साहित्य नंदिनी अक्टूबर 2022





 डाॅ. आशा पाण्डेय


शिक्षा :  एम.ए.,पीएच.डी (प्राचीन इतिहास)

प्रकाशन : 

1.   धूप का गुलाब (कहानी संग्रह)

2.   चबूतरे का सच (कहानी संग्रह)

3.   खारा पानी (कहानी संग्रह)

4.   देर कभी नहीं होती (कहानी संग्रह)

5.   बादल को घिरते देखा है (यात्रा वृत्तांत) ये पुस्तक उड़िया भाषा में अनूदित एवं प्रकाशित।

6.   तख्त बनने लगा आकाश (कविता संग्रह)

7.   बिखरा रंग सिंदूरी (कविता संग्रह) 

8.   खिले हैं शब्द (हाइकु संग्रह)

9.   यह गठरी है प्रेम की (दोहा संग्रह)

10.  खट्टे हरे टिकोरे (बाल कविता संग्रह)

11.  सोन चिरैया (बाल कविता संग्रह)

12.  मैं पंछी बन जाऊं (बाल कविता संग्रह)

- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, लेख कविताएं तथा यात्रा वृत्तांत प्रकाशित ।

- कई कहानियां, कविताएं मलयालम, उड़िया तथा नेपाली भाषा में अनूदित प्रकाशित

- आकाशवाणी नागपुर तथा अकोला से कविताएं तथा कहानियां प्रसारित ।

पुरस्कार :    महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य, अकादमी का 2010-11 का मुंशी प्रेमचंद

प्रथम पुरस्कार प्राप्त:

            श्री राधेश्याम चितलांगिया स्मृति अखिल भरतीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता सन 2011 

द्वितीय पुरस्कार प्राप्त:

- सृजन लोक सम्मान - चेन्नई

- ललद्यद शारदा सम्मान - लेह

- तुलसी सम्मान  - भोपाल से प्राप्त।     

सम्पर्क: 5, योगीराज शिल्प, आई. जी. बंगला के सामने, कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र 

    मो.  9422917252,  09112813033

    फोन  : 

ईमेल  : ashapandey286@gmail.com

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समीक्षा


नीरज नीर, राँची, झारखंड, मो. 8797777598


खारा पानी: समस्या नहीं, समाधान की कहानियाँ

कहानियाँ सिर्फ यथार्थ का चित्रण ही नहीं बल्कि यथार्थ की कलात्मक व रोचक अभिव्यंजना होती है। आशा पांडे की कहानियों से गुज़रते हुये हम पाते हैं कि उनका कथ्यात्मक कौशल बहुत ही संवेदनशील तरीके से ग्रामीण जीवन में व्याप्त असमानता, भूख, गरीबी, जहालत और बदहाली की तार्किक पड़ताल करते हुये मनुष्यता के लिए स्पेस की तलाश करता है लेकिन इस तलाश में ये कहानियाँ कहीं भी अभिव्यंजना व रंजकता के सतह पर कमजोर नहीं पड़ती हैं। जीवन की विसंगतियों के बीच इंसानियत के लिए थोड़ी सी जगह की तलाश करने के क्रम में आशा पांडे अपनी कहानियों का जो गझिन ताना-बाना बुनती हैं वह पाठको के अन्तर्मन में अन्तः सलिला की भांति प्रवाहमान होने लगता है। 

“खारा पानी” शीर्षक से आए आशा पाण्डेय के नवीन कहानी संग्रह की कई कहानियाँ स्त्री विमर्श की धारदार कहानियाँ हैं, जो बहुत ही मजबूती से से न केवल स्त्रियों के स्त्री होने की पीड़ा व यंत्रणा की विवेचना करती हैं बल्कि उनसे जूझना, लड़ना और जीतना भी सीखाती है। इनमें ज्यादातर कहानियाँ ग्रामीण परिवेश की हैं, लेकिन गाँव से शहर जाने के प्रवास की पीड़ा भी कुछ कहानियों में बहुत ही मुखर होकर प्रतिबिम्बित हुई हैं। 

यूं तो किसानों की स्थिति सम्पूर्ण देश में एक सी ही है एवं सभी जगह वे अनेक तरह की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र में लगातार होते किसानों की आत्महत्या ने सभी को चिंतित एवं द्रवित किया है। विडंबना यह है कि किसानों की जो मूल समस्या है, उसकी ओर ध्यान नहीं देकर उसे खैरात देने की कोशिश की जाती है। अगर किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, उन्हें सस्ते दर पर बीज मिले, कीटनाशकों का छोटा डोज उपलब्ध हो, अनाजों के भंडारण व ट्रांसपोर्टेसन की उपयुक्त व्यवस्था हो तो किसानों को खैरात देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। किसान इस देश का सबसे स्वाभिमानी समुदाय है, जो देश के लिए सर्वाधिक योगदान देता है, न केवल अपने श्रम एवं कृषि उत्पादों के द्वारा बल्कि सीमा पर लड़ने वाले अपने सैनिक बेटों के द्वारा भी। संग्रह की एक कहानी “जागते रहो” इस विषय को बहुत ही पैने तरीके से उद्भाषित करती है। व्यापारियो द्वारा संतरा उगाने वाले किसानों को अनेक वर्षों से एक ही तरीके से छला जा रहा है और किसान यह सब जानते हुये भी हर बार छले जा रहे हैं। यह कैसी मजबूरी है... कैसी बेचारगी? जितनी पूंजी वे लगाते हैं, जब उतना भी वापस नहीं मिलता तो कर्ज में डूबा हुआ किसान अत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। जिस तरह से किसी जानवर के मरने पर गिद्ध उसकी मृत देह को नोचने चले आते हैं... न न ... गिद्ध न कहें ... आजकल गिद्ध कहाँ रह गए... लाश के कीड़े सही रहेगा। हाँ तो जिस तरह से लाश के कीड़े चले आते हैं.... उसी तरह किसी किसान की आत्म हत्या पर झुंड के झुंड मीडिया वाले चले आते हैं, जिनको मृतक से या मृतक के परिवार जनों से जरा भी संवेदना नहीं होती। वे तो लाशों के व्यापारी हैं ... लाशों से उनकी टीआरपी बढ़ती है। एक जगह एक किसान आत्म हत्या कर रहा था, कुछ लोग उसकी विडियो बनाते रहे, किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की। यह कैसा अधम समाज है, पढे लिखे लोगों का, तथाकथित सभ्य लोगों का समाज? कोट, टाइ लगाए लाश के कीड़ों का समाज। आशा पांडे की यह कहानी आज के भारतीय गाँव की एक दारूण कहानी है, एक भयावह सच एक ऐसा सच जिससे आज का हिन्दी साहित्य नजरें चुरा रहा है, जो आज के मध्य वर्गीय समाज का केंद्र बिन्दु नहीं है, जिसकी पीड़ा अलग है, जिसका दुख अलग है। किसानी जीवन की इस पीड़ा को प्रकट करती कहानी में प्रथमेश और नन्दा की एक प्रेम कहानी भी गुथी हुई है, जो मुख्य कहानी के साथ साथ चुपचाप चलती रहती है। एक ऐसी कहानी जो यद्यपि संसार के लिए शुरू होने से पहले समाप्त हो गयी लेकिन आत्मा के स्तर पर जो कभी समाप्त नहीं हुई, नन्दा की मृत्यु के बाद भी प्रथमेश के जीवन के अँधियारे कोने में सुबकती हुई दुबकी हुई जिंदा रही।

आशा पांडे के इस इस नए कहानी संग्रह की कई कहानियाँ नारी के अन्तर्मन की गहरी व सूक्ष्म पड़ताल करती है। ऐसी ही एक कहानी है, संग्रह की पहली कहानी “यही एक राह”, जो एक ग्रामीण विधवा वैदेही की कहानी है। गाँव में आज भी एक विधवा को अपनी जमीन और अपनी देह दोनों बचानी होती है। कभी कभी देह की लूट, जमीन लूटने का साधन बन जाती है तो कभी जमीन हड़प लेना देह लूटने का साधन। इन दोनों को बचाकर चलना एक तनी हुई रस्सी पर चलने के समान होता है और इस पूरे प्रकरण में व्यवस्था दर्शक के रूप में खड़े रहकर ताली पीटने का काम करती है। आशा पाण्डेय की यह कहानी न केवल एक स्त्री की अंतर्शक्ति की पहचान कराती है बल्कि उसके संकल्प के आगे कैसे एक निकृष्ट, कायर व स्वार्थी समाज झुक जाता है यह भी दिखाती है। 

इसी तरह से एक कहानी है “चीख”, गाँव की एक परित्यक्ता हंसा की कहानी, जिसके जीवन में तमाम तरह के दुख, तकलीफ और कड़वाहट के बीच प्रेम मीठे जल के सोते की तरह फूटता है और उसकी जिंदगी को सराबोर करने लगता है, वह अपनी तकलीफों को कम तकलीफदेह पाने लगती है, उसकी पीड़ा कम पीड़ादायक होने लगती है । लेकिन समाज को प्रेम भला कब मंजूर हुआ है .....? कहते हैं प्रेम की समाज में सबसे ज्यादा जरूरत है लेकिन विडम्बना देखिये कि प्रेम समाज के लिए सबसे अवांछित तत्व है। हंसा की लाश एक दिन अपने ही बगीचे के कुएं में पाई जाती है। प्रेम में मार दी गयी स्त्री की लाश दरअसल स्त्री की लाश नहीं बल्कि समाज की लाश होती है। जब जब एक स्त्री प्रेम में मारी जाती है तब तब समाज थोड़ा और मरता है। स्त्री मन की अंतरतम परतों को उधेड़ती कहानीकार की यह कहानी आद्यांत मन के कोरों को भिगोती रहती है। दुनियाँ में स्त्री को प्रेम से वंचित करने की ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ लिखी गयी होंगी लेकिन आशा पाण्डेय की यह कहानी अपने विशिष्ट कलेवर और भावनाओं के मर्मांतक उत्स के लिए अलग से पहचान बनाती है। 

शहर में रहने वाले बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने वाले तथाकथित सभ्य समाज के बरक्स जंगल में रहने वालों की मानवीय संवेदनाओं से परिचित कराती एक कहानी है “जंगल”। नागरीय सभ्यता जंगल में रहने वालों के प्रति एक पूर्वाग्रही अवधारणा से ग्रसित है, जो उन्हें उनके प्रति भय, शंका और घृणा से भर देती है। लेकिन कहानी का मुख्य पात्र जो होटल में प्लेटें धोने वाला एक लड़का है जब उनके बीच फंस जाता है या यूं कहें कि शहरी सभ्यता के सबसे चमकदार पात्रों के द्वारा छोड़ दिया जाता है तो उसे इस बात की अनुभूति होती है कि असल में जो शहर है वही जंगल है और जंगल में इंसानी सभ्यता का वास है। इस संदेश के हेतु से रचित इस कहानी में कहानीकार अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल रही हैं। बहुत ही खूबसूरती से बुनी गयी यह कहानी पूर्वाग्रह की बेड़ियों को तोड़ने व शहरों में संवेदना शून्य होती युवा पीढ़ी के चरित्र को अभिव्यक्त करने का अत्यंत सार्थक प्रयास है। 

भूख जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है लेकिन यह भी सच है कि जैसे ही पेट की भूख मिटती है, अन्य तरह की भूख जन्म लेती है और साथ ही जन्म लेने लगते है संदेह, संशय, ईष्र्या, लोभ, और लालच के कीड़े जो आदमी को आदमी नहीं रहने देते। संग्रह की कहानी “दंश” गाँव से शहर आए एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसमें पेट भरने का इंतजाम होने के बाद एक पति अपनी पत्नी पर व्यर्थ के संदेह करने लगता है और इसके कारण जमी जमाई गृहस्थी बिखर जाती है। 

आशा पाण्डेय यद्यपि महाराष्ट्र में रहती है पर उत्तर प्रदेश उनके दिल के करीब है। रोजगार हेतु उत्तर प्रदेश के लोगों के प्रवास की पीड़ा वह अपने दिल में महसूस करती है। संग्रह की कहानी “खारा पानी” जिसके नाम पर इस किताब का शीर्षक भी है ऐसे ही एक प्रवासी मजदूर बच्चे की कहानी है। लड़का नौकर है। नौकर की उम्र पर ध्यान बाद में जाता है, उसके काम पर पहले। वह डांट खाता है, झिड़की खाता है, खाना खाता है। लड़का सब कुछ पचाता है। एक चमक-दमक से भरे घर में कीमती सामानो व छोटे दिल वाले घर में वह कई कारणों से डांट खाता है। डांट खाते-खाते वह भ्रम में रहने लगता है कि क्या सही है और क्या गलत। जिसे वह सही समझता है वह गलत हो जाता है। एक छोटे बच्चे की जिज्ञासा को, उसके मनोभावों को, उसकी पीड़ा को एवं घरवालों का उसके साथ व्यवहार को आशा पांडे ने जितनी सूक्ष्मता से पकड़ा है उतनी ही खूबसूरती से उसे बयान भी किया है। 

आशा पाण्डेय की कहानियों की विशेषता है कि वे अपनी कहानियों के कथ्य कहीं बाहर नहीं तलाश करती बल्कि अपने वर्तमान व विगत जीवन से यादों के मोती सँजोती है और उन्हें कल्पनाओं के धागों में गूँथकर कहानी रूपी माला में प्रस्तुत करती हैं। 

संग्रह की एक कहानी “वसीयत” वर्तमान काल के महानगरीय जीवन में स्वार्थों एवं भौतिक लिप्सा के मध्य आपसी पारिवारिक रिश्तों के दरकने की मर्मस्पर्शी कहानी है। महानगरों में छोटे होते घरों के आकार के साथ ही लोगों के हृदय भी छोटे होते जा रहे हैं जो पारिवारिक सम्बन्धों की मर्यादा को भी अपने भीतर समा पाने में समर्थ नहीं है। 

आशा पांडे की कहानियों की विशेषता है कि ये सिर्फ समस्या गिनवाकर पाठकों की करुणा नहीं बटोरती बल्कि समस्याओं के समाधान भी प्रस्तुत करती हैं। 

संग्रह में कुल जमा बारह कहानियाँ संकलित हैं और सभी बारह की बारह कहानियाँ पठनीयता एवं कथ्यात्मकता की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं। इन कहानियों को अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए। 

आजकल कई किताबों को पढ़ना हुआ है, सभी किताबों में प्रिंटिंग, व्याकरण दोष एवं वाक्य विन्यास की इतनी गलतियाँ देखने को मिलीं कि पढ़ने का मन ही उचाट हो जाता है। जबकि सभी तथाकथित बड़े प्रकाशकों की किताबें थी। यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई है कि इस कहानी संग्रह में ऐसी कोई दिक्कत नहीं है। प्रिंटिंग त्रुटिहीन है एवं प्रिंटिंग की गुणवत्ता भी अच्छी है। आशा पाण्डेय को इस कहानी संग्रह की लिए बारंबार बधाई। मैं यह आशा करता कि यह कहानी संग्रह पाठकों को अवश्य ही पसंद आएगा।                                          

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समीक्षा


श्री प्रमोद भार्गव लेखक/पत्रकार, शब्दार्थ 49, श्रीराम काॅलोनी, शिवपुरी (म.प्र.)
मो. 09425488224, 9981061100


खारा-पानी, कड़वी कहानियां

खारा पानीः प्रसिद्ध कथा लेखिका आशा पाण्डेय का नया कहानी संग्रह है। ये कहानियां अपने समय की नब्ज पकड़ने में सार्थक हैं, इसलिए कड़वी हैं। कहानियों में ग्रामीण समाज और शहर में जीवन-यापन के लिए गांव से आए लोगों की ऐसी त्रासदियां हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग की मानसिक विदू्रपता से परिचय कराती हैं। इन कहानियों में गरीब, लाचार एवं वंचितों का जीवन संघर्ष है। पुरातन तथा आधुनिक जीवन मूल्यों की कश्मकश निकलते प्राण हैं। कुप्रथाओं की कुरूपता है। कर्ज में डूबे किसानों की मौत है, तो जीने के लिए पगडंडी बनाते किसान भी हैं। साफ है, संघर्षरत लोगों के जीवन के विविध रूप कथ्य का हिस्सा हैं। ये चित्र इतनी सहजता से बिंबों, प्रतीकों और लोक में व्याप्त मुहाबरों के माध्यम से संपूर्ण मानवीय करुणा व संवेदना के साथ उकेरे गए हैं। कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वाकई सत्य और कल्पना के सम्मिश्रण की ये ऐसी कथाएं हैं, जो संवेदनशील व्यक्ति के अंतकरण में बदलाव की दस्तक देकर उसे झकझोरती हैं कि हम यह कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं ? 

इस संग्रह की कहानियों में यह तय करना मुश्किल है कि कौनसी श्रेष्ठ और कौन-सी सर्वश्रेष्ठ कहानी है ? इसलिए बात उत्पादक समाज, यानी किसान के कथानक से जुड़ी कहानी ‘जागते रहो‘ से करते हैं। यह कहानी संदेश देती है कि इसके पात्र ही नहीं, जैसे पूरे देश का उत्पादक एवं श्रम से जुड़ा समाज आजीवन त्रासदी भोगने को अभिशप्त है। अवर्षा या अतिवृष्टि की चपेट में तो वह है ही, सरकारी कामकाज में फैली अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की मार भी सबसे ज्यादा इसी वर्ग को झेलनी पड़ रही है। कहानी में कर्ज में डूबे एक के बाद एक किसान की आत्महत्या की खबरें आती हैं। टीवी में इस बहस के दौरान कि सूखा पड़ा है अथवा नहीं के बीच भाभी अपने देवर को सूचना देती है, ‘प्रथमेश देख, दौड़, तेरे दादा के मुंह से झाग निकाल रहा है।‘ यह झाग भोजन के जहर बन जाने से नहीं, भोजन पैदा करने वाले किसान द्वारा  कीटनाशक दवा पी लेने से निकला है।

यह वह साल है, जब आम चुनाव के कारण दो बार संसद में पेश हुए आम बजट में किसान की आय दोगुनी करने और साल में छह हजार रुपए सीधे खाते में डालने के प्रावधान किए गए हैं। सरकारी आंकड़े बोलते हैं कि इसी वर्ष के छह महीनों में अकेले महाराष्ट्र में तैरह सौ किसानों ने आत्महत्या की है। यह लेखिका आशा पाण्डेय का रचनात्मक दृष्टि बोध है कि पटवारी और अन्य राजस्व कर्मचारी जो आर्थिक मदद पर भी गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं, उन्हें ठेंगा दिखाते हुए गांव में सहकारिता का माहौल रचकर, बेरोजगार अलग-अलग सामान की दुकानें खोलते हैं। शर्त रहती है कि एक दुकान पर मिलने वाला सामान दूसरी दुकान पर नहीं मिलेगा। इससे बिक्री और आय में समानता बनी रहेगी। यह व्यवस्था माॅल और डिपार्टमेंटल स्टोरों को दरकिनार कर एक ऐसी राह दिखाती है, जिससे गांव और कस्बों में समृद्धि के द्वार खुल सकते हैं ? 

मर्ज कहानी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तमाचा है। इस कहानी में ग्रामीणों का वह सतत संघर्ष है, जो उन्होंने जमींदारों-जागीरदारों से किया और फिर जब देश आजाद हो गया तो यही लोग विधायक एवं सांसद बनकर सत्ता पर काबिज हो गए। लेखिका ने इस कहानी में एक बिंब रचा है, जिसके जरिए नायक मातादीन की पत्नी पति द्वारा अनाज की चोरी के जुर्म से मुक्ति के लिए शारीरिक शोषण को विवशता झेलती है। इसके बदले में शुल्क के रूप में एक बोरी रोजाना अनाज मिलता है। मातादीन का परिवार इस आनाज का उपयोग करने की बजाय एक कोठरी में एकत्रित करता रहता है। धीरे-धीरे समय बीता और कोठरी खण्डर में तब्दील होकर मैदान में बदल गई। अब न मातादिन है, न उसकी पत्नी, किंतु उसके वंशज हैं। यह वंशज जब इस मैदान में खेलता है, तो उसे गंघाई धूल से छींक और सर्दी की शिकायत होने लगती है। क्योंकि उसने अपने पूर्वजों से सुना है कि इस खण्डर की धूल में एक निर्दोष स्त्री के दैहिक दुराचार लाचारी पसरी है।

‘खारा-पानी‘ एक जिज्ञासु बालक के शहर आकर घरेलू नौकर बनने की कहानी है। जब वह घर में पानी-बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों की फिजूलखर्ची रोकता है तो उसे डांट-फटकार मिलती है। जिज्ञासु बालक की एक अन्य कहानी ‘जंगल‘ भी है। इसमें शहरी सभ्यता की मानसिक विदू्रपता घने जंगल में रहने वाले आदिवासियों के मानवीय पक्ष से तुलना करके दिखाई गई है। ‘यही एक राह‘ एक ऐसी संघर्शशील ग्रामीण स्त्री की कहानी है, जिस पर कुदरत की मारें पड़ती हैं। जब वह अपनी विधवा बहू के साथ अकेली रह जाती है तो गांव के दबंग उसकी जमीन हड़प लेते हैं और राजस्व व पुलिस अमला आंख मूंदे रहता है। जमीन वापसी के लिए वह देवी के थान पर अनायास सिर में देवी आ जाने का स्वांग रचती है और उसकी समस्याएं आश्चर्यजनक ढंग से हल होने लगती हैं। ‘चीख‘ एक संभावनाश्ील ऐसी युवती की कहानी है, जिसके सपने जड़ हो चुके पुरातन और आधुनिक कश्मकश में हिचकोले खा रहे मूल्यों पर टूटते चले जाते हैं और अंततः पुनर्विवाह का सपना लिए वह आत्महत्या कर लेती है। 

इस संकलन की प्रत्येक कहानी एक नूतन व मौलिक कथ्य का विस्तार लिए हुए ग्रामीण, आर्थिकी और समस्याओं से जुड़े विविध आयामों के सार्थक अक्ष खींचती हैं। विषेशतः जिस तरह पटवारी हलकों में फैले खेतों के अक्षों की आड़ी-तिरछीं रेखाएं मानचित्र पर उभरी होती हैं, ठीक वैसे ही लाचारी और शोषण से अभिशप्त स्त्री-पुरुषों के चेहरे इस संग्रह के पृष्ठों पर अपनी संघर्ष-गाथा कहते उभरे हैं। ये चेहरे निकम्मे के आलस्य का प्रतीक न होकर व्यवस्था के भ्रष्टाचार और विदू्रपता की ऐसी परछाईयां हैं, जो हर मृत्यु के पीछे अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाती हैं। इन कहानियों में लेखिका ने कहीं गहरे उतरकर लाचार की विवश्ता का यर्थाथ और मर्म समझने की कोशिश की है। कहानियों का शिल्प प्रांजल भाषा और देषज मुहाबरों-कहावतों से गढ़ा गया है। इसलिए कहानियां पाठक के लिए सहज, पठनीय व रोचक हैं। 

पुस्तकः खारा पानी, 

लेखिकाः आशा पाण्डेय, प्रकाशकः बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा, जयपुर-302006, मूल्य-150 रुपए। 

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पुस्तक समीक्षा



सुश्री अंजू शर्मा, नई दिल्ली, मो. 88517 51628 


खारा पानी : विषय की विविधता और विषय संधान की क्षमता चकित करती है!

इन दिनों हिंदी कथालेखन में जो लेखिकाएं लगातार लिखते हुए अपनी जगह बना रही हैं उनमें आशा पाण्डेय का नाम नया नहीं है! उनकी कहानियाँ महज किस्सागोई की बानगी भर नहीं हैं अपितु वे उत्तर आधुनिकता की ओर दौड़ते समाज में लगातार क्षरित होते जीवनमूल्यों की तलाश का सटीक तानाबाना हैं!

खारा पानी, वरिष्ठ कथाकार आशा पाण्डेय का तीसरा कहानी संग्रह है जो हाल ही में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ और पुस्तक मेले में लोकार्पित हुआ है! इससे पहले उनकी कहानी सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपती और प्रशंसित होती रही हैं! इस नये संग्रह में कुल 12 कहानियाँ हैं! किसी भी संग्रह में कुछ याद रह जाने लायक कहानियाँ मिल जायें तो वह संग्रह सार्थक कहलाता है! लेकिन इन बारह कहानियों में ज्यादातर कहानियाँ अपनी विषयवस्तु और उसके निर्वहन में परिपक्वता के कारण इस कसौटी पर ख्ररी उतरती हैं! अमूमन स्त्री लेखन पर केवल स्त्री विमर्श और स्त्री पुरुष सम्बन्धों की कहानियों में उलझे रहने का आरोप बार-बार लगता है लेकिन खारा पानी में विषय की विविधता और विषय संधान की क्षमता चकित करती है! इन कहानियों की रेंज सम्बन्धों के दायरे से बाहर देश, दुनिया और समाज तक अपना विस्तार करती है!

बकौल राजेंद्र यादव कि ‘‘कहानी मूलतः यथार्थ का ट्रीटमेंट है, इस यथार्थ को हम कैसे प्रस्तुत करते हैं- एक अनुभव का यथार्थ है, एक वास्तविकता होती है यानी एक जो होता है फैक्चुअल घटना है, जिस तरह से मैं व्यक्तिगत रूप से किसी चीज को देखता हूँ वो मेरा यथार्थ है और उस यथार्थ को हम कई तरह से कह सकते हैं।‘‘ किसी भी फंतासी या काल्पनिक दुनिया से दूर आशा पाण्डेय की ये कहानियाँ अपने ट्रीटमेंट को लेकर इसी कटु यथार्थ को बिना किसी लाग लपेट, खास शिल्प या भाषाई ट्रीटमेंट की चाशनी के अपने पाठकों के सामने रखने का साहस रखती हैं!

पहली कहानी ‘यही एक राह’ एक स्त्री के जीवन पर्यन्त संघर्ष और जिजीविषा की कहानी है! वेदैही जो युवावस्था में पति को खो देती है और बाद में दोनों बेटों को भी, अपने संघर्षों का स्थान्तरण अपनी पुत्रवधू तक होते देखती है पर उसकी विपदाओं का अंत कभी नहीं होता और जब अपने ही रिश्तेदारों के अत्याचारों से त्रस्त हो जाती है तो वह शीतला मइया के अवतरण का सहारा लेकर उनका मुकाबला करती है और अपनी जमीन को बचा पाने में कामयाब होती है! यह मार्मिक कहानी जहाँ एक ओर एक अकेली स्त्री की सतत लड़ाई और कभी हार न मानने वाली जीवनी शक्ति की कहानी है वहीं धर्मान्धता पर भी एक सटीक टिप्पणी है!

‘जंगल’ कहानी एक ऐसे किशोर की कहानी है जो जंगल के करीब स्थित एक होटल पर काम करते हुए जंगल घूमने का सपना पाले हुए है! होटल पर जंगल घूमने आये कुछ लोगों की मदद से उसका सपना सच भी होता है! किन्तु सघन वन में मिले तथाकथित ‘जंगलियों’ की आदमियत और सभ्य लोगों के ‘जंगलीपन’ का अद्भुत कंट्रास्ट रचती यह कहानी यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि सभ्यताओं के विकास में संवेदनाओं के बढ़ते क्षरण के बाद किसी आदमी में कितनी आदमियत बची रहती है!

‘सुरक्षा’ कहानी रेलवे प्लेटफार्म पर घूमती एक मानसिक रूप से विक्षिप्त स्त्री की कहानी है जो एक पुरुष की लोलुप दृष्टि का शिकार होने पर क्रुद्ध प्रतिकार का सहारा लेकर स्वयं को उस समय बचा तो लेती है पर यह सवाल पाठक के सामने छोड़ जाती है कि वास्तव में विक्षिप्त कौन है वह स्त्री या कदम कदम पर उसे नोचने को आतुर वह समाज जहाँ वह आज नहीं तो कल शिकार बन ही जाएगी! कहानी की सार्थकता यही है कि उसकी सुरक्षा की चिंता में अब पाठक भी शामिल है! इस कहानी का अप्रत्याशित अंत उसकी मार्मिकता को तीव्र उत्तेजना में बदल देने की क्षमता रखता है!

‘जागते रहो’ कहानी ग्रामीण परिवेश और किसान आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर एक टिप्पणी ही नहीं एक समाधान के रूप में प्रस्तुत होती है! एक किसान के पूरे जीवन पर लिखी इस मार्मिक लम्बी कहानी में औपन्यासिक कहानी या नाटक के सारे गुण हैं और प्रेमचंद और रेणु के पाठक स्वतः ही इस कहानी से जुड़ जाते हैं! हालाँकि उनके मन में ये मलाल रहेगा कि इतने वर्षों बाद भी यह विषय न केवल प्रासंगिक है अपितु आज भी एक ज्वलंत मुद्दे के रूप में जगह बनाये हुए है! इस कहानी में खेती और ग्रामीण जीवन से जुड़े छोटे छोटे ब्योरे कहानी की विश्वसनीयता में उत्तरोतर वृद्धि करते हैं!

‘दंश’ कहानी बिल्कुल अलग ट्रेक पर ले जाती है! यहाँ एक सनेही और पार्वती के रूप में एक दम्पत्ति हैं जो मेहनत के बल पर एक धनी परिवार में नौकरी कर अपने जीवन को संवार लेने की मंशा से शहर आ तो जाता है किन्तु इस प्रेममय जोड़े के बीच शक का दंश जब जगह बनाता है तो सोख लेता है न केवल उनका सुख चैन बल्कि पार्वती के सारे सपने जो वह अपनी सन्तति की शिक्षा और बेहतर परवरिश के लिए संजोये थी! जब तक सनेही लौटता है अपने शक के चक्रव्यूह से टूटे सपनों और दरकते मन के साथ पार्वती अपनी हर चाह खो चुकी होती है! स्त्री पुरुष सम्बन्धों पर ये एक बेहतरीन कहानी है!

‘मर्ज’ कहानी पीढ़ियों से चले आ रहे सामंतवाद, स्थानीय राजनीति की भीतरी परतों और ग्रामीणों के शोषण पर एक लिखी गई एक अच्छी कहानी है जो लगातार कई सवाल उठाती है! कहानी एक बड़े कालखंड को समेटते हुए बार बार सूत्रधार के नोस्टाल्जिया से मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ती जाती है और अंत की विवशता उसे यथार्थवाद की ओर बढ़ा देती है!

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘खारा पानी’ एक ऐसे किशोर की कहानी है जो निर्धनता से जूझते हुए शहर तक तो पहुँच गया पर एक धनी परिवार में घरेलू नौकर के रूप में काम करते हुए अभावग्रस्त जीवन से उपजी स्वाभाविक सावधानियों और धनाढ्य जीवन की संसाधनों को लेकर लापरवाहियों में सामंजस्य नहीं बिठा पाता! जल्दी ही उसका उत्साह काफूर हो जाता है और सतरंगी शहरी दुनिया का जादू दम तोड़ने लगता है! अपने गाँव में थोड़े बहुत उपलब्ध खारे पानी के चलते वह मीठे पानी के लिए ग्रामीणों के संघर्ष से पूरी तरह वाकिफ है! यही कारण है कि शहर में मीठे पानी’ के अंधाधुंध प्रयोग को उसका ग्रामीण मन सहजता से नहीं ले पाता! पानी के दुरूपयोग पर उसकी छटपटाहट पाठक के मन को भी बेचैन बना देती है! संसाधनों के अनावश्यक दोहन पर सवाल उठाती यह वाकई एक सुंदर और सार्थक कहानी है!

‘चीख’ कहानी एक परित्यक्त स्त्री हंसा की कहानी है जो अपने पति के अत्याचारों को झेलते हुए पिता और पति के अहम् के बीच पेंडुलम सी झूलती जिन्दगी जीने पर विवश होती है! हंसा के माध्यम से ये कहानी कई ऐसे प्रसंगों को सामने लाती जहाँ ये सवाल उठता है कि आखिर मर्यादा का सारा बोझ पितृसत्ता ने स्त्री के ही कंधों पर क्यों रखा है! कुल की मर्यादा के निर्वहन की सारी जिम्मेदारी बेटी पर ही आयद क्यों! आखिर बेटी और बेटे में इतना अंतर क्यों रखा जाता है कि जो जातिबाहर विवाह बेटे के लिए क्षम्य है वह बेटी के लिए निषिद्ध क्यों? हंसा के जीवन का अंत जरूर हो जाता है किन्तु उसके संघर्षों का अंत नहीं होता!

‘उलझते धागे’ कहानी एक ट्रेन में सफर कर रही एक विचारशील स्त्री में मन के गुंजलकों की कहानी है जो रेलवे प्लेटफोर्म और ट्रेन में उभर रहे कई दृश्यों को समेटे हुए है! यहाँ कई दृश्यों और पात्रों के माध्यम से एक संवेदनशील स्त्री की विचारप्रक्रिया पाठक के सामने कई सवाल छोड़ देती है!

‘कुल का दिया’ फिर से ग्रामीण जीवन पर लिखी एक लम्बी कहानी है जो बुआ के माध्यम से जातिप्रथा और निरर्थक रीति रिवाजों पर टिप्पणी करती हुई चलती है! यह कहानी समाज के दोगलेपन पर कड़ा प्रहार करती है जो एक स्त्री को भूखा मरने के लिए छोड़ देने को तो गलत नहीं मानता किन्तु उसके किसी नीची जाति के व्यक्ति के घर में खुद पका लेने भर से समाज के नियम और कानून बाधित हो जाते हैं! कहानी के अंत में बुआ की मृत्यु के बाद उनके जीवन से 

प्रेरणा लेकर रंजना का इन्ही तथाकथित रीति-रिवाजों के विरोध में घर-समाज के सामने खड़े हो जाना कहानी को सशक्त बनाता है! बिना किसी नारेबाजी या विमर्श के दावे के यह कहानी प्रगतिशील चेतना के जरिये बहुत बड़ी बात कहने का हौंसला रखती है! रंजना द्वारा कही गईं ये पंक्तियाँ गौर कीजिये, “तुमसे कोई गलती नहीं हुई सुमेर मामा, अम्मा प्रेम और ममता से भरी हुई थीं, तुम भी प्रेम और इंसानियत से भरे हो! तुम अम्मा के कुल के ही हो मामा! अम्मा को तुम्हारा ही जलाया दिया मंजूर होगा! अब यहाँ दस दिन तक तुम ही जलाओगे दिया!

‘खुद्दार’ कहानी निर्धन बच्चों और आम खाने एक बगीचे में आये एक शहरी परिवार की बातचीत के प्रसंग से निकली एक छोटी कहानी है! शहरी महानता के दंभ के आगे ग्रामीण खुद्दारी जीत जाती है इसकी बानगी है ये पंक्तियाँ...”मेरी दानशीलता को धक्का लगता है! अतिउत्साह में मैं ये सोच नहीं पाई थी कि चीजों को जबरदस्ती उठा लेना खरीदने की श्रेणी में नहीं लूटने की श्रेणी में आता है और कोई खुद्दार व्यक्ति लूटी हुई वस्तु की कीमत पाकर खुश नहीं होता!”

संग्रह की अंतिम कहानी ‘वसीयत’ पढ़ने में अपने ही परिवार में उपेक्षित जीवन जी रही एक साधारण सी लड़की की कहानी हैं पर कहानी अपने अंत तक पहुँचते पहुँचते एक स्त्री के अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता की कहानी बन जाती है, इसकी अंतिम लाइन तो पंच लाइन है जब वही स्त्री अपनी वसीयत अपने भतीजे नहीं भतीजी के नाम करने की बात कहती है जो तलाक के बाद भाई के घर रहने चली आई है! वह कहती है, “....वैसे एक राज की बात बताऊँ, वसीयत मैंने कर दी है! अरे नहीं, तेजस के नाम नहीं, मीता के नाम! तलाक लेकर मायके में रहती है!....आखिर उसे भी तो एक भाई है!”

कुल मिलाकर ये सभी कहानी विषयों के वैविध्य के कारण विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं! बदलते जीवन मूल्यों के प्रति चिंताएं, मानवीय करुणा और मार्मिकता इन कहानियों का प्राणतत्व है! बहुत साधारण और आम जीवन जीते पात्रों पर लिखी गईं ये कहानियां किसी वैशिष्ट्य का दम नहीं भरतीं! पर ये साधारण कहानियाँ अपने निर्वहन और लगातार उठते सवालों के कारण अपनी विशिष्टता को लगातार दर्ज जरूर कराती हैं! इन कहानियों की चेतना प्रगतिशील है और ये लगातार अपने समय को दर्ज करते हुए समाज की विसंगतियों पर बहुत सहज भाषा में अपनी बात रखने का शानदार प्रयास है! ग्रामीण पृष्ठभूमि में रची कुछ कहानियों में भाषा की आंचलिकता मन मोह लेती हैं साथ ही रोचकता और पठनीयता का विस्तार करती है! वहीँ वर्ग संघर्ष पर ये कहानियाँ बिना किसी शोर शराबे के अपनी सटीक टिप्पणी के माध्यम से अपनी बात रखने में पूरी तरह सक्षम हैं! आशा जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें इस उम्मीद के साथ कि उनकी और भी कहानियां हिंदी जगत को पढ़ने को मिलती रहेंगी!

पुस्तक: खारा पानी, लेखक: डाॅ. आशा पाण्डेय, प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर! पेपरबैक संस्करण, मूल्य: 150 रूपये केवल

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समीक्षा

समी. गिरिजा कुलश्रेष्ठ, मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास,

ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत),
मो. 99262 16689


‘खारा पानी’ मेरी नज़र में

‘खारा पानी’ श्रीमती आशा पाण्डे का दूसरा कहानी संग्रह है जो उन्होंने मुझे भेजा है। इससे पहले ‘चबूतरे का सच’ पढ़ा था और उसके बारे में भी लिखा था। हालांकि उन्होंने आग्रह नहीं किया कि मैं उसपर कुछ लिखूँ लेकिन पढ़ने के बाद लिखे बिना रहा नहीं जा सकता। इनकी कहानियाँ सामयिक व ज्वलन्त विषयों पर न होकर भी हमेशा रहने वाली हैं। सामयिक विषयों पर लिखना निश्चित ही रचनाकार की सजगता और सक्रियता का प्रतीक है उसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता लेकिन कहीं कोने में दबे छुपे समाज के अनछुए विषयों पर लिखने और इस गहराई के साथ लिखना अपने आप में एक तप जैसा है। वास्तव में ऐसी कहानियाँ तो बहुत लिखी जा रही हैं जिन्हें एक नजर से पढ़ो और चल दो। आज समय की माँग है कि छोटा लिखो आसान लिखो। कहानी से लघुकथा और लघुकथा के नाम पर चुटकुले या फिर कुछ ऐसा उत्तेजक लिखो कि रातों रात चर्चा का विषय बन जाए। ऐसे में जब खारापानी जैसे संग्रह आते हैं तो आश्चर्य होता है कि चुपचाप सड़क से अलग पगडण्डियों पर जाकर भी लिखा जा रहा है। जिसे चलते चलते केवल मन बहलाव के लिये नहीं पढ़ा जा सकता। कहानियाँ आपसे समय और ध्यान चाहती हैं और यहीं बात कहानियों का स्तर तय करती है।  

संग्रह में बारह कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ भीड़ से अलग विशिष्ट कहानियाँ हैं जो सामयिक व जानेमाने विषयों पर न होकर भी इस गहनता और तल्लीनता के साथ लिखी गई हैं कि आपके सामने एक पूरा परिवेश रच जाता है। स्वानुभूति को कथा रूप देना अपेक्षाकृत आसान है पर स्वयं से परे होकर दूरदराज के प्रसंग को देखना सोचना और उसमें पूरी तरह घुसकर एक दुनिया रच देना बहुत कठिन है। चाहे वह परिवार की जीविका चलाने के लिये माता की सवारी का आडम्बर करती वैदेही (यही एक राह) की विवशता हो या स्टेशन पर लोगों की बुरी नीयत से बचती पागल औरत की व्यग्रता हो (सुरक्षा) या फिर किसानों की आत्महत्या के कारणों का विश्लेषण हों (जागते रहो) या अपने अधिकार के लिये भाई के विरुद्ध होती बहिन (वसीयत) हो लेखिका ने इन प्रसंगों को बहुत गहराई से अपना बनाकर लिखा है। रसोईघर तक जाकर, वहाँ के बर्तनभाड़े और आटादाल तक देखकर  आशा जी के सौम्य व्यक्तित्त्व से अलग कुछ कठोर सी लेकिन यथार्थ लगने वाली कहानियाँ संग्रह की सभी कहानियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं। मैं तीन कहानियों का उल्लेख जरूर करना चाहूँगी। ‘मर्ज’ कहानी राजाओं व जमींदार युग से लेकर आज लोकतंत्र के चुनावों तक का एक व्यापक फलक समेटे है। कहानी का नायक छींकने के मर्ज का शिकार है जो देहशोषण और भ्रष्टाचार के प्रति विरोध का प्रतीक है पर वह लाइलाज है बल्कि अब वह बढ़ गया है दिल तक पहुँच गया है। विषय जाना माना है। भ्रष्टाचार और शोषण पहले भी था और आज भी है पर आशा जी ने जिस तरह इसे बुना है वह अपने आप में अनूठा है। किस्सा कहानी जैसा। यही कहानी की विशेषता है। शीर्षक कहानी ‘खारा पानी’ बहुत ही सुन्दर और संवेदनशील कहानी है जिसमें एक बच्चा माँ से दूर शहर में काम करने जाता है जहाँ पानी की कोई कमी नहीं। प्रभूतमात्रा में मीठा पानी उसे ललचाता है। वह चाहता है कि माँ भी यहीं आकर काम करे जो बहुत ही सीमित मात्रा में खारे पानी से गुजर बसर करती है। पर इसके लिये वह जो उपाय अपनाता है उसे सिर्फ डाँट फटकार मिलती है। यहाँ खारा पानी आँसुओं का प्रतीक है .इसे आशा जी ने बहुत आत्मीयता से लिखा है। पानी की कमी, पानी का महत्त्व, बच्चे के मनोभाव, उसकी सरलता, शहर में आकर उसकी जिज्ञासाओं को बड़े चित्रात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है जो आनन्दित करता है। ‘वसीयत’ कहानी इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी है। भाषा, शिल्प, कथ्य हर दृष्टि से कहानी बहुत ही प्रभावशाली है। आरम्भ से अन्त तक कहीं भी शिथिलता या अतिरिक्तता नही हैं। दंश, चीख, खुद्दार, उलझते धागे, जंगल, कुल का दिया आदि अन्य कहानियाँ है। सभी में आशा जी बोलती नजर आती हैं। कुल मिलाकर बोधि प्रकाशन से निकला यह संग्रह पठनीय और संग्रहणीय है। 

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समीक्षा


समी. श्री रामप्रसाद राजभर, दिल्ली, मो. 9995455598


चबूतरे का सच

 

‘‘ख़्वाहिश को अहमको ने परस्तिश दिया क़रार 

क्या पूजता हूँ उस बुत ए बेदाद-गर को मैं’’

फेसबुक की दुनिया आभासी है जरूर पर वहाँ पर आभासी, व्यावहारिक भी होता है। ऐसा मेरा मानना है और अनुभव भी है। आज जिन दो पुस्तकों की चर्चा करनी है, वह मुझे दीदी ने दीदी को कहकर भिजवायी। जी हाँ, दीदी ने दीदी को कहकर! मुझे इसी आभासी दुनियाँ से एक के बाद एक और दीदी मिली।

आभासी से साक्षात्कार की दुनियाँ। जैसे शब्दों से बुनी हुई दुनियाँ व उसके दुःख-दर्द, परेशानियाँ, जिन्दगी को जीने की जद्दोजहद। तमाम तरह की दुनियाँ। इन्हीं दुनियाँ में रिश्तों के क्षरण होने का दुःख, तो रिश्तों के बीच स्वार्थ का अनमोल जोड़क जोड़-तत्व।

निराला ने कहा था कि, ‘सबसे टेडे गाँव के लोग होते हैं। ‘यह वही जान सकता है जिसने राजकपूर की फिल्मे न देखी हो। गाँव एक ऐसा जंगल है जहाँ साँप ही साँप है और वहाँ रहने का मतलब है साँप के फन को कुचलने का फन आना चाहिये।

दोनों कहानी संग्रह में नौ और बारह मिलाकर कुल इक्कीस कहानियाँ हैं। इक्कीस की राशि श्रेष्ठ होती है। ‘चबूतरे का सच’ और ‘खारा पानी‘ दोनों कहानी-संग्रह में क्रमशः नौ व बारह कहानियाँ हैं।

सभी कहानियाँ अलग-अलग कथावस्तु, परिवेश के साथ ग्राम व शहर से जुड़ी हुई है। भारतीय कथाकारों की यही एक विशेषता है कि वे गाँव व शहर दोनों ही जगहों से अपने को जोड़े हुए हैं। या यूँ कहिये कि शहरों में रहते हुये भी उनकी जड़े गाँव में ही है। और गाँव उनकी स्मृतियों में रचा-बसा है।

चबूतरे का सच में कुल नौ कहानियाँ हैं और सभी विविधतापूर्ण है। कथालेखन में यथार्थ अवश्य होना चाहिये। यथार्थ मतलब कि कहानी हमारी लगने लगे। न कि हाँ, होगी कहीं की कहानी, ऐसा तो सुना है देखा नहीं। देखा नहीं ही संशय पैदा करता है और इस संशय से मुक्त होकर जब कहानी हमें अपने से जोड़ लेती है तो लगता है कि यह तो वहाँ होते देखा है, फलाने की कहानी है, अरे! यह तो अपनी ही जिन्दगी है। आशा पाण्डेय (दीदी) की कहानियों में यही बात है।

पहली कहानी नीम का पेड़ है। कहानी में नीम का पेड़ एक प्रतीक है। यह प्रतीक लगभग सभी का सत्य है। इस कहानी में अपनों की उस सच्चाई का उद्घाटन है जो कथित तौर पर अपने होते हैं पर पूरी प्रतियोगिता उन्हीं से होती है। कहते हैं कि शत्रु नजदीक का ही होता है। तो ख़ून के रिश्तेदारो को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। जो व्यक्ति कमाने के लिये शहर चला जाता है अक्सर उसके पाटीदार यही मान लेते हैं कि पैतृक सम्पत्ति भी अब उन्ही की हो गयी। जानेवाला शायद ही लौटकर आये। और उसकी सम्पत्ति में धीरे-धीरे अधिकार की मात्रा बढ़ाने लगते हैं। किन्तु जब वही लौटकर वापस आता है, स्थायी रूप से रहने के लिये तो मन मसोसकर रह जाते हैं और मन की कटुता व द्वेष  के साथ व्यवहार में भी बदलाव आ जाता है, अपनत्व सूख जाता है जैसे जेठ की दुपहरी में भीगे कपड़े।

एक और मानसिकता होती है मनुष्य की। वह संतुष्ट कहीं भी नहीं हो पाता। गाँव से शहर, शहर से महानगरों व उसके आगे की ओर पलायन इसी संतुष्टि के लिये होता है।

अगली कहानी भी ग्रामीण समाज व परिवेश की है। ग्रामीण दांव पेंच को समझने और समझाने में यह कहानी एक बेहतर प्रयास है। किस तरह मृत्यु के दुखद समय पर भी लोगों की धूर्तता सक्रिय रहती है कि गौ-दान में भी अपनी आमदनी बना लेने का उपक्रम ढूँढते हैं। सहायता में भी स्वार्थ छुपा हुआ होता है।

‘जेल से जेल तक’ भी एक बेहतरीन व मार्मिक कहानी है। बहुत ही सुन्दर और शानदार शैली में इस कहानी को बुना गया है। जुम्मन भाई उर्फ कन्हैया सिंह कैसे एक छोटी सी गलती के कारण पुलिस का शिकार होते हैं और उसके अहंकार व अत्याचार के कारण जेल पहुँच जाते हैं। और उससे पहले पुलिस की लाठी की मार से पैर में गहरी चोट लगती है। जो आगे जाकर ख़राब हो जाती है। और जुम्मनभाई आगे कोई भारी काम करने लायक नहीं हो पाते। जुम्मनभाई के घर का आर्थिक ढाँचा पूरी तरह से चरमरा जाता है। तब परेशानियाँ और बढ़ जाती है। घर में बूढ़ी माँ, अपाहिज बच्चा और बीबी है, कमाने वाले वह स्वयं। कुछ न कर सकने की स्थिति उन्हें घर में भी जेल का अहसास कराती है।

इसमें दो बातें स्पष्ट होकर सामने आती है। पहली यह कि यदि हम काम के हैं तो ही पूछ है अन्यथा वह भी नहीं पूछता जिसके लिये रातदिन काम करो, थोड़ा सा पाने के लिये। दूसरे पुलिस की इन्हीं ज्यादतियों से ही अपराध व अपराधी का जन्म होता है।

अगली कहानी शीर्षक कहानी है। कहानी को पढ़ चुकने के बाद श्रीकांत की वह नायिका स्मरण हो आयी जो श्रीकांत से पूछती है कि ’अग्नि के फेरे और कसमें दोनों ने ही ली थी फिर क्यों उसके पालन की सारी जिम्मेदारी हमपर?’

हमपर यानि स्त्री पर श्रीकांत अवाक रह जाता है। क्योंकि यह प्रश्न नारी की अस्मिता व अस्तित्व का था, जिसका उत्तर उनके पास नहीं था। शताब्दी गुजर गयी। पर सवाल वही का वही है। आज भी यह सवाल अपना उत्तर ढूँढ़ता है। रघुवीर अपनी पत्नी उर्मिला की प्रश्नाकुल तबीयत के खिलाफ है। साथ ही उनकी माँ भी, जोकि स्वयं एक स्त्री हैं। उर्मिला से छुटकारा पाने के लिये तीर्थयात्रा की योजना बनाते हैं। और वहाँ जाकर बड़ी मक्कारी से उर्मिला को वहाँ छोड़ कर वापस आ जाता है।

तीर्थों की स्थापना किस-हेतु की गयी थी? लोगों ने उसका क्या इस्तेमाल/उपयोग करना शुरू कर दिया। और  ससुराल में रहना है तो सास का लुग्गा नहीं देखना चाहिये कि वह ऊपर है कि नीचे?? जो बहुये इस कहावत के साथ नहीं रहती उनकी सास उन्हें बड़ी सताती है, सताने का एक कारण और भी दृष्टिगत होता है वह यह कि उर्मिला विवाह के कई साल के पश्चात भी निःसंतान है। ग्रामीण क्षेत्र में यह और एक संकीर्ण मानसिकता का उदाहरण है। 

स्त्री का शोषण कर, प्रताड़ित कर निर्ममता से इस संसार से विलग कर दिया जाता है और तत्पश्चात उसी के नामपर देवी-स्थान, चबूतरे, मन्दिर आदि बनाकर अपने स्वार्थ की सिद्धि की जाती है।

उड़ान की थकान’ संग्रह की एक और महत्वपूर्ण कहानी है, एक और महत्वपूर्ण विषय पर आधारित। अभावों की जिन्दगी एक किशोर को गम्भीर बना देती है। अपने हमउम्रों को वह जब इच्छित करते देखता है तो क्षोभ के साथ उसके मन में क्रोध उपजता है। तब उसे अपने शराबी-निठल्ले पिता, विवाहोपरान्त भी घर में डेरा जमाये बैठी बहनों, पर भी वह क्षुब्ध होता है। एक छोटी सी कोठरी में इतने सदस्यों की उपस्थिति से क्रोध का उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। अभावों की ज़िदगी स्वभाव व व्यवहार में कडवाहट व तीखापन लाती है, कुण्ठा भी कभी-कभी घर जमा लेती है।

और एक सेकेण्ड हैण्ड टीवी भी ऐसे में प्रसन्नता व संतुष्टि का केन्द्र बन जाता है। यह देश के तमाम उन किशोरों की व्यथा है व परिस्थितियों से गुजर कर युवा होते हैं। और अभावों की गर्द को सपने से धो-धो कर मन बहलाते हैं कि अभाव बहकर दूर जा रहे हैं। पर अभाव की मोटी परत कहीं सपनों से दूर हुई है।

जेब को सोखती दोपहर’ कहानी फेरीवालों वह निम्न मध्यम आय वर्ग के घरों की स्त्रियों व उनकी मानसिकता जरूरतों को आधार बनाकर भुनी हुई एक श्रेष्ठ कहानी जो अर्थशास्त्र के तुष्टि गुण के सिद्धांत को भी सिद्ध करती है इसके बाद एक और महत्वपूर्ण कहानी है उत्तर का आकाश तिब्बत पर चीनीओं का जबरन अधिकार व अत्याचार पूरे विश्व ने देखा पर वहां के किसी भी नागरिक के आम दर्द को किसने देखा यह उसी आम आदमी के दर्द को पूरी तरह से हमारे सामने प्रस्तुत करती है। निर्वासित का दुख कैसा होता है यह कहानी सिद्ध करती है सुख उसके बाद की कहानी है जो अपने अपने भ्रम व अपने अपने सुख होते हैं लगन हो तो इक्षित अवश्य मिलता है। इसके लिये वह कहावत याद आती है कि, ’जेकर जेपर सत्य सनेहू। ते तेहि मिलिहै न कछु संदेहु।।“

अंत में ‘सूनी गोद’ कहानी में भी एक स्त्री की उस मानसिकता व वेदना को बड़ी खूबसूरती और मार्मिकता से कथारूप दिया है जो मातृत्व से जुड़े हुए हैं। स्त्री के स्वर यदि विद्रोही हो तो उसे ससुराल पक्ष स्वीकार नहीं करता। चाहे वह उर्मिला (चबूतरे का सच) या फिर सावित्री (सूनी गोद) हो। दोनों को ही शाब्दिक, मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। 

यह एक संग्रह की कहानियाँ पर एक पाठकीय टिप्पणी है। पर कहानियाँ सचमुच विशेष है। भाषाशैली सरल व बोधगम्य है। कहीं-कहीं मराठी टच भी दिखता है।

दोनो संग्रह के लिये दोनो दीदी का हार्दिक आभार।

दोनो संग्रह बोधि प्रकाशन से प्रकाशित है। और पेपरबैक संस्करण में है।

सबसे पहले  ध्यान इसके उचित मूल्य पर भी जाता है। एक सौ बीस और एक सौ पचास रूपये कोई अधिक तो नही लगते।

‘‘किसी की शक्ल फिरती है नजर में 

कोई भूला हुआ याद आ रहा है ।“-कैफी आजमी

पुस्तक: चबूतरे का सच, लेखक: आशा पाण्डेय, पृष्ठ-108, मूल्य-रु 150/- प्रकाशन-बोधि प्रकाशन

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समीक्षा


रीना कुमारी चौधरीधरी,  (शोध छात्रा) हिंदी विभाग, 

पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय, मो. 8240529732

आत्मबोध एवं जिजीविषा की राह दिखाती कहानियाँ

आशा पाण्डेय समकालीन महिला कहानीकारों में अपनी एक विशेष स्थान रखती हैं। जनवरी, 2019 में प्रकाशित इनकी ‘खारा पानी‘ कहानी - संग्रह में रचित कहानियाँ बहुत ही व्यापक और वैविध्यपूर्ण रही हैं जिसमें एक तरफ गाँव के लोगों की जीवन स्थितियों का चित्रण है तो दूसरी तरफ शहरी जीवन का यथार्थ। बहुत ही सामान्य सी घटनाओं में पिरोयी हुई इनकी कहानियाँ गंभीर एवं गहन समस्याओं के साथ मानव मन के सहज, स्वाभाविक और कोमल भावों की अभिव्यक्ति भी करती हैं।

एक सजग महिला कहानीकार के रूप में उन्होंने वर्तमान समाज की सम्पूर्ण समस्याओं को ‘खारा पानी‘ कहानी- संग्रह में समेटने की कोशिश की हैं जिसमें महिला सुरक्षा का स्वर काफी प्रमुखता से मुखरित हुआ है। स्त्रियों के लिए निर्दयी होते पुरुष प्रधान समाज का नंगा चेहरा इसकी पहली कहानी ‘यही एक राह‘ में दिखलाई देती है। किस्मत की मारी वैदेही जहां अपने पति तथा दो - दो जवान बेटांे की मौत को झेलते हुए विधवा बहु तथा दो बच्चों के साथ जीवन को जीने के संघर्ष में जुटी थी तो वहीं इनकी बेबसी का फायदा उठाते हुए गाँव के प्रधान का भाई दो - चार लठैतों के साथ उसके खेत को भी हड़प लेने का षड़यंत्र रच डालता है। ऐसी परिस्थिति में वैदेही को एक ही रास्ता सुझा धर्म का भय। गाँव में भक्त के ऊपर देवी की प्रसन्न होकर उसके शरीर में आने की घटना कोई नयी नहीं थी। अतः वैदेही भी इसका अभिनय करती और संयोगवश बातें सही भी हो जाती  है। पर अंतर में अपराधबोध हमेशा उसे कचोटता एवं धिक्कारता है, “अथाह वेदना होती है दिल में। जिसे दबाने की कोशिश में वह दरक - दरक कर टूटती है, टूट- टूट कर जुड़ती है।” (पृष्ठ सं. - 8) इस कहानी में वैदेही के संघर्ष, उसकी जीवनाकांक्षाओं और जमीन को बचाने के जद्दोजहद को केंद्र में रखा गया है। इस कहानी की केन्द्रीय पात्र वैदेही चेतना से परिपूर्ण एक सजग एवं संघर्षरत्त स्त्री पात्र है जो सामाजिक रुढियों को नकारते हुए बहू के अस्तित्व को सुरक्षित करने के लिए अंधी व्यवस्था से टकराती है, “मैंने अपना बेटा खोया है तो इसने भी अपना पति खोया है। उजड़ गया है इसका जीवन। भला कोई अपने ही हाथों अपना जीवन उजाड़ना चाहेगा क्या ? मेरा बेटा दुर्घटना में गया, इसमें इसका क्या दोष ?‘‘ ( पृष्ठ सं. - 8) ग्रामीण समाज में ‘दिशा मैदान‘ के लिए बाहर खेत में जाने वाली महिलाओं के साथ आये दिन होने वाली वीभत्स घटनाओं की ओर भी संकेत किया गया है, “मेड के एक ओर रुक गयी वह, यह सोचकर कि यह लोग आगे बढ़ जायें तब वह चले। पर जैसे ही वे लोग उसके करीब आये तो उनमें से एक ने उसे अपने हाथ के घेरे में भर लिया। वह छटपटाई , चिल्लाई। .....मदन काका को देखते ही दोनों उसे छोड़कर भाग गये।‘‘ ( पृष्ठ सं. - 15)

तो वहीं ‘सुरक्षा‘ कहानी में प्लेटफोर्म पर दिखने वाली सामान्य - सी स्थिति के माध्यम से स्त्री सुरक्षा जैसी गंभीर सामाजिक मुद्दे को काफी सहजता से लेखिका ने उठाया है। अपने रोजमर्रा के कार्यो में व्यस्त हमारी दृष्टि प्लेटफोर्म की एक ऐसी ही बावली से जरुर परिचित होती है और उसके अर्धनग्न बदन को दबोचने के लिए लालायित पुरुषरूपी दानवों से भी, जिसका मूर्त बिम्ब इस कहानी में खिंचा गया है। अतिआधुनिकता का दंभ भरते इस समाज में लोग बावली हो चुकी स्त्री से भी अपनी दमित काम वासना की पूर्ति करने से पीछे नहीं हटते, तो किशोरी और युवा स्त्रियों की बात ही क्या है? एक अधेड़ - सा पुरुष विभिन्न प्रकार की चेष्टाओं द्वारा महिला से अपनी इच्छापूर्ति करना चाहता है तो वहीं मूंगफली, चना मुरमुरे वाले के माध्यम से उस समाज पर व्यंग किया गया है जो इस तरह की घृणित मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। प्लेटफोर्म जैसी सदैव चलायमान जगह में भी स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं है। जब पगली अपने तन की रक्षा के लिए प्रतिकार करती है तो इच्छापूर्ति न होने पर पुरुष वर्ग देश हित एवं समाज - चिंता की चादर ओढ़ अपने पौरुष का दंभ भरते नजर आते हैं, “कैसे चुपचाप बैठी है, मैं तो कहता हूँ कि यह पागल है ही नहीं बल्कि किसी माफिया या आतंकवादी गिरोह की सदस्य है।” ( पृष्ठ सं. - 36 ) आज जहां महिला सुरक्षा सम्पूर्ण समाज के लिए एक चुनौती है तो वहीं पुरुष वर्ग की अपनी सुरक्षा के नाटकीयता पर भी लेखिका के द्वारा व्यंग किया गया है, “जो भी हो हमारे लिए यह हर तरह से खतरनाक है। हमें मिल कर कुछ करना होगा..... इसे यहाँ से हटाना ही होगा ।” ( पृष्ठ सं. - 36)

‘वसीयत‘ कहानी में स्त्रियों पर होने वाले घरेलु हिंसा को एक नवीन दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। ‘मैं‘ शैली में रचित इनकी कहानी सम्पूर्ण स्त्री - समाज का प्रतिनिधित्व करती है। माता - पिता की मृत्यु के पश्चात केवल पुत्र ही नहीं बल्कि पुत्री भी संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार होती है। परन्तु सारी संपत्ति हड़प जाने के चक्कर में ‘मैं को कभी उसके भैया - भाभी स्वतंत्र जीवन जीने ही नहीं दिए। भावनाओं की अंधी जकड़ में वो अपने पर होने वाली अत्याचार को भी नहीं समझ पाती थी। अविवाहित ‘मैं केवल भाई-भाभी की नौकरानी बनकर रह जाती है, “ मैं सुबह उठकर घर में झाडू-पोछा करती, बरतन मांजती, दूकान से दूध और ब्रेड ले आती, सब्जी-भाजी काट लेती, आटा गूंथ कर रख लेती। तब तक मेरी भाभी भी उठ जाती। मेरी भाभी को घर में भीड़ - भाड़ अच्छी नहीं लगती थी, इसलिए उनके उठने के बाद मैं हाल से लगकर ऊपर जाने वाली सीढियों पर बैठ जाती थी। ..... नाश्ता और खाना भाभी ही बनाती थीं। मुझे देखकर उन्हें घिन आ जाती थी .....” ( पृष्ठ सं. - 127 ) ‘मैं उनके लिए केवल ‘भीड़ - भाड़‘ थी परिवार का सदस्य नहीं। शिंदे भाभी जैसी जागरुक पात्र के माध्यम से मैं के अन्दर आत्मसार्थकता का बोध कराया गया है, जो अपने ही घर में एक उपेक्षिता का जीवन व्यतीत करती है, “तुम्हारे अन्दर कोई कमी नहीं है .....अपने को कम मत समझा करो।‘‘ (पृष्ठ सं. 131) ‘मैं‘ के द्वारा ‘मेरा भी हक‘ शब्द पर बार - बार जोर देकर सम्पूर्ण स्त्री जाति को सचेत करने की कोशिश की गई है, “मेरा भी हक ! और मैं दिन - दिन भर सीढियों पर बैठी रहती हूँ ! मेरा भी हक, और मैं भाभी के उतारे कपड़े पहनती हूँ! मेरा भी हक, और मैं कुर्सी या बिस्तर पर बैठ नहीं सकती हूँ! मेरा भी हक और मैं पकौड़े, समोसे या कुछ नया बनने पर रसोई में उसे बनता देखकर संतोष करती हूँ! मेरा भी हक ! मेरा भी हक !” ( पृष्ठ सं. 133 ) वर्तमान समय में अविवाहित बहनें भाई पर बोझ बन जाती है जहां भावुकता एवं अपनेपन का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता। इसमें सिर्फ ‘मैं‘ को एक फ्लैट ही मिल जाती ताकि वो भी स्वावलंबी हो सकती परन्तु भाई की जकड़ी और सारी संपत्ति को एकलौता हड़पने की मानसिकता ने न केवल उस पर हाथ उठवाया बल्कि उसे घर से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया। वसीयत की परंपरा केवल पुत्रों को ही मिलती थी परन्तु अब उस पर पुत्री का भी उतना ही हक है। अपनी जिंदगी से सबक लेते हुए अविवाहिता ‘मैं अपने फ्लैट को अपनी भतीजी मीता के नाम करती है जो ‘मैं की जागरूक दृष्टिकोण का परिचायक है , “तलाक लेकर मायके में रहती है। .....आखिर उसे भी तो एक भाई है।” ( पृष्ठ सं. 136)

‘दंश‘ कहानी भारतीय दाम्पत्य जीवन की बिडम्बना का चित्रण करती है। एक सफल दाम्पत्य जीवन के लिए पति और पत्नी के मध्य प्रेम, श्रद्धा, मान-सम्मान और सामंजस्य का होना बहुत जरुरी है। यदि रिश्ते में अविश्वास और शंका का जहर घुल जाए तो आत्मभत्र्सना और पश्चाताप के अलावा कुछ नहीं बचता जैसा इस कहानी के पात्र सनेही के साथ होता है। नगरीकरण तथा मंडीकरण के कारण मध्यवर्गीय जीवन की तरफ आकर्षित गाँव की पार्वती और सनेही अपने बच्चों के लिए सुखद भविष्य का स्वपन देखते हैं, “गाँव के नरक से शहर के स्वर्ग में आ गए हम लोग ..... अब अपने जगन, मगन और मुन्नी की तकदीर समझो खुल गई.... सुध ले ली भगवान ने.....चार अक्षर पढ़ लेंगे तो इंसान बन जायेंगे..... मेरे जैसे काला अक्षर भैंस बराबर वाली हालत तो नहीं रहेगी।” (पृष्ठ सं. - 57 ) पार्वती बंगले में साहब के लिए काम करती पर अब अपने को संवार कर रखती थी जो उसके पति को सशंकित करता और धीरे - धीरे ये शहरी चौकाचौंध उनके प्रेममय जीवन को धुंध से ढक देता है। पहले गाँव में पार्वती के कार्यों में सनेही पूर्ण सहयोग करता था तो वहीं अब शक के दंश ने दोनों के मध्य गहरी खाई बना दी है जहां, “मन ही मन दोनों अविराम युद्ध लड़ रहे हैं। खोजी हो गए है दोनों। सनेही पार्वती के हाव - भाव में, बनाव श्रृंगार में, बात - चीत में, कुछ न कुछ खोजता है तो पार्वती सनेही में सनेही को खोजती है।” ( पृष्ठ सं. - 59) पार्वती हर क्षण पति की कड़वी तानों को सहते हुए सम्बन्ध को सहेजने की कोशिश करती है, “सनेही बउरा गया है तो क्या पार्वती भी बउरा जाए? बच्चों की उन्नति, तरक्की का स्वप्न जो पार्वती की आँखों में गहरे तक उतर गया है उसके चलते वह सनेही की बातों की ओर से काँन मूंद लेती है। पर काँन मूंद लेने से क्या होता है। आँखें तो खुली हैं। सनेही के हाव - भाव, उसकी उपेक्षा, आँखों के रास्ते दिल में उतरती है और नश्तर की तरह चुभ जाती है।” (पृष्ठ सं.- 59) अंत में सनेही को अपनी गलती पर पश्चाताप तो होता है पर तब तक शक का दंश पार्वती को पूरी तरह निचुड़ कर रख देता है और उनके सारे सपने धराशायी हो जाते है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के बाद बनी आर्थिक व्यवस्था ने ग्रामीण जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारतीय गाँवों पर बाजार का इतना गहरा असर पड़ा कि खेती-किसानी चैपट होने के कारण खेतिहर मजदूर तो दुसरे कामों के लिए पलायन कर गए, लेकिन किसान आज भी अपनी मरजाद बचाने के लिए जमीन को पकड़ कर रहता है। जिसकी झलक हमें ‘खुद्दार‘ कहानी में देखने को मिलती है। ग्रामीण परिवेश प्रारंभ से ही शहरों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। अक्सर हम अपनी छुट्टियाँ शहरों के शोरगुल से इतर ऐसे ही शांत वातावरण में व्यतीत करना पसंद करते हैं। अच्छी जिंदगी की तलाश तथा गाँव में रोजगार का साधन न मिल पाने के कारण किसान अपनी भूमि अच्छे पैसे के लोभ में बेच देते हैं और यही किसान जिनके पास आज अपनी जमीन है वो कल उसी जमीन पर बनने वाले बिल्डिंग में मजदूरी का काम करते नजर आते हैं।

अर्थात् शहरीकरण के कारण गाँव का परिदृश्य जिस गति से बदल रहा है उसका बहुत कलात्मकता के साथ जिक्र किया गया है। पति के शब्दों में, “क्यूँ नहीं बेचेंगे ? ..... दुगुना पैसा दे दूंगा, दौड़कर बेचेंगे द्य कोई खरीदने वाला तो मिले, गाँव में कौन खरीदता है जमीन ? ..... फिर इन्हें तो पैसा मिलेगा न।” ( पृष्ठ सं. - 125 ) किसानों के गाँव से शहरों की तरफ पलायन की समस्या को उजागर किया गया है जिससे वो विस्थापन का शिकार भी हो जाते है। पाठकों में आशा की ज्योत जगाने वाली लेखिका इतनी गंभीर समस्याओं के मध्य ‘बाबा‘ जैसे सशक्त किसान पात्र का गठन कर परिस्थिति से हार मान अपनी जमीन का सौदा कर विस्थापन की जिंदगी जीने वालो के लिए मिशाल कायम करती है, जो आर्थिक तंगी के बावजूद भी ‘मैं‘ के बच्चों द्वारा बिना पूछे लिए आमों का दाम नहीं लेते और शहरी मानसिकता से ग्रसित इन्हें खुद्दारी का सबक भी सिखा देते हैं , “अगर हम इन आमों को बेच रहे होते और तब आपने ख़रीदा होता तो हम जरुर पैसे लेते। आपने तो अपनी इच्छा से जबरदस्ती मेरे आमों को उठाया है, इसके पैसे हम नहीं लेंगे।” (पृष्ठ सं.-136) शहर के लोग जहां अपनी दानशीलता का दंभ भर मन ही मन प्रफुल्लित हो रहे थे तो वहीं किसान के द्वारा अपनी दानशीलता और उनके द्वारा अपनी इच्छापूर्ति को लुटने की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है। कृषक जिंदगी का दूसरा पहलू हम ‘जागते रहो कहानी में देख सकते हैं जहाँ अपने अनाजों का उचित दाम न मिलने से किसानों का किसानी से मोहभंग और कर्ज से लदे हुए किसानों की आत्महत्या की समस्या को केंद्र में रखा गया है। किसान और सरकार के मध्य उपस्थित पटवारी जैसे घूसखोरों की वजह से किसानों की स्थिति सुधर नहीं पा रही है और सरकारी सुविधाओं का लाभ जरुरत मंद किसान को तो जीते - जी नहीं मिल पाती है और मर जाने पर मुआवजे की रकम की पेशकश की जाती है। प्रथमेश के माध्यम से आत्महत्या के कारण को उजागर किया गया है, “असली समस्या पैसे की है, गरीबी की है- खाद, पानी, बीज की है, पैदावार की है, उपज के सही मूल्य मिलने की है। जब इसमें कोई सुधार होगा तब रुकेंगी आत्महत्याएं।” (पृष्ठ सं. - 52) युवा लड़कों द्वारा टोली बनाकर दिशाहीन होते कृषक वर्ग को निराशा से उबरकर सरकारी तंत्र से लड़ने की प्रेरणा दी गयी है एवं रोजगार की नयी व्यवस्था का भी संकेत किया गया है। किसानों के आत्महत्या का समाचार आए दिन टी. वी. अखबार, सोशल मीडिया में देखते - देखते तो अब हमारी संवेदनाए भी कुंठित हो गयी हैं पर लेखिका ने हताश हो चुके किसानों को जिजीविषा का मार्ग दिखलाया है।

आज हमारी समाज की अवस्था को देखते हुए कोई भी संवेदनशील व्यक्ति रुग्ण हो सकता है ‘मर्ज‘ कहानी का नरेटर भी ‘छींक‘ से पीड़ित है जिसका कोई इलाज नहीं। छींक वास्तव में अशुभ का संकेत है। इस कहानी में ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ वर्तमान की परिस्थितियों का सिलसिलेवार वर्णन किया गया है। आज हमारा देश भले ही स्वतंत्र हो गया है परन्तु हमारी परिस्थितियाँ अभी भी ज्यूँ की त्यूं बनी हुई हैं केवल शोषण का रूप बदल गया है, “ कब तक चिपकती रहेगी खंडहर में मिट्टी। पहले ये कोट में बैठकर अत्याचार करते थे अब दिल्ली में बैठकर कर रहे हैं। कहाँ मिली हमें स्वतंत्रता ? बस रूप बदल गया है इनके शासन का। इनकी क्रूरता से खंडहर बढ़ेंगे गाँव में।” ( पृष्ठ सं. - 76 ) इस कहानी में देश को पूरी तरह से जर्जर कर देने वाली राजसत्ता के आतंरिक दाव-पेंच एवं राजनैतिक गलियारों में होने वाले भाई - भतीजावाद के चलन को भी उकेड़ा गया है जिसने हमारे देश को भीतर ही भीतर खोखला कर दिया है। नरेटर की बाल्यावस्था से प्रौढ़ावस्था तक के विवरण द्वारा देश की सत्ता से जुड़ी छोटे से छोटे पहलुओं को सामने लाया गया है। आजादी के पश्चात भी हम साधारण जनता सत्तालोलुप राजनेताओं (रायबहादुर और उनके शहजादे) द्वारा सिर्फ पददलित ही होते रहे हैं। ऐसे शासकों के शासनकाल में स्त्री की सुरक्षा भी खतरे में रहती है जिसे मातादीन और उसकी पत्नी के द्वारा देखा जा सकता है जहाँ मातादीन को एक बोरी अनाज की कीमत अपनी पत्नी के सतीत्व से चुकानी पड़ी। चुनाव की प्रक्रिया में होने वाली धांधली का भी मूर्त बिम्ब खींचा गया है, “शहजादा साहब की गाड़ियाँ लोगों को बूथ तक पहुँचाती रही। लठैतों का ऐसा जमावड़ा कि विरोधी वोट ही न डाल पाये। एकाध जो पहुँच भी गए बूथ तक तो वो भी बदरंग ही लौटे। उनका वोट पहले ही डाला जा चुका था।” ( पृष्ठ सं. - 76 ) चुनाव के पहले बिजली के लुभावने सपने दिखाने वाले पानी के लिए भी मोहताज कर देते हैं। देश में योग्य युवा को सत्ता न मिलकर पैसों के बल पर चुनकर आये शहजादों को मिलती है जो इस देश की समस्याओं से भलीभांति परिचित ही नहीं जिन्होंने कभी ऐसी गरीबी देखी ही नहीं। अतः देश मौलिक सुख-सुविधाओं से भी वंचित रह जाता है। नरेटर द्वारा देश की इस अवस्था को बदलने के लिए आग्रह किया गया है, “ बस प्रजा ही बने रहना हमारा भाग्य बन गया है। बदलो इसे।” ( पृष्ठ सं. - 77)

‘चीख‘ कहानी में जाति एवं लिंग भेद की समस्या को मुखरित किया गया है। ससुराल में आए दिन बहुओं के साथ होने वाली घरेलु हिंसा का हंसा के द्वारा मूर्त बिम्ब खिंचा गया है। बेटी होने की जानकारी मिलने पर ससुराल वाले बच्चा विकलांग होने का बहाना बना कर गर्भपात करा देते हैं। पर दूसरी बार हंसा इसका पुरजोर विरोध करती है और पति द्वारा जलाई जाती है, “ पति ने चूल्हे पर उबल रहे दूध को हंसा के सिर पर उलट दिया। वह बुरी तरह जल गई। ..... ठंडा पानी पड़ते ही पीठ, हाथ, कमर में पड़े बड़े-बड़े फफोले शरीर छोड़कर लटक गये।” ( पृष्ठ सं. दृ 94 ) हंसा चैधरी परिवार की बेटी है इसीलिए इस घर की मान-मर्यादा का ध्यान उसे ही रखना है। अतः हंसा का दूसरा ब्याह मास्टर से इसलिए नहीं किया जाता है क्यूंकि वह जात का नहीं है, “घुट-घुट कर मर जाए वह तुम्हारी इज्जत संभालने के लिए ? ..... तुम्हारे दोनों भाइयों ने जब गैर बिरादरी में ब्याह कर लिया तब नहीं गयी थी इज्जत ? .....( पृष्ठ सं. - 98 ) और अंत में झूठी मान मर्यादा के लिए हंसा की हत्या उसी के भाई द्वारा की जाती है।

‘कुल का दिया‘ में जांत-पाँत से ऊँचा प्रेम और इंसानियत को दिखलाया गया है तथा ‘बुआ‘ के माध्यम से आधुनिक समाज में वृद्ध वर्ग के अकेलेपन की समस्या को उजागर किया गया है। बुआ परिवार होने के बावजूद अकेले हर तरह की मानसिक प्रताड़ना एवं कष्टों को झेलते हुए हँसी से जीवन व्यतीत करती है और मर जाने पर भी पति और बच्चों के पास श्राद्ध तक रुक पाने का समय नहीं है। आधुनिक युग में पैसे की महत्ता इतनी ज्यादा है कि माँ की मृत्यु के पश्चात उसकी यादें भी उसी से तौली जाती है, पर माँ के लिए बच्चों की प्रिय वस्तु ही अमूल्य निधि होती है। माँ का हृदय लेखिका ने पाठकों के समक्ष खोल कर रख दिया है। बुआ को अकेला गाँव में छोड़ सारे लोग शहर में जीवन व्यतीत कर रहे थे, तब सुमेरु मामा (अछूत) ही उन्हें अपने घर में शरण देते और भोजन भी। सुमेरु मामा, बुआ का न जात का है नाही परिवार फिर भी बुआ की शव के पास वो बैठे थे और परिवार वाले तो पूरी तरह से संवेदनहीन हो मेहमानों की तरह श्राद्ध में आने की बात कह चल दिए पर बुआ के लिए दीपक तक जलाने वाला कोई नहीं था। वेद-पुराण में वर्णित विधि - विधान पर कटाक्ष करते हुए मानवता को सबसे ऊपर स्थापित किया गया है, “ अम्मा प्रेम और ममता से भरी थी, तुम भी प्रेम और इंसानियत से भरे हो। तुम अम्मा के कुल के ही हो मामा। अम्मा को तुम्हारा ही जलाया दिया मंजूर होगा।” (पृष्ठ सं. - 121)

इस संग्रह की कुछ कहानियाँ बेहद प्रामाणिक घटनाओं के साथ वर्तमान समय की उस यथार्थ को सामने लाती है जहां पाठक भी कथा के पात्र के साथ यात्रा करते हुए स्वयं को ठगा हुआ तथा भावनात्मक विचारों के उहापोह में अंत तक उलझा हुआ महसूस करता है। ‘उलझते धागे‘ और ‘जंगल‘ ऐसी ही कहानियाँ है। ‘जंगल‘ कहानी में शहरीकरण के दौड़ में मनुष्यों के मध्य ख़त्म होती मानवता की ओर संकेत किया गया है। जंगल में रहने के बावजूद वहाँ के तथाकथित जंगली लोगों ने लड़के की भाषा से अपरिचित जिस तरह का मानवीय व्यवहार किया वह स्वयं लड़के को भी आश्चर्यचकित कर देता है, “ नशे में धुत इन लोगों में इतनी संवेदना, इतना प्रेम है कि उसके रोते ही सबका नशा उड़ गया ! अब तक की जिंदगी में रोया तो वह कई बार था , किन्तु उसके आँसू अपने आप ही सूखते थे।” ( पृष्ठ सं. -28 ) वह जंगल से वापस अपने लोगों के बीच लौटने के लिए उत्सुक था कि होटल का मालिक तथा अन्य साथी इंतजार कर रहे होंगे परन्तु उनकी सारी आशाएं धराशाही हो गयी। लेखिका ने शहरों में खत्म होती मानवीय संवेदनाओं को मालिक के झन्नाते हुए तमाचों के द्वारा स्पष्ट किया है। भूमंडलीकरण के दौड़ में भागते हुए शहरी लोगों के लिए न तो लड़के के जीवन का कोई मोल था और नाहीं बदन पर लगे हुए चोटों के निशान की पीड़ा। वहीं जंगली लोगों के लिए लड़के के आँसू ही काफी असहनीय थे। ‘जंगल‘ कहानी के माध्यम से लेखिका ने बहुत ही सुन्दर ढंग से शहरी होती जिंदगी की हिंसक जंगली प्रवृत्ति पर चोट किया है तथा सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना कर समाज के प्रति अपनी गहन चिंता भी व्यक्त की हैं, “उसे लगा ये इमारत जंगल के महाकाय वृक्षों में तब्दील हो रही हैं तथा आस - पास के लोग जंगली चैपायों में बदल गये हैं। उसने आँखें मल कर बार - बार देखने का प्रयास किया, किन्तु हर बार दृश्य अधिक भयानक दिखता। ..... स्वयं की सुरक्षा के लिए भगवान से प्रार्थना करने लगा।” (पृष्ठ सं. 30 ) ‘उलझते धागे‘ कहानी के माध्यम से लेखिका भिक्षावृत्ति जैसे मुद्दे पर ध्यान आकर्षित करती हैं जो अब बहुत तादात में एक पेशे का रूप धारण कर चुका है।

अधनंगे नन्हें हाथों से जब छोटे बच्चे भिक्षा की याचना करते हैं तो इनके भविष्य की चिंता मन को कचोटती है कि ये पेशे के अभ्यस्त हैं या वास्तव में इन्हें इस भीख की जरुरत है। बच्चों को आधार बनाकर विभिन्न तरह की ठगी की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। हमारे देश का भविष्य इन्हीं छोटे बच्चों के नन्हे हाथों पर निर्भर करता है जिसमें पुस्तक की जगह भिक्षावृत्ति के लिए याचनाएं है। बाल मजदूरी और भिक्षावृत्ति कानूनन अपराध है फिर भी हमें ऐसे दृश्य प्लेटफोर्म पर देखने को मिलते है जहां तमाम सरकारी व्यवस्थाएं कोरी घोषनाएं ही साबित होती है। यह शिक्षा के अभाव में भिक्षावृत्ति के द्वारा जिंदगी जीने के अभ्यस्त कभी मेहनत और खुद्दारी को समझ ही नहीं सकते और भीख की पेशकश कर कहीं न कहीं हम इनके इसी मनोवृत्ति को और बढ़ावा तो नहीं दे रहें। इसी कशमकश में उलझा हुआ नरेटर का मन भविष्य की चिंता करता है, “वैसे एक प्रश्न अब भी मेरे साथ बना है कि पैसा देकर मैंने उस बच्चे की भूख मिटाई या उसे उस बूढ़े जैसा जीवन दिया ।” (पृष्ठ सं. - 109) इस मुद्दे की तरफ सरकार के ठोस कदम की अपेक्षा की जाती है।

इस संग्रह की प्रतिनिधि कहानी ‘खारा पानी में लेखिका जल संकट जैसे पर्यावरणीय समस्या की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं। ग्रामीण पात्र ‘लड़का‘ के माध्यम से जहां गाँवों में जल अभाव से त्रस्त लोगों की स्थिति को दरसाया गया है तो वहीं शहरों में पानी की फिजूलखर्ची का यथार्थ चित्रण किया गया है, “पीने के लिए मीठा पानी तो दो कोस दूर से लाना पड़ता है। बिल्कुल संभल - संभल कर चलना पड़ता है। बूंद भर पानी भी अगर घड़े से छलक कर गिर जाता है तो कई - कई दिन अफसोस होता है।” ( पृष्ठ सं. - 81 ) गाँव में जहां बूंद - बूंद पानी को संजोया जाता है तो वहीं शहरों में बच्चों के खेल में पानी का प्रयोग हो रहा, “पानी भी खिलौना बन सकता है, लड़का यही देख रहा है।” ( पृष्ठ सं. - 83) खारा पानी बुरे दिन का प्रतीक है अतः वर्तमान समय में सम्पूर्ण संसार को जल संरक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए।

इनकी कहानियों के शीर्षक साभिप्राय है, कहानी पढ़ते ही ये अपने मूल भाव के साथ अपनी सार्थकता को स्वयं ही स्पष्ट कर देती है। देश की राजनीतिक दाव - पेंच, स्त्री सुरक्षा, विधवा विवाह, किसान जीवन की समस्या और कर्ज, जातिगत भेदभाव, पारिवारिक समस्या, पर्यावरण आदि सभी विषय इस कहानी - संग्रह में दृष्टिगोचर होते हैं। इनकी कहानियां बहुत ही सरल एवं संजीदगी से सारी समस्याओं को न सिर्फ प्रकाश में लाती है बल्कि उसका विरोध भी करती हैं, कहीं तीव्र रूप में (यथा: सुरक्षा, वसीयत) तो कहीं टोली बनाकर आशा के दीप प्रज्वलित करते हुए (यथा: जागते रहो )। इनकी कहानी की एक ख़ास विशेषता इनकी प्रतीकात्मक परिणति में है जो कहानी को मार्मिकता के साथ गंभीर एवं विचारणीय बनाती है। इनकी कहानियों में वर्णित पात्र सामाजिक रूढ़ियों को नकारते हुए व्यवस्था से टकराने का साहस भी रखते हैं (यथा: वैदेही, रंजना दी, श्रीहरी)। ‘मैं‘ शैली में रची गयी इनकी 

अधिकांश कहानियाँ केवल व्यक्तिगत स्थिति को बयां नहीं करती बल्कि समाज की असंगत व्यवस्थाओं में छटपटाती मानव जाति की समस्याओं को उजागर करती हैं।

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समीक्षा


समी. डॉ निरुपमा राय,  मो. 80027 47533

साहित्यकार एवं व्याख्याता, संस्कृत - विभाग, पूर्णिया विश्वविद्यालय पूर्णिया, बिहार 


खारा पानी: ‘‘जीवन की सूक्ष्म विडंबनाओं और वेदना मंडित समस्याओं का खारा पानी स्वयं में समेटे सुंदर शब्दों का लहराता उमड़ता सागर ’’

डॉ. आशा पांडे का नया कथा संग्रह- “खारा पानी” पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बोधि प्रकाशन से प्रकाशित इस संकलन में जीवन को मुखरित करती 12 कहानियों का समावेश है। भाषा, कथ्य, तथ्य संकलन,समायोजन सब कुछ समन्वयात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं। कहानी तभी सार्थक मानी जाती है जब उसके पात्र अपने मन की व्यथा को पाठकों के सामने खोल कर रखने में सक्षम होते हैं। साथ ही अगर पात्र मौन हैं, फिर भी उनके अंतर्मन में क्या चल रहा है यह भी पाठक यदि जान जाएं, तो यह लेखक की सार्थकता होती है। आशा पांडे जी अपनी कहानियों, उसके पात्रों और कथानक के साथ हमें बांध कर चलती हैं। 12 कहानियां 12 प्रकार के तथ्यों और मनोभावों को प्रकट करतीं, पाठकों को अपने साथ उसी काल में उसी समय के साथ संबद्ध कर देती है। “यही एक राह “- कहानी वैदेही और उसकी बहू की आंतरिक पीड़ा का दस्तावेज है। वस्तुतः एक साहसी रुह वैदेही के भीतर समाहित थी, जहां सारी चेतना ही अपनी देह की रक्षा तक सीमित हो जाती। उस अवस्था में मानसिक शारीरिक वेदनाओं की सूली पर चढ़ी होने पर भी, दर्द से कराहते हुए, आंतरिक धिक्कार सहते हुए, अपराध बोध से भरते हुए भी बस एक ही रास्ता बच जाता है,जहां वो करना नियति बन जाती है जिसे करना हृदय नहीं चाहता। इस भीतरी छटपटाहट को बहुत सुंदर ढंग से शब्दों का बाना पहनाया गया है। चिलक गई, जवार, अगियार, थान, गोडी, अभूआने जैसे देशज शब्द कहानी में चार चांद लगाते हैं। “ जंगल”- कहानी एक सूक्ष्म दर्द को स्वयं में समेटे कंक्रीट के जंगलों का साक्षी बनने पर मजबूर हृदय की व्यथा कथा है। तो “सुरक्षा” एक स्त्री के साथ सदियों से चिपका शब्द मानो कहानी के अंत में कुछ शब्दों में सभी स्त्रियों की आंतरिक संतुष्टि और दृढ़ता को स्वर प्रदान कर देता है, “अपनी सुरक्षा के लिए परेशान पुरुष मंडली को देखकर महिला थोड़ा मुस्कुराती है फिर उठ कर आवेशहीन आंतरिक संतुष्टि तथा दृढ़ता के साथ आगे बढ़ जाती है।“ (पृष्ठ- 36)।

कहानी “जागते रहो” गांव में गहरे तक जड़ जमाए गरीबी, बेरोजगारी और किसानों की वेदना की गाथा है। आए दिन किसानों की आत्महत्या की खबरें समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती हैं जो हम सब को भीतर तक आहत कर देती हैं। अन्नदाता किसान स्वयं भुखमरी झेलने पर विवश हो यह भीषण विडंबना नहीं तो क्या है ? जिस कीटनाशक से फसलें उगाई जाती हैं, उस की पैदावार बढ़ाई जाती है उस कीटनाशक को पीकर आत्महत्या करने वाले किसान की मानसिक स्थिति का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। कुछ दिन सरकार, टीवी, मीडिया साथ देते हैं फिर सब कुछ शून्य की खूंटी पर टंग सा जाता है। और सरकारी गिद्धों की भी कमी कहां है ? नंदा की मृत्यु... उसके पिता की आत्महत्या... कर्ज का बोझ, फसल की मार.... उफ! सारे दर्द मानो आंखों में उमढ़ पड़ते हैं। फिर श्रीहरि द्वारा उठाया गया पहला साहसिक कदम और कहानी कह रहे नायक का यह कथन, “ अब मेरी समझ में भी आ गया कि सिर्फ परिस्थितियां ही नहीं है आत्महत्या का असली कारण हथियार डाल देना है।“( पृष्ठ- 54) बहुत अच्छी, सारगर्भित, समस्या-परक नहीं समाधान- परक कहानी । जागते रहो ही इस समस्या का हल है। बधाई! आशा जी।

कहानी “दंश” पति पत्नी के मध्य पनपते संदेह, आशा-निराशा, विश्वास-अविश्वास, क्षोभ, दंश और सूक्ष्म द्वेष के उलझते-सुलझते धागों की कहानी है तो “मर्ज” एक नए कथानक पर बुनी गई, कोट, शहजादे, नदी, मिट्टी, धूल, गांव, समाज और उसके साथ जुड़ी विडंबनाओं की पोल खोलती आज के युग की सार्थक कहानी है। कथा के साथ एक और कथा... मातादीन की कथा.... तूफानी की कथा सहज प्रवाहित धारा की तरह चलती है, और गरीबी भूख अशिक्षा उत्पीड़न शोषण जैसे शब्दों को जीवंत कर देती है। “दया करें हुजूर भूख ने यह गलती करवाई है“(पृष्ठ -71) मातादीन की घरवाली का यह कथन भीषण सामाजिक विडंबना का कथन है जो मन को छू जाता है। निःशब्द... मौन का धुआं... उसमें जीना, जीवित दिखना... गरीब की दशा का जीवंत चित्रण है। शीर्षक “मर्ज” सार्थक अभिव्यक्ति है।

शीर्षक कहानी “खारा पानी” बाल मनोविज्ञान को उकेरती उभारती कहानी है। पानी जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकता को भी सहज प्राप्त नहीं करने वाला बालक अपनी गरीबी के कारण जब शहर आता है, तो वहां की दुनियां उसकी दुनियां से बिल्कुल अलग होती है। कहानी की निम्नलिखित पांच पंक्तियां पूरी कथा का सार हैं, जो बाल मनोविज्ञान की कथा कहते हुए पानी की, आवश्यकता और पानी की बर्बादी की पोल भी खोलते हैं।

“पानी से भरा टब, बाल्टी, मटका! जितना चाहो नहाओ जितना चाहो गिराओ। एक उसका गांव है खारे पानी से भरा हुआ। पीने के लिए मीठा पानी तो दो कोस दूर से लाना पड़ता है। बिल्कुल संभल-संभल कर चलना पड़ता है। बूंद भर पानी भी अगर घड़े से छलक कर गिर जाता है तो कई कई दिन अफसोस होता है। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक बूंद बूंद पानी जुटाने की चिंता। याद है लड़के को पानी के लिए गांव के प्रधान ने उसके बाबू की कितनी हुज्जत की थी।“( पृष्ठ-81)।

“पानी भी खिलौना बन सकता है लड़का यहीं देख रहा है “(पृष्ठ -83)। साधुवाद!

कहानी “चीख” के सभी पात्र कहीं न कहीं पाठक के मन में भी एक प्रश्न खड़ा करते हैं और कई बार वह प्रश्न बिल्कुल चीख की तरह ही पूछने पर विवश करता है, कि हम कैसा कदम उठाएं कि हमारे समाज में ऐसी चीखें कभी न उभरे। लेखिका इस संदेश को देने में सफल रही है। कई बार ऐसा होता है कि कहानी का सकारात्मक अंत अच्छा लगता है पर चीख जैसी कहानियां अपने नकारात्मक अंत के साथ भी प्रभाव छोड़ने में सफल हैं। हंसा के जीवन की व्यथा मन में चुभन पैदा करती है और यह चीख भी हृदय से उठती है कि कब तक हंसा जैसी स्त्रियों को यह सब झेलने पर विवश होना पड़ेगा।

कहानी “उलझते धागे” एक संवेदनशील स्त्री के मन में चल रहे विचारों, चिंतन और कुछ प्रश्नों का ताना-बाना है। गरीबी से जूझते लड़ते एक बच्चे को स्टेशन पर देखकर उसके मन में कई प्रश्न उठते हैं जिस का समावेश कहानी की अंतिम पंक्ति-“ वैसे एक प्रश्न अभी भी मेरे साथ बना है कि पैसा देकर मैंने उस बच्चे की भूख मिटाई या उसे उस बूढ़े जैसा जीवन दिया”-(पृष्ठ-109) में होता है। आशा जी ने इस कहानी में एक लेखिका की सूक्ष्म व्यवहारिक दृष्टि का परिचय दिया है जो इस कहानी को पढ़ते हुए पाठक के मन में भी प्रश्न छोड़ जाता है।

“कुल का दिया” इस संकलन की मार्मिक दिल को झकझोर देने वाली संवेदनशील कहानी है। परिवार, समाज, बेटा-बेटी, अभाव भीतर का दुख सब कुछ बहुत अच्छी तरह व्यक्त हुआ है लेखिका का कथन-“अपनों की दुत्कार से आहत मन को बुआ अपनी हंसी के सहारे ही तो संभाले रहती थी नहीं तो मन के कोमल तारों को टूटते देर लगती है भला।“ (पृष्ठ -114) से जहां बुआ का चरित्र पाठकों के मन में संवेदना जगाता है वहीं सुमेर काका का अद्भुत चरित्र मानवीय संवेदना को उभार कर मन को मार्मिक अनुभूतियों से भर जाता है। वस्तुतः पाठक को ऐसा प्रतीत होता है की पीपल के नीचे जल रहा दिया अपनी रोशनी तो फैला ही रहा है साथ ही उसमें सुमेर काका का चेहरा भी चमक रहा है। मानवीय संवेदनाओं से भरी अद्भुत कहानी। इन्हीं जात-पात से अलग मानवीय संवेदनाओं के ऊपर ही तो हमारा भारतीय समाज अब तक खड़ा है।

कहानी “खुद्दार“ आज भी ग्रामीण समाज में व्याप्त संवेदनशीलता और इंसानियत का आईना है। वस्तुतः कोई खुद्दार व्यक्ति लूटी हुई वस्तु की कीमत पाकर खुश नहीं होता।

संग्रह की अंतिम कहानी “वसीयत” आज के युग की महत्वपूर्ण व्यथा कथा और समाज के ज्वलंत प्रश्न को स्वयं में समेटे मुखर हुई है। जब बेटियों को भी पिता की संपत्ति में समान हक मिलने की कानूनी लड़ाई हम जीत चुके हैं फिर भी, यह कानूनी लड़ाई जीतने पर भी जो परिवार में विघटन आया है उसका बहुत सुंदर चित्रण इस कहानी में आशा जी ने किया है। अब प्रश्न यह उठता है कि एक ही पिता की दो संतान, एक लड़का एक लड़की, एक भाई एक बहन संपत्ति के बंटवारे के मामले में क्यों दुश्मन हो जाते हैं ? भाई सहजता से अपना हक देना क्यों नहीं चाहता और बहन लेने से कतराती सकुचाती क्यों है? आज बेहद आवश्यकता है समाज में शिंदे भाभी जैसी महिलाओं की जो ऐसी परिस्थिति में सचेतक का कार्य करतीं हैं। कहानी का अंत झकझोर कर रख देता है। कथानायिका का यह कथन“....वैसे एक राज की बात बताऊं वसीयत मैंने कर दी है ..अरे नहीं तेजस के नाम नहीं मीता के नाम । तलाक लेकर मायके में रहती है आखिर उसे भी तो एक भाई है!” (पृष्ठ -136)।

एक साहित्यकार होने के साथ-साथ मैं एक गंभीर पाठक भी हूं । इस संग्रह की सभी कहानियों ने मुझे जहां एक ओर आकृष्ट किया, पढ़ने पर विवश किया वहीं दूसरी ओर संतुष्ट भी किया कि हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाली डॉ. आशा पांडे जैसी सशक्त लेखिका हमारे बीच हैं । भाव, भाषा ,संवेदना कथ्य, समय , परिवेश और अनुभव सभी दृष्टिकोण से इस संकलन “ खारा पानी” की कहानियां खरी उतरी हैं। भविष्य में भी हम उनकी रचनाएं पढ़ें इस शुभकामना और उनके उत्तम स्वास्थ्य और नव वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ इस संकलन हेतु हार्दिक बधाई। खारे पानी की मीठी अनुभूतियों के लिए आपको साधुवाद।

समीक्ष्य कृति, खारा पानी- कहानी संग्रह, बोधि प्रकाशन जयपुर, प्रथम संस्करण जनवरी 2019, मूल्य-रु. 150/-

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आर. पी. शुक्ल, 401, नवनिर्माण भवन, चौथी मंजिल,
पराग नारायण रोड, लखनऊ, मो. 94518 42384


पुस्तक समीक्षा

जापान के आदि हाईककारों - वाशी, 1644-1694, बूसान। 1716-1784, ईसा, 1763-1824, और सिकी, 1867-1902 ने कभी भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि जिस को उन्होंने शुरू किया था कालान्तर में वह समूचे विश्व में छा जाएगी।

कविता विराट में व्यापक आनंद है, ऐसा आनंद जो असीम है। कविता सुन्दरता की लयात्मक सृष्टि है। ऐसा भी कहा गया है कि कविता भाव और कल्पना के द्वारा जीवन की व्याख्या है। यह माना जाता है कि ‘हाईकू‘ मूलतः कविता की जापानी शैली है। छंद रचना की दृष्टि से ‘हाईकु‘ 5, 7, 5 मे अक्षरीय त्रिपदी रचना कही जा सकती है। वस्तुतः ‘हाईकु‘ कविता वामन अवतार-सी है जो अनंत को संक्षेप में कहने का हुनर रखती है। संक्षेप में मैं तो यही कह सकता हूँ कि- आकार की संक्षिप्तता, भावों की तरलता, प्रकृति की सहजता और मन की पवित्रता का नाम है ‘हाईकु‘ कविता। वैसे तो जापानी परम्परा के अनुसार विषय की दृष्टि से ‘हाईकु‘ के सात भेद किये गये हैं। लेकिन भारत में लगभग हर विषय पर लिखे जा रहे हैं।

गुजराती के वरिष्ट कवि स्नेहरश्मि को भारतीय साहित्य का प्रथम सफल हाईकुकार माना जा सकता है। भारत में हाईकु की चर्चा सबसे पहले रवीन्द्र नाथ टैगोर ने 1914 मेें और उसके बाद अज्ञेय जी ने 1959 में की थी। लेकिन वास्तविक रूप मे हाईकु को भारत में पूरा खाद-पानी देकर लहलहाने का श्रेय जवाहर लाल नेहरू विश्वविधालय दिल्ली के जापानी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. सत्य भूषण वर्मा को जाता है। 

आज भारत में भी हजारों की संख्या में लोग ‘हाईक‘ लिख रहे हैं। और नित कोई न कोई पुस्तक भी बाज़ार में आ रही है। इसी शृंखला मे डॉ. आशा पाण्डेय की ‘खिले हैं शब्द‘ नाम से एक और पुस्तक आ गयी है। लेखिका ने अपने पहले ही प्रयास मे नई उंचाइयों को छुआ है। भाषा सरल भी है और चुटीली भी। कहीं तीर सी चुभती है तो कहीं मरहम लगाती दिखती है। हर ‘हाईकु‘ तुकबंदी के चुगल से अपने आप को मुक्त किए हुए है। यह बहुत बड़ी बात है। हाईकुकारों की पंगत में डा. आशा पाण्डेय का भी स्वागत है। पुस्तक से ही कुछ हाईकु आप भी पढ़ें-

    ’                                  ’

जीवन नदी                                          

उमड़ी हर बार                                               

बाँधों से घिरी                                                 


बेटी पराई

ससुराल पी-घर

बेघर नारी

      ’                                  ’

आम आदमी

देखता है सपने

खाने में दाल


देश की बेटी

देश को जगाकर

निद्रा मे लीन

      ’

पुस्तक मूल्य - 85 रु., बोधि प्रकाशन, जयपुर।

सम्पर्क: 5, योगिराज शिल्प, स्पेशल आई.जी. बंगला के सामने कैंप, अमरावती - 444602

दूरभाष: 0721 - 2660396, मो. 094229 17252

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समीक्षा

सुश्री उर्मिला सिंह, कल्यण, मुंबई, मो. 91673 50560


संवेदनाओं का सरस आख्यान - ‘बिखरा रंग सिंदूरी’


‘बिखरा रंग सिंदूरी’ आशा पांडेय का दूसरा काव्य संग्रह है। इस संग्रह में उनकी छंद बद्ध कविताएँ संग्रहित हैं। इसके पहले ‘तख्त बनने लगा आकाश’ में मुक्त छंद की कविताएँ थीं। आशा पाण्डेय मूलतः कथा लेखिका हैं, किंतु कविताएँ भी मार्मिक और सार्थक लिखती हैं तथा मानवीय जीवन के यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती हैं। ‘बिखरा रंग सिंदूरी’ यह प्रतीकात्मक शीर्षक संग्रह की अधिकांश कविताओं को ध्वनित करता है। सिंदूरी रंग का बिखरना सिर्फ प्राकृतिक छटा भर ही नहीं, अपितु संवेदना, प्रेम, विश्वास और भरोसे के गाढ़े रंगों का बिखर कर सूख जाने का दर्द भी है तथा निरंतर समृद्ध होते समाज की भीतरी छटपटाहट और विडम्बनाओं का सरस आख्यान भी है।

संग्रह की भूमिका में ‘अपनी बात’ कहते हुए आशा पाण्डेय कविता को सम्बोधित करते हुए स्वयं लिखती हैं, ‘ कविते! ... इन कविताओं में तुम मानवीय जीवन की करुणा, विडम्बना तथा मार्मिक मासूमियत में बही हो, उनके यथार्थ एवं अंतद्र्वंद्वों की दुनिया में प्रवेश की हो, उनके जिए हुए सच में लय बनकर गुनगुनाई हो, सहलाती रही हो उन दिलों को जहाँ तनिक भी वेदना, तनिक भी उदासी रही होगी।’

इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए उनकी बात से सहमत हुआ जा सकता है कि ये कविताएँ सिर्फ भाषा का खिलवाड़ भर नहीं हैं बल्कि मानवीय सम्बन्धों की सूक्ष्म पड़ताल करती हैं।

संग्रह की शुरुआती कविताओं में ही एक कविता है- आँसू और सागर। ये सुनामी की विभीषिका पर लिखी गई है। अनंत विस्तार लिए सागर लाखों लोगों को लील जाता है,तब आंसू जिसकी निर्मिति भी खारे जल से ही हुई है, उसके मन में महानता और लघुता के बारे में प्रश्न उठता है। वह सागर से कहता है-

‘तुम गहरे हो गंभीर जलधि, मैं गहरे दुख से बहता हूँ /तुम युग-युग से आप्लावित हो, मैं मिटकर जीवित रहता हूँ / तेरी लहरों का कालनृत्य, लेता है सुख को तुरत छीन / मैं हाहाकार मचाकर भी, बहता नयनों से मौन धीर।’

और तार्किक विवेचन करते हुए अंत में सागर को लघु साबित कर देता है।

अगली एक कविता में आज के सामाजिक बिखराव और फसाद की चिंता करते हुए पत्थर मूर्तिकार से कहता है- ‘हे मूर्तिकार! मत कर प्रहार, मैं पाहन ही अच्छा हूँ... आज विषम स्थिति आई/चहुदिश नफरत ही है छाई। तुम गढ़ दोगे मूरत कोई/ तोड़ेगा तेरा ही भाई/फिर उलझ पड़ेगा दो समूह/बह जायेगा बे-अर्थ लहू। मैं हर प्रहार तो सह लूँगा/इसको सहने में कच्चा हूँ।’

जीवन में ऐसा समय भी आता है जब हम अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करते-करते छीज जाते हैं और मुड़-मुड़ कर पीछे देखते हुए हिसाब लगाने लगते हैं कि हमें क्या मिला?इस हिसाब में अक्सर एक टीस उठती है। उसी टीस का जिक्र आशा पाण्डेय ने अपनी कविता ‘फिर भी मगर’ में किया है - ‘मैं उमग कर चली रात-दिन भूलकर, पंथ सारे मगर मुझको झुलसा दिये/... कष्ट को भूलकर फिर बढ़ाया कदम, प्रेम की गीतिका को सजाती रही / जो विरोधों के सुर आ मिले थे गले, नेह का सुर मिला गीत गाती रही / किंतु मिलते रहे कंटकों से कदम, दर्द दामन में मेरे बिखरा दिये ...’ इसके अतिरिक्त ‘उदासी,’ ‘अपना प्यारा घर’, ‘कैसे कहूँ मैं’, ‘नदी बह रही’, ‘बीते दिन मधुर लौट आओ’, आदि कविताएँ भी इसी भाव को समेटे हैं।

यूँ तो जीवन दुखों, संघर्षों और उदासियों से घिरा होता है, इन्हीं के बीच उम्मीद और प्रेम की एक हल्की झलक भी दिखाई देती है, जो इस झलक को देख लेता है उसके लिए मार्ग कुछ आसान हो जाता है, ‘एक दिन होगा हमारा’, ‘आस मुझको नई मिल रही है’, तथा ‘नदी बह रही है’ आदि कविताओं में इसी बात का विस्तार किया गया है।

आशा पांडेय के स्वभाव की सरलता, संवेदना और प्रकृति प्रेम न सिर्फ उनके गद्य में अपितु उनके काव्य में भी परिलक्षित होता है। वे जीवन के संघर्षों से जूझ रहे, साधन सुविधाहीन, आम जनों की पीड़ा को भली - भांति अनुभव करती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में इस वर्ग के लिए चिंता और समाज की बेहतरी के लिए चिंतन अपनी सार्थकता के साथ उपस्थित रहता है। उनकी कविताएँ समय की विडम्बनाओं को साथ लेकर चलती हैं और उसी के बीच एक बेहतर राह बनाने की कोशिश करती हैं। वे संवेदना और दर्द को लिखते हुए भी श्रृंगार और प्रकृति को नहीं भूलती हैं। उनके हृदय का प्रेम-भाव प्रकृति के प्रति भी है और प्रियतम के प्रति भी। इस जगह आकर प्रियतम और प्रकृति का भेद मिट जाता है।

‘होती समर्पित जलनिधे ! स्वीकार कर लेना मुझे/भर अंक में निज श्वास से, अमरत्व दे देना मुझे।‘

इस संग्रह की कुछ कविताएं तो भाव और सौंदर्य की दृष्टि से अति उत्कृष्ट बन गई हैं। हम सभी जानते हैं कि कृष्ण जब गोकुल से मथुरा चले गए थे तो दुबारा कभी गोकुल लौट कर नहीं गए, किंतु कवयित्री ने अपनी कल्पना में उन्हें गोकुल लौटाया है और उन्हें धिक्कारते हुए उलाहना भी दिया है। बड़े मार्मिक और गहरे भाव हैं इस कविता में। कवयित्री इस बात को नहीं स्वीकार कर पा रही हैं कि कृष्ण गोकुल के प्रेम को कैसे भुला दिये ! प्रेम ही तो उनका मुख्य भाव था तो गोकुल के प्रति, नंद-यशोदा के प्रति, राधा के प्रति उनका ये भाव क्यों तिरोहित हो गया !... तो कवयित्री अपनी कल्पना के संसार में कृष्ण को गोकुल ले आती हैं -

‘शाम को ब्रज-वीथिका में, घूमते कान्हा मिले / मैंने कहा कैसे प्रभो! इस गली में पग चले? ‘

इस संग्रह की कविताएँ स्त्री-विमर्श को ध्यान में रखकर नहीं लिखी गई हैं, किंतु कई कविताओं में स्त्री केंद्र में है। इस दृष्टि से ‘सिद्धार्थ’ और ‘अनुत्तरित प्रश्न जैसी कवितायें उल्लेखनीय हैं। ‘सिद्धार्थ’ कविता में कवयित्री ने सिद्धार्थ को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है-

‘सिद्धार्थ तुमने क्यों नहीं विश्वास पत्नी पर किया/नींद में ही छोड़कर उसको, कदम आगे किया।’

‘‘अनुत्तरित प्रश्न‘‘ कविता में द्रौपदी द्वारा पूछे गए प्रश्नों में मार्मिकता के साथ परिवारिक और सामाजिक व्यवस्था पर धिक्कार भाव भी है, जिसमें कि पत्नी भी दांव पर लगाए जाने योग्य वस्तु के समान मान ली गई थी-

‘एक दिन था-द्रौपदी ने, प्रश्न अर्जुन से किया/आर्य सुत! मुझको बताओ, क्यों विकट यह दुःख दिया?’

स्त्री को अनिकेतन घोषित करने के लिए चल रहे षड्यंत्र का सरल उत्तर एक भावपूर्ण कविता ‘नया विचार’ में -

‘वह मेरे बचपन का आंगन, यह कर्मक्षेत्र संसार मेरा/कैसे कह दूं मैं बिन घर की, दोनों घर पर अधिकार मेरा।’

अनंत यात्रा पर चली गई मां के अपरिमित स्नेह - दुलार का स्मरण कराती कविताएं द्रवित करती हैं-

‘यूं बीत गए हैं वर्ष कई, पर याद हमेशा तुम आती/हो सुबह-शाम कोई पल भी, आकर के तुम दुलरा जाती।‘

समाज से निरंतर छीजते जा रहे प्रेम, अपनत्व और सौहार्द पर चिंता इन शब्दों में प्रगट हुई है -

‘अपनेपन का अब भाव कहां? रिश्ते-नातों की छांव कहां? आतिथ्य भाव की सेवा में,’ मजबूरी मैंने देखी थी।’

इस संग्रह में कई महत्वपूर्ण और लंबी कविताएं हैं। इन्हें पढ़ते हुए एक कहानी जैसी रोचकता और लय का आभास होता है। यही कारण है कि लंबी कविताओं से सहज उपजने वाली ऊब यहां अनुभव नहीं होती।

भाषा सहज, सरल और सवेदनशील है। मन के गहरे और कोमल भावों को बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया गया है। मैं इस सुंदर और सार्थक काव्य संग्रह हेतु आशा पांडेय को हार्दिक बधाई देती हूँ और उनके निरंतर लेखन के लिए कामना करती हूँ।      

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इंटरव्यू

देहमुक्ति स्त्री की एकमात्र आकांक्षा नहींः डॉ. आशा पाण्डेय

हिन्दी की चर्चित लेखिका डॉक्टर आशा पाण्डेय साहित्य के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी काफी सक्रिय रही हैं. उच्च शिक्षा के साथ, समाज, साहित्य और पारिवारिक परिवेश में तालमेल की अद्भुत महारत के बीच इन्होने खूब लिखा और पढ़ा. यहां पेश है लेखक, अनुवादक और फेस एन फैक्ट्स और जनता जनार्दन की साहित्य समन्वयक सुजाता शिवेन से डॉक्टर आशा पाण्डेय की बातचीत के खास अंशः 

प्रश्न:- आपके रचना कर्म की शुरुआत कब और कैसे हुई ?

उत्तर:- निश्चित समय या तारीख बता पाना तो मुश्किल है। मन में साहित्य के प्रति अगाध स्नेह तो होश सम्भालने के बाद से ही महसूस की हूँ। मैं तो सोचती हूँ कि कोई भी रचना कागज पर उतरने के पहले एक लम्बे अरसे तक दिमाग में तैयार होती रहती है। मुझे जब साहित्य का क, ख, ग भी नहीं समझ आता था तब भी दर्दीले लोकगीत मुझे रुला देते थे। पाठ्यक्रम में लगी कविताओं को मैं इतनी-इतनी बार पढ़ती थी कि वे सब मुझे अब भी कंठस्थ हैं।  मुझे तो लगता है मेरे रचना कर्म की शुरुआत का असली समय वही रहा होगा, भले ही मन के मन में ही।    

कागज पर उतरने वाली मेरी पहली कविता के बारे में जहाँ तक मुझे याद आता है, मैं छठी कक्षा में रही होऊँगी जब गणतन्त्र दिवस पर एक कविता लिखी थी। स्कूल में सुनाई भी थीं। उसके बाद से साल दो साल के अन्तराल पर एकाध कविता लिखने लग गई थी। बी.ए. पूरा करते- करते कहानी लेखन की तरफ भी रुझान हो गया था,  लेकिन बस गिनती की कविताएँ और कहानियाँ थीं मेरे पास। नियमित लेखन तो सन्  2002 से शुरू हुआ।

प्रश्न:- आप मूलतः कहानियाँ लिखती हैं ? इसके अलावा भी क्या किसी और विधा में अपनी कलम चलाई हैं ?

उत्तर:- जी हाँ, जैसा कि मैंने अभी आपको बताया कि लेखन की शुरुआत तो कविता से हुई। आज भी मैं कविताएँ लिखती हूँ। शीघ्र ही मेरा एक काव्य संकलन आने वाला है। इसके अलावा मैं यात्रावृत्तान्त, संस्मरण, डायरी, सामाजिक विषयों पर लेख आदि भी लिखती हूँ। इन दिनों तो दोहा और हाइकु लिखना भी शुरू की हूँ।

प्रश्न:- आज के इस आधुनिक युग में स्त्री-मुक्ति आन्दोलन को आप किस नज़रिंये से देखती हैं ?

उत्तर:- मेरा मानना है कि युग चाहे जो भी हो, समय चाहे जैसा भी हो, ‘स्त्री-मुक्ति’ शब्द को सही अर्थों  में समझना होगा।  देश में तमाम संस्थाएँ स्त्री-मुक्ति के लिए कार्य कर रही हैं और उसका सकारात्मक परिणाम भी सामने है किन्तु, ये जो हिन्दी साहित्य में स्त्री मुक्ति के नाम पर नारी विमर्श, नारी अस्मिता का एक नया आन्दोलन चल निकला है उसमें मुझे कहीं से भी स्त्री मुक्ति का कोई प्रयास दिखाई नही देता।  ये तो मुझे वैसा ही लगता है जैसे किसी वस्तु के विज्ञापन में (चाहे वहाँ नारियों को दिखाना जरूरी हो या ना हो ) नारियों को कम वस्त्रों में दिखा कर उस वस्तु की विक्री बढ़ा लेने की बात सोचते हैं वैसे ही संपादक नारी विमर्श के नाम पर नारी देह की कहानियाँ छापकर पत्रिका की बिक्री बढ़ा लेना चाहते हैं।

देहमुक्ति या अपनी देह पर अपना अधिकार स्त्री की प्रथम आकांक्षा हो सकती है किन्तु एक मात्र नही। जहाँ करोड़ों की संख्या में स्त्रियाँ दो वक्त के भर पेट भोजन के जुगाड़ में जद्दोजहद कर रही हों, वहाँ मात्र देह की स्वतन्त्रता कुछ खास मायने नही रखती। मेरे विचार से स्त्री का श्रम विमर्श का मुख्य मुद्दा होना चाहिए। कितनी बड़ी बिडम्बना है कि कार्य के स्वरूप एवं समय में समानता होने के बावजूद भी स्त्री मजदूर को पुरुष मजदूर से 

आधी या कभी-कभी आधी से भी कम मजदूरी मिलती है। स्त्री अपनी कम मजदूरी से ही दो वक्त की रोटी तथा बच्चों के पालन-पोषण का जुगाड़ करती है जबकि पुरुष अपने हिस्से की कमाई शराब एवं जुए-सट्टे में उड़ा देता है। पत्नी यदि इस बात का विरोध करे तो उसे गाली एवं मार मिलती है। अपवाद हो सकते हैं किन्तु, अधिकांशतः यही स्थिति देखने को मिलती है।

मेरे विचार से स्त्री का श्रम, जो वह अर्थ कमाने के लिए इस्तेमाल करती है तथा उसका वह धैर्य जो वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने बच्चों एवं घर को सम्भालने में लगाती है, मुख्य रूप से इसकी चर्चा होनी चाहिए। इसके साथ ही साथ उस हिंसा की चर्चा होनी चाहिए जो पुरुषों द्वारा शब्दों एवं नजरों से की जाती है। उन छोटी-छोटी बातों की भी चर्चा होनी चाहिए जो घर परिवार के द्वारा बोलकर उन्हें नश्तर की तरह चुभोया जाता है। नारी को इन्सान मान लेना तथा उसके वजूद का उसके निर्णय का सम्मान करना ही सही अर्थों में नारी मुक्ति की बात होगी। और मैं मानती हूँ कि इतने से ही नारी के सारे अधिकार सुरक्षित हो जायेंगे, उसकी देह पर उसका अधिकार भी।

प्रश्न:- आज के इस दौर में युवावर्ग अपनी भाषा, संस्कृति व साहित्य से कटता दिखाई दे रहा है, आपका अपना अनुभव ?

उत्तर:- आज भौतिकवादी सोच अपने चरम पर है। सुख एवं सुविधा की हर वस्तु हमारे पास होनी चाहिए जिसके लिए पैसा जरूरी है। पैसा कमाने के लिए हर सम्भव उपाय अपनाये जा रहे हैं। जब समाज में मान्यता की कसौटी पैसा ही हो गया है तो लोग अपने उसूल, आदर्श, अपनी संस्कृति, अपनी भाषा सब ताक  पर रख कर उन हथकंडों को अपना रहे हैं जिनसे पैसा आ सके। आज का युवावर्ग इसी दौड़ में शामिल है। उसे अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के बारे में सोचने का वक्त नही है। उसके मन में यह प्रश्न भी उठता है कि भाषा और संस्कृति के बारे में सोचने से उसका फायदा क्या होगा ? और जिस चीज से कोई आर्थिक फायदा नही है उससे जुड़ना वह क्यों चाहेगा ?

आज के युवा के पास नये विषय हैं, नये विम्ब हैं, नई शैली है। पुराने मूल्य अब बेमानी लगते हैं उन्हें।

इसके समानान्तर मैंने यह भी महसूस किया है कि आज का युवा वर्ग परिस्थितियों के प्रति अधिक सजग, जिम्मेदार और जुझारू है। अगर उसे सही नेतृत्व मिले तो वह अपनी संस्कृति एवं भाषा की रक्षा करते हुए भी विकास की नई राह खोज ले। क्योंकि वह भावनाशून्य या विवेकशून्य नही हैं।

प्रश्न: कहानी की रचना प्रक्रिया में पहले आप प्लाट बना लेती हैं या फिर लिखने बैठती हैं और कहानी एक रौ में बनती जाती है ?  

उत्तर: कहीं ना कहीं से एक सूत्र तो जरूर उठाती हूँ जिसे आप प्लाट कह सकती हैं। किन्तु, पूरी की पूरी कहानी दिमाग में नही तैयार होती। जब लिखना शुरू करती हूँ तब कई बार कहानी सोचे हुए तरीके से अलग हट जाती है और एक नया रूप अख्तियार कर लेती है। छः कहानियाँ एक रौ में बन भी जाती हैं किन्तु कुछ स्वयं को बार-बार लिखवाती हैं फिर भी एक असन्तोष बना रहता है कि, ठीक से नही बन रही है।

प्रश्न: एक स्त्री होने के नाते क्या आपके लेखन कर्म में किसी तरह के कोई अवरोध का अनुभव आपको होता है ?

उत्तर: बहुत अधिक तो कभी नही महसूस होता क्योंकि मैं यह मानकर चलती हूँ कि मेरी घरेलू और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पहले हैं,  उन्हें पूर्ण करने के बाद ही मैं लेखन की ओर जाती हूँ। पुरुष लेखक भी अगर नौकरी या व्यवसाय कर रहा होता है तो पहले वह उसी कार्य को महत्व देता है। बचे समय में या बचा लिए गये समय में ही वह भी लेखन कर पाता है। हाँ, इतना अवश्य मुझे लगता है कि पुरुष लेखक घर में अपने लेखन कर्म को पहले नम्बर पर रख कर किसी भी समय लेखन कर लेता है लेकिन स्त्रियाँ लेखन को अपना प्रथम कार्य नही बना पाती हैं। उन्हें घर परिवार के सारे कार्य निपटा कर ही जो समय मिलता है उसी में लेखन करना पड़ता हैं और उसका ऋणात्मक परिणाम यह होता है कि कई बार अच्छे विचार दिमाग में बनते हैं और जब जिम्मेदारियों को निभा कर महिला कलम उठाती है तब तक वो दिमाग से गायब भी हो चुके होते हैं।  वैसे मेरी कोशिश अपने लेखन को उत्कृष्ट और सशक्त बनाने की रहती है। इस विषय पर मैं कम ध्यान देती हूँ कि मैं स्त्री हूँ इसलिए पिछड़ रही हूँ या फलां लेखक पुरुष है इसलिए आगे बढ़ रहा है। मेरा मानना है कि उत्कृष्ट लेखन को कोई अधिक दिन तक नहीं नकार सकता।

प्रश्न: आपके अपने प्रिय लेखक कौन हैं ?

उत्तर: यदि मैं शुरुआती दिनों की बात करू जब हिन्दी कथा कहानी को मैंने जाना समझा, परिचित हुई तो मुंशी प्रेमचंद का नाम ही मुझे याद आता है। उनकी कहानियों को सुनकर पढ़कर ही मैं हिन्दी साहित्य के पाठन की ओर आगे बढ़ी। काव्य में महादेवी एवं जयशंकर प्रसाद याद आते हैं। बाद में तो कई नाम इस आदरणीय सूची में जुड़ते गये। जैनेन्द्र, अज्ञेय, मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल आदि की कई-कई कहानियाँ मेरे दिमाग पर अमिट छाप छोड़ चुकी हैं।

वैसे आपने यदि यह पूछा होता कि आपकी प्रिय रचनाएँ कौन-कौन सी हैं तो मैं एक के बाद एक का नाम बता डालती। क्योंकि मैंने महसूस किया है कि मुझे एक ही लेखक की कुछ रचनाएँ तो बहुत अच्छी लगती हैं किन्तु कुछ रचनाएँ बहुत कम प्रभावित कर पाती हैं।

प्रश्न: हिन्दी के अलावा भारत की किस दूसरी भाषा के साहित्य से आप ज्यादा प्रभावित हैं?

उत्तर: बड़े दुःख के साथ बता रही हूँ कि मैं अभी भारत की अन्य भाषाओं में से किसी एक भाषा के साहित्य का पठन पूर्ण समग्रता में नहीं कर सकी हूँ। बांग्लाभाषा के साहित्य में शरतचन्द्र तथा महाश्वेता देवी के कुछ उपन्यास तथा कहानियों को पढ़ी हूँ। बंकिमचन्द्र का  ‘आनन्दमठ’ तथा रवीन्द्र नाथ टैगोर की भी कुछ रचनाएँ पढ़ी हूँ। इसके अतिरिक्त कुछेक मराठी कहानियों का हिन्दी अनुवाद पढ़ी हूँ। इक्का दुक्का तमिल, कन्नड़, मलयालम उडिया आदि को पढ़ी हूँ। इतने अल्प पाठन के आधार पर इस प्रश्न का उत्तर देना मुझे उचित नही लग रहा है। हाँ मुझे महाश्वेता देवी की कहानियाँ प्रभावित करती हैं। मराठी की भी कुछ कहानियाँ, जो मैं पढ़ सकी हूँ, मुझे बहुत अच्छी लगी थीं।

प्रश्न: इन दिनों आप क्या लिख रही हैं ?

उत्तर: मुख्य रूप से तो मैं कहानियाँ ही लिखती हूँ इसलिए उस पर काम चलता ही रहता है। इसके अतिरिक्त मैं इन दिनों दोहा और हाइकु भी लिखना शुरू की हूँ। कविता संस्मरण एवं डायरी लेखन भी बीच-बीच में चलता रहता है।

प्रश्न: युवा लेखकों से आपकी उम्मीदें क्या हैं ?

उत्तर: चूँकि मैंने लेखन बहुत देर से शुरू किया इसलिए स्वयं को मैं नवलेखक ही मानती हूँ। युवा लेखक तो मुझसें आगे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। ऐसे ही अच्छी रचनाएँ वे हिन्दी साहित्य को देते रहें यही उम्मीद करती हूँ तथा उन्हें शुभकामनाएँ भी देती हूँ।

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समीक्षा


सुश्री उर्मिला सिंह, कल्यण, मुंबई, मो. 91673 50560


बादल को घिरते देखा है: आशा पाण्डेय

डाॅ. आशा पाण्डेय का यह यात्रा वृतांत एक प्रकार से अनोखा ही है। कैलाश मानसरोवर यात्रा उनके पति श्री सुशील कुमार पाण्डेय ने अपने मित्रों, परिचितों के साथ तय की थी। वे स्वभाववश सारा घटनाक्रम डायरी में दर्ज करते गए। लिखने के पीछे उनकी सोच सिर्फ इतनी ही थी कि यह महत्वपूर्ण यात्रा कभी विस्मृत न हो। यात्रा से सकुशल लौटने के बाद पाण्डेय जी बहुत उत्साहित थे और जब - तब अपने अनुभवों को आशा से बाँटते रहते थे। उनकी बातें सुनकर और डायरी पढ़कर आशा के मन में विचार आया कि इसे पुस्तकाकार होना चाहिए। इसे हम भगवान शिव की कृपा या इच्छा भी समझ सकते हैं।

आशा ने इस पुस्तक के लिए अथक परिश्रम किया। किसी दूसरे के अनुभवों और डायरी के आधार पर पुस्तक लिखना इतना भी आसान नहीं। फिर भी ईश्वर की कृपा से पुस्तक पूरी हुई। पाण्डेय जी उसे पढ़कर आश्वस्त हो गए तब आशा ने उनके साथ गए मित्रों से भी घटनाक्रमों का सत्यापन कराया। इस प्रकार कैलाश मानसरोवर यात्रा पर एक बढ़िया पुस्तक तैयार हो गयी।

इस पुस्तक का नाम और आवरण चित्र जितना सुन्दर है, पुस्तक भी उतनी ही बढ़िया है। इस पुस्तक को प्रकाशक से मंगाया जा सकता है। 

प्रकाशक: दिशा प्रकाशन, दिल्ली, मूल्य: 250 रुपए    



 





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