साहित्य नंदिनी मई 2023



 समीक्षा


समी. सुश्री निर्मल सुन्दर, वसन्त कुंज, नई दिल्ली, मो. 9910778185

ले. डाॅ. उमा त्रिलोक


‘स्मृतियाँ’ 


जब मैं उमा जी का काव्य संग्रह ‘स्मृतियाँ’ पढ रही थी तो मैं पहुँच गई गीता के अठारवें अध्याय के 73वें श्लोक पर, जिस में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाने के उपरान्त पूछा- हे अर्जुन! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया  ?’’ अर्जुन ने उत्तर में कहा- ‘‘हाँ! आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। मैंने ‘स्मृति’ प्राप्त कर ली है और मैं स्थित हूँ।’’

संसार के क्रियाकलापों में उलझे, मायाजाल में बद्ध हमारी स्मृति पर कुछ अज्ञान का पर्दा पड़ जाता है जिस से हम भगवान से विमुख हो जाते हैं। जब भगवान की कृपा से विस्मृति का वह आवरण हट जाता है और तत्व की अनुभूति से स्मृति जागृत हो जाती है तब भगवान के साथ एकाकार हो जाता है। उमा जी की स्मृतियां हमें उसी दिशा में ले जाती हैं जैसे ‘यह ज़रूरी तो नहीं’ कविता में उमा जी कोई शिकवा नहीं करतीं। वे कहती हैं- ‘‘इक दूजे के लिये होना/बस होना ही बहुत है।’’ ‘वह क्षण’ कविता में कहती हैं- ‘‘ढूंढ लिया जब अन्दर-बाहर/फिर मैंने अपने भीतर झांका/हां, अपने भीतर झांका/वहीं मिला वह नटखट मुझ को/धीमे से मुस्काता।’’ ‘संदली शाम’ कविता में तो कवयित्री ‘उस’ में रम ही जाती-‘‘वह है मुझ में मैं हूँ उस में/ रम गये एक-दूजे में। उमा जी सभी कविताएं उनकी अनुभूति से व्याप्त हैं। तादात्म्य होता है उनसे और तब भक्तिभाव जाग्रत हो जाता है। कहीं भी द्वैत या अद्वैत नहीं बस है तो एक शून्य-‘मौन’ ऐसी कविताएं है जहाँ वे चारों ओर अपने प्रिय भगवान को देखती है। ‘मौन’ में कहती हैं-‘‘तुम तो/न होने में हो।’’

कहा जाता है साहित्य समाज का दर्पण है। समाज में नारी की दयनीय और पराजित स्थिति उनके अन्तर्नाद में में गूँज उठती है लेकिन वे उसकी पराजित सोच के साथ जीना नहीं चाहती। अन्त में वे कहीं है-‘‘मुझे जीना है/हंस ध्वनि-सा/गुनगुनाता जीवन/गीत सा लहराता जीवन।’’

लगता है उनका रोम-रोम उस ‘असीम’ को ढूँढ रहा है। ‘‘एक कोना’ कविता में वे कहती है-‘‘अब तलाशती है रुह/ एक कोना, सुनसान, वीरान/एकाकी मौन।’’ यही दर्शाता है उनका भक्तिभाव, प्रेम और समर्पण।

किसी जाति-धर्म में भेदभाव न करते हुए ‘ईद’ के मौके पर लिखती है- ‘‘तुम थे असलम/मैं थी/न हमीदा, न जमीला/मैं तो सविता थी/और तुम थे/न विनय न विकास।

लाॅकडाउन करोना जैसी कविताओं में अपनी संवेदना प्रकट करते हुए ‘तलाक’ कविता में कहती हैं- ‘‘सह जाते गर/इक-दूजे के/छोटे-मोटे अवगुण/नहीं होता तब कभी/यह अभिशप्त तलाक’’। इस से इनकी गम्भीर संवेदना और हृदय का दर्द निकल कर आता है। ‘कृष्णकली’ कविता में लाचार?, गरीब बच्ची का चित्रण करती है। दूसरी ओर भगवान को जैसे निरुत्तर करते हुए पूछती हैं-‘‘मेरी साधना के प्रसाद/मेरी प्रतीक्षा के फल/मेरे प्रश्नों के उत्तर/मेरी प्यास के जल/क्या वही हो तुम ?’’

भक्ति रस से सराबोर इन कविताओं में प्रेमरस की धारा निरन्तर प्रवाहित हो रही है। धरा गगन-कहाँ नहीं गिर रही उसकी बूँदे। वे तो प्रकृति से बाते करती हैं। हवा छू कर उनको दिलासा दिलाती है। वे अपने प्रियतम को सर्दी, गर्मी, बरसात सबको खिड़की में बुलाती है और अन्त में वायदा करती हैं कि ‘‘तुम्हारे आते ही मैं/कट जाऊँगी दुनिया से- तुम आना।’’ कितना बड़ा आश्वासन है अपने प्रियतम के लिये! क्या यह भक्ति, प्रेम, विश्वास और अनन्त के प्रति गहरी निष्ठा नहीं है ?

इस प्रकार उमा जी की कविताओं में अध्यात्म, समर्पण, भक्तिरस, प्रेम और समाज के प्रति कत्र्तव्य सब एक ही स्थान पर दिखाई देते हैं जो व्यक्ति को भक्ति देते हैं, प्रेरणा देते हैं। उमा जी इतने सुन्दर काव्य संकलन के लिये बधाई की पात्र हैं।

आभारी है हम सब उनके, जिन्होंने गीता दोहराई/हृदय को छू जाती है, उनकी हर परछाई। अपने भीतर झांकने की, दे रही प्रेरणा/संसार में रह कर भी, ‘स्वयं’ से मिला रही हैं। 

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समीक्षा



समी. सुश्री सरला शुक्ला, -वसन्त कुंज, नई दिल्ली

ले. डाॅ. उमा त्रिलोक

उमा त्रिलोक का काव्य संकलन ‘स्मृतियाँ’ पढ़ कर लगा वह आहों की व्यापारी हैं। भाव पूर्ण कविताएँ  उन का काम है। मानो कह रही हैं ‘‘गगन की पागल हवाओं, अपने दामन समेट लो कि मेरे नेह गीत दबे हुए सीनों में हंगामा बरपाने वाले हैं। नीरज के शब्दों में कहूँ तो जब लिखने के लिए लिखा जाता है, तब जो कुछ भी लिखा जाता है, उसका नाम है गद्य। पर जब लिखे बिना न रहा जाए और जो कुछ भी खुद ब खुद ही लिख लिख जाए उास का नाम है ‘कविता’। जब उमा त्रिलोक का काव्य संग्रह ‘स्मृतियाँ मिला तो लगा कविता के विषय में ठीक ही कहा था नीरज ने। उमा सृजन के आकाश में वर्षों पहले उड़ान भर चुकी हैं और अब वह अनुभूति के पँख फैलाती हुई ‘स्मृतियाँ’ बिखेर रही हैं। कविता की यात्रा कठिन और दुरुह होती है।’ इसका सफर यूँ ही तय नहीं हो जाता है। आँसू की हथेली पर मुस्काने की चमेली उगानी पड़ती है, यादों की राहों से कई साये समेटने पड़ते हैं, पीड़ा की धरती से कांटे हटाने होते हैं। और तब कहीं जा कर मनचले इन्द्र धनुष के रंगीले झूले में जा कर झूला जा सकता है, उमा त्रिलोक ने यह सब जरूर ही भोगा होगा जो उनकी अनुभूति के विविध आयाम है और संस्कारों का अनूठा संगम है।

अंधकार हो या प्रकाश, जन्म हो या मृत्यु, सुख हो या दुख संघर्ष हो या शान्ति, किसी प्रवासी की सूनी सांझ हो या प्रणय केली में रत किसी प्रेयसी की चांदनी रात हो, जहाँ तक जीवन है, वहीं तक कविता की गति है। उमा त्रिलोक की काव्य यात्रा में, अभिव्यक्ति में कई पड़ाव हैं और इस सभी में एक तलाश है, एक आरजू है जो डर से सरक कर अधर तक आती है, श्रोता और पाठक को मंत्र मुग्ध करती हैं।

कवि हृदय सृष्टि के सौन्दर्य का मर्मज्ञ होता है। वह तो एक ऐसा यंत्र है जिस के द्वारा सारी सृष्टि का सौन्दर्य देखा जा सकता है- ‘स्मृतियाँ’ में। चलते‘-चलते उमा भी प्राकृतिक दृश्यावली को अपनेी आँखों से ओझल नहीं कर पाईं और लिखा- ‘फूल भी आँखें मूंदे पड़े हैं, जैसे अभी जगे ही नहीं मगर कुछ तो, शिकायत में है चुप।’

पूछने को हैं, कि सुबह क्यों नहीं हुई अब तक कविता निराश मन को भीतर बाहर से तराश कर अनुभूति के भुजपाश में बांध कर निर्मय बना देती है, तभी तो उमा ने वास्तविकता के साथ अस्तिकता से समझौता किया है और लिखा है .... ‘‘बस, उनके ख्वाबों में, तुम्हारा होना ही बहुत है कोई बंदिशें, वादे, गिले, शिकवे या शिकायत हो यह जरूरी तो नहीं, इक दूजे के लिए होना, बस होना ही बहुत है।’’

उमा ने अपनी अभिव्यक्ति के सांचे में नारी की अस्मिता और अस्तित्व पर भरपूर प्रकाश डाला है और सृष्टि की अनुपम रचना के विषय में भी अपनी रचना धर्मिता के क्रम में दृष्टिपात किया है, अनुभूति के शीतल जल प्रपात के नीचे कभी भीग-भीग कर, कभी नारी वेदना की तपती धरा पर भाग-भाग कर कभी कल्पना की चेतना द्वारा इसे भोग-भोग कर नारी के अवचेतन अस्तित्व के प्रति भी सावधान रहते हुए बदल देना चाहती हैं विधान, और लिखती हैं।

‘‘क्योंकि नहीं जीना है मुझे, इस हारी सोच की व्यथा के साथ ‘‘मुझे जीना है, हंस ध्वनि-सा, गुनगुनाता जीवन गीत सा लहराता जीवन।’’

अनुभूति का शायद ही कोई कोना सूना बयाँ हो जहां कवयित्री भावों का सोना बोना, उमा भूल गई हों। उमा त्रिलोक के ‘स्मृतियां’ लिखने के इस अभियान के प्रति मैं अपनी मंगल कामनाएँ समर्पित करती हूँ, इन की सभी रचनाएँ मन की गहन अनुभूतियों को जागृत करती हैं। यह मेरा परम सौभाग्य है कि मुझे उनकी सुन्दर रचना ‘‘स्मृतियाँ’’ पढ़ने का अवसर मिला।

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समीक्षा


समी. डाॅ. दिव्या प्रसाद



ले. डॉ श्यामबाबू शर्मा


भारतीय साहित्य का दर्शन है
‘स्वाधीनता आन्दोलन और साहित्य’


पुस्तकें खामोश रहकर भी मनुष्य को बोलने, बतियाने, समझने, समझाने और विचारने की शक्ति प्रदान करती हैं। कहा जा सकता है कि जब-जब कलम ने अपने देश की कमान संभाली है, तब-तब अपने लेखन से देश की परम्परा, संस्कृति, शौर्य, आस्था और इतिहास की विशेषता को वर्णित किया है। ऐसे में हमारा मन गर्वित हो उठता है। एक धरातल पर, एक विषय को कई रूपों में, कई स्तर पर वर्णित करना एक सफल चिंतक का परिचायक है। इसी संदर्भ में ‘स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य‘ पुस्तक में हमारे देश की स्वाधीनता के संघर्ष से लेकर स्वाधीनता प्राप्ति तक की यात्रा में विभिन्न भारतीय भाषाओं और साहित्यिक विधाओं की भूमिका को वर्णित किया गया है।

भारत के 1857 से लेकर 1947 में आजादी प्राप्त करने तक और फिर इससे आगे स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने तक का यह सफर आज आजादी पर्व के रूप में पूरे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। सभी जाति, धर्म, संस्कृति से जुड़े लोगों ने अपने-अपने तरीके से देश के प्रति अपने प्रेम को दर्शाया है। सरकार के साथ-साथ आम जनों का देश के प्रति प्रेम, भक्ति और गर्व का बोध ही हमें दुनिया के सभी देशों में विशेष बनाता है।

स्वाधीनता का अर्थ है हर ओर से स्वतन्त्र होना। मन, शरीर, आत्मा से स्वाधीनता हर प्राणी को प्रिय होती है। स्वाधीनता के सपने को साकार बनाने में हमारे देश ने कई वर्षों तक संघर्ष किया है। जब देश अंग्रेजी सत्ता का गुलाम था और उसके अत्याचारों से त्रस्त था, तब हर भारतीय के मन में एक ही इच्छा सर्वोपरि थी कि हमारा देश भारत पूरी तरह से आजाद हो। देश के अनुभवी राज नेताओं के साथ सभी वर्गों ने आजादी के पावन यज्ञ में होम किया है। आज जो प्रश्न सबसे अधिक प्रासंगिक है वह यह है कि-क्या हम अपनी आजादी का मूल्य समझते हैं? क्या हम अपनी आजादी के संघर्ष को महसूस करते हैं? भारत जैसे देश में जहां अनेकता में एकता इसकी कमजोरी नहीं मजबूती है वहां ऐसे प्रश्नों का उत्तर खोजना अति आवश्यक हो जाता है। 

स्वाधीनता के संघर्ष को समझना देश की संवेदना को समझना है। इस पावन भूमि के चरणों में तन, मन, आत्मा के साथ कर्म और अपने मन के भाव को शब्द रूपी पुष्पों के रूप में समर्पित करना हमारा धर्म बन जाता है। कोई घटना भले ही पुरानी हो जाए परंतु उसकी याद पुरानी नहीं होती। आजादी का अमृत-महोत्सव आजादी के संघर्ष और हमारे वीर सपूतों के शहीद हो जाने के शौर्य कथा पर पड़ गये धूल को साफ करने का काम है। आज यह अत्यंत आवश्यक है कि हम सिर्फ हमारे युवाओं को ही नहीं देश के प्रत्येक व्यक्ति को इस शौर्य गाथा से परिचित करवाएं। समय आ गया है अपने स्वाभिमान को देश के अस्तित्व के साथ जोड़ने का। आजादी के मूल्य को बताने और समझाने का। अपने वीर शहिदों के योगदान को सहेजने, समेटने और अमर बनाये रखने का।

इस पुस्तक में भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भारत की सभी भाषाओं की भूमिका को वर्णित किया गया है। कोई भी देश समाज अपनी भाषा से प्रभावित होता है। ऐसे में विभिन्न भाषाओं में स्वाधीनता के संघर्ष को व्याख्यायित करना सचमुच स्वयं में जमीनी स्तर का काम है। कभी-कभी साहित्य को अपने समाज, देश, धर्म की व्याख्या व्यापक पैमाने पर करने की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की ठीक-ठीक पूर्ति तभी हो सकती है जब हम बिना किसी भेद-भाव की दीवार खड़ी किए आपस में एक साथ विचार करें। सबकी आवाज में अपने देश की शौर्य पूर्ण ऐतिहासिक गाथा का गायन सुने। अपने देश के इतिहास से वार्ता करें। संवाद करें। विभिन्न दृष्टियों से स्वाधीनता आंदोलनों और तत्कालीन परिस्थितियों को जानने और बताने का यह प्रयास हमारे साहित्य की दूरदर्शिता परिचायक है। वन्देमातरम, मेरा रंग दे बसंती चोला, सरफरोशी की तमन्ना, जय हिन्द, जय भारती, पूर्ण स्वराज, सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा के भाव को पुनः जीवंत बनाने और भारतीयता के स्वर को मुखरित करने का काम इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।

कलम और तलवार यह दो अस्त्र ही किसी व्यक्ति, समाज और देश की रक्षा करने में सबसे अधिक सक्षम होते हैं। इतिहास गवाह है जब-जब देश पर संकट की स्थिति उत्पन्न हुई है तब-तब शस्त्र और शास्त्र दोनों ने ढाल बनकर इसकी रक्षा की है। ऐसे में कलम के पुजारियों की जिम्मेदारी अपने देश के प्रति और भी अधिक बढ़ जाती है। हमें जो बताया गया, पढ़ाया गया उन तथ्यों को खंगालना और निष्पक्षता से उनकी सत्यता को प्रमाणित करना हमारे विद्वानों का काम है। ऐसे में हमारा पथ प्रशस्त करने का काम ‘स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य‘ के माध्यम से सम्पादक डॉ श्यामबाबू शर्मा ने किया है। ग्रंथ में विभिन्न विषयों पर केंद्रित आलेखों को पढ़ने के बाद यह सहज ही समझ में आ जाता है कि आलेखों को सिर्फ लिखा ही नहीं गया है बल्कि अपने इतिहास, संवेदना, अनुभव की मोतियों को पिरोया भी गया है।

इस पुस्तक में संकलित सभी आलेख लब्धप्रतिष्ठित पद्मश्री और साहित्य अकादमी, भारत भारती सम्मानों से सम्मानित साहित्यकारों के भाषाई अनुशीलन का दस्तावेज हैं। ये सब एक से बढ़कर एक बहुमूल्य मोती हैं जिसमें भारत के ऐतिहासिक पक्षों को बड़ी ईमानदारी से व्याख्यायित किया गया है। तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं के महत्व को मुक्त कंठ से स्वीकार किया गया है। पुस्तक में संकलित आलेख इस बात को प्रमाणित करते हैं कि ‘‘भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन का प्रामाणिक वृत्तान्त जानने का एक प्रमुख स्रोत समकालीन समाचार-पत्र और पत्रिकाएं हैं।‘‘

यह हम सभी जानते हैं कि हमारे देश के स्वाधीनता संघर्ष में कलम ने साहित्य, अखबार और पत्रिकाओं के माध्यम से बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस बात को हमे नहीं भूलना चाहिए कि फिरंगियों के अत्याचारी शासन ने हर ओर से हमारे देश को कमजोर बनाने की कोशिश की, परन्तु यह हमारे देश के वीर सपूतों का साहस ही था जिसने उनके दमन नीति का मुंह तोड़ जवाब दिया। इस पुस्तक के आलेख इस सच को बखूबी बयां करते हैं- ‘‘स्वाधीनता संग्राम में सैकड़ों की संख्या में पत्र और पत्रकार फिरंगी हुकूमत के दमनचक्र का शिकार हुए। पर उनके बुलन्द हौसलों ने हार नहीं मानी। संघर्ष का मार्ग नहीं त्यागा।‘‘

इसके साथ ही हमारी भारतीय संस्कृति, परम्पराओं की भव्यता को सहेजने, समेटने और बताने का काम भी संपादक ने अपनी इस पुस्तक में आलेखों के माध्यम से किया है। भारतीय संस्कृति की विशेषता ही भारत को विशेष बनाता है। इस पुस्तक में संकलित आलेख इस बात की पुष्टि करते हैं- “भारतीयता का दर्शन समग्रता की चिन्तन दृष्टि पर आधारित है। इसमें हृदय प्रधान है, बुद्धि नहीं...। बुद्धि भावोद्रेक को संयमित करती है, सन्तुलन बनाती है यह उसकी यहाँ महती भूमिका है। विश्व बाजार, बाजारीकरण, वैश्वीकरण इसके उपकरण नहीं हो सकते।यह भावनाओं की नम भूमि है, यहाँ बन्धुत्व के पौधे लहलहाते हैं।‘‘

यहां संकलित आलेखों को पढ़ते हुए मन में भावों का ज्वार उमड़ने लगता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी घटनाएँ और बातें हमारी आँखों के सामने घटित हो रही हो। भाषा में चित्रात्मकता सहज ही उत्पन्न होने लगती है। कहीं कोई शब्द बनावटी और काल्पनिक नहीं दिखता। भाषा का सहज, सरल और प्रवाह-पूर्ण प्रयोग कहीं भी पाठकों को उबने नहीं देता। पाठकों के मन को बोझिल नहीं होने देता। ऐसा लगता है जैसे इन आलेखों की ध्वन्यात्मकता हमारे हृदय से सीधे वार्तालाप कर रही हो।

कई भाषाओं के माध्यम से हमारे स्वाधीनता के संघर्ष और स्वाधीनता को पाने के बाद का हर्ष इस पुस्तक में वर्णित किया गया है। कहना गलत न होगा कि यह पुस्तक हमारे देश की अनेकता में एकता की विशेषता से हम सभी से व्यापक स्तर पर परिचित करवाती है।

भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की ऐतिहासिक गाथा को बयाँ करने वाली पुस्तक ‘स्वाधीनता आंदोलन और साहित्य‘ इस बात के लिए प्रासंगिक है कि इसमें संग्रहित सारे आलेख अपने-अपने लहजे में हमारे देश की ऐतिहासिक परिस्थितियों को ईमानदारी से बताते हैं। एक-एक बातों को तार्किक ढंग से प्रस्तुत कर हर पहलू पर विचार करना इन आलेखों की विशेषता है। इन आलेखों को एक साथ जोड़ना और एक ही पुस्तक में संग्रहित करने का काम सचमुच प्रशंसनीय है।

आजादी के 75 वर्ष के इस राष्ट्र पर्व पर स्वाधीनता के संघर्ष और अपने देश को व्याख्यायित करने का महत्वपूर्ण काम ‘स्वाधीनता आन्दोलन और साहित्य‘ रूपी पुस्तक के माध्यम से किया गया है। यह पुस्तक हमें उम्मीद दिखाती है कि हमारे देश के विद्वानों की दृष्टि पारखी है। उनकी नजर अपने देश, इतिहास पर ही नहीं वर्तमान और आने वाले भविष्य के प्रति भी सजग है। देश की भक्ति किसी भी रूप में, किसी भी स्तर पर की जा सकती है। निस्वार्थ भाव से अपने कर्म को देश से जोड़कर देखना भी देश के प्रति प्रेम को करना है। इस पुस्तक के सम्पादक डॉ श्यामबाबू शर्मा ने अपने हृदय में छुपे राष्ट्र प्रेम को साकार किया है। निः संदेह यह पुस्तक हमारे देश के इतिहास को निष्पक्ष होकर बड़ी निडरता से बयां करने वाला दस्तावेज है।

कलम के सिपाहियों के साथ-साथ हर भारतीय को अपने देश के प्रति सदैव सजग रहने की जिम्मेदारी का बोध कराने में इस पुस्तक की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी यह विश्वास है।

पुस्तकः स्वाधीनता आन्दोलन और साहित्य / संपादकः डॉ श्यामबाबू शर्मा / प्रकाशकः अनुज्ञा बुक्स दिल्ली / 

समीक्षक डॉ. दिव्या प्रसाद, सुरेन्द्र नाथ इवनिंग कालेज, कोलकाता

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रिपोर्ट

सं. डॉ श्यामबाबू शर्मा

काव्य-संग्रह ‘फटा हलफनामा’ पर राष्ट्रीय परिचर्चा

मातृछाया साहित्यिक संस्था शिलांग की ओर से 14 अप्रैल 2023, शुक्रवार को डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की 132वीं जयंती पर डॉ. श्यामबाबू शर्मा द्वारा संपादित डॉ. रामप्रकाश के काव्य संग्रह ‘फटा हलफनामा‘ पर राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिसमें दिल्ली, मेघालय, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों ने अपनी सहभागिता दर्शाई।

डॉ.वेदप्रकाश अमिताभ की अध्यक्षता में आयोजित परिचर्चा में कोलकाता से डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी, अकोला से डॉ.कोमल श्रीवास, उन्नाव से कुमार दिनेश प्रियमन, खंडवा से डॉ. प्रतापराव कदम, अमरावती से भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ने भाग लिया। परिचर्चा की शुरुआत मातृछाया साहित्यिक संस्था के संस्थापक अध्यक्ष डॉ.श्यामबाबू शर्मा ने आयोजन की भूमिका के साथ की और कहा कि ‘आज समाज में विविध विसंगतियां हैं, सब में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़-सी लगी है। जल्दी से पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार पाने की लालसा है। हमारे मूल्य बहुत तेजी से पीछे छूटते जा रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग विशेषतः साहित्य जगत का उसूलों में तरमीमी कर लेना दुःखद है। ऐसे में डॉ. रामप्रकाश की कविताएं प्रासंगिक हैं। इनके यहां लिखने के लिए कविता नहीं लिखी जाती, बल्कि हालात उनसे लिखवा लेते हैं। विसंगतियों, विद्रूपीकरण, असमानताओं, गरीबी, मजलूमी पर गंगाजलि उठाने वालों के जो हलफनामे हैं, वे विसर्जित किए जा रहे हैं। तब ऐसी रचनाओं की प्रासंगिता बढ़ने लगती है। संग्रह की कविताएं इन सवालों से जूझते-टकराते राह भी दिखाती हैं। उनकी कविताएं महज कविताएं नहीं है बल्कि, ये यथार्थ तस्वीरें हैं। जिनमें श्रमिक, आम एवं निम्न वर्ग की पीड़ा एवं दर्द है।‘

इसके पश्चात् डॉ. रामप्रकाश ने अपने काव्य संग्रह फटा हलफनामा से कुछ प्रतिनिधि कविताएं सुनाकर सभी को शुभकामनाएं प्रेषित कीं। जिसके पश्चात् डॉ रेशमी पांडा मुखर्जी ने अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी में कहा कि-‘डॉ. रामप्रकाश की कविताओं में ओज है जिन्हें पढ़ने के बाद पाठक में जीवटता आ जाती है। डॉ.कोमल श्रीवास ने अपनी समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि-‘इन कविताओं में नूतन बिम्ब एवं नूतन परिकल्पनाओं के माध्मय से आम जनों की समस्याएं हमारे समक्ष रखी गई हैं। आज जब साहित्य विमर्शों में बँट रहा है ऐसे में फटा हलफनामा इन सभी विमर्शों का सम्मिश्रण है।’ उन्नाव के साहित्यकार कुमार दिनेश प्रियमन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-‘डॉ. रामप्रकाश लोक  जीवन के कवि है। उनका संग्रह व्यंजनापूर्ण है। फटा हलफनामा स्वयं अपने आप में आजादी के बाद का वह संकल्प पत्र है, जो फट चुका है। संग्रह सभ्यता और शिष्टता के अंतिम पायदान पर खड़े हुए आम आदमी की त्रासदी है वह पूरी की पूरी फटी हुई है। इसके प्रसिद्ध समीक्षक प्रतापराव कदम ने अपनी समीक्षा में शिल्प और कथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कविताओं में जो चरित्र आते हैं, उन्हें हम आम जीवन में चहलकदमी करते हुए देख सकते हैं। फटा हलफनामा इस बात का दस्तावेज है कि जो आम जनता, वो सब जानती है। उन्हीं की आवाज़ को कवि ने शब्द देने का कार्य किया है। साहित्यकार भगवान वैद्य प्रखर ने कविताओं की प्रासंगिकता को बताते हुए कहा कि -‘संग्रह में कवि का चिंतन हर वर्ग के प्रति गहन है लेकिन स्वतंत्रता के बाद राजनीति में किए गए वादे अब कहीं नहीं दिखाई देते। योजनाएं केवल कागज पर बनती हैं लेकिन लाभार्थियों तक पहुंच नहीं पाती हैं। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ ने कहा कि -‘ डॉ. रामप्रकाश की कविताएं विचार प्रधान हैं और जो वैचारिक उर्जा उनके भीतर है वह सकारात्मक है। वे निराश नहीं हैं बल्कि निश्चिंत हैं कि अन्याय का अंत होगा। डॉ.रामप्रकाश  की कविताएं समकालीन कविताओं में मुख्य धाराओं की कविताएं हैं। परिचर्चा में लेखकों, कवियों और विद्यार्थियों की भारी सहभागिता रही। परिचर्चा का संचालन एवं आभार प्रदर्शन डॉ. निशाली पंचगाम ने किया। प्रस्तुति, डॉ. निशाली पंचगाम, शिलाँग

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समीक्षा



समी. निशा चंद्रा, अहमदाबाद, मो. 9662095464

ले. नीलम कुलश्रेष्ठ, अहमदाबाद, मो. 9925534694

पारू के लिए काला गुलाब

क्या नाम ही काफी नहीं है, इस उपन्यास को पढ़ने की उत्सुकता जगाने के लिए। पहले तो काला गुलाब शब्द ने ही मुझे अपने जाल में बांध लिया। काला गुलाब ही क्यों? लाल, पीला या गुलाबी क्यों नहीं। क्या काला गुलाब इसलिए कि ये ऐसा रंग है जो बहुत ही कम देखने को मिलता है। या फिर इसलिए कि इसका एक अलग सम्मोहन होता है,या फिर इसलिए कि पारू काली थी।

उपन्यास हाथ में लिया और खोती चली गई अजंता की गुफाओं में, रंगों में, पेंटिंग में, गोरे रॉबर्ट में, काली पारू में।

‘अजंता की एक गुफा में हल्के नीम अंधेरे में ध्यान लगाए बैठी, विशाल बुद्ध की प्रतिमा के चरणों में ...........।‘

उपन्यास शुरू होता है,इस सुंदर पंक्ति से। जिसे पढ़ते पढ़ते मैंने पाया कि एक अंधेरी गुफा में विशाल बुद्ध की मूर्ति के सामने पारू ही नहीं, मेरा सूक्ष्म भी वहां है।

‘बुद्धम शरणं गच्छामि

धम्मं शरणं गच्छामि .....

के पवित्र स्वरों से पूरी गुफा का वातावरण एक अनोखी आभा से दीप्त हो उठा था। उपन्यास खत्म हुआ और मैं जब बाहर आई तो एक दूसरी ही दुनिया मुझे दिखाई दे रही थी। उपन्यास काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक पात्रों  की कहानी है इसलिए जब पढ़ने बैठी तो जिज्ञासा अपने चरम पर थी। क्या पारू और मेजर रॉबर्ट गिल मिल पाए होंगे या बिछड़ गए होंगे। क्या दोनों का प्रेम अपनी मंजिल पर पहुंचा या पहुंचने से पहले गिल लंदन लौट गए। उपन्यास पूरा हुआ और कितने ही दिनों तक रॉबर्ट गिल,अजंता की गुफाएं,रंग बनाती हुई पारू, चित्र बनाते हुए मेजर, काला गुलाब, दुभाषिया नईम, दिल दिमाग में घूमते रहे।

उपन्यास में प्रयोग हुई भाषा,तथ्य,कथ्य,शब्द व्यंजना,रोमांस और प्यार से भरा सागर, मेरे मन को विस्फारित,विमुग्ध, विस्मित करते रहे। 

इन पृष्ठों से गुजरते हुए मुझे जिंदगी की धड़कनें सुनाई देती रहीं।

कितना कुछ समेट लिया है नीलम जी ने इस उपन्यास में। रॉबर्ट गिल और पारू की प्रेम कथा तो है ही साथ ही,अंग्रेज साम्राज्य का अंकुश, अजंता की गुफाओं का इतिहास, ईस्ट इंडिया कंपनी कब और कैसे गठित हुई। कैसे एक छोटी सी काली मिर्च के कारण अंग्रेजी साम्राज्य की जड़ें भारत में फैली।लॉर्ड मैकाले के भाषण के अंश। बहुत कुछ ऐसा जिसे, जो लोग नहीं जानते वह भी जान जाएंगे......

नीलम जी ने ये उपन्यास लिखकर एक बेहद खूबसूरत प्रणय कथा से हमें अवगत कराया है। कुछ मामूली सी दिखने वाली  स्थितियों, प्रसंगों को भी नीलम जी के 

द्वारा अभिव्यक्त करने का तरीका पाठकों को अवश्य चमत्कृत कर देगा। मैं ये जानती हूं। अनुभूति, संवेदना, प्रणय इस उपन्यास के प्रमुख हस्ताक्षर हैं।

पर मेरा मन तो अभी भी काली खूबसूरत भीलनी और गोरे रॉबर्ट के आस पास ही भटक रहा है। जिन क्षणों में नीलम कुलश्रेष्ठ जी ये वास्तविक प्रेमकहानी लिख रहीं थीं,तब क्या वह स्वयं वहां उपस्थित थीं या कोई और उनकी लेखनी के द्वारा ये करिश्मा करके चला गया। मेजर गिल या फिर पारू ? इस निसर्ग सृजन के लिए लेखिका की। जितनी तारीफ करूं कम है। इस उपन्यास में एक ऐसा सम्मोहन है कि मुझे लगा जैसे इसे अभिमंत्रित कर दिया गया हो। बार बार रंगों से मन का कैनवास चित्रित हो उठता है।बार बार पन्नों से निकलकर किरदार मेरे आस पास चक्कर मारने लगते हैं। प्राकृतिक रूप से रंग बनाती पारू, गिल की मॉडल बनी हुई पारू। पारू को रोज एक काला गुलाब देते हुए रॉबर्ट गिल। रॉबर्ट के चैड़े सीने पर सिर रखकर सिसकती पारू।क्या मेरे मन में भी एक बसंत खिल रहा है।

इसे मैं नीलम जी की उपलब्धि ही कहूंगी, जिन्होंने दो प्रेमियों की कथा ऐसे लिखी कि शब्द शब्द रंगों से खिल उठे। कि काले गुलाब लाल गुलाब को मात दे उठे।दुभाषिया नईम, पारू की बहन सुरजी, गिल की पत्नी फ्रेंसिस। सब जैसे  जीवंत हो उठे हैं। बरसों वीरान पड़ी अजंता की गुफाएं इस प्यार के तूफान से आबाद हो गई। एक काली भील लड़की और गोरे रॉबर्ट के निस्वार्थ प्रेम की साक्षी रहीं। पारू रंग बनाती रही, तस्वीरें बनती रहीं। गिल का बंगला पेंटिंग्स से भरता गया। पारू गिल की बांहों में सिमटती रही और एक दिन ऐसा भी आ गया जब अपनी सारी कलाकृतियों के साथ गिल को लंदन वापस जाना पड़ा।

‘थोड़े दिनों बाद आप अपने देस चले जाएंगे।‘

पारू ने डबडबाई आंखों से कहा,

‘तुम मेरा इंतज़ार करोगी या धनी मुखिया की पत्नी बन जाओगी‘

क्या कहा पारू ने?

क्या मेजर गिल वापस भारत आए ?

क्या हुआ उन दुर्लभ पेंटिंग्स का ?

क्या पारू और गिल का मिलन हुआ या दोनों सदा के लिए बिछड़ गए ?

उपन्यास पढ़ना पड़ेगा....... ........

कुछ दिल को छू जाने वाली पंक्तियों के साथ पाठकों को छोड़े जा रही हूं।अब वही बताएंगे कि मैंने जो कहा वह कितना सत्य है।

‘उनका कलाकार मन अजंता की कलात्मकता से अचंभित था कि इस देश की जड़ों में संस्कृति कितनी गहरी है कि बरसों पूर्व लोग चित्र, मूर्तियां, भव्य इमारतें बना गए,जो आज भी वैसी की वैसी हैं...................।

पारू और सुरजी ने जैसे ही बंगले के कंपाउंड में कदम रखा तो पारू के पैर सहम कर वहीं जड़ हो गए।इतने सारे सुंदर फूलों के पौधे और इस पूरे वृत को घेरे काले गुलाब......................।

मशाल की पीली रोशनी में उसकी मादक आंखों में तैरते लाल डोरे गिल की आंखों से छिपे ना रह सके। क्या था उन आंखों में मादकता, आमंत्रण,समर्पण की अपरिमित चाह,या यहां से वहां तक खुला आकाश? अपनी बाहों में उन्होंने उस कोमल शरीर को घेर लिया।पारू का अपने हाथों से बनाया गया अनगढ़ जूड़ा खुल गया जुडे़ में लगा काला गुलाब दोनों के बीच महक रहा था।

नईम अपनी दार्शनिक बातों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था।क्यों गिल साहब और पारू की मोहब्बत की बातें बताते हुए उसकी आंखें छलछला आई हैं?

इनकी उम्र का फर्क नहीं पता ?

‘वो मुहब्बत ही क्या जो उम्र की देहलीज पर आकर ठिठक जाए ‘

अजंता की सारी पेंटिंग्स उसे मुस्कुरा कर आशीर्वाद देने लगी।जैसे समझ गई हों कि बौद्ध धर्म हो या कोई और।जीवन से पलायन मिथ्या है,सच है तो सिर्फ यही प्रेम।

पारू को एक अनजाना भय घेरने लगता,जब गिल साहब का काम खत्म हो जाएगा तब वह अपने देश चले जाएंगे, तब क्या करेगी वह, क्या.........................

जब तेरी समंदर आंखों में / इस शाम का सूरज डूबेगा / सुख सोएंगे घर दर वाले / और राही अपनी राह लेगा - फैज 

एक  ऐसा उपन्यास  जो उपन्यास नहीं पारु और रॉबर्ट गिल की प्रेम कहानी का जीता जागता दस्तावेज है. मैं चाहूँगी कि सभी को ये उपन्यास पढ़ना चाहिए। 

प्रकाशक-प्रलेक प्रकाशन / कीमत-249/-

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समीक्षा


समी. सुधा ओम ढींगरा,

ले. पंकज सुबीर


रूदादे-सफर- देहदान जैसे जटिल विषय का

बखूबी चित्रण


पंकज सुबीर एक गजलकार, संपादक, कथाकार और उपन्यासकार हैं। कई कहानियों के साथ-साथ पहले तीन उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं‘, ‘अकाल में उत्सव‘ और ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पर नाज था‘ बहुत चर्चित हुए हैं। पंकज सुबीर का नया उपन्यास ‘रूदादे-सफर‘ चैथा उपन्यास है। यह उपन्यास जिस भूमि पर लिखा और तराशा गया है, उसकी आधे हिस्से की सूखी और आधे हिस्से की गीली माटी है। दोनों हिस्सों को एक साथ लेकर चलना, जिससे कोई हिस्सा कमजोर न पड़े, लेखन कौशल का कमाल होता है। मजबूती से पकड़ कर उपन्यास पाठक को जब अन्त तक ले जाता है, पाठक भौंचक्का रह जाता है। अंत में सिहर उठता है। विज्ञान और चिकित्सा जैसे शुष्क विषय और रिश्ते तथा संबंधों जैसे भावुक और संवेगों से भरपूर विषय को लेकर उपन्यास रचा गया है। दो विपरीत विषयों का ताना-बाना बुन कर पंकज सुबीर ने पिता और पुत्री के रिश्ते पर एक खूबसूरत उपन्यास लिखा है। माँ और बेटी के रिश्ते पर तो काफी लिखा गया है, पर पिता और बेटी के रिश्ते पर बहुत कम लिखा गया है। पंकज सुबीर ने इस उपन्यास में बखूबी पिता-पुत्री की भावनाओं का चित्रण किया है। चिकित्सा विज्ञान में एनॉटमी पर भी खूब शोध से लिखा है। उपन्यास में लेखक ने एनॉटमी, रिश्तों और भावनाओं के ऐसे पैटर्न डाले हैं, कि सबने मिल कर उपन्यास को विशाल बना दिया है। चिकित्सा विज्ञान में एनॉटमी पर लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी साहित्य को नायाब तोहफा है।

पंकज सुबीर की किस्सागोई तो हर उपन्यास, हर कहानी में कमाल की होती है। इस उपन्यास में भी कहन शैली पाठक को बाँधे रखती है। कहन के साथ-साथ चित्रात्मक विवरण का उत्तम प्रयोग हुआ है, उसी का कमाल है कि एनाटॅमी जैसे शुष्क विषय को मनोभावों की चाशनी में ऐसा मिलाया है कि पता ही नहीं चलता कब भावनाओं में बहते-बहते एनॉटमी का ज्ञान भी मिल जाता है। यह उपन्यास जिस तरह के शुष्क विषय को केंद्र में लेकर आगे बढ़ता है, उसके लिए बहुत जरूरी था कि लेखक किस्सागोई और कहन शैली में ऐसी सरसता का उपयोग करे, जिससे पाठक को उस शुष्कता का एहसास ही नहीं हो। किस्सागोई किसी भी विषय को सरस बना देती है, पंकज सुबीर के पास किस्सागोई की कला है, जिसका उपयोग कर इस उपन्यास को रोचक और अंत तक उत्सुकता जगाए रखने वाली कृति पंकज सुबीर ने इसे बना दिया है।

डॉ. राम भार्गव और डॉ. अर्चना भार्गव के माध्यम से लेखक ने पिता-पुत्री के रिश्ते को बड़ी शिद्दत से अभिव्यक्त किया है। भावनाएँ रिश्ते बड़े सरल होते हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति इतनी सरल नहीं होती। इस उपन्यास का कथ्य भी सरल है, पिता पुत्री का रिश्ता। पर इसने कई जटिल समस्याओं को सुलझाया है और कठिन परिस्थितियों का मुकाबला किया है। हालाँकि पंकज सुबीर के बाकी उपन्यास जटिल कथ्य और उबड़-खाबड़ धरा पर खड़े हैं, जबकि ‘रूदादे-सफर‘ की धरती समतल है। घटनाओं की भरमार और उतार-चढ़ाव नहीं और न ही कई अन्तरकथाएँ चलती हैं। जो कथा व पात्र साथ चलते हैं, वे कथ्य की बुनावट और आकार देने में सहयोगी बनते हैं। ऐसा उपन्यास लिखना कठिन होता है, जिसमें दो चुनौती पूर्ण विषयों को सहजता से वर्णित किया जाए। पंकज सुबीर के पहले तीन उपन्यासों के विषय काफी जटिल थे। ‘रूदादे-सफर‘ रिश्तों की ठंडी बयार का झौंका लेकर आया है।

लेखक ने पिता-पुत्री के प्यार में माँ को अलग-थलग नहीं होने दिया। बल्कि माँ के गुस्से वाले स्वभाव के बावजूद बेटी अर्चना की नजरों में माँ की छवि डॉ. राम भार्गव बहुत गरिमामय बनाते हैं। माँ के बारे में बेटी को बताते हैं- ‘हम वही बनते हैं जो हमें हमारी जिंदगी शुरू के बीस-पच्चीस वर्षों में बनाती है, हमारा स्वभाव, हमारी आदतें,  हमारी पसंद-नापसंद, सब कुछ हमारे जीवन के शुरू के पच्चीस सालों में तय हो जाता है। तुम्हारी मम्मी वही है जो उनको जिंदगी ने बना दिया है। वे अपनी मर्जी से ऐसी नहीं हुई। जब भी कोई हमेशा कड़वा बोलता है, तो असल में वह हमको कड़वा नहीं बोल रहा होता है, जिंदगी ने उसके साथ जो अन्याय किया है, वह उस अन्याय के प्रति अपनी प्रतिक्रिया दे रहा होता है। वह अपने आप में नहीं होता है। हम यह समझ लेते हैं कि यह  कड़वाहट हमारे प्रति है, जबकि हम अगर ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है।‘

पुष्पा भार्गव यानी अर्चना की माँ के तेज स्वभाव, और कड़वा बोलने की कमी को कितनी खूबसूरती से डॉ.भार्गव ने अपनी बेटी के सामने रखा है। अक्सर लेखकों से ऐसी चूक हो जाती है कि एक का प्यार दर्शाते हुए दूसरा साथी खलनायक या खलनायिका बन जाता है। पंकज सुबीर ने रिश्तों में बहुत संतुलन रखा है। उपन्यास का प्रारंभ जहाँ से होता है, वहाँ ऐसा लगता है कि यह भी एक माता, पिता के अलगाव का दंश झेलने वाली बेटी की कहानी है, जिसमें सारी नकारात्मकता माँ के हिस्से में रखी जानी है। लेकिन जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे पाठक रिश्तों की नयी व्याख्याएँ, नई परिभाषाएँ सीखता है, समझता है। रिश्तों का समीकरण बिलकुल नए रूप में पाठक के सामने आता है। पिता और पुत्री के बीच जो कोमल रिश्ता है, एक-दूसरे को समझने की समझ से भरा जो संबंध है, उसके कारण माँ अलग-थलग नहीं हो जाती। उपन्यास में माँ का पात्र जो प्रारंभ में पाठक के मन में एक शंका पैदा करता है, वह अंत तक आते-आते पाठकों का प्रिय पात्र हो जाता है, बावजूद इसके कि यह पिता और पुत्री की कहानी है।

उपन्यास अकेलेपन की भी नए सिरे से व्याख्या करता है। वह अकेलापन जो अर्चना के जीवन में है। अर्चना का प्रेम परवान नहीं चढ़ता, और माँ की मृत्यु के बाद वह पिता के अकेलेपन की ख़ातिर शादी नहीं करवाती। संगीत का शौक उसके अकेलेपन को भरता है। लेखक के कहन कौशल ने उसका भी बहुत सुंदर चित्रण खींचा है- एकाकीपन अपने आप में उदास और भूरे रंग का होता है, उस पर इसमें अगर अतीत के पन्नों से रिस-रिसकर आ रही स्मृतियों का धूसर रंग भी मिल रहा हो तो यह उदासी बहुत बेचैन कर देने वाली हो जाती है। अर्चना को ही पता है कि पूरे समय गाने सुनकर घर में संगीत की उपस्थिति रखकर वह अपने आप को भ्रम में रखने का प्रयास कर रही है कि वह अकेली नहीं है। मगर जब आप अपने ही मन को भुलावे में रखने की कोशिश करते हैं, छलावा देने का प्रयास करते हैं तो आप शत प्रतिशत मामलों में असफल सिद्ध होते हैं। आपका मन हमेशा आपसे एक क़दम आगे ही चलता है। बस आपकी हर चाल समझता है। आप उसे भुलावा देते हैं और वह भुलावा खा जाने का भुलावा आपको देता है। मन...कितने गह्वर है इसके अंदर...  इसकी खलाएँ छिपी हुई है इसके अंदर। जब तक हम जिंदा रहते हैं तब तक विचारों के कितने सितारे टूट-टूट कर इन ख़लाओं में समाते हैं।‘ अकेलेनपन के ऐसे कई चित्र इस उपन्यास में पाठक को मिलते हैं। ये सारे चित्र इतनी कलात्मकता के साथ बनाए गए हैं, कि अकेलापन भी एक तरह की रूमानियत से भरा हुआ दिखाई देता है।

यह उपन्यास संवादों के माध्यम से कहानी को बहुत अच्छे से पाठक तक संप्रेषित करता है। संवाद इतनी सहज और बोलचाल की भाषा में लिखे गये हैं कि पाठक उपन्यास को पढ़ते समय अपने आप को उस बातचीत का हिस्सा समझने लगता है। पुष्पा जी का कैंसर के अंतिम दिनों में बेटी से संवाद बहुत भावुक कर देता है। जिस तरह पिता, बेटी को माँ की कमियों का कारण और उससे पैदा हुए उसके स्वभाव के बारे में बड़ी मोहब्बत से बताता है, उसी तरह माँ, अर्चना को उसके पिता के स्वभाव और असूलों के प्रति अपनी भावनाएँ बड़े प्यार और आदर से बताती है। बेटी अर्चना को अपने माँ-बाप के प्यार और एक दूसरे के प्रति उनके सम्मान का पता चलता है। लेखक ने बड़े ही सुंदर तरीके से अलग-अलग स्थलों पर इस तरह का चित्रण कर उपन्यास को उदासियों के बीच रोचक और रिश्तों को मर्यादित बना दिया है। डॉ. राम भार्गव और पुष्प भार्गव अस्सी के युग का दंपति है, उस समय का दाम्पत्य समर्पण, सम्मान और आदर पर टिका था, यही उनका प्रेम था। इजहार कम होता था, केयरिंग और शेयरिंग में 

अधिक छलकता था।

एक पुत्री के लिए पिता अक्सर ‘रोल मॉडल‘ होता है। पुत्री में पिता की छवि भी कई बार देखने को मिलती है। रुदादे-सफर में डॉ. अर्चना अपने पिता डॉ. राम भार्गव का ही रूप है। डॉ. अर्चना का अपने पिता के प्रति निश्छल भावनाओं को दर्शाता यह उपन्यास अपने साथ एनॉटमी और देहदान जैसे जटिल विषयों को भी उकेरता चलता है। एनाटॅमी एक रूखा विषय है और देहदान एक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी। दोनों अलग-अलग छोर हैं। रिश्तों और भावनाओं की बौछारों में इन दोनों छोरों को जिस तरह मिलाया और समाहित किया गया है, यह लेखक के वर्षों के अनुभव का कमाल है। देहदान को हमेशा संस्कारों से जोड़ कर अलग कर दिया जाता है, पर रुदादे-सफर में लेखक ने देहदान की उपयोगिता, उसके महत्त्व तथा उसकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी को जिस बखूबी से चित्रित किया है, उसकी तारीफ किये बिना नहीं रह सकती। लेखक ने संस्कारों के महत्त्व को भी कम नहीं होने दिया। उपन्यास में देहदान के कई सारे पहलुओं को उजागर किया गया है, जिनको पढ़ते समय पाठक को देहदान का महत्त्व समझ में आता है। लेकिन यह सरोकार उपन्यास पर कहीं भी थोपा हुआ नहीं लगता, या कहीं भी ऐसा नहीं महसूस होता कि देहदान की बात उपन्यास की धारा में शामिल नहीं है। मूल कथा में ही देहदान को इस तरह पिरोया गया है, कि पिता और पुत्री के भावानात्मक संबंधों पर लिखी गई इस कहानी में देहदान जैसा सरोकार भी बहुत ख़ामोशी से कहानी का हिस्सा बन जाता है। इस उपन्यास के एक पक्ष की निस्संकोच चर्चा करना चाहूँगी, एनॉटमी और केडावर (मृत व्यक्ति का शरीर ) का ज्ञान जिस सहजता से इसमें दिया गया है, वह बुद्धि और मन को भारी नहीं करता, बल्कि शारीरिक संरचना और शरीर विज्ञान की बहुत-सी जानकारियाँ आसानी से मिलती हैं।

मेडिकल व्यवसाय में बुरी तरह फैल रहे भ्रष्टाचार को भी इस उपन्यास में बड़े शोध के साथ बुना गया है। उल्लेखनीय है कि यह उपन्यास चिकित्सा शिक्षा की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है, मुख्य पात्र भी चिकित्सक हैं, उसके बाद भी यह उपन्यास चिकित्सा जगत् में इन दिनों व्याप्त सभी प्रकार के भ्रष्टाचार पर बात करता है। न केवल बात करता है बल्कि सप्रमाण पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को परत दर परत खोलता जाता है। साथ ही चिकित्सा व्यवसाय के आने वाले एक भयावह कल का भी चित्र पाठक के सामने प्रस्तुत करता है। यह चित्र पाठक की आँखें खोल देने वाला चित्र है।

उपन्यास में एनॉटमी, केडावर, फार्मेलीन, मानव अंग, विच्छेदन जैसी बातें शामिल हैं, जिनके कारण उपन्यास के बहुत रूखा हो जाने की संभावना थी। लेखक ने गीतों और गजलों की मृदुलता का उपयोग कर इस रूखेपन के ख़तरे को दूर किया है। हिन्दी फिल्म संगीत के स्वर्णिम दौर के कई गीत और कई गजलें पृष्ठभूमि में गूँजते हैं और कहानी का हिस्सा बनती जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे कठोर पानी को मृदु बनाने के लिए जिस प्रकार विभिन्न सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार इस उपन्यास में भी पंकज सुबीर ने गानों और गजलों का उपयोग किया है, उपन्यास में मृदुलता लाने के लिए। कुछ बेहद लोकप्रिय गजलों का बहुत सुन्दर तरीके से उपयोग उपन्यास को रुचिकर बनाता है। विशेषकर आबिदा परवीन द्वारा गाई गई कुछ गजलें तो जैसे कहानी का ही हिस्सा बन जाती हैं। बहुत पहले प्रसारित हुए दूरदर्शन के धारावाहिक ‘इसी बहाने‘ में चित्रा सिंह द्वारा गाई गई निदा फाजली की गजल के शे‘र पर इस उपन्यास का अंत होता है-  

अब जहाँ भी हैं वहीं तक लिखो रूदादे-सफर

हम तो निकले थे कहीं और ही जाने के लिए...

उपन्यास का शीर्षक भी इसी शे‘र से चुना गया है...

लेखन कुशलता का कमाल है, उपन्यास का अंत बड़ा अप्रत्याशित है। हालाँकि डॉ. अर्चना के बेहोश होकर गिरने के साथ-साथ पाठक भी बेचैन हो जाता है, पर यह अंत उपन्यास को बहुत ऊँचाई प्रदान कर गया है।

कई उपन्यास और कहानियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़कर जो महसूस किया जाता है, उन भावनाओं को शब्दों में अभिव्यक्त करना आसान नहीं होता, गुलजार के शब्दों में-सिर्फ एहसास है यह रूह से महसूस करो... बस यह उपन्यास भी रूह तक पहुँचता है, उसी को झंकृत करता है। बेहद संवेदनशील उपन्यास है।

पुस्तक - ‘रूदादे-सफर‘ उपन्यास / लेखक- पंकज सुबीर / प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर, मप्र 466001 / दूरभाष - 07562405545, ईमेल -shivna.prakashan@gmail.com / मूल्य - 300 रुपये/ पृष्ठ - 232 / प्रकाशन वर्ष - 2023 -संपर्क: सुधा ओम ढींगरा, यू.एस.ए., ईमेल:sudhadrishti@gmail.com

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समीक्षा


समी. हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ रांची-834002 (झारखण्ड), मो. 09162773121


ले. प्रणव प्रियदर्शी, राँची-834002 (झारखण्ड), मो. 09905576828, 07903009545


संभावनाओं की क्षितिज-स्पर्शी कृति: अछूत नहीं हूँ मैं


कविता में भाषा का कायिक सौंदर्य और चुम्बकीय शब्द-संयोजन का होना ही उसकी श्रेष्ठता का प्रतिमान नहीं होता और न ही ऐन्द्रिक बोध को उदीप्त करने मात्र से उसकी उदात्तता सिद्ध होती है। क्योंकि यह कवि की अनुभूति का पहला स्तर होता है। उसके बाद कवि अपने चित्त के स्तर पर भावानुभूति की सृष्टि करता है। उस भावानुभूति में युगबोध की संश्लिष्टि स्वतः होने लगती है। कविता का शिल्प और कथ्य आकार लेने लगते हैं। कवि-मेधा भाषा के कलात्मक साँचे में सुचिन्तित कथ्य को ढालती है। उसके सुचिन्तित कथ्य में उसका मन तो अभिव्यक्त होता ही है, साथ ही वर्तमान समाज की संवेदनशीलता के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति भी होती है। दार्शनिक चित्त के उदीयमान कवि प्रणव प्रियदर्शी ने ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘, में कई-कई कसमसाते द्वन्द्वात्मक प्रश्न खड़े किए हैं। एक ऐसा प्रश्न जो शाश्वत सत्य, गतिशील समग्रता और चिरन्तन सांस्कृतिक धारा का संवाहक रहा है और रहेगा। अस्तित्व के तनाव से धड़कता और बिम्बों में लिपटा कवि का प्रश्न है-

‘‘ओस से भी ज्यादा कोमल

आँसू से भी  ज्यादा खामोश

अपने प्रेम को कहाँ रखूँ‘‘

इस प्रश्न में कवि की अन्तस्थ प्राणचेतना कंपकँपा रही है। प्रेम अन्तःशिराओं में प्रवाहित रसायन है। प्रेम चक्रवर्ती जीवनेच्छा है। प्रेम दिग्मूलक कविताओं का स्थापत्य है। प्रेम अस्तित्व और चेतना, भौतिक प्रत्ययात्मक सह सम्बन्ध और विश्वबोध की कूंजी है। ऐसी स्थिति में कवि प्रणव प्रियदर्शी का यह प्रश्न कि-‘अपने प्रेम को कहाँ रखूँ‘, मनुष्यता के उचित स्थान की बेचैनी का संकेतक है। यह तथ्य बड़ी सावधानी से कवि-कृति ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘, के रचनालोक में, रचनाओं के भाषालोक में और भाषा की मनोसंस्कृति में उतरने पर स्पष्ट होता है।

‘‘मैं अपनी कोमलता को/जिंदा रखने के लिए/ कुछ करने लगता हूँ/सच कहूँ तो/कविता लिखने लगता हूँ।‘‘

कविता एक अद्वितीय भाषा है, जो अपनी सघनता, संकेन्द्रण और संक्षिप्तता में मानवीय प्रेम-संवेदना के सूक्ष्मतम स्पन्दनों को पकड़ कर मनुष्य के आन्तरिक विरोधाभासों की चट्टानों को तोड़कर सहानुभूति और सम्वेदना की निर्मल  धारा प्रवाहित करती है। कवि प्रणव प्रियदर्शी द्वारा रचित कृति-‘अछूत नहीं हूँ मैं‘, की रचनाएँ आदमी से आदमी की पहचान कराती हैं, युग सत्य का बिम्ब उकेरती हैं।

प्रेम का अदृश्य फूल / इतने स्थूल काँटों से गूँथा रहा/ कि प्रेम को जब भी / याद करना चाहा / काँटे ही याद आते रहे / पर प्रेम का वह कतरा-सा क्षण/सुख का मद्धम-सा अहसास/यादों का कोमलतम स्पर्श/मेरे इंतजार में हैं अब भी/कि उनके पास लौटूँ/और कह दूँ/कि तुम्हारी ही सुगन्ध से/सुरभित है हमारा/बची हैं कविताएँ/बची हैं अभी कई संभावनाएँ।

कवि की बची हुई सम्भावनाओं में समवेत लोक चेतना और सामूहिक संवेग मुखर हुए हैं। पूरी कृति में युग-सापेक्षता, परिवेश-बोध का नवीन शब्द-शिल्प के द्वारा आनुभूतिक तथा रूपात्मक मानचित्र रचा गया है। कवि प्रणव प्रियदर्शी की दृष्टि जीवन से जुड़ी है और जीवन को प्रेरक बल मान कर सृजन की आकांक्षा एवं निरंतरता को पाने का रास्ता खोजती है। विचार और संवेदना को संश्लिष्ट मानकर ही जीवन में आत्मीयता की ऊष्मा और परस्पर सहभागिता की स्निग्धता की अनुभूति की जा सकती है।

ये ठहरी हुई बेकली/नीरस दरख्तों से रिसते हुए/जीवन के कुछ सिंचित भाव लिये/निकलती है रोज सफर पर/बेसुध अरमानों में गुम होकर/सो पाती है किसी तरह।

मनुष्यता मनुष्य की सहज और अत्यन्त कोमल सम्वेदना है। मानवीय अनुभूति का संवेदनात्मक आरेखन कवि और कविता की संजीदगी की पहचान होती है। यह सत्य है कि  कवि यदि अपनी कविताओं के माध्यम से अपने अनुभूत विचारों को जन-मानस तक संप्रेषित करना चाहता है तो सहृदयता और सम्वेदना का आश्रय उसे लेना पड़ता है। रचनाकार होने के नाते और रचनाधर्मिता का अभिन्न हिस्सा होने के नाते व्यक्ति और समाज के अन्तर्द्वन्द्वों के प्रति सम्वेदनशील होना रचनाशीलता का हिस्सा होता है। कवि अपने अकेलेपन में भी-एक व्यक्ति के रूप में समाज का ही अभिन्न अंग होता है। कविता का क्षेत्र भावनाओं का क्षेत्र है। कवि की बौद्धिकता और सामाजिकता को सम्वेदना ही अमरत्व प्रदान करती है। ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘ में कवि ने अपनी सम्वेदना को बेतार के संग्राहक की तरह अपने समय के वायुमण्डल में मंडराते विचार के अणुओं को व्यक्त किया है-

सबसे भयानक होती है/संवेदना की मौत/संवेदना जीवित रहे तो/कई सपने फिर से पंख पसार लेते हैं/लेकिन लोग सपनों के मरते ही/संवेदना को भी मार देते हैं।

मैं जीना चाहता हूँ/इसलिए चक्रव्यूह तोड़ना चाहता हूँ/मैं जीना चाहता हूँ/इसलिए भी कि संवेदना को/मरने से बचा सकूँ।

जिस समाज में मानवीय सम्वेदना जीवन के केन्द्र में होगी, वहाँ वैचारिक क्षितिज को भी सहारा मिलता है। सम्वेदना ही है, जहाँ जीवन की हरीतिमा के ऊपर मंगल-कुसुम की वर्षा होती है। छोटे-छोटे पंख पसारे, हवा के सहारे पक्षी अपने नीड़ की दिशा में उड़ान भरते हैं और बरसाती आँखों वाले बादल जहाँ करुणा की वर्षा करते हैं-अनन्त की लहरें भी जहाँ किनारा पा जाती हैं। सम्वेदना के प्रभाव से ही कवि?रचनाकार जीवन में उत्पन्न त्रासदियों, विरोधाभासों और विसंगतियों की ओर उँगली उठाता है तथा उनको नये चित्रों, नई मूत्तियों की मर्म छवियों में उकेरता है। जड़ता में भी जीवन का संचार करता है। ऐसी समर्थ सम्वेदना विवश करती है प्रश्न पूछने के लिए-इस जीवन से परेशान होकर/मेरे युवा पड़ोसी ने चुपचाप/आत्महत्या कर ली है/उसने किसी से कुछ नहीं पूछा/किसी ने उससे भी कुछ नहीं पूछा/हो सकता है आपने यह सुना हो/लेकिन मैंने कभी नहीं सुना है कि/कोई पशु-पक्षी आत्महत्या करते हैं।

इन मर्मवेधी पंक्तियों के द्वारा कवि ने नित्य घटने वाले अन्तर्निहित वर्तमानकालिक यथार्थ का अत्यन्त बारीक चित्र उपस्थित किया है। साथ ही समाज के और वर्तमान के मनुष्य के नैतिक रंगमंच की यवनिका को उठा दिया है। यही उचित अवसर है यह याद दिला देने का कि कविता मानव-मूल्यों का सम्यक कल्प है, जो सामाजिक चेतना का परिष्कार करती हुई मानवीयता के उत्थान-पतन, रूपान्तरण और विकास में योगदान करती है।

युग और समय की परिस्थितयाँ काव्यर्ढना के लिए कवि-चेतना को उदीप्त करती हैं। देशगत, समाजगत, व्यक्तिगत तथा समयगत प्रभाव कवि के कथ्य का विन्यास करते हैं। कथ्य और तथ्य की भंगिमाएँ भी व्यक्ति, समूह और समय के साथ संचरण करती हैं। इस संदर्भ में कविता समग्र मानवीय बोध का मूल्यवान, सार्थक और अनिवार्य रूप होती है। इसे दूसरे रूप में कहना हो तो कहा जा सकता है कि कविता कवि-मानस की बौद्धिक एवं वैज्ञानिक प्रक्रिया के समानान्तर चलनेवाली सम्वेदनात्मक और अनिवार्य प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया की परिधि में कवि का वैज्ञानिक चित्त आवर्त्तक भूमिका में उपस्थित होकर जीवन का मानचित्र निर्मित करता है। इसीलिए वह अनुभूत वर्तमान समय को निर्विघ्न फलते-फूलते देखने की आकांक्षा करता है। ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘ का स्वर यही है-

मैं चाहता हूँ/समय के हाथों में रखूँ/एक बीज/और उससे कई पौधे निकल आएँ/ मैं चाहता हूँ/जीवन के हाथों में रखूँ/एक पौधा/और उस पर कई फूल खिल आएँ।

कवि प्रणव प्रियदर्शी का विज्ञानकोषीय मन विचलित हो उठता है फिसलते समय को लेकर। दिक्-काल जिसकी सीमा अनिश्चित है और जो पूर्णतः आत्मनिर्भर है-वह और उसकी गति के भी कुछ नियंत्रक सिद्धांत होंगे-वह फिसलता क्यों है? समय के भागते अश्व का नियमन, ब्रह्मांडीय डोरों की लगाम हाथ से छूट-छूट क्यों जाती है?-

मेरे हाथ से फिसल जाता है वक्त/पानी की तरह/वक्त का पानी/रुकने का नाम नहीं लेता/फिर भी मुझे/स्थूल जरूरतों के चैकर में ही उलझाकर/बेदम कर दिया जाता है/जैसे पत्थरों की भीड़ में/नदी खत्म करने की साजिश/सरपट भागता वक्त...

कवि की यह चिन्तन प्रणाली फिसलते-सरकते समय का सवाक् चित्र उपस्थित करती है। लगता है वह अपने और समय के साथ सहभागिता का आकांक्षी है। उसकी यह चक्करदार जिज्ञासा विज्ञानशीलता को रेखांकित करती है।

कविता जीवन और जगत के गतिशील सौन्दर्य की भावात्मक अभिव्यक्ति है। इसीलिए उसमें जहाँ एक ओर जीवन की तमाम आकांक्षाएँ, सभी अनुभूतियाँ, मूर्त-अमूर्त चित्र एवं परिघटनाएँ अभिव्यक्त होती हैं, वहीं दूसरी ओर जगत के सारे द्वन्द्व और दृश्य भी प्रत्यक्ष बिम्बित होते हैं। सुख-दुख, हर्ष-विषाद, राग-विराग जैसे समस्त 

द्वन्द्व-समष्टि ही जीवन है। इस जीवन और कविता का सामासिक सम्बन्ध है। कहना उपयुक्त होगा कि ऐसे विवर्ती जीवन की व्याख्या है-सूक्ष्मतम कारिका है कविता। ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘ में ‘शिकार‘, ‘अन्धकार में उतरना ही होगा‘, ‘आस्था‘, ‘होली का रंग‘, ‘आग सेंकता घर‘, ‘शनिचर‘, ‘घर-बाहर‘, ‘बेबसी में घर‘, ‘चैंका हुआ रहता है मन‘, ‘कविता का आकाश‘, ‘नदी से पूछना‘, ‘इस जीवन शैली को...‘ ‘ठहरी हुई बेकली‘, ‘वक्त‘, ‘साजिश में पूरी दुनिया‘, ‘युद्ध और आदमी‘, ‘मुट्ठी भर भविष्य दे दो मुझे‘, ‘साजिश के विरुद्ध‘, ‘आनेवाली पीढ़ियाँ‘ और तमाम कविताएँ हैं। विशेषता यह है कि कवि प्रणव प्रियदर्शी ने इस कृति और कविताओं के द्वारा अपनी कारयित्रि और भावयित्रि प्रतिभा का निदर्शन उपनीत किया है। कवि प्रणव प्रियदर्शी ने ‘अछूत नहीं हूँ मैं‘ के रूप में जीवन का प्रतीक रचा है-अपने चिन्तन के निष्कर्ष काय साथ ही अनेक प्रकट और प्रच्छन्न जीवन की युग की विद्रूपताओं, विरोधाभासों और सामाजिक त्रासदियों का चकित कर देने वाले शब्द-संयोजनों के द्वारा बिम्ब उकेरा है। मैं इनकी उर्ध्वरेता प्रज्ञा की मंगलकामना करता हूँ।






कविता संग्रह: अछूत नहीं हूँ मैं/ कवि: प्रणव प्रियदर्शी/प्रकाशक: रुद्रादित्य प्रकाशन, प्रयागराज/पृष्ठ संख्या: 222/मूल्य: 300 रुपए

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समीक्षा



समी. श्रीमती विजया गुप्ता, मुजफ्फरनर, उत्तर प्रदेश, मो. 9457689457


ले. श्रीमती मंजु महिमा, अहमदाबाद, मो. 9925220177


काव्य व्यंजन: कवयित्री मंजु महिमा

साहित्य और कला में नये नये प्रयोग की, नये अनुभवों की, नवीन कल्पनाओं की अपार संभावनाएं होती हैं, जिनसे रचनाकार की प्रतिभा तो सामने आती ही है,साथ ही वे दर्शकों ध्पाठकों को भी चमत्कृत कर देती हैं। कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे अहमदाबाद की वरिष्ठ और प्रतिभा शाली साहित्यकार मंजु महिमा भटनागर जी की नव प्रकाशित पुस्तक ’काव्य व्यंजन’ के साथ हुआ। इस पुस्तक से मेरा परिचय गुजरात की वरिष्ठ नागरिक काव्य मंच की अहमदाबाद की इकाई में कुछ माह पूर्व हुआ। सर्व प्रथम इस काव्य संकलन के शीर्षक ने मेरा ध्यान आकर्षित किया फिर पढ़ने की उत्सुकता जाग्रत होने पर मैंने इसे।उं्रवद से मंगवाया और एक ही प्रवाह में पढ़ गयी, निश्चय ही इसकी रोचकता ने मुझे  बांधे रखा।

एक महिला चाहे जितनी भी बड़ी साहित्यकार, चित्रकार अथवा ऊंचे पद पर हो, उसका रसोई से जुडा़व रहता ही है, पेट की भूख रसोई में बने भोज्य पदार्थो से ही संतुष्ट होती है और उस पर भी लजीज व्यंजन, उनकी तो बात ही क्या? यही कारण है कि मंजु महिमा जी के काव्य व्यंजन की पहली रचना ‘‘भूख‘‘ पर ही आधारित है।

 लघु आकार की ये रचनाएं जहां संबंधित चित्र होने से उस खाद्य पदार्थ की आकृति और स्वाद को साकार कर देती हैं वहीं उसमें निहित भाव भी मन को प्रभावित करते हैं जैसे ‘‘रोटी‘‘ शीर्षक की कविता! रोटी को बनाने के लिये विभिन्न सामग्री की आवश्यकता होती है लेकिन वह संघर्षों की अग्नि में तप कर ही रोटी का रूप लेती है और इसी प्रकार एक कविता का भी जन्म होता है! बहुत छोटे आकार की रचना ‘‘अचार‘‘ है जो बेमजा जिन्दगी को चटपटे तीखे खट्टे -मीठे अचार की तरह अहसासों के स्वाद से जायकेदार बना देती है। जिन्दगी की तुलना सिल बट्टे से पीसी गयी चटनी से करना, प्याज की उतरती हुई परतों में दर्द का समावेश आंसू के रूप में, बीते हुए पलों की अभिव्यक्ति गर्म तेल में छिटके हुए राई के दानों के रूप में और आलू को एक औरत के रूप में देखनाः जैसे आलू सब सब्जियों के साथ मिल जाता है उसी प्रकार एक महिला भी हर परिस्थिति में अपना सामंजस्य स्थापित कर लेती है, बहुत ही सुंदर कल्पना है।

 बहुत सही कहा, आधुनिक लड़कियां हरी मिर्च की तरह ही तीखी, चरपरी, सी सी करती हुई सी तो हैं। पालक पनीर, भरवां करेला जहां मुंह में वही स्वाद ला देते हैं तो उनके निहितार्थ किसी और ही भाव को इंगित करते हैं।‘‘ भरते के बैंगन ‘‘की उपमा अवसर वादी राज नेता से किये जाने से अधिक सार्थक और क्या हो सकती है। ‘‘अमिया‘‘ शोषिता ( नारी विमर्श ), दही बड़ा, मेंगो आइसक्रीम: सूरज गुलाब जामुन, रस गुल्ला आदि रचनाएं अपने भीतर स्वाद के साथ ही गहन अर्थ समेटे हुए हैं। ‘‘खोपड़ी‘‘ रूपी हांडी में विचार रूपी पुलाव का पकना, प्यार की चाशनी में डूबी जलेबी जैसी टेढ़ी मेढ़ी जिन्दगी, गुंजिया (चाशनी में पगी) में संस्कार वान मां की कल्पना, मायके की याद दिलाता ‘‘घेवर‘‘, बहुत कष्टों से पापड़ का आकार लेती जिन्दगी तो दूसरी ओर कवयित्री की दृष्टि में जिन्दगी ‘‘ भोजन का थाल‘‘ है जो खट्टे मीठे, कड़वे, कसैले, नमकीन चटपटे जायके से सजा है।

संभवतः सबसे छोटे आकार की रचना ‘‘सैंडविच‘‘ गृहणी ‘‘ है। सच ही तो है कि एक महिला अपनी गृहस्थी में पति और बच्चों की फर्माइश पूरी करते करते सैंडविच ही तो है, उसकी अपनी चाहत कुछ नहीं! ‘‘पड़ोसिनें फूली फूली कचैरी जैसी चटपटी खबरों से भरी, गोल गप्पे माया मोह जैसे, पाव भाजी परिवार सी। 

 अंत में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली दो रचनाओं का जिक्र अवश्य करूंगी जिनके अंतर्निहित भाव ने कुछ सोचने को विवश किया। शरीर की चाय के सकोरे से अच्छी तुलना और क्या हो सकती है? हमारा शरीर भी तो मिट्टी के कुल्हड़ के समान ही तो है जिसमें पी गयी गर्म गर्म सौंधी महकती चाय जैसे पीने वाले को लुभाती है वैसे ही शरीर भी है जब तक गर्म है तो ठीक, ठंडा होते ही कुल्हड़ की तरह फेंक दिया जाता है मिट्टी में ही मिलने को!

 सबसे अधिक गहन भाव वाली रचना है ’खीर: अमृत महोत्सव’ जिसमें एक स्वादिष्ट खीर बनाने की रेसिपी तो है ही, महत्व पूर्ण यह है कि वह किन भावों, विचारों के साथ पकाई गयी है। उसमें मौलिक विचारों का दूध है तो अनुभवों के चावल हैं, ठोस चिंतन के बादाम हैं तो देश प्रेम की चीनी की मिठास है, कल्पना के काजू, कर्म का केसर, मेहनत की इलायची से महकाया है। भारत की पच्छहतरवीं स्वतंत्रता की भांति सुदीर्घ अवधि में बन कर तैयार हुई है यह खीर। 

रसोई और जीवन से मौलिक बिंब चुनकर उनको गहन चिंतन, दर्शन और आध्यात्मिकता का रुप एक स्वादिष्ट व्यंजन के माध्यम से परोसना सच में ही साहित्य में बिलकुल अनूठा प्रयोग है जिसका पाठकों के ऊपर दोहरा प्रभाव पड़ेगा, प्रथम दृष्ट्या जिह्वा का स्वाद तो दूसरी ओर विचारों का मंथन, आकलन। 

 इस अभिनव प्रयोग के द्वारा साहित्य को ’काव्य व्यंजन’ के रूप में अनुपम भेंट देने के लिये मंजु महिमा जी तो बधाई की पात्र हैं ही, साथ ही इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाली स्मिता ध्रुव जी को भी इतने सुंदर सटीक अनुवाद के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें! साहित्य जगत में इस सर्वथा नवीन परिकल्पना वाले ’काव्य व्यंजन’ का भरपूर स्वागत होगा इसी मंगल कामना के साथ..............

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समीक्षा


सारिका आशुतोष मूंदड़ा, 9225527666


काव्य संग्रह: मुझमें मीठा है तू 


अगर कुछ मीठा पढने का मन हो तो पढ़िये मायामृग जी का- ‘मुझमे मीठा तू है‘ , 77 कविताओं का खूबसूरत काव्य संग्रह वाकई  बहुत मीठा है।  कृतज्ञता, दार्शनिकता के भावों के  रस से अंतरमन सिक्त हो जायेगा। वर्तमान समय मे कृतज्ञता के उदगार विलुप्त प्रायः हो चले हैं। प्रत्येक परिस्थिति के लिए समाज दोषी है , तो रोष ही रोष है ...अगर ऐसे  समय मे अपने परिवेश , प्रकृति रूपी ईश्वर के प्रति उपकृत दृष्टि से सराबोर पुस्तक पढने को मिले तो जिस आनन्द का अनुभव हो तो उसका तो कहना ही क्या ...

कई वर्षों पूर्व अज्ञेय ने स्व अस्तित्ववाद को वाणी प्रदान की और  उसके महत्व को प्रतिपादित किया था ...क्या अस्तित्व की बात सिर्फ अधिकारों के लिए  है , क्या कर्तव्य का बोध हम विस्मृत कर चुके हैं , अगर  नहीं तो क्या हमने कभी टटोला स्वयं को .... 

एक बार झांक लो भीतर /तुम्हारे पास नहीं है इस कमरे की चाबी कोई जवाब आये तो भीतर से सुनना कभी सोचा इस प्रकृति को, इसके प्रति अपने कृतघ्नता पूर्ण व्यवहार को ....क्या कभी क्षमा मांगी ? तो मांगिये  कवि के साथ  क्योंकि क्षमा मांगना राहत देगा। वही चिर-परिचित उपमान मगर अर्थ का एक नया विस्तार ...ऐसा प्रतीत होता है वक्त की सीढियां  चढ कर अब व्यक्ति फुरसत  से नाप रहा है अपना हर कदम,अपनी हर सोच ...तभी तो कभी कह उठते हैं ‘क्षमाप्रार्थी हूँ मैं ‘‘ और कभी  खंगालते हैं अपने बड़े होने के दम्भ  को ....कविता ‘मैं बड़ा ‘ में  तो अहम की पीडा से त्रस्त मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिए मानो चिंतन युक्त औषधि ही दे दी है ...

मुझसे तो बड़े हैं पेड़/मै तप जाता हूँ जरा सी आँच मे /उनमें बढती जाती है छांव धूप के तेज होने के साथ /भीतर गहरी ठंडक होती तो हो सकता था छांव भर जीना 

........../ बड़ा होने के लिए होना होता है ....पेड़,/ आसमान  ....धरती और नदी ...

कोई भी  लेखन तभी सार्थक होता है जब पाठक उससे जुड सके और  इस काव्य संग्रह मे कितनी ही बार ये प्रतीत होता है कि स्व मूल्यांकन करने जो व्यक्ति बैठा है वो हम स्वयम् हैं , एक  सुनी हुई मगर उपेक्षित भाषा की ओर आप ध्यान खींचते हैं और शब्दावली तो बहुत ही सहज....मगर कब प्रकृति की भाषा आशीष देती हुई और राह सम्मुख रखते हुए गंभीर अर्थ धरने लगती है, भान नहीं होता।

भाषा हमेशा सुनी और पढ़ी  नहीं जाती/छू कर कहा ,उस छोटे पौधे ने /यह स्पर्श याद रखना ..हरे रहना सदा हर सहमति एक संभावना है /संभावना से  भरी है धरती की भाषा /झुककर छूने से समझ आती है .....

सीमाओं मे बांधना या बंधना अक्सर नकारात्मक प्रतीत होता है ,मगर मनुष्य की सीमायें याद दिलाती एक कविता की पंक्तियां सकारात्मकता की ओर ले जाती हैं। अपनी सीमाओं, हदों को पहचान कर जो परिधि निर्मित होती है ,वो हमें असीम का दर्शन करने के लिए दृष्टि प्रदान करती है।

आसमान भर फैला था मेरा गर्व ऊँचाईयों को छूने का /मैने खंगाले सभी मुहावरे/जिनमे आसमान से  ऊँचा होने का अर्थ था /पर आँख की हद से आगे नहीं जा सकता मेरा आकाश .. 

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‘अँखिया ई धन्य बा’ का नई दिल्ली में भव्य विमोचन 

दिलवालों की नगरी, दिल्ली के मान और स्नेह से मन भीगा.

18 दिसम्बर 2022 को भोजपुरी साहित्य के शेक्सपियर श्री भिखारी ठाकुर जी की 135 वीं जयंती समारोह में अहमदाबाद निवासी हिन्दी- भोजपुरी रचनाकार, विनीता ए कुमार की भोजपुरी अनुवादित पुस्तक ’अँखिया ई 

धन्य बा’ का विमोचन सम्पन्न हुआ। इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन विश्व भोजपुरी सम्मेलन व दिल्ली भोजपुरी समाज के संयुक्त तत्वावधान में एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया, ऑफिसर्स इंस्टिट्यूट (AAIOI), नई दिल्ली के सम्मेलन कक्ष में किया गया । समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में सांसद, अभिनेता एवं गायक श्री मनोज तिवारी जी, पूर्व सांसद श्री महाबल मिश्रा जी, दिल्ली बार काउंसिल के चेयरमैन श्री मुरारी तिवारी जी, श्री विनयमणी त्रिपाठी जी, अध्यक्ष विश्व भोजपुरी सम्मेलन, दिल्ली ईकाई, श्री प्रभाकर सिंह जी एवं श्री अजित दुबे जी उपस्थित रहें। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री मनोज तिवारी जी ने अपने उद्बोधन में विनीता कुमार के अनुवाद की भूरी-भूरी प्रशंसा की व भाषा के प्रति उनकी निष्ठा को सराहा। उपस्थित अन्य सभी अतिथियों ने ‘अँखिया ई धन्य बा’ को लेखिका के अपने जड़ से जुड़े होने एवम् भाषा के प्रति उनके प्रेम का जीता जागता उदाहरण माना।

पुस्तक के बारे में लिखना हमारे लिए कठिन था क्योंकि पुस्तक हमारे पास उपलब्ध नहीं थी जो आप ने भूमिका भेजी थी वह पर्याप्त नहीं थी।  कृपया पुस्तक भेजे ताकि हम समीक्षा करवा कर प्रकाशिक कर सकें।

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आलेख


श्री अनुज अग्रवाल, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, मो. 09811424443


सामान्य जीवन का अंतिम दशक

बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि अपना काम करके जा चुकी है और किसान व फल-सब्जी उत्पादक बस चुपचाप बर्बादी की दास्ताँ देख रहा है। हर दो-तीन महीने में बदलने वाले मौसम ने पिछले तीन वर्षों में इतनी करवटें ली है जिसका कोई पैटर्न ही नहीं नजर आ रहा। मौसम के बदलाव अब हर सप्ताह हो जाते हैं। लोग जाड़ा, गर्मी और बरसात सब एक साथ झेल रहे हैं। मगर मौसम विभाग अभी भी पुराने मॉडल पर भविष्यवाणी कर अपनी बेइज्जती करवाने से नहीं चूकता। जीवाश्म ईंधनों के बढ़ते अतिशय प्रयोग व पेट्रोलियम व रासायनिक पदार्थों से बने उत्पाद (प्लास्टिक, सिंथेटिक कपड़े, रासायनिक खाद, कीटनाशक आदि) से निकली मीथेन व कार्बन डाइऑक्साइड आदि गैसों  ने धरती के हज़ारों साल से बने बनाए संतुलन को बिगाड़ दिया है और पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री से लेकर 2.5 डिग्री तक बढ़ने के करीब है। तीस हजार बर्षों से मानव एक स्थिर वायुमंडल में जी रहा था जिसको पिछले तीन दशकों के विकास ने पूरी तरह बिखेर दिया है। शायद यह आखिरी दशक हो जिसको हम जैसे तैसे ठीक से जी भी पाएँ। हालाँकि इसकी शुरुआत दो सदी पहले ही प्रारंभ हो गई थी। यह बहुत ख़राब है क्योंकि हमारा शरीर नए व तीव्र बदलावों के लिए तैयार नहीं। लाखों जीव-जंतु व वनस्पतियों की प्रजातियां तो नष्ट भी हो चुकी हैं। अब मानव जीवन का अस्तित्व भी दाँव पर है। सरकारें और नीतिकार जो बाजार और जीडीपी को ही हर समस्या का समाधान मान बैठे है, वे भी इस “न्यू नार्मल “स्थितियों का सही आकलन नहीं कर पा रहे। हाँ यथाशीघ्र नीतियों, योजनाओं व जीवन शैली में क्रांतिकारी परिवर्तन होने चाहिए इस पर सब सहमत हैं किंतु एक दूसरे पर दोषारोपण कर उसी पुराने ढर्रे पर चल निकलते हैं क्योकि जिन बड़े बदलावों को करना होगा उसके लिए जनमानस को तैयार करने व नया तंत्र बनाने की इच्छा शक्ति किसी के भी पास नहीं। 

चुनौती, कार्य योजना व वास्तविक क्रियान्वयन -

1. यूएन (यूनाइटेड नेशन) व वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम का लक्ष्य जीवाश्म ईंधनों (पेट्रोल, डीजल, गैस, कोयला) व मांसाहार का प्रयोग पूर्णता समाप्त करना। सभी देशों का संकल्प सन् 2070 तक जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य। व्यवहार में दुनिया में जीवाश्म ईंधनों व इनसे बने पदार्थों का उपयोग हर वर्ष 5-10ः तक बढ़ रहा है। 

2. यूएन का लक्ष्य ग्रीन एनर्जी व इलेक्ट्रिक व्हीकल को बढ़ावा। दुनिया में अभी 10ः ही ग्रीन एनर्जी का प्रयोग। जितनी मात्रा में ग्रीन एनर्जी व इलेक्ट्रिक व्हीकल का प्रयोग बढ़ रहा है उसी अनुपात में पेट्रोलियम पदार्थों व उन पर आधारित वाहनों की बिक्री भी बढ़ रही है।

3. यूएन (यूनाइटेड नेशन) का लक्ष्य पूरी दुनिया में खेती को कारपोरेट सेक्टर के हवाले करना क्योंकि छोटे किसान गलत तरीके से खेती करते हैं जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है। जहां जहां कृषि सुधार लागू किए गए वहाँ वहाँ व्यापक विरोध। वास्तविक धरातल पर यह बढ़ा चुनावी मुद्दा व खेती से हटे लोगों को वैकल्पिक रोजगार देने में मुश्किलें। 

4. यूएन का लक्ष्य मांसाहार व दुग्ध पदार्थों पर नियंत्रण व सन् 2030 तक इसमें 30ः तक कमी लाना। मांसाहार, दूध व उनसे बने उत्पादों के दुष्प्रभाव के विरुद्ध जन अभियान चलाना व लोगों को “वीजन” बनाना।  लगातार बदलते मौसम के कारण अनाज उत्पादन में कमी होती जा रही है। चूँकि अभी भी अनाज का उत्पादन मानवीय आवश्यकता से बहुत अधिक हो रहा है इस कारण स्थितियाँ संभाल ली जा रही हैं। किंतु सप्लाई चेन बिगड़ने व विदेशी मुद्रा की कमी के कारण अनेक राष्ट्र भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी अधिक उत्पादन के लिए जो नए बीज बनाए जा रहे हैं वे अपेक्षा के अनुरूप सफल नहीं हो रहे हैं। संकर फसलों से उत्पाद की गुणवत्ता भी गिरती जा रही है। अब पशुपालन (गाय, भैंस, सूअर, मुर्गी, मछली आदि) को कम करने की योजना पर काम चल रहा है। ये सारे बदलाव भीषण बेरोजगारी को भी जन्म दे रहे हैं। 

5. यूएन का लक्ष्य ऐसी तकनीक, जीवन शैली  व उपायों को अपनाना जिनसे कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण हो सके। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा प्रेरित वर्क फ्रॉम होम, एआई व डिजिटलीकरण पर आधारित चैथी औद्योगिक क्रांति को बढ़ाना। नई तकनीक के महँगा होने, कुशल विशेषज्ञों की कमी व विस्तार से रोजगार पर संकट की समस्या।

6. जीवाश्म ईंधनों के प्रयोग से हो रही ग्लोबल वार्मिंग के कारण जिन जलवायु परिवर्तनों का हम सामना कर रहे हैं उन्होंने मानव जीवन को बिखेरना शुरू कर दिया है-

अतिवृष्टि व अनावृष्टि अब आम बात है। हम निरंतर तूफान, बाढ़, सूखे, चक्रवात ,जंगलों में आग व भूकंप आदि का सामना कर रहे हैं और इन सभी चुनौतियों की निरंतरता बढ़ रही है। इस कारण व्यापक जन धन, संसाधन व कृषि उपज के नष्ट हो जाने से करोड़ों लोगों के जीवन यापन व विस्थापन का संकट आ खड़ा हुआ है। सरकार के आपदा प्रबंधन खर्च बढ़ते जा रहे हैं व आधारभूत ढाँचे को चोट पहुँच रही है। हर रोज यह चुनौती बढ़ती ही जानी है।रासायनिक खेती से बढ़ रही बीमारियों व मिट्टी की गुणवत्ता व उत्पादकता में कमी होती जाने  के कारण दुनिया  जैविक कृषि की ओर बढ़ रही है मगर जैविक कृषि से खाद व कीटनाशक कंपनियां बर्बाद हो जाएगी और बेरोजगारी बढ़ेगी।

बढ़ता तापमान व नई जीवन शैली विविध बीमारियों, मानसिक रोगों व महामारियों की वजह बनता जा रहा है। जिससे निकट भविष्य में करोड़ों लोगों को व्यापक परेशानी, आर्थिक तंगी से लेकर जान से हाथ धो बैठने तक की नौबत आ सकती है। कोई भी देश व सरकार आवश्यकता के अनुरूप स्वास्थ्य ढाँचा नहीं खड़ा कर पाएगा।गर्म देशों में बढ़ती लू व गर्मी के बीच हर घर में एसी लगाना व उसके अनुरूप बिजली उत्पादन बड़ी चुनौती होगी। फिर बढ़ते हुए बिजली बिल के भुगतान की क्षमता कितनों की हो पाएगी।

पिघलते ग्लेशियरो से समुद्र व नदियों का बढ़ता जलस्तर व बाढ़, सूखा, चक्रवात आदि बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार व जमीन छिनने का कारण बनते जा रहे हैं। निकट भविष्य में इसमें और तीव्रता आएगी। आपदाओं से होने वाले नुकसान सरकारों के बजट बिगाड़ देंगे। कैसे सरकारे करोड़ों लोगों को नए स्थानों पर बसा पाएँगे व किस प्रकार इनकी गुजर बसर हो पाएगी यह यक्ष प्रश्न है क्योंकि अगले एक दशक में इन लोगों की संख्या सौ करोड़ तक हो सकती है।

अगले एक दशक में हमारी जीवन शैली में व्यापक बदलाव होने जा रहे हैं। तेल व गैस उत्पादक देशों की बर्बादी तय है। एआई, डिजिटलीकरण, ग्रीन एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, कारपोरेट खेती, वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन शिक्षा आदि जीवन की वास्तविकता व अनिवार्यता बन जाएँगे। ऐसे में करोड़ों लोगों की नौकरी व व्यापार आदि छिन जाएँगे या उनको नए के अनुरूप ढलना होगा। ये बदलाव व्यापक राजनीतिक,आर्थिक व सामाजिक बदलावों वाले होंगे। अनेक देशों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों व बैंकों तक की अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाएगी तो छोटे मोटे उद्योगपति,व्यापारी, किसान  व नौकरीपेशा की तो बिसात ही क्या।

पुरानी शिक्षा प्रणाली अप्रासंगिक होती जा रही है व नई के प्रति जिस गति से काम होना चाहिए वो हो नहीं रहा। नये पाठ्यक्रम, नई लैब, अपग्रेडेड अध्यापक  व ढाँचा खड़ा करना बड़ी चुनौती है। स्किलिंग, रिस्किलिंग व अपस्किलिंग बड़ी चुनौती होने जा रही है। कुशल कामगारों के अभाव और आर्थिक अनिश्चितता में औद्योगिक उत्पादन पर असर पड़ना तय है। 

बदलाव व बिखराव से हमारी सप्लाई चैन पर लगातार असर पड़ रहा है। जिसके कारण वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं। होने वाले बदलाव इसको बढ़ा सकते हैं। 

बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई दुनिया के देशों में व्यापक अराजकता व  गृह युद्ध को जन्म देगी जिससे पार पाना बड़ी चुनौती होगी। 

गिरता कृषि उत्पादन खाद्य संकट को बढ़ावा दे रहा है जो आगे विकराल रूप लेने वाला है। जल संकट भी एक बड़ी चुनौती बन ही चुका है। बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण नदियों  में समुद्री खारा पानी बढ़ता जा रहा है जिस के कारण पीने व सिंचाई हेतु जल की कमी होती जा रही है। 

पर्यावरण असंतुलन से कृषकों के साथ ही उद्योग व्यापार व बैंक आदि से जुड़े लोग भी उतने ही परेशान हैं। देश व दुनिया का व्यापार ऊर्जा, खनिज, वाहन, इंफ्रा, निर्माण और कृषि क्षेत्रों पर प्रमुखता से टिका है और यही क्षेत्र व्यापक बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर इन्ही क्षेत्रों पर टिका है, अगर इन क्षेत्रों में ऐसे ही उतार चढ़ाव बने रहे तो वो बुरी तरह डूब सकता है। इन कारणों से ग्राहकों के व्यवहार व मिजाज में अप्रत्याशित बदलाव आ रहें हैं और हर एक असुरक्षा के दौर से गुजर रहा है। 

दुनिया के बड़े देश आपसी टकराव के दौर में हैं। शक्ति संतुलन बदल और बिगड़ रहे हैं। रुस - यूक्रेन युद्ध के बीच मध्य पूर्व एशिया व दक्षिण चीन सागर युद्ध के नए मैदान बन चुके हैं, जो तीसरे विश्वयुद्ध का संकेत दे रहे हैं। धार्मिक विवादों के साथ ही यूरोप व अमेरिका भीषण महंगाई, मंदी व बेरोजगारी से दो चार हैं। विदेशी मुद्रा की कमी के कारण सौ से अधिक देशों की अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है। यह सभी घटनाक्रम भीषण चुनौतियों की आहट दे रहे हैं। 

हम सभी इन चुनौतियों को समझ भी रहे हैं व इनसे जूझ भी रहे हैं और मौन रहकर पुरानी सोच व जीवन शैली के अनुरूप जी भी रहे हैं। अधिकांश मान चुके हैं कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं या फिर प्रकृति अपने आप निकाल ही लेगी या फिर जो होगा वो सबके साथ होगा तो हम ही क्यों चिंता करे।

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प्रसंगवश


श्री आशुतोष आशु ‘निःशब्द’, सत्कीर्ति-निकेतन, गुलेर, काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश, मो. 94180 49070 


हिंदी को पुकारता नाटू-नाटू श्री आशुतोष आशु ‘निःशब्द’

ऑस्कर पुरस्कार समारोह भारत के लिए दो शुभ समाचार लेकर आया। लघु फिल्म की श्रेणी में ‘एलीफेंट व्हिस्पर्रस‘ नामक भारतीय फिल्म को ‘उत्कृष्ट लघु फिल्म‘ पुरस्कार प्राप्त हुआ। हाथी के अनाथ बच्चों तथा उनके संरक्षकों के बीच अटूट भावनात्मक रिश्ते को दर्शाती भावुक कहानी ने जजों से खूब सराहना बटोरी। इस फिल्म की मूल पटकथा तमिल भाषा में है। दूसरी ओर नाटू-नाटू गाने ने ऑस्कर में श्रेष्ठ मौलिक गाने के रूप में पुरस्कार अर्जित करके भारतीय सृजनात्मकता का परचम विश्व भर में लहरा दिया। मूलतः यह गाना तेलुगु भाषा में लिखा गया है; गाने का हिंदी भाषांतर नाचो-नाचो नाम से है। 

एक भारतीय होने के नाते इन दोनों उपलब्धियों पर सीना गर्व से चैड़ा हो जाना निश्चित है। इसमें दो राय नहीं कि भारत में मौलिक सृजनात्मकता का अकूत भंडार छिपा पड़ा है। दक्षिण भारतीय सिनेमा में मौलिकता की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इधर लंबे समय तक मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को ही भारतीय सिनेमा का अभिन्न अंग मान लिया जा चुका था। खासकर हिंदी पट्टी के दर्शकों को मुंबई फिल्म इंडस्ट्री ने लंबे समय तक रिझाये रखा। हिंदी फिल्म निर्माण की दृष्टि से मुंबइया सिनेमा ने लंबे समय तक एकछत्र राज किया, इसलिए मुंबई को हिंदी सिनेमा का बेताज बादशाह कहना अतिशयोक्ति न होगा। 

इस उपलब्धि ने जहाँ हिंदी के प्रचार-प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका वहन की थी, वहीं दूसरी ओर इंडस्ट्री में व्याप्त एकछत्र-आधिपत्य के अनगिनत नुकसान भी हिंदी को उठाने पड़े हैं। मध्य से लेकर उत्तरी-पश्चिमी तथा बहुतांश पूर्वी भारत में भी हिंदी को अच्छे से पढ़ा तथा समझा जाता रहा है। इस अपार जनसंख्या घनत्व के दम पर हिंदी सिनेमा ने भारत में अपनी पैठ बनाई तथा आमदनी का एक बड़ा हिस्सा अर्जित किया। 

हिंदी के मुकाबले अन्य प्रादेशिक भाषाओं के सिनेमा का विस्तार सीमित क्षेत्र में होने के कारण उनके द्वारा किए गए सराहनीय कार्य को वैसा मुक्ताकाश प्राप्त ना हो सका जैसा हिंदी सिनेमा को प्राप्त था। मगर हिंदी सिनेमा ने यह प्रसिद्धि केवल अपनी सृजनात्मकता के बल पर अर्जित की थी, यह कहना ठीक नहीं होगा। जबकि यह भी सच है कि हिंदी दर्शकों की बहुलता भी हिंदी सिनेमा की प्रसिद्धि का एक कारण बना। कहने का अभिप्राय यह नहीं कि हिंदी सिनेमा में मौलिक सृजनात्मकता का सर्वथा अभाव ही रहा। मगर इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता कि हिंदी के अनेक प्रचलित गाने विदेशी धुनों में से निकले थे, जैसेः सोचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा। ऐसे अनगिनत गानों की लंबी फेहरिस्त है। 90 के दशक में संयोजित गानों को जिस किसी ने सुना होगा वह इस कथन का समर्थन अवश्य करेगा। 

हिंदी सिनेमा की पटकथाओं को लेकर भी यही समस्या रही। मसाला फिल्मों के बेतहाशा चलन ने हिंदी सिनेमा की उस पुख्ता नींव को खोखला करने का कार्य किया जिसे वी शांताराम, दादा साहब फाल्के, राज कपूर, सिप्पी बंधुओं आदि ने बड़े परिश्रम से स्थापित किया था। 

सत्य है कि गत दो दशकों में हिंदी सिनेमा की सृजनात्मकता निरंतर सवालों के घेरे में रही है। इक्का-दुक्का अच्छी पटकथाओं को छोड़कर बाकी सभी फिल्में लचर पटकथा के अटपटे निर्देशन की मारी, बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह ही गिरी हैं। हिंदी सिनेमा की तुलना में दक्षिण भारतीय सिनेमा ने एक-के-बाद-एक लगातार मौलिक कथाओं को उत्कृष्ट निर्देशन से सजा कर दर्शकों का मन मोह लिया। यहाँ तक कि हिंदी सिनेमा ने भी दक्षिण भारतीय पटकथाओं को अपने माध्यम से रूपांतरित करके वाहवाही बटोर ली; सिंघम जैसी फिल्में नजीर हैं। कहने का अभिप्राय है कि जहाँ हिंदी सिनेमा लगातार ह्रासोन्मुख दिखाई देता है, वहीं दक्षिण भारतीय सिनेमा ने सशक्तता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करायी है। 

वास्तव में यह सिनेमाई चिंता नहीं है। हिंदी सिनेमा का लगातार गिरता प्रदर्शन स्वयं हिंदी के लिए संकट उत्पन्न करता प्रतीत होता है। विगत कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का सिक्का मजबूती से चला है। बुकर पुरस्कार के बाद अब ये दो सम्मान भारत के लिए गौरव का विषय हैं। मगर गौर से देखें तो यह सभी सम्मान गैर हिंदी श्रेणी में प्राप्त हुए हैं। बुकर पुरस्कार भी अंग्रेजी अनुवाद ‘टूम ऑफ सैंड’ को प्राप्त हुआ था। 

सिनेमा एवं साहित्य भारतीय-भाषा का गौरव बढ़ाते आये हैं। फिलवक्त हिंदी सिनेमा का लगातार खराब प्रदर्शन हिंदी के मस्तक पर चिंता की रेखाएं खींच रहा है। आम जनमानस के मन में ऐसी अवधारणा पनपती है कि हिंदी के क्षेत्र में मौलिकता का नवोन्मेष ही नहीं हो पा रहा; जबकि यह सत्य नहीं। 

हिंदी साहित्य में भरपूर मौलिकता विद्यमान है। परंतु यहाँ रचनात्मकता कुनबों एवं खेमों में बंटी जान पड़ती है। यही हाल हिंदी सिनेमा का हो रखा है। हिंदी पट्टी में साहित्यिक मंच कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। दो या चार लेखक-मित्र मिलकर एक मंच खड़ा कर लेते हैं तथा अपने जैसी औसत सृजनात्मकता को मंच प्रदान करने के नाम पर हिंदी से खिलवाड़ करते दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी कमोबेश यही हालात हैं। स्तरीय संस्थानों में गुरु हैं, और आगे की साहित्यिक यात्रा का उत्तरदायित्व केवल उनके चेलों को प्राप्त है। 

स्थापना की इस जंग में मौलिक सृजनात्मकता के अनेक चेहरे हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं। हिंदी सिनेमा पर नेपोटिज्म नामक दुराचार का आरोप लगता रहा है। एकछत्र आधिपत्य के चलते अच्छी कहानियाँ एवं अच्छे कलाकार लगातार उपेक्षा का दंश झेलते आए हैं। 

कुनबों में बंटे समाज को प्रगतिशील समाज नहीं कहा जाता। हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए हिंदी पट्टी को एकजुट होने की आवश्यकता है। मौलिकता को खंगाल कर स्तरीय लेखन को मुक्त आकाश प्रदान करने का समय प्रस्तुत है। निजी पसंद-नापसंद को त्याग कर अच्छे लेखकों को उपयुक्त अवसर प्रदान करने से भाषाई व्योम निश्चित ही विस्तारशील होगा। सुप्रसिद्ध संगीतकार ए. आर. रहमान ने भी हाल ही में कहा है कि रचनाओं के चुनाव में हमसे कहीं न कहीं चूक हो रही है। यह सच है कि चुनाव में हमसे कहीं न कहीं चूक तो अवश्य हो रही है। अन्यथा भारत की झोली में ऑस्कर या बुकर, यदा-कदा नहीं, बल्कि अक्सर आ-मिले होते। 

वैसे भारतीय प्रतिभा को अपनी उत्कृष्टता साबित करने के लिए विदेशी पुरस्कारों अथवा मान्यताओं की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कारों का वितरण ज्यूरी नहीं, बाजार की हवाओं का रुख तय करता है। 

विश्व को जब भारत में सौंदर्य प्रसाधनों के कारोबार का अवसर दिखाई पड़ा था, तब भारतीय सुंदरता धड़ल्ले से वैश्विक पटल पर अपना परचम लहराने लगी थी। मगर अब भाषा के महीन धागे को सहारा बनाकर एकजुटता के बीच लकीर खींचना दूर का सपना है, जो कभी पूरा नहीं हो सकता। पूरब, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण - देश की समस्त दिशाओं में व्याप्त रचनात्मकता संपूर्ण रूप से भारतीय है। आशा है कि हिंदी में भी मौलिकता का दर्शन शीघ्र सुलभ होगा।  

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समीक्षा


डाॅ. अवधबिहारी पाठक, सेंवढ़ा, जिला दतिया (म.प्र.), मो. 9826546665


डाॅ. उमा त्रिलोक


न दिया वक्त ने वक्त को वक्तः अर्थात ‘‘उस पार’’

डाॅ. उमा त्रिलोक का लिखा उपन्यास देखने को मिला आपने पर्याप्त लेखन किया है और आपकी कई रचनाएँ विदेशी भाषा में अनुदित हैं। इस रचना से गुजरते हुए निम्न तथ्यों को रेखाँकित किया जा सकता है-

यह रचना उपन्यास तो हो सकती है परन्तु मैं इसे कथा डायरी कहना चाहूँगा। क्योंकि घटना और प्रसंगों की स्मृतियों के आधार पर जिन्दगी की उठती हाट में चर्चा है। अस्तु स्मृतियाँ कथानक पर हावी हैं। हुआ कुछ नहीं, किसी हुए को कह डालने की बेचैनी ने कथा का एहसास करा ही डाला जो लेखकीय कौशल है साथ ही स्मृतियों को क्रम से सहेजने का उपक्रम भी है। रचना में कुछ अध्याय चले परन्तु अचानक बिना किसी भूमिका के स्मृतियाँ पात्रों के जीवन का अपना वर्तमान बन गईं, जो परस्पर पत्र शैली में चला अस्तु रचनात्मकता के आधार पर यह रचना उपन्यास और कथा डायरी दोनों के बीच एक नई विधा को जन्म देती है। जो हिन्दी में नया प्रयोग है। इसे कोई नाम देना जल्दबाजी होगी। फिर भी इसे फिलहाल आत्म-लाभ तो कहा ही जा सकता है।

रचना में दो मुख्य पात्र विग्रेडिर विक्रम और नयन तारा हैं। कुछ पात्र कथाक्रम को आगे बढ़ाने के लिए आ गए हैं। माली की मदद से विक्रम नयन तारा के घर बगीचा देखने के लिए पहुँचता है। बड़े कम परिचय में ही प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी नयन तारा ने अपना प्रेम प्रसंग प्रेमिका नयन तारा को स्वीकार करना उसके घर से बच्ची को जन्म देना और माँ की घृणा से उत्पन्न प्रतिदान में घृणा पूर्वक माँ से दूर हो जाना जैसे प्रसंग विक्रम से प्रकट कर देती है। पहली ही भेंट में आत्मीयता का विस्तार होता है। विक्रम, सरू (सरिता) प्रसंग को नयना से प्रकट कर देता है। यह दो टूटे हुए अन्तःकरणों का सहज बहाव है। जिन्होंने गाँठें खोली उसे प्रकट तो किया परन्तु गाँठ खुलती कहाँ है। चार माह की आत्मीयता ने निकटता ला दी दोनों में नेह की तरलता जागी। परन्तु प्रेम को कबीर का आदर्श कायम रहा। कहीं भी उसे स्थूल नहीं होने दिया। यह लेखक का शिल्प कौशल है और प्रेम की परिपक्वता का सबूत। एक विशेष बात जो दिखी कि नयना और विक्रम ने परस्पर दुराव का जगह नहीं दी। यहाँ याद किया जा सकता है कि लेखक ने प्रेम के ऐसे स्वरूप को वाणी दी है जो ढाई आखर वाला प्रेम है। यहाँ रहस्यों का निरावृत्तता इन्सानी जिन्दगी का विदू्रप नहीं बन सकी। नयना, विक्रम के साथ एक भौतिक समय काट सकती थी परन्तु वह बिना बताए चली गई। जहाँ उसका मौत के मुँह में जाना तय था। केवल इसलिए विक्रम के प्रेम को कष्ट न हो, विक्रम नयनतारा के जाने का कारण खोजता रहा। बार-बार लौटने को पत्र लिखा, वह अपने प्रेमादर्श के उदात्त रूप को देखने को लालायित था किन्तु अपने-अपने गोपन को बहा देने के वावजूद एक ऐसा रूप देने का संकल्प था, जिसमें दोनों के व्यक्तित्व से कहीं बदबू नहीं आये।

रचना में सरू वाला प्रसंग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। पूर्वाद्ध में विक्रम एक एलीट पात्र दिखने वाले रूप को छोड़कर इन्सान के सहज रूप में दिखा। जहाँ वह सरू की गरीबी, असहायता, वेवशी और अवसाद को पढ़ सका हैं। कहाँ है उपन्यासों में ऐसे दृश्य सरू के दूर चले जाने का विक्रम को दुख तो है लेकिन पश्चाताप नहीं और न बदले की भावना। यहाँ विक्रम का एक नारी के प्रति गलित करुणा का स्रोत दिखा, जो जैनेन्द्र के उपन्यास त्याग-पत्र में दिखा था। यहाँ लेखक ने जैनेन्द्र की परम्परा को एक नया आयाम देने की कोशिश की है। आज इक्कीसवीं सदी में नारी को अपने अधिकारों की उतनी ही जरूरत है जितनी कि समाज नारी को नारी समझकर उसकी मदद् को आगे आवे। वह अपने अधिकारों को खोज रही है परन्तु पुरुष सत्तात्मक समाज उसे अधिकार भी नहीं दे रहा है। नारी बेल है उसके भीतर बेल आरोहण की प्रवृत्ति ने आत्म विश्वास पैदा ही नहीं होने दिया। नयनतारा कहती है- ‘‘मुझमें इतनी ताकत नहीं थी कि समाज के मूल्यों को बदल सकती और समाज को अपने मूल्य मनवाने को मजबूर करती। मैं यहाँ आकर छुप गई समाज ने मुझे ठुकरा दिया।’’ (पृष्ठ-42)

उपन्यास नारी वादी है जो नारी का वाद पुरुषसत्ता के सामने खड़ा करती है पर अपनी सहजता को नहीं छोड़ना चाहती। लेखक का संकेत है कि नारी तो समाज की एक इकाई होकर भी प्रकृति है उसे अस्तित्व को चुनौती देना है तो पुरुष सत्ता को प्रकृति की ओर लौटना होगा। जहाँ सहजता में कोई व्यतिक्रम न हो लेखक स्थापित कर सका है कि नारी को अधिकार तो दो परन्तु उसे प्रकृति का उपहार समझकर।

जहाँ तक भाषा की बात है तो यह रचना गद्य में भी होकर गद्य नहीं है। विक्रम और नयना के मँुह से निकले शब्द और वाक्यों में एक ताल है जिसे पढ़ने वाला पढ़ता कम है उन शब्दों की गमक को वजन को उसमें पैदा हुई बेचैनी को गहराई से व्यंजित करता है। यथा- ‘‘तुम्हें मैं तुम्हारे पास- अपनी अमानत समझकर छोड़ आई हूँ’’। (पृष्ठ-100) रचना में उर्दू भाषा की चर्चा है निश्चित रूप से लिपि कोई भी हो नागरी भाषा तो नागरी ही रहेगी। चाहे वह उर्दू पंजाबी में लिखी जावे इसी तरह देश की सीमाओं को विखरने की चर्चा लेखक ने की है, यहाँ युद्ध भी बेकार है क्योंकि युद्ध सीमाओं को बढ़ाता है। लेखक दृष्टि यहाँ वसुधैव कुटुम्बकम की दिखी है।

एक अलग बात जो है वह यह है कि लेखक का संकेत है कि सारे द्वन्द्वों से मनुष्य को दूर जाना है, तो प्रकृति की ओर लौटना पड़ेगा विक्रम और नयना की भाँति। जहाँ नारी पुरुष की पद्चाप को और पुरुष नारी की पद्चाप को सुन सके। तभी तो विक्रम नौकरों से पूछता है- ‘‘क्या मेम साब आ गईं।’’ (पृष्ठ- 183) और उनसे बात भी करता है और आई एम बैक भी कहता है। जबकि कोई पात्र नहीं है। यहाँ मानव हृदय किसी भी स्थूल भौतिकता से बहुत दूर खड़ा दिखाता है जहाँ केवल प्यार हो वही कवि वाला प्रेम, इस रचना में दिखता है जो इन्सानी फितरतों से बहुत दूर हो जाता है। रचना में कुछ ऐसा है कि सबकी होकर भी सबसे अलग है। इसके पढ़ने के लिए करुणा दया त्याग और खुले पन से लवरेज एक हृदय चाहिए। काश पढ़ने वाले लोग लेखक की अन्तर्पीढ़ा का साक्षात्कार कर सकें। क्योंकि उस पार देखने के लिए अलग ही आँखे चाहिए। पागल के गीत का रचनाकार रामभरोसे पाठक कवि तो कह देता है विक्रम की तरह ‘‘उस पार बुलाता कोई मुझे’’ उमा त्रिलोक का लेखक भी ऐसी ही अन्तध्र्वनियों को सुनने का आकाँक्षी है।

ऐसी रचना मनोवैज्ञानिक रचना का हिन्दी में समादर होना चाहिए। 

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आलेख


श्री राकेश गौड़, नई दिल्ली, मोः 9818974184

मुद्दा क्या है ?

यह बात लगभग एक साल पहले की है, जब वर्ष 1991 से चल रहा ज्ञानवापी मस्जिद विवाद दोबारा अपने चरम पर था वाराणसी की जिला अदालत ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में देवी देवताओं की पूजा की मांग को लेकर की गई पाँच महिलाओं की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मैं सुबह - सुबह पार्क में सैर कर रहा था। मेरा मानना है कि बात करते - करते घूमने से आपका तारतम्य टूट जाता है और कोई विशेष स्वास्थ्य लाभ नहीं होता। दूसरे, बातचीत भी आजकल राजनीति, विशेषकर हिंदू - मुस्लिम की राजनीति तक सिमट कर रह गयी है और यह एक कड़वा सच है कि इस विषय में अधिकतर चर्चा पूर्वाग्रह से ग्रसित रहती है। इसलिए मैं परिचित लोगों से दुआ - सलाम करके आगे बढ़ लेता हूँ। उस दिन भी मेरे आगे - आगे चार पाँच लोग ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर चर्चा कर रहे थे। एक दो लोग तो बड़े आवेश में कह रहे थे, ‘‘अरे भाई सीधी सी बात है, मुगल तो बहुत बाद में देश में आये और मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदें बनायी गईं, तो फिर शक की गुंजाइश कहाँ रह जाती है। फिर यहाँ तो सरेआम दिखायी दे रहा है कि शिवलिंग को ही फव्वारे में बदल दिया गया है। वहाँ पूजा करना तो हमारा अधिकार है, इसमें कोई भी अदालत क्या करेगी। में मन ही मन मुस्कुरा रहा था, “इस देश में हर आदमी, इतिहासवेत्ता, धर्म का पंडित, वकील और डाक्टर, सब कुछ है।”

तभी मेरा ध्यान फुटबाल मैदान में खेलने की तैयारी कर रहे कुछ नाईजीरियाई नागरिकों की ओर गया। मैंने पहले भी उन्हें कई बार यहाँ खेलते हुए देखा था। उस दिन मैंने देखा कि जब सब खिलाड़ी तैयार हो गए तो उन्होंने एक घेरा बना कर घूम घूम कर प्रार्थना करनी शुरू कर दी। मुझे एक शब्द ‘‘हेलोलूयाह‘‘ से ऐसा आभास हुआ। मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि इस टीम में दो भारतीय खिलाड़ी भी थे। वह सूर्य नमस्कार की मुद्रा में अपनी टीम की जीत के लिए प्रार्थना कर रहे थे। जैसे ही उनकी प्रार्थना समाप्त हुई तो वे दोनों भी उनके साथ मिल कर घेरे में घूमने लगे। मुझे लगा कि यह तो कोई मुद्दा ही नहीं है। क्रिकेट की ‘आई पी एल‘ प्रतियोगिता तो इसका और भी बड़ा उदाहरण है। जब खिलाड़ी अपने अपने ढंग से प्रार्थना करके एक टीम में खेल सकते हैं तो हम अलग अलग सम्प्रदाय के लोग अपने अपने ढंग से पूजा करके भी मिलजुल कर क्यों नहीं रह सकते। एक के बाद एक विवाद खड़ा करने की क्या आवश्यकता है ?

इसी ऊहापोह में घूमते-घूमते मेरी आँखों के आगे लगभग पच्चीस वर्ष पहले की एक घटना घूम गयी । रोटरी क्लब से जुड़ा होने के कारण मुझे नाईजीरिया से आई रोटरी क्लब की टीम के सदस्यों को दिल्ली में भ्रमण कराने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। हमने उनका कार्यक्रम इस प्रकार बनाया था कि दिल्ली के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व धार्मिक स्थलों का भ्रमण कराया जा सके। दक्षिण दिल्ली स्थित विश्व प्रसिद्ध कुतुब मीनार के भ्रमण के पश्चात कुछ दूर स्थित छतरपुर मंदिर भी उस दिन के कार्यक्रम में सम्मिलित था। मैं जब टीम के सदस्यों को लेकर छतरपुर मंदिर पहुँचा तो मंदिर में प्रवेश से पहले उनसे जूते उतारने का अनुरोध किया। कई सदस्यों ने सहर्ष अपने-अपने जूते उतार दिए और मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ने लगे। मैंने पीछे मुड़कर देखा, उनके टीम लीडर से एक सदस्य तर्क कर रहा था। वह कह रहा था, ‘‘मैं अपने जूते क्यों उतारूँ?” टीम लीडर ने उसे समझाने की कोशिश की, “इनकी ऐसी परम्परा है तो तुम्हें इसमें क्या परेशानी है?‘‘ उसका जवाब था, “मगर हमारे यहाँ यह परम्परा नहीं है।” “ठीक है, अगर तुम्हें मंदिर में जाना है तो इनकी परम्परा को मानते हुए, जूते उतार कर आ जाओ वरना यहीं बैठ कर प्रतीक्षा करो”, टीम लीडर ने कहा। उसका जवाब था, “मैं मंदिर में जाने के लिए अपने जूते नहीं उतारूँगा और यहीं बैठकर इंतजार करूँगा।” टीम लीडर ने बड़ा अजीब मुँह बनाया और मुझसे खेद प्रकट करके टीम के अन्य सदस्यों के साथ मंदिर की ओर बढ़ने लगा। मुझे उस समय कुछ भी अजीब नहीं लगा था। अगर किसी को दूसरे के धर्म की मान्यताएँ और परम्पराएँ स्वीकार्य नहीं हैं तो हम उसे क्यों बाध्य करें?

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तो हमारे देश में स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। कोई सड़क पर ही नमाज पढ़ने की जिद पर अड़ा है तो कोई अपना रोजा खोलने के लिए हाइवे पर ही बैठ गया है। उधर रामलीला की सवारी और हनुमान जयंती की शोभायात्रा भी संवेदनशील इलाक़ों से ही निकालने की जिद है। हाँ, रामनवमी व अन्य त्यौहारों के अवसर पर भंडारे में भाग लेते मुस्लिम भाईयों को देखकर व इफ्तार की दावतों में हिंदू भाईयों को शामिल होते देख कुछ राहत जरूर मिलती है। चुनावों के दौरान इस तरह के विवाद कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ लेते हैं।

यह कैसा विरोधाभास है कि सुनहरी पर्दे पर शाहरुख़ खान को ‘राहुल‘ बन कर रोमांस करते देख कर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती अपितु उन्हें अपने फैन्स का भरपूर प्यार मिलता है। इसी तरह कई मुस्लिम अभिनेत्रियों ने सुनहरे पर्दे पर आने से पहले न केवल अपना नाम बदल लिया अपितु फिल्मों में भी पर्दा प्रथा को न मान कर हिंदू चरित्र निभाए हैं। कितने ही हिंदू अभिनेता अभिनेत्रियों ने मुस्लिम चरित्र निभा कर न केवल प्रशंसा बटोरी है अपितु पुरस्कार भी प्राप्त किए हैं। पर भी अपनी धार्मिक मान्यताओं से कोई समझौता करने का आरोप नहीं लगा है।

इनमें से किसी में यही सोचते हुए घूम रहा था कि आम जनता के लिए तो ये कोई मुद्दे ही नहीं हैं मगर हमारे राजनीतिक आका, चाहे किसी भी दल से हों, अपनी चुनावी रोटियाँ सेंकने के लिए धर्म के ‘चूल्हे‘ की आँच को मंदा नहीं होने देंगे। वरना खेल और कला तो देश के विभिन्न सम्प्रदायों के लोगों को एक सूत्र में बांधते हैं। अचानक फुटबाल ग्राउंड में शोर मचा। मैंने देखा कि नाईजीरियाई खिलाड़ी ने गोल दाग दिया और उसकी टीम के भारतीय खिलाड़ी भी दौड़ कर उस से लिपट गए। मैं सोच रहा था तो फिर मुद्दा क्या है भाई !!-

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     चर्चा के बहाने


     डाॅ. रेनू यादव


     असिस्टेंट प्रोफेसर

     भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग

     गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, 

     यमुना एक्सप्रेस-वे,  गौतम बुद्ध नगर, ग्रेटर नोएडा, 

     ई-मेल- renuyadav0584@gmail.com


     पुस्तक: वर्जित इच्छाओं की सड़क 

     लेखक: अनुराधा ओस

     विधा: काव्य

     संस्करण: प्रथम, 2022

     प्रकाशन: बोधि प्रकाशन, जयपुर


‘कविता क्या है’ निबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी लिखते हैं, “कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है। यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम मनोभाव मनुष्य के अंतःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। कविता हमारे मनोभावों को उच्छृसित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है। हम सृष्टि के सौंदर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं। कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है। हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है”।  

कविता के संदर्भ में शुक्ल जी का यह वाक्य अनुराधा ओस के काव्य-संग्रह ‘वर्जित इच्छाओं की सड़क’ के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठता है। अनुराधा जी की कविताएँ हृदय की कोमल भावनाओं से निकल कर पाठक को सहृदयी बनाती हैं, जिसे वे प्रसव पीड़ा की असहनीय दर्द से झेलकर मौन संवाद को जन्म देने के भाँति समझती हैं। सत्य तो यह है कि पीड़ा झेलने वाला व्यक्ति ही दूसरों की पीड़ा समझ सकता है। वे ‘खो खो खेलती लड़कियाँ’ कविता में अपने होने का प्रमाण देने वाली लड़कियों के पैरों तले की जमीन का मजबूत होने की चाह रखती हैं तो देह व्यापार में फँसी लड़कियों की तुलना सिक्के से कर उनकी जरूरतों और विवशताओं के तह तक पहुँचती हैं। वे बुलबुल का तुलसी पर घोसला बना कर छाँव पाने के माध्यम से संसार के आखिरी आदमी के सर पर छत की चाह रखती हैं तो समय की पीठ पर न्यायधीश का फैसला किसानों के हक में न जाने से दुखी दिखाई देती हैं। वे हिंसक व्यक्ति के जीवन से कोमलता गायब होने को लेकर चिंतित हैं दूसरी तरफ भूख की लड़ाई लड़ने वालों के प्रति सरकारी योजनाओं के असफल हो जाने से समाज में घटती इंसानियत को लेकर व्यथित दिखाई देती हैं। वे इस बात को अच्छी तरह से समझती हैं कि अभावों का भय मनुष्य में बहुत बार साहस भी पैदा कर देता है, “भय और भूख/दुःख और मौन/जब नहीं बदल पाते डर में/तब वो बदल जाता है/साहस में”। 

सभ्य होने और असभ्य होने के प्रश्न के बीच अभाव एक बहुत बड़ा कारक होता है और उस कारक का परिणाम रेखांकित करते हुए वे लिखती हैं, “सभ्य लोगों की दुनियाँ में/अभाव तो है/मगर दूसरे तरह के /अकेलापन, अवसाद, भरे पेट ऊब/एक दूसरी दुनियाँ जहाँ/अभाव-गंदगी-भूख/जो उन्हें सभ्यता से बहुत परे/धकेल देता है”।  

सभ्यता स्वयं के बदलाव से भी बचने की शुरूआत हो सकती है कदाचित कवयित्री इसलिए ही लिखती हैं, “मैं झरनों का संगीत होना चाहती हूँ”। कवयित्री के काव्य में व्यक्तिगत दुख, व्यक्ति, समाज, प्रेम, स्त्री, खेत-खलिहान, भूख, पीड़ा और जीवन आदि सब कुछ दिखाई देता है।

कविता ‘स्व’ की अभिव्यक्ति होते हुए भी ‘पर’ की अभिव्यक्ति में बदल जाती है । कविता जीवन ढूँढने का मार्ग है तो जीवन को जीवन देने का और बदलाव का भी... ।


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