साहित्य सृजन में सहयोग करती हैं। साहित्य सृजन एक दिन में नहीं हो सकता, यह मन में चलने वाली लम्बी प्रक्रिया का परिणाम होता है। साहित्य अथवा किसी भी रचना या कला के उद्गम को समझने के लिए सिर्फ फ्रॉयड के सिद्धांत को ही नहीं बल्कि अल्फ्रेड एडलर और युंग के सिद्धांतों पर भी दृष्टिपात करना होगा।

मनोविज्ञान को अंग्रेजी में Psychology कहते हैं, जो कि ग्रीक शब्द Psyche और Logos से मिलकर बना है। मनोविज्ञान का अर्थ आत्मा के अध्ययन से लिया जाता था किंतु बाद में आत्मा की जगह मन शब्द का प्रयोग किया गया। इसलिए मन के ज्ञान को मनोविज्ञान कहा जाने लगा। मनोविज्ञान को परिभाषित करते हुए स्किनर कहते हैं, “जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के प्रति प्राणी की प्रतिक्रियाओं या व्यवहार का अध्ययन ही मनोविज्ञान है। प्रतिक्रियाओं, (प्रत्युत्तरों) या व्यवहार का अर्थ प्राणी की सभी प्रकार की प्रतिक्रियाओं, समायोजन, कार्य-व्यापारों (अनुक्रियाओं) और अभिव्यक्तियों से है”1।

(डॉ. प्रीति वर्मा, डॉ. डी. एन. श्रीवास्तव, आधुनिक सामान्य मनोविज्ञान, पृ. 11,  (R.S.Worth – Psychology] 1954)

वैलेन्टाइन के अनुसार, “मनोविज्ञान मन का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विज्ञान है जिसमें केवल बौद्धिक तत्त्वों का ही नहीं भावात्मक अनुभवों, प्रेरक शक्तियों, क्रिया-कलापों तथा व्यवहार का भी अध्ययन सम्मिलित है”2। 

(गणपति चन्द्र गुप्त. रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन.  पृ. 204.)

कालिन्दी महाविद्यालय तथा रामानुजन कॉलेज के संयुक्त तत्त्वाधान में आयोजित FDP में दिनांक 04.08.20 को मनोवैज्ञानिक प्रो. आनंद प्रकाश अपने व्याख्यान में ‘साहित्य और मनोविज्ञान में अंतर्संबंध’ बताते हुए कहते हैं कि ‘मनोविज्ञान साक्ष्य प्रधान होता है, वह तर्कबुद्धि को स्पर्श करता है और साहित्य लालित्य प्रधान है, वह भाव बुद्धि को स्पर्श करता है। दोनों का संबंध व्यक्तिगत सत्य से होता है जो दूसरों तक पहुँचाते हैं। साहित्य में व्यक्तिगत सत्य समष्टिगत सत्य बन जाता है’। इसलिए यह कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान साहित्य के माध्यम से विस्तार पा जाता है, वह साहित्य के माध्यम से सिर्फ तथ्यात्मक नहीं रह जाता बल्कि व्यावहारिक बन जाता है।   

साहित्य और मनोविज्ञान का अंतर्संबंध तीन स्तरों पर देखा जा सकता है -

1. साहित्यकार का मनोविज्ञान

रेने वेलेक और आस्टिन वारेन की पुस्तक ‘साहित्य-सिद्धांत’ के अनुसार साहित्यिक प्रतिभाशाली के लिए “ग्रीक काल से ही लोग सोचते हैं कि इसका कुछ न कुछ संबंध पागलपन से अवश्य है - और पागलपन की इस परिधि में उन्माद (न्यूरोटिसिज्म) से लेकर विक्षिप्तता (साइकोसिस) तक समेटा जाता रहा है”3।   

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 106)

उन्होंने ‘आविष्ट’ और ‘गढ़िया’ कवि के दो प्रकार माना है, पहला कवि एक ‘आविष्ट’ प्राणी होता है, जो अपने अवचेतन अवस्था का उद्गार प्रकट करके दूसरों से कुछ कम होते हुए भी कुछ अधिक बढ़कर होता है। उनमें कविता स्वतः उपजती है, उन्हें कविता करने के लिए कोशिश नहीं करनी पड़ती। जैसे कि स्वच्छंदतावादी, अभिव्यंजनावादी और अतियथार्थवादी कवि। दूसरा, ‘रचयिता’ या ‘गढ़िया’ कवि, जिन्होंने कविता करने की कला सीखी होती हैं। वे ‘करत-करत अभ्यास ते’ के आधार पर एक प्रगल्भ, प्रशिक्षित एवं कविता का सूक्ष्म ज्ञान हासिल कर लेते हैं। जैसे - चारण परंपरा के कवि, पुनर्जागरणकाल और नव्यक्लासिकी, रीतिकालीन कवि। 

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 112)

रचनाकारों अथवा कलाकारों के संबंध में साइकोएनालिसिस के लेखक और मनोविज्ञान के जनक फ्रॉयड का मन्तव्य बहुत साफ नहीं दिखाई देता, उनका कहना है, “कलाकार मूलतः एक ऐसा व्यक्ति है जो वास्तविकता की ओर से अपना मुँह मोड़ लेता है क्योंकि उससे अपनी वासनाओं की तुष्टि का परित्याग करने की जो माँग की जाती है उसे वह स्वीकार नहीं कर पाता और जो इसके बाद अपने कल्पना विलास में अपनी कामुक भावनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं को खुली छूट दे देता है”।

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 108) 

रचनाकार रचना में कल्पना का समन्वय कर अपने विकृत्तियों को ही विषय-वस्तु बनाकर अपने स्वप्न का विस्तार कर देता है। एरिक जेन्श रचनाकार अथवा कलाकार के इस क्षमता को प्रत्यक्षानुभूत और संकल्पनाजन्य का विशेष ढंग से एकीकरण मानते हैं। उनका मानना है कि रचनाकार अपने जातीय लक्षणों जिन्दा रखता है और उसके विकसित कर अनुभव ही नहीं करता बल्कि उसे प्रत्यक्ष रूप से देख भी सकता है।        

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 110)

सिगमंड फ्रॉयड के बाद मनोविज्ञान के सशक्त हस्ताक्षर अल्फ्रेड एडलर और युंग रचनाकार में मनस्तापी सृजन के कारक मानते हैं। लेकिन दोनों में अंतर यह है कि एडलर रचनाकार को मनस्ताप से मुक्ति का मार्ग मानते हैं तो युंग रचनाकार के सर्जनात्मक शक्ति का परिणाम मनस्ताप को मानते हैं। इस आधार पर यदि मनस्ताप का परिणाम सकारात्मक हो तो व्यक्ति अथवा रचनाकार उच्च कोटि की रचनाएँ कर सकता है। उदाहरण के लिए अमेरिकी गणितज्ञ जॉन नैश को देखा जा सकता है, जो स्क्रिजोफेनिया से पीड़ित थे, किंतु उच्च कोटि के गणितज्ञ बनें। जिनकी जीवनी पर सन् 2001 में ‘अ ब्युटीफुल माइंड’ फिल्म बनी है। 

रचनाकार से संबंधित विचारों में कार्ल युंग का सिद्धांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘अवचेतन मन के सम्भाग में सृजनशीलता की संभावनाएँ होती हैं’ कहने वाले युंग का मानना है कि व्यक्ति के अवचेतन के नीचे शैशावस्था के रूद्ध अनुभवों का अवशेष दबा रहता है। जो लेखन के समय उभर कर सामने आता है। चिन्तन, अनुभूति, अंतःप्रज्ञा और संवेदन की प्रधानता के अनुसार लोगों के टाइप होते हैं, जो अंतर्मुखी और बहिर्मुखी दो प्रकारों के अंतर्गत आते हैं। लेखक वर्ग भी अलग-अलग टाइप के होते हैं और उनमें से कुछ अपने टाइप का उद्घाटन करते हैं तो कुछ 

विरोधी टाइप और अपने पूरक का। दूसरी बात कुछ लेखक में अंतर्मुखी और बहिर्मुखी दोनों होते हैं, वे विविधता और बहुलता भरे होते हैं, जैसे कि टी.एस. ईलियट, शेक्सपीयर, पो आदि और भारतीय कवियों में निराला और कुँवर नारायण को ले सकते हैं। 

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 111)

निट्शे की पुस्तक द बर्थ ऑफ ट्रैजेडी (1872) में आधुनिक काल के विरोधी प्रवृत्तियों के कवियों का वर्णन पाया जाता है। फ्रान्सीसी मनोवैज्ञानिक राइबो ने बाह्य जगत् के पर्यवेक्षण से, प्रत्यक्षानुभूति से प्रेरित कवि और कल्पना तरल कवि दो प्रकार माने हैं। कीट्स का कवि के विषय में मानना है, “वह सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं होता है। ... वह इयागो की कल्पना करते हुए भी उतना ही हर्षित होता है जितना किसी इमोगेन की कल्पना करते समय।... दुनियाँ में कवि से अधिक अकाव्यात्मक कोई चीज नहीं हो सकती, क्योंकि उसका अपना कोई ‘स्वरूप’ नहीं होता - वह निरंतर किसी अन्य को भरता-पूरता रहता है”।  

(वेलेक, रेने एवं आस्टिनवारेन. साहित्य-सिद्धांत. पृ. 110)

देखा जाय तो कीट्स के विचार सिर्फ काव्य के लिए ही नहीं गद्य विधा में कथाओं के लिए भी कुछ हद तक सटिक बैठता है। क्योंकि रचनाकार कथा-कहानी लिखते समय अपने शरीर में होते हुए भी कल्पना के माध्यम से दूसरों के शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिसे तदानुभूति की संज्ञा दी जाती है। वह रचना प्रक्रिया के समय एक साथ कई-कई जिन्दगियाँ जीता है। और शब्दों के माध्यम से सूक्ष्म कल्पना को मूर्त कर देता है।

2. साहित्य में मनोविज्ञान 

साहित्य में मनोविज्ञान दो रूपों में देख सकतें हैं। पहला, वे रचनाएँ जो मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को आधार बनाकर लिखी जाती हैं अथवा मनोवैज्ञानिक उपकरण समाहित होते हैं। इसलिए उन रचनाओं के अध्ययन का विषय मनोविश्लेषणात्मक होती है। उदाहरण के लिए जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ और अज्ञेय की कविताएँ। मनौवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित कहानियों में प्रेमचंद की कुंठा, हीनता ग्रंथि पर आधारित ‘कफन’, अवचेतन मन को खूबसूरती से उभारने वाले प्रसाद की ‘पुरस्कार’, ‘मधुवा’, ‘ममता’, जैनेन्द्र की यौन कुंठा, अंतद्र्वन्द्व पर आधारित ‘ध्रुवयात्रा’, ‘एक रात’, ‘नीलम देश की राजकन्या’, ‘एक पन्द्रह मिनट’, फ्रॉयड के सिद्धांतों पर आधारित तथा असामान्य मनोग्रंथियों पर इलाचन्द्र जोशी की ‘यज्ञ और जागृति’, ‘विद्रोह’, ‘परित्यक्ता’, अज्ञेय की ‘पुरूष के भाग्य’, ‘रोज’, मनस्ताप पर आधारित कमलेश्वर की ‘राजा निरवंसिया’, यौन कुंठा, पीडा एवं अंतद्र्वन्द्व पर आधारित कमला दत्त की ‘मछली सलीब पर टंगी’, ‘अच्छी औरतें’, ‘तीन अधजली मोमबत्तियाँ’, शरीर में कैमिकल परिवर्तन की वजह से मानसिक बदलाव पर आधारित सुधा ओम ढींगरा की कहानी ‘आग गर्मी कम क्यों है’, विवेक मिश्र की कहानी ‘सुसाइड क्लब’, ‘गुब्बारे’, ‘निर्भया नहीं मिली’, ‘कारा’ कहानियाँ, यौन कुंठा पर आधारित तेजेन्द्र शर्मा की ‘अपराध-बोध का प्रेत’, ‘कल फिर आना’, सुरज प्रकाश की ‘लहरों की बाँसूरी’ आदि उपन्यासों में जैनेन्द्र की ‘सुनीता’, ‘परख’, इलाचन्द्र जोशी के ‘संन्यासी’, ‘प्रेत और छाया’, ‘निर्वासित’, अज्ञेय की ‘शेखरः एक जीवनी’, ‘नदी के द्वीप’ सुनीता जैन का ‘बिन्दू’, ‘अनुगूँज’, भगवती प्रसाद वाजपेयी का ‘निमंत्रण’, गिरिराज किशोर की ‘यात्राएँ’, राजकमल चैधरी की ‘मछली मरी हुई’, धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’, अन्नपूर्णा देवी का ‘परत दर परत’, मृदुला गर्ग की ‘चित्तकोबरा’, सुषम वेदी की ‘नवाभूम की रसकथा’, सुदर्शन प्रियदर्शिनी का ‘पारो’ आदि मनोवैज्ञानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं। 

निबंधों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों का मूल्यांकन मनोविज्ञान को समझे बिना नहीं हो सकता। 

कुछ लेखक अपनी रचना का पैटर्न भी मनोविज्ञान के किसी एक सिद्धांत के आधार पर अपना लेते हैं, जैसे कि प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा की अधिकतर कहानियों का पैटर्न ‘प्रतिक्रिया-निर्माण’ (Reaction Formation) पर आधारित है, जो कि ‘अहं रक्षात्मक प्रक्रम’ (Ego Defense Mechanism) का एक प्रकार है। उन्होंने अहं रक्षात्मक प्रक्रम का एक प्रकार ‘प्रक्षेपण’ (Projection) का भी प्रयोग किया है। प्रवासी साहित्यकार सुधा ओम ढींगरा की कहानियों में मनःसंवेगों का सहजता के साथ सफलतापूर्वक विलय होता है। सुदर्शन प्रियदर्शिनी का उपन्यास ‘पारो’ व्यामोह में फँसी नायिका को दर्शाता है, हालांकि इनकी कथाएँ दुखान्तक होती हैं लेकिन ‘पारो’ सुखान्तक है। सुषम वेदी का उपन्यास अहं और अस्तित्वाद को प्रमुखता देने वाला ‘नवाभूम की रसकथा’ में भाव और बुद्धि की टकराहट दिखाई देती है। 

दूसरा, वे रचनाएँ जिनमें मनोवैज्ञानिक उपकरण प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देतें किंतु उन रचनाओं का संबंध मनोविज्ञान से होता है। क्योंकि रचना करने अथवा लिखने के लिए अभिप्रेरित करने वाले कारक तथा सम्पूर्ण रचना-प्रक्रिया एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। वे रचनाएँ सामाजिक, माक्र्सवादी, भाषिक अथवा अस्मितामूलक विमर्शों आदि से संबंधित क्यों न हों, किंतु उनका अप्रत्यक्ष संबंध मनोविज्ञान से ही है।  

भारतीय साहित्य में यदि प्रथम ग्रंथ भरतमुनि के नाट्यशास्त्र को लिया जाए तो नाट्यशास्त्र में रस-सिद्धांत का सीधा संबंध मनोविज्ञान से दिखाई देता है। आचार्य भरतमुनि ने आठ रसों का वर्णन किया था किंतु बाद इन रसों की संख्या ग्यारह हो गई, उनके स्थायी भावों (रति, शोक, भय, हास, उत्साह, क्रोध, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद, वात्सल्य, भगवत्प्रेम) को मनोविज्ञान में मनःसंवेग कहते हैं। 

रस सिद्धांत के पुनर्विवेचन में इनके संबंध की तालिका को कुछ इस प्रकार दिया गया है। 

भावनाओं एवं मूलभावों का पारस्परिक संबंध  

क्र. सं.

सहज-प्रवृत्ति

भावनाएँ एवं भावात्मक प्रवृत्तियाँ

मूलभाव या स्थायी भाव

1.     

काम प्रवृत्ति

प्रणय भावना

काम (रति) या प्रणय

2.     

युयुत्सा की प्रवृत्ति

द्वेष, प्रतिशोध, क्रांति विद्रोह आदि की भावनाएँ

क्रोध

3.     

पलायन की प्रवृत्ति

भीरूता

भय

4.     

शरणागति-प्रदान की वृत्ति

सहानुभूति, करूणा

शोक (करूणा)

5.     

हास्य की प्रवृत्ति

विनोद, उपहास, व्यंग्य

हास्य

6.     

विकर्षण की प्रवृत्ति

घृणा

घृणा

7.     

जिज्ञासा की प्रवृत्ति

जिज्ञासा, कौतुहल

आश्चर्य

8.     

आत्मदैन्य की प्रवृत्ति

भक्ति भावना

भक्ति

9.     

संतति पालन की प्रवृत्ति

वात्सल्य, स्नेह, करूणा

वात्सल्य

10.  

संग्रह-वृत्ति आत्मगौरव की वृत्ति

अधिकार भावना

उत्साह

11.  

साहचर्य की प्रवृत्ति

सख्य, मैत्री

सख्य

12.  

चिंतन की प्रवृत्ति

(नवोन्मेषण की प्रवृत्ति)

निर्वेद

निर्वेद

(डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन. पृ. 228) 

मैक्डूगल ने प्राणियों के अंदर चैदह प्रकार की मूल प्रवृत्ति (शिशु रक्षा, योधन, उत्सुकता, भोजनान्वेषण, विकर्षण, पलायन, युथचारिता, आत्म-प्रकाशन, आत्मवश्यता, संग्रह, यौन-प्रवृत्ति, रचना-प्रवृत्ति, शरणागत होना, हास) माना है जिसका संबंध आवेग मनोवेग (वात्सल्य, क्रोध, आश्चर्य, क्षुधा, घृणा, भय, अकेलापन, उत्साह, आत्महीनता, अधिकार का भाव, काम-भाव, रचनात्मक आनंद, करूणा, आमोद) से माना है। 

स्थायी भाव के अतिरिक्त अन्य रस-सामग्रियों जैसे कि विभाव (आलम्बन और उद्दीपन विभाव), अनुभाव (कायिक, वाचिक, मानसिक, आहार्य, सात्विक), संचारी अथवा व्याभिचारी भाव (हर्ष, विषाद, त्रास, लज्जा, ग्लानि, चिंता, शंका, असूया, अमर्ष, मोह, गर्व, औत्सुक्य, उग्रता, चपलता, दैन्य, जड़ता, आवेग, निर्वेद, धृति, मति, विवोध, वितर्क, श्रम, निद्रा, आलस्य, स्वप्न, स्मृति, मद, उन्माद, अवहित्था, अपस्मार, व्याधि, मरण) मन या चित्त से संबंध रखते हैं, जो अनुकूल वातावरण में जागृत हो उठते हैं। 

काव्य की प्रक्रिया मूलतः मनोविज्ञान का हिस्सा है ही, इनमें से भक्तिकालीन, छायावादी रचनाएँ आज तक सबकी स्मृत्तियों का हिस्सा हैं और इन पर मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अध्ययन किया जा चुका है और होता रहता है। 

कहानियों में उदाहरण के लिए प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ में सामाजिक उपकरण मिलेंगे न कि मनोवैज्ञानिक। किंतु युंग की सामूहिक अवचेतन पर दृष्टि डालें तो उस समय के अनुकूल और मनोसामाजिक संरचना के कारण वह कहानी उस समय के लिए अत्यंत प्रासंगिक कहानी है। किंतु आज के समय (स्थान विशेष को छोड़ कर) में यह कहानी अप्रासंगिक है। उसी प्रकार उनकी कहानियों (ईदगाह, पूस की रात आदि)  या उपन्यासों (गोदान, गबन, निर्मला) में प्रत्यक्ष रूप से मनोवैज्ञानिक उपकरण नहीं दिखाई देते हैं, उसके बावजूद भी उनकी कहानियों और उपन्यासों का अध्ययन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से किया जाता है। इसी प्रकार अमृतलाल नागर, मोहन राकेश, कमलेश्वर, उषा प्रियंवदा आदि की रचनाओं का भी अध्ययन किया जाता है। 

रचनाओं पर बात करते हुए अस्मितामूलक विमर्श को नहीं भूलना चाहिए। अस्मितामूलक विमर्श के अंतर्गत स्त्री-विमर्श को समझने के लिए मनोविश्लेषणवादी धारा की इरिगेरे आदि के सिद्धांतों के समझते हुए भी युंग और एडलर के सिद्धांतों को नकार नहीं सकतें। सी. जी. युंग ने अवचेतन मन अथवा चित्त को दो भागों में विभाजित किया है  - मन का ऊपरी सतह, ‘व्यक्तिगत अवचेतन’ कहलाता है जो व्यक्ति के दैहिक जीवन से जुड़े भूतकालीन समाज द्वारा असंगत इच्छाओं का दमित एवं उपेक्षित एवं विस्तृत स्वरूप है। दूसरा मन का भीतरी सतह, जिसे ‘सामूहिक अवचेतन’ कहते हैं। उसमें व्यक्ति की पारिवारिक यानि पूर्वजों, प्रजाति, आदिम समूहों, जाति, धर्म, संस्कृति के भूतकालीन विस्मृत अनुभव बीजों का अव्यवस्थित भंडार होता है। मन के भीतरी सतह से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का विस्तार होता है। उसकी सोच-समझ, सफलता-असफलता उसी पर निर्भर होती है। जब स्त्री-विमर्शी लेखन को जातीय स्मृत्ति पर आधारित कहते हैं, तब युंग के इन सिद्धांतों पर विचार करना जरूरी हो जाता है। 

स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श या थर्ड जेण्डर विमर्श आदि किसी भी विमर्श को देखे तो युंग के सिद्धांतों के साथ एडलर के अधिकार भावना पर दृष्टिपात करना जरूरी हो जाता है। अस्मितामूलक सभी विमर्श मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एड़लर के “वैयक्तिक मनोवज्ञान” के अंतर्गत अधिकार भावना के माध्यम से समझा जा सकता है। “एडलर अपनी पुस्तक ‘द प्रेक्टिस एंड थियरी ऑफ इंडिव्युजल साइकोलॉजी’ में प्रत्येक मनस्ताप को श्रेष्ठता की भावना की प्राप्ति के लिए, हीनता की भावना से मुक्ति का प्रयास समझते हैं और वे कहते हैं, “हीनता की भावना ही अतिवादी स्थिति में हीनता ग्रंथि (इनफिरियारिटी कॉम्पलेक्स) का रूप धारण करती है। अपने को प्रत्येक से श्रेष्ठ समझने की भावना अतिचार श्रेष्ठता ग्रंथि (सुपीरिआरिटी कॉम्पलेक्स) को जन्म देता है। हीनता-ग्रंथि अथवा श्रेष्ठता-ग्रंथि विरोधी दृष्टिगत होने पर भी विरोधी नहीं होतीं- वे एक दूसरे की पूरक होती हैं। एक ही व्यक्ति में ये दोनों ग्रंथियाँ पाई जाती हैं। हीनता की ग्रंथि को व्यक्ति श्रेष्ठता भावना में बदलना चाहता है”।  

(https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/227701/6/06_%20chapter%201.pdf अवचेतन प्रभावों की रूपात्मकता: तथ्य, परिभाषा एवं विश्लेषण) 

एडलर वैयक्तिक मनोविज्ञान की बात करते हुए व्यक्ति को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। इसलिए समाज में अधिकार भावना अस्मितामूलक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। क्योंकि हाशिए पर खड़े सबकी लड़ाई अधिकारों के लिए ही है।

3. पाठक का मनोविज्ञान

युंग के अनुसार, “भाव व्यक्ति की तीव्र अव्यवस्थित (या उद्दीप्त) मानसिक अवस्था है”। 

(रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन - डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त. पृ. 211. (Emotions in man and Animal : P.T. Young, Page-51) 

जिसे रचनाकार अपनी रचनाओं में कल्पना के साथ सतर्क व्यवस्थित करने का प्रयास करता है। यह अवचेतन मन से चेतन मन बनने की एक क्रिया है। चेतन बनाने में बिम्ब-प्रतीक सशक्त हथियार होते हैं। 

किंतु जब पाठक किसी रचना को पढ़ता है तो उसकी प्रक्रिया लेखक की प्रक्रिया से ठीक उल्टी होती है। वह चेतन से अवचेतन की ओर उन्मुख होता है। फ्रॉयड के जिस स्वप्न का विस्तार कल्पना के माध्यम से लेखक कर चुका होता है उसे पाठक पुनः अपनी कल्पना में बाँधता है और उसके बाँधने के साथ अपने स्वप्न का विस्तार करता है। रचना में उद्धृत बिम्ब-प्रतीक पाठक के स्मृत्ति का हिस्सा बन जाते हैं तथा पाठक के अनुभव संसार के साथ मिलकर पात्रों को अथवा दृश्य को सजीव बनाते हैं। इस प्रक्रिया को समझने में युंग का सामूहिक अवचेतन का सिद्धांत सहायक होगा।  

चूंकि पाठक भी इसी समाज का सदस्य होता है। लेखक के अंदर जो मनोवृत्तियाँ, मनःसंवेग विद्यमान हैं वही मनोवृत्तियाँ तथा मनःसंवेग कुछ अलग अथवा उन्हीं के समान पाठक में भी विद्यमान होती हैं। यदि पाठक स्वयं भी लेखक है तो वह उस रचना के माध्यम से अपने स्वप्न का और भी विस्तार कर सकता है किंतु यदि पाठक आम पाठक है तो वह अपनी स्मृत्तियों से पाठ को जोड़ते हुए लेखक से भिन्न विस्तार को गढ़ता है अथवा अपनी अनुभूति को दुहराता है। ऐसे में पाठक पर कर्ता-प्रेक्षक प्रभाव (Actorobserver effect) पड़ता है, वह पाठ पढ़ते समय पात्रों में अपने को गुणारोपण करके देखता है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो पाठक पाठ में उद्धृत घटनाओं को अपने अनुभव के साथ जोड़ कर देखता है, जिसके जैसे अनुभव (सुखात्मक या दुखात्मक) हैं उसकी संवेदनाएँ उन घटनाओं के साथ जुड़ जाती हैं, जिसे मनःसंवेगों का तादात्मीकरण कह सकते हैं। यही कारण है कि हर लेखक का अपना पाठक वर्ग होता है तथा रचना के प्रति सभी पाठकों का अपना अपना दृष्टिकोण बन जाता है। एक ही रचना किसी को अधिक प्रभावित करती है तो किसी को कम। उदाहरण के लिए वीरगाथात्मक रचनाएँ पढ़ने पर पाठक के अंदर उत्साह से उत्तेजित होना, प्रेमपरक रचनाएँ पढ़ने पर काम अर्थात प्रणय भाव का जागृत होना तथा अस्मितामूलक साहित्य पढ़ने पर अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना आदि देखा जा सकता है। अस्मितामूलक साहित्य को समझने के लिए युंग और एडलर दोनों के सिद्धांत सहायक होते हैं।

युंग के अनुसार व्यक्ति में जो घटित होता है वही समष्टि में भी घटित होता है। इस प्रकार लेखक व्यक्ति से समष्टि की ओर आगे बढ़ता और पाठक समष्टि से व्यक्ति को ओर लौटता है। लेखक और पाठक दोनों ही समाज का हिस्सा हैं इसलिए दोनों के मनःसंवेग में तादात्मीकरण स्वाभाविक है। इस सिद्धांत को भारतीय काव्यशास्त्र में साधारणीकरण कहते हैं। 

निष्कर्ष: साहित्य और मनोविज्ञान दोनों का अपना-अपना महत्त्व है। किंतु साहित्य-सृजन मनोविज्ञान की भूमिका के बिना संभव नहीं है अथवा कह सकते हैं कि साहित्य का अस्तित्व मनोविज्ञान के बिना संभव नहीं हो सकता किंतु मनोविज्ञान का अस्तित्व साहित्य के बिना हो सकता है।                      

संदर्भ-ग्रंथ सूची –

1.  फ्रॉयड, मनोविश्लेषण,  सं. 2004. राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली.

2.  रेने वेलेक एवं आस्टिनवारेन, साहित्य-सिद्धांत, सं. 2000, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद. 

3.  डॉ. प्रीति वर्मा, डॉ. डी. एन. श्रीवास्तव, आधुनिक सामान्य मनोविज्ञान, तेरहवाँ 2005, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा.  

4.  डॉ. देवराज उपाध्याय, आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य और मनोविज्ञान, सं. द्वितीय, 1963 इसवी. साहित्य भवन प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद.

5.   डॉ. पद्मा अग्रवाल, मनोविज्ञान और मानसिक क्रियाएँ, सं. द्वितीय, 1955, मनोविज्ञान प्रकाशन, बनारस.

6.   गणपति चन्द्र गुप्त, रस सिद्धांत का पुनर्विवेचन, सं. द्वितीय, 1998, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद.

7.  http://www.ignited.in/I/a/200773. (मनोविज्ञान और हिन्दी कथा साहित्य – शिक्षा रानी)

8.   https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/92659/6/06_chapter-1.pdf (मनोविज्ञान का स्वरूप एवं परिभाषा चरित्र का स्वरूप एवं परिभाषा)

9.    https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/227701/6/06_%20chapter%201.pdf (अवचेतन प्रभावों की रूपात्मकता : तथ्य, परिभाषा एवं विश्लेषण)

10. https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/93506/8/08_chapter%203.pdf (हिन्दी उपन्यासों में मनोवैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक उपन्यासों पर विविध विचारधाराओं का प्रभाव)



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आलेख



डाॅ. रेनू यादव 


स्त्री-विमर्श के आईने में राधा का प्रेम और अस्तित्व

अर्थात् कृष्ण के प्रत्येक नाम के साथ राधा का नाम, जबकि कृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार माने जाते हैं, उनकी स्वयं अपनी पहचान है । प्रश्न यह उठता है कि राधा का ही नाम क्यों, रूक्मिणी अथवा सत्याभामा का नाम क्यों नहीं ? कृष्ण का नाम उनकी 16108 रानियों-पटरानियों अथवा ब्रज में गोपियों ललिता, चन्द्रावती, प्रमदा, सुषमा, शीला, वृन्दा आदि, जो कृष्ण से अनन्य प्रेम करती थीं, क्यों नहीं जोड़ा जाता ? क्या सिर्फ इसलिए कि राधा लक्ष्मी की अवतार थीं, अथवा स्वयं कृष्ण की अंश ? गोपियाँ खंडिता नायिका क्यों मानी गयीं और रानियाँ-पटरानियाँ जीवनसंगिनी-कर्मसंगिनी होकर भी क्यों अपनी पहचान नहीं बना पायीं, जबकि भारतीय समाज में पत्नी का महत्त्वपूर्ण एवं सम्माननीय स्थान होता है न कि प्रेमिका का...?

ये सभी अस्मितापरक प्रश्न हमारे इतिहास और राधा के जीवन-चरित्र को बार बार खंगालने के लिए विवश करते हैं । वैसे तो कई विद्वानों का मानना है कि राधा एक काल्पनिक पात्र थीं उनका कोई अस्तित्व ही नहीं था, किंतु काल्पनिक ही सही हमारे धर्म-ग्रंथों में, साहित्य में राधा का अस्तित्व है । इसलिए इन्हीं धर्म-ग्रंथों तथा साहित्य को आधार बनाकर ही कृष्ण की राधा एवं राधा के कृष्ण को समझना होगा । अतः राधा के प्रेम को समझने के लिए उस समय के समाज में स्त्रियों की स्थिति एवं नैतिकता के मानदंड़ों को समझना अतिआवश्यक है ।

महाभारतकालीन समाज और कृष्ण का समाज समकालीन था, इसलिए उस समय के समाज में स्त्रियों की स्थिति लगभग एक जैसी थी और नैतिकता के मानदंड भी । उस समय पुत्रियाँ पुत्रों के समान शिक्षा ग्रहण करती थीं, वे पिता पर बोझ नहीं थीं । उनका पुत्रों की भाँति जातकर्मादि आदि होता था, उदाहरण के लिए महाराजा शान्तनु ने गौतम के पुत्र और पुत्री कृप और कृपी का और महाराज अश्वपति ने सावित्री का जातकर्म किया था । चूंकि निम्न वर्ग की स्त्रियों का उल्लेख नहीं मिलता लेकिन उच्चवर्ग की स्त्रियों की शिक्षा पितृगृह में ही होती है । उस समय पुत्र की भाँति स्त्रियाँ भी दान में दी जाती थी । जैसे यदुश्रेष्ठ शूर ने अपनी पुत्री पृथा को अपने फुफेरे भाई कुन्तीभोज को दान में दिया, पृथा का नाम कुन्तीभोज की पुत्री होने के कारण कुन्ती पड़ा ।

- भट्टाचार्य, सुखमय. महाभारतकालीन समाज. पृ.63-64

वे पति की कर्मसंगिनी हुआ करती थीं तथा सलाहकार भी । कुंती, सत्यवती, शकुन्तला आदि का नाम एक अच्छे सलाहकार के रूप में उल्लेखनीय है । दुखद स्थिति में विवाहित स्त्रियाँ अपने पिता अथवा सगे-संबंधियों के घर जाया करती थीं । जैसे पांडवों के वनवास गमन पर सुभद्रा का अपने पिता के घर रहना । किंतु अधिक दिनों तक पिता के घर रहना निंदनीय माना जाता था । शकुन्तला, सावित्री, द्रोपदी, गांधारी, रोहिणी, सत्यभामा, सुभद्रा आदि स्त्रियाँ सतीत्व की उदाहरण हैं । कुंती, गांधारी, द्रोपदी, दमयंती, शकुन्तला, सावित्री आदि सशक्त स्त्रियाँ पतिपरायण और पवित्र थीं । कुंती का अपने पति की आज्ञा से नियोग अपनाना, गांधारी का नेत्रहीन पति का साथ देने के लिए स्वयं आखों पर पट्टी बाँध लेना, द्रोपदी का हस्तिनापुर का कोष संभालना, दमयंती का अपने पति नल द्वारा राज्य की उपेक्षा करने पर स्वयं राज्य संभालना, शकुन्तला का अपनी पहचान के लिए दुष्यंत तक पहुँचना और उन्हें पति रूप में प्राप्त करना, सावित्री का यम से सत्यवान को वापस लाना आदि मिथकों से स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ अपना फैसला ले सकती थीं और उस समय पतिपरायण स्त्रियों को ही सम्मान प्राप्त था । ऐसी स्त्रियों का श्राप भी प्रभावशाली होता था । उस समय पुत्र की अपेक्षा पति को अधिक महत्त्व दिया गया जैसे कि देवकी ने कंस के सम्मुख कृष्ण की अपेक्षा वासुदेव के जीवन का चयन किया । स्त्रियाँ सभा में सहभागी होती थीं, उनके आदेश, सलाह, और विचारों का सम्मान होता था । गृहस्थ आश्रम के पश्चात् वे वानप्रस्थ आश्रम में भी प्रवेश करती थीं जिसका उदाहरण स्वयं सत्यवती, गांधारी, कुंती, सत्यभामा आदि हैं । पति के मृत्यु पर सति होने का भी उल्लेख मिलता है और जो स्त्रियाँ सति नहीं होती थीं वे प्रायः पिता के घर रहा करती थीं ।

किंतु उनपर भी मनुस्मृति का नियम लागू था । विवाह से पूर्व पिता का और विवाहोपरांत पति का अधिकार होता था और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इन सबके वावजूद कहीं न कहीं स्त्रियों के प्रति नैतिकता के दोहरे मानदंड भी निर्धारित थे ।

 श्रीमद्भागवत में स्त्री का जन्म पूर्वजन्म के पापों का फल बताया गया है ।

मां ही पार्थ व्यापाश्रित्य येsपि स्युः पापयोनयः ।

स्त्रियों वैश्यास्तथा शूद्रास्तेsपि यान्ति परां गतिम्।।

-       पाण्डेय, डॉ. दर्शन. नारी अस्मिता की परख. पृ. 11. (महाभारत – महर्षि व्यास – 13/40/14-15)

 नारद-पंचचूडा संवाद में नारी को दोषों की खान कहा गया है ।

-  पाण्डेय, डॉ. दर्शन. नारी अस्मिता की परख. पृ. 11.

उस समय भी अपहरण, बलात्कार, विवाह, श्राद्ध, उपहारस्वरूप दान में देना, दास्य-प्रथा, नियोग, सति-प्रथा आदि का उदाहरण स्त्री के वस्तुगत मूल्यांकन की ओर संकेत करता है । लड़कियाँ बोझ नहीं थीं किंतु अनैतिक आचरण स्वीकार्य नहीं था । कुंती विवाह के पूर्व गर्भवती होने पर समाज में उपेक्षा के भय से अपने पुत्र कर्ण को स्वयं से दूर करने के लिए विवश हो गईं, जबकि उनके पति पाण्डु पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्हें अन्य पुरूषों के पास नियोग हेतु भेजते देते हैं । नियोग का उल्लेख अम्बिका, अम्बालिका, कुंती, माद्री के संदर्भ में भी प्राप्त होता है । बहुपत्नी विवाह, बहुपति विवाह और नियोग हो सकता था किंतु विवाहेत्तर संबंध मान्य नहीं था । पतिव्रता का प्रमाण है कि बलराम देवकी के गर्भ से सीधे चमत्कारिक ढंग से रोहिणी के गर्भ में समा जाते हैं । वहीं सुरक्षात्मक दृष्टि से कृष्ण को रोहिणी के पास नहीं भेजा जाता बल्कि यशोदा के पास भेजा जाता है । वह भी तब जब यशोदा सोई रहती हैं और उनके बगल में सोई लड़की को कृष्ण के बदले बलि के लिए भेज दिया जाता है । इससे ज्ञात होता है कि स्त्री की स्थिति कैसी रही होगी ? माता यशोदा कृष्ण को स्वीकारती हैं और पति के निर्णय को ही अपना निर्णय मानती हैं । पुत्र और पुत्री में समानता थी किंतु पुत्र-आकांक्षा के कारण पुत्रियाँ उपेक्षित हो जाती थीं जैसे कि द्रोपदी । स्त्रियाँ विदुषी थीं उनके सलाह का महत्त्व था किंतु वर्चस्ववादी सत्ता उनके सुझाव की उपेक्षा भी करते थे जैसे कि पुत्र मोह में डूबे धृतराष्ट्र को गांधारी ने समाझाया किंतु धृतराष्ट्र ने उनकी बातों की उपेक्षा की, द्रोपदी को दाव पर लगाए जाने के पश्चात् द्रोपदी चीख चीखकर अपनी रक्षा के लिए सबको पुकारती रहीं किंतु समस्त सभागण निष्क्रिय रहें । अंबा अपने अस्तित्व की लडाई में आत्मदाह कर बैठीं । शकुन्तला गंधर्व-विवाह के पश्चात् भी एक अंगूठी की पहचान से अपनी पहचान बनाने हेतु भटकती रहीं ।

अतः स्पष्ट है कि समाज और नैतिकता के दोहरे मानदंडों में स्त्री का जीवन यदि उच्च कुल में इतना जटिल एवं दुष्कर था तो मध्यम वर्ग और निम्न कुल में क्या स्थिति रही होगी ? और इन सबके बीच राधा…?

राधा किसी राजघराने से नहीं थीं । राधा का कृष्ण से बड़ा होना, उनका विवाहेत्तर संबंध और कृष्ण के लिए अपना जीवन समर्पित कर देना किसी चुनौती से कम नहीं रहा होगा । सामाजिक एवं नैतिक वर्जना के बावजूद भी राधा की पहचान उनके प्रेम के चर्मोत्कर्ष के कारण है, अर्थात् प्रेम गली अति साकरी... को उन्होंने विस्तार दे दिया ।

राधा-कृष्ण पर अनेक ग्रंथ प्राप्त होते हैं, जैसे कि जयदेव का गीतगोविन्द, चंडीदास की पदावली, विद्यापति की पदावली, भट्टनारायण के वेणीसंहार, सोमदेव के यशस्तिलक चम्पू, लीला शुक का कृष्ण कर्णामृत, ईश्वरपूरी का श्रीकृष्ण लीलामृत, बोपदेव का हरि लीला, वेदांत देशिक का यादवाभ्युदय, स्वामी श्रीधर का ब्रजबिहारी, रामचंद्र भट्ट का गोपलीला, चतुर्भुज का हरिचरित काव्य, कृष्ण भट्ट का मुरारि विजय नाटक, कृष्णवल्लभा की उज्जवल नीलमणि, सूरदास का सूरसागर और नंददास का मानमंजरी, बिहारी की बिहारी-सतसई के कुछ दोहे, अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध का प्रिय-प्रवास, धर्मवीर भारती की कनुप्रिया आदि ग्रंथों में राधा के अलग-अलग अनेक रूप दृष्टिगत होते हैं, जैसे मोहक छवि वाली राधा, भोग-विलासिनी राधा, स्वकीया राधा, परकीया राधा, वाक्वैदग्ध राधा, वियोगिनी राधा, प्रेम-रमिणी राधा आदि । राधा किसी नारी का नाम नहीं हैं, यह नारी-जीवन की सम्पूर्ण-गरिमा, तेजोद्दीप्तता, समर्पण, प्रेम की अनन्यता तथा सम्पूर्ण सौन्दर्य, शील और प्रहा के घन-विग्रह का अभिधान है । राधा भारतीय प्रेम-साधना की परिणति का नाम है

-सिंह, डॉ. शिवप्रसाद. विद्यापति. पृ. 111.

कृष्ण के सात वर्ष की अवस्था में राधा के साथ प्रथम नेत्रोत्मिलन हुआ था । महाकवि सुरदास जी कहते हैं -

                           औचक ही देखी तहँ राधा नयन बिसाल भाल दिये रोरी ।

                            नील बसन फरिया कटि पहिरे बेनी पीठ रूलति झकझोरी ।

                            संग लरिकनी चलि इत आवति दिन थोरी अति छबि तन गोरी ।

                            सूर स्याम देखत ही रीझे नैन नैन मिलि परी ठगौरी

-       शर्मा, हरबंसलाल, संपा. सूरदास. पृ. 204.

आयु में राधा कृष्ण से पाँच वर्ष बड़ी थीं, इसलिए स्वाभाविक है कि वे कृष्ण से अधिक समझदार एवं परिपक्व रही होंगी । पूनम दिनकर के अनुसार प्रेम उम्र नहीं देखता, रंग रूप कद काठी, जाति-धर्म, उचित-अनुचित, कुछ भी नहीं देखता । प्रेम निश्चित रूप से एक उच्च भावना है जिसमें त्याग निहित होता है । प्रेम से बढ़कर कर्तव्य का स्थान होता है, प्रेम प्रवाह हो सकता है परंतु उस दुःख की दवा भी प्रेम है

-शब्द रेखा (प्रेम-विशेषांक) सं. एवं प्रकाशक – विश्वप्रताप भारती (पृ. 16) (प्रेम पर कुछ विचार, पूनम दिनकर)

          सूरसागर के पद्यों के अनुसार राधा-कृष्ण बढ़ती उम्र के साथ-साथ एक दूसरे के पूरक बनते गए । उनकी बाल्य-अटखेलियाँ एवं नोक-झोक की जगह धीरे-धीरे दर्शन, मान-मनुहार, प्रेम, ईर्ष्या आदि ने ले ली और 11 वर्ष की अवस्था में कृष्ण ने रास रचाया, सूरदास के शब्दों में –

                        अपनी भुजा स्याम भुज ऊपरि स्याम भुजा अपने उर धरिया ।

                         यों लपटाइ रहे उर-उर ज्यों, मरकत मणि कंचन में जरिया

-शर्मा, हरबंसलाल, संपा. सूरदास. पृ. 206.

           विद्यापति ने राधा के सौंन्दर्य का वर्णन करते समय अपना हृदय उड़ेल दिया हैं किंतु जब स्वयं राधा के मुख से उनकी रति-कथा कहलावाते हैं तब उन्हें एक सामान्य नायिका की भाँति चित्रित करते हैं । वे कृष्ण-समागम का वर्णन अपनी सखी से करते-करते कहती हैं -

                        हँसि हँसि पहु आलिंगन देल

                         मनमथ अंकुर कुसुमित भेल

                         जब निवि बन्ध खसाओल कान

                        तोहर सपथ हम किछु जदि जान

-सिंह, डॉ. शिवप्रसाद. विद्यापति. पृ. 126.

संयोग-पक्ष का वर्णन राधा-कृष्ण से जुडने वाले समस्त कवियों ने किया है, किंतु सूरदास ही एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने राधा-कृष्ण के बचपन से लेकर प्रेम का बढ़ना और पिघलना दिखाया है । नीवी खोलत धीरे-धीरे गाने वाले सूरदास मर्यादा की रेखा पार नहीं करतें, जबकि जयदेव और विद्यापति मर्यादा का उल्लंघन करते हुए दिखाई पड़ते हैं । रसखान ने राधा के सौंदर्य को दर्शाया है । जिससे प्रकृति भी प्रभावित है । उनके सम्मुख अंग, मृग, खंजन, मीन भी लज्जित हैं

रसखान-रत्नावली https://books.google.co.in/books?id=4tBUBQAAQBAJ&pg=PA33&lpg=PA33&dq=रसखान के+काव्य+में+राधा&source=bl&ots=

गाथा-सप्तशतीके कुछ पदों में राधा के प्रेम का चित्रण प्रतीत होता है । सूरदास ने पनघट-लीला, हिंडोल-लीला, फागुन लीला आदि में राधा कृष्ण के संयोगावस्था को दर्शाया है । जयदेव की भोगविलासिनी प्रेम विह्वला राधा, विद्यापति की यौवनशील मोहक छवि वाली यौवनोन्मत्त विरहिणी परकीया राधा, बंगाल के वैष्णव कवि चंडीदास की कोमल उन्मादिनी विरहिणी एवं परकीया राधा, नंद की वाक्वैदग्ध राधा, बिहारी की छैल-छबिली साध्या राधा से कहीं अलग सूरदास की सरल किशोरी मर्यादित संतुलित नागरी राधा हैं । चंडीदास की राधा गोपियों के साथ कृष्ण को देखकर तनिक आशंकित हैं, उन्हें सास ननद का भय सताता है तो विद्यापति की राधा की यौवनावस्था में बदलती क्षण-क्षण की चेष्टाएँ, बिहारी की चंचल राधा का मुरली छिपा लेना सूर की राधा से भिन्नता को दर्शाता है । किंतु आधुनिक युग में राधा का आधुनिक नारी का स्वरूप दृष्टिगत होता है । प्रिय प्रवास की राधा आधुनिक चेतना की संवाहिका, युगीन नारी चेतना (प्रेम, कर्तव्य, त्याग, निष्ठा, शील) का सच्चा प्रतिनिधित्व करती हैं । कनुप्रिया की राधा का तन्मय एवं स्वकीया रूप का निरूपण हुआ है  वे स्वयं को और कनु की स्थिति को एक मानती है ।

                             मेरे स्रष्टा

                              तुम्हारे सम्पूर्ण अस्तित्व का अर्थ है,

                              मात्र तुम्हारी सृष्टि

                              तुम्हारी सम्पूर्ण सृष्टि का अर्थ है

                              मात्र तुम्हारी इच्छा

                              और तुम्हारी सम्पूर्ण इच्छा का अर्थ हूँ

                              केवल मैं ! केवल मैं !! केवल मैं !!!”

-https://books.google.co.in/books, कनुप्रिया, पृ. 30 (नई कविता के प्रबन्ध काव्य-शिल्प और जीवन-दर्शन),

पद्मपुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक वैश्य गोप की पुत्री थीं । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं । किशोरावस्था में उनका विवाह रापाण, रायाण अथवा अनयघोष नामक व्यक्ति से हुआ था, जो कि माता यशोदा के भाई थे । इस प्रकार राधा श्रीकृष्ण की मामी हुईं । इसी पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार राधा कृष्ण की पत्नी (विवाहिता) थीं । जिनका गंधर्व-विवाह ब्रह्मा ने स्वयं करवाया था । गर्ग संहिता के अनुसार श्रीकृष्ण के पिता नंद उन्हें प्रायः पास के भंडिर ग्राम में ले जाया करते थे, जहाँ उनकी मुलाकात राधा से हुआ करती थी ।

- http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/radha-krishna-114051000009_9.html

 ध्यातव्य है कि गोपियों को इन्द्रियों का प्रतीक माना जाता हैं, जिन्हें कृष्ण ने वश में करने हेतु लीला किया । वे सभी खंडिता नायिकाएँ थीं, जो कि दूती का कार्य भी करती थीं किंतु राधा कृष्ण के लिए सर्वाधिक प्रिय थीं । राधा का प्रेम साधारण प्रेम नहीं था बल्कि सूक्ष्मातिसूक्ष्म था, उन्हें कृष्ण ने स्वयं अपने अंश से बनाया था इसलिए वे अलग रहें या एक साथ, क्या औचित्य ? इन सभी कथाओं का उद्देश्य मात्र लीला है आदि ।

किंतु यदि सांसारिक धरातल पर राधा-कृष्ण के प्रेम को देखा-परखा जाए तो ये कथा मात्र एक दैवीय कथा नहीं बल्कि प्रेम की प्रतिमूर्ति स्वाभिमानी स्त्री की कथा है । ये वही राधा हैं जो कृष्ण से क्षण भर दूर होने मात्र से मुर्च्छित हो जाती थीं, मुरली की धून सुनकर बेसुध बरबस खिंची चली आती थीं । जिसके लिए उन्होंने पति, परिवार, समाज, धर्म, नैतिकता को ताक पर रखकर अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया और अपना जीवन दाव पर लगा दिया, वही कृष्ण उन्हें एक दिन छोड़कर चले गए कुछ प्रश्नों, अपेक्षाओं और एक तड़पते दर्द के साथ... ।

हमारा समाज स्त्रियों के लिए आज भी दोहरे मानदंड तय करता है और उस समय भी करता था । एक ही घर में स्त्री-पुरूष दोनों के लिए अलग-अलग संस्कार और चारित्रिक मूल्य निर्धारित किए जाते हैं । कृष्ण विष्णु के अवतार थे, इसलिए राधा पर कोई आंच नहीं आयी किंतु राधा का दर्द दैविय अवधारणाओं में कहीं दब-सा जाता है । देवी बनाने के चक्कर में राधा की आँखें रेत बनकर समस्त आँसूओं को एक साथ सोख लेती हैं, क्योंकि उन्हें कृष्ण ने वचन दिया था कि मेरे जाने के पश्चात् तुम रोना मत... !

प्रश्न यह है कि क्या सचमुच राधा कृष्ण की खुशी के नहीं रोईं अथवा उनकी अंतरात्मा ने उन्हें रोने नहीं दिया अथवा एक तड़पता दर्द कि जिससे उन्होंने इतना प्रेम किया वे यूँ ही बिना बताए छोड़कर जा रहे थे, यदि वे नहीं जान पातीं और उनसे मिलने नहीं आतीं तो कृष्ण बिना मिले ही चले जातें... ! हो सकता है वे अपने आपको ठगा-सा महसूस कर रही हों अथवा कृष्ण का जाना वो आसानी से सहन नहीं कर पायीं इसलिए उसी समय से जड़ बन गईं ।

प्रेम में सुध-बुध खो देना आसान है पर जब मनुष्य छला हुआ महसूस करता है तब उसकी संम्पूर्ण चेतना जाग जाती है । राधा आध्यात्मिक एवं दार्शनिक रूप से जाग गई थीं । कदाचित् इसीलिए संयोग में उन्होंने बंधन स्वयं तोड़ा था पर वियोग में वे स्वतः स्वछंद हो गईं, क्योंकि प्रेम बंधन देता है और वियोग स्वच्छंदता । राधा बंधन-मुक्त हो गईं । कनुप्रिया में राधा के संदर्भ में डॉ. हुकुमचंद राजपाल ने कहा है, कनुप्रिया में राधा एक देवी की अपेक्षा मानवी के रूप में अधिक उभरी है । उसके मानवी प्रेम को भी गहनता के कारण दिव्यत्व की स्थिति प्राप्त हुई है । उसके मिलन श्रृंगार के भी बड़े ही सरस दृश्य अंकित हुए हैं। प्रभाव की दृष्टि से यही कहा जा सकता है कि राधा का चरित्र आध्यात्मिक और श्रृंगारिक स्वरूपों की भूलभूलैयों से बाहर आकर अपनी सनातन उपेक्षा की व्यथा के विषैले घूँट को पचाकर, अपने अस्तित्व की रक्षा की सौम्य चाह प्रकट करने वाली स्त्री के चरित्र के रूप में अंकित हो गया है

-       सुलभा बाजीराव पाटिल – कनुप्रियाः एक मूल्यांकन, पृ 88 (नई कविता के प्रबन्ध काव्य-शिल्प और जीवन-दर्शन) https://books.google.co.in/books

संदेह नहीं कि राधा ने कृष्ण से उद्दात्त प्रेम किया था । बचपन के सखे का प्रेम विवाहेत्तर संबंध में परिवर्तित हुआ और सदैव एकनिष्ठ रहा । वे आजीवन कृष्ण की प्रतीक्षा करती रहीं । यदि पूर्वजन्म की लेखनी (श्राप) भूल जाया जाए और यथार्थ के धरातल पर उनके प्रेम को स्पर्श करें तो दृष्टिगत होता है कि विछोह की अवस्था में उनका स्वाभिमान और हठ ही उनके जीने का सम्बल बना । संयोगावस्था में रूठ जाने पर कृष्ण उन्हें मनाने के लिए घंटों उनके दरवाजे पर खड़े रहते थे, किंतु वे आसानी से बाहर नहीं आती थीं, यदि आतीं तो अत्यंत मान-मनुहार और प्रतीक्षा के पश्चात्.. ।

कृष्ण का मथुरा-प्रवास और वहाँ से मिलने न आना कहीं न कहीं स्त्री-अस्तित्व पर लगी वह चोट थी, जिसका उत्तर देना उनके लिए स्वयं भारी था । कदाचित् वह एक विरहिणी प्रेम विह्वला स्त्री का हठ ही रहा होगा कि उन्होंने श्याम का प्रिय पेय दूध पीना छोड़ दिया, शौक-श्रृंगार तो दूर अपने जीवन में दुःख से पुनः उबरने का खयाल भी न रहा । यह हठ ही तो था कि वे 7 मील चलकर स्वयं मथुरा नहीं गईं और पूरे मान के साथ आजीवन प्रतीक्षारत् रहीं ।

वहीं दूसरी ओर कृष्ण को जैसे ही पता चलता है कि रूक्मिणी उनसे इतना प्रेम करती हैं कि किसी और से विवाह नहीं कर सकतीं, तब वे उन्हें विवाह-मंडप से भगाकर गंधर्व-विवाह कर लेते हैं । वजह चाहे जो भी हो किंतु जहाँ 16108 विवाह हो सकता था वहीं एक और क्यों नहीं अथवा कुछ और क्यों नहीं ? क्योंकि उनसे तो न जाने कितनी ही ब्याही-अनब्याही कन्याएँ प्रेम करती थीं...!

 यदि मात्र महिमामंडन हेतु राधा-कृष्ण के विवाह का प्रसंग न लिखा गया हो और सचमुच कृष्ण के साथ उनका गंधर्व-विवाह हुआ हो, तो राज-काज संभालने के पश्चात् राधा को पत्नी का दर्जा क्यों नहीं मिला । यदि विवाह हुआ था तो फिर पिछले जन्म के श्राप का भला क्या महत्त्व ? यदि मान लिया जाय कि राधा विवाहित थीं, उस समय तलाक नहीं हो सकता था तो भी यह किसी समस्या का समाधान नहीं था, क्योंकि राधा पतिपरायण या पतिव्रता स्त्री नहीं मानी जा सकतीं । इसलिए पति को छोड़कर कृष्ण को अपनाना उनके लिए आसान था । साहित्य में चित्रित राधा के व्यक्तित्व के अनुसार वे प्रेम में ईष्यालु थीं, उन्हें कृष्ण का गोपियों  के साथ क्रीडा पसन्द नहीं था । अर्थात् उनका प्रेम लौकिक विशुद्ध प्रेम था न कि श्रद्धा । जिस प्रकार कृष्ण के गोपियों के साथ कई हिस्सों में बँटने पर भी उन्होंने गोपियों को स्वीकार कर लिया था उसी प्रकार उनकी रानियों-पटरानियों को भी स्वीकार कर लेतीं ? प्रश्न यह भी है कि कृष्ण मथुरा जाने के पश्चात् अपने उत्तरदायित्वों में खो जाते हैं जबकि राधा प्रतीक्षा करती रहती हैं । तो क्या कृष्ण भी उसी वर्चस्ववादी मानसिकता के शिकार थे कि विवाहेत्तर संबंध बनाने वाली अथवा रास रचाने वाली स्त्री से विवाह नहीं करना चाहिए ? वे राधा के वियोग में रो सकते थे, उनकी पीड़ा महसूस कर सकते थे तो फिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि वे उनसे मिलने नहीं आ सकें ?   

वर्षों बाद यदि कोई आता है तो उद्धव । उद्धव से गोपियाँ संवाद करती हैं किंतु राधा नहीं । और कहतीं भी क्या.. वे उस युग में छली गईं जिस युग में बहुपत्नी विवाह और बहुपति विवाह धड़ल्ले से प्रचलित था और कृष्ण स्वयं उसके भुक्तभोगी एवं प्रत्यक्षदर्शी थे । राधा द्रोपदी की तरह आवाज नहीं उठा सकती थीं, और न ही वे इतनी समृद्ध थीं कि एक राजा से गुहार लगातीं, वे सुदामा की भाँति उनके महल में प्रवेश भी नहीं कर सकती थीं क्योंकि कृष्ण विवाह करके किसी और के हो चुके थे । कदाचित् इसीलिए उद्धव से वे कुछ न कह पायीं । उद्धव कृष्ण से मूक राधा की व्यथा सुनाते हैं–

                           “तुम्हरे बिरह ब्रजनाथ राधिका नैनिन नदी बढ़ी ।

                            लीने जात निमेष कूल दोउ एते मान चढ़ी ।।

-       शर्मा, हरबंसलाल, संपा. सूरदास. पृ. 210.

राधा स्वयं से भी आहत थीं, उन्हें उनकी एकनिष्ठता ने छला था... उनका कुछ न कहना उनके अस्तित्व पर लगी चोट थी जिसे न तो वो छुपा सकती थीं और न ही दिखा सकती थीं ।

कुरूक्षेत्र में राधिका का मिलन एक व्यथित हृदय का मिलन था । न जाने कितने सवाल अपना जबाव खो चुके थे और उत्सुकता व्याकुल हो चुकी थी, किंतु एक भय कि इतने दिनों बाद क्या कृष्ण मिलना भी चाहेंगे ? उन्हें पता है कि कृष्ण को अब राधा की जरूरत नहीं, उनके विरह में सिर्फ राधा जल रही हैं, कृष्ण के विरह की तीव्रता अब पहले जैसी नहीं रही होगी । कृष्ण पधारें भी तो अपनी पत्नी के साथ, शायद राधा इसकी कल्पना भी नहीं की होंगी, वे कृष्ण के साथ एकांत ही चाह रही होंगीं । राधा ने देखा कि कृष्ण अब वो हमारे कृष्ण नहीं, वे अब महाराजा हैं, किसी के पति हैं । एक संवेदनशील स्त्री कभी भी किसी और के पति पर अपना कोई अधिकार नहीं समझती । राधा आहत मन से स्वागत करने वाली बालाओं के बीच खड़ी हो गईं ।

सूरदास के अनुसार रूक्मिणी गोपियों के बीच राधा को न पहचान कर कृष्ण से पूछती हैं कि उनमें से वृषभानु कुमारी, आपके बालपन की साथी कौन हैं ? कृष्ण बड़े सुन्दर ढ़ंग से कहते हैं –

                   देखो जुवति वृन्द में ठाढ़ी नील बसन तनु गोरी ।

                    सूरदास मेरौ मन बाकी चितवन देखी हरयौ री।।

-       शर्मा, हरबंसलाल, संपा. सूरदास. पृ. 212.

         और फिर सूर की राधा को रूक्मिणी अपने घर लिवा जाती हैं, और माधव से राधा की भेंट करवाती हैं –

                   राधा माधव माधव राधा कीट भृंग गति ह्वै जु गई ।

                    माधव राधा के रँग राचे राधा माधव रंग गई

-  शर्मा, हरबंसलाल, संपा. सूरदास. पृ. 213.

कृष्ण ने अपने और राधा में भेद मिटाने की बात कही किंतु भावुक राधा के मुख से कोई बोल न फूटे । बिन कुछ कहे ही वे वापस लौट आती हैं ।

यदि राधा का कृष्ण से मिलन हो गया होता अथवा वे अपने पति को स्वीकार ली होतीं अथवा किसी और से विवाह कर ली होतीं तो कदाचित् राधा भी कहीं गुमनामी के अंधेरे में खो गई होतीं । किंतु राधा कृष्ण से बिछड़ने के बाद भी अपने प्रेम मार्ग पर अटल रहीं । वे कृष्णमय हो गईं । ठगे जाने का एहसास हो या प्रेम का अतुलनीय स्वरूप राधा ने रिश्तों की परवाह किये बिना आजीवन एकाकीपन में गुजार दिया । एक स्वाभिमानी स्त्री का आसक्ति से विरक्ति, स्थूल से सूक्ष्म, आकर्षण से विकर्षण, लौकिक से पारलौकिक में जाना अपने आप में एक चूनौती भरा चयन था ।  वे उम्र में बड़ी थीं, विवाहित थीं, रिश्ते में कृष्ण की मामी भी । यह समाज में किसी भी अवस्था में ग्राह्य नहीं । यदि मान लिया जाय की मामी भी बाल्यावास्था में अपने भाँजे के साथ खेलती थीं, किंतु बड़े होने के पश्चात् कौन उनके रिश्ते को स्वीकारता... ? स्वयं कृष्ण भी नहीं...? कृष्ण प्रेम कर सकते थे विवाह नहीं । क्योंकि आयुनुसार देखा जाय तो कृष्ण का प्रेम किशोरावस्था अथवा लड़कपन का प्रेम प्रतीत होता है और राधा का प्रेम परिपक्वता की ओर अग्रसर । इसलिए प्रेम में राधा को अकेले ही जलना था । राधा का प्रेम विद्यापति के शब्दों में वह कुन्दन है जो दुःसह आँच में तप-तपकर निरंतर चमकीला होता गया।                        

-सिंह, डॉ. शिवप्रसाद. विद्यापति. पृ. 125.

उनके प्रेम की परिपक्वता ही उन्हें अपने मार्ग पर टिके रहने के लिए विवश कर देती है । आश्चर्य नहीं कि उन्हें पतिव्रता न होने के कारण अपमान और पीड़ा का दंश भी झेलना पड़ा होगा, उसके बावजूद भी उन्होंने आजीवन कृष्णमय होकर गुजारा, अपने अस्तित्व को अद्वैत बना दिया ।

तत्कालीन समाज ने इन्हें कितना देवी बनाया और कितना महिमामंडित किया, यह कहना मुश्किल है । किंतु धार्मिक ग्रंथों और साहित्यकारों ने इनके टूटन-घुटन और चुप्पी को देवी अवश्य बना दिया । आज के समय में अवतारवाद की अवधारणा के कारण राधा सिर्फ इसलिए पूजनीय नहीं हैं कि वे कृष्ण की अंश थीं अथवा लक्ष्मी की अवतार, बल्कि इसलिए पूजनीय हैं कि उन्होंने अपना कंटकाकीर्ण मार्ग स्वयं चुना और समाज के विपरीत जाकर प्रेम की दुनियाँ में अपनी पहचान बनाईं । वरना पितृसत्ता में कृष्ण से पहले राधा का नाम कभी नहीं आता, हो सकता है कि इसमें तनिक सहयोग कृष्ण का महाराजा बनना और चमत्कारिक ढ़ंग से समस्त समस्याओं को हल करने की लोकप्रियता भी शामिल हो । आज के समय में समाज-सुधार के बावजूद भी प्रेमिकाओं को ऑनर कीलिंग, तलाक, मार-पीट का शिकार होना पड़ता है, दोहरे मानदंड़ो का सत्य तो यह है कि राधा जैसी प्रेमिका और सीता जैसी पत्नी सबको चाहिए, किंतु राधा अपने घर की बहू -बेटी के रूप में न हो । अतः ऐसे समाज में राधा युगों-युगों तक भक्तों के लिए भक्ति, प्रेमियों के लिए प्रेम-प्रतीक और अपनी अस्मिता स्थापित करने वाली समस्त नारियों के लिए पथप्रदर्शिका के रूप में पूजनीय एवं सम्माननीय रहेंगी ।

संदर्भ-ग्रंथ –

1.    शर्मा, हरबंसलाल. संपाः, सूरदास. राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली. सं. पहला 1966, दूसरा 2011.

2.    सिंह, डॉ. शिवप्रसाद. विद्यापति. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. सत्रहवाँ 2004.

3.    पाण्डेय, डॉ. दर्शन. नारी अस्मिता की परख. संजय प्रकाशन, नई दिल्ली. प्रथम 2004.

4.    भट्टाचार्य, सुखमय. महाभारतकालीन समाज. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. द्वितीय 2003.

5.    सहगल, डॉ. मनमोहन. हिन्दी साहित्य का भक्तिकालीन काव्य. हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला. प्रथम 2007.

6.    शर्मा, डॉ. शिव कुमार, हिन्दी साहित्य की युग और प्रवृत्तियाँ. अशोक प्रकाशन, दिल्ली. अठारहवाँ 2003.

7.    नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास. मयूर पेपरबैक्स, नोएडा. तैतीसवां 2007.

8.    शुक्ल, डॉ. धनेश्वर प्रसाद. मध्यकालीन कविता संग्रह. विद्यार्थी पुस्तक भंडार, गोरखपुर. 1996.

9.    शब्द रेखा (प्रेम-विशेषांक) सं. एवं प्रकाशक – विश्वप्रताप भारती (पृ. 16)

10.   http://kavitakosh.org/kk/प्रिय_प्रवास_/_अयोध्या_सिंह_उपाध्याय_’हरिऔध’_/_सप्तदश_सर्ग_/_पृष्ठ_-_3

11.   http://www.hindikunj.com/2009/06/blog-post_15.html

12.    http://spandanhindi.blogspot.in/2009/01/blog-post.html

13.   http://www.mahashakti.org.in/2006/12/blog-post_19.html

14.   http://isha.sadhguru.org/blog/hi/yog-dhyan/radhe-aur-krishna-ki-pehli-raas-leela/

15.   सुलभा बाजीराव पाटिल – कनुप्रियाः एक मूल्यांकन, पृ 88 (नई कविता के प्रबन्ध काव्य-शिल्प और जीवन-दर्शन) https://books.google.co.in/books

16.   http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/radha-krishna-114051000009_9.html

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आलेख

डाॅ. रेनू यादव 


पद्मावत, पूर्वराग और पद्यावती का अस्तित्व

 

पेम घाव दुख जान न कोई । जेहि लागे जानै पै सोई11/1

-अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.115

लौकिक हो अथवा पारलौकिक, प्रेम की पीड़ा भुक्तभोगी ही जान सकता है । दार्शनिक ओशो के अनुसार, प्रेम शक्तियों का निकास बनता है । प्रेम बहाव है । क्रिएशन, सृजनात्मक है प्रेम, इसलिए वह बहता है और तृप्ति लाता है

 - ओशो. संभोग से समाधि की ओर. पृ. 70

एक शोधार्थी के अनुसार, प्रेम संपर्क है, संवाद है और संवेदनात्मक शिरकत है

-               https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf  

जैसा कि हम जानते हैं कि सर्वप्रथम भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में श्रृंगार-रस का उल्लेख प्राप्त होता है । रसराज श्रृंगार के दो भेद हैं – नायक नायिका के परस्पर मिलन एवं प्रेम को संयोग-श्रृंगार तथा नायक-नायिका के विछोह के पश्चात् हृदय में उत्पन्न वियोग को वियोग-श्रृंगार कहा जाता है । वियोग श्रृंगार की चार अवस्थाएँ हैं – पूर्वराग, मान, प्रवास और करूण । कवि विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में इसे तीन प्रकार का बताया है – कुसुम राग, नीली राग तथा मंजिष्ठा राग

https://books.google.co.in/books?id=M2EAf21iLIIC&pg=PT90&lpg=PT90&dq=साहित्य+में+पूर्वराग&source=bl&ots=NdaZ8kNR4i&sig=ACfU3U3oCF3_yn3WgB3bzGUj1HfMKTJ8iQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjy6qahv_gAhUHuY8KHTduCyo4ChDoATABegQICBAB#v=onepage&q=साहित्यजज्%20में%20पूर्वराग&f=false

केशवदास, भिखारीदास, कन्हैयालाल पोद्दार, रामदहिन मिश्र ने भी इन्ही तीनों भेदों को स्वीकृति प्रदान की है । आचार्य मम्मट, भानुदत्त, पंडितराज के अनुसार पाँच प्रकार है – अभिलाष हेतुक, विरस हेतुक, ईर्ष्या हेतुक, प्रवास हेतुक, शाप हेतुक । मतिराम और हरिऔध ने पूर्वाराग, मान, प्रवास तीन ही भेद माने हैं ।

समागम के पूर्व अर्थात् मिलन से पहले का वियोग पूर्वराग, प्रिय अपराध जनित कोप को मान कहा जाता है, जो कि प्रणयमान तथा ईर्ष्यामान दो प्रकार का होता है

- http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/33418/8/08_chapter%204.pdf

नायक अथवा नायिका दोनों में से किसी एक के प्रवासगमन के पश्चात् वियोग को प्रवास तथा नायक नायिका दोनों में किसी एक की मृत्यु अथवा कोई ऐसी आपदात्मक कारण जिसके कारण मिलन सम्भव ही न हो ऐसी स्थिति में उत्पन्न अदम्य वियोग करूण कहलाता है ।

वियोग श्रृंगार के इन चारों भेदों में से पूर्वराग को पूर्वानुराग भी कहा जाता है । पूर्वराग आश्रय के हृदय में उत्पन्न वह एकल व्याकुल दशा है जिसमें आलम्बन को प्रेम का भान ही नहीं होता । इसे आधुनिक समाज में एकतरफा प्रेम भी कहा जाता है । इसमें पूरी सम्भावना होती है कि आलम्बन प्रेम का भान होने पर प्रेम स्वीकारने से इंकार कर दे । यह अंधेरे में चलाये गए तीर के समान है जो लगे तो लगे अन्यथा लगे बिना ही कहीं बिला जाय । भारतीय साहित्य संग्रह के अनुसार पूर्वराग पुं. (कर्म.सं.) साहित्य में किसी के प्रति मन में उत्पन्न होने वाला वह प्रेम जो बिना प्रिय को देखे केवल उसका गुण या नाम सुनने, चित्र आदि देखने से होता है ।  

-              https://www.pustak.org/index.php/dictionary/word_meaning/पूर्व-राग  

श्रृंगार मंजरी के अनुसारपूर्वानुराग को ही पूर्वराग भी कहा जाता है । साक्षात् मिलन या समागम के पूर्व जो प्रेम होता है, वही पूर्वराग है ।

https://books.google.co.in/books?id=M2EAf21iLIIC&pg=PT90&lpg=PT90&dq=साहित्य+में+पूर्वराग&source=bl&ots=NdaZ8kNR4i&sig=ACfU3U3oCF3_yn3WgB3bzGUj1HfMKTJ8iQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjy6qahv_gAhUHuY8KHTduCyo4ChDoATABegQICBAB#v=onepage&q=साहित्यजज्%20में%20पूर्वराग&f=false  

ग्रंथ श्रृंगार मंजरी में गिरिधर पुरोहित पूर्वराग के लक्षण बताते हुए लिखते हैं - 

देखत ही द्युति दंपतिहिं, उपजि परत अनुराग ।

बिनु देखें दुख पाइये, सोइ पूरब अनुराग ।।46।।

https://books.google.co.in/books?id=M2EAf21iLIIC&pg=PT90&lpg=PT90&dq=साहित्य+में+पूर्वराग&source=bl&ots=NdaZ8kNR4i&sig=ACfU3U3oCF3_yn3WgB3bzGUj1HfMKTJ8iQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjy6qahv_gAhUHuY8KHTduCyo4ChDoATABegQICBAB#v=onepage&q=साहित्यजज्%20में%20पूर्वराग&f=false

कुलपति मिश्र ने इसके चार हेतु निर्धारित किए हैं – प्रत्यक्ष-दर्शन, चित्र-दर्शन, स्वप्न-दर्शन, श्रवण । भोज ने अपने ग्रंथसरस्वती-कण्ठाभरण में इन्हीं लक्षणों को महत्त्व दिया है । अर्थात् मिलन से पूर्व प्रत्यक्ष दर्शन, चित्र दर्शन, स्वप्न में दर्शन तथा प्रेमी के रूप-गुण आदि को सुनने के पश्चात् आलम्बन के हृदय में जब प्रेम उत्पन्न हो तथा उस प्रेम को पूरित करने हेतु तीव्र उत्कंठा एवं व्याकुलता के फलस्वरूप विरह-वियोग उत्पन्न हो तो पूर्वराग अथवा पूर्वानुराग की स्थिति कही जाती है ।

पूर्वराग में प्रत्यक्ष-दर्शन श्रवण, चित्र एवं स्वप्न दर्शन के पश्चात् भी हो सकता है, जो पूर्वानुराग और मिलन के मध्य में आता है, उसे सुरतानुराग भी कहा जा सकता है । इसके लक्षण बताते हुए रसलीन रस प्रबोध में लिखते हैं –

जाहि बाति सुनि कै भई तन मन की गति आन ।                                                            

ताहि दिखाये कामिनी क्यौं रहि है मो प्रान ।।965।।

-              http://kavitakosh.org/kk/वियोग_श्रृंगार_/_रस_प्रबोध_/_रसलीन

पूर्वानुराग के मध्य में अति व्याकुलता की स्थिति को वृष्ठानुराग कहते हैं, जिसके लक्षण हैं -

आप ही आग लगाई दृग फिरि रोवति यहि भाइ ।

जैसे आगि लगाइ कोउ जल छिरकत है आइ ।।957।।

-              http://kavitakosh.org/kk/वियोग_श्रृंगार_/_रस_प्रबोध_/_रसलीन

पूर्वानुराग की पहली दशा है - स्मरणदशा अभिलाषा । मोहि इहै चहिए कथन नायक-नायिका की अभिलाषा को सपाट रूप से सीधे व्यक्त कर देता है ।

https://books.google.co.in/books?id=M2EAf21iLIIC&pg=PT90&lpg=PT90&dq=साहित्य+में+पूर्वराग&source=bl&ots=NdaZ8kNR4i&sig=ACfU3U3oCF3_yn3WgB3bzGUj1HfMKTJ8iQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjy6qahv_gAhUHuY8KHTduCyo4ChDoATABegQICBAB#v=onepage&q=साहित्यजज्%20में%20पूर्वराग&f=false

आचार्य धन्ञ्जय ने अपने ग्रंथ दशरूपक में पूर्वराग के स्थान पर अयोग श्रृंगार की कल्पना की है । अयोग मूलतः पूर्वराग या मिलने से पहले की घड़ियाँ हैं और आचार्य जी ने इसकी दस अवस्थाएँ भी गिना दी – अभिलाषा, चिंता, स्मृति, गुणकथन उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, ज्वर, जड़ता और यहाँ तक मरण को भी इसी में शामिल कर लिया है

बेदी, सुषम. नवाभूम की रसकथा. पृ. 52.

प्राचीन काल से राजा-रानी की कहानियों, मिथकों एवं धर्मग्रंथों तथा सिनेमा में पूर्वराग दृष्टिगत होता है । पूर्वराग के अनेक उदाहरणों में से सबसे पहला और प्रसिद्ध उदाहरण देवी पार्वती का है, जिसमें देवी पार्वती हर जन्म में बिन देखे शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तप करती हैं और अंततः शिव को प्राप्त भी करती हैं । दूसरा प्रसिद्ध उदाहरण रूक्मिणी का है, जो कृष्ण द्वारा दिए गए बिना किसी वचन के बिन देखे कृष्ण के प्रेमाधीन हो विवाह के दिन भी कृष्ण की प्रतीक्षा करती रहीं और आश्चर्य की बात यह है कि श्रीकृष्ण को पता चलते ही वह पूर्वराग वाली प्रेमिका को विवाह मंडप से भगा भी ले जाते हैं । पूर्वराग के मुद्दे से भारतीय सिनेमा भी अछूता नहीं रहा । सिर्फ तुम इसका प्रमाण है । 

 http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf

राजा रत्नसेन और पद्मावती के मिलन को अलौकिक मिलन साबित करने के पश्चात् कथा को आगे बढ़ाना जायसी की सबसे बड़ी भूल थी, लेकिन यदि जायसी अलाउद्दीन का प्रसंग छोड़ देते तो शायद यह ग्रंथ उतना उत्कृष्ट एवं चर्चित भी न होता । फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी लेखक तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना नहीं लिख सकता, जायसी के साथ भी यही हुआ । वर्चस्ववादी मानसिकता के प्रभाव में भक्ति का आवरण ओढ़ काव्य-रचना की गयी और उसी मानसिकता से अब तक इसका मूल्यांकन होता आया है तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाया भी जाता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रेमाख्यान आदि दृष्टि से यह ग्रंथ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इन सबके साथ इस ग्रंथ पर पुनर्विचार करने की भी अत्यंत आवश्यकता है कि यह ग्रंथ विशुद्ध लौकिक प्रेम-काव्य है अथवा आध्यात्मिक प्रेमाख्यान ?यदि भगवत्भक्ति की बात करें तो भगवत्भक्ति का आधार ही पूर्वराग है । भक्ति साहित्य में मिलन भी पूर्वराग में कल्पना का एक अंग है । साहित्य में यत्र-तत्र-अन्यत्र की चर्चा अगर छोड़ दें तो कुछ अपवादों को छोड़ कर पूरा का पूरा सूफी साहित्य पूर्वराग पर लिखा गया है ।  असाइत कृत हंसावली में राजकुमार के द्वारा पाटण की राजकुमारी को स्वप्न में देखकर, पुहकर रचित रसरतन में नायक सोम का राजकुमारी रम्भा को स्वप्न में देखकर स्वप्न-दर्शन प्रेम, मुल्ला दाउद कृत चान्दायन में नायक लोर अथवा लोरिक का नायिका चन्दा का, दामो या दामोदर कवि द्वारा रचित लखमसेन पद्मावती कथा में राजा लक्ष्मणसेन और राजकुमारी पद्मावती का, कुतुबन कृत मृगावती में नायक राजकुमार और मृगावती का, मंझन कृत मधुमालती में नायक और नायिका मधुमालती का प्रथम दर्शनजन्य प्रेम, गणपति कृत माधवानल-कामकन्दला में नायक माधव का कामकन्दला का नृत्य-कला पर मुग्ध होकर प्रेम, उसमान द्वारा रचित चित्रावली में सोते समय नायक-नायिका शिवमंदिर में साक्षात्कार का प्रसंग और प्रेम प्रसिद्ध है । किंतु इन सबमें पद्मावत का अपना एक विशिष्ट स्थान है ।

पद्मावत् में नायक-नायिका के हृदय में पूर्व-राग की उत्पत्ति

पद्मावत में यदि आध्यात्मिक पक्ष को छोड़ दिया जाय तो यह विशुद्ध मांसल प्रेम अथवा प्रणय-काव्य कहा जा सकता है । इस आधार पर कहा जा सकता है कि पद्मावत में समस्त घटनाओं का हेतु कामवासना है, जिसकी शुरूआत पूर्वराग से होती है । इस ग्रंथ में चार पात्रों में पूर्वराग उत्पन्न हुआ है –चित्तौड़गढ़ के राजा रत्नसेन, सिंघलगढ़ की राजकुमारी पद्मावती, दिल्ली का शाह अलाउद्दीन खिलजी और कुंभलनेर के नरेश देवपाल ।

यह कहना गलत न होगा कि पूर्वराग वन साइडेड लव में प्रत्यक्ष दर्शन टर्निंग प्वांइट का काम करता है, जो कि पद्मावत् में रत्नसेन, पद्मावती, अलाउद्दीन के साथ दर्शाया गया है किंतु देवपाल के लिए यह संभव नहीं हो सका । राजा रत्नसेन और पद्मावती के हृदय में पूर्वराग उत्पन्न करने वाला माध्यम हीरामन तोता तथा अलाउद्दीन के हृदय में उत्पन्न करने वाला माध्यम राघव-चेतन बनता है ।

 राजा रत्नसेन के हृदय में पूर्वराग -

 चित्तौड़गढ़ के राजा चित्रसेन के पुत्र रत्नसेन के लिए एक ज्योतिषि ने भविष्यवाणी किया था कि इसकी जोड़ी उत्तम पदार्थ पद्मावती रूपी हीरे के साथ लिखी है, इनके मिलने से चाँद और सूर्य जैसा योग होगा ।

- अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 73

जिसकी सत्यता पाट प्रधान रानी चम्पावती की पुत्री पद्मावती जिसे शिव लोक की मणि माना गया था, वह दीपक बन सिंहल द्वीप में उत्पन्न हुई, जिसे जायसी ने सूर्य की कला से भी श्रेष्ठ माना है, के माध्यम से प्रमाणित होती है । सिंहलद्वीप के सात खण्डों वाले धवलगृह में निवास करने वाली पद्मावती के साथ दैव द्वारा प्रदत्त ज्योति के समान महापंडित सुनहरे रंग वाला हीरामन तोता भी रहता था, जिसके नेत्रों में रत्न और मुख में माणिक और मोती लगे हुए दिखाई देते थे । पद्मावती और हीरामन साथ-साथ वेदशास्त्र पढ़ते थे जिसे सुनकर ब्रह्मा भी सर हिलाने लगते थे । पद्मावती के सौन्दर्य की पराकाष्ठा कहानी के प्रारंभ में ही पता चल जाती है कि उसे पाने के लिए योगी, यति और सन्यासी भी तप साधते थे ।

देखा जाय तो सुआ हीरामन द्वारा राजा रत्नसेन के हृदय में प्रेमानुराग उत्पन्न करना स्वाभिमान और अपमान-बोध के कारण है । हीरामन सुआ के द्वारा पद्मावती को सूर्य का उपदेश अर्थात् पुरूषसंसर्ग का उपदेश देते हुए राजा गंधर्वसेन चक्रवर्ती ने सुन लिया, जिससे वे विचलित हो गये कि सुआ वेदपाठ के बहाने कामभाव की शिक्षा प्रदान कर रहा है इसलिए उन्होंने उसे नाऊ-बारी के हाथों मारने का आदेश दे दिया । उस समय पद्मावती ने उसे बचा लिया किंतु अपमान-बोध के कारण और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए वह वन में प्रस्थान कर गया । जहाँ उसे बहुरूपिये बहेलिए ने बंदी बना लिया और उसे बेचने के लिए सिंघलगढ़ के बाज़ार जा पहुँचा ।

इधर चित्तौड़गढ़ के बंजारों के साथ एक गरीब ब्राह्मण भी व्यापार के लिए सिंहल-द्वीप पहुँचा, जिसने सुनहरे सुआ (जो वेदादि ग्रंथों का ज्ञाता था) को खरीद लिया और उनसे चित्तौड़ के तत्कालीन राजा रत्नसेन ने एक लाख मूल्य देकर मस्तक पर टीका, कंधे पर जनेऊ, व्यास जैसे कवि, सहदेव जैसे पण्डित एवं लाल और काले दो कण्ठ वाले सुग्गा को खरीदा । बनिजारा खण्ड में हीरामन अपना परिचय देते हुए कहता है,

चतुर बेद हौं पंडित हीरामन मोहि नाँउ ।

पद्मावति सों मेरवौं सेव करौं तेहि ठाउँ ।।7/8।।

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.79

और वह सूर्य (रत्नसेन) से चन्द्र (पद्मावती) की कहानी कहकर उसके मन में प्रेम का ग्रहण लगाने लगा ।

- अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 81

नागमति सुआ खण्ड में रानी नागमति अपने पति को खो देने की विचार से आशंकित हो जाती है और किसी भी साक्षी के अभाव में सुआ को धाय द्वारा मारने का आदेश देती है किंतु रानी के आदेश के विपरीत धाय ने उसे बचा लिया और एक बार फिर से सुआ रत्नसेन के हृदय में प्रेम उत्पन्न करने के लिए तत्पर हो गया । राजा सुआ संवाद खण्ड में पदुमावति राजा कै बारी । पदुम गंध ससि बिधि औतारी ।3/ ससि मुख अंग मलैगिरि रानी । कनक सुगंध दुआदस बानी । / हँहि जो पदुमनि सिंघल माहाँ । सुगँध सुरीप सो ओहि की छाहाँ ।।9/2।।  - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.91. कहकर हीरामन सुआ अपना परिचय देता है साथ ही पद्मावती का वर्णन भी करता है, जिसे सुनते ही रत्नसेन लाल हो जाते हैं 9/5

- अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत.  पृ.-93

तुई सुरंग मूरति वह कही । चित्त महँ लागि चित्र होइ रही ।

जनु होई  सुरूज आइ मन बसी  । सब घट पूरि हिएँ परगसी ।।9/5

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 93

उनका हृदय पद्मावती से मिलने के लिए व्याकुल हो जाता है -

किरिन करा भा प्रेम अँकुरू । जौं ससि सरग मिलौ होई सूरू ।

सहसहुँ कराँ रूप मन भूला  । जहँ जहँ दिस्टि कँवल जनु फूला ।

तहाँ भँवर जेऊँ कँवला गंधी । भै ससि राहु केरि रिनि बंधी ।

तीनी लोक चौदह खंड सबै परै मोहि सूझि ।

प्रेम छाँड़ि किछु औरू न लोना जौं देखौं मन बूझि ।।9/5

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 93

अर्थात् सूर्य की किरण और चन्द्रमा की कला में प्रेम का अंकुर उत्पन्न हो गया है । यदि वह चन्द्र आकाश में भी हो तो मैं सूर्य के समान आकाश मार्ग से जाकर उससे मिलूँगा । अपनी सहस्रों किरणों से मेरा मन उस पर मोहित हुआ है । जहाँ जहाँ देखता हूँ वहाँ वहाँ वही कमल फूला हुआ दिखाई पड़ता है (मेरी सहस्र किरणों वाली दृष्टि को सर्वत्र पद्मावती ही दिखाई दे रही है ) । और कमल की गंध से लुभाने वाले भौंरे की भाँति मैं भी वहाँ मँडराता हूँ । अब तो चन्द्रमा और राहु के परस्पर ऋणबन्धी सम्बन्ध की तरह उसकी और मेरी भी ऋणबन्धिता हो गई है ।

तीन लोक औऱ चौदह खँडों में जो सब मुझे दिखाई दे रहा है, उसमें जब मैं विचार कर देखता हूँ तो प्रेम को छोड़ कर और कुछ सुन्दर नहीं है

- अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 94

राजा रत्नसेन सुरतानुराग के लिए व्याकुल हो जाते हैं उस पर से सुआ के द्वारा पद्मावती के नख-शिख सौंदर्य (कस्तूरी से काले केश, जिन पर नागराज वासुकि भी बलि जाता है, मलयगिरि रूपी शरीर, मेघों में खिंची बिजली अथवा कसौटी में खिंची कंचन रेखा रूपी माँग, ज्योति द्वितीया के चन्द्रमा के समान ललाट, ताने हुआ धनुष की भाँति भौंहें, लाल कमल पर मँडराते हुए भौरों के समान नेत्रों में काली पुतलियाँ अथवा नेत्र जल से भरे समुद्र में लहरों का माणिक्य अथवा क्रीड़ा करते हुए खंजन पक्षी रूपी नेत्र, आकाश में अनगिनत नक्षत्रों की भाँति बरौनियाँ, शुक्र भी जिसके नाक में बेसर बनकर सुशोभित हो अथवा जिसके सामने सुग्गा भी लजाकर पीला पड़ जाए ऐसी नासिका, लाल गुल दुपहरिया (बन्धूक पुष्प) जैसे अधर, मिस्सी के गहरे श्याम रंग में सुशोभित होते हुए दशन अथवा दाँत जो सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रों, रत्नों, हीरे, माणिक्य और मोतियों को भी ज्योति प्रदान करते हैं, अमृत वचन बरसाती रसना जिसने कोकिल और चातक के भी स्वरों को ग्रहण कर लिया, पराग और अमृत के रस को सानकर कत्थे की सुरंग टिकिया बाँधे अथवा एक नारंगी के दो अनमोल खंडों के समान लाल-लाल कपोल, बाएँ कपोल पर तिल जिसे देखते ही देखने वाले के शरीर के तिल तिल में आग लग जाती है, सीपियों जैसे दो कान, मोरनी अथवा कबूतर के ग्रीवा से ली गयी अथवा क्रौंच पक्षी की ग्रीवा के समान ग्रीवा, केले के खम्भों के समान भुजाएँ और लाल कमल के समान हथेलियाँ, सुवर्ण दण्ड के समान कलाई, सोने के लड्डू के समान हृदय रूपी में थाल में सुशोभित दोनों कूच, चन्दन के पत्र की भाँति पेट, काली नागिन की भाँति रोमावली, नाभिकुंड बनारस, मलयगिरि चन्दन से सँवारी गई पीठ, बर्र की कमर से भी पतली कमर अथवा कमलिनी के दो टुकड़ों में टूट जाने पर बीच में बचे पतले तार की भाँति कमर, समुद्र के भँवर की भाँति घूमी हुई तथा मलय की सुगन्ध से पूरित नाभि कुण्ड, कटि भाग की शोभा बढ़ाने वाले नितम्ब, केले के खम्भों को उलटकर रखे हुए जंघाएँ, देवता द्वारा हाथों-हाथ उठा लेने वाले चरन कमल तथा जहाँ जहाँ चरण कमल पड़ते हैं देवता अपना सर रख देते हैं, चाँद और सूर्य की भाँति  उज्ज्वल दोनों पैरों के चूड़े, नक्षत्रों तथा तारों की भाँति अनवट और बिछिया का वर्णन सुनकर उन्हें वृष्ठानुराग की स्थिति में पहुँचा देता है, जिससे मूर्च्छित हो जाते हैं ।

मुर्च्छा समाप्ति पर राजा का हाथ में किंगड़ी, सिंगी चक्र और कमण्डलु, सिर पर जटाएँ, शरीर पर भस्म रमा, मेखला बाँधकर गले में जोगपट्ट, कन्धे पर बाघम्बर धारण कर कथरी पहने तन से बेसुध और मन से बावले की भाँति रटते हुए जोगी वेश में घर से निकलने की तैयारी करना, राजमहल में अनेक लोगों का समझाना, उनकी माता रतन रतन कहते हुए सुग्गा द्वारा बहका ले जाने का दुख व्यक्त करना और रानियों का रो रो कर प्राण देना, हाथ की चूड़ियाँ फोड़कर खलिहान भरना, उनकी प्रिय रानी जिसे अपने प्रेम पर अति गर्व था उसका संसार की सबसे खूबसूरत नायिका होने का घमण्ड चूर-चूर होना और बेवश होकर भवै भलेंहि पुरूषन्ह कै डीठी । जिन्ह जाना तिन्ह दीन्हि न पीठी । 12/6। - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.127 कहकर प्रार्थना करना, उनके विलाप से भी राजा का मन नहीं पसीजना और रानी को तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी । मूरूख सो जो मतै घर नारी ।12/7। - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.127  कहते हुए चल देना तथा रानी का खंडिता नायिका बनकर रह जाना पूर्वराग में प्रबल उत्कर्ष दर्शाता है । 

 पद्मावती के हृदय में पूर्वराग

हीरामन की युक्ति के अनुसार अपने योग से धरती-आकाश को जीतने वाले राजा रत्नसेन माघ मास के शुक्ल पक्ष में वसन्त पंचमी के दिन कंचन पर्वत पर स्थित शिव मंडप में पद्मावती के दर्शन के लिए पहुँच जाते हैं तथा दूसरी ओर स्वयं पद्मावती यौवन की पीड़ा जोबन भर भादौं जस गंगा । लहरैं देइ समाइ न अंगा । 18/3 । - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 163 से कामोद्दीप्त रहती है । ऐसे में हीरामन सुआ के द्वारा रत्नसेन का जोगी वेश में उसे प्राप्त करने का संदेश {यौवन के गहरे समुद्र से बाँह पकड़कर खींचने वाले सूर्य के समान प्रकाशमान रत्नसेन स्वयं उसके प्रेमावेश में उसके दर्शन के लिए जोगी का वेश धारण कर सोलह सहस्र राजकुमारों (जिन्होंने जोगी वेष धारण कर रखा है) के साथ महादेव के मठ में पहुँच चुका है} सुरूज परस दरस की ताईं । चितवे चाँद चकोर की नाईं । 19/4। - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 171) सुनकर वह और भी काम भाव से दग्ध हो जाती है ।  

 हीरामन जौं कही रस बाता । सुनि कै रतन पदारथ राता ।

जस सूरूज देखत होइ ओपा । तस भा बिरह काम दल कोपा । 19/5

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.171-172

 

किंतु पद्मावति राजा रत्नसेन के समान तत्काल प्रेम में विह्वल और भावुक नहीं होती बल्कि वह प्रेम में अनुरक्त होने के पश्चात् भी अपने पिता (जिनके भय से स्वर्ग में इन्द्र भी काँपते हैं) के विषय में सोचती है तथा अपनी विशिष्टता से रत्नसेन की तुलना करते हुए बौद्धिकता का परिचय देती है कि उसके योग्य वर भला संसार में कहाँ है ? सुग्गा के लाख प्रशंसा के बावजूद भी अपने हृदय में राजा की स्तुति समेटे वह अपनी दिनचर्या में खो जाती है । सामान्यतः प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी बसंत-पंचमी को उपवन में विहार करते हुए महादेव के मठ पहुँचती है । आश्चर्य की बात है कि जायसी ने यहाँ पद्मावती को देव-दर्शन के लिए भेजा है किंतु स्वयं पद्मावती के दर्शन से देवताओं के भी धड़ में प्राण नहीं जान पड़ता । तत्पश्चात् सखियों द्वारा बताये गए मठ के पूर्व द्वार पर ठहरे हुए जोगी जो संभावित था कि हीरामन के द्वारा जिसकी प्रशंसा सुनी थी वही हो, उसके दर्शन के लिए जाती है । जोगी के विषय में जैसा सुनी थी वैसा ही वहाँ उन्हें सूर्य के समान तेजस्वी पाती है । किंतु जोगी यानी कि राजा रत्नसेन की दृष्टि पद्मावती पर पड़ते ही वे मुर्च्छित हो जाते हैं और बड़े ही धैर्य के साथ वह उनके हृदय पर लिख वापस महल लौट जाती है -    

तब चंदन आखर हियँ लिखे । भीख लेइ तुइँ जोगि न सिखे ।

बार आइ तब गा तैं सोई । तैसे भुगुति परापति होई ।

अब जौं सूर अहै ससि राता । आइहि चढ़ि सो गँगन पुनि साता20/13। 

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 186

चेतना वापसी के पश्चात् राजा अपने हृदय पर चंदन से लिखा संदेश देख कर विलाप में डूब गए और वे स्वयं को एवं देवताओं को कोसने लगें । उनके रक्त के आँसू के ढ़ेर लग गए । तत्पश्चात् शिव-पार्वती के मार्गदर्शन के अनुसार वे स्वर्ग के समान सिंहलगढ़ के सात खंड, उस गढ़ के भीतर नौ ड्योढ़ियाँ (नौ इन्द्रिय द्वार), जिसके पाँच कोतवाल (पंच प्राण), दसवाँ गुप्त (अगम् और टेढ़ा) द्वार (ब्रह्मरन्ध्र), गढ़ के नीचे अथाह कुंड में छिपी सुरँग से चोर की भाँति सेंध लगा पद्मावती को प्राप्त करते हुए पहुँचते हैं ।                                                                   

(अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 205)

दूसरी ओर सूरतानुराग के पश्चात् पद्मावती की अति दारूण दशा हो जाती है । वह पीउ पीउ करते हुए पपीहा की भाँति व्याकुल होकर रत्नसेन को सोने की स्याही से पत्र हौं पुनि अहौं ऐसि तोहिं राती - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 224 लिखकर प्रेम की अभिव्यक्ति करती है । किंतु यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रेम में विह्वल होने के पश्चात् भी वह अपनी बुद्धिमत्ता परित्याग नहीं करती और रत्नसेन की परीक्षा लेती है । परीक्षा में सफल होने के पश्चात् ही उन्हें उड़न्त छाल पर बैठकर सिद्द बनाने के लिए बुलाती है ।

 अलाउद्दीन के हृदय में पूर्वराग

जिस प्रकार राजा रत्नसेन और पद्मावती के हृदय में पूर्वराग उत्पन्न करने वाला माध्यम हीरामन तोता होता है उसी प्रकार शाह यानी अलाउद्दीन के हृदय में प्रेम उत्पन्न करने वाला माध्यम राघव-चेतन है । हीरामन तोता की भाँति कुटिल राघव-चेतन को भी देश निकाला दिए जाने पर अपमान-बोध के कारण बदले की भावना से अलाउद्दीन के हृदय में पूर्वराग की उत्पत्ति करता है ।  

संदर्भानुसार यक्षिणीपूजक व्यास की भाँति कवि और सहदेव की भाँति पण्डित राघव चेतन और कुछ अन्य ब्राह्मणों से राजा रत्नसेन ने अमावस के दिन पूछा कि दोयज कब है ? इस पर अन्य पण्डितों ने कल यानी दूसरे दिन का समय बताया किंतु राजा का विश्वास प्राप्त करने के लिए राघव ने सबकी दृष्टि जादू से बाँध कर अमावस्या के दिन ही दोयज दिखा दिया । जब दूसरे दिन ठग-विद्या का भेद खुला तब राघव को राजा द्वारा देश निकाला दे दिया गया । किंतु यह बात बुद्धिमती पद्मावती को पता चलते ही उसने राज्य को अनहोनी से बचाने के लिए कुटिल किंतु ज्ञानी यक्षिणीपूजक ब्राह्मण को वापस बुलाया । निष्कलंक चन्द्रमा के समान उसने झरोखे से नौ रत्न कोर जड़े कंगन देते हुए उसे राज्य में रूकने के लिए कहा । किंतु उसके सौन्दर्य-दर्शन से राघव मुर्च्छित हो गया और राजा से अपमान का बदला लेने के लिए अलाउद्दीन खिलजी (अल्दीन अब्बुल मुजफ्फर मुहम्मद शाह अल सुल्तान) के दरबार दिल्ली चला गया । शाह के दरबार में पेश होने पर वह हस्तिनी, सिंहनीं, चित्रिणी, पद्मिनी स्त्रियों में भेद बताते हुए बारह बानी कुंदन जैसी शुद्ध और चमकीली और चन्द्रबदनी पद्मावती का वर्णन करते हुए कहता है -

पदुमिनी सिंघल दीप की रानी । रतनसेनि चितउर गढ़ आनी ।

कँवल न सरि पूजै तेहि बाँसा । रूप न पूजै चंद अकासाँ ।

जहाँ कँवल ससि सूर न पूजा । केहि सरि देउँ औरू को पूजा 39/4।

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 475

ऐसा दिव्य-दर्शन का वर्णन सुनकर शाह को मुर्च्छा आ गई । मुर्च्छा समाप्त होने पर तब अलि अलाउद्दीन जग सुरू । लेउँ नारि चितउर कै चुरू 41/20 । - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 505 अर्थात् तब मैं जगत में अलावल अलाउद्दीन सच्चा शूर (या सूर्य) हूँ, जब चित्तौड़ को नष्ट करके उस बाला को प्राप्त करूँ । - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 506  का प्रण लेता है । तत्पश्चात् शाह ने राघव को पान सरोपा, दस नर हाथी, सौ घोड़े, कंगन की जोड़ी, तीस करोड़ मूल्य के रत्न, एक लाख दीनारें देने के पश्चात् पद्मावती को प्राप्त करने के बदले चित्तौड़ का सिंहासन का वचन देकर सरजा बलवान पुरूषसिंह के हाथों रत्नसेन को पद्मावती को सौंपने के लिए पत्र लिखकर भेजा ।  

रत्नसेन का पत्र सुनकर भड़कना और शाह से युद्ध करना और युद्ध के दौरान शाह द्वारा चित्तौड़गढ़ को घेर लेना, चित्तौड़गढ़ में राजा का युद्द के लिए अंतिम प्रयास और रानियों का जौहर करने का निर्णय करना और उसकी सूचना शाह तक पहुँचना, पद्मिनी के खो देने के भय से शाह का संधि का प्रस्ताव और सम्मान देकर राजा को परास्त करने की कुटिल सोच में पड़ना, चित्तौड़गढ़ के पाँच रत्न हंस, अमृत, पारस पत्थर नग, सोनहा पक्षी, शार्दुल के बदले संधि का प्रस्ताव रखना, संधि की स्वीकृति और राज्य में शाह के स्वागत की तैयारी करना, शाह का चित्तौड़गढ़ में आना, शाह का बसंती फुलवारी, मंदिर आदि देखना, भोज के समय उसका मन न लगना और शतरंज के खेल में दर्पण को अपने पैरों की ओर रखना ताकि झरोखे में आते ही पद्मावति की झलक देख सके आदि प्रयोजन पूर्वराग में कुटिलता के साथ व्याकुलता को दर्शाता है । यहाँ आश्चर्य की बात है कि पद्मावति अपनी बुद्धमत्ता का प्रयोग न करके सखियों के कहने पर जिज्ञासावश रात्रि समय में शाह को देखने पहुँच जाती है और उसी समय शाह उसे दर्पण में देख लेता है -

विहँसि झरोखे आइ सरेखी । निरखि साहि दरपन महँ देखी । 

होतहि दरस परस भा लोना । धरती सरग भएउ सब सोना ।46/18

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.617

वह पद्मावती को देखते ही मुर्च्छित हो जाता है और होश आने के पश्चात् राघव के द्वारा पूछने पर उसने बताया कि

अति विचित्र देखेऊँ सो ठाढ़ी । चित कै चित्र लीन्ह जिय काढ़ी । 46/21

-               अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.621

फिर क्या था ऐसी अनुपम सुन्दरी को वह बल के बजाय छल से पाने के लिए अनेक षड़यंत्र गढ़ने लगा ।

 देवपाल के हृदय में पूर्वराग

कुंभलनेर के नरेश देवपाल के हृदय में सांकेतिक रूप से पूर्वराग दर्शाया गया है । जिसने शाह द्वारा रत्नसेन को बन्दी बना लिए जाने पर सुअवसर देखते हुए अपनी दूती को पद्मावती के हृदय में परपुरूष यानी अपने प्रति प्रेम जागृत करने हेतु भेजा और दूती प्रेम जागृत करने का पूरा प्रयास भी करती है - भोग विलास केरि यह वेरा । मानि लेहि पुनि को केहि केरा 49/12।

- अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ.646 

 वह उसे यौवन की महत्ता स्पष्ट करते हुए परुपुरूष की ओर यौवन का रसपान करने लिए प्रेरित करती है- 

रस दोसर जेहि जीभ बईठा । सो पै जान रस खट्टा मीठा ।

भँवर बास बहु फूलन्ह लेई । फूल बास बहु भँवरन्ह देई ।

तैं रस परस न दोसर पावा । तिन्ह जाना जिन्ह लीन्ह परावा ।

एक चुरू न रस भरै न हिया । जौ लहि नहिं भरि दोसर पिया49/14

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 648

यह सुनते ही पद्मावति भड़क उठती है और अपने सतित्व का परिचय देते हुए उसे अपने दासियों द्वारा पिटवाकर वापस लौटा देती है । जब राजा रत्नसेन शाह के बंधन से बंधनमुक्त होकर वापस लौटते हैं तब पद्मावाती उन्हें सारी कथा सुनाती है, जिससे वे क्रोधित हो देवपाल से युद्ध करने पहुँच जाते हैं और वे देवपाल का वध करके विजय तो प्राप्त कर लेते हैं किंतु देवपाल से युद्ध ही उनके अंत का कारण बनता है । अनेकों उपचार के बाद भी घाव ठीक न होने के कारण उनकी मृत्यु हो जाती है ।

 पूर्वराग की दुखान्तक परिणति

 राजा रत्नसेन और देवपाल के बीच होने वाले युद्ध में देवपाल का वध हो जाता है किंतु राजा रत्नसेन अपने मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर पातें ।  अन्ततः पद्मावती और नागमति एक साथ अपने पति के साथ भाँवर लेते हुए सति हो जाती हैं । हालांकि शाह चित्तौडगढ़ पर आक्रमण करने आ ही रहा होता है लेकिन पद्मावती के सति होने के बाद वहाँ पहुँचता है और पद्मावती के सती होने की कथा सुनकर उसकी मुट्ठी भर राख उड़ाते हुए पिरिथमी झूठी’ - अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 712 कहते हुए अफसोस व्यक्त करता है । जिसका परिणति चित्तौड़गढ़ के ध्वस्त होने के रूप में होती है । बादल के साथ साथ समस्त सैनिक शहीद हो जाते हैं तथा वहाँ की सारी औरतें जौहर कर लेतीं हैं ।

 संदेह, जिज्ञासा और प्रश्नों के चक्रव्युह में परमात्मा पद्मावती का अस्तित्व

इस ग्रंथ में चित्तौड़गढ़ को तन, राजा रत्नसेन को मन, सिंघलगढ़ को हृदय, पद्मिनी को परमात्मा या बुद्धि, नागमति को दुनिया धंधा, हीरामन को शुक गुरू, राघव चेतन को शैतान, अलाउद्दीन को माया कहा गया है । यह ग्रंथ न सिर्फ पाठक के हृदय में प्रश्न जागृत करता है बल्कि परंपरागत आध्यात्मिक आलोचना पर भी प्रश्न उठाता है - 

पहला प्रश्न प्रतीकों की हेरा-फेरी से उठता है कि यदि मनुष्य के दैहिक संवेदनाओं वाले अंश को निकाल दिया जाय और आध्यात्मिक रूप से तथा सूफ़ी सिद्धांतों के अनुरूप देखें तो रत्नसेन-पद्मावती (आत्मा-परमात्मा, सूर्य-चन्द्र) के मिलन तक सटिक बैठता है किंतु उसके बाद कहानी में आत्मा-परमात्मा का भाव समाप्त हो जाता है, राजा रत्नसेन मात्र बर्चस्ववादी सत्ता का वहन करने वाले एक पति और रानी पद्मावती भारतीय संस्कारों में ढ़ली पतिव्रता पत्नी बन कर रह जाती है । उनके मिलन से पूर्व आध्यात्मिक एवं योग-साधना के अनुसार भी उल्टे प्रतीक की कल्पना एवं संयोग दृष्टिगत होता है कि यदि पद्मावती परमात्मा है तो उसे सूर्य होना चाहिए और रत्नसेन को चन्द्र । किंतु यहाँ रत्नसेन सूर्य है और पद्मावती चन्द्र । यही नहीं कवि अलाउद्दीन और देवसेन को भी सूर्य की संज्ञा दी गई है ! यदि हठयोग के सिद्धांत पर रत्नसेन सूर्य है और पद्मावती चन्द्र तो अलाउद्दीन भी सूर्य कैसे हो सकता है ? तथा देवपाल भी उससे कम नहीं ! फिर सबके साथ हठयोग के सिद्धांत का क्या औचित्य ? यदि औचित्य है भी तो परमात्मा सर्वव्यापक है, वह मात्र किसी एक जीव के दायरे में कैसे बँध सकता है अथवा किसी एक जीव से कैसे प्रेम कर सकता है ? पद्मावती परमात्मा ने अपने प्रकाश से अलाउद्दीन और देवपाल को वंचित क्यों रखा ?

दूसरा प्रश्न परमात्मा पद्मावती के अलौकिक सौन्दर्य का अतिशयोक्तिपूर्ण आलोक से है, जिसे देखते ही रत्नसेन, अलाउद्दीन और राघव-चेतन मुर्च्छित हो जाते हैं, यहाँ तक कि देवताओं के धड़ में भी प्राण नहीं रहते । आश्चर्यजनक है कि पद्मावती के आस-पास के लोग जीवित कैसे रह गयें ? पद्मावति के जिन स्वरूप का वर्णन हीरामन सुआ करता है, वह बिल्कुल एक नारी के सौंदर्य का वर्णन है न कि परमात्मा का आलोक यदि परमात्मा के आलोक का आरोपण कर भी दिया जाय तो जिन शब्दों में हीरामन सुआ पद्मावती का वर्णन रत्नसेन से करता है तो वह गुरू माना जाता है किंतु उन्हीं शब्दों में वर्णन करने वाला राघव-चेतन शैतान कैसे ? जिस परमात्मा को प्राप्त करने के लिए जीव या आत्मा राजा रत्नसेन जोगी बन बैठा उसी परमात्मा को प्राप्त करने को इच्छुक अलाउद्दीन माया कैसे ? कहानी का अंत करने में राजा देवपाल कहानी का मुख्य हिस्सा होते हुए अमान्य कैसे रह गया ? परमात्मा से प्रेम क्या पुरूष ही कर सकते हैं स्त्री नहीं ! नागमति परमात्मा पद्मावती की भक्त क्यों नहीं बन पायी ? यदि पद्मावति परमात्मा है तो उसे नागमति से सौतियाडाह क्यों ? विवाह से पूर्व यदि पद्मावती परमात्मा का स्वरूप है तो विवाहोपरांत मात्र पतिव्रता भारतीय स्त्री कैसे बन गयी ?  

देखा जाय तो सूफ़ियों ने स्त्री को महत्व तो दिया है लेकिन यदि समस्त कथाक्रम को ध्यान में रखा जाय तो उनके लिए नारी सौंदर्य वह अप्राप्य वस्तु है जिसे पाने के लिए नर अनेक बाधाओं को पार करते हुए उस तक पहुँचता है और पाने के बाद सोने के पिंजरे में जड़ देता है । जिस नारी रूपी परमात्मा को प्राप्त करने के लिए वह जोगी बन जाता है उसे प्राप्त करने के पश्चात् निरा भोगी बन जाता है । जिस नारी में परमात्मा दिखायी देता है, विवाहोपरांत उसी नारी की सलाह की कोई जरूरत नहीं होती अथवा उसके सुझाव को महत्त्व नहीं दिया जाता ! लैंगिक आकर्षण और परमात्म-प्रेम गड्ड-मड्ड होकर स्त्री की बौद्धिकता घर के अंदर सिर्फ भोग-विलास तक सीमित हो जाती है, चौखट के बाहर वह  ‘तुम्ह तिरिआ मति हीन तुम्हारी बन कर रह जाती है । सिमोन द बोउवार के अनुसार, पुरूष जब नारी को अपनी संपत्ति के रूप में प्राप्त करता है, तो उसकी इच्छा रहती है कि नारी केवल देह ही रहे । पुरूष नारी के शरीर में नारी के व्यक्तित्व का विकास नहीं देखना चाहता । वह अपने में सीमित रहे, संसार में अन्य किसी से संलग्न न रहे । वह जिस कामना को जाग्रत करती है, उसे तृप्त करे

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परमात्मा पद्मावति का स्वरूप उस समय और अधिक संदिग्ध हो जाता है जब वह एक आम इंसान की भाँति काम भावना में दग्ध हो जाती है । आत्मा यानी जीव के आने के पुर्व से ही उसके अंदर कामभावना का दीप प्रज्वलित रहता है और रत्नसेन का आगमन जलती अग्नि में घी के समान कार्य करता है, जिसे परमात्मा का जीव से मिलने की तीव्र उत्कंठा कही गयी है । मिलन यानी विवाह के पश्चात् चित्तौड़गढ़ में आने पर उसका परमात्मापन का भारतीय पतिव्रता नारी के रूप में परिवर्तित होना उसके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है । सुहागरात की सेज पर आत्मा-परमात्मा का मिलन अश्लीलता की सारी हदें तोड़ता हुआ नज़र आता है । जिसमें जायसी स्त्री-भेद हस्तिनी, सिंहिनी, चित्रिणी, पद्ममिनी बताते हुए पद्ममिनी नायिका के भोग को उत्कृष्ट साबित करते हैं साथ ही पुरूष को संतुष्ट करना स्त्री का परम कर्तव्य है, जैसे सिद्धांतों पर बल देते हैं । रामकुमार वर्मा के अनुसार, जायसी ने अपनेपद्मावतकी कथा में आध्यात्मिक अभिव्यंजना रखी है... पर जायसी इस आध्यात्मिक संकेत को पूर्ण रूप से नहीं निबाह सके और अधिकांश में पद्मावत में चित्रित प्रेम का स्वरूप अलौकिक न होकर लौकिक हो गया है

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इतना ही नहीं आत्मा परमात्मा का भोग कर वापस दुनिया-धंधा यानी नागमति के पास लौट आता है और अपने शब्द जाल में दुनियाँ-धंधा को फँसाते हुए उसका भी उपभोग करता है । भोग उपभोग की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती बल्कि सौतियाडाह का रूप ले लेती है । आत्मा परमात्मा के पास जब वापस लौटती है तब दुनियाँ-धंधा से ईर्ष्या करते हुए परमात्मा आत्मा से कहती है  -   

सुरूज हँसा ससि रोई डफारा । टूटी आँसु नखतन्ह कै मारा ।

रहै न राखे होइ निसाँसी । तहँवहि जाहि जहाँ निसि बासी ।

हौं कै नेहु आनि कुँव मेली । सींचै लाग झुरानी बेली 35/10।।

-              अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. पृ. 435

जीव या आत्मा के लिए दुनियाँ-धंधा और परमात्मा में सौतियाडाह व्यंग्य तथा कलह के माध्यम से इतना बढ़ जाता है कि विवाद सुलझाने के लिए आत्मा को दखलअंदाजी करनी पड़ जाती है । ऐसी स्थिति में आत्मा को बेहद सशक्त और परमात्मा को कमजोर बनना आध्यात्मिक काव्य के हित में दृष्टिगत नहीं होता । आदर्शवाद के नाम पर शब्दाम्बरों की आड़ लेकर अलौकिक एवं उदात्त प्रेम में लिपटे परमात्मा का ऐसा अनावरण पूरे सूफी काव्य को संदेह के घेरे में खड़ा कर देता हैं । मेरी वोल्स्टनक्राफ़्ट के शब्दों में कहें तो, प्रेम, जैसा कि प्रतिभाशाली व्यक्तियों की लेखनी ने दर्शाया है, का अस्तित्व इस धरा पर नहीं है अथवा यह मात्र उन तीव्र, आवेशपूर्ण कल्पनाओं में जीवित है, जिसने ऐसे खतरनाक चित्र खींचे हैं । खतरनाक इसलिए कि वे कामी पुरूषों को, जो विशुद्ध इन्द्रियलोलुपता को भावुकता के आवरण में ढँक लेते हैं, न केवल एक कपटपूर्ण बहाना उपलब्ध कराते हैं, बल्कि साथ ही वे इस पाखण्ड को व्यापक बनाते हैं, और सद्गुण की प्रतिष्ठा को हीन कर देते हैं ।

-वोल्सटनक्राफ़्ट, मेरी. स्त्री-अधिकारों का औचित्य-साधन. पृ. 109

इतना ही नहीं, इस अलौकिक गाथा का अंत राम और कृष्ण की भाँति स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करने से होता है । जिसके प्रकाश से संसार प्रज्ज्वलित है ऐसे परमात्मा का अपने प्रिय जीव के साथ सति करने में जायसी थोड़ा भी नहीं हिचकिचातें । उसके बावजूद भी अलाउद्दीन की शक्ति बची रह जाती है और परमात्मा के नगर को पूजने के बजाय ध्वस्त करने की आवश्यकता पड़ जाती है ! डॉ. शिवकुमार मिश्र, पद्मावत की त्रासदी यह नहीं है कि जीव भस्म हो गया और मुट्ठी भर क्षार बची रही । बल्कि सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जीव के साथ ब्रह्म भी मर गया । प्रेम तो जीवन का सार हैं । अगर वह नहीं बचा तो बचा क्या” ?  

-http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf

कहना गलत न होगा कि यह ग्रंथ अलौकिक गाथा में परमात्मा रूपी पर्दे के पीछे छुपकर नैतिकता की दुहाई देते हुए विशुद्ध लौकिक प्रणय-काव्य है और संस्कारों का चोला पहन कर परमात्मा के आवरण में छुप कर कामुकता को तुष्ट करना कवि और आलोचकों के लिए आसान रहा है । यदि यह ग्रंथ विशद्ध प्रणय-ग्रंथ के रूप में मान्य होता तो यह एक बेहतरीन ग्रंथ होता किंतु उसे आध्यात्मिक आवरण ने अनगिनत सवालों के कठघरे में खड़ा कर दिया है । समासोक्ति-अन्योक्ति अथवा अलौकिक और ऐतिहासिकता का मिश्रण रूपी ग्रंथ के अंत को प्रक्षिप्त अंश कहना हमारे उस संस्कारी मानसिकता को दर्शाता है जहाँ कामभाव की स्वीकृत्ति मन में तो है पर सार्वजनिक स्तर पर स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती । यह वर्चस्ववादी सत्ता का नारी के सौन्दर्य और उसकी बौद्धिकता को भोग-उपभोग कर अपने कामुक भावनाओं को तुष्ट करना तथा उसे अपनी जायदाद समझ कर अपनी जिन्दगी ही नहीं बल्कि पूरे राज्य को दाँव पर लगाने की कथा है ।  

रामकुमार वर्मा के अनुसार, जायसी ने अपनेपद्मावतकी कथा में आध्यात्मिक अभिव्यंजना रखी हैं । सारी कथा के पीछे सूफी सिद्धांतों की रूपरेखा हैhttp://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf जैसे कथन पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है । भारतीय परम्परा के अनुसार भी पद्मावती परकीया नायिका ही थी, जिससे विवाह करके रत्नसेन ने स्वकीया बना लिया और अपने पति के वियोग में तड़पने वाली नायिका के दुःख की अवहेलना करते हुए उसे दुनिया-धंधा का नाम दे दिया गया, जो स्वकीया होते हुए भी परकीया की भाँति चर्चित रही । दुनियाँ-धंधा के ईर्ष्या-द्वेष को सार्वजनिक किया गया और परमात्मा के ईर्ष्या-द्वेष संबंधी उदाहरणों पर टिप्पणी करने पर बड़ी ही चालाकी से बच जाया गया । यह एकांगी दृष्टि वर्चस्ववादी सत्ता का न सिर्फ अपनी सुविधानुसार नायिका के चयन का अधिकार एवं उसके प्रेम को रेखांकित कर इतिहास बदलने की दृष्टि को दर्शाता है बल्कि भक्तिकालीन साहित्य में स्त्री के प्रति उपेक्षात्मक दृष्टि पर पर्दा डालने का प्रयास नज़र आता है । यह सोचनीय है कि यदि यही प्रेम नागमति को किसी पुरूष परमात्मा से होता तो क्या नागमति दुनिया-धंधा भी रह पाती ? क्या सूफ़ी संत फिर भी किसी प्रेम-गाथा का उत्कृष्ट रूप तैयार करतें ? क्या नारी सम्मान की पात्र होती या पूर्वराग को महत्त्व दिया जाता ? अथवा यदि ये सभी प्रश्न सूफ़ीज्म के विरोध में हैं... तो क्या परमात्मा स्त्री अपने सभी जीवों से समान प्रेम करते हुए साहित्य के इतिहास इसी रूप में होती ?

इन सारे प्रश्नों को एक शोधार्थी ने अपने शोध में तर्क-वितर्क के साथ प्रस्तुत भी किया है किंतु वह शोध कहीं न कहीं गुमनामी के अंधेरे में खोया पड़ा है । 

http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf

राजा रत्नसेन और पद्मावती के मिलन को अलौकिक मिलन साबित करने के पश्चात् कथा को आगे बढ़ाना जायसी की सबसे बड़ी भूल थी, लेकिन यदि जायसी अलाउद्दीन का प्रसंग छोड़ देते तो शायद यह ग्रंथ उतना उत्कृष्ट एवं चर्चित भी न होता । फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी लेखक तत्कालीन परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना नहीं लिख सकता, जायसी के साथ भी यही हुआ । वर्चस्ववादी मानसिकता के प्रभाव में भक्ति का आवरण ओढ़ काव्य-रचना की गयी और उसी मानसिकता से अब तक इसका मूल्यांकन होता आया है तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाया भी जाता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रेमाख्यान आदि दृष्टि से यह ग्रंथ अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इन सबके साथ इस ग्रंथ पर पुनर्विचार करने की भी अत्यंत आवश्यकता है कि यह ग्रंथ विशुद्ध लौकिक प्रेम-काव्य है अथवा आध्यात्मिक प्रेमाख्यान ?

संदर्भ-ग्रंथ –

·         अग्रवाल, वासुदेवशरण. पद्मावत. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. सं. 2018

·         शुक्ल, आ. रामचन्द्र. प्रस्तावना, योगेन्द्र प्रताप सिंह. पद्मावत. लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद. सं. प्रथम, 2017.

·         डॉ. नगेन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास. मयूर पेपरबैक्स, नोएडा. सं. प्रथम 1973, तैतीसवां 2007.

·         ओशो. संभोग से समाधि की ओर. डायमंड पाकेट बुक्स (प्रा.) लि., नई दिल्ली. 2005.

·         बेदी, सुषम. नवाभूम की रसकथा. हिन्दी बुक सेन्टर, नई दिल्ली. प्रथम, 2018

·        वोल्सटनक्राफ़्ट, मेरी. स्त्री-अधिकारों का औचित्य-साधन. अनु. मीनाक्षी. राजकमल प्रकाशन प्रा.लि., नई दिल्ली, पहला 2003.

·         https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/206996/12/9_chapter%204.pdf  

·         http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/33418/8/08_chapter%204.pdf

·  https://books.google.co.in/books?id=M2EAf21iLIIC&pg=PT90&lpg=PT90&dq=साहित्य+में+पूर्वराग&source=bl&ots=NdaZ8kNR4i&sig=ACfU3U3oCF3_yn3WgB3bzGUj1HfMKTJ8iQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjy6qahv_gAhUHuY8KHTduCyo4ChDoATABegQICBAB#v=onepage&q=साहित्यजज्%20में%20पूर्वराग&f=false

·         https://www.pustak.org/index.php/dictionary/word_meaning/पूर्व-राग

·         http://kavitakosh.org/kk/वियोग_श्रृंगार_/_रस_प्रबोध_/_रसलीन

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आलेख

डाॅ. रेनू यादव 

छायावाद : प्रवर्तक बनाम स्तम्भ   

किसी पौधे का धरती के ऊपर अंकुरित होने के साथ उसकी उम्र की शुरूआत नहीं होती, बल्कि धरती के अंदर बीज के अंकुरित होने के लिए संघर्ष के साथ उसकी शुरूआत हो चुकी होती है । इसी प्रकार किसी युग अथवा काल के निर्धारण से पहले ही उसका बीजवपन हो चुका होता है । काल-निर्धारण तो प्रचलन के बाद की प्रक्रिया होती है । छायावाद के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । शुक्ल जी की पुस्तक हिन्दी साहित्य का इतिहासके अनुसार छायावाद का बीज भारतेन्दु युग में अम्बिका दत्त व्यास के माध्यम से पड़ चुका था । डॉ. नगेन्द्र के अनुसार छायावाद का प्रारंभ 1916 ई. में निराला की जूही की कली और अंत 1936 में पंत के युगान्त और 1938 ई. में निराला की अनामिका के प्रकाशन के साथ मानना चाहिए । उनके अनुसार इस समय को दो-चार वर्ष आगे पीछे खींच कर देखा जा सकता है ।

-     डॉ. नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास. पृ. 528-529 

सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली श्री शारदापत्रिका में सर्वप्रथम मुकुटधर पाण्डेय नेहिन्दी में छायावाद लेख लिखा । चार किस्तों में प्रकाशित होने वाले इस लेख में उन्होंने छायावाद की प्रमुख चार विशेषताओं का उल्लेख किया है – आंतरिकता (वैयक्तिकता), स्वातंत्र्य (मुक्ति का आग्रह), रहस्यवादिता, विचित्र प्रकाशन रीति (शैलीगत वैशिष्ट्य और अस्पष्टता) ।

-    सिंह, बच्चन. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. पृ. 330

हालांकि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने छायावाद पर व्यंग्य भी किया, “किसी कविता के भावों की छाया यदि अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए ।  

-               https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/171266/5/05_chapter%202.pdf (छायावाद की अवधारणा एवं प्रभाव)

सन् 1924 में ज्योति प्रसाद मिश्र निर्मल ने ‘मनोरमा में प्रकाशित हिंदी कविता की गतिशीर्षक लेख में छायावाद की नूतन शैली पर अंग्रेजी और बंगला का प्रभाव माना, जबकि इनके विपरीत शांतिप्रिय द्विवेदी ने अपनी पुस्तक हमारे साहित्य निर्माता में छायावाद को लौकिक अभिव्यक्ति माना है ।

छायावाद के नाम और परिभाषा के संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत रहे हैं । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में माना है – पहला रहस्यवाद के अर्थ में, जिसका संबंध काव्यवस्तु से होता है तथा दूसरा काव्यशैली या पद्धति विशेष के व्यापक अर्थ में

-    शुक्ल, आचार्य रामचंद्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ.527-528.

शुक्ल जी ने पहले अर्थ का संबंध योरप के रूपात्मक आभास को छाया यानी फैंटसमाटा तथा दूसरे का संबंध फ्रांस के प्रतीकवाद यानी सिंवालिस्ट्स से जोड़ा है और उसके प्रभाव से बंगला साहित्य में और बंगला साहित्य से हिन्दी में आगत माना है । जबकि बंगला साहित्य में छायावाद नाम के चलन से भी इंकार करते हुए हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं, छायावाद एक सांस्कृतिक परंपरा का परिणाम है । काव्य की यह भारतीय परंपरा अंग्रेजी साहित्य से प्रभावित अवश्य है लेकिन अनुकृति नहीं । इसमें मानवीय जीवन के नवीन मूल्यों की नवीन शैली में अभिव्यक्ति हुई है । इसमें आध्यात्मिक अनुभूति, मानवतावादी विचारधारा तथा वैयक्तिक चिन्तन और अनुभूति का प्राधान्य है ।   

-     शर्मा, डॉ. शिव कुमार शर्मा. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ. 491.

हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहासलिखने वाले बच्चन सिंह छायावाद नाम के स्थान पर स्वच्छंदतावाद कहने पर जोर देते हैं तो गंगाप्रसाद पांडेय इसे वस्तुवाद और रहस्यवाद के बीच की कड़ी मानते हैं । श्री रामकृष्ण शुक्ल ने छायावाद और रहस्यवाद को एक मान लिया तो डॉ. रामकुमार वर्मा परमात्मा की छाया आत्मा में और आत्मा की छाया परमात्मा में पड़ने’ को छायावाद मान लिया । डॉ. नगेन्द्र छायावाद को स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह कहते हैं तो डॉ. रामविलास शर्मा डॉ. नगेन्द्र के मत का विरोध करते हैं । वे मध्यवर्ग के तत्त्वाधान में थोथी नैतिकता, रूढ़िवाद और सामन्ती साम्राज्यवादी बंधनों के प्रति विद्रोह मानते हैं । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किंतु व्यक्त सौंदर्य में आध्यात्मिक छाया का भाव मानते हैं लेकिन डॉ. देवराज छायावाद को गीति काव्य, प्रकृति-काव्य तथा प्रेम-काव्य मानते हैं ।

-     शर्मा, डॉ. शिव कुमार शर्मा. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ. 491-492.

छायावाद के संदर्भ में छायावाद के तत्कालीन कवि एवं लेखक भी अपना अपना मत व्यक्त करते हैं । प्रसाद भारतीय परंपरा के अंतर्गत मोती के भीतर छाया जैसी तरलता और ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्य, प्रकृति-प्रधान तथा उपचार-वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृत्ति मानते हैं । (जिसका समर्थन डॉ. नगेन्द्र भी करते हैं) तो पंत छायावाद को अंग्रेजी साहित्य के रोमांटिसिज्म से प्रभावित कहते हैं । महादेवी वर्मा ने स्वछंद छंद में चित्रित मानव अनुभूतियों का नाम छाया माना है ।  

-    शर्मा, डॉ. शिव कुमार शर्मा. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ. 490, 492.

शुक्ल जी के अनुसार भारतेन्दु युग में पं. अम्बिकादत्त व्यास ने अतुकान्त पद्य का प्रयोग किया था, तत्पश्चात् ट्रू रोमांटिसिज्म यानी कि अनुभूति की सच्ची नैसर्गिक स्वच्छंदता का जन्म हिन्दी साहित्य के द्वितीय उत्थान द्विवेदी युग में श्रीधर पाठक के माध्यम से हुआ और वे ही सच्चे स्वछंदतावाद (रोमांटिसिज्म) के प्रवर्तक ठहरते हैं । 

-    शुक्ल, आचार्य रामचंद्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 480

इसी युग के कवि श्री रामनरेश त्रिपाठी के स्वप्न खण्डकाव्य (छायावाद के समय में लिखी गयी थी) में छायावाद की झलक मिलती है और इसी युग की परंपरा में नूतन प्रयोग के जोर का प्रतिवर्तन तृतीय उत्थान में दिखायी देता है । उसी समय बंगाल में ब्रह्मसमाज के बीच रूपात्मक आभास (फैंटसमाटा) के तर्ज पर आध्यात्मिक गीत और भजन तथा नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं की धूम मच गयी । टैगोर की कविताएँ जनमानस पर छा गयीं, जिससे द्विवेदी युग में उठी अनुभूति की सच्ची नैसर्गिक स्वच्छंदता कहीं न कहीं दब कर रह गई और श्री मैथिलीशरण गुप्त तथा श्री मुकुटधर पांडेय की रचनाओं में तृतीय उत्थान की विशेषताएँ (रहस्यात्मक और चित्रात्मक शैली) दिखायी देने लगीं । इसीलिए शुक्ल जी हिन्दी कविता की नई धारा के प्रवर्तक गुप्त और पांडेय जी को मानते हैं । उनके अनुसार छायावाद से पहले ही नए-नए मार्मिक विषयों पर लिखे जा रहे थे लेकिन उनमें व्यंजक शैली, कल्पना और संवेदना के योग का अभाव था । किंतु गुप्त और पांडेय जी की कविताओं में ये विशेषताएँ दिखायी देने लगीं । दूसरी बात यह हुई कि सन् 1885 में रहस्यवादी कवियों द्वारा प्रयोग की गयी प्रतीकवाद (सिंवालिस्ट्स) का प्रयोग हिन्दी साहित्य में भी होने लगा । इसलिए छायावाद काव्यशैली अथवा पद्धतिशैली के स्तर पर भी पनप गया । कवियों में रहस्यवाद को पूर्णतः लेकर चलने वाली महादेवी वर्मा हुईं तो प्रसाद, पंत, निराला रहस्यवाद के साथ प्रतीकवाद और चित्रभाषा शैली को भी साथ-साथ लेकर चलें ।

-    शुक्ल, आचार्य रामचंद्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 514-515,  528.

शुक्ल जी का यह भी मानना है कि उस समय के कवियों के पास अपना कोई रास्ता नहीं था, वे सभी रहस्यवाद, प्रतीकवाद और चित्रभाषा शैली की बहती धारा में बह गए और छायावादी कवियों के अंतर्गत आ गए । हालांकि उनकी आध्यात्मिकता के पर्दे में छिपी प्रणयवासना धीरे-धीरे सामने आने लगी । फिर उक्त विशेषताओं के कारण आत्मा पूर्ण आनन्द, ब्रह्मानंद की अपरिमेयता, योग के सहस्रदल कमल संबंधी रहस्यात्मक अवगुंठनों से इतर कविताएं भी छायावादी कविताएँ कहलायी जाने लगीं । 

जबकि डॉ. नगेन्द्र ने छायावाद को भारत की अस्मिता की खोज का युग माना है, जो भारतीयों पर राजनैतिक और सांस्कृतिक आक्रमण का परिणाम था । वे छायावाद को स्वच्छंदतावादी कम और पुनरूत्थानवादी अधिक मानते हैं । उन्होंने छायावाद के मान्यता के तीन कारण माने हैं – 1. कवित्व की दृष्टि से, 2. प्राचीन भारतीय परंपरा के जीवंत तत्त्वों तथा नवीन तत्त्वों का समानांतर समावेश, 3. यूगीन जन-जीवन की समग्र अभिव्यक्ति.

-    डॉ. नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास. पृ. 529.

छायावाद का महत्त्व डॉ. नगेन्द्र इसलिए भी मानते हैं कि छायावादी कवियों ने द्विवेदी युगीन इतिवृत्तात्मकता के विरूद्ध सूक्ष्म भावनाओं की प्रतिष्ठा, तत्कालीन रूढ़ियों और ईसाई धर्म प्रचारकों के आक्षेपों के विरूद्ध अतीत भारत के प्राणवान मूल्यों की प्रतिष्ठा, आर्थिक-राजनीतिक दासता के विरूद्ध स्वाधीनता – केवल राष्ट्रीयता ही नहीं, मानव-मात्र की स्वाधीनता की प्रतिष्ठा की । इन तीनों मूल्यों का समावेश छायावादी कवियों ने अपने काव्य में की है । 

-    डॉ. नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास. पृ. 533.

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार महावीर प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य में सरलता, असलियत और जोश’ पर बल दिया था तथा उन्होंने रीतिकालीन संवेदना का तीव्र विरोध किया था । उसके बावजूद भी छायावादी कवियों ने इसी संवेदना को अपने काव्य का आधार बनाया । छायावाद के जनक एवं प्रवर्तक के विषय में आलोचकों के अलग अलग मत रहे हैं । रामचन्द्र शुक्ल ने मैथिलीशरण गुप्त तथा मुकुटधर पाण्डेय को, इलाचन्द्र जोशी तथा शिवनाथ जयशंकर प्रसाद को, नन्द दुलारे वाजपेयी सुमित्रानंदन पंत को तथा विनयमोहन शर्मा एवं प्रभाकर माचवे जैसे विद्वान माखनलाल चतुर्वेदी को छायावाद के प्रवर्तक मानते हैं।

यह ध्यातव्य है कि प्रसाद और पंत लगभग एक समय में ही अपनी रचनाओं की शुरूआत करते हैं । माखनलाल चतुर्वेदी अपनी रचनाओं में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्यधारा में अपना स्थान बनाते हैं । चूँकि स्वच्छंद काव्य धारा का बीजवपन पहले ही हो गया था इसलिए प्रसाद, पंत एवं चतुर्वेदी जी को प्रवर्तक मानना अनुचित होगा । यदि शुक्ल जी की आलोचना पर ध्यान दें तो शुक्ल जी ने स्वच्छंदतावाद और छायावाद को अलग अलग समझा । वे श्रीधर पाठक, मैथिलीशरण गुप्त, ठाकुर गोपालशरण सिंह, अनूप शर्मा, श्याम नारायण पाण्डेय को स्वच्छंद धारा के अंतर्गत देख रहे थे और उन्हें छायावाद के समानांतर मान रहे थे । उस समय छायावाद जैसी अभारतीय कविता (अभारतीय से तात्पर्य अंग्रेजी से प्रभावित) की चमक इतनी ज्यादा बढ़ गयी कि उसके सामने समानांतर धारा की कविताएँ कहीं छुप गईं या चमक न सकीं अर्थात् स्वच्छंदतावादी कवि श्रीधर पाठक और रामनरेश त्रिपाठी छायावाद से कट कर अलग हो गए ।

उसके बाद उनके पथानुगामी उनसे थोड़ा अलग हटकर नई पद्धतियों में रचनाएँ करने वाले श्री मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पाण्डेय बचते हैं । स्वयं शुक्ल जी उन्हें छायावाद के प्रवर्तक मानते हुए लिखते हैं, ये कवि जगत् और जीवन के विस्तृत क्षेत्र के बीच नई कविता का संचार चाहते थे । ये प्रकृति के साधारण, असाधारण, सब रूपों पर प्रेमदृष्टि डालकर, उसके रहस्य भरे सच्चे संकेतों को परखकर, भाषा को अधिक चित्रमय, सजीव और मार्मिक रूप देकर कविता का एक अकृत्रिम, स्वच्छंद मार्ग निकाल रहे थे । भक्तिक्षेत्र में उपास्य की एकदेशीय या धर्मविशेष में प्रतिष्ठित भावना के स्थान पर सार्वभौम भावना की ओर बढ़ रहे थे जिसमें सुन्दर रहस्यात्मक संकेत भी रहते थे । अतः हिन्दी कविता की नई धारा का प्रवर्तक इन्हीं को – विशेषतः श्री मैथिलीशरण गुप्त और श्री मुकुटधर पाण्डेय को - समझना चाहिए

-    शुक्ल, आचार्य रामचंद्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ. 514.

तत्पश्चात् शुक्ल जी ही मुकुटधर पाण्डेय का परिचय देते हुए यह स्वीकार करते हैं कि गुप्त जी किसी एक पद्धति या वाद में बंधकर नहीं रह सकें लेकिन मुकुटधर पाण्डेय बराबर नूतन पद्धति पर ही चलें ।

देखा जाय तो गुप्त जी द्विवेदी युग में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना चुके थे लेकिन मुकुटधर पाण्डेय अपनी व्यंजक शैली, कल्पना, संवेदना आदि कुल मिलाकर भी न तो द्विवेदी युग में कोई विशेष जगह बना पाए और न ही छायावाद में । जबकि तृतीय उत्थान में इन्हीं कवियों ने पदार्पण किया था । अब प्रश्न यह उठता है कि वे लीक से हटकर नई पद्धति पर चलने के कारण प्रवर्तक तो बन गए पर छायावाद के प्रमुख स्तंभों में उनका नाम क्यों नहीं आता ?

स्वयं आचार्य शुक्ल जी छायावादी कवियों की विशेषताएँ बताते हुए जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा की ही रचनाओं पर विस्तार से लिखते हैं (महादेवी पर बहुत कम लिखे हैं) न कि गुप्त और पाण्डेय जी की कविताओं पर । ऐसा लगता है कि मुकुटधर पाण्डेय को छायावाद का मुकुट बना कर कहीं किसी तहखाने में रख दिया गया । उनके विषय में विस्तार से न लिखा जाना ही कहीं न कहीं उन्हें छायावाद के स्तंभ बनने से उन्हें विलगा देता है । उनके बाद के आलोचकों ने भी शुक्ल जी द्वारा निर्धारित चार स्तम्भों पर ही विचार किया है और मुकुटधर पाण्डेय की सुध लेना जरूरी नहीं समझा, यदि कहीं चर्चा हुई भी तो नाममात्र की ।

इसके पूर्व आधुनिक युग में भारतेन्दु युग में भारतेन्दु हरीश्चन्द्र और द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ही अपने-अपने युग के प्रवर्तक और प्रमुख स्तम्भ रहे हैं । उन पर जमकर चर्चाएँ भी होती रही हैं । यदि हम छायावाद को भक्तिकाल के तर्ज पर देखें तो ज्ञानाश्रयी शाखा, प्रेमाश्रयी शाखा, रामाश्रयी एवं कृष्णाश्रयी शाखा में प्रवर्तक और स्तम्भों में भिन्नता दिखायी देगी । लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि उस समय प्रवर्तक बनने की चाह और राह से अलग राह थी स्वान्तः सुखाय और भगवद्भक्ति । जिससे छायावाद की तुलना करना असमीचीन होगा । आधुनिक युग का रचनात्मक भाव-बोध एवं अपेक्षाएँ अलग रही हैं । इसलिए हमें आधुनिक युग (भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, नकेनवाद आदि) के प्रवर्तकों एवं स्तम्भों की ओर दृष्टि डालने की जरूरत है ।

चूँकि शुक्ल जी आलोचना के सम्राट हैं और उन्होंने जो रास्ता दिखाया उस रास्ते से किसी आलोचक को मतभेद अवश्य हो सकता है लेकिन उन्हें झुठलाना संभव नहीं हो सका । छायावाद पर चाहे जितने भी आलोचकों (नंददुलारे बाजपेयी, रामकृष्ण शुक्ल, डॉ. नगेन्द्र, हजारी प्रसाद द्विवेदी, संजय गुप्ता, बच्चन सिंह, शिवकुमार शर्मा, डॉ. रामविलास शर्मा आदि) ने आलोचनाएँ की हों, उन आलोचनाओं में प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी वर्मा को चाहे जितना भी कम या ज्यादा आंका हो लेकिन शुक्ल जी द्वारा वर्णित अथवा स्थापित इन चारों कवियों को ही छायावाद का स्तंभ बनाये रखा। यदि उनमें से किसी ने अलग से कुछ सोचा तो वृहत्रयी और लघुत्रयी के विषय में । प्रसाद, पंत, निराला को वृहत्रयी और महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा और भगवतीचरण वर्मा को लघुत्रयी के अंतर्गत रख दिया । इस खाँचे से भी मुकुटधर पाण्डेय अलग हो गए ।

सीता-विलाप, सरलते, करूणा-रस, शोकांजलि, ध्रुव-तपस्या, ओस की निर्वाण-प्राप्ति, महानदी, विश्व-बोध, रूप का जादू, अधीरा-आँखें, अधीर, स्वागत, कुररी के प्रति, किंशुक के प्रति, तुलसीदास, आत्म-विलाप, स्मृति-गीत, अंतिम-पुष्प आदि भावात्मक, संवेदनात्मक और रहत्यात्मक अनुभूति से जुड़ी कविताएँ लिखने वाले मुकुटधर पाण्डेय की पूजा-फूल और कानन-कुसुम काव्य-संग्रह हैं ।

सीता-विलाप कविता में सीता को गर्भावस्था में लक्ष्मण द्वारा वनवास में छोड़े जाने का वर्णन है । उन्हें चौदह वर्ष के वनवास में रावण द्वारा अपहरित होने पर उतनी पीड़ा नहीं जितना कि लोकोपवाद के कारण राम के फैसले से होता है । राम उनकी आत्मा हैं, आत्मीय हैं और आत्मीय की आपत्ति उनके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा है । लक्ष्मण जब उन्हें छोड़ कर उनकी दृष्टि के सामने से ओझल हो जाते हैं तब सीता मुर्छित हो जाती हैं ।

रथ की ध्वजा ज्यों नेत्र पथ से हा ! अंतर्हित हुई

यों वायु ताड़ित मृदुलता सी जानकी मुर्छित हुई

इस काल तक वह भूल अपना घोर दुःख गई सभी

होती हित प्रद दुखितों को सत्य ही मूर्च्छा कभी

-     http://kavitakosh.org/kk/सीता-विलाप_/_मुकुटधर_पांडेय

 

 सीता की व्यथा एक छोटी सी कविता में समेटी गई है लेकिन इसे पढ़कर मैथिलीशरण गुप्त की उर्मिला की स्मृति हो आती है ।

 गले मिलो ऐ सुभगा सरलते ! कोमल-भाषिणी ।

विजन विपिन, गिरि, गुहा नवल नीरद नद वासिनी

-    http://kavitakosh.org/kk/सरलते_/_मुकुटधर_पांडेय

कह सरलता को परिभाषित करने वाले मुकुटधर की कविता पढ़कर निराला की काव्य-शैली याद आती है । तो आँसू कविता में प्रिय को दुखी देख हृदय का व्यथित होना, तुलसीदास कविता में रत्नावली से विरक्ति के पश्चात् तुलसीदास के हृदय में राम के प्रति भक्ति-भाव का जागृत होना, महानदी का प्राणों की भाँति क्रंदन करना,कुररी के प्रति’ कुररी पक्षी को रोते हुए देख कर मन का व्यथित होना आदि मुकुटधर के संवेदनशीलता के परिचायक हैं ।

 डॉ. बलदेव अपने लेख मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि में द्विवेदी युग और छायावाद के संक्रमण काल के कड़ी और द्विवेदी युग के शुष्क उद्यान में नूतन सूर भरा तथा नव बसन्त की आगवानी करके युग-प्रवर्तन का ऐतिहासिक कार्य करने वाले हस्ताक्षर के रूप में मुकुटधर पाण्डेय के विषय में लिखते हैं, मुकुटधर पाण्डेय जी जीवन की समग्रता के कवि हैं । उनके काव्य में प्रसन्न और उदास दोनों के छायाचित्र हैं । प्रकृति के सौन्दर्य में अलौकिक सत्ता का आभास मिलता है, उसके प्रति कौतुहल उनमें हर कहीं विद्यमान है । यदि एक ओर उनके काव्य में अंतस्सौन्दर्य की तीव्र एवं सूक्ष्मतम अनुभूति, समर्पण और एकान्त साधना प्रगीतात्मक अभिव्यंजना है, तो दूसरी ओर द्विवेदीयुगीन प्रासादिकता और लोकहित का आदर्श

-    https://hindi.pratilipi.com/read?id=4844256240336896 (मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि – डॉ. बलदेव)

पं. मुकुटधर पाण्डेय की रचना शैली पर डॉ. सुरेश गौतम कहते है - इनके काव्य में मानव-प्रेम, प्रकृति-सौंदर्य, करूणाजनित सहानुभूति, दु:खवाद, मानवीकरण, वैयक्तिकता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्‍मकता, आध्‍यात्मिकता, संयोग-वियोग, अव्‍यक्‍त सत्ता के प्रति जिज्ञासा और गीतात्मकता की प्रधानता रही है

-    https://www.sahityashilpi.com/2008/09/blog-post_30.html (छायावाद के मुकुटः मुकुटधर पाण्डेय (विशेष प्रस्तुति) – संजीव तिवारी)

निराला भी इन्हें संधि-स्थल के श्रेष्ठ कवि स्वीकारते हैं । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी इनके काव्य को दो वर्गों में विभाजित करते हैं । पहले के अंतर्गत उनके बड़े भाई की छाप और दूसरे के अंतर्गत स्वतंत्र प्रेरणा से सृजित ।

-    https://hindi.pratilipi.com/read?id=4844256240336896 (मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि – डॉ. बलदेव (रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ, पृ.100)

पाण्डेय जी की कविताएँ जिस समय सरस्वती पत्रिका में छप रही थी उसी समय से उनकी रचनाओं में भावात्मक और स्वच्छंतावादी अभिव्यंजनात्मक शैली की एक अलग बानगी रही । लेकिन 1923 ई. में मुकुटधर पाण्डेय मानसिक रोग की अवस्था में छायावाद और कुररी के प्रति रचनाओं में युगबोध को जन्म दिया । डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के अनुसार, कुररी में तो भारत वर्ष की सारी संवेदना की परंपरा निहित है

-     https://www.sahityashilpi.com/2008/09/blog-post_30.html (छायावाद के मुकुटः मुकुटधर पाण्डेय (विशेष प्रस्तुति) – संजीव तिवारी)

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, वस्तुतः स्वच्छंदतावादी कविता बहुत पहले शुरू हो चुकी थी और कविवर मुकुटधर पाण्डेय उसके प्रमुख उन्नायक रहे । आधुनिक हिन्दी कविता के अध्ययन में इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिकी आंदोलन की उपेक्षा नहीं की जा सकती।  

-    https://hindi.pratilipi.com/read?id=4844256240336896 (मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि – डॉ. बलदेव)

 इसके बावजूद उपेक्षाओं का सिलसिला जारी रहा । वृहत्रयी और लघुत्रयी रचनाकारों की रचनाएँ ही छायावाद में गिनी जाती हैं और विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ायी जाती हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि हर रचनाकार की रचना अपनी जगह स्वयं बनाती हैं लेकिन कभी-कभी हाशिए पर खड़े होने की वजह आलोचक-दृष्टि भी होती है । यदि स्तंभों की बात करें तो स्तंभों को स्तंभ बनाने में उनकी रचनाओं के साथ-साथ आलोचक दृष्टि भी रही है ।  

कविता को आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति मानने वाले जयशंकर प्रसाद की कविता खोलो द्वार सन् 1914 में प्रकाशित हो चुकी थी और चित्राधार उनका पहला तथा कामायनी आखिरी काव्य-संग्रह था । चित्राधार, झरना, आँसू, लहर, कामायनी निःसंदेह इनकी विशिष्ट कृतियाँ हैं । स्वयं सुमित्रानंदन पंत इन्हें हिन्दी में ताजमहल के समान मानते हैं ।

-    https://www.hindi-kavita.com/Biography-Jaishankar-Prasad.php

कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास लिखने वाले बहुमुखी प्रतीभा के धनी प्रसाद को नाटककार के रूप में स्थापित करने में महेश आनंद, शांता गाँधी, वीरेन्द्र नारायण, सत्येन्द्र तनेजा का अत्यधिक योगदान रहा । कुछ आलोचक इन्हें छायावाद के प्रतिष्ठापक के रुप में मानते हैं किंतु बच्चन सिंह के अनुसार, प्रसाद को छायावाद (स्वच्छंदतावादी काव्य) का प्रवर्तक कहना कवि के प्रति अंधश्रद्धा का सूचक है । प्रसाद, निराला, पंत ने लगभग एक समय में लिखना प्रारंभ किया था । किसी कवि के थोड़ा पहले जन्म लेने मात्र से उसे किसी काव्यान्दोलन का प्रवर्तक नहीं ठहराया जा सकता । इसे विशिष्ट काल-खंड का उत्पादन मानना चाहिए

-    सिंह, बच्चन. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. पृ. 334

पल्लव की भूमिका में पंत जी ने स्वयं छायावाद की भाषागत एवं शैलीगत भावबोध को व्यक्त किया, जिसे छायावाद का मेनिफेस्टो माना जाता है । इनकी छायावादी रचनाएँ वीणा, ग्रंथि, गुंजन, पल्लव, युगांत है । बनारस, इलाहाबाद, अल्मोड़ा में से इनका दैनिक दिनचर्या का संबंध रहा । ये हरिवंश राय बच्चन और श्री अरविंदों के अच्छे मित्र थे और हरिवंशराय बच्च गाँधी परिवार के । कुछ विद्वानों के अनुसार कहीं न कहीं पंत जी को इन सबका लाभ भी हासिल हुआ । इन्हें हिन्दी साहित्य का विलियम वर्ड्सवर्थ कहा जाता है । पंत के लिए रामधारी सिंह दिनकर की आलोचना सराहनीय है । लेकिन बच्चन सिंह पंत की रचनाओं को दो हिस्सों में बाँट कर देखते हैं, वीणा से युगांत तक की रचनाओं के विकास को आरोहात्मक तथा युगवाणी से लोकायतन तक के विकास को अवरोहात्मक मानते हुए कहते हैं, परवर्ती काव्य में न रागतत्त्व है, न बौद्धिक विश्लेषण-संश्लेषण और न समीक्षा । वह सिद्धांतों का पद्यानुवाद है । पर पंत ने वहाँ भी कल्पना का पल्ला नहीं छोड़ा है । अंतर यह है कि पूर्ववर्ती काव्य की कल्पना सर्जनात्मक है तो परवर्ती काव्य की कल्पना यूटोपियायी। 

-    सिंह, बच्चन. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. पृ. 355     

विशुद्ध भावात्मक कविता लिखने वाली महादेवी वर्मा सात साल की उम्र से लिखना शुरू कर चुकी थी । निहार, रश्मि और नीरजा, दीपशिखा इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं । छायावाद के समय ही अपने व्यक्तित्व एवं रचनाओं के लिए वर्चस्ववादी सत्ता में अपना विशिष्ट स्थान बना चुकी थीं हालांकि आलोचकों ने महिला रचनाकारों पर ध्यान न देते हुए भी इनके और सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं पर ध्यान देना शुरू कर दिया था । आधुनिक मीरा कही जाने वाली महादेवी वर्मा के विषय में नामवर सिंह लिखते हैं, प्रसाद और पंत की तरह उनमें आदर्श और सुखद लोक में पलायन करने की भावना नहीं है । भारतीय नारी आखिर भागकर जा ही कहाँ सकती है ? फिर भी आरंभिक गीतों की तीखी अतृप्ति में जो तड़प और ताजगी है, वह अंतिम गीतों के मंथर अवसाद में नहीं मिलती । पदावली और वाक्य रचना पर अवसाद हावी हो गया है । पहले के गीतों में जो चोट है, वह तो कभी की गायब हो गयी !”

-    https://medium.com/hindi-kavita/महादेवी-वर्मा-एक-नारी-का-छायावाद-f4caaeb8b25f (महादेवी वर्माः एक नारी का छायावाद)  

यह कहना गलत न होगा कि वह भारतीय नारी तो भारतीय परंपराओं का बहुत पहले ही खंडन कर संघर्ष को स्वयं चुन चुकी थीं, उन्हें पीड़ा में ही सुख मिला, अवसाद ही सुखद हो गया । दीपशिखा तक आते आते उनकी भावनाएँ इतनी परिपक्व हो गयी थी कि काव्य में उन्हें नए प्रयोग की आवश्यकता न रही । काव्य उनकी व्यक्तिगत पीड़ा की अभिव्यक्ति है तो गद्य सामाजिक पीड़ा की । समाज के पीड़ा के सामने अपनी पीड़ा को भूल गयीं । वर्चस्ववादी सत्ता को उलांघती महादेवी के जीवन-संघर्ष और रचनात्मक विस्तार ने आलोचकों को उन्हें इतिहास में अंकित करने के लिए विवश कर दिया । डॉ. बच्चन सिंह उनके ऊपर पुरूषों द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को चस्पा किए जाने के प्रतिकार में नए तरिके से आलोचना की उम्मीद करते हैं और उनकी रचना के संदर्भ में कहते हैं, उनकी रचनाएँ मूलतः समाज द्वारा उत्पीड़ित नारी की आत्माभिव्यक्ति है जो विद्रोह और आत्मदमन दोनों छोरों को छूती रहती है

-    सिंह, बच्चन. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. पृ. 361       

साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध बंगाल में जन्मे निराला जी का साहित्य का समृद्ध होना स्वाभाविक था । बाद में उनके जीवन का संबंध कोलकाता, लखनऊ एवं इलाहाबाद से हो गया । निराला जी के संदर्भ में यह विचारणीय है कि वे रचना के क्षेत्र में बहुमुखी थे । छायावाद के समय में रचनात्मक रूप से समृद्ध होने बावजूद भी उन्हें अपेक्षित साहित्यकार का स्थान नहीं मिल पा रहा था । जिसका दर्द सरोज-स्मृति और राम की शक्तिपूजा में छलका है । शुरूआती दौर में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने छायावादी रचना जूही की कली को अनैतिक कहते हुए सरस्वती पत्रिका में छापने से इंकार कर दिया था तो बाद में मुक्त छंद की कविताएँ लिखकर बनी-बनायी लीक को तोड़ना कदाचित् वर्चस्ववादी आलोचकों को मान्य नहीं था । ज्योति प्रसाद मिश्र निर्मल ने ‘हिंदी कविता की गति लेख में निराला की कविताओं पर श्री रविन्द्र जी का प्रभाव कहते हैं और उसके बाद से निराला की अतुकान्त मुक्त छंद पर ऊँगलियाँ उठने लगीं । ऐसी स्थिति में निराला के समर्थन में नवजादिक लाल श्रीवास्तव सामने आये और उन्होंने मुक्त काव्य को कविता का सच्चा स्वरूप कहते हुए बचाव किया ।   

इसका अर्थ यह निकलता है कि निराला के समर्थक और विरोधी दोनों ही छायावाद में थे । अब बने-बनाए खाँचों को तोड़ना हर किसी के लिए संभव न था और न ही आलोचकों के विरोध में जाने का साहस । ये अलग बात है कि बाद में रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में उन्हें वो सारे स्थान प्रदान किए जिसके वे हक़दार थे । राम की शक्तिपूजा, तुलसीदास, सरोज-स्मृति, मेघनाथ वध छायावाद की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ हैं तो कुकुरमुत्ता, वह तोड़ती पत्थर आदि प्रगतिवाद की । मुक्त छंद के साथ ये प्रगतिवाद के प्रवर्त्तकों में गिने जाने लगें ।   

1336 तक आते आते छायावादी कवि स्वयं छायावादी काव्य-शैली का अतिक्रमण लगें । नामवर सिंह और ललित मोहन अवस्थी प्रगतिवादी काव्य की शुरूआत 1930 से मानते हैं । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, बालकृष्ण शर्मा नवीन, भगवती चरण वर्मा प्रगतिवादी कविता की शुरूआत छायावाद में ही कर चुके थे । जिनमें से निराला ने 1923 ई. में बादलराग लिखा तत्पश्चात् भिक्षुक, वह तोड़ती पत्थर लिखें । नगेन्द्र सुमित्रानंदन पंत को प्रगतिवाद का पहला कवि मानते हैं और श्री प्रकाशचन्द्र शुक्ल रामधारी सिंह दिनकर को । लेकिन निराला छायावाद और प्रगतिवाद दोनों के महत्त्वपूर्ण कवि बन गए ।  

इन सभी कवियों के समकालीन कवि मुकुटधर पाण्डेय ने अपनी कविताओं को विशुद्ध आंतरिक सहज अभिव्यक्ति मात्र मानते थे । वे 1909 से 1925 तक निरंतर लेखन में सक्रिय रहें किंतु उसके बाद मानसिक अस्वस्थता के कारण बहुत कम लिख पायें, लेकिन उस बीच जो भी लिखें छायावाद के लिए महत्त्वपूर्ण है ।   

प्रश्न यह उठता है कि क्या उनका कम लिखना उन्हें छायावाद के स्तम्भों से विलगाने की वजह है या उनकी रचनाओं का कम पढ़ा जाना ? दूसरा प्रश्न यह भी उठता है कि जिस प्रकार दिल्ली आज साहित्यिक गढ़ है उसी प्रकार इलाहाबाद और बनारस उस समय साहित्य का गढ़ हुआ करता था और साहित्यिक मठाधीश भी लगभग वहीं निवास करते थे । स्तम्भों का निवास एवं साहित्यिक गतिविधियों का जुड़ाव आदि इन्हीं स्थानों से था जबकि बिलासपुर जिले (छत्तीसगढ़) के बालपुर ग्राम में जन्में मुरली मुकुटधर पाण्डेय का इस गढ़ से बहुत कम संपर्क रहा । तो क्या साहित्यिक मठाधीशों में कम पैठ होने से वे हाशिए पर चले गए ? क्योंकि कहा जाता है कि मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं को सरस्वती के अलावा कहीं और छपा देखकर महावीर प्रसाद द्विवेदी को क्रोध आ गया था लेकिन इसी बीच मुकुट जी की कविताएँ लगभग सभी पत्रिकाओं में अपनी जगह बनाये हुए थी । यानी तटस्थता इनका अपना व्यक्तिगत नियम रहा । साहित्यिक गुटबंदियों और मठाधीशों से संपर्क करने के लिए आज की तरह सोशल मीडिया न थी । आज भी सोशल मीडिया होते हुए भी दूर-दराज के लेखक लगभग हाशिए पर ही होते हैं । वे साहित्यिक गढ़ में कभी-कभी चमक तो जाते हैं लेकिन अपनी घुसपैठ न बना पाने कारण जल्द ही अंधेरे में खो भी जाते हैं । तो क्या साहित्यिक गढ़ में घुसपैठ न बना पाने कारण वे आलोचकों की दृष्टि में शिखर पर नहीं पहुँच पायें ? चौथा प्रश्न, यह सच है कि रचनाएँ स्वयं अपनी जगह बनाती हैं तो क्या द्विवेदी युग में लीक से हट कर चलने वाले मुकुट जी की रचना स्थापित किए गए स्तम्भों की रचनाओं के बीच अपनी जगह बनाने में असफल रहीं ? पाचवाँ प्रश्न, आलोचना के सम्राट शुक्ल जी ने जिन चार छायावादी कवियों की विस्तार से चर्चा की है, क्या उन्हें ही बाद के आलोचकों ने आँखें बंद करके स्तम्भ मान लिया और मुकुटधर तथा अन्य कवियों पर उनकी दृष्टि नहीं गयी ?

ये सारे प्रश्न आलोचकों पर भी सवाल उठाते हैं और परंपरागत आलोचकों से हटकर निष्पक्ष रूप से हिन्दी साहित्य के मूल्यांकन की नई माँग करते हैं । हिन्दी साहित्य की पंरपरा में यदि कोई कवि सचमुच महत्त्वपूर्ण नहीं था अथवा निम्न स्तरीय था तो वह प्रवर्त्तक कैसे बन गया और यदि बन गया तो उसकी रचनाओं का अवमूल्यन उसी युग के अंतर्गत क्यों हो गया ? कुररी के प्रति में मुकुटधर पाण्डेय की रचना कदाचित् अब भी स्वयं के अस्तित्व के लिए विलाप कर रही है- 

किसी गुप्त दुष्कृति की स्मृति क्या उठी हृदय में जाग

जला रही है अथवा प्रिय वियोग की आग ?

 

शून्य गगन में कौन सुनेगा तेरा विपुल विलाप ?

बता कौन सी व्यथा तुझे है, है किसका परिताप?”

-       https://www.rachanakar.org/2017/09/blog-post_16.html

 संदर्भ ग्रंथ –

1.    शुक्ल, आचार्य रामचंद्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास. प्रका. अभ्युदय बुक्स. सं. 2014.

2.    डॉ. नगेन्द्र. हिन्दी साहित्य का इतिहास. प्रका. मयूर पेपरबैक्स, नौएडा. सं. प्रथम, 1973, तैतीसवाँ, 2007.

3.    शर्मा, डॉ. शिव कुमार शर्मा. हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ. प्रका. अशोक प्रकाशन, दिल्ली. सं. अठारहवाँ 2003.

4.    सिंह, बच्चन. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास. प्रका. राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली. सं. 1996, संशोधित परिवर्द्धित 2006, आवृत्ति 2009.)

5.    गुप्त, गणपतिचन्द्र. महादेवी नया मूल्यांकन. प्रका. लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली. द्वितीय सं. 1997.

6.    https://hindi.pratilipi.com/read?id=4844256240336896 (मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि – डॉ. बलदेव)

7.    https://www.sahityashilpi.com/2008/09/blog-post_30.html (छायावाद के मुकुटः मुकुटधर पाण्डेय (विशेष प्रस्तुति) – संजीव तिवारी)

8.  https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/171266/5/05_chapter%202.pdf (छायावाद की अवधारणा एवं प्रभाव)

9.    https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/46008/6/06_chapter%201.pdf (छायावाद की पृष्ठभूमि)

10. https://www.sahapedia.org/छायावाद-एक-प्रवेशिका

11.  https://www.hindi-kavita.com/Biography-Jaishankar-Prasad.php

12.https://medium.com/hindi-kavita/महादेवी-वर्मा-एक-नारी-का-छायावाद-f4caaeb8b25f (महादेवी वर्माः एक नारी का छायावाद) 

13.  http://kavitakosh.org

 



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